निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । १६ जैसे—"उष्णं घृतम्" 'उष दाहे' (भ्वा० पा०) धातु है । यह प्रायः वेदमें प्रसिद्ध है ।—"प्रत्युष्ट ँरक्षः प्रत्युष्टा अरातयः” ( य० वा० स० १, ७, ) इत्यादि ।—और भाषामें 'उष्ण' शब्द बोला जाता है । यह नैगम शब्दके सादृश्य पर निर्वचन किया जाता है । ऐसे ही-'घृक्षरग दीप्त्योः' (भ्वा० प०) धातु है, उसका—"आत्वा जि घर्मि” ( य० वा० सं० ११, २३ ) इत्यादि-वेद वाक्योंमे प्रयोग प्रसिद्ध है, और भाषामें 'घृतम्' पद व्यवहृत होता है, सो यह वैदिक 'घृ' धातुसे ही निर्वचनीय है। इस प्रकारसे 'लौकिक शब्दोंसे वैदिक शब्द और वैदिक शब्दोंसे लौकिक शब्दों का निर्वचन करना चाहिये । निर्वचनमें विभिन्न देश भाषाओंका परिज्ञान । निर्वचन करनेवालेको और यह एक बात ध्यानमे रखनी चाहिये कि—"कुछ देशोमे धातु शब्दोंकी प्रकृति ही बोली जाती है, और कुछ देशोंमें विकृति” । धातुका आख्यात पदके रूपमें जो प्रयोग है, वह प्रकृति कहाता है, क्योंकि—पहिले-"सब नाम आख्यातसे ही उत्पन्न होते हैं” । इस सिद्धान्तके द्वारा आख्यातको कारण बता चुके है । और 'नाम'के रूपमें जो धातुका प्रयोग होता है, वह उसकी विकृति है, यह बात भी उपर्युक्त सिद्धान्तसे ही आ जाती है ॥ ३ ॥ ( ख० ४ ) शवतिर्गतिकर्मा, कम्बोजेषु-एव भाष्यते । कम्बोजाः, कम्बलभोजाः, कमनीय भोजा वा । कम्बलः कमनीयो भवति । विकार मस्यार्येषु भा- षन्ते शव इति । दातिर्लवनार्थे प्राच्येषु, दात्र-
२० २ अ० १ पा० ४ खं० । मुदी च्येषु । संवस्-एक-पदानि निर्ब्रू यात् । अथ तद्धित समासेषु एक पर्व सु च अनेक पर्व सु च पूर्वं पूर्वम् अपरम् अपरं प्रविभज्य निर्ब्रू यात् । दण्ड्यः पुरुषः, दण्डमर्हति, -इति वा । दण्डेन सम्पद्यते इति वा । दण्डः, -ददतेः धारयति कर्म्मणः । “अक्रूरो ददते मणिम्”—इति अभिभाषन्ते । 'दम- नात्'—इति औपमन्यवः । 'दण्ड मस्या कर्षत'— इति गर्हायाम् ॥ ४ ॥ अर्थः— 'शवति' क्रिया-रूप, गति-अर्थमें कम्बोज या म्लेच्छ देशोंमें ही बोला जाता है । [ उदाहरण विशेषमें आये हुए शब्दका निर्वचन-] 'कम्बोज' नामसे कम्बलों को सेवन करनेवाले या सुन्दर पदार्थोंको खानेवाले-[ बोले जाते हैं । ] [ विग्रहमें आया हुआ शब्द-] 'कम्बल नाम वाऽउनोयका होता है । इस 'शवति' धातुकी 'शव' इस विकृति या नाम पदको आर्य-देश ( हिन्दुस्थान ) में बोलते हैं । 'दाति'—क्रिया छेदन अर्थमें प्राच्य या पूर्वी देशोंमें बोली जाती है । 'दात्र' जो इसको विकृति है, उदीच्य या उत्तरी देशोंमें बोली जाती है । इस प्रकारसे एक-पद या अखण्ड-पदोंकी व्याख्या करे । इसके अतिरिक्त एक पदवाले अथवा अनेक पदवाले तद्धित और समासोंमें पहिले पहिले और पिछले पिछलेको अलग अलग करके निर्वचन करे । [ जैसे-] 'दण्ड्यः पुरुषः,' जो पुरुष दण्डके योग्य हो । अथवा दण्डसे सिद्ध किया जावे । [ पदार्थ—निर्वचन—] 'दण्ड'-शब्द धारणार्थक 'दद्' ( भ्वा० आ० ) ध तुसे होता है ।
हिन्दी निरुक्त । २१ [ लोकमें—] 'अक्रूरो ददते मणिम्' 'अक्रूर मणिको धारण करता है'—ऐसा बोलते हैं। औपमन्यव आचार्य्य इस ( दण्ड ) शब्दको दमन क्रियाके सम्बन्धसे ( 'दम' उपशमे ( दि० प० ) धातुसे ) बना हुआ मानते हैं। [ लोकमें—] “दण्डमस्य आकर्षत”—हे सभा- सदो ! इसको दण्ड दो, ऐसा गर्हा या निन्दामें प्रयोग करते हैं ॥४॥ व्याख्या-- 'शवतिः'—कम्बोज नाम म्लेच्छ देशोंमे 'शवति' यह आख्यातकी क्रिया 'गच्छति'—( जाता है) के अर्थमें बोली जाती है, यह इस धातुका प्रकृति-रूप है। और आर्य्यदेश या हिन्दुस्थानमें इसी धातुके विकार भूत 'शव' नामसे मृतक शरीर ( मुर्दा ) बोला जाता है। इस प्रकार कोई देशोंमें प्रकृति और कोई देशोंमें धातुकी प्रकृति बोली जाती है, या कहीं चेतन, और कहीं अचेतन। कम्बोजाः—[ क-] 'कम्बलभोज' शब्दसे 'कम्बोज' शब्द बना है, क्योंकि—उन देशोंमें शीतके आधिक्यसे कम्ब- लको ओढ़ने, पहिननेमें बहुत लेते हैं; इसलिये कम्बलभोजसे ही कम्बोज बना होगा। [ ख-] अथवा 'कमनीयभोज' शब्दसे कम्बोज शब्दकी उत्पत्ति हुई। क्योंकि-उन देशोंके मनुष्य, कम- नीय—या उत्तम उत्तम वस्तुओंको उपभोग करते है। 'भुज' धातुके भोजन अर्थको लेकर काश्मीर देश कम्बोज कहा जा सकता है, क्योंकि—वहाँ अच्छे मेवे होते हैं। जिनको वहांके लोग खाते है। यदि उपभोग अर्थ लेवें तो कम्बोज उस देशका नाम हुआ, जिस समुद्रके अन्तरमें मोती आदि कमनीय रत्न पैदा होते हैं, जिसका- कि, अब भी कम्बोज नाम प्रसिद्ध है; क्योंकि-वहांके लोग कमनीय रत्नोंका उपभोग करते हैं।
२२ २ अ० १ पा० ४ खं० । कम्बलः - कमनीय् होनेसे ही कम्बल कहाता है। क्योंकि-शीतसे पीड़ित मनुष्यका वह प्रार्थनीय होता है। दूसरा उदाहरण । "दाति" धातु आख्यातकी क्रियाके रूपमें प्राच्य या पूर्वीय देशोंमे बोला जाना है; जिसका वहां छेदन अर्थ होता है। जैसे- 'ब्रीहीन्दाति'-'धानोंको काटता है। 'यवान् दाति'-'यवोंको काटता है'। और यही धातु उदीच्य या उत्तरीय देशोंमें विकृति या नामके रूपमें 'दात्र' ऐसा बोला जाता है। 'दीयते अनेन' इति दात्रम्। जिससे काटा जाय उसे दात्र कहते है। जिस प्रकार कम्बोज और आर्य देशोंमें भिन्न भिन्न रूपोंमें पाये हुए शवति धातुके प्रयोगोंके अर्थानुसन्धानसे उसके अभिधेयकी स्थिरता होतो है, कि-वहाँ भी जाना अर्थ देता है, और यहाँ भी,- जिसके प्राण चले गये, उस शरीरको कहते हैं, सर्वथा दोनों देशोंमें इसका चलना अर्थ है। इससे गति अर्थ सन्दिग्ध है। तथा 'दाति' धातुका प्राच्य और उदीच्य दोनों देशोंके व्यव- हारसे लवन या छेदन अर्थ निश्चित होता है, इसी प्रकार अन्य अन्य जो एक पद या स्वतन्त्र स्वतन्त्र पद हैं (जैसे कि-ऐक पदिक काण्डमें आवेंगे) उनका लोक और वेदकी व्यवस्थासे या देश- भाषाओंकी प्रसिद्धिके विभागसे निर्वचन करना। तद्धित तथा समास युक्तपदोंका निर्वचन । जो शब्द तद्धित व समाससे रहित हैं, वे शुद्ध नाम तथा आ- ख्यातके रूपमें एक एक पद होते हैं, इससे उनकी निरुक्तिमें किसी क्रम विशेषकी शंका नहीं होती, किन्तु जहां समास व तद्धितका योग है, वहाँ अनेक अनेक पदोंके मेल होते हैं, इस लिये वहां पर क्रम
हिन्दी निरुक्त । २३ बताना चाहिये, पहिले पूर्व पूर्व पदोंका निर्वचन होकर पर पदोंका निर्वचन होगा या इससे उलटा ? इस प्रश्नका स्पष्ट अर्थ यह है कि- ( १ ) तद्धित युक्त पदोंमें क्या पहिले, पूर्व पदके अर्थका निर्वचन होगा ? या तद्धितके अर्थका ? ( २ ) ऐसे ही समास युक्त पदोंमें पहिले पदोंके अर्थका निर्वचन होगा ? या समासके अर्थका ? तद्धित और समास । “तद्धिताः” ( पा०-४, १, ७६ ) इस सूत्रके अधिकारमें जो प्रत्यय विधान किये गये हैं, वे तद्धित कहाते हैं । तथा “समर्थः पदविधिः” ( पा०-२, १, १ ) या “प्राक्कडारात्समासः” ( पा० २, १, ३ ) सूत्रके अधिकारमें जो संस्कार या वृत्ति विधान की गई हैं, वे समास हैं । इन दोनोंमें ही समान नियम हैं, चाहे वे एक पर्व ( एक पद ) या अनेक पर्व ( अनेक पद ) हों, उनमें पहिलेको पहिले, और पिछलेको पीछे निर्वचन करना । अर्थात् तद्धित युक्तपदमें पहिले तद्धितार्थका निर्वचन करे और पीछे पदार्थका । एवम्, समास युक्त पदोंमें पहिले समासार्थका निर्वचन करे, और पीछे पदार्थोंका । “दाण्ड्यः”—यह एक तद्धित है,और “वाष्र्ण्यायणिः” यह अनेक पद । क्योंकि यह अपने आत्मामें अनेक पदोंको लय किये हुए है । जैसे “वृषस्यापत्यं-वार्ष्यः” वृषका अपत्य या सन्तान वार्ष्य, और ‘वार्ष्यस्यापत्यं = वाष्र्ण्यायणः’ वार्ष्यका सन्तान वाष्र्ण्यायण, तथा- ‘वाष्र्ण्यायणस्य अपत्यं वाष्र्ण्यायणिः’ वाष्र्ण्यायणका अपत्य वाष्र्ण्यायणि होता है । ऐसे ही एक शेष, एक पद समास होता है, जिसको विधान “सरूपाणामेकशेष एक विभक्तौ” ( पा०-१, २, ६४ ) सूत्रसे होता है, जैसे कि -“पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषौ” दो पुरुष शब्दोंमेंसे एक
२४ २ अ० १ पा० ४ खं० । शब्दका लोप और एक शेष रहनेसे 'पुरुषौ' बनता है। 'पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषश्च पुरुषाः' यहां तीन पुरुष शब्दोंमेंसे एक पुरुष शब्द- का शेष और दोके लोप होनेसे 'पुरुषाः' पद बनता है। ^१ द्विगु, द्वन्द्व, अव्ययी भाव, कर्मधारय, बहुव्रीहि और तत्पुरुष ये छः समास अनेक पद हैं। पाणिनीयसूत्र—"संख्या पूर्वीद्विगुः” ( पा० २, १, ५२) उदा- हरण—पञ्चमूली पञ्चरथी, दशरथी–इत्यादि। सूत्र—"चार्थे द्वन्द्वः” ( पा० २, १, २६) यह विकल्पसे एकके समान होता है वहां एक वचन और अन्य स्थलमें पदार्थोंकी संख्याके अधीन द्विवचन तथा बहु वचन होता है। उदाहरण—'प्लक्षन्यग्रोधौ' पिलखन-बट । 'अहिनकुलम्' साँप- न्योला । 'भीमार्जुनवासुदेवाः' भीम-अर्जुन-वासुदेव । इत्यादि । 'उपसर्ग निपात पूर्वकोऽव्ययीभावः' उदाहरण— 'उपमणिकम्' मणिकके समीप । 'अनुसमुद्रम्' समुद्रके सदृश्य । 'व्यभ्रम्' मेघोंका अभाव । इत्यादि । इनमें उपसर्ग या निपात ही पूर्व पद होते हैं। 'तुल्यलिङ्ग विभक्ति कयो रुभयोः पदयोः समा- नाधिकरणः कर्मधारयः' जिन दो पदोंके लिङ्ग और विभक्ति समान हों, उनके समाना- धिकरण या एकार्थ पर समासको कर्मधारय कहते हैं। जैसे—'कृष्णमृगः' काला मृग। 'रक्ताश्व' लाल घोड़ा। श्वेत पताका इत्यादि निर्वचनमें क्रमके जाननेके लिये उदाहरण । १—"द्विगु द्वन्द्वोऽव्ययी भावः कर्मधारयएवच । पञ्चमस्तु बहुव्रीहिः षष्ठस्तत्पुरुषः स्मृतः ॥”
हिन्दी निरुक्त। २५ ( १ ) तद्धित । "दण्ड्यः पुरुषः "-'दण्ड्य' शब्द एकपद तद्धित है, और पुरुष शब्दका विशेषण है; इसकी व्युत्पत्ति-(तद्धितार्थ निर्वचन) ( क ) 'दण्डमर्हति' किसी अपराधमें योग्य को 'दण्ड्य' कहते हैं। ( ख ) अथवा 'दण्डेन वा कार्षापणादिना सम्पद्यते, संयुज्यते दण्ड्यः,' दण्ड जो कार्षापण आदि राजनियत मुद्रा आदि जुर्माना उससे संयुक्त किया जाय । पदार्थ निर्वचन । "दण्डः"-'दण्ड' धारणार्थक 'दद्' धातुसे बनता है । "धार्यते ह्येषोऽपराधेषु राजाभिः" राजा लोग अपराधोंके समय इसको धारण करते हैं, इससे यह दण्ड कहाता है। 'दद्' धातुका धारण अर्थ लोक और वेद दोनों स्थलोंमें देखा जाता है। जैसे-वेदमें "विश्वेदेवाः पुष्करे त्वा ददन्ते" (ऋ०सं० ५, ३, २४, १) विश्वेदेवता पुष्करमें तुझे धारण करते हैं। और लोकमें "अक्रूरो ददते मणिम्" अक्रूर स्यमन्तक मणिको धारण करता है। औपमन्यव आचार्य, दमनक्रियाके सम्बन्धसे 'दमु उपशमे' (दि० प०) धातुसे बनता है, क्योंकि जो पुरुष अदान्त = नियमसे बाहर चलनेवाला होता है, उसे दण्डके द्वारा ही दमन करते हैं। इसीसे यह कहा गया है कि-"अदान्तोंका दमन करे" लोकमें भी जो कोई पुरुष अदान्त होता है, उसके लिये कहते हैं "दण्डमस्या- कर्षत" हे सभासद् गणों ! इसको दण्डित करो, उसीसे यह दान्त या दमनशील होगा', ऐसा निन्दामें प्रयोग किया जाता है।
२६ २ अ० १ पा० ५ खं० । [खं० ५] ‘कक्ष्या’ रज्जुः, अश्वस्य । कक्षं सेवते । ‘कक्षः’ गाहतेः । ‘क्सः’ इति नामकरणः । ख्यातेर्वा अनर्थकः अभ्यासः । किम्-अस्मिन्ख्यानम्-इति । कषतेर्वा । तत्सामान्यात्-मनुष्य कक्षः । बाहुमूल सामान्याद्-अश्वस्य । राज्ञः पुरुषः राज पुरुषः । ‘राज’ राजतेः । ‘पुरुषः’ पुरिषादः । पुरीशयः । पूरयते र्वा । पूरयति-अन्तः-इति अन्तर पुरुषम्- अभिप्रेत्य । “यस्मात् परं ना पर मस्ति किञ्चिद् यस्मान्नाणी यो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्।” इत्यपि निगमो भवति ॥ ५ ॥ अनुवादः । ‘कक्ष्याः’ नाम घोड़े की रस्सो (तंग) का है। [क्योंकि-वह] कक्ष (बगल) को सेवन करती है। [‘कक्ष’ नाम और ‘य’ तद्धित प्रत्यय ।] [पदार्थ] ‘कक्ष’ शब्द विलोडनार्थ ‘गाहू’ (भ्वा० आ०) धातुसे होता है। ‘क्स’ यह प्रत्यय है। अथवा ‘ख्या’ प्रकथने (अदा० प०) धातुसे। अभ्यास [दो बार उच्चारण] अनर्थक है। [अथवा सार्थक है] क्या इसमें बताने योग्य है? अथवा ‘कष’ (भ्वा० प०) धातुसे है। [क्योंकि-वह नित्य ही खुजली पैदा करता।] अश्वके कक्षकी समानतासे मनुष्यका कक्ष भी ‘कक्ष’ कहलाता है। घोड़े के भी बाहुके मूल स्थानको सादृश्यसे
हिन्दी निरुक्त । २७ कक्ष कहते हैं । [ समासका उदाहरण ] राज्ञका पुरुष राज- पुरुष कहलाता है । [ पदार्थ ] ‘राजन्’ शब्द दीप्ति-अर्थ ‘राजृ’ (भ्वा० उ०) धातुसे है । ‘पुरुष’ नाम पुरिषादका है। [क्योंकि—] वह पुर् नाम शरीर अथवा बुद्धिमें रहता है । [ अथवा ] पुरिशय या शरीरमें सोनेवाला होनेसे पुरुष है । अथवा ‘पूरी’ आप्यायने (चु० उ०) धातु से ‘पुरुष’ है। भीतरसे सब जगत्को व्यापन करता है, इस प्रकार अन्तर-पुरुषके अभिप्रायसे । [निगम ] जिससे पर अथवा पूर्व कुछ नहीं है, जिससे सूक्ष्म अथवा स्थूल या मोटा कुछ नहीं है, वृक्षके समान निश्चल भावसे अकेला आकाशमें खड़ा है, उससे यह सब जगत् पूर्ण या व्याप्त है ।” यह भी निगम है ॥५॥ व्याख्या-- २य, तद्धितका उदाहरण । ( तद्धितार्थ निर्वचन ) “कक्ष्या” । ‘कक्ष्या’—यह तद्धित है । घोड़ेके चारजामेके कसनेकी रस्सीको कक्ष्या कहते हैं । क्योंकि—वह कक्षको सेवन करती है, या उससे संयुक्त होती है, अथवा उसमें रहती है। पदार्थका निर्वचन । कक्षः—विलोड़नार्थक ‘गाह’ धातु (भ्वा० आ०) से ‘कक्ष’ शब्द बनता है। क्योंकि—कक्षों या बगलोंमें ही किसी दबाने योग्य वस्तुको विलोडन करता या दबाता है। ‘गाह’ धातुसे ‘क्स’ प्रत्यय जुड़नेसे ‘कक्ष’ हो जाता है। और सब कुछ जो आ- द्यन्त विपर्यय आदि होता है, वह जैसा दिखाया है, अथवा जैसा सम्भव हो, जहां तहां कार्यस्थलमें यथासम्भव योजन कर लेना चाहिये ।
३८ २ अ० १ पा० ५ खं० । अथवा 'ख्या' धातुका अनर्थक अभ्यास (दोहराये हुए धातुका पहिला रूप ) ककार है । अर्थात् 'ख्य' का 'कख्य' होकर 'कक्ष' हो गया । अथवा ककार सार्थक ही है, अनर्थक नहीं । कैसे ? “किमस्मिन् ख्यातम्” इति कक्षः । अर्थात् क्या इसमें ख्यात वा प्रसिद्ध करने योग्य कुछ नहीं। क्योंकि—देखनेमें नहीं आता, या छिपाने योग्य है। इस अर्थके अनुसार 'किंख्या' शब्द होकर ‘कक्ष' शब्द हो जाता है। अथवा—‘कष,-विलेखने' (भ्वा० प०) धातुसे ‘कक्ष' शब्द बनता है, क्योंकि—वह नित्य काल ही स्वेदशील होनेसे खुजली पैदा करता रहता है, इसीसे उसे (बगलको) नखोंसे नित्य खुजाते हैं, इस रीतिसे कषण-क्रियाके सम्बन्धसे ‘कक्ष' शब्द बन जाता है। उसके सादृश्यसे मनुष्यका कक्ष भी कक्ष कहलाता है। अश्वका भी जो बाहुका मूल देश है, वह ‘कक्ष’ कहलाता है। और उसको सेवन करनेसे अश्वके तंगको 'कक्ष्या' कहते हैं । अन्य टीकाकारोंका मत । “पूर्वं पूर्वमपरमपरं प्रविभज्य निर्ब्रूयात्” ( नि० अ० २, पा० १ ख ० ४ ) इस वाक्यकी पहिले व्याख्या की गई है, कि—“तद्धित व समास युक्त पदोंमें पहिले तद्धित व समासके अर्थका निर्वचन करना, और पदोंके अर्थका निर्वचन पीछे करना।” किन्तु कोई टीकाकार इसकी व्याख्या दूसरे प्रकारसे करते हैं कि—“पहिले जो पद हो, उसकी निरुक्ति पहले ही करना, तथा जो पद पीछे आवै उसकी व्याख्या पीछे ही करना” अर्थात् इनके मतमें यह बचन तद्धित और समासके लिये नहीं है, किन्तु पदोंके निर्वचन मात्रकी व्यवस्था करता है, इस लिये तद्धित-समासमें निर्वचन
