न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
तरस्य नोपलभे' इत्येषा बुद्धिः 'अपेक्षा' = संशयस्य प्रवर्त्तिका वर्तते, तेन विशेषा- पेक्षो विमर्शः संशयः । अनेकधर्मोपपत्तेरिति । समानजातीयमसमानजातीयं चानेकम्, तस्यानेकस्य धर्मोपपत्तेः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । समानजातीयेभ्योऽसमानजातीयेभ्य- श्चार्था विशिष्यन्ते, गन्धवत्त्वात् पृथिवी अबादिभ्यो विशिष्यते गुणकर्मभ्यश्च । अस्ति च शब्दे विभागजन्यत्वं विशेषः। तस्मिंस्ते 'द्रव्यं गुणः कर्म वा' इति सन्देहः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । 'किं द्रव्यस्य सतो गुणकर्मभ्यो विशेषः, आहोस्वित् गुणस्य सतो द्रव्यकर्मभ्यः?, अथ कर्मणः सतो द्रव्यगुणेभ्यः ? इति विशेषापेक्षा - 'अन्यतमस्य व्यवस्थापकं धर्मं नोपलभे' इति बुद्धिरिति । विप्रतिपत्तेरिति । व्याहतमेकार्थदर्शनम् = विप्रतिपत्तिः, व्याघातः = विरोधः, असहभाव इति । 'अस्त्यात्मा' इत्येकं दर्शनम्, 'नास्त्यात्मा' इत्यपरम्; न च सद्भावासद्भावौ सहैकत्र सम्भवतः, न चान्यतरसाधको हेतुरुपलभ्यते, तत्र तत्त्वानवधारणं संशय इति । २. अनेक धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । अर्थात् समानजातीय तथा असमानजातीय विशेषक (विभेदक) धर्म सामान्य धर्म के साथ रहते हैं—इस अध्यवसाय की उपलब्धि से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । समानजातीय और असमानजातीय धर्मों से अर्थ विभिन्न हुए देखे जाते हैं । जैसे—पृथ्वी गन्धवती होने से समानजातीय जलादि द्रव्यों से भिन्न है, इसी प्रकार असमानजातीय गुण, कर्म से भी । शब्द में भी विभागजन्य विशेष (विभेदक धर्म) है। इस (शब्द) में— 'यह द्रव्य है, या गुण है, या कर्म है'—ऐसा सन्देह हो सकता है; क्योंकि उसका विभेदक धर्म तीनों में समानरूप से देखा जाता है। यहाँ 'क्या यह द्रव्य होता हुआ गुण, कर्म से भिन्न है' ? या 'गुण होता हुआ द्रव्य, कर्म से भिन्न है'? अथवा 'कर्म होता हुआ द्रव्य, गुण से भिन्न है' ?—ऐसी विशेषापेक्षा—'किसी एक निश्चित विभेदक धर्म को नहीं पा रहा हूँ'—यह बुद्धि होती है। ३. विप्रतिपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श भी संशय कहलाता है । विरुद्ध एकार्थदर्शन को 'विप्रतिपत्ति' कहते हैं। व्याघात = विरोध, एक साथ न रहना । जैसा कि 'आत्मा है' यह एक वाक्य है, 'आत्मा नहीं है'—यह दूसरा वाक्य, एक में सत्ता (होना) तथा असत्ता (न होना) दोनों एकत्र रह नहीं सकते, इनमें से किसी एक का साधक हेतु भी नहीं दिखाया गया, अतः ऐसे अवसर पर तत्त्व (यथातथ = समीचीन) का ज्ञान का न होना ही 'संशय' है । १. क्वचिन्नास्ति ।
४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० उपलब्धिव्यवस्थातः खल्वपि । सच्चोदकमुपलभ्यते तडागादिषु, मरीचिषु चाविद्यमानमुदकमिति; अतः क्वचिदुपलभ्यमाने तत्त्वव्यवस्थापकस्य प्रमाण- स्यानुपलब्धेः—‘किं सदुपलभ्यते, अथासत्’ इति संशयो भवति । अनुपलब्ध्यव्यवस्थातः । सच्च नोपलभ्यते मूलकीलकोदकादि, असच्चा- नुत्पन्नं निरुद्धं वा; ततः क्वचिदनुपलभ्यमाने संशयः—‘किं सन्नोपलभ्यते, उता- सत्’ इति संशयो भवति । विशेषापेक्षा पूर्ववत् । पूर्वः समानोऽनेकश्च धर्मो ज्ञेयस्थः, उपलब्ध्द्यनुपलब्धी पुनर्जातृस्थे—एतावता विशेषेण पुनर्वचनम् । समानधर्माधिगमात् समानधर्मोपपत्तेर्विशेषस्मृत्यपेक्षो विमर्श इति॥ २३ ॥ प्रयोजनलक्षणम् स्थानवतां लक्षणमिति समानम् । ४. उपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे— तालाब आदि में जल है, और मिल जाता है, तथा मृगमरीचिका में जल नहीं है, परन्तु भान होता है । इसलिये कहीं उपलब्धि होने पर तत्त्वनिर्णायक प्रमाण की उपलब्धि न होने से 'क्या सत् ही मिलता है या असत् भी मिल जाता है'—ऐसा विमर्श भी 'संशय' होता है । ५. अनुपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । सत् भी कभी कभी नहीं मिलता, जैसे—मन्त्रादि से कीलित या वस्त्रादि से आच्छादित जल । असत् तो मिलेगा ही क्या ! असत् द्विविध स्थिति में होता है—१. अनुत्पन्न या २. किसी उपाय से छिपा हुआ । तब कहीं अनुपलब्धि होने पर संशय होता है कि क्या सत् उप- लब्ध नहीं होता है, या असत् उपलब्ध नहीं होता ? यहाँ 'विशेषापेक्षा' का व्याख्यान पहले लक्षण की तरह ही समझ लेना चाहिये । 'संशय' के इन पाँच हेतुओं में से प्रथम और द्वितीय ('समान....' और 'अनेक....') ज्ञेय में घटेंगे तथा तथा चतुर्थ और पंचम ('उपलब्धि....' 'अनुपलब्धि....') ज्ञाता में । इसी भेद को बताने के लिये ये पुनः कहे गये हैं । "समानधर्म के अधिगम से, समानधर्म की उपपत्ति से विशेष स्मृत्यपेक्षावान् विमर्श 'संशय' कहलाता है"—यह संशय का निष्कृष्ट लक्षण है ॥ २३ ॥ क्रमशः अवसर आने पर ही 'प्रयोजन' का लक्षण-कथन अभीष्ट था, अब उसका अवसर आ गया है । १. अत्र वार्त्तिककारः—'समानधर्मोपपत्तेः, अनेकधर्मोपपत्ते', विप्रतिपत्तेश्च त्रिविध एव संशयः' इत्याह । विस्तरस्तु तत एवावगन्तव्यः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२५. सू० ] न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् ४३ यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ॥ २४ ॥ यमर्थमाप्तव्यं हातव्यं वा व्यवसाय तदाप्तिहानोपायमनुतिष्ठति, प्रयोजनं तद्वेदितव्यम्; प्रवृत्तिहेतुत्वात् । 'इममर्थमाप्स्यामि हास्यामि वा' इति व्यवसायो- ऽर्थस्याधिकारः, एवं व्यवसीयमानोऽर्थोऽधिक्रियत इति ॥ २४ ॥ दृष्टान्तलक्षणम् लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः ॥ २५ ॥ १लोकसामान्यमनतीता लौकिकाः, नैसर्गिकं वैनयिकं बुद्धयतिशयमप्राप्ताः । तद्विपरीताः परीक्षकाः, तर्केण प्रमाणैरर्थं परीक्षितुमर्हन्तीति । यथा यमर्थं लौकिका बुध्यन्ते तथा परीक्षका अपि, सोऽर्थो दृष्टान्तः । दृष्टान्तविरोधेन हि प्रतिपक्षाः प्रतिषेद्धव्या भवन्तीति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षाः स्थापनीया भवन्तीति, अवयवेषु चोदाहरणाय कल्पत इति ॥ २५ ॥ प्रमाता जिस अर्थ (वस्तु) को अनुकूल या प्रतिकूल निश्चय कर प्रवृत्त हो, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रमाता जिस अर्थ को उपादेय या हेय निश्चित करके उसकी प्राप्ति या त्याग का प्रयत्न करता है, उसे 'प्रयोजन' समझना चाहिये, क्योंकि वह (प्रयोजन) प्रमाता की प्रवृत्ति का हेतु होता है । 'इस अर्थ को ग्रहण करूँगा, या छोड़ूँगा', यह निश्चित (इच्छा) ही अर्थ का अधिकार (प्रयोजन) है । इस निश्चय का विषय अर्थ अधिकार का विषय है ॥ २४ ॥ जिस अर्थ में लौकिक और परीक्षकों का बुद्धि का साम्य (अविरोध) हो वह 'दृष्टान्त' कहलाता है ॥ २५ ॥ 'लौकिक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि लोकविपरीत में न जाती हो, अर्थात् ऐसे शिष्य, जिन्होंने स्वाभाविक शास्त्रमर्यादित अर्थ को समझने में बुद्धि का वैशद्य न प्राप्त किये हो । उसके विपरीत 'परीक्षक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि शास्त्रपरिशीलन से प्रकृष्ट हो चुकी हो, जो कि तर्क तथा प्रमाणों से अर्थ की परीक्षा कर सकता हो । जिस अर्थ को लौकिक तथा परीक्षक पुरुष एक-सा समझते हों, वह अर्थ 'दृष्टान्त' कहलाता है । दृष्टान्तविरोध से प्रतिपक्षी को बाद में रोका जाता है तथा दृष्टान्तसमाधान से अपना पक्ष परिपुष्ट किया जाता है, और पञ्चावयवों में उदाहरण की कल्पना दृष्टान्त से ही होती है—इन सब कारणों से दृष्टान्त को 'न्यायपूर्वाङ्ग' में समाविष्ट किया है ॥ २५ ॥ १. 'लोकसाम्यम्'—इति पाठ० । लोकसामान्यम् = मौर्य्यम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० न्यायाश्रयसिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् [ २६-३१ ] अथ सिद्धान्तः । इदमित्थम्भूतञ्चेत्यभ्यनुज्ञायमानमर्थजातं सिद्धम्, सिद्धस्य संस्थितिः = सिद्धान्तः । संस्थितिः इत्थम्भावव्यवस्था, धर्मनियमः । स खल्वयम्— तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः १ ॥ २६ ॥ तन्त्रार्थसंस्थितिः तन्त्रसंस्थितिः, तन्त्रम् = इतरेतराभिसम्बद्धस्यार्थसमूह- स्योपदेशः, शास्त्रम् । अधिकरणानुषक्तार्थसंस्थितिरधिकरणसंस्थितिः, अभ्युपगम- संस्थितिरनवधारितार्थपरिग्रहः, तद्विशेषपरीक्षणाय्याभ्युपगमसिद्धान्तः ॥ २६ ॥ तन्त्रभेदात्तु खलु— स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थन्तरभावात् ॥ २७ ॥ तत्रेताश्चतस्रः संस्थितयोऽर्थान्तरभूताः ॥ २७ ॥ अब 'सिद्धान्त' का व्याख्यान करते हैं । 'यह ऐसा'—इस प्रकार स्वीक्रियमाण अर्थसमूह 'सिद्ध' कहा जाता है, सिद्ध की संस्थिति 'सिद्धान्त' कहलाती है । 'संस्थिति' से तात्पर्य है 'ऐसा ही होना चाहिये'–इस तरह की व्यवस्था, अर्थात् इस प्रकार का निश्चय । प्रामाणिकतया स्वीक्रियमाण अर्थ की 'इदमित्थम्' इस व्यवस्था को 'सिद्धान्त' कहते हैं । अर्थात् धर्मनियम भी वही है । वही यह— शास्त्र, अधिकरण, अभ्युपगमभेद से विशेष परीक्षणार्थ स्वीकृत विषय (ज्ञानविशेष) की इत्थम्भावव्यवस्था 'सिद्धान्त' कहलाती है ॥ २६ ॥ परस्पर सम्बद्ध अर्थसमूह का उपदेशक शास्त्र 'तन्त्र' कहलाता है । तन्त्रार्थ की इत्थम्भावव्यवस्था 'तन्त्रसंस्थिति' कही जाती है, उसमें अधिकरणभेद से सम्बद्ध अर्थ 'अधिकरणसंस्थिति' कहलाता है । अनिश्चित अर्थ ( शास्त्र में साक्षात् अनुक्त, जैसे— इस शास्त्र में मन का इन्द्रियत्व ) का परिग्रह 'अभ्युपगमसंस्थिति' कहलाता है । संक्षेप में—मन आदि के विशेष अंश की परीक्षा के लिये अभ्युपगमसिद्धान्त माना जाता है ॥ २६ ॥ तन्त्रभेद से— वह सिद्धान्त चार प्रकार का होता है—१. सर्वतन्त्रसंस्थिति, २. प्रतितन्त्रसंस्थिति, ३. अधिकरणसंस्थिति तथा ४. अभ्युपगमसंस्थिति ॥ २७ ॥ भेद करने पर संस्थिति ( सिद्धान्त ) के ये चार भेद ही बन सकते हैं ॥ २७ ॥ १. तन्त्र्यन्ते पदार्था अनेनेति तन्त्रं प्रमाणम्, तदधिकरणमाश्रयो ज्ञापकत्या येषां पदार्थानामभ्युपगमो ज्ञानविशेषस्तस्य संस्थितिः 'इवमित्थमेव' इति व्यवस्थेति सूत्राक्षरार्थः । तथा च तच्छास्त्रसिद्धोऽर्थः, तन्निश्चयो वा तच्छास्त्रसिद्धान्त इति भावः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३०. सू० ] सिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् ४५ तासाम्— सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः ॥ २८ ॥ यथा घ्राणादीनीन्द्रियाणि, गन्धादय इन्द्रियार्थाः, पृथिव्यादीनि भूतानि, प्रमाणैरर्थस्य ग्रहणमिति ॥ २८ ॥ ४। समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः ॥ २९ ॥ यथा—नासतः आत्मलाभः, न सतः आत्महानम्, निरतिशयाश्चेतनाः, देहेन्द्रियमनःसु विषयेषु तत्तत्कारणेषु च विशेषः—इति साङ्ख्यानाम्। पुरुषकर्मादिनिमित्तो भूतसर्गः, कर्महेतवो दोषाः, प्रवृत्तिश्च, स्वगुणविशिष्टा- श्चेतनाः, असदुत्पद्यते उत्पन्नं निरुध्यते—इति योगानाम्¹ ॥ २९ ॥ यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः ॥ ३० ॥ उन सिद्धान्तों में— अन्य तन्त्रों से सम्मत तथा स्वतन्त्र प्रतिपादित अर्थ 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥२८॥ जैसे—'घ्राणादिक इन्द्रिय हैं', 'गन्धादि इन्द्रियों के विषय हैं', 'पृथिवी आदि महाभूत हैं', 'प्रमाण से अर्थ का ग्रहण होता है'—ये सिद्धान्त सभी तन्त्रों में समानतया गृहीत हैं, अतः इन्हें 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहा जाता है ॥ २८ ॥ समान (स्वमतानुयायी) तन्त्र में स्वीकृत तथा विरोधी अन्य तन्त्र में अस्वीकृत अर्थ 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥ २९ ॥ 'असत् की उपलब्धि नहीं हो सकती, सत् का क्षय नहीं हो सकता' 'चेतन अपरि- णामी है, किसी धर्म से युक्त नहीं होता'; 'देह, इन्द्रिय, मन आदि स्थूल विषय तथा तत्कारण महत्, अहङ्कार, पञ्च तन्मात्रा, पञ्च महाभूत आदि सूक्ष्म विषयों में विशेष अतिशय रहता है' इत्यादि सांख्यतन्त्र के सिद्धान्त हैं । 'भूतसृष्टि पुरुषकर्मनिमित्तक है', प्रवृत्ति तथा दोष कर्महेतु हैं', 'चेतन स्वगुणविशिष्ट है', 'असत् उत्पन्न होता है' 'उत्पन्न विनष्ट होता है'—ये नैयायिकों के सिद्धान्त हैं। ये उभयविध सिद्धान्त सांख्य तथा नैयायिकों के लिये परस्पर 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' हुए ॥ २९ ॥ जिसके सिद्ध होने पर अन्य प्रकरण (साथ लगे अर्थ) की स्वतः सिद्धि हो जाये, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ॥ ३० ॥ १. वैशेषिकाणाम्—इति केचित् । तत्त्वतस्तु योगशब्देनात्र नैयायिका एवाभिप्रेताः । एतस्मिन्नेवार्थेऽस्य प्रयोगो बहुत्रोपलभ्यते प्राचीनग्रन्थेषु ।
