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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

नक्षत्रप्रकरण ४१ चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मृगशिरा, शतभिष, अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित् और श्रवण नक्षत्र में; मंगल, रविवार, बृहस्पति दिन में शिरामोक्षण अर्थात् फस्त खोलवाना शुभ होता है। बुध और शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में और इन्हीं पूर्वोक्त नक्षत्रों में विरेक-वमन आदि शुभकारक होता है। अनुराधा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र में; रविवार, सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्र दिन में; बुध और बृहस्पति के लग्न वा षड्वर्ग में; लग्न में बृहस्पति के रहते और कर्त्ता का बृहस्पति बली होने पर धर्म- क्रिया का आरम्भ करना शुभ होता है ॥ ३० ॥ धान्यच्छेदनमुहूर्त्त तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दु- स्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये । मन्दाररिक्तरहिते दिवसेऽतिशस्ता धान्यच्छिदा निगदिता स्थिरभे विलग्ने ॥ ३१ ॥ अन्वयः- तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दुस्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये, मन्दार- रिक्तरहिते दिवसे, स्थिरभे विलग्ने धान्यच्छिदा अतिशस्ता निगदिता ॥ ३१ ॥ मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, पूर्वाभाद्रपद, हस्त, कृत्तिका, धनिष्ठा, श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, मघा, तीनों उत्तरा, पूर्वाषाढ़, भरणी, चित्रा और पुष्य नक्षत्र में; शनैश्चर, मंगल दिन और रिक्ता तिथि को छोड़ अन्य दिन और तिथि में और स्थिर लग्न में अनाज का काटना शुभ होता है ॥ ३१ ॥ कणमर्दन और सस्यरोपण का मुहूर्त्त भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूल- मैत्रान्त्यभेषु कथितं कणमर्दनं सत् । द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे सस्यस्य रोपणमिहार्किकुजौ विना सत् ॥ ३२ ॥ अन्वयः-भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूलमैत्रान्त्यभेषु, कणमर्दनं सत् कथितम् । द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे, आर्किकुजौ विना सस्यस्य रोपणं सत् ॥ ३२ ॥ पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, श्रवण, मघा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मूल, अनुराधा और रेवती नक्षत्र में कणमर्दन अर्थात् खरिहान में अनाज का

४२ मुहूर्त्तचिन्तामणि पीटना अथवा माड़ना शुभ है। विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, मूल, रोहिणी, शतभिष और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में; शनैश्चर और मंगल को छोड़ अन्य दिनों में; खेतों में धान का लगाना शुभ है ॥ ३२ ॥ धान्यस्थिति और धान्यवृद्धि का मुहूर्त्त मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु कर्कजतौलिरहिते च तनौ शुभाहे । धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता ध्रुवेज्य- द्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु च धान्यवृद्धिः ॥ ३३ ॥ अन्वयः-मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु च (तथा) कर्कजतौलिरहिते तनौ, शुभाहे धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता। च [पुनः] ध्रुवेज्यद्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु धान्यवृद्धिः शुभकरी गदिता ॥ ३३ ॥ विशाखा, कृत्तिका, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा और ज्येष्ठा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; कर्क, मेष और तुला को छोड़ अन्य लग्नों में; सोम, बुध, शुक्र और बृहस्पति के दिन में धान्यस्थिति अर्थात् अन्न का रखना शुभ होता है। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुष्य, विशाखा, ज्येष्ठा, अश्विनी, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र में धान्यवृद्धि अर्थात् डेढ़ी और सवाई पर अनाज देना शुभ है ॥ ३३ ॥ शान्तिक और पौष्टिक मुहूर्त्त क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु शस्तं स्याच्छान्तिकं च सह मङ्गलपौष्टिकाभ्याम् । खेऽर्के विधौ सुखगते तनुगे गुरौ नो मौढ्यादिदुष्टसमये शुभदं निमित्ते ॥ ३४ ॥ अन्वयः-क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु अर्के खे, विधौ सुखगते, गुरौ तनुगे मङ्गल- पौष्टिकाभ्याम् सह शान्तिकं शस्तं स्यात् । मौढ्यादिदुष्टसमये नो शुभदं (तथा) निमित्ते [केत्वाद्युत्पातदर्शने सति] शुभदं (स्यात्) ॥ ३४ ॥ अश्विनी, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अनुराधा और मघा नक्षत्र में; रिक्ता, अष्टमी, पूर्णमासी, अमावस, सूर्य-संक्रान्ति, रविवार, मङ्गल, शनैश्चर को छोड़ अन्य तिथियों और दिवसों में; लग्न से दशवें स्थान में सूर्य, चौथे स्थान में

गणेशादि की पूजा, Wait, is it "गणेशादि"? "मङ्गल अर्थात् गणेशादि की पूजा," -> Yes.

पौष्टिक अर्थात् पुष्टिकामना से कोई पुरश्चरणादि और मूलशान्ति आदि करना शुभ है । बृहस्पति, शुक्रास्तादि और केतूदयादि उत्पात के समय को Wait, space before danda? "करना शुभ है।" - no space before danda.

छोड़कर उक्त मुहूर्त्त मिले तो बहुत उत्तम है, अन्यथा कैसा ही समय हो, शान्त्यादि करने में कुछ दोष नहीं है ॥ ३४ ॥ होमाहुतिमुहूर्त्त सूर्यभात्तित्रिभे चान्द्रे सूर्यविच्छुक्रपङ्गवः । चन्द्रारेज्यागुशिखिनो नेष्टा होमाहुतिः खले ॥ ३५ ॥ अन्वयः—सूर्यभात् त्रित्रिभे चान्द्रे [चान्द्रर्क्षे] सूर्यविच्छुकपङ्गवः चन्द्रारेज्यागुशिखिनः Wait, does it have colon after अन्वय? "अन्वयः—" (visarga + em-dash). Then: "(स्युः) खले होमाहुतिः नेष्टा (भवति) ॥ ३५ ॥" सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे तीन-तीन नक्षत्रों का एक

४४ मुहूर्त्तचिन्तामणि नवान्नभक्षणमुहूर्त्त नवान्नं स्याच्चरक्षिप्रमृदुभे सत्त नौ शुभम् । विना नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् ॥ ३७ ॥ अन्वयः—चरक्षिप्रमृदुभे, सत्त नौ, नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् विना नवान्नं (शुभं) स्यात् ॥ ३७ ॥ श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट शुभग्रहों के लग्न में, परीवा, छठि, एकादशी तिथि, विषघटी, पूस और चैत्रमास, मङ्गल और शनैश्चर दिन को छोड़ अन्य तिथि, वार और मास में नवान्न- भक्षण शुभ है ॥ ३७ ॥ नौकाघट्टनमुहूर्त्त याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे । भृग्विज्यार्कदिने नौकाघट्टनं सत्त नौ शुभम् ॥ ३८ ॥ अन्वयः—याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे, भृग्वीज्यार्कदिने सत्त नौ नौकाघट्टनं शुभम् ॥ ३८ ॥ भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, विशाखा, ज्येष्ठा, आश्लेषा, मघा, आर्द्रा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; शुक्र, बृहस्पति और रविवार में तथा शुभग्रहयुक्त वा दृष्ट शुभ लग्न¹ में नाव का बनवाना शुभ होता है ॥ ३८ ॥ वीरसाधन व अभिचार का मुहूर्त्त मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे सौम्ये घटे तनौ । सुखे शुक्रेऽष्टमे शुद्धे सिद्धिवीराभिचारयोः ॥ ३९ ॥ अन्वयः—मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे, घटे तनौ सौम्ये, शुक्रे सुखे, अष्टमे शुद्धे वीराभि- चारयोः सिद्धिः (भवति) ॥ ३६ ॥ मूल, आर्द्रा, भरणी, मघा और मृगशिरा नक्षत्र में; बुधयुक्त कुम्भ लग्न में; लग्न से चौथे स्थान में शुक्र के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह के न रहते वीरसाधन और अभिचार करना सिद्धिकारक होता है ॥ ३९ ॥ रोग शान्त होने के पश्चात् स्नान का मुहूर्त्त व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये रिक्ते तिथौ चरतनौ विकवीन्दुवारे । १—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।

नक्षत्रप्रकरण ४५ स्नानं रुजा विरहितस्य जनस्य शस्तं हीने विधौ खलखगैर्भवकेन्द्रकोणे ॥ ४० ॥ अन्वयः—व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये, रिक्ते तिथौ, चरतनौ, विकवीन्दु- वारे, विधौ हीने, खलखगैः भवकेन्द्रकोणे, (तदा) रुजा विरहितस्य [जनस्य] स्नानं शस्तम् ॥ ४० ॥ रेवती, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मघा, स्वाती और आश्लेषा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; रिक्तासंज्ञक तिथियों में; शुक्रवार और सोमवार को छोड़ अन्य दिनों में, मेष, कर्क, तुला और मकर लग्न में निषिद्ध स्थान में चन्द्रमा के रहते और गेरहवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें स्थान में पापग्रहों के रहते रोग से छूटे हुए पुरुष का स्नान करना शुभदायक होता है ॥ ४० ॥ शिल्पविद्या के प्रारंभ का मुहूर्त्त मृदुध्रुवक्षिप्रचरे ज्ञे गुरौ वा खलग्नगे । विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥ अन्वयः—मृदुध्रुवक्षिप्रचरे, ज्ञे खलग्नगे, वा गुरौ खलग्नगे, विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥ मृदुसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक और चरसंज्ञक नक्षत्रों में; लग्न और दशवें स्थान में बुध या बृहस्पति के रहते; बुध और बृहस्पति के षड्वर्ग में चन्द्रमा के रहते शिल्पविद्या का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है ॥ ४१ ॥ सन्धानमुहूर्त्त सुरेज्यमित्रभाग्येषु चाष्टम्यां तैतिले हरौ । शुक्रदृष्टे तनौ सौम्यवारे सन्धानमिष्यते ॥ ४२ ॥ अन्वयः—सुरेज्यमित्रभाग्येषु, च (तथा) अष्टम्यां, हरौ, तैतिले, शुक्रदृष्टे तनौ, सौम्यवारे सन्धानं इष्यते ॥ ४२ ॥ पुष्य, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, अष्टमी, द्वादशी, सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार, शुक्र से दृष्ट वा युत लग्न और तैतिलनाम करण में सन्धि और मित्रता करना शुभ होता है ॥ ४२ ॥ परीक्षामुहूर्त्त त्यक्त्वाष्टभूतशनिविष्टिकुजान् जनुर्भ- मासौ मृतौ रविविधू अपि भानि नाड्यः ।

४६ मुहूर्त्तचिन्तामणि द्व्यङ्गे चरे तनुलवे शशिजीवतारा- शुद्धौ करादितिहरीन्द्रकपे परीक्षा ॥ ४३ ॥ अन्वयः-अष्टभूतशनिविष्टिकुजान्, जनुर्भमासौ, मृतौ रविविधू, अपि नाड्याः भानि त्यक्त्वा, द्व्यङ्गे चरे तनुलवे, शशिजीवताराशुद्धौ, करादितिहरीन्द्रकपे, परीक्षा (कार्या) ॥ ४३ ॥ अष्टमी, चतुर्दशी, शनैश्चर, मंगल, भद्रा, जन्मनक्षत्र, जन्ममास, आठवाँ सूर्य, आठवाँ चन्द्रमा, जिस नाड़ी में जन्मनक्षत्र हो उस नाड़ी¹ के सब नक्षत्र, इन सबको छोड़कर हस्त, पुनर्वसु, श्रवण, ज्येष्ठा, शतभिष नक्षत्र में; मिथुन, कन्या, धन, मीन, मेष, कर्क, तुला, मकर लग्न में और इन्हीं राशियों के नवांश में; चन्द्रमा और बृहस्पति का गोचर शुद्ध तथा ताराशुद्धि रहते परीक्षा अर्थात् सत्यासत्य के निर्णय के लिये लोहे का गरम गोला आदि उठवाना शुभ होता है ॥ ४३ ॥ सब शुभ कार्यों में लग्नशुद्धि व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते । चन्द्रे त्रिषट्दशायस्थे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥ अन्वयः-व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते, त्रिषड्दशायस्थे चन्द्रे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥ लग्न से बारहवाँ और आठवाँ स्थान शुद्ध हो, अर्थात् किसी शुभाशुभ ग्रह से युक्त न हो। कर्त्ता के जन्मराशि वा जन्मलग्न से तीसरी, छठी, गेरहवीं, दशवीं इनमें से कोई लग्न हो और शुभग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो। चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इनमें से किसी स्थान में हो तब सम्पूर्ण शुभ कर्मों का आरम्भ शुभदायक होता है ॥ ४४ ॥ जिन नक्षत्रों में ज्वर होने से मृत्यु होती है अथवा जितने दिनों तक ज्वर रहता है वह कहते हैं- स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे मृतिज्वरेन्त्यमैत्रे स्थिरता भवेद्रुजः । याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्रा हि पक्षो द्व्यधिपार्कवासवे ॥ ४५ ॥ मूलाग्निदात्रे नव पित्र्यभे नखा बुध्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः । मासोऽब्जवैश्वेऽथ यमाहि मूलभे मिश्रेशपित्र्ये फणिदंशने मृतिः ॥ ४६ ॥ १—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।

नक्षत्रप्रकरण ४७ अन्वयः-स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे ज्वरे मृतिः (स्यात्), अन्त्यमैत्रे रुजः स्थिरता भवेत्, याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्राः द्व्यधिपार्कवासवे पक्षः, हि मूलाग्निदास्रे नव, पित्र्ये नखाः, बुध्न्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः, अब्जवैश्वे मासः। अथ मिश्रेशपित्र्ये, फणिदंशने मृतिः (स्यात्) ॥ ४५-४६ ॥ स्वाती, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा और आश्लेषा में जिसे ज्वर हो उसकी मृत्यु होती है। रेवती और अनुराधा में हो तो रोग की स्थिरता होती है, अर्थात् रोग बहुत दिन तक रहता है। भरणी, श्रवण, शतभिष और चित्रा में हो तो गेरह दिन तक; विशाखा, हस्त और धनिष्ठा में हो तो पन्द्रह दिन तक; मूल, कृत्तिका और अश्विनी में हो तो नव दिन तक; मघा में हो तो बीस दिन तक; उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य, पुनर्वसु, रोहिणी में हो तो सात दिन तक; मृगशिरा और उत्तराषाढ़ में हो तो एक महीने तक ज्वर रहता है। यदि भरणी, आश्लेषा, मूल, कृत्तिका, विशाखा, आर्द्रा वा मघा नक्षत्र में किसी को सर्प काटे तो उसकी मृत्यु होती है। चन्द्रमा बली हो तो शायद बच जाय ॥ ४५-४६ ॥ रोगी के शीघ्र ही मरने का योग रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु पापवारे। रिक्ताहरिस्कन्ददिने च रोगे शीघ्रं भवेद्रोगिजनस्य मृत्युः ॥ ४७ ॥ अन्वयः-रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु, पापवारे, रिक्ताहरिस्कन्ददिने च, रोगे रोगिजनस्य शीघ्रं मृत्युर्भवेत् ॥ ४७ ॥ आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, शतभिष, भरणी, तीनों पूर्वा, विशाखा, धनिष्ठा अथवा कृत्तिका नक्षत्र; रविवार, मंगल वा शनैश्चर दिन और चौथि, नवमी, चतुर्दशी, द्वादशी वा छठि तिथि; ऐसे योग में यदि रोग उत्पन्न हो तो रोगी की शीघ्र ही मृत्यु होती है ॥ ४७ ॥ प्रेतक्रिया का मुहूर्त्त क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे प्रेतक्रिया स्याज्झषकुम्भगे विधौ। प्रेतस्य दाहं यमदिग्गमं त्यजेच्छय्यावितानं गृहगोपनादिकम् ॥ ४८ ॥ अन्वयः-क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे, प्रेतक्रिया स्यात्, विधौ झषकुम्भगे प्रेतस्य दाह, यमदिग्गमं, शय्यावितानं, च गृहगोपनादिकम् त्यजेत् ॥ ४८ ॥ अश्विनी, पुष्य, हस्त, आश्लेषा, मूल, ज्येष्ठा, श्रवण, आर्द्रा और स्वाती

४८ मुहूर्त्तचिन्तामणि नक्षत्र में प्रेतक्रिया करना योग्य है, यदि मरणकाल में किसी कारणवश से न की गई हो। धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तरार्द्ध, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा- भाद्रपद, रेवती इन साढ़े चार नक्षत्रों में प्रेत का दाह, दक्षिण दिशा की यात्रा, खाट बिनाना और घर छवाना वर्जित है। आदि पद से तृण काष्ठ आदि का संग्रह भी न करे ॥ ४८ ॥ त्रिपुष्कर योग और उसका फल भद्रातिथी रविजभूतनयार्कवारे द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे । त्रैपुष्करो भवति मृत्युविनाशवृद्धौ त्रैगुण्यदो द्विगुणकृद्वसुतक्षचान्द्रे ॥ ४९ ॥ अन्वयः—भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे, द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे, मृत्युविनाशवृद्धौ त्रैगुण्यदः त्रैपुष्करो भवति । (एवं) भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे, वसुतक्षचान्द्रे, मृत्युविनाशवृद्धौ द्विगुणकृत् (द्विपुष्करो योगो) भवति ॥ ४६॥ शनैश्चर, मंगल या रविवार हो; दुइज, सप्तमी वा द्वादशी तिथि हो; विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पुनर्वसु, कृत्तिका वा उत्तराषाढ़ नक्षत्र हो तो त्रिपुष्कर योग होता है। इस योग में यदि किसी के घर में कोई मरे तो तीन प्राणी मरें। और यदि कोई वस्तु नष्ट हो जाय तो तीन नष्ट हों यदि किसी वस्तु का लाभ हो तो तीन वस्तुओं का लाभ हो। यदि रविवार, मंगल, शनैश्चर इन्हीं दिनों में दुइज, सप्तमी वा द्वादशी यही तिथि हों और धनिष्ठा, चित्रा या मृगशिरा नक्षत्र हो तो द्विपुष्कर योग होता है। इसमें कोई मरे तो उस घर में दो मरें, कोई वस्तु नष्ट हो तो दो नष्ट हों और कुछ लाभ हो तो दो का लाभ हो ॥ ४९ ॥ शवप्रतिकृतिदाह का निषिद्धकाल शुक्राराकिषु दर्शभूतमदने नन्दासु तीक्ष्णोग्रभे पौष्णे वारुणभे त्रिपुष्करदिने न्यूनाधिमासेऽयने । याम्येऽब्दात्परतश्च पातपरिघे देवेज्यशुक्रास्तके भद्रावैधृतयोः शवप्रतिकृतेर्दाहो न पक्षे सिते ॥ ५० ॥ जन्मप्रत्यरितारयीमृतिसुखान्त्येऽब्जे च कर्तुर्न स- न्मध्योमैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्यङ्घ्रिभे ज्ञेऽपि च ।

नक्षत्रप्रकरण ४९ श्रेष्ठोऽर्केज्यविधोर्दिने श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये तथा त्वाशौचात्परतो विचार्यमखिलं मध्ये यथासम्भवम् ॥ ५१ ॥ अन्वयः—शुक्रारार्किषु, दर्शभूतमदने नन्दासु, तीक्ष्णोग्रभे, पौष्णे, वारुणभे, त्रिपुष्कर- दिने, न्यूनाधिमासे, अब्दात्परतः याम्ये अयने, च पातपरिघे, देवेज्यशुक्रास्तके, भद्रावैधृ- तयोः, सिते पक्षे, शवप्रतिकृतेर्दाहः न (कार्यः) जन्मप्रत्यरितारयोः, अब्जे मृतिसुखान्त्ये, कर्तुः न सत्, मैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्वयङ्घ्रिभे, च ज्ञेऽपि कर्तुः मध्यः अर्केज्यविधोर्दिने, श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये, कर्तुः श्रेष्ठः (स्यात्) । (इदं) अखिलं अशौचात्परतः विचार्यम्, मध्ये तु यथासम्भवं (कार्यम्) ॥ ५०-५१ ॥ शुक्र, मंगल, शनैश्चर दिन में; अमावस, चतुर्दशी, त्रयोदशी, परीवा, छठि, एकादशी तिथि में; मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, रेवती, शतभिष नक्षत्र में; त्रिपुष्कर योग, क्षयमास, मलमास, जिसे मरे हुए एक वर्ष से अधिक हो गया हो उसका दक्षिणायन, व्यतीपात योग, परिघ योग, बृहस्पति और शुक्र का अस्त, वैधृति योग, भद्रा और शुक्लपक्ष में शवप्रतिकृतिदाह न करे। कोई आचार्य आषाढ़, पौष और हरिशयन में भी निषेध करते हैं ॥ ५० ॥ कर्त्ता की जन्मतारा अर्थात् जन्मनक्षत्र और जन्मनक्षत्र से दशवाँ वा उन्नीसवाँ नक्षत्र और प्रत्यरि तारा अर्थात् जन्मनक्षत्र से पाँचवाँ, चौदहवाँ और तेइसवाँ नक्षत्र. इनमें और कर्त्ता की जन्मराशि से आठवें, चौथे, बारहवें चन्द्रमा के रहते शवप्रतिकृतिदाह शुभ नहीं होता। अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में और बुधवार में शवप्रतिकृतिदाह मध्यम; रविवार, बृहस्पति और सोमवार में श्रवण, हस्त, स्वाती, अश्विनी, पुष्य नक्षत्र में शवप्रातेकृतिदाह श्रेष्ठ है। मरने के दिन से लेकर दश दिन बीत गये हों तो यह सम्पूर्ण विचार करना चाहिए और दश दिन के भीतर भी यदि श्रेष्ठ मुहूर्त्त मिल जाय तो उत्तम है। यदि सम्भव न हो तो कुछ भी न विचारना चाहिए ॥ ५०-५१ ॥ अभुक्तमूलघटी अभुक्तमूलं हि घटीचतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं हि नारदः । वशिष्ठ एकद्विघटीमितं जगौ बृहस्पतिस्त्वेकघटीप्रमाणकम् ॥ ५२ ॥ अथोचुरन्ये प्रथमाष्टघटचो मूलस्य शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः । जातं शिशुं तत्र परित्यजेद्वा मुखं पितास्याष्टसमा च पश्येत् ॥ ५३ ॥

५० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं घटिकाचतुष्टय, अभुक्तमूलं (इति) नारदः जगौ, ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं एकद्विघटीमितं अभुक्तमूलं (इति) वसिष्ठः जगौ, बृहस्पतिस्तु ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवम् एकघटीप्रमाणकम् अभुक्तमूलं स्यादिति जगौ, अथ मूलस्य प्रथमाष्टघटचः, शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः (अभुक्तमूलं स्यादिति) अन्ये ऊचुः, तत्र जातं शिशुं परित्यजेत्, वा पिता अस्य अष्टसमा मुखं न पश्येत् ॥ ५२-५३ ॥ ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्त की चार घड़ी और मूल नक्षत्र के आदि की चार घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह नारदजी कहते हैं। ज्येष्ठा के अन्त की एक घड़ी और मूल के आदि की दो घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह वसिष्ठजी ने कहा है। ज्येष्ठा के अन्त की आधी घड़ी और मूल के आदि की आधी घड़ी अभुक्त- मूल है, यह बृहस्पतिजी ने कहा है॥ ५२ ॥ मूल नक्षत्र के आदि की आठ घड़ी और ज्येष्ठा के अन्त की पाँच घड़ी अभुक्तमूल हैं, यह अन्याचार्यों ने कहा है। अभुक्तमूल में उत्पन्न सन्तान को त्याग दे अथवा आठ वर्ष तक पिता उसका मुख न देखे। अब इस विषय में कोई यह पूछे कि इन अनेक मतों में किसका मत प्रामाणिक है ? तो उसका उत्तर यह है कि बहुत से आचार्यों की सम्मति होने के कारण नारदजी का मत ठीक है ॥ ५२-५३ ॥ मूल और आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न सन्तान का शुभाशुभ फल आद्ये पिता नाशमुपैति मूलपादे द्वितीये जननी तृतीये । धनं चतुर्थोऽस्य शुभोऽथ शान्त्या सर्वत्र सत्स्यादहिभे विलोमम् ॥ ५४ ॥ अन्वयः—आद्ये मूलपादे पिता नाशं उपैति, द्वितीये जननी, तृतीये धनं (नाशं उपैति) चतुर्थः अस्य (शिशोः) शुभः (स्यात्) शान्त्या सर्वत्र सत्स्यात् । अहिभे विलोमं (भवति) ॥ ५४ ॥ मूल नक्षत्र के पहिले चरण में जन्म होने से पिता का नाश, दूसरे चरण में माता का और तीसरे चरण में धन का नाश होता है। चौथा चरण शुभ- दायक होता है और शान्ति करने से चारों चरणों में शुभ ही होता है। आश्लेषा में इससे विपरीत अर्थात् आश्लेषा के चौथे चरण में यदि किसी का जन्म हो तो उसके पिता का, तीसरे चरण में माता का और दूसरे चरण में धन का नाश होता है तथा पहिला चरण शुभदायक है ॥ ५४ ॥ मूल का निवास स्वर्गे शुचिप्रोष्ठपदेषमाघे भूमौ नभः कार्त्तिकचैत्रपौषे । मूलं ह्यधस्तात्तु तपस्यमार्गवैशाखशुक्रेष्वशुभं च तत्र ॥ ५५ ॥

नक्षत्रप्रकरण ५१ अन्वयः—शुचिप्रौष्ठपदेषमाघे मूलं स्वर्गे (तिष्ठति) । नभः कार्त्तिकचैत्रपौषे मूलं भूमौ (तिष्ठति) । तु (पुनः) तपस्यमार्गवैशाखशुक्रेषु मूलं अधस्तात् (तिष्ठति) । मूलं (यत्र) तिष्ठति तत्र अशुभं (ज्ञेयम्) ॥ ५५ ॥ आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन और माघ में स्वर्ग में; श्रावण, कार्त्तिक, चैत्र और पौष में भूमि में; और फाल्गुन, ज्येष्ठ, अगहन और वैशाख में पाताललोक में मूल का निवास होता है । जहाँ मूल का वास होता है वहाँ उसका अशुभ होता है ॥ ५५ ॥ गण्डान्तादि में जन्मे हुए का अरिष्ट और उसका परिहार गण्डान्तेन्द्रभशूलपातपरिघव्याघातगण्डावमे संक्रान्तिव्यतिपातवैधृतिसिनीवालीकुहूदर्शके । वज्रे कृष्णचतुर्दशीषु यमघण्टे दग्धयोरमृतौ विष्टौ सोदरभे जनिर्न पितृभे शस्ता शुभा शान्तितः ॥ ५६ ॥ अन्वयः—[अत्रान्वयः श्लोकक्रमेणैवान्ते] जनिः न शस्ता, शान्तितः शुभा (भवति) ॥ ५६ ॥ गण्डान्त, ज्येष्ठा, शूलयोग, पात अर्थात् गणित से सिद्ध होनेवाला व्यतीपात, परिघ, व्याघात, गण्डयोग, अवम अर्थात् तिथिक्षय, संक्रान्ति, व्यतीपात, वैधृतियोग, सिनीवाली अर्थात् चतुर्दशीयुक्त अमावास्या, कुहू अर्थात् परीवासंयुक्त अमावास्या, दर्श अर्थात् सूर्य और चन्द्रमा का समागम जिसमें हो वह तिथि, वज्रयोग, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, यमघंट, दग्धयोग, मृत्युयोग, भद्रा, भाई-बहिन का जन्म नक्षत्र, माता-पिता का जन्मनक्षत्र, तथा चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहणकाल में यदि किसी का जन्म हो, तीन कन्याओं के बाद पुत्र का जन्म और तीन पुत्रों के बाद कन्या का जन्म हो तो अशुभ होता है । परन्तु उसकी शान्ति करने से शुभ होता है ॥ ५६ ॥ अश्विन्यादि नक्षत्रों के तारों की संख्या त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नयः शरेषुनेत्राशिवशरेन्दुभूकृताः । वेदाग्निरुद्राशिवयमाग्निवह्नयोऽब्धयः शतंद्विद्विरदा भतारकाः ॥ ५७ ॥ अन्वयः—[श्लोकक्रमेण] (एताः) भतारकाः [क्रमेण ज्ञेया] ॥ ५७ ॥ अश्विनी का स्वरूप तीन ताराओं का, भरणी का तीन ताराओं का, कृत्तिका का छः ताराओं का, रोहिणी का पाँच ताराओं का, मृगशिरा का

५२ मुहूर्तचिन्तामणि पाँच ताराओं का, आर्द्रा का एक तारा का, पुनर्वसु का चार ताराओं का, पुष्य का तीन ताराओं का, आश्लेषा का पाँच ताराओं का, मघा का पाँच ताराओं का, पूर्वाफाल्गुनी का दो ताराओं का, उत्तराफाल्गुनी का दो ताराओं का, हस्त का पाँच ताराओं का, चित्रा का एक तारा का, स्वाती का एक तारा का, विशाखा का चार ताराओं का, अनुराधा का चार ताराओं का, ज्येष्ठा का तीन ताराओं का, मूल का गेरह ताराओं का, पूर्वाषाढ़ का दो ताराओं का, उत्तराषाढ़ का दो ताराओं का, अभिजित् का तीन ताराओं का, श्रवण का तीन ताराओं का, धनिष्ठा का चार ताराओं का, शतभिष का सौ ताराओं का, पूर्वाभाद्रपद का दो ताराओं का, उत्तराभाद्रपद का दो ताराओं का और रेवती का स्वरूप बत्तिस ताराओं का है ॥ ५७ ॥ अश्विन्‍यादि नक्षत्रों का रूप अश्व्यादिरूपं तुरगास्ययोनिक्षुरोनएणास्यमणीगृहं च । पृषत्कचक्रे भवनं च मञ्चः शय्याकरो मौक्तिकविद्रुमं च ॥ ५८ ॥ तोरणं बलिनिभं च कुण्डलं सिंहपुच्छगजदन्तमञ्चकाः । त्र्यस्रि च त्रिचरणाभमर्दलो वृत्तमञ्चयमलाभमर्दलाः ॥ ५९ ॥ अन्वयः—तुरगास्ययोनिक्षुरः, अनः, एणास्यमणिः, गृहं च, पृषत्कचक्रे भवनं च, मञ्चः, शय्या, करः, मौक्तिकविद्रुमं च, तोरणं, बलिनिभं च, कुण्डलं, सिंहपुच्छगजदन्त- मञ्चकाः, त्र्यस्रि च, त्रिचरणाभमर्दलः, वृत्तमञ्चयमलाभमर्दलाः [एतत्] अश्व्यादिरूपं (ज्ञेयम्) ॥ ५८-५९ ॥ घोड़े के मुख के सदृश अश्विनी, योनि के सदृश भरणी, छुरा के सदृश कृत्तिका, गाड़ी के सदृश रोहिणी, हरिण के मुख के सदृश मृगशिरा, मणि के सदृश आर्द्रा, घर के सदृश पुनर्वसु, बाण के सदृश पुष्य, चक्राकार आश्लेषा, घर के समान मघा, मचान के सदृश पूर्वाफाल्गुनी, खाट के सदृश उत्तराफाल्गुनी, हाथ के सदृश हस्त, मोती के सदृश चित्रा, मूंगा के सदृश स्वाती, तोरण के सदृश विशाखा, भात के ढेर के सदृश अनुराधा, कुण्डल के सदृश ज्येष्ठा, सिंह की पूँछ के सदृश मूल, हाथी-दाँत के सदृश पूर्वाषाढ़, मचान के सदृश उत्तराषाढ़, त्रिकोणाकार अभिजित्, वामन भगवान् के सदृश श्रवण, नगाड़ा के सदृश धनिष्ठा, मण्डलाकार शतभिष, मचान के सदृश पूर्वाभाद्रपद, जुड़े हुए दो नक्षत्र उत्तराभाद्रपद और नगाड़ा के सदृश रेवती है ॥ ५८-५९ ॥

संक्रान्तिप्रकरण ५३ जलाशय-वाटिका-देवप्रतिष्ठा के मुहूर्त्त जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाङ्कशुक्रे । दृश्ये मृदुक्षिप्रचरध्रुवे स्यात्पक्षे सिते स्वर्क्षतिथिक्षण वा ॥ ६० ॥ रिक्तारवर्ज्ये दिवसेऽतिशरता शशाङ्कपापैस्त्रिभवाङ्गसंस्थैः । व्यन्त्याष्टगैः सत्खचरैर्मृगेन्द्रे सूर्यो घटे को युवतौ च विष्णुः ॥ ६१ ॥ शिवो नृयुग्मे द्वितनौ च देव्यः क्षुद्राश्चरे सर्व इमे स्थिरर्क्षे । पुष्ये ग्रहा विघ्नपयक्षसर्पभूतादयोऽन्त्ये श्रवण जिनश्च ॥ ६२ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥ अन्वयः—सौम्यायने, जीवशशाङ्कशुक्रे दृश्ये, मृदुक्षिप्रचरध्रुवे, सिते पक्षे, वा स्वक्षं- तिथिक्षणे, रिक्तारवर्ज्ये दिवसे, शशाङ्कपापैः त्रिभवाङ्गसंस्थैः सत्खचरैः व्यन्त्याष्टगैः (तदा) जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा अतिशस्ता स्यात् । मृगेन्द्रे सूर्यः, घटे कः, युवतौ विष्णुः, नृयुग्मे शिवः, च द्वितनौ देव्यः, चरे क्षुद्राः, इमे सर्वे स्थिरर्क्षे [स्थाप्याः ] पुष्ये ग्रहाः, अन्त्ये विघ्नपयक्षसर्पभूतादयः (स्थाप्याः), श्रवणे जिनः (स्थाप्यः) ॥ ६०-६२ ॥ उत्तरायण में; बृहस्पति, चन्द्रमा और शुक्र के उदय रहते; मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, चरसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों में; शुक्लपक्ष में; जिस देवता की प्रतिष्ठा आदि करना हो उसी के नक्षत्र, तिथि और मुहूर्त्त में; रिक्ता तिथि और मंगल दिन को छोड़ अन्य तिथि और दिवस में तड़ागादि जलाशयों का उत्सर्ग, बगीचे आदि का उत्सर्ग और देवताओं की स्थापना शुभ होती है। लग्न से तीसरे, गेरहवें और छठे स्थान में चन्द्रमा वा पापग्रहों के रहते; आठवें और बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रहों के रहते और स्थिर वा द्विस्वभाव लग्नों में सामान्यतः सब देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ होती है। परन्तु विशेष यह है कि सिंह लग्न में सूर्य की, कुम्भ में ब्रह्मा की, कन्या में विष्णु की, मिथुन में शिव की, द्विस्वभाव लग्नों में देवी की, चर लग्नों में योगिनी आदि देवियों की, स्थिर लग्नों में उक्तानुक्त सब देवताओं की, पुष्य नक्षत्र में चन्द्रादि आठ ग्रहों की, हस्त नक्षत्र में सूर्य की, रेवती नक्षत्र में गणेश, यक्ष, सर्प, भूतादिकों की और श्रवण नक्षत्र में बुद्ध की स्थापना शुभ होती है ॥ ६०-६२ ॥

५४ मुहूर्त्तचिन्तामणि संक्रान्तिप्रकरण ——————:०:—————— दिन और नक्षत्र के भेद से संक्रान्तियों के नाम और फल घोरार्कसंक्रमणमुग्ररवौ हि शूद्रान् ध्वाङ्क्षी विशो लघुविधौ च चरर्क्षभौमे । चौरान् महोदरयुता नृपतीन् ज्ञमैत्रे मन्दाकिनी स्थिरगुरौ सुखयेच्च मन्दा ॥ १ ॥ विप्रांश्च मिश्रभभृगौ तु पशूंश्च मिश्रा तीक्ष्णार्कजेऽन्त्यजसुखा खलु राक्षसी च । अन्वयः—[यदि] उग्ररवौ अर्कसंक्रमणं (स्यात्) (तदा) घोरा (नाम्नीसंक्रान्तिः) (सा) शूद्रान् सुखयेत्, लघुविधौ ध्वाङ्क्षी [सा] विशः, च (पुनः) चरर्क्षभौमे महोदर- युता (संक्रान्तिः) (सा) चौरान्, ज्ञमैत्रे मन्दाकिनी (सा) नृपतीन्, स्थिरगुरौ मन्दा (सा) विप्रान्, तु (पुनः) मिश्रभभृगौ मिश्रा (सा) पशून् सुखयेत्, तीक्ष्णार्कजे राक्षसी (सा) अन्त्यजसुखा (स्यात्) ॥ १ ॥ तीनों पूर्वा, भरणी या मघा नक्षत्र में रविवार को जो सूर्य की संक्रान्ति होती है, उसका घोरा नाम होता है। वह शूद्रों को सुख देती है। हस्त, अश्विनी, पुष्य या अभिजित् नक्षत्र में सोमवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका नाम ध्वांक्षी होता है। वह वैश्यों को सुख देती है। स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा वा शतभिष नक्षत्र में मंगलवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका महोदरी नाम होता है। वह चोरों को सुख देती है। मृगशिरा, रेवती, चित्रा वा अनुराधा नक्षत्र में बुधवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका मन्दाकिनी नाम होता है। वह क्षत्रियों को सुख देती है। तीनों उत्तरा वा रोहिणी नक्षत्र में बृहस्पति के दिन जो सक्रान्ति होती है, उसका मन्दा नाम होता है। वह ब्राह्मणों को सुख देती है ॥ १ ॥ विशाखा अथवा कृत्तिका नक्षत्र में शुक्रवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका मिश्रा नाम होता है। वह पशुओं को सुख देती है। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा या आश्लेषा नक्षत्र में शनैश्चर को जो संक्रान्ति होती है, उसका राक्षसी नाम होता है। वह चाण्डालादि को सुख देती है।

संक्रान्तिप्रकरण ५५ संक्रान्तिचक्र

घोराध्वांक्षीमहोदरीमन्दाकिनीमन्दामिश्राराक्षसी
सूर्यसोममंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनैश्चर
पू० ३<br>भरणी<br><br>मघाहस्त<br>अश्विनी<br>पुष्य<br>अभिजित्स्वाती<br>पुनर्वसु<br>श्रवण<br>धनिष्ठा<br>शतभिषमृगशिरा<br>रेवती<br>चित्रा<br>अनुराधाउत्तरा ३<br>रोहिणीविशाखा<br>कृत्तिकामूल ज्येष्ठा<br>आर्द्रा<br>आश्लेषा
शूद्र<br>सुखदावैश्य<br>सुखदाचोर सुखदाक्षत्रिय<br>सुखदाब्राह्मण<br>सुखदापशु<br>सुखदाचांडालादि<br>सुखदा
दिन-रात्रि के विभाग से संक्रान्तियों का शुभाशुभ फल
त्र्यंशे दिनस्य नृपतीन्प्रथमे निहन्ति
मध्ये द्विजानपि विशोऽपरके च शूद्रान् ॥ २ ॥
अस्ते निशाप्रहरकेषु पिशाचका-
दीन्नक्तंचरानपि नटान् पशुपालकांश्च ।
सूर्योदये सकललिङ्गिजनं च सौम्य
याम्ययनं मकरकर्कटयोर्निरुक्तम् ॥ ३ ॥
**अन्वयः—**दिनस्य प्रथमे त्र्यंशे (अर्कसंक्रमणं) नृपतीन् निहन्ति, मध्ये (त्र्यंशे)
द्विजान्, अपरके (त्र्यंशे) विशः, अस्ते शूद्रान् । निशाप्रहरकेषु (क्रमेण) पिशाचकादीन्,
नक्तंचरान्, नटान् अपि, पशुपालकान् च निहन्ति, सूर्योदये (अर्कसंक्रान्तिः) सकललिङ्गि-
जनं निहन्ति । मकरकर्कटयोः (क्रमेण) सौम्ययाम्ययानम् निरुक्तम् ॥ २-३ ॥
दिनमान के तीन भाग करके यह विचार करना चाहिए कि प्रथमभाग
में सूर्यसंक्रान्ति हो तो क्षत्रियों का, दूसरे भाग में हो तो ब्राह्मणों का, तीसरे
भाग में हो तो वैश्यों का और सूर्यास्तकाल में हो तो शूद्रों का नाश करती
है । रात्रि के पहले पहर में संक्रान्ति हो तो पिशाचों और भूतों का, दूसरे
पहर में हो तो राक्षसों का, तीसरे पहर में हो तो नटों का चौथे पहर में
पशुपालकों अर्थात् अहीरों का और सूर्योदय काल में पाखण्डियों का नाश

५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि करती है। मकर की संक्रान्ति को उत्तरायण और कर्क की संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं ॥ २-३ ॥ शेष संक्रान्तियों के नाम षडशीत्याननं चापनृयुक्कन्याझषे भवेत् । तुलाजौ विषुवं विष्णुपदं सिंहालिगोघटे ॥ ४ ॥ अन्वयः—चापनृयुक्कन्याझषे षडशीत्याननं, तुलाजौ विषुवं, सिंहालिगोघटे विष्णुपदं (नाम संक्रमणं) भवेत् ॥ ४ ॥ धनु, मिथुन, कन्या और मीन की संक्रान्ति का षडशीतिमुख नाम है; तुला और मेष की संक्रान्ति का विषुव नाम है तथा सिंह, वृश्चिक, वृष और कुम्भ की संक्रान्ति का विष्णुपद नाम है ॥ ४ ॥ संक्रान्ति का पुण्यकाल संक्रान्तिकालादुभयत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडशषोडशोष्णगोः । अन्वयः—उष्णगोः (यः संक्रान्तिकालः तस्मात्) संक्रान्तिकालात् उभयत्र षोडश षोडष नाडिकाः पुण्या मताः । सूर्य की संक्रान्ति जिस समय हो उससे पहले और पश्चात् सोलह- सोलह दण्ड पुण्यकाल मानना चाहिए । गणित से पुण्यकाल जानने की यह रीति है कि सूर्य के बिम्ब की कलाओं को साठ से गुणा करके सूर्य की गति का भाग देने से जो लब्ध हो वही संक्रान्ति से पूर्व-पर पुण्यकाल होता है । रात्रि में संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल निशीथतोऽर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्वभागयोः ॥ ५ ॥ अन्वयः—निशीथतः अर्वागपरत्र संक्रमे (सति) (क्रमेण) पूर्वापराहान्तिमपूर्व- भागयोः (पुण्यघटिका भवन्ति) ॥ ५ ॥ यदि आधी रात्रि से पूर्व संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन का उत्तरार्द्ध पुण्यकाल और यदि आधी रात्रि के उपरांत संक्रान्ति हो तो पर दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता है ॥ ५ ॥ आधी रात्रि में होनेवाली संक्रान्ति का पुण्यकाल पूर्णे निशीथे यदि संक्रमः स्याद्दिनद्वयं पुण्यमथोदयास्तात् । पूर्वं परस्ताद्यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये ॥ ६ ॥

२. षोडश संस्कार (गर्भाधान, पुंसवन, नामकरण, उपनयन, विवाह) मुहूर्त

संक्रान्तिप्रकरण ५७ अन्वयः—यदि पूर्णे निशीथे संक्रमः स्यात् (तदा) दिनद्वयं पुण्यं, अथ उदयास्तात् पूर्वं परस्तात् यदि याम्यसौम्यायने (संक्रान्ती भवतः) (तदा) तु परे पूर्वदिने पुण्ये (स्याताम्) ।। ६ ।। यदि ठीक आधी रात्रि में संक्रान्ति हो तो पूर्व और पर दोनों दिन पुण्यकाल होता है। यदि सूर्योदय से पूर्व कर्क संक्रान्ति हो तो पूर्व ही दिन सम्पूर्ण पुण्यकाल और सूर्यास्त के बाद मकर संक्रान्ति हो तो पर ही दिन सम्पूर्ण पुण्यकाल होता है ।। ६ ।। सन्ध्याकाल का प्रमाण सन्ध्या त्रिनाडीप्रमितार्कबिम्बादधोदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । चेद्याम्यसौम्ये अयने क्रमात्तस्तः पुण्यौ तदानीं परपूर्वघस्रौ ।। ७ ।। अन्वयः—अर्द्धोदितास्तात् अर्कबिम्बात् अधः ऊर्ध्वं त्रिणाडीप्रमिता सन्ध्या (कथिता) अत्र चेद्याम्यसौम्ये अयने (संक्रमणे भवतः) तदानी परपूर्वघस्रौ पुण्यौ स्तः ।। ७ ।। सूर्य का आधा बिम्ब उदय होने से पूर्व तीन दण्ड प्रातः सन्ध्या और आधा बिम्ब अस्त होने के बाद तीन दण्ड सायं सन्ध्या जानना चाहिए। यदि प्रातःसन्ध्या में कर्क संक्रान्ति हो तो सूर्योदय के अनन्तर सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल और यदि सायंसन्ध्या में मकर संक्रांति हो तो सूर्यास्त से पूर्व सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होता है ।। ७ ।। संक्रान्तियों का विशेष पुण्यकाल याम्यायने विष्णुपदे चाद्या मध्यास्तुलाजयोः । षडशीत्यानने सौम्ये परा नाड्योऽतिपुण्यदाः ।। ८ ।। अन्वयः—याम्यायने विष्णुपदे च आद्याः नाड्यः, तुलाजयोः मध्याः नाड्यः, षडशीत्यानने (तथा) सौम्ये पराः नाड्यः अतिपुण्यदाः (भवन्ति) ।। ८ ।। कर्क, वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ संक्रान्ति जिस समय हो उससे पूर्व सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है। तुला और मेष संक्रान्ति जिस समय हो उससे पूर्व सोलह दण्ड और पर सोलह दण्ड मिलकर बत्तिस दण्ड अथवा पूर्व आठ और पर आठ मिलकर सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है। मिथुन, कन्या, धनु, मीन और मकर संक्रान्ति जिस समय हो उससे पर सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है ।। ८ ।।

५८ मुहूर्तचिन्तामणि सायन संक्रान्तियों का पुण्यकाल तथायनांशाः खरसाहताश्च स्पष्टार्कगत्या विहृता दिनाद्यैः । मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युर्दाने जपादौ बहुपुण्यदास्ते ॥ ९ ॥ अन्वयः—अयनांशाः खरसाहताः च स्पष्टार्कगत्या विहृताः (लब्धैः) दिनाद्यैः मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युः, ते दाने तथा जपादौ बहुपुण्यदाः ॥ ९ ॥ साठ से गुणे हुए अयनांशों में सूर्य की स्पष्ट गति से भाग देने पर जितने दिनादि लब्ध हों, मेषादि संक्रान्तिकाल से उतने ही दिनादि पूर्व चलसंक्रम अर्थात् अयन संक्रान्तियाँ होती हैं। वे अयन संक्रान्तियाँ दान, जप, होम और श्राद्धादि पुण्य कर्म करने के लिए बहुत पुण्यदायक हैं ॥ ९ ॥ नक्षत्रों की सम, बृहत्, जघन्य संज्ञा समं मृदुक्षिप्रवसुश्रवोग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं बृहत्स्यात् । ध्रुवद्विदैवादितभं जघन्यं सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यम् ॥ १० ॥ अन्वयः—मृदुक्षिप्रवसुश्रवोऽग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं समं स्यात्, ध्रुवद्विदैवादितभं बृहत् स्यात्, सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यं जघन्यं स्यात् ॥ १० ॥ मृगशिरा, रेवती, अनुराधा, चित्रा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, धनिष्ठा, श्रवण, कृत्तिका, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद और मूल नक्षत्र की सम संज्ञा, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, विशाखा और पुनर्वसु की बृहत्संज्ञा तथा आश्लेषा, शतभिष, आर्द्रा, स्वाती, ज्येष्ठा और भरणी की जघन्य संज्ञा है ॥ १० ॥ उक्त संज्ञाओं का प्रयोजन जघन्यभे संक्रमणे मुहूर्त्ताः शरेन्दवो बाणकृता बृहत्सु । खरामसंख्या समभे महर्घं समर्धसाम्यं विधुदर्शनेऽपि ॥ ११ ॥ अन्वयः—जघन्यभे संक्रमणे शरेन्दवः मुहूर्त्ताः, बृहत्सु बाणकृताः मुहूर्त्ताः, समभे खरामसङ्ख्याः मुहूर्त्ताः, (तत्र) महर्घसमर्घसाम्यं (क्रमात्फलं ज्ञेयम्) । विधुदर्शनेऽपि (एवं फलं भवति) ॥ ११ ॥ १—वर्त्तमान शाके में चारसौ चवालीस घटाकर उसमें साठ का भाग देने से अयनांश स्पष्ट होता है। यथा शाके १८१४ में ४४४ घटाया, १३७० शेष रहे, इनमें साठ का भाग दिया तो २२ । ५० हुए, यही लब्ध अयनांश हुआ।

संक्रान्तिप्रकरण ५९ जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पन्द्रह मुहूर्त्त, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पैंतालिस मुहूर्त्त और समसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो तीस मुहूर्त्त होते हैं। जिस महीने की संक्रान्ति में पन्द्रह मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न महँगा और जिस महीने की संक्रान्ति में पैंतालिस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न सस्ता और जिस महीने की संक्रान्ति में तीस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न न महँगा न सस्ता, किन्तु समभाव बिकता है। चन्द्रोदय में भी ऐसे ही अन्न का भाव जानना चाहिए अर्थात् जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में प्रथम चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने भर अन्न महँगा, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न सस्ता और समसंज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न समभाव बिकता है ॥ ११ ॥ • कर्क संक्रान्ति के रविवारादि में अब्दविंशोपक अर्कादिवारे संक्रान्तौ कर्कस्याब्दविंशोपकाः । दिशो नखा गजाः सूर्या धृत्योऽष्टादश सायकाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—अर्कादिवारे कर्कस्य संक्रान्तौ (क्रमात्) दिशः, नखाः, गजाः, सूर्याः, धृत्यः अष्टादश, सायकाः, (एते) अब्दविंशोपकाः (ज्ञेयाः) ॥ १२ ॥ कर्क की संक्रान्ति यदि रविवार को हो तो दश, सोमवार को बीस, मंगल को आठ, बुधवार को बारह, बृहस्पति को अठारह, शुक्रवार को भी अठारह और शनैश्चर को पाँच अब्दविंशोपक होते हैं ॥ १२ ॥ कर्क संक्रान्ति में अब्दविंशोपकचक्र

रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारबृहस्पतिशुक्रवारशनैश्चर
१०२०१२१८१८
स्यात्तैतिले नागचतुष्पदे रविः सुप्तो निविष्टस्तु गरादिपञ्चके ।
किंस्तुघ्न ऊर्ध्वः शकुनौ सकौलवेऽनिष्टः समः श्रेष्ठ इहार्घवर्षणे ॥ १३ ॥
अन्वयः—तैतिले नागचतुष्पदे (करणे) रविः सुप्तः (सन् संक्रमितः स्यात्) तु
(पुनः) गरादिपञ्चके निविष्टः (सन् संक्रमितः स्यात्) किंस्तुघ्ने (तथा) सकौलवे
शकुनौ ऊर्ध्व (सन् संक्रमितः स्यात्) इह अर्घवर्षणे (क्रमात्) नेष्टः, समः, श्रेष्ठः
(स्यात्) ॥ १३ ॥

६० मुहूर्त्तचिन्तामणि तैतिल, नाग और चतुष्पद करण में सोते हुए; गर, वणिज, भद्रा, बव और बालव में बैठे हुए; किंस्तुघ्न, शकुनि और कौलव में खड़े हुए सूर्य संक्रान्ति करते हैं। सोते हुए सूर्य अन्नादि की महँगी और अवर्षणकारक होते हैं, बैठे हुए सूर्य सम अर्थात् इष्टानिष्ट कुछ नहीं करते और खड़े हुए सूर्य श्रेष्ठ अर्थात् अन्नादि की सस्ती और वर्षा करते हैं ।। १३ ।। संक्रान्तियों के वाहन, वस्त्र, आयुध, भक्ष्य, लेपन, जाति और पुष्प सिंहव्याघ्रवराहरासभगजा वाहद्विषद्घोटकाः श्वाजौ गौश्चरणायुधश्च बवतो वाहा रवेः संक्रमे । वस्त्रं श्वेतसुपीतहारितकपाण्ड्वारक्तकालासितं चित्रं कम्बलदिग्धनाभमथ शस्त्रं स्याद्भुशुण्डी गदा ।। १४ ।। खङ्गोदण्डशरासतोमरमथो कुन्तश्च पाशोऽङ्कुशो- ऽस्त्रं बाणस्त्वथ भक्ष्यमन्नपरमान्नं भैक्षपक्वान्नकम् । दुग्धं दध्यपि चित्रितान्नगुडमध्वाज्यं तथा शर्करा- ऽथो लेपो मृगनाभिकुङ्कुममथो पाटीरमृद्रोचनम् ।। १५ ।। यावश्चोतुमदो निशाञ्जनमथो कालागुरुश्चन्द्रको जातिर्देवतभूतसर्पविहगाः पश्वेणविप्रास्ततः । क्षत्रियवैश्यकशूद्रसंकरभवाः पुष्पं च पुन्नागकं जातीबाकुलकेतकानि च तथा बिल्वार्कदूर्वाम्बुजम् ।। १६ ।। स्यान्मल्लिकापाटलिकाजपा च संक्रान्तिवस्त्राशनवाहनादेः । नाशश्च तद्वृत्त्युपजीविनां च स्थितोपविष्टस्वपतां च नाशः ।। १७ ।। **अन्वयः—**बवतः [बवमारभ्य] रवेः संक्रमे (सति) (क्रमात्) सिंहव्याघ्रवराह- रासभगजाः द्विषद्घोटकाः श्वा अजः गौःचरणायुधः (एते) वाहाः (ज्ञेयाः), (तथा) श्वेतसुपीतहारितकपाण्डुरक्तकालासितं चित्रं कम्बलदिग्धनाभं [एतद्वस्त्रं ज्ञेयं], अथ भुशुण्डी गदा खङ्गः दण्डशरासतोमरं अथो कुन्तः पाशः अंकुशः अस्त्रं बाणः (एतत्) शस्त्रं स्यात्, अथ अन्नपरमान्नं भैक्ष्यपक्वान्नकम् दुग्धं, दधि अपि (तथा) चित्रितान्नगुडमध्वाज्य तथा शर्करा (एतत्) भक्ष्यं (ज्ञेयम्), अथ मृगनाभिकुङ्कुमं अथो पाटीरमृद्रोचनम् यावः च (पुनः) ओतुमदः निशाञ्जनं अथ कालागुरुः चन्द्रकः (एषः) लेपः, (तथा) दैवतभूतसर्पविहगाः पश्वेणविप्राः ततः क्षत्रियवैश्यकशूद्रसंकरभवाः [एषा] जातिः (ज्ञेया), च (पुनः) पुन्नागकं जातीबाकुलकेतकानि च (तथा) विल्वार्कदूर्वाम्बुज मल्लिका पाटलिका च (पुनः) जपा (एतत्) पुष्पं स्यात्, च (पुनः) संक्रांतिवस्त्रासन-