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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

५. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २१ तन्त्रान्तरसमाचाराच्चैतत् प्रत्येयमिति । 'परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम्' इति हि तन्त्रयुक्तिः ॥ ४ ॥ व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ ० (ख) अनुमानलक्षणम् अथ तत्पूर्वकं२ त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥ ५ ॥ 'तत्पूर्वकम्' इत्यनेन लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धदर्शनं लिङ्गदर्शनं चाभि- सम्बध्यते । लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बद्धयोर्दर्शनेन लिङ्गस्मृतिरभिसम्बध्यते । स्मृत्या लिङ्गदर्शनेन चाप्रत्यक्षोऽर्थोऽनुमीयते । पूर्ववदिति-यत्र कारणेन कार्यमनुमीयते, यथा-मेघोन्नत्या 'भविष्यति वृष्टिः' इति । शेषवत् तत्-यत्र कार्येण कारणमनुमीयते, पूर्वोदकविपरीतमूदकं नद्याः पूर्णत्वं शीघ्रत्वं च दृष्ट्वा स्रोतसोऽनुमीयते-'भूता वृष्टिः' इति । सामान्यतो- उसका इस तन्त्र ( न्यायदर्शन ) में खण्डन नहीं किया गया, अतः सूत्रकार को मन का इन्द्रियत्व अभिप्रेत है—ऐसा मान लेना चाहिये; क्योंकि तन्त्रकारों की एक यह भी युक्ति है कि दूसरे मत का यदि हम खण्डन नहीं करते तो वह हमें मान्य है ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष का व्याख्यान कर दिया गया ॥ प्रत्यक्ष का निरूपण करने के बाद अब अनुमान का निरूपण करते हैं— प्रत्यक्षपूर्वक अनुमितिकरण को 'अनुमान' कहते हैं। वह तीन प्रकार का होता है— १. पूर्ववत्, २. शेषवत् तथा ३. सामान्यतोदृष्ट ॥ ५ ॥ यहाँ 'तत्पूर्वक' इस पद से लिङ्ग (हेतु) लिङ्गी ( हेतुमान् ) का सम्बन्ध (व्याप्ति)- दर्शन तथा लिङ्गदर्शन—इन दोनों का भी परामर्श कर लेना चाहिये । सम्बद्ध हेतु लिङ्ग- स्मृति से सम्बद्ध होता है । स्मृति और लिङ्ग-परामर्श व्यापार से अप्रत्यक्ष अर्थ का अनु- मान होता है । पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ कारण से कार्य का अनुमान हो, जैसे—बादलों के घिर जाने से 'वर्षा होगी' यह अनुमान होता है । शेषवत् उसे कहते हैं जहाँ कार्य से कारण का अनुमान हो, जैसे नदी में पहले के जल से बढ़ा हुआ जल देखकर या नदी को बढ़ी हुई, वेग से बहती हुई देख कर 'वर्षा हुई है' ऐसा अनुमान होता है । सामान्यतोदृष्ट वह कहलाता है जिसे पहले कहीं देखा हो बाद में कहीं देखे तो उसमें गति का अनुमान १. तन्त्रयुक्तिरियं बौद्धनैयायिकचक्रवर्त्तिदिङ्नागकृते 'प्रमाणसमुच्चये' दृश्यते । २. एतत्पदस्य विस्तृतं व्याख्यानं वार्त्तिकेऽनुसन्धेयम् ।

२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दृष्टम्—व्रज्यापूर्वकमन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र दर्शनमिति, तथा चाऽऽदित्यस्य; तस्मादस्त्यप्रत्यक्षाप्यादित्यस्य व्रज्येति । अथ वा—पूर्ववदिति, यत्र यथापूर्वं प्रत्यक्षभूतयोरन्यतरदर्शनेनान्यतर- स्याप्रत्यक्षस्यानुमानम्, यथा—धूमेनाऽग्निरिति । शेषवन्नाम—परिशेषः, स च प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः, यथा—'सदनित्यम्' एवमा- दिना द्रव्यगुणकर्मणामविशेषेण सामान्यविशेषसमवायेभ्यो विभक्तस्य शब्दस्य तस्मिन् द्रव्यगुणकर्मगुणसंशये—'न द्रव्यम्, एकद्रव्यत्वात्; न, कर्म, शब्दान्तर- हेतुत्वात्; यस्तु शिष्यते सोऽयम्' इति शब्दस्य गुणत्वप्रतिपत्तिः । सामान्यतोदृष्टं नाम—यत्राप्रत्यक्षे लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धे केनचिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्याद- प्रत्यक्षो लिङ्गी गम्यते, यथा—इच्छादिभिरात्मा, 'इच्छादयो गुणाः, गुणाश्च द्रव्यसंस्थानाः, तद्यदेषां स्थानं स आत्मा' इति । विभागवचनादेव त्रिविधमिति सिद्धे त्रिविधवचनं महतो महाविषयस्य न्यायस्य लघीयसा सूत्रेणोपदेशात् परं वाक्यलाघवं मन्यमानस्यान्त्यस्मिन् होता है। जैसे—सूर्य को प्रातः पूर्व में देखा गया और सायंकाल पश्चिम में देखा गया तो अनुमान हुआ 'सूर्य में गति है।' 'अथ वा' से उक्त तीनों पदों का अन्य प्रकार से व्याख्यान का उपक्रम करते हैं— पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ पहले दोनों का प्रत्यक्ष हो चुका हो परन्तु अब लिङ्ग-लिङ्गी में किसी एक को देख कर दूसरे का अनुमान किया जाय, जैसे—धूम से वह्नि का । शेषवत् उसे कहते हैं जो परिशेष ( बाकी बचा ) रह जाये । वह है सम्भाव्यमानों में से कुछ का प्रतिषेध कर देने पर बाकी बचे हुओं में कहीं भी सम्भाव्यमान न होने से उक्त प्रतिषेध के बाद अवशिष्ट का ज्ञान । जैसे—'शब्द सत् है, अनित्य भी है' ऐसा निश्चय हो जाने के बाद सन्देह होता है कि हम शब्द को क्या मानें—द्रव्य, गुण या कर्म ? तब 'शब्द द्रव्य नहीं हैं एक द्रव्य में समवेत होने से', 'शब्द कर्म भी नहीं है, शब्दान्तर का हेतु होने से' इन हेतुओं द्वारा शब्द में द्रव्यत्व तथा कर्मत्व का प्रतिषेध हो गया, बाकी बच गया गुण, अतः वहाँ अनुमान होता है—'शब्द गुण हैं' । सामान्यतोदृष्ट वह होता हैं जहाँ लिङ्ग और लिङ्गी दोनों के ही सम्बन्ध अप्रत्यक्ष हों, परन्तु किसी अर्थविशेष से लिङ्ग के साधारण्य द्वारा लिङ्गी का ज्ञान हो जाये । जैसे—इच्छादि से आत्मा का 'इच्छादि गुण हैं, गुण द्रव्य में रहते हैं, अतः ये इच्छादि जिसमें रहें वही आत्मा हैं'— यह अनुमान । विभाग कर देने से अनुमान का त्रैविध्य ज्ञात हो ही जाता, फिर सूत्र में 'त्रिविधम्' यह पद क्यों दिया ? अतिगम्भीर इस महान् न्यायशास्त्र का छोटे-छोटे सूत्रों से उपदेश करके ही आचार्य ने लाघव कर दिखाया, फिर इन छोटे-छोटे वाक्यों में भी और लाघव CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २३ वाक्यलाघवेऽनादरः, 'तथा चाऽयम्¹' इत्यम्भूतेन वाक्यविकल्पेन प्रवृत्तः सिद्धान्ते, छले, शब्दादिषु च बहुलं समाचारः शास्त्र इति । सद्विषयं च प्रत्यक्षम्, सदसद्विषयं चानुमानम् । कस्मात् ? त्रैकाल्यग्रहणात्- त्रिकालयुक्ता अर्था अनुमानेन गृह्यन्ते-'भविष्यति' इत्यनुमीयते, 'भवति' इति च, 'अभूत्' इति च । असच्च खल्वतीत मनागतं चेति ॥ ५ ॥ (ग) उपमानलक्षणम् अथोपमानम् । प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञातेन सामान्यात् प्रज्ञापनीयस्य प्रज्ञापनमुपमानमिति-'यथा गौरेवं गवयः' इति । किं पुनरत्रोपमानेन क्रियते, यदा खल्वयं गवा समानधर्मं प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तमर्थं प्रतिपद्यत इति ? समाख्यासम्बन्धप्रतिपत्तिरुप- मानार्थ इत्याह । 