संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१ राममाह जनस्थाने भ्रात्रा सह महाबलम्। ज्ञात्वा ते राघवं क्रुद्धाः प्रेषयामासूरूर्जितान्॥ ५१ चतुर्दशसहस्राणि राक्षसानां बलीयसाम्। अग्रे निजग्मुस्तेनैव रक्षसां नायकास्त्रयः॥ ५२ रावणेन नियुक्तास्ते पुरैव तु महाबलाः। महाबलपरीवारा जनस्थानमुपागताः॥ ५३ क्रोधेन महताऽऽविष्टा दृष्ट्वा तां छिन्ननासिकाम्। रुदतीमश्रुदिग्धाङ्गीं भगिनीं रावणस्य तु॥ ५४ रामोऽपि तद्वलं दृष्ट्वा राक्षसानां बलीयसाम्। संस्थाप्य लक्ष्मणं तत्र सीताया रक्षणं प्रति॥ ५५ गत्वा तु प्रहितैस्तत्र राक्षसैर्बलदर्पितैः। चतुर्दशसहस्रं तु राक्षसानां महाबलम्॥ ५६ क्षणेन निहतं तेन शरैरग्निशिखोपमैः। खरश्च निहतस्तेन दूषणश्च महाबलः॥ ५७ त्रिशिराश्च महारोषाद् रणे रामेण पातितः। हत्वा तान् राक्षसान् दुष्टान् रामश्चाश्रममाविशत्॥ ५८ शूर्पणखा च रुदती रावणान्तिकमागता। छिन्ननासां च तां दृष्ट्वा रावणो भगिनीं तदा॥ ५९ मारीचं प्राह दुर्बुद्धिः सीताहरणकर्मणि। पुष्पकेण विमानेन गत्वाहं त्वं च मातुल॥ ६० जनस्थानसमीपे तु स्थित्वा तत्र ममाज्ञया। सौवर्णमृगरूपं त्वमास्थाय तु शनैः शनैः॥ ६१ गच्छ त्वं तत्र कार्यार्थं यत्र सीता व्यवस्थिता। दृष्ट्वा सा मृगपोतं त्वां सौवर्णं त्वयि मातुल॥ ६२ स्पृहां करिष्यते रामं प्रेषयिष्यति बन्धने। तद्वाक्यात्तत्र गच्छन्तं धावस्व गहने वने॥ ६३ लक्ष्मणस्यापकर्षार्थं वक्तव्यं वागुदीरणम्। ततः पुष्पकमारुह्य मायारूपेण चाप्यहम्॥ ६४ तां सीतामहरानेष्ये तस्यामासक्तमानसः। त्वमपि स्वेच्छया पश्चादागमिष्यसि शोभन॥ ६५ 'महाबली श्रीराम इस समय जनस्थानमें अपने भाई लक्ष्मणके साथ रहते हैं।' श्रीरामका पता पाकर वे तीनों बहुत ही कुपित हुए और उनके साथ युद्धके लिये उन्होंने चौदह हजार प्रतापी एवं बलवान् राक्षसोंको भेजा तथा वे तीनों निशाचर-नायक स्वयं भी उस सेनाके साथ आगे-आगे चले। उन महाबलवान् राक्षसोंको रावणने वहाँ पहलेसे ही नियुक्त कर रखा था। वे बहुत बड़ी सेनाके साथ जनस्थानमें आये। रावणकी बहिन शूर्पणखा नाक कट जानेसे बहुत रो रही थी। उसके सारे अङ्ग आँसुओंसे भीग गये थे। उसकी वह दुर्दशा देख वे खर-दूषण आदि राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे थे॥ ५०-५४॥ श्रीरामने भी बलवान् राक्षसोंकी उस सेनाको देख लक्ष्मणको सीताकी रक्षामें उसी स्थानमें रोक दिया और अपने साथ युद्धके लिये वहाँ भेजे गये उन बलाभिमानी राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। अग्निकी ज्वालाके समान दीप्तिमान् बाणोंद्वारा उन्होंने चौदह हजार राक्षसोंकी प्रबल सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। साथ ही खर और महाबली दूषणका भी वध किया। इसी प्रकार त्रिशिराको भी श्रीरामने अत्यन्त रोषपूर्वक रणक्षेत्रमें मार गिराया। इस तरह उन सभी दुष्ट राक्षसोंका वध करके श्रीरामचन्द्रजी अपने आश्रममें लौट आये॥ ५५-५८॥ तब शूर्पणखा रोती हुई रावणके पास आयी। दुर्बुद्धि रावणने अपनी बहिनकी नाक कटी देख सीताको हर लानेके उद्देश्यसे मारीचसे कहा—'मामा! हम और तुम पुष्पकविमानसे चलकर जनस्थानके पास ठहरें। वहाँसे तुम मेरी आज्ञाके अनुसार सोनेके मृगका वेष धारणकर धीरे-धीरे मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये उस स्थानपर जाना, जहाँ सीता रहती है। मामा! वह जब तुम्हें सुवर्णमय मृगशावकके रूपमें देखेगी, तब तुम्हें लेनेकी इच्छा करेगी और श्रीरामको तुम्हें बाँध लानेके लिये भेजेगी। जब सीताकी बात मानकर वे तुम्हें बाँधने चलें, तब तुम उनके सामनेसे गहन वनमें भाग जाना। फिर लक्ष्मणको भी उधर ही खींचनेके लिये उच्चस्वरसे [हा भाई लक्ष्मण! इस प्रकार] कातर वचन बोलना। तत्पश्चात् मैं भी मायामय वेष बनाकर, पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो, उस असहाया सीताको हर लाऊँगा; क्योंकि मेरा मन उसमें आसक्त हो गया है। फिर भद्र! तुम भी स्वेच्छानुसार चले आना'॥ ५९-६५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०१ इत्युक्ते रावणेनाथ मारीचो वाक्यमब्रवीत्। त्वमेव गच्छ पापिष्ठ नाहं गच्छामि तत्र वै ॥ ६६ पुरैवानेन रामेण व्यथितोऽहं मुनेर्मखे। इत्युक्तवति मारीचे रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६७ मारीचं हन्तुमारेभे मारीचोऽप्याह रावणम्। तव हस्तवधाद्वीर रामेण मरणं वरम् ॥ ६८ अहं गमिष्यामि तत्र यत्र त्वं नेतुमिच्छसि । अथ पुष्पकमारुह्य जनस्थानमुपागतः ॥ ६९ मारीचस्तत्र सौवर्णं मृगमास्थाय चाग्रतः। जगाम यत्र सा सीता वर्तते जनकात्मजा ॥ ७० सौवर्णं मृगपोतं तु दृष्ट्वा सीता यशस्विनी। भाविकर्मवशाद्राममुवाच पतिमात्मनः ॥ ७१ गृहीत्वा देहि सौवर्णं मृगपोतं नृपात्मज। अयोध्यायां तु मद्गेहे क्रीडनार्थमिदं मम ॥ ७२ तयैवमुक्तो रामस्तु लक्ष्मणं स्थाप्य तत्र वै। रक्षणार्थं तु सीताया गतोऽसौ मृगपृष्ठतः ॥ ७३ रामेण चानुयातोऽसौ अभ्यधावद्वने मृगः। ततः शरेण विव्याध रामस्तं मृगपोतकम् ॥ ७४ हा लक्ष्मणेति चोक्त्वासौ निपपात महीतले। मारीचः पर्वताकारस्तेन नष्टो बभूव सः ॥ ७५ आकर्ण्य रुदतः शब्दं सीता लक्ष्मणमब्रवीत्। गच्छ लक्ष्मण पुत्र त्वं यत्रायं शब्द उत्थितः ॥ ७६ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तत्त्वं वै रुदतः श्रूयते ध्वनिः। प्रायो रामस्य संदेहं लक्षयेऽहं महात्मनः ॥ ७७ इत्युक्तः स तथा प्राह लक्ष्मणस्तामनिन्दिताम्। न हि रामस्य संदेहो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ७८ रावणके यों समझानेपर मारीचने कहा—'अरे पापिष्ठ! तुम्हीं जाओ, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। मैं तो विश्वामित्रमुनिके यज्ञमें पहले ही श्रीरामके हाथों भारी कष्ट उठा चुका हूँ।' मारीचके यों कहनेपर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो उसे मार डालनेको उद्यत हो गया। तब मारीचने उससे कहा—'वीर! तुम्हारे हाथसे वध हो, इसकी अपेक्षा तो श्रीरामके हाथसे ही मरना अच्छा है। तुम मुझे जहाँ ले चलना चाहते हो, वहाँ अब मैं अवश्य चलूँगा' ॥ ६६-६८१/२ ॥ यह सुनकर वह पुष्पकविमानपर आरूढ हो उसके साथ जनस्थानके निकट आया। वहाँ पहुँचकर मारीच सुवर्णमय मृगका रूप धारणकर, जहाँ जनकनन्दिनी सीता विद्यमान थीं, वहाँ उनके सामने गया। उस सुवर्णमय मृगकिशोरको देखकर यशस्विनी सीता भावी कर्मके वशीभूत हो अपने पति भगवान् श्रीरामसे बोलीं—'राजपुत्र! आप उस सुवर्णमय मृगशावकको पकड़कर मेरे लिये ला दीजिये। यह अयोध्यामें मेरे महलके भीतर क्रीड़ा-विनोदके लिये रहेगा' ॥ ६९-७२ ॥ सीताके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको वहाँ रख दिया और स्वयं उस मृगके पीछे चले। श्रीरामके पीछा करनेपर वह मृग वनकी ओर भागा, तब श्रीरामने उस मृगशावकको बाणसे बींध डाला। मारीच 'हा! लक्ष्मण!'—यों कहकर पर्वताकार शरीरसे पृथ्वीपर गिरा और प्राणहीन हो गया। रोते हुए मारीचके उस आर्तनादको सुनकर सीताने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स लक्ष्मण! जहाँसे यह आवाज आयी है, वहीं तुम भी जाओ। निश्चय ही तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राताके रोदनका शब्द कानोंमें आ रहा है, मुझे प्रायः महात्मा श्रीरामका जीवन संशयमें पड़ा दिखायी देता है' ॥ ७३-७७ ॥ सीताकी यह बात सुनकर उन अनिन्दिता देवीसे लक्ष्मणने कहा—'देवि! श्रीरामके लिये कोई संदेहकी बात नहीं है, उन्हें कहीं भी भय नहीं है।' In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९ इति ब्रुवाणं तं सीता भाविकर्मबलाद्धृतम्। यों कहते हुए लक्ष्मणसे उस समय विदेहकुमारी सीताने लक्ष्मणं प्राह वैदेही विरुद्धवचनं तदा॥ ७९ कुछ विरुद्ध वचन कहा, जो भवितव्यताकी प्रेरणासे उनके मुखसे सहसा निकल पड़ा था। वे बोलीं—'मैं मृते रामे तु मामिच्छन्न्रतस्त्वं न गमिष्यसि। जानती हूँ, तुम श्रीरामके मर जानेपर मुझे अपनी बनाना इत्युक्तः स विनीतात्मा असहन्नप्रियं वचः॥ ८० चाहते हो; इसीसे इस समय वहाँ नहीं जा रहे हो।' सीताके यों कहनेपर विनयशील राजकुमार लक्ष्मण जगाम राममन्वेष्टुं तदा पार्थिवनन्दनः। उस अप्रिय वचनको न सह सके और तत्काल ही संन्यासवेषमास्थाय रावणोऽपि दुरात्मवान्॥ ८१ श्रीरामचन्द्रजीकी खोजमें चल पड़े॥ ७८—८०१/२॥ इसी समय दुरात्मा रावण भी संन्यासीका वेष बनाकर स सीतापाश्र्वमासाद्य वचनं चेदमुक्तवान्। सीताके पास आया और यों बोला—'देवि! अयोध्यासे आगतो भरतः श्रीमानयोध्याया महामतिः॥ ८२ महाबुद्धिमान् भरतजी आये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ बातचीत करके वहीं काननमें ठहरे हुए हैं। श्रीरामचन्द्रजीने रामेण सह सम्भाष्य स्थितवांस्तत्र कानने। मुझे तुम्हें बुलानेके लिये यहाँ भेजा है। तुम इस विमानपर मां च प्रेषितवान् रामो विमानमिदमारुह॥ ८३ चढ़ चलो। भरतजीने मनाकर श्रीरामको अयोध्या चलनेके लिये राजी कर लिया है, अतः वे अयोध्या जा रहे हैं। अयोध्यां याति रामस्तु भरतेन प्रसादितः। वैदेहि! तुम्हारी क्रीडा—विनोदके लिये उन्होंने उस मृग- मृगबालं तु वैदेहि क्रीडार्थं ते गृहीतवान्॥ ८४ शावकको भी पकड़ लिया है। अहो! तुमने इस विशाल वनमें बहुत दिनोंतक ऐसा महान् कष्ट उठाया है। अब क्लेशितासि महारण्ये बहुकालं त्वमीदृशम्। तुम्हारे स्वामी सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी तथा उनके सम्प्राप्तराज्यस्ते भर्ता रामः स रुचिराननः॥ ८५ विनयशील भाई लक्ष्मण भी राज्यग्रहण कर चुके हैं। अतः तुम उनके पास चलनेके लिये इस विमानपर चढ़ लक्ष्मणश्च विनीतात्मा विमानमिदमारुह। जाओ'॥ ८१—८५१/२॥ इत्युक्ता सा तथा गत्वा नीता तेन महात्मना॥ ८६ उसके यों कहनेपर उसकी कपटपूर्ण बातोंसे प्रेरित हो सती सीता वह सब सत्य मानकर उस तथाकथित आरुरोह विमानं तु छद्मना प्रेरिता सती। महात्माके साथ विमानके निकट गयीं और उसपर आरूढ तज्जगाम ततः शीघ्रं विमानं दक्षिणां दिशम्॥ ८७ हो गयीं। तब वह विमान शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़ा। यह देख सीता अत्यन्त शोकसे पीड़ित ततः सीता सुदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता। हो, अत्यन्त दुःखसे विलाप करने लगीं। यद्यपि सीता विमाने खेऽपि रोदन्त्याश्चक्रे स्पर्शं न राक्षसः॥ ८८ आकाशमें उसके अपने ही विमानपर बैठी थीं, तथापि रावणने वहाँ रोती हुई सीताका स्पर्श नहीं किया। अब रावणः स्वेन रूपेण बभूवाथ महातनुः। रावण अपने असली रूपमें आ गया। उसका शरीर बहुत दशग्रीवं महाकायं दृष्ट्वा सीता सुदुःखिता॥ ८९ बड़ा हो गया। दस मस्तकवाले उस विशालकाय राक्षसपर दृष्टि पड़ते ही सीता अत्यन्त दुःखमें डूब गयीं और हा राम वञ्चिताद्याहं केनापिच्छद्मरूपिणा। विलाप करने लगीं—'हाय राम! किसी कपटवेषधारी रक्षसा घोररूपेण त्रायस्वेति भयार्दिता॥ ९० भयानक राक्षसने आज मुझे धोखा दिया है, मैं भयसे पीड़ित हो रही हूँ; मुझे बचाओ। हे महाबाहु लक्ष्मण! हे लक्ष्मण महाबाहो मां हि दुष्टेन रक्षसा। मुझे दुष्ट राक्षस हरकर लिये जा रहा है। मैं भयसे व्याकुल द्रुतमागत्य रक्षस्व नीयमानामथाकुलाम्॥ ९१ हूँ तुम जल्दी आकर मुझ असहायाकी रक्षा करो'॥ ८६—९१॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०३ एवं प्रलपमानायाः सीतायास्तन्महत्स्वनम्। इस प्रकार उच्चस्वरसे विलाप करती हुई सीताके उस आकर्ण्य गृध्रराजस्तु जटायुस्तत्र चागतः॥ ९२ महान् आर्तनादको सुनकर गृध्रराज जटायु वहाँ आ पहुँचे (और बोले-) 'अरे दुष्टात्मा रावण! ठहर जा; तू तिष्ठ रावण दुष्टात्मन् मुञ्च मुञ्चात्र मैथिलीम्। सीताको छोड़ दे, छोड़ दे।' यह कहकर पराक्रमी जटायु इत्युक्त्वा युयुधे तेन जटायुस्तत्र वीर्यवान्॥ ९३ उसके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने अपने दोनों पंखोंसे रावणकी छातीमें चोट की। उनको इस प्रकार प्रहार करते पक्षाभ्यां ताडयामास जटायुस्तस्य वक्षसि। देख रावणने समझ लिया कि 'यह पक्षी बड़ा बलवान् ताडयन्तं तु तं मत्वा बलवानिति रावणः॥ ९४ है।' जब जटायुके मुख और चोंचकी मारसे वह बहुत पीड़ित हो गया, तब उस दुष्टने बड़े वेगसे 'चन्द्रहास' तुण्डचञ्चुप्रहारैस्तु भृशं तेन प्रपीडितः। नामक विशाल खड्ग उठाया और उससे धर्मात्मा जटायुपर तत उत्थाप्य वेगेन चन्द्रहासमसिं महत्॥ ९५ घातक प्रहार किया। इससे उनकी चेतना क्षीण हो गयी और वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ९२-९६॥ जघान तेन दुष्टात्मा जटायुं धर्मचारिणम्। निपपात महीपृष्ठे जटायुः क्षीणचेतनः॥ ९६ उस समय उन्होंने रावणसे कहा- 'अरे दुष्टात्मन्! ओ नीच राक्षस ! मुझे तूने नहीं मारा है। मैं तो तेरे उवाच च दशग्रीवं दुष्टात्मन् न त्वया हतः। 'चन्द्रहास' नामक खड्गके प्रभावसे मारा गया हूँ। अरे चन्द्रहासस्य वीर्येण हतोऽहं राक्षसाधम ॥ ९७ मूर्ख ! तेरे सिवा दूसरा कौन शस्त्रधारी योद्धा होगा, जो किसी निहत्थेपर हथियार चलायेगा ? अरे दुष्ट राक्षस ! निरायुधं को हनेन्मूढ सायुधस्त्वामृते जनः। तू यह जान ले कि सीताका हर ले जाना तेरी मौत सीतापहरणं विद्धि मृत्युस्ते दुष्ट राक्षस ॥ ९८ है। दुष्टात्मा रावण ! निस्संदेह श्रीरामचन्द्रजी तेरा वध कर डालेंगे' ॥ ९७-९८१/२ ॥ दुष्ट रावण रामस्त्वां वधिष्यति न संशयः। रुदती दुःखशोकार्ता जटायुं प्राह मैथिली ॥ ९९ जटायुके मारे जानेसे अत्यन्त दुःख और शोकसे पीड़ित हुई मिथिलेशकुमारी सीता उनसे रोकर बोलीं- मत्कृते मरणं यस्मात्त्वया प्राप्तं द्विजोत्तम । 'हे पक्षिराज! तुमने मेरे लिये मृत्युका वरण किया है, तस्माद्रामप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्स्यसि ॥ १०० इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे विष्णुलोकको प्राप्त होओगे। खगश्रेष्ठ! जबतक श्रीरामचन्द्रजीसे तुम्हारी यावद्रामेण सङ्गस्ते भविष्यति महाद्विज। भेंट न हो, तबतक तुम्हारे प्राण शरीरमें ही रहें।' उन तावत्तिष्ठन्तु ते प्राणा इत्युक्त्वा तु खगोत्तमम् ॥ १०१ पक्षिराजसे यों कहकर अत्यन्त दुःखिनी सीताने अपने शरीरसे धारण किये हुए समस्त आभूषणोंको उतारा ततस्तान्यर्पितान्यङ्गाद्भूषणानि विमुच्य सा। और शीघ्रतापूर्वक वस्त्रमें बाँधकर कहा- 'तुम सब- शीघ्रं निबध्य वस्त्रेण रामहस्तं गमिष्यथ ॥ १०२ के-सब श्रीरामके हाथमें पहुँच जाओगे।' और तब उन्हें भूमिपर गिरा दिया ॥ ९९-१०२१/२॥ इत्युक्त्वा पातयामास भूमौ सीता सुदुःखिता। एवं हृत्वा स सीतां तु जटायुं पात्य भूतले ॥ १०३ इस प्रकार सीताको हरकर तथा जटायुको धराशायी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२०४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
२०४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१ पुष्पकेण गतः शीघ्रं लङ्कां दुष्टनिशाचरः। करके वह दुष्ट निशाचर पुष्पकविमानद्वारा शीघ्र ही लङ्कामें अशोकवनिकामध्ये स्थापयित्वा स मैथिलीम् ॥ १०४ जा पहुँचा। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीताको अशोक-वाटिका में रखकर राक्षसियोंसे बोला- 'भयंकर मुखवाली निशाचरियो ! इमामत्रैव रक्षध्वं राक्षस्यो विकृताननाः। तुम लोग यहीं सीताकी रखवाली करो।' यह आदेश दे इत्यादिश्य गृहं यातो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १०५ वह राक्षसराज रावण अपने भवनमें चला गया। उस समय लङ्कानिवासी एकान्तमें परस्पर मिलकर बातें करने लङ्कानिवासिनश्चोचुरेकान्तं च परस्परम्। लगे- 'दुरात्मा रावणने इस नगरीका विनाश करनेके लिये अस्याः पुर्या विनाशार्थं स्थापितेयं दुरात्मना ॥ १०६ ही सीताको यहाँ ला रखा है' ॥ १०३-१०६॥ विकट आकारवाली राक्षसियोंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित राक्षसीभिर्विरूपाभी रक्ष्यमाणा समन्ततः। हुई सीता वहाँ दुःखमग्न हो केवल श्रीरामचन्द्रजीका ही सीता च दुःखिता तत्र स्मरन्ती राममेव सा ॥ १०७ चिन्तन करती हुई रहने लगीं। वे सदा अत्यन्त शोकार्त हो बड़े दुःखके साथ बहुत रोदन किया करती थीं। उवास सा सुदुःखार्ता दुःखिता रुदती भृशम्। रावणके वशमें पड़ी हुई सीता ज्ञानको अपनेतक ही सीमित यथा ज्ञानखले देवी हंसयाना सरस्वती ॥ १०८ रखनेवाले कृपणके अधीन हुई हंसवाहिनी सरस्वतीके समान वहाँ शोभा नहीं पाती थी ॥ १०७-१०८॥ सुग्रीवभृत्या हरयश्चतुरश्च यदृच्छया। सीताने वस्त्रमें बँधे हुए अपने जिन आभूषणोंको वस्त्रबद्धं तयोत्सृष्टं गृहीत्वा भूषणं द्रुतम् ॥ १०९ नीचे गिरा दिया था, उन्हें अकस्मात् घूमनेके लिये आये हुए चार वानरोंने, जो वानरराज सुग्रीवके सेवक स्वभर्त्रे विनिवेद्योचुः सुग्रीवाय महात्मने। थे, पाया और शीघ्रतापूर्वक ले जाकर अपने स्वामी अरण्येऽभून्महायुद्धं जटायो रावणस्य च ॥ ११० महात्मा सुग्रीवको अर्पित करके यह समाचार भी सुनाया कि 'आज वनके भीतर जटायु और रावणमें अथ रामश्च तं हत्वा मारीचं माययाऽऽगतम्। बड़ा भारी युद्ध हुआ था।' इधर, जब श्रीरामचन्द्रजी निवृत्तो लक्ष्मणं दृष्ट्वा तेन गत्वा स्वमाश्रमम् ॥ १११ मायामय वेष बनाकर आये हुए उस मारीचको मारकर लौट पड़े, तब मार्गमें लक्ष्मणको देखकर उनके साथ सीतामपश्यन्दुःखार्तः प्ररुरोद स राघवः। अपने आश्रमपर आये; किंतु वहाँ सीताको न देखकर लक्ष्मणश्च महातेजा रुरोद भृशदुःखितः ॥ ११२ वे दुःखसे व्यथित हो फूट-फूटकर रोने लगे। महातेजस्वी लक्ष्मण भी अत्यन्त दुःखी होकर रोदन बहुप्रकारमस्वस्थं रुदन्तं राघवं तदा। करने लगे। उस समय श्रीरामचन्द्रजीको सर्वथा अस्वस्थ भूतले पतितं धीमानुत्थाप्याश्वास्य लक्ष्मणः ॥ ११३ होकर रोते और पृथ्वीपर गिरा देख बुद्धिमान् लक्ष्मणने उन्हें उठाकर धीरज बँधाया ॥ १०९-११३॥ उवाच वचनं प्राप्तं तदा यत्तच्छृणुष्व मे। राजन्! उस समय लक्ष्मणने उनसे जो समयोचित अतिवेलं महाराज न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ ११४ बात कही थी, वह तुम मुझसे सुनो। (लक्ष्मण बोले-) 'महाराज! आप अधिक शोक न करें। प्रभो! अब उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शीघ्रं त्वं सीतां मृगयितुं प्रभो। सीताकी खोज करनेके लिये आप शीघ्रतापूर्वक उठिये, इत्येवं वदता तेन लक्ष्मणेन महात्मना ॥ ११५ उठिये।' इत्यादि बातें कहते हुए दुःखी महात्मा लक्ष्मणने अपने शोक-ग्रस्त भाई राजा रामचन्द्रजीको उठाया और उत्थापितो नरपतिर्दुःखितो दुःखितेन तु। उनके साथ स्वयं सीताकी खोज करनेके लिये वनमें भ्रात्रा सह जगामाथ सीतां मृगयितुं वनम् ॥ ११६ चले ॥ ११४-११६॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०५ वनानि सर्वाणि विशोध्य राघवो उस समय श्रीरामचन्द्रजीने सारे वनोंको छान गिरीन् समस्तान् गिरिसानुगोचरान्। डाला, समस्त पर्वतों तथा उनकी चोटियोंपर तथा मुनीनामपि चाश्रमान् बहून्- जानेवाले मार्गोंका भी निरीक्षण कर लिया। इसी स्तृणादिवल्लीगहनेषु भूमिषु॥ ११७ प्रकार उन्होंने मुनियोंके बहुत-से आश्रम भी देखे; तृण एवं लताओंसे आच्छादित वनस्थलियों तथा नदीतटे भूविवरे गुहायां खुले मैदानोंमें, नदीके किनारे, गड्ढोंमें और कन्दराओंमें निरीक्षमाणोऽपि महानुभावः। देखनेपर भी जब उन महानुभावको अपनी प्रिया प्रियामपश्यन् भृशदुःखितस्तदा सीताका पता नहीं लगा, तब वे बहुत दुःखी हुए। जटायुषं वीक्ष्य च घातितं नृपः॥ ११८ उसी समय राजा रामचन्द्रजीने रावणद्वारा मारे गये जटायुको देखा और कहा—'अहो! आपको किसने अहो भवान् केन हतस्त्वमीदृशीं मारा? आह! आप ऐसी दुर्दशाको पहुँच चुके हैं? दशामवाप्तोऽसि मृतोऽसि जीवसि। पता नहीं, जीवित हैं या मर गये। पत्नीके ममाद्य सर्वं समदुःखितस्य भोः वियोगवश आपके समान ही दुःखी होकर यहाँ पत्नीवियोगादिह चागतस्य वै॥ ११९ आये हुए मुझ रामके लिये आजकल आप ही सब कुछ थे'॥ ११७—११९॥ इत्युक्तमात्रे विहगोऽथ कृच्छ्रा- भगवान् रामके इतना कहते ही वह पक्षी उस दुवाच वाचं मधुरां तदानीम्। समय बड़े कष्टसे मधुर वाणीमें बोला—'राजन्! इस शृणुष्व राजन् मम वृत्तमत्र समय मैंने जो कुछ देखा है और तत्काल ही वदामि दृष्टं च कृतं च सद्यः॥ १२० उसके लिये जो कुछ किया है, वह मेरा सारा वृत्तान्त आप सुनें। दशमुख रावणने मायासे सीताका दशाननस्तामपनीय मायया अपहरण करके उसे उत्तम विमानपर चढ़ा लिया सीतां समारोप्य विमानमुत्तमम्। और आकाशमार्गसे वह दक्षिण दिशाकी ओर चल जगाम खे दक्षिणदिङ्मुखोऽसौ दिया। उस समय माता सीता बड़े दुःखके साथ सीता च माता विललाप दुःखिता॥ १२१ विलाप कर रही थीं। रघुनन्दन! सीताकी आवाज सुनकर मैंने उन्हें अपने ही बलसे छुड़ानेके लिये आकर्ण्य सीतास्वनमागतोऽहं रावणके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। फिर उस सीतां विमोक्तुं स्वबलेन राघव। राक्षसने अपनी तलवारके बलसे मुझे मार डाला। युद्धं च तेनाहमतीव कृत्वा विदेहकुमारी सीताके ही आशीर्वादसे मैं अभीतक हतः पुनः खड्गबलेन रक्षसा॥ १२२ जीवित था, अब यहाँसे स्वर्गलोकको जाऊँगा। पृथ्वीपालक राम! आप शोक न कीजिये, अब तो वैदेहिवाक्यादिह जीवता मया उस दुष्ट राक्षसको उसके गणोंसहित मार ही दृष्टो भवान् स्वर्गमितो गमिष्ये। डालिये'॥ १२०—१२३॥ मा राम शोकं कुरु भूमिपाल जटायुके यों कहनेपर श्रीरामने पुनः जह्यद्य दुष्टं सगणं तु नैर्ऋतम्॥ १२३ शोकपूर्वक उनसे कहा—'पक्षिराज! आपका रामो जटायुषेत्युक्तः पुनस्तं चाह शोकतः। कल्याण हो और आपको उत्तम गति मिले।' स्वस्त्यस्तु ते द्विजवर गतिस्तु परमास्तु ते॥ १२४ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२०६ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
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२०६ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१ <br>
ततो जटायुः स्वं देहं विहाय गतवान्दिवम्। विमानेन तु रम्येण सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ १२५ रामोऽपि दग्ध्वा तद्देहं स्नातो दत्त्वा जलाञ्जलिम्। भ्रात्रा सगच्छन् दुःखार्तो राक्षसीं पथि दृष्टवान् ॥ १२६ उद्वमन्तीं महोल्काभां विवृतास्यां भयंकरीम्। क्षयं नयन्तीं जन्तून् वै पातयित्वा गतो रुषा ॥ १२७ गच्छन् वनान्तरं रामः स कबन्धं ददर्श ह। विरूपं जठरमुखं दीर्घबाहुं घनस्तनम् ॥ १२८ रुन्धानं राममार्गं तु दृष्ट्वा तं दग्ध्वाऽशनैः । दग्धोऽसौ दिव्यरूपी तु खस्थो राममभाषत ॥ १२९
तदनन्तर जटायु अपना शरीर त्यागकर एक सुन्दर विमानपर आरूढ़ हुए और अप्सरागणोंसे सेवित हो स्वर्गलोकको चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने भी उनके शरीरका दाह-संस्कार करके स्नानके पश्चात् उनके निमित्त जलाञ्जलि दी। फिर सीताके लिये दुःखी हो भाई लक्ष्मणके साथ आगे जाने लगे। इतनेमें ही उन्हें रास्तेपर एक राक्षसी खड़ी दिखायी दी। वह मुँहसे बड़ी भारी उल्काके समान आगकी ज्वाला उगल रही थी। उसका मुँह फैला हुआ था। वह बड़ी डरावनी थी और पास आये हुए अनेकानेक जीवोंका संहार कर रही थी। श्रीरामने उसे रोषपूर्वक मार गिराया। फिर वे आगे बढ़ गये। जब श्रीराम दूसरे वनमें जाने लगे, तब उन्होंने कबन्धको देखा, जो बहुत ही कुरूप था। उसका मुख उसके पेटमें ही था, बाँहें बड़ी-बड़ी थीं और स्तन घने थे। श्रीरामने उसे अपना मार्ग रोकते देख उसे काठ-कबाड़द्वारा धीरे-धीरे जला दिया। जल जानेपर वह दिव्यरूप धारण करके प्रकट हुआ और आकाशमें स्थित होकर श्रीरामसे बोला— ॥ १२४-१२९॥
राम राम महाबाहो त्वया मम महामते । विरूपं नाशितं वीर मुनिशापाच्चिरागतम् ॥ १३० त्रिदिवं यामि धन्योऽस्मि त्वत्प्रसादान्न संशयः । त्वं सीताप्राप्तये सख्यं कुरु सूर्यसुतेन भोः ॥ १३१ वानरेन्द्रेण गत्वा तु सुग्रीवे स्वं निवेद्य वै। भविष्यति नृपश्रेष्ठ ऋष्यमूकगिरिं व्रज ॥ १३२
‘महाबाहु श्रीराम ! महामते वीरवर ! एक मुनिके शापवश चिरकालसे प्राप्त हुई मेरी कुरूपताको आपने नष्ट कर दिया; अब मैं स्वर्गलोकको जा रहा हूँ। इसमें संदेह नहीं कि आज मैं आपकी कृपासे धन्य हो गया। रघुनन्दन ! आप सीताकी प्राप्तिके लिये सूर्यकुमार वानरराज सुग्रीवके साथ मित्रता कीजिये। उनके यहाँ जाकर सुग्रीवसे सारा वृत्तान्त निवेदन कर देनेपर आपका कार्य सिद्ध हो जायगा। अतः नृपश्रेष्ठ ! आप यहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर जाइये’ ॥ १३०-१३२॥
इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन् रामो लक्ष्मणसंयुतः । सिद्धैस्तु मुनिभिः शून्यमाश्रमं प्रविवेश ह ॥ १३३ तत्रस्थां तापसीं दृष्ट्वा तया संलाप्य संस्थितः । शबरीं मुनिमुख्यानां सपर्याहृतकल्मषाम् ॥ १३४ तया सम्पूजितो रामो बदरादिभिरीश्वरः । साप्येनं पूजयित्वा तु स्वामवस्थां निवेद्य वै ॥ १३५ सीतां त्वं प्राप्स्यसीत्युक्त्वा प्रविश्याग्निं दिवंगता । दिवं प्रस्थाप्य तां चापि जगामान्यत्र राघवः ॥ १३६
यह कहकर कबन्ध स्वर्गको चला गया। कहते हैं, तब लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीने एक ऐसे आश्रममें प्रवेश किया, जो सिद्धों और मुनियोंसे शून्य था। उसमें उन्होंने एक ‘शबरी’ नामकी तपस्विनी देखी, जो बड़े-बड़े मुनियोंकी सेवा-पूजा करनेसे निष्पाप हो गयी थी। उसके साथ वार्तालाप करके वे वहाँ ठहर गये। शबरीने बेर आदि फलोंके द्वारा भगवान् रामका भलीभाँति सत्कार किया। आवभगतके पश्चात् उनसे अपनी अवस्था निवेदन की और यह कहकर कि ‘आप सीताको प्राप्त कर लेंगे’ वह शबरी भी उनके सामने ही अग्निमें प्रवेश करके स्वर्गको चली गयी। उसे भी स्वर्गलोकमें पहुँचाकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अन्यत्र चले गये ॥ १३३-१३६॥
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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०७ ततो विनीतेन गुणान्वितेन तदनन्तर विनयशील और गुणी भाई लक्ष्मणके भ्रात्रा समेतो जगदेकनाथः । साथ जगदीश्वर भगवान् राम प्रियाके वियोगसे अत्यन्त प्रियावियोगेन सुदुःखितात्मा जगाम याम्यां स तु रामदेवः ॥ १३७ दुःखी हो वहाँसे दक्षिणकी ओर चल दिये ॥ १३७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकोनपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारविषयक' उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥ पचासवाँ अध्याय सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना; सीताकी खोज और हनुमान्का लङ्कागमन मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले-वालीसे वैर हो जानेके कारण वालिना कृतवैरोऽथ दुर्गवर्ती हरीश्वरः । उसके लिये दुर्गम स्थानमें रहनेवाले वानरराज सुग्रीवने सुग्रीवो दृष्टवान् दूराद्दृष्ट्वाऽऽह पवनात्मजम् ॥ १ दूरसे ही श्रीराम और लक्ष्मणको आते देखा और देखकर पवनकुमार हनुमान्जीसे कहा- 'ये दोनों किसके कस्येमौ सुधनुःपाणी चीरवल्कलधारिणौ । पुत्र हैं, जो हाथमें सुन्दर धनुष लिये, चीर एवं वल्कल- पश्यन्तौ सरसीं दिव्यां पद्मोत्पलसमावृताम् ॥ २ वस्त्र धारण किये, कमलों एवं उत्पलोंसे आच्छन्न इस दिव्य सरोवरको देख रहे हैं।' जान पड़ता है, ये दोनों नानारूपधरावेतौ तापसं वेषमास्थितौ । वालीके भेजे हुए बहुविधरूपधारी दूत हैं, जो इस समय वालिदूताविह प्राप्ताविति निश्चित्य सूर्यजः ॥ ३ तपस्वीका वेष धारण किये यहाँ आ पहुँचे हैं। यह निश्चय करके सूर्यकुमार सुग्रीव भयभीत हो गये और उत्पपात भयत्रस्तः ऋष्यमूकाद् वनान्तरम् । समस्त वानरोंके साथ ऋष्यमूक पर्वतसे कूदकर दूसरे वानरैः सहितः सर्वैरगस्त्याश्रममुत्तमम् ॥ ४ वनमें स्थित अगस्त्यमुनिके उत्तम आश्रमपर चले गये ॥ १-४ ॥ तत्र स्थित्वा स सुग्रीवः प्राह वायुसुतं पुनः । वहाँ स्थित होकर सुग्रीवने पुनः पवनकुमारसे कहा- हनूमन् पृच्छ शीघ्रं त्वं गच्छ तापसवेषधृक् ॥ ५ 'हनूमन् ! तुम भी तपस्वीका वेष धारण करके शीघ्र जाओ और पूछो कि 'वे कौन हैं? किसके पुत्र हैं? और किस कौ हि कस्य सुतौ जातौ किमर्थं तत्र संस्थितौ । लिये वहाँ ठहरे हुए हैं?' महाबुद्धिमान् वायुनन्दन ! ये सब ज्ञात्वा सत्यं मम ब्रूहि वायुपुत्र महामते ॥ ६ बातें सच-सच जानकर मुझसे बताओ' ॥ ५-६ ॥ उनके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्जी संन्यासीके इत्युक्तो हनुमान् गत्वा पम्पातटमनुत्तमम् । रूपमें पम्पासरके उत्तम तटपर गये और भाई लक्ष्मणके भिक्षुरूपी स तं प्राह रामं भ्रात्रा समन्वितम् ॥ ७ साथ विद्यमान श्रीरामचन्द्रजीसे बोले- 'महामते ! आप कौन हैं? यहाँ कैसे आये हैं? इस जनशून्य घोर वनमें को भवानिह सम्प्राप्तस्तथ्यं ब्रूहि महामते । आप कहाँसे आ गये ? यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है ?- अरण्ये निर्जने घोरे कुतस्त्वं किं प्रयोजनम् ॥ ८ ये सब बातें मेरे समक्ष ठीक-ठीक बताइये' ॥ ७-८ ॥