४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० यस्यार्थस्य सिद्धावन्येऽर्था अनुषज्यन्ते, न तैर्विना सोऽर्थः सिद्ध्यति, तेऽर्था यदधिष्ठानाः, सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा—'देहेन्द्रियव्यतिरिक्तो ज्ञाता, दर्शन- स्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' इति । अत्रानुषङ्गिणोऽर्थाः—'इन्द्रियनानात्वम्', नियतविषयाणीन्द्रियाणि', 'स्वविषयग्रहणलिङ्गानि ज्ञातुर्ज्ञानसाधनानि', 'गन्धा- दिगुणव्यतिरिक्तं द्रव्यं गुणाधिकरणम्' 'अनियतविषयाश्चेतना' इति पूर्वार्थ- सिद्धावेतेऽर्थाः सिद्ध्यन्ति, न तैर्विना सोऽर्थः सम्भवतोति' ।। ३० ।। अपरीक्षिताभ्युपगमात् तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः ।। ३१ ।। यत्र किञ्चिदर्थजातमपरीक्षितमभ्युपगम्यते—अस्ति द्रव्यं शब्दः; स तु नित्यः, अथानित्य इति ? द्रव्यस्य सतो नित्यताऽनित्यता वा तद्विशेषः परीक्ष्यते, सोऽभ्यु- पग़मसिद्धान्तः, स्वबुद्धयतिशयचिख्यापयिषया परबुद्धयवज्ञानाच्च प्रवर्तत इति ।। ३१ ।। जिस अर्थ की सिद्धि से अन्य अर्थ अनुषक्त ( = सिद्ध, साथ लगे हुए) हों, उनके बिना वह अर्थ सिद्ध न होता हो, वे अर्थ जहाँ उपवर्णित हों, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है। जैसे—'दर्शन तथा स्पर्श द्वारा एक ही अर्थ का ग्रहण होने से देहेन्द्रिय से अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञाता है'—इस अनुमान में अनुषक्त (साथ लगे) अर्थ हैं—इन्द्रियों का नानात्व, इन्द्रियों का नियतविषयत्व, इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणहेतु तथा ज्ञाता के लिये इन्द्रियों का ज्ञानसाधनत्व आदि और 'द्रव्य गन्धादि गुणों से अतिरिक्त है और गुणों का अधिष्ठान है', 'चेतन धर्म अनियतविषयक है'.आदि । पूर्व साक्षाद् अधिकृत अर्थ की सिद्धि होने पर ही ये अर्थ सिद्ध हो सकते हैं, इनकी सिद्धि के बिना वह अर्थ भी सिद्ध न हो पायेगा। यह परस्पर एक दूसरे को प्रमाणित करना ही 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३० ।। जो अर्थ सूत्रों में परीक्षित न हो परन्तु शास्त्र में मिलता हो उसका विशेष परीक्षण 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३१ ।। कोई ऐसा अर्थसमूह जो अपरीक्षित (सूत्र में न कहा गया या जिसकी सम्यक् परीक्षा न की गयी) हो, शास्त्र में मिल जाये उसकी विशेष परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कह- लाती है। जैसे—'शब्द द्रव्य है, वह नित्य है या अनित्य', यहाँ शब्द की द्रव्यत्वपरीक्षा तथा द्रव्य होने पर उसकी नित्यता या अनित्यता की यह विशिष्ट सूक्ष्म परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' है। अभ्युपगमसिद्धान्त का उपयोग अपनी बुद्धि की उत्कृष्टता दिखलाने तथा प्रतिपक्षी की बुद्धि को अपकृष्टता के लिये किया जाता है ।। ३१ ।। १. अत्रार्थापत्तिमुखेनाधिकरणसिद्धान्तखण्डनाय बद्धपरिकराणां बौद्धनैयायिकानां मतं तत्खण्डनं च वार्त्तिकेऽवधेयं सुधीभिः। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३२. सू० ] न्यायप्रकरणम् ४७ न्यायप्रकरणम् [ ३२-३९ ] अथावयवाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ॥ ३२ ॥ दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सञ्चक्षते-जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः, प्रयोजनम्, संशयव्युदास इति, ते कस्मान्नोच्यन्त इति ? तत्राप्रतीयमानेऽर्थे प्रत्ययार्थस्य प्रर्वतिका जिज्ञासा । अप्रतीयमानमर्थं कस्मा- ज्जिज्ञासते ? 'तं तत्त्वतो ज्ञातं हास्यामि वा, उपादास्ये वा, उपेक्षिष्ये वा' इति। ता एता हानोपादानोपेक्षाबुद्धयस्तत्त्वज्ञानस्यार्थः, तदर्थमयं जिज्ञासते । सा खल्वियम- साधनमर्थस्येति । जिज्ञासाधिष्ठानं संशयश्च व्याहतधर्मोपसङ्घातात् तत्त्वज्ञाने प्रत्यासन्नः, व्याहतयोर्हि धर्मयोरन्यतरत्तत्त्वं भवितुमर्हतीति । स पृथगुपदिष्टोऽ- प्यासाधनमर्थस्येति । प्रमातुः प्रमाणानि प्रमेयाधिगमार्थानि, सा शक्यप्राप्तिर्न साधकस्य वाक्यस्य भागेन युज्यते प्रतिज्ञादिवदिति । प्रयोजनं तत्त्वावधारण- मर्थसाधकस्य वाक्यस्य फलम्, नैकदेश इति । संशयव्युदासः प्रतिपक्षोपवर्णनम्, अब अवयवों का वर्णन करते हैं- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन-न्याय वाक्य के ये ( पाँच ) अवयव हैं ॥ ३२ ॥ कुछ नैयायिक न्याय वाक्य के दश अवयव मानते हैं, जिनमें पाँच तो ऊपर गिना ही दिये गये हैं, इनके अतिरिक्त पाँच ये हैं-१. जिज्ञासा, २. संशय, ३. शक्यप्राप्ति, ४. प्रयोजन तथा ५. संशयनाश; सूत्र में ये अतिरिक्त पाँच भी क्यों नहीं कहे गये ? 'जिज्ञासा' अप्रतीयमान अर्थ में प्रत्यय होने के लिये प्रवर्त्तिका होती है, अप्रतीयमान अर्थ की इसलिए जिज्ञासा होती है कि उसे तत्त्वतः जान कर छोड़ दूँगा, या ग्रहण कर लूँगा या उपेक्षा कर दूँगा। ये हान, उपादान, उपेक्षा बुद्धियाँ तत्त्वज्ञान से होती हैं, तत्त्वज्ञान के लिए 'जिज्ञासा' काम आती है। यह किसी अर्थ की साधिका नहीं हैं, अतः पञ्चावयवों में इसका परिगणन निरर्थक है। क्योंकि जिज्ञासाधिष्ठान 'संशय' में दो विरुद्ध धर्मों का उपसंघात होता है, अतः यह तत्त्वज्ञान के लिये प्रत्यासन्न है, विरुद्ध धर्म में से अन्यतर होना चाहिए केवल इतना समझता है, इसीलिए इसका प्रमेयों में पाठ करके भी पञ्चावयवों में इसे नहीं पढा, क्योंकि यह भी अर्थसाधक कोटि में नहीं आता। प्रमाता के प्रमाण प्रमेयप्राप्त्यर्थक हैं'- यह 'शक्यप्राप्ति' साधक वाक्य में प्रतिज्ञा की तरह अवयवरूप से प्रयुक्त नहीं होती। तत्त्वावधारण को 'प्रयोजन' कहते हैं, यह अर्थ- साधक वाक्य का फल हो सकता है, अवयव नहीं। इसी तरह 'संशयव्युदास' भी तत्त्वा- भ्यनुज्ञा के लिये उपयुक्त है, क्योंकि प्रतिपक्षोपवर्णन का निषेधक है, जो तत्त्वज्ञान में सहायक हो सकता है, अर्थसाधक वाक्य का एकदेश नहीं बन सकता । [नैयायिक भद्रबाहु 'संशय', 'संशयव्युदास' के स्थान पर 'आशङ्काप्रतिषेध' का परिगणन करते हैं, उनका
४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० तत्प्रतिषेधेन तत्त्वाभ्यनुज्ञानार्थम्, न त्वयं साधकवाक्यैकदेश इति। प्रकरणे तु जिज्ञासादयः समर्थाः, अवधारणीयार्थोपकारात्। तत्त्वार्थसाधकभावात्तु प्रति- ज्ञादयः साधकवाक्यस्य भागा एकदेशा अवयवा इति ॥ ३२ ॥ प्रतिज्ञालक्षणम् तेषां तु यथाविभक्तानाम्— साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ॥ ३३ ॥ प्रज्ञापनीयेन धर्मेण धर्मिणो विशिष्टस्य परिग्रहवचनं प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा¹ साध्यनिर्देशः—'अनित्यः शब्दः' इति ॥ ३३ ॥ हेतुलक्षणम् उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः ॥ ३४ ॥ उदाहरणेन सामान्यात् साध्यस्य धर्मस्य साधनं प्रज्ञापनं हेतुः, साध्ये प्रति- सन्धाय धर्ममुदाहरणे च प्रतिसन्धाय तस्य साधनतावचनं हेतुः—'उत्पत्तिधर्म- कत्वात्' इति। उत्पत्तिधर्मकमनित्यं दृष्टमिति ॥ ३४ ॥ किमेतावद्धेतुलक्षणमिति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ? तथा वैधर्म्यात् ॥ ३५ ॥ खण्डन भी इन दोनों के खण्डन की तरह ही समझना चाहिये ।] एक प्रकरण ( कथा- प्रवृत्ति ) में ये पाँचों जिज्ञासादि अवधारणीय अर्थ के उपकारक होने से स्वरूपेण समर्थ हो सकते हैं। प्रतिज्ञादि पाँचों अवयव तो साधक वाक्य के तत्त्वार्थसाधक होने से भाग (एकदेश, अवयव) हैं। अतः सूत्रकार ने अवयव-परिगणन में इन्हीं पाँचों का ग्रहण किया है ॥ ३२ ॥ उनका विभाग करने के बाद ( प्रत्येक का लक्षण करते हैं )— वाक्य में साध्य का निर्देश 'प्रतिज्ञा' कहलाता है ॥ ३३ ॥ प्रज्ञापनीय धर्म से विशिष्ट धर्मी का परिग्राहक वाक्य 'प्रतिज्ञा' कहलाता है। अर्थात् साध्यतया स्वीक्रियमाण अर्थ का वचन 'प्रतिज्ञा' है—जैसे 'शब्दः अनित्यः' यह वचन साध्यनिर्देश है ॥ ३३ ॥ उदाहरणसादृश्य से साध्य (धर्म) का साधक 'हेतु' कहलाता है ॥ ३४ ॥ सामान्य धर्म को समझकर उदाहरण में अनुसन्धान करने के पश्चात् साध्य का साधक 'हेतु' कहलाता है। जैसे 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्' यह हेतु है। लोक में अन्य उत्पत्ति- धर्मक प्रमेय भी अनित्य ही देखा गया है ॥ ३४ ॥ क्या हेतु का लक्षण इतना ही है ? नहीं; यह भी है— उदाहरण के असादृश्य से साध्य का साधक भी 'हेतु' है ॥ ३५ ॥ १. एतत्पदं क्वचिन्नास्ति ।
३६. सू० ] न्यायप्रकरणम् ४९ उदाहरणवैधर्म्याच्च साध्यसाधनं हेतुः । कथम् ? 'अनित्यः शब्दः, उत्पत्ति- धर्मकत्वात्; अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम्, यथा आत्मादि द्रव्यम्' इति ॥ ३५ ॥ उदाहरणलक्षणम् साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम् ॥ ३६ ॥ साध्येन साधर्म्यम्-समानधर्मता । साध्यसाधर्म्यात्कारणात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त इति । तस्य धर्मस्तद्धर्मः । तस्य = साध्यस्य । साध्यं च द्विविधम्-धर्मिविशिष्टो वा धर्मः-शब्दस्यानित्यत्वम्; धर्मविशिष्टो वा धर्मी-'अनित्यः शब्दः' इति । इहोत्तरं तद्ग्रहणेन गृह्यत इति । कस्मात् ? पृथग्धर्मवचनात् । तस्य धर्म- स्तद्धर्मः, तस्य भावस्तद्धर्मभावः, स यस्मिन् दृष्टान्ते वर्तते स दृष्टान्तः साध्य- साधर्म्यादुत्पत्तिधर्मकत्वात्१ तद्धर्मभावी भवति, स चोदाहरणमिष्यते तत्र यदुत्पद्यते तदुत्पत्तिधर्मकम् । तच्च भूत्वा न भवति, आत्मानं जहाति, निरुध्यत इत्यनित्यम् । एवमुत्पत्तिधर्मकत्वं साधनम्, अनित्यत्वं साध्यम् । सोऽयमेकस्मिन् द्वयोर्धर्मयोः साध्यसाधनभावः साधर्म्याद् व्यवस्थित उपलभ्यते, तं दृष्टान्त उप- लभमानः शब्देऽप्यनुमिनोति-'शब्दोऽप्युत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यः, स्थाल्यादिवत्' हेतु अपना वैधर्म्य उदाहरण में बतला कर भी साध्य का साधक होता है । कैसे ? 'शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्मक होने से, 'जो अनुत्पत्तिधर्मक है वह नित्य है, जैसे- आत्मा आदि द्रव्य' । यहाँ आत्मादि का असमान (अदृश ) उदाहरण देकर साध्य में अनित्यत्वसाधक 'उत्पन्नत्व' हेतु सिद्ध किया गया है ॥ ३५ ॥ साध्य के सादृश्य से साध्य के धर्म से सम्बद्ध धर्म का भाव जिसमें हो वह दृष्टान्त 'उदाहरण' कहलाता है ॥ ३६ ॥ साध्यसाधर्म्य से साध्य की समानधर्मता में तात्पर्य है । उस (साध्य) का धर्म 'तद्धर्म' है । साध्य दो प्रकार का होता है-१. धर्मिविशिष्ट धर्म, जैसे-'शब्दस्य अनित्यत्वम्' या २. धर्मविशिष्ट धर्मी, जैसे-'अनित्यः शब्दः' । यहाँ द्वितीय अर्थ तद्ग्रहण से गृहीत है; क्योंकि धर्म ( अनित्यत्व ) अलग कहा गया है । उसका धर्म = तद्धर्म, तद्धर्म का भाव = तद्धर्मभाव; वह जिस दृष्टान्त में हो वह दृष्टान्त साध्य-साधर्म्य से 'तद्धर्म- भावी' होता है, वही 'उदाहरण' कहलाता है । जो उत्पन्न होता है, वह 'उत्पत्तिधर्मक' है, वह होकर नहीं भी होता है, अपने को त्याग देता है, निरुद्ध हो जाता है । इस प्रकार 'अनित्यः शब्दः, उत्पत्तिधर्मकत्वात्' इस वाक्य में साधन हुआ 'उत्पत्तिधर्मत्व', 'अनित्यत्व' हुआ साध्य । यह दो धर्मों का एकत्र साध्यसाधनभाव सादृश्य से व्यवस्थित मिलता है । प्रमाता उसे दृष्टान्त में देखता हुआ शब्द में भी अनुमान कर लेता है-'शब्द १. 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्'-इति क्वचिन्नास्ति । न्या० द० ४
५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इति । उदाह्रियतेऽनेन धर्मयोः साध्यसाधनभाव इत्युदाहरणम् ॥ ३६ ॥ तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम् ॥ ३७ ॥ दृष्टान्त उदाहरणमिति प्रकृतम् । साध्यवैधर्म्यादतद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणमिति । 'अनित्यः शब्दः, उत्पत्तिधर्मकत्वात्, अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यमा- त्मादि' । सोऽयमात्मादिर्दृष्टान्तः साध्यवैधर्म्यादनुत्पत्तिधर्मकत्वादतद्धर्मभावी, योऽसौ साध्यस्य धर्मोऽनित्यत्वं स तस्मिन्न भवतीति । अत्रात्मादौ दृष्टान्त उत्पत्तिधर्मकत्वस्याभावादनित्यत्वं न भवतीति उपलभमानः शब्दे विपर्ययमु- मिनोति—'उत्पत्तिधर्मकत्वस्य भा वादनित्यः शब्दः' इति । साधर्म्योक्तस्य हेतोः साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम् । वैधर्म्योक्तस्य हेतोः साध्यवैधर्म्यादतद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम् । पूर्वस्मिन् दृष्टान्ते यौ तौ धर्मौ साध्यसाधनभूतौ पश्यति, साध्येऽपि तयोः साध्यसाधन- भावमनुमिनोति । उत्तरस्मिन् दृष्टान्ते तयोर्धर्मयोरेकस्याभावादितरस्याभावं पश्यति, तयोरेकस्याभावादितरस्याभावं साध्येऽनुमिनोतीति । तदेतद्धेत्वाभासेषु भी अनित्य है, उत्पत्तिधर्मक होने से, स्थाल्यादि की तरह।' दो धर्मों का साध्य-साधन- भाव इससे उदाहृत होता है, अतः इसे 'उदाहरण' कहते हैं ॥ ३६ ॥ साध्य के असादृश्य से अतद्धर्मभावी दृष्टान्त भी 'उदाहरण' कहलाता है ॥ ३७ ॥ 'दृष्टान्त उदाहरण होता है'—यह प्रसङ्ग चल रहा है। यहाँ सूत्रकार कहते हैं— साध्य की असमानता से साध्य के धर्म से असम्बद्ध दृष्टान्त भी 'उदाहरण' कहलाता है। जैसे—'शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्मक होने से, जो उत्पत्तिधर्मा नहीं होता वह नित्य होता है, यथा—आत्मा आदि।' यहाँ 'आत्मा आदि' दृष्टान्त है, साध्य की असमानता से अनुत्पत्तिधर्मा होने के कारण अतद्धर्मभावी अनित्यस्वरूप साध्यधर्म उसमें ( आत्मा में ) नहीं रहता। यहाँ प्रमाता 'आत्मा आदि दृष्टान्त में उत्पत्तिधर्मत्व न रहने से अनित्यत्व नहीं बनता' ऐसा अनुभव करता हुआ, शब्द में विपरीत अनुमान करता है— 'उत्पत्तिधर्मक होने से शब्द अनित्य हैं'। साधर्म्योक्त हेतु का साध्यसमानता से युक्त तद्धर्मभावी दृष्टान्त 'उदाहरण' कहलाता है। वैधर्म्योक्तहेतु का साध्य की असमानता से अतद्धर्मभावी दृष्टान्त भी 'उदाहरण' कहलाता है। प्रथमोक्त दृष्टान्त में प्रमाता जिन दो धर्मों को साध्यसाधनभावापन्न देखता है, साध्य में भी उन दोनों के साध्यसाधनभाव का अनुमान कर लेता है। उत्तर दृष्टान्त में उन दोनों धर्मों में से एक के न रहने पर इतर का अभाव देखता है तो वह साध्य में भी उनमें से एक के अभाव का अनुमान कर लेता है। यह बात हेत्वाभासों में CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३८. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५१
३८. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५१ न सम्भवतीत्यहेतवो हेत्वाभासाः । तदिदं हेतूदाहरणयो सामर्थ्यं१ परमसूक्ष्मं दुःखबोधं पण्डितरूपवेदनीयमिति ॥ ३७ ॥ उपनयलक्षणम् उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः ॥ ३८ ॥ उदाहरणापेक्षः = उदाहरणतन्त्रः, उदाहरणवशः । वशः = सामर्थ्यम् । साध्यसाधर्म्ययुक्ते उदाहरणे—स्थाल्यादि द्रव्यमुत्पत्तिधर्मकमनित्यं दृष्टम्, तथा 'शब्द उत्पत्तिधर्मकः' इति साध्यस्य शब्दस्योत्पत्तिधर्मकत्वमुपसंह्रियते । साध्यवैधर्म्ययुक्ते पुनरुदाहरणे आत्मादि द्रव्यमनुत्पत्तिधर्मकं नित्यं दृष्टम्, न तथा शब्द इति, अनुत्पत्तिधर्मकत्वस्योपसंहारप्रतिषेधेनोत्पत्तिधर्मकत्वमुप- संह्रियते । तदिदमुपसंहारद्वैतमुदाहरणद्वैताद्भवति । उपसंह्रियतेऽनेनेति चोपसंहारो वेदितव्य इति ॥ ३८ ॥ द्विविधस्य पुनर्हेतोर्द्विविधस्य चोदाहरणस्योपसंहारद्वैते च समानम्— सम्भव नहीं हैं; क्योंकि हेत्वाभास अहेतुक हैं । यह हेतु-उदाहरण का सामर्थ्य ( सादृश्य ) परमसूक्ष्म है, दुरवबोध है, न्यायशास्त्रज्ञ विद्वान् ही इसे समझ सकते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरण की अपेक्षा रखते हुए 'वैसा ही यह है' या 'वैसा यह नहीं है'—साध्य का यह उपसंहार 'उपनय' कहलाता है ॥ ३८ ॥ 'उदाहरणापेक्ष' से तात्पर्य है उदाहरणानुसारो अर्थात् उदाहरणवश । 'वश' कहते हैं 'सामर्थ्य' को । अक्षरार्थ हुआ 'उदाहरण से सामर्थ्य ( शक्ति ) पाया हुआ' । जिस प्रमाता ने साध्य के सादृश्य से युक्त उदाहरण में स्थाली-आदि द्रव्य को उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य देखा है, वह प्रमाता 'शब्द उत्पत्तिधर्मक है' इस अनुमान में साध्य द्रव्य का अनित्यत्वविशिष्ट शब्द में उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत कर लेता है। इसी तरह साध्य की असदृशता से युक्त उदाहरण में आत्मा-आदि द्रव्य को अनुत्पत्तिधर्मा होने से नित्य समझा है, वह नित्यत्व शब्द में नहीं है, क्योंकि अनुत्पत्तिधर्मकत्व के उप- संहारप्रतिषेध से वहाँ उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत हो जाता है । अन्वय-व्यतिरेकी रूप से उदाहरण के दो भेदों से उपसंहार के ये दो भेद हो जाते हैं । जिससे उपसंहार ( उपन्यास ) हो वह 'उपसंहार' कहलाता है ॥ ३८ ॥ दो प्रकार के हेतु कह दिये गये तथा दो प्रकार के उदाहरण और उपसंहार (उप- नय) भी बता दिये गये, उसी तरह अब दो प्रकार के निगमन का भी व्याख्यान कर रहे हैं। १. 'साधर्म्यम्'—इति पाठः।