'यथा गौरेवं गवयः' इत्युपमाने प्रयुक्ते गवा समानधर्ममर्थ- करना उन्हें अभीष्ट नहीं था, अतः ऐसे लाघव में उनका आदर नहीं है—यह दिखाने के लिये। आचार्य का ऐसा लाघव के प्रति अनादर इस शास्त्र में 'वैसा ही यह हैं' इत्यादि वाक्य-विकल्पों द्वारा सिद्धान्त, छल, शब्द आदि के वर्णन-प्रसंग में भी बहुत जगह देखा जाता है। प्रत्यक्ष केवल वर्तमानविषयक होता है, परन्तु अनुमान वर्तमानविषयक भी होता है, अतीत व अनागत विषयक भी; क्योंकि अनुमान द्वारा त्रैकालिक ज्ञान होता है। तीनों कालों से युक्त अर्थ अनुमान द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं, जैसे 'होगा' यह अनुमान भी हो सकता है, 'है' यह भी हो सकता है, 'था' यह भी। 'असत्' का अनुमान अतीत या अनागत विषयक ही होता है ॥ ५ ॥ इस प्रकार अनुमान का व्याख्यान कर दिया गया ॥ अब उपमान का निरूपण करते हैं— (जिससे) प्रसिद्ध (पूर्वप्रमित गवादि) के साधर्म्य (सादृश्य) ज्ञान से साध्य (गवयादि- पदवाच्य) की सिद्धि हो वह 'उपमान' प्रमाण कहलाता है ॥ ६ ॥ प्रज्ञात (प्रसिद्ध गो-आदि) के सादृश्यज्ञान से प्रज्ञापनीय (गवय-आदि) का ज्ञान जिस प्रमाण से कराया जाये—उसे 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी गौ ऐसा ही गवय होता हैं'। प्रमाता जब गो के सदृश गवय को देखता है तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाण से ही वह ज्ञान हो जाता है, फिर उपमान प्रमाण यहाँ क्या नई चीज ला देगा ? वाक्यार्थश्रोता समान- धर्म (सादृश्य) को प्रत्यक्ष कर गवय को देखता ही है। किसी एक शब्द की उसके अर्थ में समाख्या का परिचय होना, यही उपमान का प्रयोजन है—ऐसा सूत्रकार का अभिप्राय १. 'चायमस्य'-इति पा० ।

२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० मिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुपलभमानः 'अस्य गवयशब्दः संज्ञा' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यते इति । 'यथा मुद्गस्तथा मुद्गपर्णी', 'यथा माषस्तथा माषपर्णी' इत्युपमाने प्रयुक्ते उपमानात् संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यमानस्तामोषधीं भैषज्याया- ऽऽहरति । एवमन्योऽप्युपमानस्य लोके विषयो बुभुत्सितव्य इति ॥ ६ ॥ (घ) शब्दलक्षणम् अथ शब्दः । आप्तोपदेशः शब्दः१ ॥ ७ ॥ आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याऽऽप्तिः, तया प्रवर्त्तत इत्याप्तः । ऋष्यार्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्त इति । एवमेभिः प्रमाणैर्देवमनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते, नाऽतोऽन्यथेति ॥७॥ है । अर्थात् 'जैसी गौ वैसा गवय होता है' इस उपमान के प्रयुक्त होने पर समानधर्म (सदृश) अर्थ को इन्द्रियार्थसन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) से प्राप्त करता हुआ 'इसकी संज्ञा गवय- शब्द है' ऐसा संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध उपमान प्रमाण से जान लेता है । 'जैसा मूंग वैसी मुद्- गपर्णी' 'जैसा उड़द वैसी माषपर्णी' यह उपमान प्रयुक्त होने पर संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को जानता हुआ उस औषध को दवा के लिये ले आता है । इसी तरह लोक में व्यवहृत अन्य उपमानों को भी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ उपमान प्रमाण का व्याख्यान समाप्त ॥ अब शब्द का निरूपण करते हैं— आप्त के उपदेश को 'शब्द' प्रमाण कहते हैं ॥ ७ ॥ साक्षात्कृतधर्मा (जिसने सुदृढ़ प्रमाणों द्वारा अर्थ का निश्चय कर लिया हो), यथा- दृष्ट (सही) अर्थ को बतलाने का इच्छा से प्रवृत्त उपदेष्टा पुरुष 'आप्त' कहलाता है । साक्षात्कृत (अर्थ के प्रत्यक्षज्ञान) के पश्चात् प्रवृत्त पुरुष आप्त कहलाता है । 'आप्त' का यह लक्षण ऋषि (त्रिकालज्ञ), आर्य (निष्पाप साधारण जन) तथा म्लेच्छ (डाकू-लुटेरे)— तीनों में समान रूप से घट सकता है । (लुटेरे भी घोर जंगल में किसी धनिक को लूट कर उस पर दया कर उसे नगर का सही मार्ग बतला देते हैं ।) इसलिये इन सभी के ऐसे शब्दव्यवहार प्रवृत्ति में सहायक होते हैं । इस प्रकार इन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रमाणों से ही सभी देवता, मनुष्य व पशु-पक्षियों के समग्र (लौकिक-अलौकिक) व्यवहार चलते हैं, उन व्यवहारों का इनसे भिन्न अन्य कोई साधन नहीं है ॥ ७ ॥ १. बौद्धाचार्यास्तु शब्दोपमानयोर्नातिरिक्तं प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति ।

१. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २५ स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥ ८ ॥ यस्येह दृश्यतेऽर्थः स दृष्टार्थः । यस्याऽमुत्र प्रतीयते सोऽदृष्टार्थः । एवमृषि- लौकिकवाक्यानां विभाग इति । किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? स न मन्येत—दृष्टार्थ एवाऽऽप्तोपदेशः प्रमाणम्, अर्थस्यावधारणादिति; अदृष्टार्थोऽपि प्रमाणम्, अर्थस्यानुमानादिति ॥ ८ ॥ इति प्रमाणभाष्यम् ॥ ३. प्रमेयप्रकरणम् [ ९-२२ ] ज्ञातुम् योग्यं किं पुनरनेन प्रमाणेनाऽर्थजातं प्रमातव्यमिति ? तदुच्यते— आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् ॥ ९ ॥ तत्राऽऽत्मा सर्वस्य द्रष्टा सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभावी । तस्य भोगायतनं शरीरम् । भोगसाधनानीन्द्रियाणि । भोक्तव्या इन्द्रियार्थाः । भोगो बुद्धिः । वह (शब्दप्रमाण) दृष्टार्थ तथा अदृष्टार्थ रूप से दो प्रकार का होता है ॥ ७ ॥ आप्त प्रयोक्ता द्वारा जिस शब्द का इसी लोक में अर्थ देख लिया गया हो वह 'दृष्टार्थ' कहलाता है । जिस अर्थ की परलोक में प्रतीति हो वह 'अदृष्टार्थ' है । इन दोनों से लौकिक वाक्यों और ऋषिवाक्यों (वेदमन्त्र) का विभाजन किया गया है । दृष्टार्थ, अदृष्टार्थ—इस विभाग की क्या आवश्यकता है, सामान्यतः एक शब्दप्रमाण ही क्यों न मान लिया जाये ? साधारण पुरुष इतना ही न समझ लें कि जिसका अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष किया जा सके—ऐसा आप्तोपदेश तो प्रमाण है, पर जिस (स्वर्गकामो यजेत-इत्यादि) का अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष न किया जा सके—वह आप्तोपदेश प्रमाण नहीं; वस्तुतः 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि आप्तोपदेश भी प्रमाण ही है क्योंकि उसके सहारे अदृष्ट अर्थ अनुमित होता है ॥ ८ ॥ प्रमाणभाष्यानुवाद समाप्त ॥ इस प्रमाणसमूह से किस अर्थसमूह (प्रमेयसमूह) का ज्ञान करना चाहिये ? इसके उत्तर में कहते हैं— आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख, अपवर्ग—ये १२ प्रमेय (प्रमाणों से जानने योग्य) हैं ॥ ९ ॥ इनमें आत्मा सभी सुख-दुःख-साधनों का द्रष्टा है, सभी सुख-दुःखों का भोक्ता है, सभी सुख-दुःख-साधनों और सुख-दुःखों को जानता है, तथा अनुभव करता है । उस आत्मा का भोगाधिष्ठान शरीर है । इन्द्रियाँ भोग के साधन हैं । इन्द्रियार्थ भोगने योग्य होते हैं । भोग बुद्धि (साक्षात्कार करनेवाली) है । सभी अर्थों को एक साथ उपलब्ध CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सर्वार्थोपलब्धौ नेन्द्रियाणि प्रभवन्तीति सर्वविषयमन्तःकरणं मनः। शरीरेन्द्रिया- र्थबुद्धिसुखवेदनानां निर्वृत्तिकारणं प्रवृत्तिः, दोषाश्च ; 'नाऽस्येदं शरीरमपूर्व- मनुत्तरं च, पूर्वशरीराणामादिर्नास्ति उत्तरेषामपवर्गोऽन्तः' इति प्रेत्यभावः । ससाधनसुखदुःखोपभोगः फलम् । दुःखमिति नेदमनुकूलवेदनीयस्य सुखस्य प्रतीतेः प्रत्याख्यानम्, किं तर्हि ? जन्मन एवेदं ससुखसाधनस्य दुःखानुषङ्गात्, दुःखेनाविरोधाद्, विविधबाधनायोगाद् 'दुःखम्' इति समाधिभावनमुपदिश्यते । समाहितो भावयति, भावयन्निर्विविद्यते, निर्विण्णस्य वैराग्यम्, विरक्तस्यापवर्ग इति । जन्ममरणप्रबन्धोच्छेदः सर्वदुःखप्रहाणमपवर्ग इति । अस्त्यन्यदपि द्रव्य- गुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः प्रमेयम्, तद्भेदेन चापरिसङ्ख्येयम् । अस्य तु तत्त्वज्ञानादपवर्गः, मिथ्याज्ञानात् संसार इत्यत एतदुपदिष्टं विशेषेणेति ॥ ९॥ (क) आत्मलक्षणम् तत्राऽऽत्मा तावत्प्रत्यक्षतो न गृह्यते। स किमाप्तोपदेशमात्रादेव प्रतिपद्यत करने में इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हो सकतीं, अतः मन को पृथक् प्रमेय मानना पड़ा । वह सभी (बाह्य-आभ्यन्तर-भेदभिन्न) विषयों का ज्ञान-साधन है। शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, सुख तथा हर्ष भय, शोकादि वेदनाओं के सम्पादनकारण को प्रवृत्ति कहते हैं। उपर्युक्तप्रवृत्तिकारण को दोष कहते हैं। 'इसका यह अपूर्व शरीर नहीं हैं, न अनुत्तर शरीर है, पूर्व शरीरों का आदि नहीं है, उत्तर शरीरों का अन्त मोक्ष है'—ऐसा प्रमेय प्रेत्यभाव कहलाता है। साधन (स्रक्चन्दनवनितातथा धूलिताड़न,, निद्रादि) सहित सुख- दुःखों का उपभोग फल कहलाता है। दुःख यह प्रमेय अनुकूलवेदनीय लक्षणवाले सुख का प्रत्याख्यानमात्र नहीं है; किन्तु साधनसहित सुखवाले मुमुक्षु को जन्म से ही दुःखानुषक्त होने से, दुःख से छुटकारा न पाये जाने से, तथा आध्यात्मिकादि विविध बाधनाओं के लगे रहने से 'यह दुःख है' ऐसी समाधि भावना का उपदेश किया गया है। मुमुक्षु समाहितचित्त होकर भावना करता है कि 'सर्वं खल्विदं दुःखम्', भावना करते हुए उसको इस दुःखरूपी संसार से ग्लानि होती है, ग्लानि होते होते वैराग्य हो जाता है, वैराग्य द्वारा वह अपवर्ग ( मोक्ष = जन्ममरणरूपी दुःख से छुटकारा ) पा जाता है। जन्ममरण- प्रवाह का उच्छेद तथा सभी दुःखों का आत्यन्तिक नाश ही 'अपवर्ग' कहलाता है। यों तो (अन्य शास्त्रों में ) प्रमेयों के अन्य भेद भी हैं, जैसे—'द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय'—आदि। उनके अवान्तर भेद से प्रमेय के इतने विभाग हो जाते हैं कि उनकी गणना ही कठिन है। यहाँ सूत्रकार को इतना ही अभीष्ट है कि तत्त्व- ज्ञान से अपवर्ग होता है, और मिथ्याज्ञान से संसार । अतः उन्होंने तदनुकूलतया इस विशेष प्रमेयसमूह का उपदेश कर दिया है ॥ ९ ॥ आत्मा का प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं होता, तो क्या वह केवल आप्तोपदेश (शब्दप्रमाण) CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१०. सू० प्रमेयप्रकरणम् २७ इति ? नेत्युच्यते; अनुमानाच्च प्रतिपत्तव्य इति । कथम् ? इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम् ॥ १० ॥ यज्जातीयस्यार्थस्य सन्निकर्षात् सुखमात्मोपलब्धवान्, तज्जातीयमेवार्थं पश्यन्नुपादातुमिच्छति, सेयमादातुमिच्छा एकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रति- सन्धानाद्भवन्ती लिङ्गमात्मनः । नियतविषये हि बुद्धिभेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एवमेकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रतिसन्धानात् दुःखहेतौ द्वेषः । यज्जातीयो- ऽस्यार्थः सुखहेतुः प्रसिद्धस्तज्जातीयमर्थं पश्यन्नादातुम्प्रयतते, सोऽयं प्रयत्न से ही जाना जायेगा ? कहते हैं—नहीं; आप्तोपदेश के बाद अनुमान से भी उस को समझना चाहिये । कैसे ?— इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख दुःख, ज्ञान—ये आत्मा के ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ १० ॥ प्रमाता जिस जातीय अर्थ-सन्निकर्ष से सुख प्राप्त करता है, वैसे ही जातीय अर्थ को पुनः देखकर उसे ग्रहण करने की इच्छा करता है, यह ग्रहण करने की इच्छा ही यतः अनेकार्थद्रष्टा के दर्शनान्तर से एकाश्रयता का सन्धान कराती है अतः किसी एक प्रमेय में दर्शन-प्रतिसन्धान कराती हुई 'आत्मा है'—इसमें हेतु है। [ बात को यों समझें— किसी वस्तु को पुनः पुनः सुखोत्पादक अनुभव करके 'यह वस्तु सुखोत्पादक है, जहाँ यह वस्तु है, वहाँ सुख है'—ऐसा व्याप्तिनिर्धारण करता है। कुछ समय बाद फिर उसी वस्तु को देखकर 'यह पूर्वानुभूत सुखवाली ही वस्तु हैं' ऐसा स्मरण करता है, तब 'यह सुख देगी'—ऐसा निगमन करके उसे ग्रहण करना चाहता है। इस इच्छा से पहले के व्याप्तिज्ञान, स्मृतिज्ञान तथा निगमन का कोई एक प्रतिसन्धाता होना चाहिये जो इच्छा कर सके, अतः इस इच्छा से अनुमान होता है कि ऐसी इच्छा करने वाला कोई आत्मा है। तात्पर्य यह है कि यह जो एक अनुभवितृ, स्मर्त्तृ, अनुमाता तथा एषिता है वही नैयायिकों के मत में 'आत्मा' कहलाता है।] शङ्का—किसी एक ज्ञाता (आत्मा) के न मानने पर भी बुद्ध्यादि के सन्तान (प्रवाह) से भी प्रतिसन्धान-व्यवस्था तो बन ही जायेगी फिर एक अतिरिक्त आत्मा मानने से क्या लाभ ? बुद्धि के प्रतिनियतविषय होने के कारण प्रतिसन्धान-व्यवस्था सम्भव नहीं है, जैसे वर्तमान बुद्ध्यादिकों का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं हो पाता । इसी तरह एक के ही अनेक अर्थों का साक्षात्कर्ता होने के कारण दर्शनप्रतिसन्धि सम्भव होने से दुःखोत्पादक विषय में द्वेष होता है। इस प्रमाता का जिस तरह का विषय सुखहेतु प्रसिद्ध है, उसी तरह के विषय को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है, यह प्रयत्न साक्षात्कर्ता तथा दर्शनप्रतिसन्धिक्कर्ता के एक हुए बिना नहीं हो सकता। बुद्ध्यादिकों की प्रवाह-व्यवस्था उनके नियत होने से

२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० एकमेनेकार्थदर्शिनं दर्शनप्रतिसन्धातारमन्तरेण न स्यात् । नियतविषये हि बुद्धि- भेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एतेन दुःखहेतौ प्रयत्नो व्याख्यातः । सुखदुःखस्मृत्या चायं तत्साधनमाददानः सुखमुपलभते, दुःखमुपलभते, सुखदुःखे वेदयते । पूर्वोक्त एव हेतुः । बुभुत्समानः खल्वयं विमृशति-किंस्विदिति, विमृशंश्च जानीते—इदमिति, तदिदं ज्ञानं बुभुत्साविमर्शाभ्यामभिन्नकर्तृकं गृह्यमाणमात्मलिङ्गम् । पूर्वोक्त एव हेतुरिति । तत्र देहान्तरवदिति विभज्यते । यथाऽनात्मवादिनो देहान्तरेषु नियत- विषया बुद्धिभेदा न प्रतिसन्धीयन्ते, तथैकदेहविषया अपि न प्रतिसन्धीयेरन्; अविशेषात् । सोऽयमेकसत्त्वस्य समाचारः स्वयं दृष्टस्य स्मरणम्, नान्यदृष्टस्य, नाहष्टस्येति; एवं खलु नानासत्त्वानां समाचारः-अन्यदृष्टमन्यो न स्मरतीति; तदेतदुभयमशक्यमनात्मवादिना व्यवस्थापयितुम् । इत्येवमुपपन्नम्—'अस्त्यात्मा' इति ॥ १० ॥ (ख) शरीरलक्षणम् तस्य भोगाधिष्ठानम्— चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ॥ ११ ॥ देहान्तर की तरह हो नहीं सकती । इसी तरह दुःखोत्पादविषयक प्रयत्न का व्याख्यान भी समझना चाहिये । सुख-दुःख-स्मृति से यह प्रमाता उनके साधनों को ग्रहण करता हुआ सुख-दुःख प्राप्त करता है, सुख-दुःख की अनुभूति करता है। इसमें अनुपदोक्त कारण ही समझना चाहिये । जानने की इच्छा करता हुआ विचार करता है कि यह क्या है, विचार करता हुआ जान जाता है कि यह यह है, जब तक इस बुभुत्सा और विमर्श का एक ही कर्ता न होगा तब तक यह ज्ञान नहीं होगा, अतः मानना पड़ेगा कि इन दोनों का एक ही कर्ता 'आत्मा' है। 'देहान्तरवत्' पद की व्याख्या करते हैं । जैसे अनात्मवादी के मत में नियतविषयक बुद्धिभेद का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं होता, उसी तरह उभयत्र समान स्थिति होने से एकदेह-अनेकदेहविषयक बुद्धिभेद भी प्रतिसन्धि में असमर्थ ही होंगे । जब यह एक प्राणी का स्वभाव है कि वह स्वयम् अनुभूत का ही स्मरण कर सकता है, न कि दूसरे द्वारा अनुभूत या अननुभूत विषय का; तो नाना प्राणियों का भी यही स्वभाव समझना चाहिये कि उनमें दूसरों द्वारा देखे गये का स्मरण दूसरा नहीं कर सकता । ये दोनों ही बातें अनात्मवादी सिद्ध नहीं कर सकते । अतः यह सिद्ध हो गया कि आत्मा है ॥१०॥ उस आत्मा के भोग का आश्रय— चेष्टाश्रय, इन्द्रियाश्रय तथा अर्थाश्रय शरीर है ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २९ कथं चेष्टाश्रयः ? ईप्सितं जिहासितं वाऽर्थमधिकृत्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य तदुपाय्यानुष्ठानलक्षणा समीहा चेष्टा, सा यत्र वर्तते तच्छरीरम् । कथमिन्द्रियाश्रयः ? यस्यानुग्रहेणानुगृहीतानि उपघाते चोपहतानि स्व- विषयेषु साध्वसाधुषु वर्तन्ते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरम् । कथमर्थाश्रयः ? यस्मिन्नायतने इन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नयोः सुखदुःखयोः प्रतिसंवेदनं प्रवर्तते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरमिति ॥ ११ ॥ ( ग ) इन्द्रियलक्षणम् भोगसाधनानि पुनः — घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः ॥ १२ ॥ जिघ्रत्यनेनेति घ्राणम्, गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनम्, रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षुः, रूपं पश्यतीति । स्पृशत्यनेनेति स्पर्शनं त्वक्स्था- नमिन्द्रियं त्वक् तदुपचारः स्थानादिति । शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्, शब्दं गृह्णातीति । एवं समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोध्यम्—स्वविषयग्रहणलक्षणानीन्द्रियाणीति । शरीर चेष्टाश्रय कैसे है ? ईप्सित या जिहासित विषय के लिए उसकी ईप्सा या जिहासा में प्रवृत्त पुरुष का उसके अधिगम के लिये किया गया स्पन्दन ही 'चेष्टा' कह- लाता है, वह जहाँ रहे, वह शरीर है । वह इन्द्रियाश्रय कैसे है ? इन्द्रियाँ जिसके स्वस्थ रहने पर स्वस्थ तथा अस्वस्थ रहने पर अस्वस्थ रहती हुई भले-बुरे कर्मों में प्रवृत्त होती हैं, वह इनका आश्रय है, वही शरीर है । वह अर्थाश्रय कैसे कहलाता है ? जिस अधिष्ठान के रहते इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न सुख दुःख का प्रतिसंवेदन प्रवृत्त होता है, वह इनका आश्रय (अवच्छेदक) है, वही शरीर है ॥ ११ ॥ अब भोगसाधनों ( इन्द्रियों ) का व्याख्यान किया जा रहा है— १. घ्राण, २. रसन, ३. चक्षु, ४. त्वक्, ५. श्रोत्र—ये भूतप्रकृतिक ( भौतिक ) इन्द्रियाँ हैं ॥ १२ ॥ जिससे सूंघा जाये—वह घ्राणेन्द्रिय है, यह गन्ध का ग्रहण करती है । जिससे स्वाद चखा जाये—वह रसनेन्द्रिय है, यह रस का ग्रहण करती है । जिससे देखा जाये—वह चक्षुरिन्द्रिय है, यह रूप को देखती है । जिससे स्पर्श किया जाये, जिसका स्थान त्वक् है, वह त्वगिन्द्रिय कहलाती है । इस इन्द्रिय का त्वक् स्थान होने से उपचार द्वारा उस स्थान के नाम पर ही इस इन्द्रिय के नाम का व्यवहार किया जाता है। जिससे सुना जाये—वह श्रोत्रे न्द्रिय है, यह शब्द सुनती है । इस प्रकार स्व स्व संज्ञाओं के यौगिक निर्वचन के कारण यह समझना चाहिये कि अपने-अपने विषय का ग्रहण ही इन्द्रियों का इतर-व्यावर्तक लक्षण है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० भूतेभ्य इति। नानाप्रकृतीनामेषां सतां विषयनियमः, नैकप्रकृतीनाम्। सति च विषयनियमे स्वविषयग्रहणलक्षणत्वं भवतीति ॥ १२ ॥ भूतलक्षणम् कानि पुनरिन्द्रियकारणानि ? पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि ॥ १३ ॥ संज्ञाशब्दैः पृथगुपदेशः—विभक्तानां भूतानां सुवचं कार्यं भवि- ष्यतीति ॥ १३ ॥ (घ) अर्थ ( विषय ) लक्षणम् इमे तु खलु— गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ॥ १४ ॥ पृथिव्यादीनां यथाविनियोगं गुणा इन्द्रियाणां यथाक्रममर्था विषया इति१ ॥ १४ ॥ (ङ) बुद्धिलक्षणम् अचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं वृत्ति चेतनस्याकर्तुरूपलब्धिरिति युक्ति- ‘भूतेभ्यः’ पद में बहुवचन इसलिये है—इन इन्द्रियों को नानाप्रकृतिक मानने पर ही इनमें विषय-नियम बनेगा, एकप्रकृतिक मानने पर नहीं । तथा विषय-नियम होने से ही इनमें स्वविषय-ग्रहण लक्षण घटेगा ॥ १२ ॥ इन इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (कारण) क्या हैं ? १. पृथिवी, २. जल, ३. तेज, ४. वायु तथा ५. आकाश—ये ‘भूत’ (इन्द्रियकारण) कहलाते हैं ॥ १३ ॥ विशेष संज्ञाओं से भूतों का पृथक् उपदेश इसलिये किया गया है कि इस प्रकार भेदों से ज्ञात इन भूतों की प्रमिति भली भाँति हो सकेगी ॥ १३ ॥ १. गन्ध, २. रस, ३. रूप, ४. स्पर्श, तथा ५. शब्द—ये पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, उनके विषय (अर्थ) हैं ॥ १४ ॥ पृथिवी आदि पाँचों भूतों का यथासम्बन्ध गुण तथा इन्द्रियों का यथाक्रम विषय समझना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रैगुण्य का विकार होने से बुद्धि स्वयम् अचेतन होती हुई भी पुरुषगत चैतन्य की छाया पड़ने के कारण चेतन की तरह आभासित होती है, उस चैतन्याभास से वह स्वयं १. एतद्भाष्यव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोरुहापोहैर्विद्यते, तदभिमतव्याख्यानं तु तत्र तत्रैव द्रष्टव्यम् ।

१५ सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३१ विरुद्धमर्थं प्रत्याचक्षाणक इवेदमाह— बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् ॥ १५ ॥ नाचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं भवितुमर्हति । तद्धि चेतनं स्यात्, एकश्चायं चेतनो देहेन्द्रियसङ्घातव्यतिरिक्त इति ? प्रमेयलक्षणार्थस्य वाक्य- स्यान्यार्थप्रकाशन'मुपपत्तिसामर्थ्यादिति ॥ १५ ॥ (च) मनोल्क्षणम् स्मृत्यनुमानागमसंशयप्रतिभास्वप्नज्ञानोहाः सुखादिप्रत्यक्षमच्छादयश्च मनसो लिङ्गानि । तेषु सत्स्वयमपि— १ प्रकाशित होती है तथा अचेतन, अकर्ता पुरुष की उपलब्धि प्रकाशित करती है'—ऐसा साङ्ख्यकार का मत है, यहाँ अचेतन बुद्धि का व्यापार ज्ञान तथा वह भी अकर्ता चेतन को उपलब्ध कराना—यह युक्तिविरुद्ध बात है । इसी का खण्डन करते हुए सूत्रकार कहते हैं— बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान—ये अनर्थान्तर (पर्याय) हैं। (इन पर्यायों से जो पदार्थ कहा जाये वह 'बुद्धि' है) ॥१५॥ पुरुषगत चैतन्य के अपरिणामी होने से उसकी छाया बुद्धि में नहीं पड़ सकती, अतः बुद्धि में ही चैतन्य मानना पड़ेगा। यदि ऐसा है तो ज्ञान के प्रति बुद्धि और पुरुष- चेतनद्वय का व्यापार अपेक्षित है, केवल बुद्धि से ज्ञान नहीं होगा; जब कि देहेन्द्रिय- संघात से अतिरिक्त एक ही चेतन माना गया है ? उपपत्तिसामर्थ्य से इस प्रमेयलक्षणार्थक वाक्य (सूत्र) का दूसरे (साङ्ख्यकार) के मत-खण्डन में भी तात्पर्य है। [ पर्याय शब्द कह देने मात्र से लक्षणाभिधान नहीं हुआ—ऐसा कुछ लोग कह सकते हैं, उनको यही उत्तर देना चाहिये कि लोक में दो तरह से पदाभिधान होता है, कुछ पद प्रतिव्यक्ति संकेतित किये जाते हैं, जैसे—पिता अपने पुत्रों का अलग-अलग नामकरण करता है; या अनेक व्यक्ति को सामान्यतः एक नाम दे दिया जाता है, जैसे— गौ आदि । दूसरे प्रकार में अभिधेय के लिए केवल पर्याय से कह देना भी अभिधेय-ज्ञान के लिए पर्याप्त होता है, लक्षणकरण का यह भी प्रयोजन है। प्रकृत में उपलब्धि तथा ज्ञान का अर्थ सर्वप्रसिद्ध है, इसलिये उन्हें बुद्धि का पर्याय कह देने से बुद्धि स्वरूप ज्ञात हो जाता है। इस युक्ति से बुद्धि का लक्षण भी बता दिया गया है ] ॥ १५ ॥ स्मृति, अनुमान, आगम, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, ज्ञान, ऊह, सुख-आदि का प्रत्यक्ष, तथा इच्छा-आदि ये मन के लक्षण हैं; इनके साथ-साथ यह भी है कि— १. सांख्यमतनिराकरणरूपम् ।

सूत्र में 'बुद्धि' शब्द से मन अभिप्रेत है 'जिससे जाना जाये' वह बुद्धि (अर्थात्

३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० १ . आ० युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् ॥ १६ ॥ अनिन्द्रियनिमित्ताः स्मृत्यादयः करणान्तरनिमित्ता भवितुमर्हन्तीति । युगपच्च खलु घ्राणादीनां गन्धादीनां च सन्निकर्षेषु सत्सु युगपज्ज्ञानानि नोत्पद्यन्ते, तेनानुमीयते—अस्ति तत्तदिन्द्रियसंयोगि सहकारि निमित्तान्तरम- व्यापि, यस्यासन्निधेर्नोत्पद्यते ज्ञानम्, सन्निधेश्चोत्पद्यत इति । मनःसंयोगानपे- क्षस्य हीन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञानहेतुत्वे युगपदुत्पद्येरन् ज्ञानानीति ॥ १६ ॥ (छ) प्रवृत्तिलक्षणम् क्रमप्राप्ता तु— प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ॥ १७ ॥ उद्योग मनोऽत्र बुद्धिरित्यभिप्रेतम्, बुध्यतेऽनेनेति बुद्धिः । सोऽयमारम्भः—शरीरेण वाचा मनसा च पुण्यः पापश्च दशविधः । तदेतत्कृतभाष्यं द्वितीयसूत्र इति ॥१७॥ (ज) दोषलक्षणम् प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः ॥ १८ ॥ प्रवर्त्तना—प्रवृत्तिहेतुत्वम्, ज्ञातारं हि रागादयः प्रवर्त्तयन्ति पुण्ये पापे वा । मन को अतिरिक्त प्रमेय मानने से ही युगपद् ज्ञान बन पायेगा ॥ १६ ॥ बाह्येन्द्रियां स्मृत्यादिक की निमित्त नहीं बन सकतीं, अतः कोई न कोई अन्य कारण उनका निमित्त मानना पड़ेगा; दूसरे, घ्राणादि तथा गन्धादि का युगपत् सन्निकर्ष होने पर सभी ज्ञान एक साथ उत्पन्न नहीं होंगे, अतः यह अनुमान होता है कि अवश्य कोई अन्य तदिन्द्रिय-संयोगी, सहकारी, अव्यापी निमित्त है जिसकी सन्निधि (सामीप्य) के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं हो पाता, तथा सन्निधि होने पर उत्पन्न हो जाता है । यह अनुमान ही मन की सत्ता में हेतु है । दूसरी बात यह भी है कि यदि बाह्येन्द्रियों के साथ मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेंगे तो अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लग जायेंगे ॥ १६ ॥ क्रमप्राप्त (प्रवृत्ति का लक्षण कर रहे हैं)— वाणी, बुद्धि (मन), शरीर से किये जाने वाले कार्य प्रवृत्ति कहलाते हैं ॥ १७ ॥ सूत्र में 'बुद्धि' शब्द से मन अभिप्रेत है 'जिससे जाना जाये' वह बुद्धि (अर्थात् मन) है । शरीर वाणी मन से, पुण्य तथा पाप रूप में कार्य दश प्रकार का होता है । इसका विशद वर्णन पीछे द्वितीय सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्ति.........) में कर चुके हैं ॥ १७ ॥ प्रवर्त्तना ही दोष हैं ॥ १८ ॥ प्रवर्त्तना = प्रवृत्ति के कारण (हेतु) दोष हैं । रागादि दोष ज्ञाता को पुण्य या पाप में प्रवृत्त करते हैं । जहाँ मिथ्याज्ञान होगा वहीं रागादि दोष होंगे । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१९. सू०] प्रमेयप्रकरणम् ३३ यत्र मिथ्याज्ञानं तत्र रागद्वेषाविति । प्रत्यात्मवेदनीया हीमे दोषाः कस्माल्लक्षणतो निर्दिश्यन्त इति ? कर्मलक्षणाः खलु रक्तद्विष्टमूढाः । रक्तो हि तत्कर्म कुरुते येन कर्मणा सुखं दुःखं वा लभते; तथा द्विष्टः, तथा मूढ इति । ‘दोषा रागद्वेषमोहाः’–इत्युच्यमाने बहु नोक्तं भवतीति ॥ १८ ॥ ( झ ) प्रेत्यभावलक्षणम् पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ॥ १९ ॥ उत्पन्नस्य क्वचित्सत्त्वनिकाये मृत्वा या पुनरुत्पत्तिः स प्रेत्यभावः । उत्पन्नस्य = सम्बद्धस्य । सम्बन्धस्तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनाभिः । पुनरुत्पत्तिः = पुनर्देहा- दिभिः सम्बन्धः । पुनरित्यभ्यासाभिधानम्, यत्र क्वचित्प्राणभृन्निकाये वर्तमानः पूर्वोपात्तान्देहादीन् जहाति तत्प्रैति, यत् तत्रान्यत्र वा देहादीनन्यानुपादत्ते तद्भवति । प्रेत्यभावः = मृत्वा पुनर्जन्म । सोऽयं जन्ममरणप्रबन्धाभ्यासोऽनादिरपवर्गान्तः प्रेत्यभावो वेदितव्य इति ॥ १९ ॥ साधारणजनों द्वारा हमेशा ही इन दोषों का अनुभव करते रहने से ये लक्षण बिना बताये भी जाने जा सकते हैं, पुनः इनका पृथक् लक्षण करने की क्या आवश्यकता ? उन कर्मों के कारण ही पुरुष रागी, द्वेषी तथा मूढ होते हैं; रागी पुरुष वही कर्म करता है, जिससे उसे सुख या दुःख मिलता है, इसी तरह द्वेषी तथा मोही पुरुष के विषय में समझना चाहिए; तात्पर्य यह निकला कि द्वेष प्रवृत्ति के कारण (जनक) हैं, यह ‘जनकत्व’ दिखाने के लिये ऐसा लक्षण किया गया है । ‘राग द्वेष मोह दोष हैं’—ऐसा कहने पर इनकी गणना-मात्र होती, इनका लक्षण नहीं होता, अतः ‘प्रवर्तनालक्षणा दोषाः’—ऐसा ही सूत्र पढ़ा गया ॥ १८ ॥ पुनः उत्पन्न होना (मर कर जन्म लेना) प्रेत्यभाव है ॥ १९ ॥ उत्पन्न हुए प्राणी का मरकर पुनः जन्म लेना प्रेत्यभाव कहलाता है । उत्पन्न का अर्थ है ‘सम्बद्ध’ । किस से सम्बन्ध ? देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि, वेदना से । इस तरह पुन- रुत्पत्ति से मतलब है आत्मा का देहादि से सम्बन्ध ( क्योंकि आत्मा के नित्य होने से उसमें उत्पाद या मरण नहीं होता, अतः ‘सम्बन्ध’ कहा गया है) । ‘पुनः’ शब्द से अभ्यास ( बार बार होना ) में तात्पर्य है । जहाँ कहीं प्राणसंयुक्त शरीर में रहते हुए पूर्वोपात्त देहादि को छोड़ना—‘प्रैति’ (मर जाता है) कहलाता है, तथा वहाँ से अन्यत्र दूसरे देहा- दिक का ग्रहण कर (सम्बन्ध जोड़) लेता हुआ—‘भवति’ ( जन्म लेता है ) । इन दोनों शब्दों के संयोग से व्युत्पन्न ‘प्रेत्यभाव’ का अर्थ है—‘मर कर फिर जन्म लेना’ । इस जन्म-मरण की परम्परा का पुनः पुनः होना अनादि है, अपवर्ग जब होगा तभी इसका अन्त होगा—यह इस प्रेत्यभाव के विषय में समझ लेना चाहिये ॥ १९ ॥ न्या० द० : ३

३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ( ञ ) फललक्षणम् प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम् ॥ २० ॥ सुखदुःखसंवेदनं फलम्। सुखविपाकं कर्म दुःखविपाकं च, तत्पुनर्देहेन्द्रिय- विषयबुद्धिषु सतीषु भवतीति सह देहादिभिः फलमभिप्रेतम्। तथा हि प्रवृत्ति- दोषजनितोऽर्थः फलमेतत्सर्वं भवति। तदेतत्फलमुपात्तमुपात्तं हेयम्, त्यक्तं त्यक्तमुपादेयमिति नास्य हानोपादान- योर्निष्ठा पर्यवसानं वास्ति। स खल्वयं फलस्य हानोपादानस्रोतसोह्यते लोक इति ॥ २० ॥ ( ट ) दुःखलक्षणम् अथैतदेव— बाधनालक्षणं दुःखम् ॥ २१ ॥ बाधना = पीडा, ताप इति। तयाऽनुविद्धमनुषक्तमविनिर्भागेन वर्त्तमानं दुःखयोगाद् दुःखमिति। सोऽयं सर्वं दुःखैनानुविद्धमिति पश्यन् दुःखं जिहासु- प्रवृत्ति तथा दोष से जनित सुख-दुःखरूप अर्थ 'फल' कहलाता है ॥ २० ॥ सुख-दुःख को स्वसम्बन्धितया अनुभव करना ही फल है। देह, इन्द्रिय, विषय, बुद्धि की समष्टि में सुखविपाक तथा दुःखविपाक—यों दो प्रकार का कर्म होता है. इसलिये यहां देहादिकों के साथ उपर्युक्त लक्षण वाला फल अभिप्रेत है। निष्कृष्टार्थ यह है कि सुख-दुःखसंवेदन तथा शरीरादि के साथ सम्बन्ध—ये दोनों प्रवृत्ति-दोष जनित हैं, अतः दोनों ही 'फल' कहलाते हैं। यह उक्त प्रकार का फल पुनः पुनः प्राप्त कर छोड़ दिया जा सकता है, तथा इसे बार बार छोड़कर पुनः प्राप्त करने की इच्छा हो जाती है, इसीलिए इसके हान (त्याग) या उपादान (ग्रहण) की कोई सीमा नहीं है, कोई अन्त नहीं है। यह समस्त संसार इसी हानोपादान-प्रवाह में पड़कर सुख-दुःख भोगता रहता है ॥ २० ॥ यह शरीरादि फलान्त प्रमेय ही— बाधना (पीड़ा) 'दुःख' कहलाता है ॥ २१ ॥ 'बाधना' कहते हैं पीड़ा अर्थात् ताप को। उसी से अनुस्यूत, उसके बिना न रहने वाला, उसी में ओतप्रोत दुःखपरिणाम के कारण को दुःख कहते हैं। यह सब दुःख से अनुस्यूत है, दुःख के विना नहीं रह पाता, अतः यह सब कुछ 'दुःख' है। इस प्रकार प्रमाता 'यह समग्र दृश्यमान जगत् दुःख है'—ऐसा विचार करता हुआ

जन्मनि दुःखदर्शी निर्विद्यते, निर्विण्णो विरज्यते, विरक्तो विमुच्यते ॥ २१ ॥ (ठ) अपवर्गलक्षणम् यत्र तु निष्ठा यत्र तु पर्यवसानम्, सोऽयम्— तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः ॥ २२ ॥ तेन = दुःखेन जन्मना, अत्यन्तं विमुक्तिः = अपवर्गः । कथम् ? उपात्तस्य जन्मनो हानम्, अन्यस्य चानुपादानम् । एतामवस्थामपर्यन्तामपवर्गं वेदयन्ते- ऽपवर्गविदः । तदभयम्, अजरम्, अमृत्युपदं ब्रह्म, क्षेमप्राप्तिरिति । नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षे व्यज्यते, तेनाभिव्यक्तेनात्यन्तं विमुक्तः सुखी भवतीति केचिन्मन्यन्ते; तेषां प्रमाणाभावपादनुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानं नागमो वा विद्यते—'नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षेऽभिव्यज्यते' इति । नित्यस्याभिव्यक्तिः-संवेदनम्, तस्य हेतुवचनम् । नित्यस्याभिव्यक्तिः = संवेदनम्, ज्ञानमिति, तस्य हेतुर्वाच्यः, यतस्तदुत्पद्यत इति । जन्म लेने में दुःख मानता है, दुःख मानकर ग्लानि करता है, ग्लानि मानकर सभी विषयों में वैराग्य धारण करता है, विरक्त होकर 'मोक्ष' पा जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ इस दुःख की अवधि है, जहाँ अन्त है, वह— उस (जन्मरूप) दुःख से सदा के लिये छुटकारा पा जाना 'अपवर्ग' (मोक्ष) कहलाता है ॥ २२ ॥ उस जन्मरूप दुःख से अत्यन्त (पुनरावृत्तिरहित) विमुक्ति (छुटकारा) ही अपवर्ग (मोक्ष) कहलाता है। कैसे ? क्योंकि तब प्राप्त जन्म का त्याग हो जाता है तथा अन्य (आगामी) जन्म का उपादान नहीं हो पाता । इस मोक्षरूप अविनाशी अवस्था को मुक्तितत्त्वज्ञ विद्वान् 'अपवर्ग' कहते हैं। इस प्रकार के इस कैवल्य पद में कहीं किसी से भी भय नहीं है, जरा (जीर्णता, वार्धक्य) नहीं है, यह अमृत्युपद भावरूप अवस्थाविशेष है, ब्रह्म है, नित्य सुख का आधार है । महत्त्व की तरह मोक्ष में 'आत्मा में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है, उसके अभि- व्यक्त होने से विमुक्त अत्यन्त सुखी होता है'—ऐसा कुछ लोग मानते हैं; प्रमाण न होने से उनके इस मन्तव्य को अयुक्त ही समझें; क्योंकि ऐसा कोई प्रत्यक्ष, अनुमान या आगम प्रमाण नहीं है जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि महत्त्व (व्यापकता) की तरह आत्मा को मोक्षावस्था में आत्मगत नित्य सुख अभिव्यक्त होता है । नित्य की अभिव्यक्ति—अर्थात् संवेदन, उस में कोई हेतु बतलाना चाहिये । यतः नित्य की अभिव्यक्ति = संवेदन अर्थात् ज्ञान है, अतः उसमें कोई हेतु दिखाना चाहिये जिससे वह (ज्ञान) उत्पन्न होता हो ।

३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सुखवन्नित्यमिति चेत् ? संसारस्थस्य मुक्तेनाविशेषः । यथा मुक्तः सुखेन तत्संवेदनेन च सन्नित्येनोपपन्नः, तथा संसारस्थोऽपि प्रसज्यत इति; उभयस्य नित्यत्वात् । अभ्यनुज्ञाने च धर्माधर्मफलेन साहचर्यं यौगपद्यं गृह्येत । यदिदमुत्पत्ति- स्थानेषु धर्माधर्मफलं सुखं दुःखं वा संवेद्यते पर्यायेण, तस्य च नित्यं संवेदनस्य च सहभावो यौगपद्यं गृह्येत, न सुखाभावो नानभिव्यक्तिरस्ति; उभयस्य नित्यत्वात् । अनित्यत्वे हेतुवचनम् । अथ मोक्षे नित्यस्य सुखस्य संवेदनमनित्यम् ? यत उत्पद्यते स हेतुर्वाच्यः । आत्ममनःसंयोगस्य निमित्तान्तरसहितस्य हेतुत्वम् । आत्ममनःसंयोगो हेतु- रिति चेत् ? एवमपि तस्य सहकारि निमित्तान्तरं वचनीयमिति । धर्मस्य कारणवचनम् । यदि धर्मो निमित्तान्तरम् ? तस्य हेतुर्वाच्यो यत उत्पद्यत इति । योगसमाधिजन्यकार्यावसायविरोधात् प्रक्षये संवेदननिवृत्तिः१ । यदि योग- समाधिजो धर्मो हेतुः ? तस्य कार्यावसायविरोधात्प्रक्षये संवेदनमत्यन्तं निवर्तेत । सुख की तरह वह नित्य है-ऐसा कहोगे तो संसारी और मुक्त पुरुष में भेद क्या रह जायेगा ? जैसे मुक्त पुरुष नित्य सुख तथा उसके संवेदन से उपपन्न है उसी प्रकार संसारी में भी नित्य सुख मानना पड़ेगा; क्योंकि दोनों ही सुख तथा संवेदन नित्य हैं । दोनों को नित्य मानने पर, धर्म तथा अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धिकाल में नित्य सुख तथा उसके नित्य ज्ञान का यौगपद्य (एककालसम्बद्धत्व) ग्रहण करना पड़ेगा । सुख को नित्य तथा उसकी अभिव्यक्ति को अनित्य मानने में कोई हेतु दिखाना पड़ेगा कि 'मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति अनित्य हैं'। ऐसी अभिव्यक्ति जिससे पैदा होती है, वह कारण बताना चाहिये । वैसी अभिव्यक्ति में अकेला आत्ममनःसंयोग तो निमित्त बन नहीं सकता, अतः उसका कोई निमित्तान्तर मानना पड़ेगा । वह निमित्तान्तर कौन है ? यह बताना चाहिए । 'धर्म ही तदपेक्षित निमित्तान्तर है'-ऐसा मानेंगे तो 'धर्म निमित्तान्तर हैं' इस में भी कोई हेतु बताना पड़ेगा, जिससे वह उत्पन्न होता हो । यदि योगसमाधिज धर्म (धर्ममेघाख्य समाधि) को उसका हेतु मानेंगे तो उस धर्म में कार्य का विरोधी रहने से सर्वक्षय हो जाता है, सर्वक्षय होने से उस सुखाभिव्यक्ति की भी अत्यन्त निवृत्ति हो जायेगी । 'संवेदनानुवृत्तिः'-इति पाठः ।

२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३७ असंवेदने चाविद्यमानेनाविशेषः । यदि धर्मक्षयात् संवेदनोपरमो नित्यं सुखं न संवेद्यत इति ? किं विद्यमानं न संवेद्यते, अथाविद्यमानम् ? —इति नानुमानं विशिष्टेऽस्तीति । अप्रक्षयश्च धर्मस्य निरनुमानमुत्पत्तिधर्मकत्वात् । योगसमाधिजो धर्मो न क्षीयत इति नास्त्यनुमानम् । उत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति विपर्ययस्य त्वनुमानम् । यस्य तु संवेदनोपरमो नास्ति तेन संवेदनहेतुर्नित्य इत्यनुमेयम् । नित्ये च मुक्तसंसारस्थयोरविशेष इत्युक्तम् । यथा मुक्तस्य नित्यं सुखं तत्संवेदनहेतुश्च, संवेदनस्य तूपरमो नास्ति; कारणस्य नित्यत्वात्, तथा संसार- स्थस्यापीति । एवं च सति धर्माधर्मफलेन सुखदुःखसंवेदनेन साहचर्यं गृह्येतेति । शरीरादिसम्बन्धः प्रतिबन्धहेतुरिति चेत् ? न; शरीरादीनामुपभोगार्थत्वात्, विपर्ययस्य चाननुमानात् । स्यान्मतम्—संसारावस्थस्य शरीरादिसम्बन्धो नित्यसुखसंवेदनहेतोः प्रतिबन्धकः, तेनाविशेषो नास्तीति ? एतच्चायुक्तम्; शरीरादय उपभोगार्थाः, ते भोगप्रतिबन्धं करिष्यन्तीत्यनुपपन्नम्; न चास्त्यनुमानम्—'अशरीरस्यात्मनो भोगः कश्चिदस्ति' इति । 'सुख है, परन्तु धर्मक्षय से उसका संवेदन नहीं हो पाता'—ऐसा मानेंगे तो इसमें तथा 'सुख नहीं है'—इसमें कोई अन्तर नहीं । 'उत्पत्तिधर्मा होने से वह धर्म क्षीण नहीं होता' ऐसा अनुमान भी नहीं कर सकते; अपितु 'उत्पत्तिधर्मा अनित्य होता है' ऐसा विपरीत अनुमान ही होता है । हाँ, ऐसा कोई पुरुष हो जिसे संवेदनोपरम कभी न हो पाये वह यदि अनुमान करे कि 'संवेदन हेतु नित्य है' तो बात बन सकती है, परन्तु ऐसा पुरुष मिलेगा कहाँ ! अथ च—संवेदनहेतु के नित्य मानने पर मुक्त और संसारी पुरुष में अन्तर नहीं रहेगा—वह हम पहले ही कह आये । जैसे मुक्त पुरुष के सुख तथा सुखसंवेदन कारण के नित्य होने से नित्य हैं; क्योंकि वहाँ सुखसंवेदनोपरम नहीं होता, ऐसी स्थिति में संसारी में सुख तथा सुखसंवेदन भी मानना पड़ेगा । ऐसा मानने पर धर्म तथा अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धि-काल में नित्य सुख तथा उसके नित्य संवेदन का यौग- पद्य भी मानना पड़ेगा । यदि कहें—'उस संवेदन में शरीरादिसम्बन्ध प्रतिबन्धहेतु है' ? शरीरादि तो उस सुख के उपभोग के लिये होते हैं, वे प्रतिबन्धक क्यों बनेंगे ! 'शरीर उपभोगहेतु नहीं है'— ऐसा अनुमान करना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वह शास्त्रविरुद्ध होगा । कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि संसारावस्थापन्न मुक्त पुरुष का शरीरादिसम्बन्ध नित्य सुखसंवेदन हेतु का प्रतिबन्धक है, इसलिये संसारी और मुक्तपुरुष के सुखसंवेदन

३५ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इष्टाधिगमार्था प्रवृत्तिरिति चेत् ? न; अनिष्टोपरमार्थत्वात् । इदमनुमानम्- इष्टाधिगमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्, नोभयमनर्थकमिति ? एतच्चा- युक्तम्; 'अनिष्टोपरमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्' इति । नेष्टमनिष्टे- नाननुविद्धं सम्भवतीति इष्टमप्यनिष्टं सम्पद्यते । अनिष्टहानाय घटमान इष्टमपि जहाति, विवेकहानस्याशक्यत्वादिति । दृष्टातिक्रमश्च देहादिषु तुल्यः । यथा दृष्टमनित्यं सुखं परित्यज्य नित्यं सुखं कामयते, एवं देहेन्द्रियबुद्धीरनित्या दृष्टा अतिक्रम्य मुक्तस्य नित्या देहेन्द्रियबुद्धयः में समानता नहीं है; परन्तु उनका मत भी समीचीन है, क्योंकि शरीरादि को पहले उपभोग का साधन मानना, फिर उन्हें उसका प्रतिबन्धक मानना—ये दो बातें एक साथ कैसे बनेंगी ! 'अशरीरी आत्मा को कोई भोग होता है'—ऐसा कोई अनुमान भी नहीं है। [ 'मोक्ष में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है—इसमें कोई प्रमाण नहीं है' ऐसा भाष्यकार पहले कह चुके हैं, वहां वेदान्ती कहता है—] पुरुष की प्रवृत्तियाँ इष्ट सुखप्राप्ति के लिए ही देखी जाती हैं'—ऐसा अनुमान प्रमाण मान लें ? यह भी नहीं मान सकते; क्योंकि उसकी सभी प्रवृत्तियाँ केवल इष्टप्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि उनमें कुछ अनिष्ट की निवृत्ति के लिये भी हुआ करती हैं। यदि यह अनुमान करें—'इष्टप्राप्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है', अतः दोनों ही निरर्थक नहीं हैं ? तो यह ठीक नहीं; क्योंकि 'अनिष्टनिवृत्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है' यह अनुमान भी किया जा सकता है। इस संसार में ऐसा कोई भी इष्ट नहीं है जो अनिष्ट से अनुस्यूत न हो, अतः इष्ट भी किसी समय अनिष्ट बन सकता है। उस अनिष्ट की निवृत्ति के लिए प्रवर्तमान पुरुष अपने इष्ट को भी छोड़ बैठेगा; क्योंकि इष्टानिष्ट के परस्पर संश्लिष्ट होने से अनिष्टांश का त्याग तथा इष्टांश का रक्षण सर्वथा दुःशक है। [ 'इस संसार में क्षणिक सुख को छोड़कर बुद्धिपूर्वककारी स्थायी सुख ग्रहण करता है, उनमें स्थायितम सुख ही मोक्ष है'—ऐसा मानेंगे तो यह नय देहादि में भी समान पड़ेगा; क्योंकि उनके विषय में भी कहा जा सकता है—'क्षणिक नश्वर देहादि को छोड़- कर उनसे स्थायितर किसी अन्य को चाहने की बुद्धिपूर्वककारी की इच्छा होती है इसलिए स्थायितम देहेन्द्रियादिरूप ही मोक्ष है' इस आशय से भाष्यकार परिहास करते हैं—] दृष्ट का अतिक्रमण कर उससे अच्छे अदृष्ट सुख की कल्पना को मोक्ष मानने पर देहादि में भी यह बात समान पड़ेगी। जैसे पुरुष दृष्ट सुख को छोड़कर नित्य सुख को चाहता है; इसी तरह देहेन्द्रिय बुद्धि को अनित्य समझकर उन्हें छोड़ते हुए इनसे अच्छी देहेन्द्रिय-बुद्धियों CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३९ कल्पयितव्याः ! साधीयश्चैवं मुक्तस्य चैकात्म्यं कल्पितं भवतीति । उपपत्तिविरुद्धमिति चेत् ? समानम् । देहादिनां नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्प- यितुमशक्यमिति ? समानम् । सुखस्यापि नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्पयितुमशक्य- मिति । आत्यन्तिके च संसारदुःखाभावे सुखवचनादागमेऽपि सत्यविरोधः । यद्यपि कश्चिदागमः स्यात्—‘मुक्तस्यात्यन्तिकं सुखम्' इति, सुखशब्द आत्यन्तिके दुःखाभावे प्रयुक्त इत्येवमुपपद्यते । दृष्टो हि दुःखाभावे२ सुखशब्दप्रयोगो बहुलं लोक इति । नित्यसुखरागस्याप्रहाणे मोक्षाधिगमाभावः, रागस्य बन्धनसमाज्ञानात् । यद्ययं मोक्षो नित्यं सुखमभिव्यञ्जयत इति ? नित्यसुखरागेण मोक्षाय घटमानो न मोक्षमधिगच्छेत् नाधिगन्तुमर्हतीति । बन्धनसमाज्ञातो हि रागः । न च बन्धने सत्यपि कश्चिन्मुक्त इत्युपपद्यत इति । की ही 'मोक्ष' रूप में कल्पना की जा सकती है । इससे वेदान्तियों की 'मुक्त की एकात्म- कल्पना' भी सुगम हो सकेगी ! जैसे नित्य देह की कल्पना में 'उपपत्तिविरुद्ध' कहोगे तो तुम्हारे पक्षमें भी यह 'उप- पत्तिविरोध' समान है ! जैसे प्रमाणविरुद्ध 'देहादि की नित्यता' कल्पना अशक्य है, वैसे ही प्रमाणविरुद्ध 'सुख की नित्यता' कल्पना भी अशक्य होगी ! 'मुक्त में आत्यन्तिक सुख होता है'—ऐसे आगम में आत्यन्तिक सुख का प्रयोग 'सांसारिक दुःखाभाव' में होने से कोई विरोध नहीं है । यद्यपि 'मुक्त को आत्यन्तिक सुख मिलता है'—ऐसा आगम उपलब्ध है, परन्तु इस आगम में 'सुख' शब्द का प्रयोग आत्यन्तिक दुःखाभाव के लिए किया गया है । प्रायः लोक में भी दुःखाभाव के लिये 'सुख' का प्रयोग होता है । (जैसे—सिर से बोझ उतरने पर किसी अतिरिक्त सुख की उत्पत्ति न होने पर भी भारवाहक कहता है—'ओह ! अब आराम मिला !') नित्य सुख में मुमुक्ष की प्रवृत्ति यदि राग से होती हो तो रागनिवृत्ति न होने से तत्सम्पाद्य मोक्ष की भी अनुपपत्ति ही रहेगी ? इसलिये कहते हैं—नित्यसुख-राग के क्षीण न होने पर मोक्षप्राप्ति भी न होगी; क्योंकि राग तो बन्धन का हेतु है । मुमुक्षु यदि 'मोक्ष नित्य सुख अभिव्यक्त करता है'—ऐसा राग करके मोक्ष के लिये प्रयत्न करता है, तो वह मोक्ष नहीं पा सकेगा; क्योंकि राग भी तो एक प्रकार का बन्धन है और बन्धन के रहते कोई 'मुक्त' नहीं कहला सकता ! २. 'दुःखादेरभावे-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० प्रहीणे' नित्यसुखरागस्याप्रतिकूलत्वम् । अथास्य नित्यसुखरागः प्रहीयते, तस्मिन् प्रहीणे नास्य नित्यसुखरागः प्रतिकूलो भवति ? यद्येवम्, मुक्तस्य नित्यं सुखं भवति; अथापि न भवति; नास्योभयोः पक्षयोर्मोक्षाधिगमो विकल्पत . इति ॥ २२ ॥ न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् [ २३-२४ ] संशयलक्षणम् स्थानवत एव तर्हि संशयस्य लक्षणं वाच्यमिति तदुच्यते- समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः२ ॥ २३ ॥ समानधर्मोपपत्तेर्विशेषापेक्षो विमर्शः संशय इति । स्थाणु-पुरुषयोः समानं धर्ममारोहपरिणाहौ पश्यन् पूर्वदृष्टं च तयोर्विशेषं बुभुत्समानः किंस्विदित्यन्यतरं नावधारयति, तदनवधारणं ज्ञानं संशयः । 'समानमनयोर्धर्ममुपलभे, विशेषमन्य- प्रहीण मानने पर भी नित्यसुखराग मोक्ष के विरुद्ध नहीं पड़ेगा । जब इस मुमुक्षु का नित्यसुखराग क्षीण हो जाता है, तब इसका यह नित्यसुखराग प्रतिकूल नहीं होगा, तब तो उसे मोक्ष का अधिगम हो जाना चाहिये ? यदि ऐसी बात है तो मुक्त को नित्य सुख होता हो, या न होता हो-दोनों ही पक्षों में मोक्षप्राप्ति असन्दिग्ध ही है ॥ २२ ॥ क्रमप्राप्त अवसर आने पर 'संशय' का लक्षण कथनीय है, अतः अब उसे कह रहे हैं- समान धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से, अनेक धर्मोपलब्धि से, विप्रतिपत्ति से, उपलब्धि की अव्यवस्था तथा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' कहलाता है ॥ २३ ॥ १. समान धर्मोपपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे-स्थाणु और पुरुष में तुल्य धर्म आरोह-परिणाह ( उतार-चढ़ाव ) को देखता हुआ प्रमाता पहले देखे हुए उनके विशेष ( विभेदक धर्म ) को जानना चाहता हुआ 'वस्तुतः क्या है ?'-यह एकतर निश्चय नहीं कर पाता, उक्त अनिश्चयरूप ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है । 'इन दोनों के तुल्य धर्मों को ही पा रहा हूँ, विशेष धर्मों को नहीं'-यह बुद्धि 'अपेक्षा' कह- लाती है, जो कि संशय की प्रवर्त्तिका है । संक्षेप में यों कह सकते हैं कि 'विशेषापेक्ष विमर्श' ही 'संशय' होता है । १. 'प्रहीणनित्य'०-इति पाठ० । २. संवदनीयम्-'सामान्यप्रत्यक्षात् विशेषाप्रत्यक्षाद् विशेषस्मृतेश्च संशयः' इति काणादाः । 'साधर्म्यदर्शनाद्विशेषोपलिप्सोर्विमर्शः संशयः' इति बौद्धाः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri