निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ७ अ० ७ पा० ६ मं
नहीं, तो उससे भिन्न मध्यम ज्योति या उत्तम ज्योति ही "वैश्वानर" है, यह सिद्ध होता है ? (उ०) भाष्यकार कहते हैं कि- यह आपत्ति ठीक है, किन्तु हमने भी "आदूतो अभिमभरत्" (७,७,५) इस मन्त्र से यह स्पष्ट रीति से सिद्ध कर दिया है कि- मध्यम व उत्तम ज्योति से भिन्न देवता अर्थात् अग्नि का ही नाम "वैश्वानर" है । इस रीति से हम और तुम दोनों समान बल हैं, किन्तु "वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में हमारे पूर्वोक्त [७,६,६-७- ८-६] छः हेतु अधिक हैं, इससे हमारा ही जय होता है ॥ भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि- हमारी समझ में इस "वैश्वानर" पद के विचार प्रसंग में हविष्पान्तीय सूक्त को बीच में [७,७,३-४-५-६-७ ८-९] डाल कर "सूर्य वैश्वानर है" "अग्नि वैश्वानर है" इत्यादि रीति से एक ही ज्योति तीन रूपों से स्थित है, यह बात मन्त्रों के भाव जान- ने के लिए दिखाई है, कि- ऐसे २ शब्दों के अर्थ व उनके न्याय तथा युक्तियों में जब संकट उपस्थित हो, तब यहां बुद्धि- मानों की बुद्धि खिन्न या व्याकुल नहो। प्रयोजन यह है कि- मन्त्रों में ऐसे शब्दों के अर्थ निर्णय स्थल में 'वैश्वानर' शब्द पर दिखाई हुई युक्तियों से लाभ उठाना चाहिये । यह इस विषय का एक उदाहरणमात्र दिया गया है ॥७(९)॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तम पादः ॥७,७॥
हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं० निरुक्त के सप्तम अध्याय का खण्ड सूत्र.— [१ म पा०-] अथातः (१) इन्द्रोदिवः (२) (यथैतदिन्द्रः) परोक्षकृताः (३) तद्यैन (अथाप्यष्टौ) (४) [२ य पा०-] तिस्र एव देवताः (५) अथाकारचिन्तनम् (६) अपुरुषविधाः (७) [३ य पा०-] तिस्रएव (८) पूषात्वेतः (९) अथैतानि (१०) अथैतानि (एतेष्वेव) (११) सन्त्राः (उष्णिक्) (वृहती) (१२) जगती (इतीमा) (१३) [४र्थ पा०- अथातः (१४) अग्निमीले (१५) अग्निः पूर्वेभिः (१६) अभिप्रवन्त (१७) इन्द्रंमित्रम् (१८) [५म पो०-] जातवेदाः (१६) (जातवेदसे) प्रनूनम् (२०) [६ष्ठ पा०-] वैश्वानरः (२१) वैश्वानरस्य (२२) प्रनूमहित्वम् (एषांलोकानाम्) (अथापि) (अयमेवाग्निः) (अथादित्यात्) (अथयोनि) (समानमेतत्) (२३) [७म पा०-] कृष्णं नियानम् (वैश्वानरोथः) (२४) हविष्पान्तम् (२५) अपामुपस्थे (२६) मूर्द्धा भुवः (२७) स्तोमेन (२८) यदेदेनम् [२९] यत्रावदेते (३०) यावन्मात्रम् (३१) एकत्रिंशत् ॥ इति निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः ॥७,७॥ इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥७,७॥
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥८॥ प्रथमः पादः । ( खं० १ ) ( अथ त्रयोदश पदानि ) (निघ०-) द्रविणोदाः ॥१॥ (निरु०-) द्रविणोदाः कस्मात् ? धनं ‘द्रविणम्’- उच्यते,-यद्-एनद्-अभिद्रवन्ति। बलं वा ‘द्रवि- णम्’-यद्-एनेन अभिद्रवन्ति । तस्य दाता द्रवि- णोदाः । तस्य एषा भवति--॥१॥ अर्थः-द्रविणोदाः (१) यह देवता-पद कैसे ? धन 'द्रविण' कहलाता है । क्योंकि-उसे उसके अर्थी-चाहने वाले अभिद्र- वण करते हैं-सामने दौड़ते हैं, इससे वह 'द्रविण' ( कर्म- वाच्य ) है । अथवा बल 'द्रविण' (करणवाच्य ) है ! क्यों कि-इससे संयुक्त होकर शत्रुओं के अभिमुख द्रवण करते हैं- दौड़ते हैं। उस (द्रविण) का दाता-बल का दाता-अथवा धनका दाता “द्रविणोदस्” (द्रविणोदाः) होता है। उस (द्रविणोदस्) नाम की प्रधानता से स्तुति वाली यह ऋचा है-जहां 'द्रविणोदस्' नाम प्रधान = विशेष्य है, और अन्य पद उसके विशेषण रहते हैं ऐसी यह ऋचा है [ जिसे देख कर ऋषि ने इस पद को देवतो पदों के समाम्नाय में समा- म्नाम किया = पढ़ा है ]-॥१॥
हिन्दी निरुक्त (१२७) ८ अ० १ पा० २ खं (खं० २) [निरु०-] "द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवमीलते ॥” [ऋ०सं०१,१,२९,१] द्रविणोदा यः, तम् । 'द्रविणसः' इति-द्रविणसादिनः इति वा। द्रवि- णसानिनः इति वा । 'द्रविणसः' तस्मात् पिबतु-इति वा । “यज्ञेषु देवमीलते” । याचन्ति । स्तुवन्ति । वर्द्धयन्ति । पूजयन्ति- इति वा ॥ तत्तं को द्रविणोदाः ? इन्द्रः-इति क्रौष्टुकिः । स बलधनयोर्दातृतमः, तस्य च सर्वा बलकृतिः । “ओजसो जातमुतमन्य एनम् ।” (ऋ०सं० ८ ३, ४,५) । इति च आह ॥ अथापि अग्निं 'द्राविणोदसम्' आह । एष पुनः एतस्माज्जायते । “यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान” । (ऋ०सं०२,६, ७,३) । इत्यपि निगमो भवति ॥ अथापि ऋतुयाजेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति। तेषां पुनः पात्रस्य 'इन्द्रपानम्'-इति भवति ।
हिन्दी निरुक्त ( १२८ ) ८ अ० १ पा० २ खंड अथापि एतं सोमपानेन स्तौति ॥ अथापि आह- “द्रविणोदाः पिबतु द्रविणोदसः” [ऋ०सं० २,८,१,४] इति ॥२॥ अर्थ:- “द्रविणोदाः” यह ऋचा मेधातिथि ऋषिकी है। (क) ‘द्रविणसः’ [द्रविणसानिनः] द्रव्य के लोभ से कर्म में बैठने वाले अथवा (द्रविणसानिनः) गो आदि रूप धन के भजने वाले या देवता के हविः के भजने वाले ‘ग्रावहस्तासः’ सोमके कूटने के अर्थ पत्थरों को हाथ में लिए हुए ऋत्विज् ‘अध्वरे’ अग्निष्टोम आदि यज्ञ में ‘यज्ञेषु’ हविः के दानों में अथवा यज्ञ के स्थानों में [यः] जो ‘द्रविणोदाः’ धन या बल का देने वाला है, (सम् उस ‘देवम्’ देवको ‘ईळते’ (याचन्ति) जांचते हैं (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं (वर्द्धयन्ति) बढ़ाते हैं अथवा (पूजयन्ति) पूजते हैं [वह द्रविणोदस् (धन बल का देने वाला) देव हमें धन बल देवे, यह हम चाहते हैं।] (ऐसी आशिषा जोड़ कर मन्त्र का अर्थ पूरा किया जाता है।)॥ (ख) (यं) ‘देवं’ (द्रविणोदसम्) ‘अध्वरे’ ‘यज्ञेषु’ ‘ग्राव- हस्तासः’ (ऋत्विजः) ‘ईळते’ (सः देवः) ‘द्रविणोदाः’ ‘द्रविणसः’ (अस्मात् सोमात् द्रविणसंभक्तुः आदाय स्वमंशं पिबतु एतद् आशास्महे) जिस द्रविणोदस् देवको अध्वर = यज्ञ में यज्ञ के स्थानों में पत्थरों को हाथ में लिये हुए ऋत्विज् स्तुति करते हैं; वह द्रविणोदस् = धन और बल का दाता देव ‘द्रविणसः’ इस सोमसे उसके भजने वाले ऋत्विज् से लेकर अपने अंश को प्राप्त करे। यह हम चाहते हैं।
हिन्दी निरुक्त ( १२६ ) ८ अ० १ पा० २ खं० भाष्यकार ने "द्रविणोदाः" इस मन्त्र की उक्त रीति से दो व्याख्याएं की हैं। पहिली में 'द्रविणोदाः' इस प्रथमा- न्त को द्वितीयान्त और 'द्रविणसः' यह प्रथमाबहुवचनान्त 'ग्रावहस्तासः' इसको समानाधिकरण ऋत्विजों का विशेषण किया है। पहिला पद 'ईळते' इस क्रिया पद में कर्म कारक और दूसरा कर्त्तृ कारक होता है 'ऋत्विज्' द्रविणोदा को स्तुति करते हैं । एवम् दूसरी व्याख्या में 'द्रविणोदाः' यह पहिला पद यथास्थित प्रथमान्त ही रहता है, और दूसरा 'द्रविणसः' पद पञ्चमी का एक वचन है। पहिला पद अध्या- हार की हुई 'पिवतु' क्रिया में कर्त्तृ कारक और दूसरा अपा- दान कारक होता है- "द्रविणोदाः देवता द्रविणस् सोमसे अपना अंश पीवे" ऐसा करने में भाष्यकार को ये दो बातें बाध्य करती हैं, कि मन्त्र में दो प्रथमान्त पद कर्त्ता होने के योग्य प्रतीत होते हैं- 'द्रविणोदाः' और 'ग्रावहस्तासः, । पहिला पद प्रथमा का एक वचन है, और दूसरा प्रथमा का बहुवचन है, इसी से ये आपस में विशेषण तथा विशेष्य नहीं होसकते । पहिला पद देवता का नाम है, और दूसरा ऋत्विजों का, इस कारण भी ये आपस में विशेष्य विशेषण नहीं होसकते । दूसरे मन्त्र में 'ईळते' (स्तुति करते हैं) यह एक ही क्रिया पद है, तथा बहुवचनान्त है, इसका कर्त्ता भी बहुवचन होता है, इस कारण 'द्रविणोदाः' यह एक वचन इसका कर्त्ता नहीं होसकता और देवता स्तुति किया जाता है, किन्तु करता नहीं इस लिये भी वह 'ईळते' का कर्त्ता नहीं होसकता । सुतराम् विना
हिन्दी निरुक्त ( १३० ) ८ अ० १ पा० २ खं० किसी उपाय के 'द्रविणोदाः' यह प्रथमा का एकवचन मन्त्र में उपयुक्त नहीं हो सकता इस कारण भाष्यकार ने ये दो प्रकार की व्याख्यायें की हैं, दोनों ही प्रकार से मन्त्र का अर्थ ठीक हो जाता है, और यह देवता का नाम 'द्रविणाः' पद भी उपयुक्त हो जाता है । पहिली व्याख्या में प्रथमान्त से द्वितीयान्त का काम लेने में 'यद्' शब्द और 'तद्' शब्द का अध्याहार उपाय किया है, इस उपाय से किसी पद को किसी विभक्ति में भी लिया जा सकता है । इसे व्याख्या में 'यद्वृत्त' कहते हैं । जैसे- 'यः द्रविणोदाः तम् ईलते' अर्थात्- जो द्रविणोदस् है, उसको स्तुति करते हैं । यहां 'यद्' 'तद्' शब्दों के सहारे से प्रथमान्त पदने ही द्वितीयान्त का कार्य दे दिया । ऐसे ही प्रयोजन के अनुसार अन्यत्र भी किया जा सकता है । दूसरी व्याख्या में 'पिबतु' क्रिया के अध्याहार करने से और 'द्रविणसः' को पञ्चमी मानने से ( जैसा कि- व्याकरण में हो सकता है ) 'द्रविणोदाः' यह प्रथमान्त ही रह जाता है । क्योंकि- अब यह 'पिबतु' क्रिया का कर्त्ता हो जाता है, किन्तु 'ईलते' का कर्म नहीं । उक्त कर्त्ता में प्रथमा विभक्ति ही होती है । सो कौन द्रविणोदस् ( द्रविणोदा ) है ? कौष्टुकि आचार्य मानते हैं कि-इन्द्र है क्योंकि- वह बल और धनका अति दान करने वाला है, और सब बल का कार्य उसी इन्द्र का है, इससे इन्द्र ही 'द्रविणोदाः' है । और कहता है । “ओजसो जातमुत मन्य एनम्” अर्थात्-(अहम्)
हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ८ अ० १ पा० २ वं मैं 'एनम्' इस इन्द्रदेवको 'ओजसः' किसी अतिमहान् बल से 'जातम्' उत्पन्न हुआ 'मन्ये' मानता हूं । [ क्योंकि-यह अतिबलवान् देखा जाता है । ] जो बलवान् होता है, वही बलका दाता हो सकता है, इस लिये इन्द्र ही द्रविणोदाः है । और भी यह दूसरा हेतु इन्द्रके द्रविणोदस् होने में है- मन्त्र का द्रष्टा = देखने वाला ऋषि अग्नि को द्राविणोदस कहता है। [ "द्रविणोदाः पिवतु द्राविणोदसः" जिसका पुत्र द्राविणोदस अग्नि है, वही द्रविणोदस् है ॥ ] और यह अग्नि इसी इन्द्र से उत्पन्न होता है, प्रयोजन यह कि- इन्द्रका ही पुत्र है। क्योंकि- “यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान" अर्थात् जिस इन्द्र ने दो पत्थरों के भीतर अग्नि को उत्पन्न किया था। यह भी निगम है। "अथापि०" और भी यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? ऋतुयाज मन्त्रों में- जिस से ऋतुओं का यजन होता है, उन मन्त्रों में द्राविणोदस = द्रविणोदस् शब्द वाले वचन हैं। उससे क्या ? उन मन्त्रों का जो पात्र होता है,-जिससे उनका सम्बन्धी होम होता है, उस पात्र की "इन्द्रपान" यह समाख्या = संज्ञा स्वयम् मन्त्र में आई हुई है। जैसे- "होता यक्षद्देवं द्रविणोदसम्-अपाद्धोत्रादपा- त्पोत्रादपान्नेष्ट्रात्तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यमिन्द्रपानं देवो द्रविणोदा द्रविणसः स्वयमायुष्यात् स्वयमभि-
हिन्दी निरुक्त ( १३२ ) ८ अ० १पा० २खं
गूर्यात् स्वयमभिगूर्त्तया होत्रयर्तुभिः सोमस्य पि- बत्वच्छावाक यज" । “होता यक्षद्देवम्” यह मन्त्र अच्छावाक ऋत्विज् के प्रति प्रैष = प्रेरणा है । मैत्रावरुण बोलता है । अर्थः-‘होता' नाम ऋत्विज् ऋतुदेवताओं के मन्त्रों से प्रैष्यकर्म में अध्वर्यु ( ऋत्विज् ) के द्वारा अतिप्रेषित = प्रेरित हुआ 'द्रविणोदसं देवम्' द्रविणोदस् देवको 'यक्षत्' यजन करे । वह द्रविणोदस् देव 'होत्रात् श्रपात्' होता ( ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से = विधि से किये हुए दान से सोम को पी चुका है । 'अपात् पोत्रात्' पोता (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से सोम को पी चुका है । 'अपात् नेष्ट्रात्' नेष्टा (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से सोमको पी चुका है । अब फिर यह 'तुरीयम्' चौथा 'पात्रम्' सम्प्रदान पात्र है, जो 'असक्तम्' अशुद्ध या अपूर्ण है, 'अमर्त्यम्' जिसे पीकर नहीं मरता अथवा जो मनुष्य योग्य है- जिसे मनुष्य से अन्य ( देव ) पान कर सकते हैं, उस 'इन्द्रपानम्' इन्द्र के पीने योग्य 'द्रविणसः' सोम के पात्र को 'द्रविणोदाः स्वयम् आयूयात्' आप द्रविणोदस् देव भले प्रकार मिलावे 'स्वयम् अभिगूर्यात्' आप उठावे फिर 'अभिगूर्त्तया होत्रया' अपनी चाही हुई स्तुति से दिया हुआ जो 'सोमस्य' सोम का अंश, उसे 'स्वयम् ऋतुभि' पिबतु' आप द्रविणोदस् देव ऋतु देवताओं के साथ पीवे 'अच्छावाक! यज' हे अच्छावाक ! ( ऋत्विज् ! ) तू यजन कर, तू भी ऐसा जान कर यजन कर । इस प्रकार इस इन्द्र के द्रविणोदस् नाम युक्त प्रैष मन्त्र
हिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ८ अ० १ पा० २ खं० में 'इन्द्रपान' यह पात्रकी समाख्या या नाम है, इससे जाना जाता है कि- उस से इन्द्र ही पीता है । यदि ऐसा है, तो इन्द्र द्रविणोदस् है, यह प्राप्त होता है । “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? उन्हीं ऋतुयाज मन्त्रों में इसे सोमपान से ऋषि स्तुति करता है। “होत्रात् सोमं द्रविणोदः०—०पिब ऋतुभिः” [ ऋ० सं० २, ७, २६, १ ] अर्थात्- हे द्रविणोदः ! तू होत्र से ऋतुओं के साथ सोम पी । प्रयोजन यह कि- जहां जहां सोमपान की स्तुति है, वहां वहां इन्द्र देवता है, और जो हविः जिस देवता के लिये संस्कार किया जाता है, वह उसी को दिया जाता है, इस कारण सोमपान से इन्द्र के अतिरिक्त अन्य देवता की स्तुति नहीं है, सोम का संस्कार उसी के लिये किया जाता है, अतः वहां आया हुआ 'द्रविणोदस्' नाम इन्द्र देवता के लिये ही हो सकता है। “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” अर्थात्- 'द्राविणोदसः' जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है, वह 'द्रविणोदाः' द्रविणोदस् इन्द्रदेव 'पिबतु' पीवे । “अपाद्धोत्रात्”। [ उसी अच्छावाक के प्रैष की यह याज्या है। ] [ क्रौष्टुकि आचार्य के अभिमत पूर्व पक्ष [ प्रश्न ] के
हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) ८ अ० १ पा० ३ खं० हेतु समाप्त हो गए हैं। अब शाकपूणि आचार्य के अभिमत उत्तर पक्ष [ द्रविणोदा इन्द्र नहीं, अग्नि है ] के हेतु कहे जाते हैं-। ] ॥ २ ॥ (खं० ३) (निरु०) अयमेव अग्निः द्रविणोदाः इतिशाक- पूणिः । आग्नेयेष्वेवहि सूक्तेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति ‘,देवा अग्निं धारयन्द्राविणोदाम्” [ऋ० सं० १, ७,३, १] । इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत्- स बलधनयोर्दातृतमः- इति । सर्वासु देवतासु ऐश्वर्यं विद्यते ॥ यथो एतत्- “ओजसो जातमुत मन्य एनम्” [ऋ०सं०८,३, ४, ५] । इति चाह” इति । अयमपि अग्निः ओजसा बलेन मध्यमानो जायते, तस्मात् एनम्- आह-- सहसस्पुत्रं, सहसः सूनुं, सहसो यहुम् यथो एतत्- अग्निं द्राविणोदस म्- आह इति। ऋत्विजोऽत्र द्रविणोदसः उच्यन्ते। हविषो दाता- रस्तच्च एनं जनयन्ति ।
हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ८ अ० १ पा० ३ खं० “ऋषीणां पुत्रो अधिराजएषः” (य०वा०सं०५,४)। इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत् - तेषां पुनः पात्रस्य ‘इन्द्रपानम्’ इति भवति इति । भक्तिमात्रं तद् भवति । यथा ‘वायव्यानि’ इति सर्वेषां सोमपात्राणाम् ॥ यथो एतत्- सोमपानेनएनं स्तौति इति । अस्मिन्नपि एतद्- उपपद्यते- “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रीभिः (ऋ०सं०४,३, २५, ८) । इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत्- “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” (ऋ०सं०२, ८,१,४) । इति । अस्यैव तद् भवति ॥३ (२) ॥ अर्थः- “अयमेव” यही अग्नि द्रविणोदाः है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं। क्यों कि- अग्नि के ही सूक्तों में ‘द्रविणोदस्’ शब्द युक्त प्रवाद = स्तुतिएं होती हैं। “देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्” अर्थात् देवता- ओं ने पहिले द्रविणोदा = देवताओं के अर्थ हवीरूप द्रव्यों के देने वाले अग्नि को धारण किया है। यह भी निगम है।
हिन्दी निरुक्त (१३६) ८ अ० १ पा० ३ खं० ' इस प्रकार यहां यही अग्नि 'द्रविणोदा' है, यह पक्ष स्थित है। सो यह पर पक्ष = क्रौष्टुकि- पक्ष के हेतुओं को बिना हटाए नहीं टिका हुआ जैसा ही है, इस कारण उनके निराक- रण = हटाने के अर्थ “यथो एतत्” इत्यादि रूप से कहा जाता है। “यथो एतत्” जो कि- फिर यह कहा गया है, 'वह बल और धन का बड़ा दाता है,' यह इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में : कारण नहीं है। क्यों कि- सभी देवताओं में ऐश्वर्य है। [इससे सभी देवता बल और धन के देनेवाले हैं। अतः यह हेतु इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं होसकता।] “यथोएतत्” और भी जो यह कहा है कि- “ओजसो जातमुत मन्यएनम्” अर्थात्- मैं इसे ओजसे = बल से उत्पन्न हुआ मानता हूं। यह निगम भी इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं है। क्यों कि- यह अग्नि भी ओज से = बल से मथा जाता हुआ उत्पन्न होता है, इस कारण से ऋषि इसको (अग्नि को) सहस् का पुत्र = सहस् का सूनु = सह का यहु कहता है ॥ (क) “सहस्पुत्रो अद्भुत:” (ऋ० सं० २, ५, २८, ६) । अग्नि सहस् का पुत्र अद्भुत है। (ख) “सहसः सूनवाहुतः” । (ऋ० सं० ६,५,२४,३)। हे सहस् के सूनु ! बुलाया हुआ है। (ग) “अग्ने वाजस्य गोमतःईशानः सहसो यहो”
(ऋ० सं० १, ५, २७, ४) । हे अग्नि देव ! हे सहस् (बल) के यहु (पुत्र) ! 'गोमनः' 'वाजस्य' 'ईशानः' गो आदि पशुओं से युक्त अन्न का स्वामी है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा गया है, कि- "अग्निं द्राविणोदसमाह" ऋषि अग्नि को द्रविणोदस् का पुत्र कहता है । [इसका यह अभिप्राय नहीं कि- द्रविणो दस् = इन्द्र से यह अग्नि उत्पन्न होता है किन्तु-) यहां ऋत्विज् 'द्रविणोदस्' = अग्नि के हविर्दाता कहे जाते हैं- ऋत्विज् अग्नि के द्रविणोदस् हैं- ऋत्विज् हवियों के दाता हैं, और वे ऋत्विज् इस अग्नि को उत्पन्न करते हैं, यह ऋषि के द्वारा कहा जाता है । "ऋषीणां पुत्रो अधिराज एषः" यह अग्नि देव अधिक चमकने वाला ऋषियों का पुत्र है । यह भी निगम है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा है कि- 'उन ऋतुयाजों के पात्र का नाम 'इन्द्रपान' है, यह भी इन्द्र के द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-यह भक्तिमात्र है- गुण के वश 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम है । जैसे-सोम के पात्र भिन्न २ देवताओं के होते हैं, तो भी उन सब का 'वा- यव्य' नाम है, किन्तु वे इस कारण वायु देवता के ही नहीं होजाते, यह किसी गुण के कारण उनका नाम है = समाख्या है । इस कारण 'द्रविणोदस्' नाम-युक्त मन्त्र में 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम होने से इन्द्र द्रविणोदस् नहीं हो सकता । "यथो एतत्" और भी फिर यह कहा गया है, कि-इस इन्द्र को सोम पान से स्तुति करता है, इससे द्रविणोदस् इन्द्र
हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ८ अ० १ पा० ३ खं यह भी कारण नही हो सकता । क्योंकि-इस अग्नि में भी यह उपपन्न होता है—घटता है । “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः” अर्थात्- हे भगवन् ! अग्निदेव ! इकट्ठे इकट्ठे तुम्हें आश्रयण करने वाले मरुतों के साथ ( त्वम् ) तू मोद करता हुआ सोम को पी । यह भी निगम है । इस प्रकार इस मन्त्र में सोमपान से इस अग्नि की भी स्तुति है, इस कारण सोमपान इन्द्र का ही लिङ्ग नहीं है । “यथो एतत्” और भी यह कहा है कि- “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है वह द्रविणोदस् सोम को पान करे । यह भी इन्द्रके द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-इस अग्नि का ही यह निगम है । ऋतुयाजों में अग्नि भी सोम का भागी है । क्योंकि- उन में “वनस्पते० ०द्रविणोदः” पिब ऋतुभिः” ( ऋ०सं०२,८,१,३ ) हे ‘वनस्पते!’ अग्नि देव ! हे ‘द्रविणोदः !’ ( त्वम् ) तू ‘ऋतुभि’ ऋतुओं के साथ सोम को पान कर । यहां ‘वनस्पते’ संबोधन पद के साथ समानाधिकरण ‘द्रविणोदस्’ विशेषण सम्बोधन है, इस कारण वनस्पति के अतिरिक्त और कोई द्रविणोदा नहीं हो सकता, और वनस्पति फिर निःसन्देह अग्नि है, “वह देवत्रा दिधिषो हवींषि” हे ‘ दिधिषो !, धारण करने वाले ( त्वम् ) तू ‘देवत्रा’ देवताओं के लिये ‘हवींषि’ हविष्यों को ‘वह’ लेजा । इस मन्त्र में हविः के लेजाने के संयोग से और
हिन्दी निरुक्त ( १३६ ) ८ अ० १ पा० ४ खं० स्विष्टकृत् के विकार के श्रवण से अग्नि द्रविणोदस् है, किन्तु इन्द्र नहीं ॥ ३ (२) ॥ ( खं० ४ ) (निरु०-) “मेद्यन्तु ते वह्नयो येभिरीयसेऽरिष- ण्यन्वीलयस्वा वनस्पते । आयूया धृष्णा अभि- गूर्या त्वं नेष्ट्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः ॥” ( ऋ०सं० २,८,१,३ ) ॥ मेद्यन्तु ते वह्नयो वोढारः, यैः यासि अरिष्यन् दृढीभव, आयूय धृष्णो अभिगूर्य त्वं नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यात् । ‘धिष्ण्यो’ धिषण्यः । धिषणाभावः । ‘धिषणा’ वाक् । धिषेर्दधात्यर्थे । धीसादिनी इति वा । धीसानिनी इति वा । ‘वनस्पते’ इति एनम्-आह । एष हि वनानां पाता वा । पालयिता वा । ‘वनं’ वनोते । “पिब ऋतुभिः” कालैः ॥४(३)॥ इति अष्टमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥८,१॥ अर्थः-जैसे यहां ऋतुयागों में-“मेद्यन्तु ते वह्नयः” [ ऋ०सं ०२,८,१,३ ] यह ऋचा है । यह गृत्समद ऋषि की है। इसका जगती छन्द और ऋतु देवता है ।
हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ८ अ० १पा० ४खं 'वनस्पते ' हे भगवन् ! वनस्पति देव ! हे 'द्रविणोदः!' 'ते' तेरे 'वह्नयः' ( वोढारः ) वाहन = घोड़े 'मेद्यन्तु' ( स्नि- ह्यन्तु ) स्नेह करें, 'येभिः' ( यैः ) जिनसे ( त्वम् ) तू 'ईयसे' ( यासि ) गमन करता है । 'अरिष्यन्' किसी से भी न मारा जाता हुआं । 'वीलयस्व' अपने आपे को दृढ करले, [ -सोम पान के अर्थ ] । 'धृष्णो' हे शत्रुओं को धमकाने वाले ! 'आयूय' अंगुली से मिला कर 'अभिगूर्ये' उठा कर 'नेष्ट्रात्' ( नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यांत ) नेष्टा के आसन से या नेष्टा के 'वषट्' मन्त्रके उच्चारण से दिये हुए सोम से 'त्वम्' तू 'ऋतुभिः' काल देवताओं के साथ 'सोमम्' अपने अंश (भाग) सोम को 'पिब' पान कर ! [ यह हम कहते हैं । ] 'धिष्ण्य' क्या ? धिषण्य । धिषण्य ही क्या ? धिषणा वाक् ( वाणी ) होती है, उसके अर्थ यह रखा जाता है, उस के पीछे बैठा हुआं होता शस्त्र = बिना गाए हुए मन्त्रों से स्तुति करता है । 'धिषणा' क्या ? वाक् वाणी । कैसे ? धारणार्थक 'धिष्' धातु से है । क्योंकि- वह अर्थ को धारण करती है । अथवा यह 'धीसादिनी' होने से धिषणा है । 'धीसादिनी' 'धी' बुद्धि अथवा कर्म उस पे बैठने वाली । अथवा 'धीसानिनी' होने से यह धिषणा है । क्योंकि- वह बुद्धि को सानती है- भजती है । “वनस्पते !” यह सम्बोधन पद इस 'द्रविणोदम्' को कहता है, इससे 'द्रविणोदस्' अग्नि है । अग्नि 'वनस्पति' कैसे है ? “एषहि०” क्योंकि- यह वनों का पाता है, अथवा पालक
हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ८ अ० २ पा० १ खं० करने वाला है। [ क्योंकि-यह वनों के = वृक्षादिकों के भीतर रहता हुआ भी जलाने को समर्थ होता हुआ भी उन्हें जलाता नहीं, इसी से उनका पालक है। ‘पाता’ और ‘पालयिता’ दोनों पदों में धातुओं का भेद है; और अर्थ एक ही है।] ‘वन’ कैसे संभजनार्थक ‘वन’ (त०उ०) धातु से है। क्यों कि- उसे काठ, फल, फूल आदि के लिये सेवन किया जाता है। “पिब” ऋतुओं के सहित = कालों के सहित पी। [ यह देवता पद के विचार का न्याय, जैसा कि ‘द्रविणोदस्’ पद पर दिखाया है, सर्वत्र देवता पद के विचारार्थ ग्राह्य है, ऐसे विचारों से शिष्य की बुद्धि बढती है।] ॥ ४ (३) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमोऽध्यायस्य प्रथमः पादः ॥८,१॥ द्वितीयः पादः । ( खं० १ ) निघ०-इध्मः ॥२॥ तनूनपात् ॥ ३ ॥ नराशंसः ॥४॥ ईलः ॥५॥ बर्हिः ॥ ६ ॥ द्वारः ॥७॥ उषासानक्ता ॥८॥ दैव्याहो- तारा ॥६॥ तिस्रोदेवीः ॥ १० ॥ त्वष्टा ॥११॥ वनस्पतिः ॥१२॥ स्वाहाकृतयः ॥ १३ ॥ इति त्रयोदश (१३) पदानि । (निरु०) अथात आप्रियः । आप्रियः कस्मात् ? आप्नोतेः । प्रीणातेर्वा ।
हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ८ अ० २ पा० १ खं० “आप्रीभिराप्रीणाति” इति च ब्राह्मणम् । तासाम्-‘इध्मः’ प्रथमागामी भवति । ‘इध्मः’ समिन्धनात् । तस्य–एषा भवति॥१(४)॥ अर्थः-“अथातः” यहां से ‘आप्री’ देवताओं का अधि- कार है- ‘इध्म’ (२) पद से ‘स्वाहाकृतयः’ (१३) पद तक कुल बारह (१२) आप्री कहे जाते हैं । ‘आप्री’ कैसे ? व्याप्ति अर्थ में ‘आप्’ (स्वा०उ०) धातु से है । क्योंकि- वे लोक को व्यापन करते हैं । अथवा तर्पण या तृप्ति अर्थ में ‘प्री’ (क्र्या०उ० धातु से है । क्योंकि- वे हवि- ष्यों से या स्तुतियों से तृप्त किये जाते हैं । और “आप्रीभिः-आप्रीणाति” अर्थात्- ‘आप्री’ नाम वाली ऋचाओं से ( होता ऋत्विज् उन्हें ) आप्रीणन = भले प्रकार तृप्त करता है । यह ब्राह्मण है । “तासाम्०” उन आप्री देवताओं में पहिले आने वाला ‘इध्म’ ( इन्धन देवता ) है । ‘इध्म’ (इन्धन) क्यों ? समिन्धन से । क्योंकि-उस से अग्नि समिन्धन किया जाता है-जलाया जाता है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥१(४)॥ व्याख्या । यहां अब देवताओं के नामों की व्याख्या चल रही है। उनमें अग्नि (निघ० अ० ५ खं० १पद १) जातवेदाः (निघ०
हिन्दी निरुक्त ( १४३ ) द० अ० २ पा० १ खं० अ० ५ ख० ? पद ०२) वैश्वानर (निघ० अ० ५ खं० १ पद ०३) द्रविणोदाः (निघ० अ० ५ खं०२ पद० १) ये चार शब्द व्याख्यान किये जाचुके हैं। दूसरे खण्ड के कुल १३ शब्दों में से 'इध्म' आदि बारह (१२) शब्द अवशिष्ट हैं, इनका 'आप्री' नाम प्रसिद्ध है, इसीसे आचार्य ने निघण्टु अ० ५ खण्ड २ में इध्म शब्द पर ही "अथात आप्रियः" यह अधिकार की सूचना दी है, ये बारह शब्द यहाँ निघण्टु ग्रन्थ में जिस क्रम से पढे हैं, उसी क्रमसे ⁜प्रैष ग्रन्थ = मन्त्रभाग के स्थल विशेष में भी पढ़े हुए हैं, अथवा वहाँ जिस क्रमसे ये शब्द पढ़े हैं, उसी क्रम से वहां से इस समाम्नाय में उठा लिये हैं, इस कारण इनके क्रम (सिलसिले) का प्रयोजन यहाँ वही है, जो वहाँ है, किन्तु इन 'इध्म' आदि शब्दों के क्रम पूर्वक उठाए हुओं का क्रम देखकर यह प्रश्न उठ आता है कि- क्या 'अग्नि' आदि जो और २ शब्द इस काण्ड में पढे हुए हैं, उनका वह क्रम निघण्टु में किसी प्रयोजन के साथ में होसकता है, या उनकी गणना ही जैसे तैसे अपेक्षित है ? यद्यपि 'इध्म' आदि आप्री देवताओं के नामों का
⁜ यह प्रैषाध्याय के नाम से ऋग्वेद मन्त्रसंहिताके परिशिष्ट भाग के अन्त में एक प्रकरण ग्रन्थ है। उसमें १३ प्रयाजप्रैष ८ पाशुक प्रैष ११ अनुयाज प्रैष एक सूक्त वाक प्रैष और ३६ सुत्या में सवनीय प्रैष हैं। इस प्रकार कुल वहां पर ६९ प्रैष मन्त्र हैं। इसी का नाम प्रैषग्रन्थ या प्रैषाध्याय है।