हिन्दी निरुक्त । ३६ करनेवाले की इच्छा है, जिसे चाहे, पहिले निर्वचन करे, और जिसे चाहे पीछे ; किन्तु भगवद्दुर्गाचार्य इसमें सहानुभूति नहीं करते, उनके विचारमें पहिले व्याख्या ही ठीक है । समासका उदाहरण । “राज्ञःपुरुषो-’राजपुरुषः’ । ‘राजपुरुषः”-यह समस्त पद है । 'राजका पुरुष' यह इसका अर्थ होता है। यहां ध्यानसे देखो कि-इस वाक्यका पहिला भाग 'राजाका' यही बोला जाय तो सभी कुछ उसका प्रतीत होता है, जबकि-इसके सामने पुरुष, पद और कह दिया जाता है, तो अन्य सब पदार्थोंसे उसकी स्वता या स्वाम्यता हटकर पुरुष पर ही आ जाती है, या पुरुष शब्द अप- नेसे अन्य पदार्थोंको उसके स्वता या स्वाम्यतासे अलग करदेता है । इसी प्रकार जब उक्त वाक्यका दूसरा भाग 'पुरुष' यही बोला जाता है, तो उसका सभी स्वामी प्रतीत है, जबकि-प्रथम भाग भी उसके साथ जुड़ जाता है । तो राजाके अतिरिक्त सब स्वामी निवृत्त होजाते हैं । अर्थात्-‘राजपुरुष’ ऐसा मिलाकर बोलनेसे राजा अन्य स्वामियोंसे पुरुषको निवृत्त करके अपनेमें संयुक्त कर लेता हैं। और पुरुष भी राजाको अन्य स्वकीय पदार्थोंसे निवृत्त कर अपनेमें संयुक्त कर लेता है । इस प्रकार वे दोनों शब्द अपने अर्थोंको परस्पर मिलाकर समस्त हो जाते है । इसीसे “राज पुरुषको ले आओ” ऐसा कहने पर 'न राजाको ही लाते है' और न पुरुष मात्रको ही, किन्तु राजस्वामिक (जिसका राजा स्वामी है) पुरुषको लाते हैं । प्रयोजन यह निकला कि, समासमें भिन्न ही शक्ति होती है, जिसका अनुभव ख्याल करनेसे होता है । यह समासार्थ हुआ । यह प्रश्न हो कि-इस वाक्यमें 'राजस्वामिक' यह अर्थ कहांसे लब्ध होता है, तो इसका उत्तर यह है कि-‘प्रधान और उपसर्जन (गौण) पद दोनो मिलकर एक अर्थको कहते हैं ।
३० २ अ० १ पा० ५ खं० । पदके अर्थका निर्वचन । पूर्वोक्त नियमके अनुसार समासार्थका निर्वचन करके पदार्थका निर्वचन करते हैं-“राजा” ‘राज़ृ’ दीप्तौ, ( भ्वा० उ० ) से ‘राजा पद बनता है। क्योंकि-वह पांच लोकपालोंके शरीरसे दीप्तिमान् होता है। “पुरुषः” ‘पुरुष’ शब्द पुर् शब्द, जो शरीर या बुद्धिका नाम है, सद् ( षदॢ ) विशरण गत्यवसादनेषु ( भ्वा० प० ) धातुसे बनता है। क्योंकि-वह शरीर व बुद्धिमें विषयोंको उपलब्धि या अनुभ- वके लिये रहता है। इससे ‘पुरिषाद’ होकर पुरुष शब्द बन गया । अथवा-उसी ‘पुर’ शब्दके साथमें ‘शीङ्, स्वप्ने’ ( अदा० आ० ) धातु मिलकर ‘पुरिशय’ शब्दसे ‘पुरुष’ शब्द बना। क्योंकि-वह विशेषकर उन दोनोंमें शयन या स्थिति करता है। अथवा-पूरयति ( पूरो आप्यायने ) ( चु० ) धातुसे ही ‘पुरुष’ शब्द बना। क्योंकि-इस पुरुषसे व्यापक होनेके कारण सब जगत् पूर्ण है। अथवा-‘पूरयति अन्तः’ जिससे कि-यह भीतर ही पूर्ण रहता है, इस व्युत्पत्तिके सहारे अन्तर पुरुषके अभिप्रायसे उसी धातुसे ‘पुरुष’ शब्द बना। ( यह बात प्रासङ्गिक है । ) उक्त व्युत्पत्तिके प्रमाणमें निगम । “यस्मात् परं नापर मस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् । अर्थ-जिससे पर या अपर कुछ नहीं है, जिससे छोटा अथवा बड़ा कुछ नहीं है। यह अभिप्राय है कि-सब वही है। प्रकाश-
हिन्दी निरुक्त । ३१ स्वभाव अपने आत्मस्वरूपमें वृक्षके समान निष्क्रिय भावसे स्थित है, उसी पुरुषसे यह सब स्थावर-जङ्गम जगत् व्याप्त है ॥ ५ ॥ (खं० ६) विश्वकद्राकर्षः । 'वि' इति "चकद्र" इति श्वगतौ भाष्यते । 'द्राति' इति गति कुत्सना । 'कद्द्नाति' इति द्राति कुत्सना । 'चकद्द्वाति'— 'कद्राति' इतिततः—अनर्थकः—अभ्यासः । 'तत्- अस्मिन् अस्ति'—इति विश्वकद्रः । कल्याणवर्ण- रूपः । कल्याण वर्णस्य इव अस्य रूपम् । कल्याणं कमनीयं भवति । 'वर्ण:'—वृणोतेः, 'रूप' रोचतेः। एवं तद्धित समासान् निर्ब्रूयात् । न-वैयाकरणाय, न अनुपसन्नाय, न अनिर्दंविदे वा । नित्यं हि अवि- ज्जातुर्विज्जाने असूया । उपसन्नायतु निर्ब्रूयात् । योवा—अलं विज्जातुंस्यात् । मेधाविने, तप- स्विने वा ॥ ६ ॥ अनुवाद । [ व्याख्येय शब्द-] 'विश्वकद्राकर्ष'। [ व्याख्या-] 'वि'-यह [और-] चकद्र' यह शब्द श्वान या कुत्तेकी गति या चालमें बोला जाता है। 'द्राति' या 'द्रा' ( अदा० प० ) धातुगतिकी निन्दा [ का वाचक है ।] 'कद्-द्राति' या 'कुत्' अव्ययके साथमें 'द्रा' [ अदा० प० ] धातु, 'द्रा' के अर्थकी निन्दा [ का वाच-] है।
३२ २ अ० १ पा० ४ खं० । 'चक्रद्राति'-यह 'कद् द्राति' इस कर्त्तृवाच्य आख्यातका अन- र्थक या अर्थशून्य अभ्यास है, [ अभ्यास नाम दोहराया हुआ शब्द है । ] वह या निन्दितसे भी कुत्तेकी गति जिसमें है,-वह विश्व-कद्रु है । [ उसको आकर्षण करने [ खेंचनेवाले ] को 'विश्व-कद्राकर्ष' कहते हैं ] । [ व्याख्येय शब्द-] 'कल्याण वर्णरूप' । [ व्याख्या-] कल्याण- वर्ण या शुभ रूप वालेके समान जिसका रूप हो ।। [ विग्रहके शब्द- की व्याख्या-] 'कल्याण' नाम कमनीय या वाञ्छनीयका है। ['कमु' कान्तौ, [ भ्वा०.आ० ] धातुसे बना है । ] 'वर्ण' शब्द 'वृञ्' वरणे ( स्वा० उ० ) धातुसे है । 'रूप' शब्द 'रुच' दीप्तौ, ( भ्वा० आ०) धातुसे है। इस [ उक्त-] प्रकारसे तद्धित और समासोका निर्व- चन करे, किन्तु एक या अखण्ड पदोंका निर्वचन न करे । [ अनधिकारी-] व्याकरणके न जाननेवालेके लिये [ यह निर्वचन न सुनावे ] न अशिष्यके लिये और न, इसको न जाननेवालेके लिये । क्योंकि—अजान या मूढ़को विज्ञानमें सदा ही असूया या, अश्रद्धा या निन्दा रहती है । [ अधिकारी-] किन्तु उसके लिये जो उप- सन्न या शिष्य धर्मसे अपने पास आवे, सुनावे । अथवा समझनेमें पूर्णरूपसे समर्थ हो । धारणावाली बुद्धिवालेको अथवा तपस्वीको- [ सुनावे ।] ॥ ६ ॥ व्याख्या-- समासका द्वितीय उदाहरण । ( समासार्थ ) विश्वकद्राकर्षः'' = विश्वकद्रूवाकर्षति'—इति विश्वकद्राकर्षः । विश्वकद्रूको खेंचनेवाला, 'विश्वकद्राकर्ष' कहलाता है ।
हिन्दी निरुक्त । ३३
( पदार्थ ) :
विश्वकद्र = 'वि' और 'चकद्र' ये दोनों शब्द श्वानकी गति (चाल) अर्थमें बोले जाते हैं । अर्थात्-जो मनुष्य कुत्तोंके साथ चलता है, दोनों शब्द मिल कर उसको बोधन करते हैं। इन्हीं दोनों शब्दोंके मेलसे 'विश्वकद्र' शब्द उत्पन्न होता है। भाष्यकार 'चकद्र' शब्दकी बनावटमें और भी महत्व बताते हैं कि—व्याकरणमें 'द्रा' (अदा० प०) धातुका कुत्सा (निन्दा) अर्थ है, और 'कत्' जो 'कु' के स्थानमें आदेश होता है, उसका भी कुत्सित अर्थ है। इन दोनोंके जोड़ देनेसे 'कद्रा' शब्द बन जाता है, जिसका 'निन्दित- की निन्दा' अर्थ हो सकता है। ऐसी धातु कल्पित करके उसीके पहिले अक्षर 'क' को 'च' से बदल कर, जिसे अभ्यास कहते हैं, अनर्थक मान कर पढ़ते है, ऐसा करनेसे 'चकद्रा' धातु बन जाता है। निन्दितको निन्दा यहाँ पर इस रीतिसे होती है,—कि, कुत्तेके साथ जाना ही निन्दा है, फिर उसके साथ प्राणियोंकी हिंसा भी करना यह दूसरी निन्दा हो जाती है। इस प्रकार 'खोटी गति और खोटीसे भी खोटी गति' ये दोनो जिसमें हों, वो पुरुष 'विश्वकद्र' कहाता है, उसको किसी अपराधमें जो दूसरा मनुष्य, आकर्षण करता है, उसे 'विश्वकद्राकर्ष' कहते हैं। दूसरा प्रकार । कोई आचार्य कहते हैं कि—कुत्ता ही 'विश्वकद्र' है, क्योंकि— स्वभावसे ही इसकी हिंसाशील होनेसे कुत्सित गति होती है, और फिर उसके पैर भी विकल (बिगड़े हुए–टूटेके समान) होते हैं। इससे उसकी कुत्सितसे भी कुत्सितता है, 'वि' शब्द दोनों अर्थोंके मत्वर्थ को बतानेवाला है, जिसके योगसे प्रतीत होगा कि—ऐसी गतियों वाला, इस रीतिसे कुत्तेका नाम 'विश्वकद्र' होता है, उसे विश्वकद्राकर्ष है।
३४ २ अ० १ पा० ६ खं० । मेरी समझमें यदि 'वि, श्वन, कद्रा' ( धा०) इनको जोड़ कर विश्वकद्रु शब्द बनाया जाय तो और भी अनुकूलता पडती है। जैसे कि-"विशेषेण श्वभिः सह कद्राति ('कुत्सितां कुत्सित- तराञ्च गतिं करोति' ) इति विश्वकद्रुः । अधिकतासे कुत्तोंके साथ बुरी और बुरोसे भी बुरी गति करता है, वो 'विश्वकद्रु' होता है। रूप-समास । ( समासार्थ ) कल्याणवर्णरूपः—कल्याण वर्णके समान है रूप जिसका, वो 'कल्याणवर्ण रूप' कहलाता है। कल्याणवर्ण नाम सुवर्णका है। उसके समान जिसका रूप हो वह कल्याणवर्ण है, अग्नि या और कोई । पदार्थ । "कल्याणम्" 'कमनीयम्' क्योंकि-वह सबको प्रार्थनीय होता है, इससे वह कल्याण कहलाता है। "वर्णः"-वर्ण नाम रूपका है, क्योंकि-वह अपने आश्रय या आधारको आवरण कर लेता है। "रूपम्" 'रूप' शब्द 'रुच-दीप्तौ' ( भ्वा० आ० ) धातुसे बनता है, क्योंकि-वह प्रदीप्त होता है। उपसंहार । इस प्रकारसे तद्धित और समासयुक्त पदोंका निर्वचन करना चाहिये । चेतावनी । जो 'एकपद' शब्द हैं, उनका निर्वचन ऐसी अवस्थामें न करना चाहिये कि-जब कोई द्रोहबुद्धिसे चाहे जहां पूछे, अर्थात् अपनी बुद्धिकी प्रगाढ़ता या तीव्रता दिखानेके लिये अथवा किसी अन्य
हिन्दी निरुक्त । ३५ कारणसे स्वतन्त्रतापूर्वक निर्वचन न करे। क्योंकि-उन शब्दोंके अर्थका निश्चय प्रकरणसे या उसके समीपस्थ पदोंके सहारेसे होता है। यदि प्रकरणको न समझ कर अन्यथा ही निर्वचन करेगा, तो प्रत्यवाय या पापके सम्बन्धसे हानि होगी। जैसे कि—“जहा” (४, १, १) यह ‘एकपद’ है, यदि प्रकरण अथवा उपपदकी उपेक्षा करके इसकी व्याख्या की जाय, तो नहीं जाना जाता—‘क्या यह ‘हन्’ धातुका है, या ‘ओहाक् त्यागे’ (जुहो० प०) का ।’ जबकि—प्रकरण और उपपदकी अपेक्षासे इसका निर्वचन करते हैं, तो “मान एकस्मिन्” (ऋ० सं०-६, ३, ४८, ४) में “मावधीः” यह पद है, उसीसे-“यह ‘हन्’ धातुका ही रूप है,” यह निश्चय हो जाता है। जिस पदके प्रकरण और समीपवर्ती पदका उज्ञान हो जाता है, उसीका अर्थ करना समञ्जस या न्याययुक्त होता है, इस रीतिसे जिन शब्दोंके संस्कारोंका पता नहीं है, ऐसे ‘एकपद’ शब्दोंका निर्वचन प्रकरण अथवा उपपदकी सहायतासे किया जा सकता है। इसीलिये ‘एकपद’ शब्दोंके निर्वचनका निषेध किया है। समाम्नायके श्रवणका अधिकारी । निर्वचनका लक्षण कहा गया, किन्तु अब उस पुरुषका लक्षण कहना चाहिये, जिसके लिये, ऐसे निर्वचनवाले समाम्नायका उप- देश किया जावे। इस कारण अब उस श्रवणके अधिकारीका लक्षण कहते हैं। त्याज्य श्रोता । १—“नावैयाकरणाय”। जिसने व्याकरण-शास्त्र नहीं पढ़ा हो, क्योंकि-वह लक्षणका जानकार न होनेसे व्युत्पत्तिपूर्वक
३६ २ अ० १ पा० ६ खं० । निर्वचन करने पर भी न समझेगा तथा श्रमकी व्यर्थता होगी। २—"नानुपसन्नाय"। "क्या ही इसने बड़ा अद्भुत काम किया है, जोकि-इसने व्याकरण पढ़ लिया है"—ऐसे गौरवके साथ उस वैयाकरणको भी यह शास्त्र न पढ़ाया जाय जो गुरुका अभक्त हो। क्योंकि-धर्म सर्वथा ही अपरित्याज्य है, इससे वैयाक- रणको भी, उसीको पढ़ाना जो सच्ची शिष्यवृत्ति रखता है। ३—(क) "अनिदंविदे" वैयाकरण भी कोई जड़ होता है, जिसको समझाने पर भी नहीं समझ पड़ता। जिससे कि-इस शास्त्रमें देवता आदि अनेक सूक्ष्म पदार्थ ज्ञातव्य हैं, इसीलिये जो इस शास्त्रकी बातोंको विशेष रूपसे सम- झनेमें असमर्थ हो, उसे वैयाकरण होने पर भी न बतावे। (ख) जो आत्मवित् न हो, उसे भी न पढ़ावे। किन्तु आत्म- वेत्ता या योगीको ही इस शास्त्रका उपदेश करे। क्यो- कि—उस पुरुषके आत्मज्ञानसे सब पाप दूर होजाते हैं, इसलिये वह थोड़े ही यत्नसे सूक्ष्म अर्थोंको जान- नेमें समर्थ होता है। (ग) अथवा—किसी शास्त्रके जाननेवालेसे 'इदं वित्' पदका प्रयोजन है, जिसने पहिले कोई भी शास्त्र न पढ़ा हो, उस अनिदंविद, मलिन या संस्कार-शून्यहृदयको यह शास्त्र उपदेश नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि—जिस पुरुषको किसी प्रकारका भी विज्ञान नहीं होता, वह स्वयम् न समझता हुआ अपने दोषको आचार्यमें ही लगाता है, कि—"आप ही गुरु नहीं समझता है, मुझे क्या समझावेगा" इसलिये जिसने पहिले अन्य शास्त्र नहीं पढ़ लिया हो, तथा किसी प्रकारका शास्त्रके जाननेके लिये मनमें जिसे खेद न हो, उसे निरुक्त शास्त्र नहीं पढ़ाना।
हिन्दी निरुक्त । ३७ ग्राह्य अधिकारी । १-जो कोई भी पुरुष मेधावी हो, जिसे जन्मान्तरोंके अनुभवोंके संस्कार हो, अथवा तपस्वी हो, ये चाहे व्याकरण न भी पढ़े हों, किन्तु दोनोंको यह शास्त्र पढ़ाना चाहिये । क्योंकि-इन दोनों प्रकारके पुरुषोंको कुछ असाध्य नहीं है। जैसे-पूर्वकालमें तपके प्रभावसे ही स्वयम् ही ऋषियोको वेदार्थका प्रादुर्भाव होगया था, इसो प्रकार मेधावी पुरुष भी स्वयम् उत्प्रेक्षा करनेमें समर्थ हो सकता है, फिर उससे कहा जाय तो समझनेमें आश्चर्यही क्या है। अथवा और कोई पुरुष दृढ़ग्राही वा स्थिरमति शास्त्रके अर्थको समझनेमें समर्थ हो, ऐसे मनुष्यके लिये सर्वथा ही निर्वचन करे । किन्तु जो शरणागत न हो, उसके लिये कभी न उपदेश करे, चाहे वो तपस्वी, मेधावी तथा दृढ़ग्राही क्यों न हो ? जैसा कि-कहा है। “यश्चान्यायेन निब्रूयात् यश्चान्यायेन पृच्छति । तयोरन्यतरो मृत्युं विद्वेषं वाधिगच्छति ॥ ६॥” अर्थः—जो अन्यायसे निर्वचन करे और जो अन्यायसे पूछे, उन दोनोंमें जो दोषी हो वह, मृत्युको या विद्वेषको प्राप्त होता है। ( खं० ७ ) “विद्याह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानुजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथास्याम् ॥ य आवृणोत्यवितथेन कर्णा व दुःखं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् । तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत्कतमच्च नाह ॥
३८ २ अ० १ पा० ७ खं० । अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणाऽवा । यथैव ते न गुरोर्भोजनीया- स्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तत् ॥ यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । यस्ते न द्रुह्येत्कतमच्च नाह तस्मै माब्रूया निधिपाय ब्रह्मन् ॥” इति-। निधिः शेवधिः,-इति ॥ ७ ॥ विद्याकी अधिदेवता इच्छित रूप धारण कर किसी वेद-वेदाङ्गों- के जाननेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मणके पास आई, और उसके पास जा कर नम्र हो कर बोली— विद्या—हे ब्रह्मन् ! तू मेरी रक्षा कर । फिर रक्षित होकर मैं तेरे सुखका निधान या कोश बनूंगी । ब्राह्मण—मैं किससे तेरी रक्षा करू ? विद्या—जो मनुष्य दूसरेमें दोषारोप किया करते हैं, जिसकी वृत्तियां मन, वाणी, और देहमें समानतासे नहीं रहतीं, तथा जिसकी इन्द्रियां चञ्चल हों, या जिसके किसी न किसी अङ्गमें अपवित्रता बनी रहती हो, ऐसे मनुष्यके लिये मुझे मत दे । ब्राह्मण—ऐसा करनेसे क्या होगा ? विद्या—ऐसा करनेसे तुम्हारी मैं वीर्यवती हो जाऊंगी, किञ्च जो ब्राह्मण शिष्यके खुले हुए कानोंको सत्य-ब्रह्म (वेद) से भर देता है, जिसके भरनेसे उसे सुख हो जाता है, जो ब्राह्मण मोक्षके देनेवाले ज्ञानको देता हुआ उसके कानोंको भरता है, उसीको माता तथा पिता मानें, किन्तु दूसरे जन्मदाताओको नहीं, कहा भी है—