२०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० एवं वदन्तं तं प्राह लक्ष्मणो भ्रातुराज्ञया। इस प्रकार पूछते हुए हनुमान्जीसे अपने भाईकी आज्ञा प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं रामवृत्तान्तमादितः॥ ९ पाकर लक्ष्मण बोले—'मैं श्रीरामचन्द्रजीका वृत्तान्त आदिसे ही वर्णन करता हूँ, सुनो। इस पृथिवीपर दशरथ नामके राजा दशरथो नाम बभूव भुवि विश्रुतः। राजा बहुत प्रसिद्ध थे। महाबुद्धे! ये मेरे बड़े भाई श्रीराम तस्य पुत्रो महाबुद्धे रामो ज्येष्ठो ममाग्रजः॥ १० उन्हीं महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनका राज्याभिषेक होने जा रहा था, किंतु (मेरी छोटी सौतेली माता) कैकेयीने उसे अस्याभिषेक आरब्धः कैकेय्या तु निवारितः। रोक दिया। फिर, पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए ये पितुराज्ञामयं कुर्वन् रामो भ्राता ममाग्रजः॥ ११ मेरे बड़े भ्राता श्रीराम मेरे तथा अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ घरसे निकल आये। वनमें आकर इन्होंने अनेकों मया सह विनिष्क्रम्य सीतया सह भार्यया। मुनियोंसे युक्त दण्डकारण्यमें प्रवेश किया। वहाँ जनस्थानमें प्रविष्टो दण्डकारण्यं नानामुनिसमाकुलम्॥ १२ निवास करते हुए इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी सीताको वनमें किसी पापीने हर लिया। उन सीताजीकी जनस्थाने निवस्तो रामस्यास्य महात्मनः। ही खोज करते हुए ये वीरवर कमलनयन श्रीराम यहाँ भार्या सीता तत्र वने केनापि पाप्मना हृता॥ १३ आये हैं, जिससे तुम्हें यहाँ इनका दर्शन हुआ है। बस, यही हमारा वृत्तान्त है, जो तुमसे बता दिया'॥ ९–१४॥ सीतामन्वेषयन् वीरो रामः कमललोचनः। इहायातस्त्वया दृष्ट इति वृत्तान्तमीरितम्॥ १४ महात्मा लक्ष्मणके वचन सुनकर उनपर विश्वास हो आनेके कारण वायुनन्दन हनुमान्ने अपने स्वरूपको प्रकट श्रुत्वा ततो वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः। नहीं किया और रघुकुलनायक रामचन्द्रसे यह कहकर कि अव्यञ्जितात्मा विश्वासाद्धनूमान् मारुतात्मजः॥ १५ 'आप मेरे स्वामी हैं'—उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने साथ सुग्रीवके पास ले आकर उन दोनों भाइयोंकी सुग्रीवसे त्वं मे स्वामी इति वदन् रामं रघुपतिं तदा। मित्रता करा दी। फिर श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका परिचय आश्वास्यानीय सुग्रीवं तयोः सख्यमकारयत्॥ १६ प्राप्त हो जानेके कारण उनके चरण-कमलोंको सिरपर धारणकर वानरराज सुग्रीवने मधुर वाणीमें कहा—'राजेन्द्र! शिरस्यारोप्य पादाब्जं रामस्य विदितात्मनः। इसमें संदेह नहीं कि आजसे आप हमारे स्वामी हुए और सुग्रीवो वानरेन्द्रस्तु उवाच मधुराक्षरम्॥ १७ प्रभो! मैं समस्त वानरोंके साथ आपका सेवक हुआ। रघुनन्दन! आपका जो शत्रु है, वह आजसे मेरा भी शत्रु अद्यप्रभृति राजेन्द्र त्वं मे स्वामी न संशयः। है और जो आपका मित्र है, वह मेरा भी श्रेष्ठ मित्र है; अहं तु तव भृत्यश्च वानरैः सहितः प्रभो॥ १८ इतना ही नहीं, आपका जो दुःख है, वह मेरा भी है तथा आपकी प्रसन्नता ही मेरी भी प्रसन्नता है' यों कहकर त्वच्छत्रुर्मम शत्रुः स्यादद्यप्रभृति राघव। सुग्रीवने पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ १५–१९१/२॥ मित्रं ते मम सन्मित्रं त्वद्दुःखं तन्ममापि च॥ १९ 'प्रभो! 'वाली' नामक मेरा ज्येष्ठ भाई है, जो त्वत्प्रीतिरेव मत्प्रीतिरित्युक्त्वा पुनराह तम्। महाबलवान् और बड़ा ही पराक्रमी है; किंतु वह वाली नाम मम ज्येष्ठो महाबलपराक्रमः॥ २० हृदयका अत्यन्त दुष्ट है। उसने कामासक्त होकर मेरी भार्याका अपहरण कर लिया है। पुरुषश्रेष्ठ! इस समय भार्यापहारी दुष्टात्मा मदनासक्तमानसः। आपके सिवा दूसरा कोई वालीको मारनेवाला नहीं है। त्वामृते पुरुषव्याघ्र नास्ति हन्ताद्य वालिनम्॥ २१ राजकुमार! पुराणवेत्ताओंने कहा है कि जो ताड़के इन सात वृक्षोंको एक साथ ही काट डालेगा, वही वालीका युगपत्सप्ततालांस्तु तरून् यो वै वधिष्यति। वध कर सकेगा'॥ २०–२२॥ स तं वधिष्यतीत्युक्तं पुराणज्ञैर्नृपात्मज॥ २२ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०९ तत्प्रियार्थं हि रामोऽपि श्रीमांश्छित्त्वा महातरून्। [यह सुनकर] श्रीमान् रामचन्द्रजीने भी सुग्रीवका अर्धकृष्टेन बाणेन युगपद्रघुनन्दनः ॥ २३ प्रिय करनेके लिये आधे खींचे हुए बाणसे ही उन सात महावृक्षोंको एक ही साथ काट डाला। उन महावृक्षोंका विद्ध्वा महातरून् रामः सुग्रीवं प्राह पार्थिवम्। भेदन करके श्रीरामने राजा सुग्रीवसे कहा- 'सूर्यनन्दन वालिना गच्छ युध्यस्व कृतचिह्नो रखेः सुत ॥ २४ सुग्रीव ! मेरे पहचाननेके लिये अपने शरीरमें कोई चिह्न धारण करके तुम जाओ और वालीके साथ युद्ध करो।' इत्युक्तः कृतचिह्नोऽयं युद्धं चक्रेऽथ वालिना। उनके यों कहनेपर सुग्रीवने चिह्न धारणकर वालीके साथ रामोऽपि तत्र गत्वाथ शरेणैकेन वालिनम् ॥ २५ युद्ध किया और श्रीरामने भी वहाँ जाकर एक ही बाणसे वालीको बींध दिया। इससे पराक्रमी वाली पृथ्वीपर गिरा विव्याध वीर्यवान् वाली पपात च ममार च। और मर गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त डरे हुए वालि- वित्रस्तं वालिपुत्रं तु अङ्गदं विनयान्वितम् ॥ २६ कुमार अङ्गदको, जो बहुत ही विनयी और संग्राममें रणशौण्डं यौवराज्ये नियुक्त्वा राघवस्तदा। कुशल था, युवराजपदपर अभिषिक्त करके ताराको सुग्रीव- तां च तारां तथा दत्त्वा रामश्च रविसूनवे ॥ २७ की सेवामें अर्पित कर दिया। तत्पश्चात् कमलनयन धर्मात्मा सुग्रीवं प्राह धर्मात्मा रामः कमललोचनः । श्रीराम सुग्रीवसे बोले- 'तुम वानरोंके राज्यकी देख-भाल राज्यमन्वेष्य स्वं त्वं कपीनां पुनराव्रज ॥ २८ कर लो, फिर मेरे पास आना और कपीश्वर ! सीताकी खोज करानेका शीघ्र ही यत्न करना' ॥ २३-२८१/२ ॥ त्वं सीतान्वेषणे यत्नं कुरु शीघ्रं हरीश्वर। उनके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सुग्रीवने लक्ष्मणसहित इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो रामं लक्ष्मणसंयुतम् ॥ २९ श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- 'रघुनन्दन ! इस समय महान् वर्षाकाल आ पहुँचा है; इन्द्रके वर्षा करते रहनेपर इस वनमें प्रावृट्कालो महान् प्राप्तः साम्प्रतं रघुनन्दन। वानरोंका चलना-फिरना न हो सकेगा। राजेन्द्र ! वर्षा वानराणां गतिर्नास्ति वने वर्षति वासवे ॥ ३० बीतने और शरत्काल आ जानेपर मैं समस्त दिशाओंमें अपने वानर दूतोंको भेजूँगा।' यह कहकर वानरराज सुग्रीवने गते तस्मिंस्तु राजेन्द्र प्राप्ते शरदि निर्मले । श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया और पम्पापुरमें प्रवेश करके चारान् सम्प्रेषयिष्यामि वानरान्दिक्षु राघव ॥ ३१ वे ताराके साथ रमण करने लगे ॥ २९-३२ ॥ इत्युक्त्वा रामचन्द्रं स तं प्रणम्य कपीश्वरः । इधर महामति श्रीरामचन्द्रजी भी अपने भाई लक्ष्मणके पम्पापुरं प्रविश्याथ रेमे तारासमन्वितः ॥ ३२ साथ उस महावनमें 'नीलकण्ठ' नामक पर्वतकी चोटीपर विधिपूर्वक रहने लगे। (सीताके वियोगमें) उनका वर्षाकाल रामोऽपि विधिवद्भ्रात्रा शैलसानौ महावने । बड़ी कठिनाईसे बीता। जब शरत्काल उपस्थित हुआ, निवासं कृतवान् शैले नीलकण्ठे महामतिः ॥ ३३ तब श्रीरामचन्द्रजीने सीताके वियोगसे व्यथित हो सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे इस विषयमें वार्तालाप किया। प्रावृट्काले गते कृच्छ्रात् प्राप्ते शरदि राघवः । उस समयतक वहाँ न आकर सुग्रीवने अपनी पूर्व- सीतावियोगाद्व्यथितः सौमित्रिं प्राह लक्ष्मणम् ॥ ३४ प्रतिज्ञाका उल्लङ्घन किया था। इसलिये भ्रातृवत्सल उल्लङ्घितस्तु समयः सुग्रीवेण ततो रुषा। ककुत्स्थनन्दन श्रीरामने लक्ष्मणसे क्रोधपूर्वक कहा- लक्ष्मणं प्राह काकुत्स्थो भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ३५
२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० गच्छ लक्ष्मण दुष्टोऽसौ नागतः कपिनायकः । गते तु वर्षाकालेऽहमागमिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ३६ अनेकैर्वानरैः सार्धमित्युक्त्वासौ तदा गतः । तत्र गच्छ त्वरायुक्तो यत्रास्ते कपिनायकः ॥ ३७ तं दुष्टमग्रतः कृत्वा हरिसैनासमन्वितम् । रमन्तं तारया सार्धं शीघ्रमानय मां प्रति ॥ ३८ नात्रागच्छति सुग्रीवो यद्यसौ प्राप्तभूतिकः । तदा त्वयैवं वक्तव्यः सुग्रीवोऽनृतभाषकः ॥ ३९ वालिहन्ता शरो दुष्ट करे मेऽद्यापि तिष्ठति । स्मृत्वैतदाचर कपे रामवाक्यं हितं तव ॥ ४० इत्युक्तस्तु तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा च लक्ष्मणः । पम्पापुरं जगामाथ सुग्रीवो यत्र तिष्ठति । दृष्ट्वा स तत्र सुग्रीवं कपिराजं बभाष वै ॥ ४१ ताराभोगविषक्तस्त्वं रामकार्यपराङ्मुखः । किं त्वया विस्मृतं सर्वं रामाग्रे समयं कृतम् ॥ ४२ सीतामन्विष्य दास्यामि यत्र क्वापीति दुर्मते । हत्वा तु वालिनं राज्यं येन दत्तं पुरा तव ॥ ४३ त्वामृते कोऽवमन्येत कपीन्द्र पापचेतस । प्रतिश्रुत्य च रामस्य भार्याहीनस्य भूपते ॥ ४४ साहाय्यं ते करोमीति देवाग्निजलासन्निधौ । ये ये च शत्रवो राजंस्ते ते च मम शत्रवः ॥ ४५ मित्राणि यानि ते देव तानि मित्राणि मे सदा । सीतामन्वेषितुं राजन् वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥ ४६ सत्यं यास्यामि ते पार्श्वमित्युक्त्वा कोऽन्यथाकरोत् । त्वामृते पापिनं दुष्टं रामदेवस्य संनिधौ ॥ ४७ कारयित्वा तु तेनैवं स्वकार्यं दुष्टवानर । ऋषीणां सत्यवद्वाक्यं त्वयि दृष्टं मयाधुना ॥ ४८ सर्वस्य हि कृतार्थस्य मतिरन्या प्रवर्तते । वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥ ४९ 'लक्ष्मण ! तुम पम्पापुरमें जाओ। देखो, क्या कारण है कि वह दुष्ट वानरराज अभीतक नहीं आया। पहले तो वह यही कहकर गया था कि 'वर्षाकाल बीतनेपर मैं अनेक वानरोंके साथ आपके पास आऊँगा।' अब तुम जहाँ वह वानरराज रहता है, वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ। ताराके साथ रमण करनेवाले उस दुष्ट वानरको आगे करके समस्त वानरसेनाके सहित मेरे पास शीघ्र ले आओ। यदि ऐश्वर्य प्राप्त कर लेनेके कारण मदमें चूर हो सुग्रीव यहाँ न आये तो तुम उस असत्यवादीसे यों कहना— 'अरे दुष्ट ! श्रीरामने कहा है कि जिससे वालिका वध किया गया था, वह बाण आज भी मेरे हाथमें मौजूद है; अतः वानर ! इस बातको याद करके तू श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन कर; इसीमें तेरा भला है' ॥ ३३–४० ॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसी आज्ञा देनेपर लक्ष्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर उसे शिरोधार्य किया और उनको नमस्कार करके वे पम्पापुरमें गये, जहाँ सुग्रीव रहता था। वहाँ उन्होंने वानरराज सुग्रीवको देखकर कहा—'अरे ! तू श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे मुँह मोड़कर यहाँ ताराके साथ भोग-विलासमें फँसा हुआ है ? रे दुर्बुद्धे ! तूने श्रीरामके सामने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'जहाँ-कहीं भी हो, सीताको ढूँढ़कर मैं आपको अर्पित करूँगा' उसे क्या भूल गया ? अरे पापात्मा वानरराज ! जिन्होंने वालिको मारकर पहले ही तुम्हें राज्य दे दिया, ऐसे परोपकारी मित्रका तेरे सिवा कौन अनादर कर सकता है ? तूने देवता, अग्नि और जलके निकट श्रीरामसे यह प्रतिज्ञा की थी कि 'राजन् ! मैं पत्नीसे वियुक्त हुए आपकी सहायता करूँगा। राजन् ! जो-जो आपके शत्रु हैं, वे-वे मेरे भी शत्रु हैं तथा देव ! जो-जो आपके मित्र हैं, वे-वे मेरे भी सदा ही मित्र हैं। राजन् ! मैं बहुत-से वानरोंके साथ सीताकी खोज करानेके लिये अवश्य ही आपके पास आऊँगा।' भगवान् श्रीरामके निकट यों कहकर तुझ- जैसे दुष्ट पापीके सिवा दूसरा कौन है, जो इसके विपरीत आचरण करता। अरे दुष्ट वानर ! इस प्रकार तूने अपना काम तो उनसे करा लिया और उनका कार्य करना तू भूल गया! इस समय ऋषियोंकी यह यथार्थ बात कि 'अपना काम सिद्ध हो जानेपर सभीकी बुद्धि बदल जाती है, जैसे बछड़ा माताके थनोंमें दूधकी कमी देखकर उसे छोड़ देता है [फिर माताकी परवा नहीं करता]' In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१९
जनवृत्तविदां लोके सर्वज्ञानां महात्मनाम्। न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन् कृतं प्रतिकरोति यः ॥ ५० शास्त्रेषु निष्कृतिर्दृष्टा महापातकिनामपि। कृतघ्नस्य कपे दुष्ट न दृष्टा निष्कृतिः पुरा ॥ ५१ कृतघ्नता न कार्या ते त्वत्कृतं समयं स्मर। एह्येह्यागच्छ शरणं काकुत्स्थं हितपालकम् ॥ ५२ यदि नायासि च कपे रामवाक्यमिदं शृणु। नयिष्ये मृत्युसदनं सुग्रीवं वालिनं यथा ॥ ५३ स शरो विद्यतेऽस्माकं येन वाली हतः कपिः। लक्ष्मणेनैवमुक्तोऽसौ सुग्रीवः कपिनायकः ॥ ५४ निर्गत्य तु नमश्चक्रे लक्ष्मणं मन्त्रिणोदितः। उवाच च महात्मानं लक्ष्मणं वानराधिपः ॥ ५५ अज्ञानकृतपापानामस्माकं क्षन्तुमर्हसि। समयः कृतो मया राज्ञा रामेणामिततेजसा ॥ ५६ यस्तदानीं महाभाग तमद्यापि न लङ्घये। यास्यामि निखिलैश्च कपिभिर्नृपनन्दन ॥ ५७ त्वया सह महाबीर रामपार्श्वं न संशयः। मां दृष्ट्वा तत्र काकुत्स्थो यद्वक्ष्यति च मां प्रति ॥ ५८ तत्सर्वं शिरसा गृह्य करिष्यामि न संशयः। सन्ति मे हरयः शूराः सीतान्वेषणकर्मणि ॥ ५९ तान्यहं प्रेषयिष्यामि दिक्षु सर्वासु पार्थिव। इत्युक्तः कपिराजेन सुग्रीवेण स लक्ष्मणः ॥ ६० एहि शीघ्रं गमिष्यामो रामपार्श्वमितोऽधुना। सेना चाहूयतां वीर ऋक्षाणां हरिणामपि ॥ ६१ यां दृष्ट्वा प्रीतिमभ्येति राघवस्ते महामते। इत्युक्तो लक्ष्मणेनाथ सुग्रीवः स तु वीर्यवान् ॥ ६२ पार्श्वस्थं युवराजानमङ्गदं संज्ञयाब्रवीत्। सोऽपि निर्गत्य सेनानीमाह सेनापतिं तदा ॥ ६३ तेनाहूताः समागत्य ऋक्षवानरकोटयः। गुहास्थाश्च गिरिस्थाश्च वृक्षस्थाश्चैव वानराः ॥ ६४ तैः सार्धं पर्वताकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः। सुग्रीवः शीघ्रमागत्य ववन्दे राघवं तदा ॥ ६५ लक्ष्मणोऽपि नमस्कृत्य रामं भ्रातरमब्रवीत्। प्रसादं कुरु सुग्रीवे विनीते चाधुना नृप ॥ ६६
मुझे तुझमें ही ठीक-ठीक घटती-सी दीख रही है। संसारमें जो मनुष्योचित सद्व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले हैं, उन सर्वज्ञ महात्माओंमेंसे मैं किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो लोकमें दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकारको न मानता हो। शास्त्रोंमें महापातकी पुरुषोंके भी उद्धारका उपाय (प्रायश्चित्त) देखा गया है, किंतु दुष्ट वानर ! कृतघ्न पुरुषके उद्धारका उपाय मैंने पहले कभी नहीं देखा है। इसलिये तुझे कभी कृतघ्नता नहीं करनी चाहिये। अपनी की हुई प्रतिज्ञाको याद कर। अब आ, तेरे हितकी रक्षा करनेवाले ककुत्स्थकुलनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें चल। वानर ! यदि तू नहीं आना चाहता तो यह श्रीरामका वचन सुन। [उन्होंने कहा है-] 'मैं वालिकी ही भाँति सुग्रीवको भी यमपुर भेज दूँगा। जिससे वानरराज वालि मारा गया है, वह बाण अब भी मेरे पास मौजूद है' ॥ ४१-५३ १/२ ॥
लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर कपिराज सुग्रीव मन्त्रीकी प्रेरणासे बाहर निकले। उन्होंने लक्ष्मणको प्रणाम किया और उन महात्मासे कहा- 'महाभाग! हमारे अज्ञानवश किये हुए अपराधोंको आप क्षमा करें। मैंने उस समय अमिततेजस्वी राजा रामचन्द्रके साथ जो प्रतिज्ञा की थी, उसका अब भी उल्लङ्घन नहीं करूँगा। महावीर राजकुमार ! मैं अब समस्त वानरोंको साथ लेकर आपके साथ श्रीरामके पास चलूँगा। मुझे वहाँ देखकर श्रीरामचन्द्रजी मुझसे जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं शिरोधार्य करके निस्सन्देह पूर्ण करूँगा। राजन् ! मेरे यहाँ बड़े-बड़े वीर वानर हैं। उन सबको मैं सीताजीकी खोज करनेके लिये समस्त दिशाओंमें भेजूँगा' ॥ ५४-५९ १/२ ॥
वानरराज सुग्रीवके यों कहनेपर लक्ष्मणने कहा- 'आओ! अब यहाँसे शीघ्र ही श्रीरामके पास चलें। वीर! महामते ! वानरों और भालुओंकी सेना भी बुला लो, जिसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुमपर प्रसन्न हों।' लक्ष्मणद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी सुग्रीवने पास ही खड़े हुए युवराज अङ्गदसे इशारेमें कुछ कहा। अङ्गदने भी जाकर सेनाका संचालन करनेवाले सेनापतिको प्रेरित किया। सेनापतिके बुलानेसे पर्वत, कन्दरा और वृक्षोंपर रहनेवाले करोड़ों वानर आये। पर्वतोंके समान आकारवाले उन भयंकर पराक्रमी वानरोंके साथ सुग्रीवने उस समय शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। साथ ही लक्ष्मणजीने भी अपने भाईको प्रणाम करके कहा- 'राजन् ! इन विनयशील सुग्रीवपर अब आप कृपा करें' ॥ ६०-६६ ॥
२१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० इत्युक्तो राघवस्तेन भ्रात्रा सुग्रीवमब्रवीत्। । भाई लक्ष्मणके इस प्रकार अनुरोध करनेपर आगच्छात्र महावीर सुग्रीव कुशलं तव॥ ६७ । श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे कहा—'महावीर सुग्रीव! यहाँ श्रुत्वैत्थं रामवचनं प्रसन्नं च नराधिपम्। । आओ। कहो, कुशल तो है न?' श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा शिरस्यञ्जलिमाधाय सुग्रीवो राममब्रवीत्॥ ६८ । कथन सुनकर और उन नरेशको प्रसन्न जानकर सुग्रीवने तदा मे कुशलं राजन् सीतादेवी तव प्रभो। । सिरपर अञ्जलि जोड़ उनसे कहा—'राजन्! प्रभो! मेरी अन्विष्य तु यदा दत्ता मया भवति नान्यथा॥ ६९ । कुशल तो तभी होगी, जब मैं सीतादेवीको ढूँढ़कर इत्युक्ते वचने तेन हनूमान्मारुतात्मजः। । आपको अर्पित कर दूँ; नहीं तो नहीं'॥ ६७—६९॥ नत्वा रामं बभाषैनं सुग्रीवं कपिनायकम्॥ ७० । सुग्रीवने जब यह बात कही, तब पवनकुमार हनूमान्जी शृणु सुग्रीव मे वाक्यं राजायं दुःखितो भृशम्। । श्रीरामको नमस्कार करके कपिराज सुग्रीवसे बोले— सीतावियोगेन च सदा नाश्नाति च फलादिकम्॥ ७१ । 'सुग्रीव! आप मेरी बात सुनें। ये राजा श्रीरामचन्द्रजी अस्य दुःखेन सततं लक्ष्मणोऽयं सुदुःखितः। । सीताके वियोगसे सदा ही बहुत दुःखी रहते हैं, इसीलिये एतयोस्त्र यावस्था तां श्रुत्वा भरतोऽनुजः॥ ७२ । फल आदिका भी आहार नहीं करते। इन्हींके दुःखसे दुःखी भवति तद्दुःखाद्दुःखं प्राप्नोति तज्जनः। । ये लक्ष्मण भी सदा अत्यन्त दुःखित रहा करते हैं। इन यत एवमतो राजन् सीतान्वेषणमाचर॥ ७३ । दोनोंकी यहाँ जो अवस्था है, उसे सुनकर इनके छोटे इत्युक्ते वचने तत्र वायुपुत्रेण धीमता। । भाई भरत भी दुःखी होते हैं और उनके दुःखसे वहाँके जाम्बवानतितेजस्वी नत्वा रामं पुरःस्थितः॥ ७४ । सभी लोग दुःखमें पड़े रहते हैं। राजन्! चूँकि ऐसी स प्राह कपिराजं तं नीतिमान् नीतिमद्वचः। । स्थिति है, अतः आप बहुत शीघ्र सीताकी खोज यदुक्तं वायुपुत्रेण तत्तथेत्यवगच्छ भोः॥ ७५ । कराइये'॥ ७०—७३॥ यत्र क्वापि स्थिता सीता रामभार्या यशस्विनी। । बुद्धिमान् वायुनन्दनके यों कहनेपर अत्यन्त तेजस्वी पतिव्रता महाभागा वैदेही जनकात्मजा॥ ७६ । जाम्बवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके सामने खड़े हो अद्यापि वृत्तसम्पन्ना इति मे मनसि स्थितम्। । गये। वे नीतिज्ञ थे, अतः कपिराज सुग्रीवसे नीतियुक्त न हि कल्याणचित्तायाः सीतायाः केनचिद्भुवि॥ ७७ । वचन बोले—'सुग्रीव! हनूमान्जीने जो कहा है, उसे पराभवोऽस्ति सुग्रीव प्रेषयाद्यैव वानरान्। । आप ठीक ही समझें। श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी भार्या इत्युक्तस्तेन सुग्रीवः प्रीतात्मा कपिनायकः॥ ७८ । विदेहकुलनन्दिनी जनककुमारी महाभागा पतिव्रता सीता पश्चिमायां दिशि तदा प्रेषयामास तान् कपीन्। । जहाँ-कहीं भी होंगी, आज भी सदाचारसे सम्पन्न होंगी— अन्वेष्टुं रामभार्यां तां महाबलपराक्रमः॥ ७९ । यह विचार मेरे मनमें निश्चितरूपसे जमा हुआ है। उत्तरस्यां दिशि तदा नियुतान् वानरानसौ। । सुग्रीव! सदा कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीमें ही मन प्रेषयामास धर्मात्मा सीतान्वेषणकर्मणि॥ ८० । लगाये रहनेवाली सीताजीका इस पृथ्वीपर किसीके द्वारा । भी पराभव नहीं हो सकता। इसलिये आप अभी । वानरोंको भेजें'॥ ७४—७७१/२॥ । जाम्बवान्के इस प्रकार कहनेपर महान् बल और । पराक्रमसे युक्त कपिराज सुग्रीवने प्रसन्न हो सीताकी । खोजके लिये बहुत-से वानरोंको पश्चिम दिशामें भेजा । तथा उन धर्मात्माने उत्तर दिशामें भी सीताको ढूँढ़नेके । निमित्त एक लाख वानरोंको उसी समय भेज दिया। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१३
पूर्वस्यां दिशि कपींश्च कपिराजः प्रतापवान् । प्रेषयामास रामस्य सुभार्यान्वेषणाय वै ॥ ८१
इति तान् प्रेषयामास वानरान् वानराधिपः । सुग्रीवो वालिपुत्रं तमङ्गदं प्राह बुद्धिमान् ॥ ८२
त्वं गच्छ दक्षिणं देशं सीतान्वेषणकर्मणि । जाम्बवांश्च हनूमांश्च मैन्दो द्विविद एव च ॥ ८३
नीलाद्याश्चैव हरयो महाबलपराक्रमाः। अनुयास्यन्ति गच्छन्तं त्वामद्य मम शासनात् ॥ ८४
अचिरादेव यूयं तां दृष्ट्वा सीतां यशस्विनीम् । स्थानतो रूपतश्चैव शीलतश्च विशेषतः ॥ ८५
केन नीता च कुत्रास्ते ज्ञात्वात्रागच्छ पुत्रक । इत्युक्तः कपिराजेन पितृव्येण महात्मना ॥ ८६
अङ्गदस्तूर्णमुत्थाय तस्याज्ञां शिरसा दधे । इत्युक्ते दूरतः स्थाप्य वानरानथ जाम्बवान् ॥ ८७
रामं च लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं मारुतात्मजम्। एकतः स्थाप्य तानाह नीतिमान् नीतिमद्वचः ॥ ८८
श्रूयतां वचनं मेऽद्य सीतान्वेषणकर्मणि । श्रुत्वा च तद्गृहाण त्वं रोचते यन्नृपात्मज ॥ ८९
रावणेन जनस्थानान्नीयमाना तपस्विनी। जटायुषा तु सा दृष्टा शक्त्या युद्धं प्रकुर्वता ॥ ९०
भूषणानि च दृष्टानि तया क्षिप्तानि तेन वै। तान्यस्माभिः प्रदृष्टानि सुग्रीवायार्पितानि च ॥ ९१
जटायुवाक्याद्राजेन्द्र सत्यमित्यवधारय । एतस्मात्कारणात्सीता नीता तेनैव रक्षसा ॥ ९२
रावणेन महाबाहो लङ्कायां वर्तते तु सा । त्वां स्मरन्ती तु तत्रस्था त्वद्दुःखेन सुदुःखिता ॥ ९३
रक्षन्ती यत्नतो वृत्तं तत्रापि जनकात्मजा । त्वद्ध्यानेनैव स्वान् प्राणान्धारयन्ती शुभानना ॥ ९४
[हिन्दी अनुवाद]
इसी प्रकार प्रतापी वानरराजने पूर्व दिशामें भी रामकी श्रेष्ठ भार्या सीताका अन्वेषण करनेके लिये बहुत-से वानर भेजे। बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवने इस प्रकार वानरोंको भेज लेनेके बाद वालिकुमार अङ्गदसे कहा—'अङ्गद ! तुम सीताकी खोज करनेके लिये दक्षिण दिशामें जाओ। मेरी आज्ञासे आज तुम्हारे चलते समय तुम्हारे साथ जाम्बवान्, हनूमान्, मैन्द, द्विविद और नील आदि महाबली एवं महापराक्रमी वानर जायँगे। बेटा! तुम सभी लोग बहुत शीघ्र जाकर यशस्विनी सीताका दर्शन करो और यह भी पता लगाओ, 'वे कैसे स्थानमें हैं, किस रूपमें हैं ? विशेषतः उनका आचरण कैसा है ? कौन उन्हें ले गया है ? तथा उसने उन्हें कहाँ रखा है ?'—यह सब जानकर शीघ्र लौट आओ'॥ ७८–८५१/२॥
अपने चाचा महात्मा सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर अङ्गदने तुरंत उठकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। सुग्रीवकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर नीतिज्ञ जाम्बवान्ने सब वानरोंको कुछ दूर खड़ा कर दिया और श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान्जीको एक जगह करके उनसे यह नीतियुक्त बात कही—'नृपनन्दन श्रीरामचन्द्रजी ! सीताका अन्वेषण करनेके विषयमें इस समय आप मेरी एक बात सुनें और सुननेके बाद यदि वह अच्छी लगे तो उसे स्वीकार करें। जटायुने तपस्विनी सीताको जनस्थानसे रावणद्वारा ले जायी जाती हुई देखा था तथा उन्होंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध भी किया था। साथ ही, सीताजीने उस समय अपने आभूषण उतार फेंके थे, जिनको जटायुने और हम लोगोंने भी देखा था। उन आभूषणोंको हमने सुग्रीवको अर्पित कर दिया है। इस कारण राजेन्द्र ! जटायुके कथनानुसार आप इस बातको सत्य समझें कि सीताजीको वही दुष्ट राक्षस रावण ले गया है और महाबाहो ! वे इस समय लङ्कामें ही हैं। वहाँ रहकर भी वे आपके ही दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो निरन्तर आपका ही स्मरण किया करती हैं। जनकनन्दिनी सीता लङ्कामें रहकर भी अपने सदाचारकी यत्नपूर्वक रक्षा कर रही हैं। वे सुमुखी सीतादेवी आपके ही ध्यानसे अपने प्राणोंको धारण करती हुई
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२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५०
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२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५० स्थिता प्रायेण ते देवी सीता दुःखपरायणा। | प्रायः आपके ही वियोग-दुःखमें डूबी रहती हैं। इसलिये हितमेव च ते राजन्नुदधेर्लङ्घने क्षमम्॥ ९५ | राजन्! इस समय आपके हितकी ही बात बता रहा हूँ, वायुपुत्रं हनूमन्तं त्वमत्रादेष्टुमर्हसि। | आप इस कार्यके लिये वायुपुत्र हनूमान्जीको आज्ञा दें; क्योंकि ये ही समुद्र लाँघनेमें समर्थ हैं और सुग्रीव ! आपको त्वं चाप्यर्हसि सुग्रीव प्रेषितुं मारुतात्मजम्॥ ९६ | भी चाहिये कि पवनकुमार हनूमान्जीको ही वहाँ भेजें; तमृते सागरं गन्तुं वानराणां न विद्यते। | क्योंकि वानरोंमें उनके अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो बलं कस्यापि वा वीर इति मे मनसि स्थितम्॥ ९७ | समुद्रके पार जा सके तथा हे वीर! इनके बराबर किसीका बल भी नहीं है। बस, मेरे मनमें यही विचार है। मेरे क्रियतां मद्द्वचः क्षिप्रं हितं पथ्यं च नः सदा। | कथनका शीघ्र पालन किया जाय; क्योंकि यह हमारे लिये उक्ते जाम्बवतैवं तु नीतिस्वल्पाक्षरान्विते॥ ९८ | सदा ही हितकर और लाभकारी होगा' ॥ ८६–९७१/२ ॥ वाक्ये वानरराजोऽसौ शीघ्रमुत्थाय चासनात्। | जाम्बवान्के इस प्रकार थोड़े अक्षरोंमें नीतियुक्त वचन कहनेपर वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही अपने आसनसे वायुपुत्रसमीपं तु तं गत्वा वाक्यमब्रवीत्॥ ९९ | उठे और वायुनन्दन हनूमान्जीके निकट जाकर उनसे बोले- ॥ ९८-९९ ॥ शृणु मद्द्वचनं वीर हनूमन्मारुतात्मज। | "पवनकुमार वीर हनूमान्जी ! तुम मेरी बात सुनो। अयमिक्ष्वाकुतिलको राजा रामः प्रतापवान्॥ १०० | ये प्रतापी राजा श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशके भूषण हैं। पितुरादेशमादाय भ्रातृभार्यासमन्वितः। | ये अपने पिताकी आज्ञा मानकर भाई और पत्नीके सहित प्रविष्टो दण्डकारण्यं साक्षाद्धर्मपरायणः॥ १०१ | दण्डकारण्यमें चले आये थे। सदैव धर्ममें तत्पर रहनेवाले सर्वात्मा सर्वलोकेशो विष्णुर्मानुषरूपवान्। | ये श्रीराम समस्त लोकोंके ईश्वर और सबके आत्मा अस्य भार्या हृता तेन दुष्टेनापि दुरात्मना॥ १०२ | साक्षात् भगवान् विष्णु ही हैं। इस समय मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इनकी धर्मपत्नी सीताको दुष्ट दुरात्मा तद्वियोगजदुःखार्तो विचिन्वंस्तां वने वने। | रावणने हर लिया है। ये प्रतापी वीर राजा उन्हींके त्वया दृष्टो नृपः पूर्वमयं वीरः प्रतापवान्॥ १०३ | वियोगजन्य दुःखसे पीड़ित हो वन-वनमें उन्हींकी खोज करते हुए आ रहे थे, जबकि तुमने इन्हें पहले-पहल एतेन सह संगम्य समयं चापि कारितम्। | देखा था। इनके साथ मिलकर हमने प्रतिज्ञा भी की थी। अनेन निहतः शत्रुमम वालिर्महाबलः॥ १०४ | इन्होंने मेरे शत्रु महाबली वालिका वध किया तथा कपे! अस्य प्रसादेन कपे राज्यं प्राप्तं मयाधुना। | इन्हींकी कृपासे मैंने इस समय अपना राज्य प्राप्त किया मया च तत्प्रतिज्ञातमस्य साहाय्यकर्मणि॥ १०५ | है और मैंने भी इनकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की है। तत्सत्यं कर्तुमिच्छामि त्वद्बलान्मारुतात्मज। | पवननन्दन ! मैं अपनी उस प्रतिज्ञाको तुम्हारे ही बलपर उत्तीर्य सागरं वीर दृष्ट्वा सीतामनिन्दिताम्॥ १०६ | पूर्ण करना चाहता हूँ। वीर! समुद्रके पार जा पतिव्रता सीताको देखकर पुनः समुद्रके इस पार लौट आनेकी भूयस्तर्तुं बलं नास्ति वानराणां त्वया विना। | सामर्थ्य तुम्हारे सिवा वानरोंमेंसे किसीमें भी नहीं है। अतस्त्वमेव जानासि स्वामिकार्यं महामते॥ १०७ | अतः महामते ! तुम्हीं अपने स्वामीके कार्यको ठीक- बलवान्नीतिमांश्चैव दक्षस्त्वं दौत्यकर्मणि। | ठीक जान सकते हो; क्योंकि तुम बलवान्, नीतिज्ञ और दूतकर्ममें दक्ष हो" ॥ १००–१०७१/२ ॥ तेनैवमुक्तो हनुमान् सुग्रीवेण महात्मना॥ १०८ | महात्मा सुग्रीवके यों कहनेपर हनूमान्जी बोले- स्वामिनोऽर्थं न किं कुर्यामीदृशं किं नु भाषसे। | 'आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? भला, अपने स्वामी इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामस्तं पुरतः स्थितम्॥ १०९ | भगवान् श्रीरामका कार्य क्या मैं नहीं करूँगा?' वायुनन्दनके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१५ प्राह वाक्यं महाबाहुर्बाष्पसम्पूर्णलोचनः। इस प्रकार उत्तर देनेपर शत्रुविजयी महाबाहु राम सीताकी सीतां स्मृत्वा सुदुःखार्तः कालयुक्तममित्रजित् ॥ ११० यादसे अत्यन्त दुःखी हो, आँखोंमें आँसू भरकर, सामने बैठे हुए हनुमान्जीसे समयोचित वचन बोले—'महामते ! त्वयि भारं समारोप्य समुद्रतरणादिकम्। मैं समुद्रके पार जाने आदिका भार तुम्हारे ही ऊपर सुग्रीवः स्थाप्यते ह्यत्र मया सार्धं महामते ॥ १११ रखकर सुग्रीवको अपने साथ रखता हूँ। हनूमन् ! तुम हनूमंस्तत्र गच्छ त्वं मत्प्रीतौ कृतनिश्चयः। मेरी, इन वानर-बन्धुओंकी और विशेषतः सुग्रीवकी ज्ञातीनां च तथा प्रीतौ सुग्रीवस्य विशेषतः ॥ ११२ प्रसन्नताके लिये दृढ़ निश्चय करके वहाँ (लङ्कामें) जाओ। महावीर ! प्रायः यही जान पड़ता है कि रावण प्रायेण रक्षसा नीता भार्या मे जनकात्मजा। नामक राक्षस ही सीताको ले गया है; अतः जहाँ सीता तत्र गच्छ महावीर यत्र सीता व्यवस्थिता ॥ ११३ रखी गयी हो, वहाँ जाना। यदि वे पूछें कि 'तुम जिनके यदि पृच्छति सादृश्यं मदाकारमशेषतः। पाससे आते हो, उन श्रीराम और लक्ष्मणका स्वरूप अतो निरीक्ष्य मां भूयो लक्ष्मणं च ममानुजम् ॥ ११४ कैसा है?' तो इसका उत्तर देनेके लिये तुम मेरे शरीरको तथा मेरे छोटे भाई लक्ष्मणको भी अच्छी तरह ज्ञात्वा सर्वाङ्गगं लक्ष्म सकलं चावयोरिह । देख लो। हम दोनोंके शरीरका प्रत्येक चिह्न देखकर नान्यथा विश्वसेत्सीता इति मे मनसि स्थितम् ॥ ११५ उनसे बताना। नहीं तो सीता तुमपर विश्वास नहीं कर सकतीं—यह मेरे मनका दृढ़ विचार है' ॥ १०८–११५॥ इत्युक्तो रामदेवेन प्रभञ्जनसुतो बली। भगवान् श्रीरामके यों कहनेपर महाबली वायुनन्दन उत्थाय तत्पुरः स्थित्वा कृताञ्जलिरुवाच तम् ॥ ११६ हनुमान् उठकर उनके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर उनसे बोले—'मैं आप दोनोंके सब लक्षण जानामि लक्षणं सर्वं युवयोस्तु विशेषतः । विशेषरूपसे जानता हूँ; अब मैं वानरोंके साथ जा रहा हूँ, गच्छामि कपिभिः सार्धं त्वं शोकं मा कुरुष्व वै ॥ ११७ आप खेद न करें। कमललोचन राजन् ! इसके अतिरिक्त अन्यच्च देह्यभिज्ञानं विश्वासो येन मे भवेत् । आप मुझे कोई पहचानकी वस्तु दीजिये, जिससे आपकी सीतायास्तव देव्यास्तु राजन् राजीवलोचन ॥ ११८ महारानी सीताका मुझपर विश्वास हो ॥ ११६–११८॥ इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामः कमललोचनः । वायुनन्दन हनुमान्के इस प्रकार अनुरोध करनेपर कमलनयन श्रीरामने अपनी अँगूठी निकालकर दे दी, अङ्गुलीयकमुन्मुच्य दत्तवान् रामचिह्नितम् ॥ ११९ जिसपर 'राम' नाम खुदा हुआ था। उसे लेकर पवनकुमार तद्गृहीत्वा तदा सोऽपि हनूमान्मारुतात्मजः। हनूमान्ने भी श्रीराम, लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीवकी रामं प्रदक्षिणीकृत्य लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १२० परिक्रमा की। फिर उन्हें प्रणामकर वे अञ्जनीनन्दन हनूमान् नत्वा ततो जगामाशु हनूमानञ्जनीसुतः । वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले। तब सुग्रीव भी अपने आज्ञाकारी सुग्रीवोऽपि च ताञ्छ्रुत्वा वानरान् गन्तुमुद्यतान् ॥ १२१ एवं बलाभिमानी वानरोंके विषयमें यह जानकर कि वे आज्ञेयानाज्ञापयति वानरान् बलदर्पितान् । जानेके लिये उद्यत हैं, उन्हें आदेश देते हुए बोले—'सभी वानर इस समय मेरी आज्ञा सुन लें—तुम पर्वतों और शृण्वन्तु वानराः सर्वे शासनं मम भाषितम् ॥ १२२ वनोंमें विलम मत जाना। शीघ्र जाकर महाभागा रामपत्नी विलम्बनं न कर्तव्यं युष्माभिः पर्वतादिषु । पतिव्रता सीताका पता लगाकर लौट आना; मैं श्रीरामचन्द्रजी- द्रुतं गत्वा तु तां वीक्ष्य आगन्तव्यमनिन्दिताम् ॥ १२३ के पास ठहरता हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाके विपरीत चलोगे रामपत्नीं महाभागां स्थास्येऽहं रामसंनिधौ । तो मैं तुम्हारी नाक और कान काट लूँगा' ॥ ११९–१२४॥ कर्तनं वा करिष्यामि अन्यथा कर्णनास्योः ॥ १२४
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२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० एवं तान् प्रेषयित्वा तु आज्ञापूर्वं कपीश्वरः । अथ ते वानरा याताः पश्चिमादिषु दिक्षु वै ॥ १२५ ते सानुषु समस्तेषु गिरीणामपि मूर्धसु । नदीतीरेषु सर्वेषु मुनीनामाश्रमेषु च ॥ १२६ कन्दरेषु च सर्वेषु वनेषूपवनेषु च । वृक्षेषु वृक्षगुल्मेषु गुहासु च शिलासु च ॥ १२७ सह्यपर्वतपार्श्वेषु विन्ध्यसागरपार्श्वयोः । हिमवत्यपि शैले च तथा किम्पुरुषादिषु ॥ १२८ मनुदेशेषु सर्वेषु सप्तपातालकेषु च । मध्यदेशेषु सर्वेषु काश्मीरेषु महाबलाः ॥ १२९ पूर्वदेशेषु सर्वेषु कामरूपेषु कोशले । तीर्थस्थानेषु सर्वेषु सप्तकोङ्कणकेषु च ॥ १३० यत्र तत्रैव ते सीतामदृष्ट्वा पुनरागताः । आगत्य ते नमस्कृत्य रामलक्ष्मणपादयोः ॥ १३१ सुग्रीवं च विशेषेण नास्माभिः कमलेक्षणा । दृष्टा सीता महाभागेत्युक्त्वा तांस्तत्र तस्थिरे ॥ १३२ ततस्तं दुःखितं प्राह रामदेवं कपीश्वरः । सीता दक्षिणदिग्भागे स्थिता द्रष्टुं वने नृप ॥ १३३ शक्या वानरसिंहेन वायुपुत्रेण धीमता । दृष्टा सीतामिहायाति हनूमान्नात्र संशयः ॥ १३४ स्थिरो भव महाबाहो राम सत्यमिदं वचः । लक्ष्मणोऽप्याह शकुनं तत्र वाक्यमिदं तदा ॥ १३५ सर्वथा दृष्टसीतस्तु हनुमानागमिष्यति । इत्याश्वास्य स्थितौ तत्र रामं सुग्रीवलक्ष्मणौ ॥ १३६ अथाङ्गदं पुरस्कृत्य ये गता वानरोत्तमाः । यत्नादन्वेषणार्थाय रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ १३७ अदृष्ट्वा श्रममापन्नाः कृच्छ्रभूतास्तदा वने । भक्षणेन विहीनास्ते क्षुधया च प्रपीडिताः ॥ १३८ भ्रमद्भिर्गहनेऽरण्ये क्वापि दृष्टा च सुप्रभा । गुहानिवासिनी सिद्धा ऋषिपत्नी ह्यनिन्दिता ॥ १३९ सा च तानागतान्दृष्ट्वा स्वाश्रमं प्रति वानरान् । आगताः कस्य यूयं तु कुतः किं नु प्रयोजनम् ॥ १४० कपिराज सुग्रीवने इस प्रकार आज्ञापूर्वक उन्हें भेजा और वे वानर पश्चिम आदि दिशाओंमें चल पड़े। समस्त पर्वतोंके सानुओं (उपत्यकाओं) और शिखरोंपर, सारी नदियोंके तटोंपर, मुनियोंके आश्रमोंमें, खड्डोंमें, सब प्रकारके वनों और उपवनोंमें, वृक्षों और झाड़ियोंमें, कन्दराओं तथा शिलाओंमें, सह्यपर्वतके आस-पास, विन्ध्याचल और समुद्रके निकट, हिमालय पर्वतपर किम्पुरुष आदि देशोंमें, समस्त मानवीय प्रदेशोंमें, सातों पातालोंमें, सम्पूर्ण मध्यप्रदेशोंमें, कश्मीरमें, पूर्वदिशाके सारे देशोंमें, कामरूप (आसाम) और कोशल (अवध)-में, सम्पूर्ण तीर्थ-स्थानोंमें तथा सातों कोङ्कण देशोंमें भी जहाँ-तहाँ सर्वत्र सीताकी खोज करते हुए वे महाबली वानर उन्हें न पाकर लौट आये। आकर उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणके चरणोंमें तथा विशेषतः सुग्रीवको प्रणाम किया और यह कहकर कि 'हमने कमललोचना महाभागा सीताको कहीं नहीं देखा', वहाँ खड़े हो गये ॥ १२५-१३२ ॥ तब दुःखित हुए भगवान् रामसे कपिराज सुग्रीवने कहा-'राजन् ! सीताजी दक्षिण दिशामें ही वनमें स्थित हैं; उन्हें वानरश्रेष्ठ बुद्धिमान् पवनकुमार ही देख सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सीताको देखकर ही आयेंगे। महाबाहु श्रीराम ! आप धैर्य धारण करें, मेरा यह कथन बिलकुल सत्य है।' तब लक्ष्मणने भी शकुन देखकर यह बात कही - 'हनुमान् सर्वथा सीताको देखकर ही आयेंगे।' इस प्रकार सुग्रीव और लक्ष्मण भगवान् श्रीरामको सान्त्वना देते हुए उनके पास रहने लगे ॥ १३३-१३६ ॥ इधर जो-जो श्रेष्ठ वानर अङ्गदजीको आगे करके यशस्विनी श्रीसीताजीकी यत्नपूर्वक खोज करनेके लिये गये थे, वे वनमें कहीं भी सीताजीका पता न पाकर बहुत थक गये तथा कष्टमें पड़ गये। यही नहीं, कुछ भोजन न मिलनेके कारण वे भूखसे भी बहुत पीड़ित हो गये। गहन वनमें घूमते हुए उन्होंने एक परम कान्तिमयी और उत्तम गुणोंवाली ऋषिपत्नी देखी, जो कन्दरामें निवास करनेवाली और सिद्धा थी। उसने उन वानरोंको अपने आश्रमपर आया देख पूछा- 'आप लोग किसके दूत हैं? कहाँसे आये हैं? और यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है?' ॥ १३७-१४० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१७ इत्युक्ते जाम्बवानाह तां सिद्धां सुमहामतिः । | उसकी बात सुनकर महामति जाम्बवान्ने उस सिद्धा सुग्रीवस्य वयं भृत्या आगता ह्यत्र शोभने ॥ १४१ | तपस्विनीसे कहा—'शोभने! पापहीने! हम सुग्रीवके भृत्य | हैं, श्रीरामचन्द्रजीकी भार्या सीताकी खोज करनेके लिये यहाँ रामभार्यार्थमनघे सीतान्वेषणकर्मणि । | आये हैं। हम किस दिशाको जायँ, इसका ज्ञान हमें नहीं कां दिग्भूता निराहारा अदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ १४२ | रह गया है। सीताजीका पता न पानेके कारण अभीतक हमने | कुछ भोजन भी नहीं किया' ॥ १४१-१४२ ॥ इत्युक्ते जाम्बवत्यत्र पुनस्तानाह सा शुभा। | जाम्बवान्के यों कहनेपर उस कल्याणी तपस्विनीने जानामि रामं सीतां च लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १४३ | पुनः उन वानरोंसे कहा—'मैं श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और | कपिराज सुग्रीवको भी जानती हूँ। वानरेन्द्रगण! आप लोग भुञ्जीध्वमत्र मे दत्तमाहारं च कपीश्वराः । | यहाँ मेरा दिया हुआ आहार ग्रहण करें। आप लोग रामकार्यगतास्त्वत्र यूयं रामसमा मम ॥ १४४ | श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे यहाँ आये हैं, अतः हमारे लिये | श्रीरामचन्द्रजीके समान ही आदरणीय हैं।' यों कहकर इत्युक्त्वा चामृतं तेषां योगाद्दत्त्वा तपस्विनी । | उस तपस्विनीने अपने योगबलसे उन वानरोंको अमृतमय भोजयित्वा यथाकामं भूयस्तानाह तापसी ॥ १४५ | मधुर पदार्थ अर्पित किया तथा यथेष्ट भोजन कराकर पुनः | उनसे कहा—'सीताका स्थान पक्षिराज सम्पातिको ज्ञात है। सीतास्थानं तु जानाति सम्पातिर्नाम पक्षिराट् । | वे इसी वनमें महेन्द्रपर्वतपर रहते हैं। वानरगण! आप आस्थितो वै वने सोऽपि महेन्द्रे पर्वते द्विजः ॥ १४६ | लोग इसी मार्गसे वहाँ पहुँच जायँगे। सम्पाति बहुत मार्गेणानेन हरयस्तत्र यूयं गमिष्यथ । | दूरतक देखनेवाले हैं, अतः वे सीताका पता बता देंगे। स वक्ति सीतां सम्पातिर्दूरदर्शी तु यः खगः ॥ १४७ | उनके बताये हुए मार्गसे आप लोग पुनः आगे जाइयेगा। | जनकनन्दिनी सीताको ये पवनकुमार हनुमान्जी अवश्य तेनादिष्टं तु पन्थानं पुनरासाद्य गच्छथ। | देख लेंगे' ॥ १४३–१४८॥ अवश्यं जानकीं सीतां द्रक्ष्यते पवनात्मजः ॥ १४८ | तयैवमुक्ताः कपयः परां प्रीतिमुपागताः । | उसके इस प्रकार कहनेपर वानरगण बहुत ही प्रसन्न हृष्टास्तेजनमापन्नास्तां प्रणम्य प्रतस्थिरे ॥ १४९ | हुए; उन्हें बड़ा उत्साह मिला। फिर वे उस तपस्विनीको | प्रणाम करके वहाँसे प्रस्थित हुए। सम्पातिको देखनेकी महेन्द्राद्रिं गता वीरा वानरास्तद्दिदृक्षया । | इच्छासे वे वीर कपीश्वर महेन्द्रपर्वतपर गये तथा वहाँ बैठे तत्र सम्पातिमासीनं दृष्टवन्तः कपीश्वराः ॥ १५० | हुए सम्पातिको उन्होंने देखा। तब पक्षिराज सम्पातिने वहाँ | आये हुए वानरोंसे कहा—'आप लोग कौन हैं? किसके तानुवाचाथ सम्पातिर्वानरानागतान्द्विजः । | दूत हैं? कहाँसे आये हैं? शीघ्र बतायें' ॥ १४९–१५१ ॥ के यूयमिति सम्प्राप्ताः कस्य वा ब्रूत मा चिरम् ॥ १५१ | | सम्पातिके यों पूछनेपर वानरोंने सारा समाचार यथार्थरूपसे इत्युक्ते वानरा ऊचुर्यथावृत्तमनुक्रमात् । | क्रमशः बताना आरम्भ किया—'पक्षिराज! हम सब रामदूता वयं सर्वे सीतान्वेषणकर्मणि ॥ १५२ | श्रीरामचन्द्रजीके दूत हैं। कपिराज महात्मा सुग्रीवने हमें | सीताजीकी खोजके लिये भेजा है। पक्षिवर! एक सिद्धाके प्रेषिताः कपिराजेन सुग्रीवेण महात्मना । | कहनेसे हम आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं। त्वां द्रष्टुमिह सम्प्राप्ताः सिद्धाया वचनाद्विज ॥ १५३ | महामते! महाभाग! सीताके स्थानका पता आप हमें बता सीतास्थानं महाभाग त्वं नो वद महामते। | दें।' वानरोंके इस तरह अनुरोध करनेपर गृध्र सम्पातिने इत्युक्तो वानरैः श्येनो वीक्षांचक्रे सुदक्षिणाम् ॥ १५४ | अपनी दृष्टि दक्षिण दिशाकी ओर दौड़ायी और पतिव्रता In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० सीतां दृष्ट्वा स लङ्कायामशोकाख्ये महावने। सीताको देखकर बताया—'सीताजी लङ्कामें अशोकवनके स्थितेति कथितं तेन जटायुस्तु मृतस्तव ॥ १५५ भीतर ठहरी हुई हैं।' तब वानरोंने कहा—'आपके भ्राता जटायुने सीताजीकी रक्षाके लिये ही प्राणत्याग किया है।' भ्रातेति चोचुः स स्नात्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। यह सुनकर महामति सम्पातिने स्नान करके जटायुको योगमास्थाय स्वं देहं विससर्ज महामतिः ॥ १५६ जलाञ्जलि दी और योगधारणाका आश्रय ले अपने शरीरको त्याग दिया॥ १५२—१५६॥ ततस्तं वानरा दग्ध्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। तदनन्तर वानरोंने सम्पातिके शवका दाह-संस्कार किया गत्वा महेन्द्रशृङ्गं ते समारुह्य क्षणं स्थिताः ॥ १५७ और उन्हें जलाञ्जलि दे, महेन्द्रपर्वतपर जाकर तथा उसके शिखरपर आरूढ़ हो, क्षणभर खड़े रहे। फिर समुद्रकी सागरं वीक्ष्य ते सर्वे परस्परमथाब्रुवन्। ओर देख वे सभी परस्पर कहने लगे—'रावणने ही भगवान् रावणेनैव भार्या सा नीता रामस्य निश्चितम् ॥ १५८ श्रीरामकी भार्या सीताका अपहरण किया है, यह बात निश्चित हो गयी। सम्पातिके वचनसे आज सब बातें ठीक- सम्पातिवचनादद्य संज्ञातं सकलं हि तत्। ठीक ज्ञात हो गयीं। शोभाशाली वानरो! अब आप सब वानराणां तु कश्चात्र उत्तीर्य लवणोदधिम् ॥ १५९ लोग सोचकर बतायें कि यहाँ वानरोंमें कौन ऐसा वीर है, जो इस क्षार समुद्रके पार जा लङ्कामें घुसे और परम लङ्कां प्रविश्य दृष्ट्वा तां रामपत्नीं यशस्विनीम्। यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताजीका दर्शन करके पुनः समुद्रके पुनश्चोदधितरणे शक्तिं ब्रूत हि शोभनाः ॥ १६० पार लौट आनेमें समर्थ हो सके'॥ १५७—१६०॥ वानरोंकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा—'समुद्रको इत्युक्तो जाम्बवान् प्राह सर्वे शक्तास्तु वानराः। पार करनेमें तो सभी वानर समर्थ हैं, परंतु यह कार्य एक सागरोत्तरणे किंतु कार्यमन्यस्य सम्भवेत् ॥ १६१ अन्यतम वानरसे ही सिद्ध होगा। मेरे विचारमें तो यह आता है कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें केवल हनूमान्जी तत्र दक्षोऽयमेवात्र हनूमानिति मे मतिः। ही समर्थ हैं। अब समय नहीं खोना चाहिये। हमारे कालक्षेपो न कर्तव्यो मासार्धमधिकं गतम् ॥ १६२ लौटनेकी जो नियत अवधि थी। उससे पंद्रह दिन अधिक बीत गये हैं। वानरेन्द्रगण! यदि हमलोग सीताको यद्यदृष्ट्वा तु गच्छामो वैदेहीं वानरर्षभाः। देखे बिना ही लौट जायँगे तो कपिराज सुग्रीव हमारी नाक कर्णनासादि नः स्वाङ्गं निकृन्तति कपीश्वरः ॥ १६३ और कान काट लेंगे। इसलिये मेरी राय यह है कि हम सब लोग इस कार्यके लिये वायुनन्दन हनुमान्जीसे ही तस्मात्प्रार्थ्यः स चास्माभिर्वायुपुत्रस्तु मे मतिः। प्रार्थना करें'॥ १६१—१६३१/२ ॥ इत्युक्तास्ते तथेत्यूचुर्वानरा वृद्धवानरम् ॥ १६४ यह सुनकर उन वानरोंने वृद्ध जाम्बवान्जीसे कहा, 'अच्छा, ऐसा ही हो।' तत्पश्चात् वे सभी वानर कार्यसाधनमें ततस्ते प्रार्थयामासुर्वानराः पवनात्मजम्। विशेष कुशल महाबुद्धिमान् पवननन्दन हनूमान्जीसे प्रार्थना हनूमन्तं महाप्राज्ञं दक्षं कार्येषु चाधिकम् ॥ १६५ करने लगे—'अञ्जनीनन्दन! आप श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय सेवक हैं। आप ही रावणको भय देनेके लिये लङ्कामें गच्छ त्वं रामभृत्यस्त्वं रावणस्य भयाय च। जायँ और हमारे वानरवृन्दकी रक्षा करें।' वानरोंके यों रक्षस्व वानरकुलमस्माकमञ्जनीसुत। कहनेपर पवनकुमार हनुमान्जीने 'तथास्तु' कहकर उनकी इत्युक्तस्तांस्तथेत्याह वानरान् पवनात्मजः ॥ १६६ प्रार्थना स्वीकार की। एक तो श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५१ ] हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २१९ रामप्रयुक्तश्च पुनः स्वभर्तॄणा फिर अपने स्वामी सुग्रीवने भी आदेश दिया था, इसके पुनर्महेन्द्रे कपिभिश्च नोदितः । बाद महेन्द्रपर्वतपर उन वानरोंने भी उन्हें प्रेरित किया, गन्तुं प्रचक्रे मतिमञ्जनीसुतः अतः अञ्जनीकुमार हनुमान्जीने समुद्र लाँघकर निशाचरपुरी समुद्रमुत्तीर्य निशाचरालयम् ॥ १६७ ॥ लङ्कामें जानेका निश्चय कर लिया ॥ १६४-१६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥ इक्यावनवाँ अध्याय हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन करके श्रीरामको समाचार देना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- हनुमान्जीने रावणद्वारा हरी गयी सीताकी खोज करने तथा उनके स्थानका पता स तु रावणनीतायाः सीतायाः परिमार्गणम् । लगानेके लिये चारणोंके मार्ग (आकाश)-से जानेकी इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥ १ इच्छा की। पूर्वाभिमुख हो, हाथ जोड़कर उन्होंने देवगणोंसहित आत्मयोनि ब्रह्माजीको मन-ही-मन प्रणाम अञ्जलिं प्राङ्मुखं कृत्वा सगणायात्मयोनये । किया तथा श्रीराम और महारथी लक्ष्मणको भी मनसे मनसाऽऽवन्द्य रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ही प्रणाम करके सागर तथा सरिताओंको मस्तक नवाया। फिर अपने वानर-बन्धुओंको गले लगाकर उन सबकी सागरं सरितश्चैव प्रणम्य शिरसा कपिः । प्रदक्षिणा की। तब अन्य सब वानरोंने यह आशीर्वाद ज्ञातींश्चैव परिष्वज्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥ ३ दिया- 'वीर ! तुम (सकुशल) लौट आनेके लिये पवित्र वायुसे सेवित मार्गपर बिना विघ्न-बाधाके जाओ।' यों अरिष्टं गच्छ पन्थानं पुण्यवायुनिषेवितम् । कहकर उन्होंने हनुमान्जीका सम्मान किया। फिर पराक्रमी पुनरागमानायेति वानरैरभिपूजितः ॥ ४ पवनकुमार अपनी सहज शक्तिको प्राप्त हुए-उनमें वायुके सदृश बलका आवेश हो गया। दूरतकके मार्गका अञ्जसा स्वं तथा वीर्यमाविवेशाथ वीर्यवान् । अवलोकन करते हुए उन्होंने ऊपर दृष्टि डाली। अपने- मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वं प्रणिहितेक्षणः ॥ ५ आपमें षड्विध ऐश्वर्यकी पूर्णताका-सा अनुभव करते हुए वे महाबली हनुमान् महेन्द्र पर्वतको पैरोंसे दबाकर सम्पूर्णमिव चात्मानं भावयित्वा महाबलः । उसके शिखरसे आकाशकी ओर उछले ॥ १-६॥ उत्पात गिरेः शृङ्गान्निष्पीड्य गिरिमम्बरम् ॥ ६ बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके कार्य- साधनमें तत्पर हो जब अपने पिता वायुके मार्गसे चले पितुर्मार्गेण यातस्य वायुपुत्रस्य धीमतः । जा रहे थे, उस समय उनको थोड़ी देरतक विश्राम देनेके रामकार्यपरस्यास्य सागरेण प्रचोदितः ॥ ७ लिये, समुद्रद्वारा प्रेरित हो, मैनाक पर्वत पानीसे बाहर ऊपरकी ओर उठ गया। उसे देख उन्होंने वहाँ थोड़ा- विश्रामार्थं समुत्तस्थौ मैनाको लवणोदधेः । सा रुककर उससे आदरपूर्वक बातचीत की और फिर तं निरीक्ष्य निपीड्याथ रयात्सम्भाष्य सादरम् ॥ ८ उसे अपने वेगसे दबाकर उछलते हुए वे दूर चले गये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth