नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( १७२ ) किङ्करः— आसण्णा गळुडस्स आगमणवेला, ता लहुं आसन्ना गरुडस्यागमनवेला, तल्लघु गच्छामि । गच्छामि । [इति निष्क्रान्तः] शङ्खचूडः— अम्ब ! समाश्वसिहि । वृद्धा— (समाश्वस्य, सास्रं) हा पुत्तअ ! हा मणोरहसदलद्ध ! हा पुत्रक ! हा मनोरथशतलब्ध ! कहिं पुण तुपं पेक्खिस्सं ? क्व पुनस्त्वां प्रेक्षिष्ये ? [कण्ठे गृह्णाति] नायकः— अहो नैर्घृण्यं¹ गरुडस्य ! अपि च— मूढाया मुहुरश्रुसन्ततिमुचः कृत्वा प्रलापान्² बहून् कस्त्राता³ तव पुत्रकेति, कृपणां दिक्षु क्षिपन्त्या दृशम् । अङ्के मातुरवस्थितं शिशुमिमं त्यक्त्वा घृणामश्नत- श्चञ्चुनैव खगाधिपस्य, हृदयं वज्रेण मन्ये कृतम् ॥६॥ शङ्खचूडः— (मातुरश्रूणि निवारयन्) अम्ब ! किमतिवैकलव्येन ? श्लोक नं० ६, अन्वयः— मूढायाः, मुहुरश्रुसन्ततिमुचः, ‘कस्त्राता तव पुत्रक’ इति बहून् प्रलापान् कृत्वा दिक्षु कृपणां दृशं क्षिपन्त्याः मातुः अङ्के अवस्थितं इमं शिशुं घृणां त्यक्त्वा अश्नतः खगाधिपस्य नैव चञ्चुः हृदयम् (अपि) मन्ये वज्रेण कृतम् ।
( १७३ )
सेवक — गरुड़ के आने का समय समीप ही है। अतः मैं शीघ्र ही जाता हूँ। [प्रस्थान] शङ्खचूड़ — माता जी, धीरज धरो । वृद्धा — (होश में आकर, आँसुओं के साथ) आह, पुत्र ! सैकड़ों मनोरथों से प्राप्त (बच्चे) ! फिर मैं तुम्हें कहां देखूँगी ? [गले लगाती है] नायक — अहो गरुड़ की निर्दयता ! और भी— शोक से विमोहित, बार बार आँसुओं की धारा बहाती हुई, 'हे पुत्र ! तुझे कौन बचाएगा' इस प्रकार बहुत से प्रलाप कर के चारों ओर कातर दृष्टि दौड़ाती हुई माता की गोद में ठहरे हुए इस बच्चे को दया छोड़ कर खाने वाले पक्षिराज गरुड़ की केवल चोंच ही नहीं वरन् हृदय भी मेरे विचार में वज्र का बना हुआ है । शङ्खचूड़ — (माता के आंसू पोंछता हुआ)— माता जी ! इतनी अधिक व्याकुलता से क्या लाभ ?
- नैर्घृण्यं = दया से रहित होना; निर्दयता; क्रूरता ।
- प्रलाप = विलाप । चीख़ पुकार ।
- कृपणां दृशम् = कातर दृष्टि । करुणा उत्पन्न करने वाली ।
( १०४ )
यैरत्यन्तदयापरैर्न विहिता वन्ध्यार्थिनां प्रार्थना, यैः कारुण्यपरिग्रहान्न गणितः स्वार्थः परार्थं प्रति । ये नित्यं परदुःखदुःखितधियस्ते साधवोऽस्तं गता, मातः ! संहर बाष्पवेगमधुनो कस्याग्रतो रुद्यते ॥१०॥ ननु समाश्वसिहि समाश्वसिहि । वृद्धा—(सास्रम्) कहं समस्ससिस्सं ? किं एकपुत्तओ त्ति कथं समाश्वसिष्यामि ? किमेकपुत्रक - इति कदुअ साणुकंपेण णाअराएण पेसिदोसि ? हा कहं कृत्वा सानुकम्पेन नागराजेन प्रेषितोऽसि ? हा ! कथम् अविच्छिण्णे जीअलोए मम पुत्तओ सुमरिदो ? विच्छिन्ने¹ जीवलोके मम पुत्रकः स्मृतः ? सव्वधा अहं म्हि मंदभाग्गा । सर्वथाहमस्मि मन्दभाग्या । [मूर्च्छति] नायकः-(सकरुणम्) आर्त्तं कण्ठगतप्राणं,² परित्यक्तं बन्धुभिः। त्राये³ नैनं यदि ततः कः शरीरेण मे गुणः ? ॥ ११ ॥
श्लोक नं०: १०, अन्वयः— यैः अत्यन्तदयापरैः अर्थिनां प्रार्थना वन्ध्या न विहिता, यैः कारुण्य- परिग्रहात् परार्थं प्रति स्वार्थः न गणितः, ये नित्यं परदुःख- दुःखितधियः, ते साधवः अस्तं गताः। मातः ! अधुना बाष्पवेगं संहर। कस्य अग्रतो रुद्यते ? श्लोक नं०: ११, अन्वयः — यदि (अहं) बन्धुभिः परित्यक्तं कण्ठगतप्राणम् एनम् आर्त्तं न त्राये, ततः मे शरीरेण कः गुणः ?
( १७५ ) जिन अत्यन्त दयालु पुरुषों ने याचकों की प्रार्थना को कभी निष्फल नहीं जाने दिया, जिन्होंने करुणा को ग्रहण करने के कारण परोपकार के आगे स्वार्थ को कुछ नहीं गिना, जो दूसरों के दुःख से दुःखी होते थे वे सज्जन लोग अस्त हो गए (मर गए) । (अतः) माता जी ! अब अपने आंसुओं के वेग को रोको । किस के आगे रो रही हो ? अतः धीरज धरो । वृद्धा — (आंसुओं के साथ) कैसे धीरज धरूँ ? क्या तुम इकलौते बेटे हो इसी लिए कृपालु नागराज ने तुम्हें (बलि के लिए) भेजा है ? हाय, समग्र जीवलोक के रहते हुए मेरा पुत्र ही क्यों याद किया गया ? मैं सब प्रकार से अभागिन हूँ । [मूर्च्छित हो जाती है] नायक—(दया पूर्वक) यदि मैं बन्धुओं से छोड़े गए, कंठगत प्राण वाले इस दुःखी को नहीं बचाता तो मेरे शरीर का क्या लाभ ?
- अविच्छिन्न = अखण्डित । जिस का कुछ नहीं बिगड़ा । जो लगातार कायम है । अतः सम्पूर्ण, समग्र ।
- जिस के प्राण गले तक आ गए हैं । मृतप्राय । जो अभी मरने वाला है ।
- त्राये = त्रै (भ्वादिगण आत्मने पद) + लट् + उत्तमपुरुष + एक वचन । (बचाना) -बचाता हूँ ।
शङ्खचूड़ः—अम्ब ! ¹अलं त्रासेन । न खल्वयं नागशत्रुः । पश्य- ² महाहिमस्तिष्कविभेदमुक्तरक्तच्छटाचर्चितचण्डचञ्चुः । क्वासौ गरुत्मान् ? क्व च नाम सौम्यस्वभावरूपाकृतिरेष साधुः ॥१३॥ वृद्धा - अह क्खु तुज्झ मरणभीआ सव्वं जेव्व लोअं गलुडमयं अहं खलु तव मरणभीता सर्वमेव लोकं गरुड़मयं³ पेक्खामि । प्रेक्षे । नायकः—अम्ब ! मा भैषीः । नन्वयमहं विद्याधरस्त्वत्सुत- संरक्षणार्थमेवायातः । वृद्धा—(सहर्षम्) पुत्तअ ! पुणो पुणो एव्वं भण । पुत्रक ! पुनः पुनरेवं भण । 4 नायकः—अम्ब ! किं पुनःपुनरभिहितेन ? ननु कर्मणैव सम्पादयामि वृद्धा—(शिरस्यञ्जलिं बद्ध्वा) पुत्तअ ! चिरं जीव । पुत्रक ! चिरं जीव । नायकः—ममैतदर्पय वध्यचिह्नं प्रावृत्य यावद्विनतात्मजाय । पुत्रस्य ते जीवितरक्षणाय स्वदेहमाहारयितुं ददामि ॥१४॥ श्लोक नं०: १३, अन्वयः— क्व महाहिमस्तिष्कविभेदमुक्तरक्तच्छटाचर्चितचण्डचञ्चुः असौ गरुत्मान् ? क्व च नाम सौम्यस्वभावरूपाकृतिः एष साधुः ? श्लोक नं०: १४, अन्वयः— अम्ब ! एतद् वध्यचिह्नं मम अर्पय; यावद् (अनेन) प्रावृत्य, ते पुत्रस्य जीवितरक्षणाय, विनतात्मजाय आहारयितुं स्वदेहं ददामिः
( १७६ ) शङ्खचूड़— माता जी डर को रहने दो। यह नागशत्रु गरुड़ नहीं है। देखिए— कहां तो बड़े बड़े सांपों के मस्तकों को फाड़ने से निकले हुए ख़ून की धाराओं से लिप्त भयानक चोंच वाला वह गरुड़, और कहां शान्त स्वभाव तथा सुन्दर रूप और आकृति वाला यह साधु पुरुष ? वृद्धा— मैं तो तुम्हारी मृत्यु से डरी हुई सारे संसार को गरुड़मय देख रही हूँ। नायक— माता ! मत डरो । यह मैं एक विद्याधर हूँ (जो) तुम्हारे पुत्र की रक्षा करने के लिए ही आया हूँ। वृद्धा— (हर्ष पूर्वक)— पुत्र ! बार बार ऐसा (ही) कहो । नायक—माता ! बार बार कहने से क्या ? मैं कार्य द्वारा ही सिद्ध करता हूँ। वृद्धा— (सिर पर हाथ जोड़ कर) पुत्र चिरंजीवी होवो । नायक— माता ! यह वध्यचिह्न (मरने का निशान-लाल वस्त्र) मुझे दो जबतक इस से ढक कर, तुम्हारे पुत्र की जीवन रक्षा के लिए, गरुड़ को खाने के लिए मैं अपना शरीर दे दूँ गा ।
- अलं = काफ़ी; बस; हटो; छोड़ो । इस अर्थ में 'अलं' के साथ तृतीया आती है ।
- छटा = लगातार लाइन-धारा ।
- सब को गरुड़ ही समझती हूँ ।
- काम से कर के दिखाऊँगा । 5. प्रावृत्य = ढक कर, लपेटकर ।
( १८० ) वृद्धा- (कर्णौ विधाय) पडिहदं अमंगलं । तुमं पि संखचूड- प्रतिहतममङ्गलम् । त्वमपि शङ्खचूड- णिव्विसेसो पुत्तो । अहवा संखचूड़ादो वि अहिअअरो, निर्विशेषः^१ - पुत्रः । अथवा शङ्खचूड़ादप्यधिकतरः जो एवं बंधुजणपरिच्चत्तं वि पुत्तअं मे सरीरपदाणेण य एवं बन्धुजनपरित्यक्तमपि पुत्रकं मे शरीरप्रदानेन रक्खिदुमिच्छसि । रक्षितुमिच्छसि । शङ्खचूडः -अहो ! जगद्विपरीतमस्य महासत्त्वस्य चरितम् । कुतः विश्वामित्रः श्वमांसं श्वपच^२ इव पुराभक्षयद्यन्निमित्तं, नाडीजङ्घो निजघ्ने^३ कृततदुपकृतिर्यत्कृते गौतमेन । पुत्रोऽयं काश्यपस्य प्रतिदिनमुरगानत्ति तार्क्यो यदर्थं, प्राणांस्तानेष साधुस्तृणमिव कृपया यः परार्थं ददाति ॥१५ (नायकमुद्दिश्य) - भो महासत्त्व ! त्वया दर्शितेवात्मप्रदान- व्यवसायान्निर्व्याजा मयि कृपालुता । तदलमनेन निर्बन्धेन । पश्य- श्लोक नं० १५, अन्वयः - यन्निमित्तं विश्वामित्रः श्वपच इव पुरा श्वमांसं अभक्षयत् , यत्कृते गौतमेन कृततदुपकृतिः नाडीजङ्घो निजघ्ने, यदर्थं काश्यपस्य अयं पुत्रः तार्क्ष्यः प्रतिदिनम् उरगान् अत्ति, तान् प्राणान् यः एष साधुः कृपया परार्थं तृणमिव ददाति ।
( १८१ )
वृा— (दोनों कान बन्द करके) अमंगल नष्ट हो ! तुम भी शङ्खचूड़ के समान ही पुत्र हो। अथवा, शङ्खचूड़ से भी बढ़ कर जो इस प्रकार बान्धवों से त्यागे गए भी मेरे पुत्र को अपना शरीर दे कर बचाना चाहते हों। शङ्खचूड़— अहो ! इस महात्मा का चरित्र संसार से विपरीत है : क्योंकि— जिन (प्राणों) के लिए विश्वामित्र ने प्राचीन काल में चाण्डाल की तरह कुत्ते का मांस खाया था, जिन (प्राणों) के लिए गौतम ने अपने उपकारी नाड़ीजंघ को मार डाला था, जिन के लिए कश्यप का यह पुत्र तार्क्ष्य (गरुड़) प्रति दिन सांपों को (मार कर) खा जाता है, उन्हीं प्राणों को जो यह सज्जन पुरुष दया से दूसरे के लिए तृण की तरह दे रहा है। (नायक से) हे महात्मन् ! आप ने अपने शरीर के अर्पण करने के निश्चय से मेरे प्रति निष्कपट दया दिखा दी। अतः इस आग्रह को रहने दीजिए। देखिए—
१. निर्विशेष = अभिन्न; सदृश । २. श्वपचः = चांडाल, शूद्र। ३. मारा गया था। ह। कैचाहट । पुरुष + एक
( १८२ ) जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः ¹क्षुद्रजन्तवः । परार्थे ²बद्धकक्षाणां त्वादृशामुद्भवः कुतः³ ॥ १६ ॥ तत् किमनेन निर्बन्धेन ? मुच्यतामयमध्यवसायः⁴ । नायकः—शङ्खचूड ! न मे चिराल्लब्धावसरस्य परार्थसम्पाद- नामनोरथस्यान्तरायं कर्तुमर्हसि । तदलं ⁵विकल्पेन । दीयतामेतद्वध्यचिह्नम् । शङ्खचूडः—भो महासत्त्व ! किमनेन वृथात्मायासेन ? न खलु शङ्खधवलं शङ्खपालकुलं शङ्खचूडो मलिनीकरिष्यति । यदि ते वयमनुकम्पनीयास्तदियमस्मद्विपत्तिविक्लवा न यथा जीवितं जहात्⁶, तथाभ्युपायश्चिन्त्यताम् । नायकः—किमत्र चिन्त्यते ? चिन्तित एवाभ्युपायः । स तु त्वदायत्तः । शङ्खचूडः—कथमिव ? नायकः—म्रियते म्रियमाणे या त्वयि, जीवति जीवति । तां यदिच्छसि जीवन्तीं, रक्षात्मानं ममासुभिः । १७। श्लोक; नं १६, अन्वयः— मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च । परार्थे बद्धकक्षाणां त्वादृशाम् उद्भवः कुतः ? श्लोक नंः १७, अन्वयः— या त्वयि म्रियमाणे म्रियते, (त्वयि) जीवति (च) जीवति, तां यदि जीवन्तीम् इच्छसि, (तर्हि) मम असुभिः आत्मानं रक्ष ।
( १८३ ) मुझ जैसे क्षुद्र प्राणी (संसार में कई) पैदा होते हैं और मर जाते हैं। (परन्तु) परोपकार के लिए कमर कस कर तैयार रहने वाले आप जैसे महापुरुषों का जन्म कहां होता है ? अतः इस हठ से क्या लाभ ? इस निश्चय को छोड़ दीजिए। नायक- शङ्खचूड ! चिरकाल के पश्चात् प्राप्त हुए अवसर वाले, परोपकार करने के मेरे मनोरथ में तुम्हें विघ्न नहीं डालना चाहिए। अतः यह हिचकचाहट छोड़ो। यह वध्यचिह्न दे दो ? शङ्खचूड-हे महात्मन् ! क्यों व्यर्थ ही अपने आप को कष्ट दे रहे हो ? शङ्खचूड शङ्ख के समान उज्ज्वल शङ्खपाल के कुल को कलंकित नहीं करेगा। यदि हम आप की दया के पात्र हैं तो ऐसा उपाय सोचिए जिस से मेरी विपत्ति के कारण व्याकुल हुई यह (मेरी माता) जीवन न त्याग दे। नायक - इस में सोचना क्या है ? उपाय तो सोचा हुआ ही है। वह तो तुम पर निर्भर है। शङ्खचूड- कैसे ? नायक - जो तुम्हारे मरने पर मर जाएगी और जीते रहने से जीती रहेगी; उस (माता) को यदि तू जीवित रखना चाहता है तो मेरे प्राणों से अपने को बचा।
- क्षुद्र = नाचीज़, निकम्मे, अकिंचन ।
- जिन्होंने कमर कसी हुई है; जो तैयार हैं।
- अर्थात् ऐसे महानुभावों का जन्म कभी कभी ही होता है।
- काम, निश्चय, फ़ैसला । 5. सोचविचार, हिचकचाहट ।
- हा (अदादिगण, परस्मैपद) + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + एक वचन।
( १८४ ) अयमभ्युपायः । तदर्पय त्वरितं वध्यचिह्नं, यावदने- नात्मानं प्रच्छाद्य वध्यशिलामारोहामि । त्वमपि जननीं पुरस्कृत्यास्माद्देशान्निवर्त्तस्व कदाचिदम्बावलोक्य सन्नि- कृष्टं घातस्थानं स्त्रीस्वभावकातरत्वेन जीवितं जह्यात् । किं न पश्यति भवानिदं विपन्नपन्नगानेककङ्कालसङ्कुलं महाश्मशानम् ? तथा हि, — चञ्चच्चञ्चूद्धृतार्धच्युतपिशितलवग्राससंवृद्धगन्धै- र्गृध्रैरारब्धपक्षद्वितयविधुतिभिर्बद्धसान्द्रान्धकारे । वक्त्रोद्धान्ताः पतन्त्यश्छमिति शिखिशिखाश्रेणयोऽस्मिञ्छिवाना- मस्रस्रोतस्यजस्रस्रुतबहलवसावासविस्रे स्वनन्ति ॥ १८ ॥ शङ्खचूडः — कथं न पश्यामि ? — प्रतिदिनमहिनाहारेण विनायकाहिप्रीति । शशिधवलास्थिकपालं वपुरिव रौद्रं श्मशानमिदम् ॥ १९ ॥ श्लोक नं०: १८, अन्वयः— चञ्चच्चञ्चूद्धृतार्धच्युतपिशितलवग्रास संवृद्धगन्धैः गृध्रैः व्याबद्धपक्षद्वितयविधूतिभिः बद्धसान्द्रान्धकारे अस्मिन् (श्मशाने) अजस्रस्रुतबहलवसावासविस्रे अस्रस्रोतसि शिवानां वक्त्रोद्धान्ताः शिखिशिखाश्रेणयः शमिति पतन्ति । श्लोक नं०: १९, अन्वयः — प्रतिदिनमहिना आहारेण विनायकाहितप्रीति इदं श्मशानं शशिधवलास्थिकपालं रौद्रम् वपुरिव ॥
( १८५ ) यही उपाय है। अतः शीघ्र ही वध्यचिह्न दे दो ताकि इस से अपने आप को ढक कर वध्यशिला पर चढ़ जाऊँ ! तुम भी माता को लेकर इस स्थान से लौट जाओ। कहीं (तुम्हारी) माता समीप ही वध्यभूमि को देख कर स्त्रीजाति की स्वाभाविक कायरता से प्राण ही त्याग दे। क्या आप मरे हुए सांपों के अनेक अस्थिपञ्जरों से भरे हुए (इस) महाश्मशान को नहीं देख रहे ? वैसे ही— फड़कती हुई चोंचों से उठाए गए (परन्तु) आधे रास्ते में ही गिरे हुए मांस के टुकड़ों को पकड़ने की प्रबल इच्छा वाले, फैलाए हुए दोनों पंखों को लगातार फड़फड़ाने वाले गीधों के द्वारा जहाँ घोर अन्धकार छा रहा है ऐसे इस (श्मशान) में लगातार टपकती हुई घनी चर्बी से भीषण दुर्गन्ध वाली खून की नदी में शृगालियों के मुख से निकलती हुई अग्नि की लपटें गिरती हुई 'शम्' 'शम्' का शब्द कर रही हैं। शङ्खचूड़—क्यों नहीं देखता ? (अर्थात् देख ही रहा हूँ)— प्रतिदिन सांपों के आहार से पक्षिराज (गरुड़) को आनन्द देने वाला यह श्मशान चन्द्रमा के समान सफेद हड्डियों तथा खोपड़ियों से युक्त भगवान् रुद्र (शिव) के शरीर के समान (दीख रहा है)। [वह भी प्रतिदिन सांपों के हार से सुशोभित गणेश को आनन्द देने वाला है, तथा मस्तक पर स्थित चन्द्रमा के कारण उजली हड्डियों तथा खोपड़ियों (की माला) से शोभायमान रहता है। १. गर्धः = इच्छा, लालच, लोभ । २. अस्र = रक्त खून। ३. वसा = चर्बी; वास = गन्ध; विस्रम् = दुर्गन्ध वाली। ४. तीनों विशेषणों के दो दो अर्थ—देखिए अनुवाद।
( १८६ ) नायकः- शङ्खचूड़ ! तद् गच्छ, किमेभिः सामोपन्यासैः ? शङ्खचूड़ः- आसन्नः खलु गरुडस्यागमनसमयः । (मातुरग्रतो जानुभ्यां स्थित्वा -) अम्ब ! त्वमपि निवर्त्तस्वेदानीम् । समुत्पस्यामहे मातर्यस्यां यस्यां ¹गतौ वयम् । तस्यां तस्यां प्रियस्रुते ! माता भूयास्त्वमेव नः ॥२०॥ [पादयोः पतति] वृद्धा - (सास्रम्) कहं पच्छिमं से वअणं ? पुत्तअ ! ण क्खु कथं पश्चिममस्य वचनम् ? पुत्रक ! न खलु तुमं उज्झिअ मे पाआ अण्णदो वहंति । इह ज्जेव्व तुए त्वामुज्झित्वा मे पादावन्यतो वहतः । इहैव त्वया सह चिट्ठिसं । सह स्थास्यामि। शङ्खचूड़ः- (उत्थाय) यावदहसध्यदूरे भगवन्तं दक्षिणा- गोकर्णं प्रदक्षिणीकृत्य स्वाम्यादेशमनुतिष्ठामि । [उभौ निष्क्रान्तौ] नायकः-कष्टम् । न सम्पन्न मभिलषितम् तत्कोऽत्राभ्युपायः ? कञ्चुकी- (तरसा प्रविश्य ²- इदं वासोयुगम् । नायकः-[दृष्ट्वा सहर्षमात्मगतम्] दिष्ट्या सिद्धमभिवाञ्छित- मनेनातर्कितोपनतेन ³ रक्तांशुकयुगलेन ।
श्लोक नं०: २०, अन्वयः - मातः ! यस्यां यस्यां गतौ वयं समुत्पस्यामहे तस्यां तस्यां प्रियस्रुते ! त्वम् एव नः माता भूयाः ॥
नायक—शङ्खचूड़ ! तो जाओ, इन कोमल बातों से क्या लाभ ? शङ्खचूड़—गरुड़ के आने का समय समीप ही है। (माता के आगे घुटने टेक कर) माता जी ! आप भी अब लौट जाइए। हे माता ! जिस जिस योनि में हम उत्पन्न हों, उस उस (योनि) में हे पुत्रवत्सले ! तू ही हमारी माता हो। वृद्धा—(आंसुओं के साथ) क्या यह इस का अन्तिम वचन है ? हे पुत्र, तुम्हें छोड़ कर मेरे पैर कहीं और नहीं चलते। यहीं तेरे साथ ही ठहरूँगी। शङ्खचूड़—(उठकर) मैं भी तब तक समीप ही भगवान् दक्षिण गोकर्ण की प्रदक्षिणा कर के स्वामी की आज्ञा का पालन करता हूँ। [दोनों का प्रस्थान] नायक—आह ! मेरी इच्छा पूर्ण नहीं हुई। (अब) यहां कौनसा उपाय है ? कञ्चुकी—(वेग के साथ प्रवेश करके) यह (लाल) वस्त्रों का जोड़ा। नायक—(देख कर, हर्षपूर्वक, मन ही मन) भाग्यवश अचानक लाए गए इन दोनों लाल वस्त्रों से मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया !
- दशा, हालत, योनि। 2. पताकास्थानम्।
- जिस के बारे में सोचा नहीं था, सहसा, अचानक।
( १८८ ) कञ्चुकी—इदं वासोयुगं देव्या मित्रवसुजनन्या कुमाराय प्रेषितम् । तदेतत् परिधत्तां कुमारः । नायकः-(सादरम् ) उपनय । कञ्चुकी—(उपनयति) नायकः-(गृहीत्वात्मगतम्) सफलीभूतो मे मलयवत्याः पाणिग्रहः । (प्रकाशम्) कञ्चुकिन् ! गम्यतां, मद्वचनादभिवादनीया देवी । कञ्चुकी—यदाज्ञापयति कुमारः । [इति निष्क्रान्तः] नायकः-वासोयुगमिदं रक्तं प्राप्ते काले समागतम् । महतीं प्रीतिमाधत्ते परार्थे देहमुज्झतः ॥२१॥ (दिशोऽवलोक्य) यथायं चलितमलयाचलशिखरशिला- सञ्चयः प्रचण्डो ¹ नभस्वाँस्तथो तर्कयाम्यासन्नीभूतः खलु पत्तिगज इति । तथा हि— श्लोक नं० : २१, अन्वयः— प्राप्ते काले समागतम् इदं रक्तम् वासोयुगं परार्थे देहमुज्झतः (मम) महतीं प्रीतिम् आधत्ते ।
( १८६ ) कञ्चुकी— यह वस्त्रों का जोड़ा मित्रावसु की माता महारानी ने आप- के लिए भेजा है। अतः आप इन्हें पहिन लें। नायक—(आदरपूर्वक) लाओ। कञ्चुकी— (पास ले आता हैं) नायक— (लेकर, मन ही मन) मेरा मलयवती के साथ विवाह करना (अद्य) सफल हो गया। (प्रकट) कञ्चुकी ! जाओ महारानी को मेरी ओर से प्रणाम कर देना। कञ्चुकी— जो कुमार की आज्ञा। [प्रस्थान] नायक—उचित समय पर आए हुए ये दो लाल वस्त्र परोपकार के लिए शरीर त्यागने वाले मुझे अत्यन्त प्रसन्नता दे रहे हैं। (चारों दिशाओं में देखकर) जिस प्रकार मलयपर्वत की चोटी के पत्थरों के ढेरों को हिलाता हुआ पवन प्रचण्ड (हो रहा) है, उस से मेरा विचार है कि निश्चय ही पक्षिराज गरुड़ समीप ही आ पहुँचा है। क्योंकि— १. नभस्वान् = हवा !
( १६० ) तुल्या संवर्त्तकाभ्रैः$^1$ पिद्धति गगनं पङ्क्तयः पक्षतीनां, तीरे वेगानिलोऽम्भः क्षिपति भुव इव प्लावनायाम्बुराशेः । कुर्वन् कल्पान्तशङ्कां सपदि च सभयं वीक्षितो दिग्द्विपेन्द्रै र्देहोद्योतैर्र्दशाशाः कपिशयति मुहुर्द्वादशादित्यदीप्तिः ॥२२॥ तद्यावदसौ नागच्छेच्छङ्खचूडस्तावत्त्वरिततरमिमां वध्यशिला- मारोहामि । (तथा कृत्वा, उपविश्य स्पर्शं नाटयति)— अहो स्पर्शोस्याः ! न तथा $^2$सुखयति मन्ये मलयवती मलयचन्दनरसार्द्रा अभिवाञ्छितार्थसिद्धयै वध्यशिलेयं यथाश्लिष्टा ॥२३॥ अथवा किं मलयवत्या ? नं० : २२, अन्वयः— संवर्त्तकाभ्रैः तुल्याः पक्षतीनां पङ्क्तयः गगनं पिदधति । वेगानिलः भुवः इव प्लावनाय अम्बुराशेः अम्भः तीरे क्षिपति । सपदि च कल्पान्तशङ्कां कुर्वन् दिग्द्विपेन्द्रैः सभयं वीक्षितः द्वादशा- दित्यदीप्तिः (अयं गरुडः) देहोद्योतैः दशाशाः मुहुः कपिशयति लोक नं०: २३: अन्वयः— मन्ये (यत् ) मलयचन्दनरसार्द्रा मलयवती आश्लिष्टा (मां) तथा न सुखयति यथा अभिवाञ्छितार्थसिद्धयै (आश्लिष्टा) इयं वध्यशिला ।
( १६१ ) प्रलयकाल के मेघों के समान पँखों की कतारें (समूह) आकाश को ढक रही हैं। वेग से चलने वाली हवा मानों पृथ्वी को (ही) डुबा देने के लिए समुद्र का पानी तट पर फेंक रही है। और झटपट प्रलयकाल की शङ्का उत्पन्न करता हुआ, दिशाओं से डर के साथ देखा गया, बारह सूर्यों की कान्ति वाला (यह गरुड़) अपने शरीर की प्रभा से दसों दिशाओं को बार बार कपिश (लाल भूरा) सा कर रहा है। अतः जब तक यह शङ्खचूड़ आ नहीं जाता तब तक जल्दी से इस वध्यशिला पर चढ़ता हूँ। [वैसा ही करके, बैठकर, उस के स्पर्श का अभिनय करता है]– आह ! इस का स्पर्श (कैसा अच्छा है) ! मैं मानता हूँ कि मलयचन्दन के रस से सिक्त (शीतलाङ्गी) मलयवती भी आलिङ्गन की गई मुझे इतना सुख नहीं देती जितना कि अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए स्पर्श की गई यह वध्यशिला (देती है)। अथवा, मलयवती से क्या ? (उस की बात छोड़ो)–
१. प्रलयकाल के समय प्रकट होने वाले बादल । २. 'सुखयति' और "आश्लिष्टा"–मलयवती तथा शिला–दोनों के साथ लगते हैं।
( १६२ ) शयितेन मातुरङ्के विस्रब्धं¹ शैशवे न तत्प्राप्तम्। लब्धं सुखं मयास्या वध्यशिलाया यदुत्सङ्गे ॥ २४॥ तदयमागतो गरुत्मान् , यावदात्मानमाच्छादयामि। [तथा करोति] [ततः प्रविशति गरुडः] गरुडः- क्षिप्त्वा बिम्बं हिमांशोर्भयकृतवलयां संस्मरन् शेषमूर्तिं सानन्दं स्यन्दनाश्वत्रसनविचलिते पूष्णि² दृष्टोऽग्रजेन । एष प्रान्तावसज्जज्जलधरपटलात्यायतीभूतपक्षः, प्राप्तो वेलामहीध्रं मलयमहमिहग्रासगृध्नुः क्षणेन ॥२५॥ नायकः- (सपरितोषम्) - संरक्षता पन्नगमद्य पुण्यं मयार्जितं यत्स्वशरीरदानात् । भवे भवे³ तेन ममैवमेवं भूयात्परोपकाराय शरीरलाभः ॥२६॥ श्लोक नं० : २४, अन्वयः- शैशवे मातुः अङ्के विस्रब्धं शयितेन मया तत् सुखं न प्राप्तं यत् (सुखं) अस्याः वध्यशिलायाः उत्सङ्गे लब्धम् । श्लोक नं० : २५, अन्वयः - हिमांशोः बिम्बं क्षिप्त्वा, भयकृतवलयां शेषमूर्तिं संस्मरन् , स्यन्दनाश्वत्रसनविचलिते पूष्णि अग्रजेन सानन्दं दृष्टः, प्रान्तावसज्जज्जलधरपटलात्यायतीभूतपक्षः एषोऽहम् अहिग्रासगृध्नुः क्षणेन इह वेलामहीध्रं मलयं प्राप्तः । श्लोक नं० : २६, अन्वयः - अद्य स्वशरीरदानात् पन्नगं संरक्षता मया यत् पुण्यम् अर्जितं, तेन भवे भवे मम एवमेवं परोपकाराय शरीरलाभः भूयात् ।
( १६३ ) बचपन से माता का गोद में निःशङ्क सोने से भी मुझे वह सुख प्राप्त नहीं हुआ था जो (सुख) इस वध्यशिला की गोद में मिला है । तो यह गरुड़ आ गया । अतः अपने शरीर को (इन लाल वस्त्रों से) ढकता हूँ । [वैसा ही करता है] [गरुड़ का प्रवेश] गरुड़ — चन्द्रमण्डल को हिलाता-डुलाता हुआ, भय से कुण्डलिनी मारे शेषनाग की मूर्ति को याद करता हुआ, रथ के घोड़ों के डर से सूर्य के विचलित होने पर अपने बड़े भाई (अरुण) के द्वारा आनन्द पूर्वक देखा गया, किनारों पर लिपटे हुए बादलों के समूह से अत्यन्त विस्तृत हुए पँखों वाला यह मैं साँपों को खाने की इच्छा वाला क्षण में वहां (समुद्र के) किनारे पर विद्यमान मलयपर्वत पर पहुँच गया हूँ । नायक — (सन्तोषपूर्वक) आज अपने शरीर के दान से नाग की रक्षा करते हुए मैं ने जो पुण्य प्राप्त किया है उससे प्रत्येक जन्म में मुझे इसी प्रकार ही परोपकार के लिए शरीर लाभ हो ।
- भय अथवा शङ्का से रहित हो कर—; क्रियाविशेषण ।
- सति सप्तमि — सूर्य के विचलित होने पर !
- भव = जन्म ।