५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० निगमनलक्षणम् हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञाया पुनर्वचनं निगमनम् ॥ ३९ ॥ साधर्म्योक्ते वा वैधर्म्योक्ते वा यथोदाहरणमुपसंह्रियते, 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । निगम्यन्ते अनेनेति प्रतिज्ञाहेतूदाहरणो- पनया एकत्रेति निगमनम् । निगम्यन्ते = समर्थ्यन्ते, सम्बध्यन्ते । तत्र साधर्म्योक्ते तावद्धेतौ वाक्यम् —'अनित्यः शब्दः' इति प्रतिज्ञा, 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्' इति हेतुः, 'उत्पत्तिधर्मकं स्थात्यादि द्रव्यमनित्यम्' इत्यु- दाहरणम्, 'तथा चोत्पत्तिधर्मकः शब्दः' इत्युपनयः, 'तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वा- दनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । वैधर्म्योक्तेऽपि — 'अनित्यः शब्दः', 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्', 'अनुत्पत्तिधर्म- कमात्मादि द्रव्यं नित्यं दृष्टम्', 'न च तथानुत्पत्तिधर्मकः शब्दः', 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति । अवयवसमुदाये च वाक्ये सम्भूयेतरेतराभिसम्बन्धात् प्रमाणान्यर्थान् साध- यन्तीति । सम्भवस्तावत्-शब्दविषया प्रतिज्ञा, आप्तोपदेशस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यां हेतु-कथन के बाद प्रतिज्ञा को फिर से दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है ॥ ३९ ॥ साधर्म्ययुक्त या वैधर्म्ययुक्त हेतुकथनानन्तर जैसे उदाहरण अपना काम कर चुका होता है, उसी प्रकार उत्पत्तिधर्मकत्वहेतु से उपसंहृत 'शब्द अनित्य है'—इस प्रकार प्रतिज्ञा को पुनः दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है । निगमन में प्रतिज्ञा-आदि चतुष्टय समर्थित होते हैं । साधर्म्ययुक्त हेतु में वाक्य यों विभक्त होगा—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा हुई, 'उत्पत्तिधर्मा होने से' यह हेतु हुआ, 'उत्पत्तिधर्मा स्थाली आदि द्रव्य अनित्य होते हैं' यह उदाहरण हुआ, 'वैसा ही यह शब्द है' यह उपनय हुआ, 'इसलिये उत्पत्तिधर्मा होने से शब्द अनित्य है' यह निगमन हुआ । वैधर्म्ययुक्त हेतुवाक्य में—'शब्द अनित्य हैं', 'उत्पत्तिधर्मा होने से', 'अनुत्पत्तिधर्मा आत्मादि द्रव्य नित्य देखा गया हैं', 'यह शब्द वैसा अनुत्पत्तिधर्मक नहीं है', 'इसलिये उत्पत्तिधर्मक होने से शब्द अनित्य है'—इस प्रकार पञ्चावयव का प्रयोग होगा । इस पञ्चावयवयुक्त वाक्य में अनेक प्रमाण सम्मिलित होकर परस्पर सम्बद्ध रहते हुए अर्थसाधन करते हैं । प्रमाणों के इस सम्मिश्रण को इस तरह समझना चाहिये—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा आप्तोपदेश है, ऋष्यनुक्त आप्तोपदेश स्वतन्त्र नहीं हो सकता, उसमें अवश्य प्रत्यक्ष या अनुमान की आवश्यकता पड़ेगी, अतः प्रतिज्ञा में प्रत्यक्ष तथा अनुमान का सम्मिश्रण हुआ । इसी प्रकार साध्य-साधन की व्याप्ति को उदाहरण में देखकर ही हेतु का CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३९. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५३
३९. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५३ प्रतिसन्धानाद्, अनुह्वेश्च स्वातन्त्र्यानुपपत्तेः । अनुमानं हेतुः, उदाहरणे सादृश्य- प्रतिपत्तेः। तच्चोदाहरणभाष्ये १ (१.१.३६) व्याख्यातम् । प्रत्यक्षविषयमुदाहरणम्, दृष्टेनादृष्टसिद्धेः । उपमानमुपनयः, 'तथा' इत्युपसंहारात्, 'न च तथा' इति वोपमानधर्मप्रतिषेधे विपरीतधर्मोपसंहारसिद्धेः। २सर्वेषामेकार्थप्रतिपत्तौ सामर्थ्य- प्रदर्शनं निगमनमिति । इतरेतराभिसम्बन्धोऽपि-असत्यां प्रतिज्ञायामनाश्रया हेत्वादयो न प्रवर्त्तेरन् । असति हेतौ कस्य साधनभावः प्रदर्श्येत, उदाहरणे साध्ये च कस्योपसंहारः स्यात्, कस्य चापदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनं स्यादिति ! असत्युदाहरणे केन साधर्म्यं वैधर्म्यं वा साध्यसाधनमुपादीयेत, कस्य वा साधर्म्यवशादुपसंहारः प्रवर्त्तेत ! उपनयं चान्तरेण साध्येऽनुपसंहृतः साधको धर्मो नार्थं साधयेत् । निगमनाभावे चानभिव्यक्तसम्बन्धानां प्रतिज्ञादीनामेकार्थेन प्रवर्त्तनं 'तथा' इति प्रतिपादनं कस्येति ! अथावयवार्थः—साध्यस्य धर्मस्य धर्मिणा सम्बन्धोपादानं प्रतिज्ञार्थः, हेतुत्व निश्चित होता है, अतः उदाहरण में सादृश्य-प्रतिपादन से हुए अनुमान को ही 'हेतु' कहते हैं । इसका विशद विवेचन हम पीछे उदाहरणसूत्र-व्याख्यान (१.१.३६) के समय कर आये हैं । उदाहरण प्रत्यक्षाधीन होता है; क्योंकि उस दृष्ट उदाहरण से अदृष्ट (परोक्ष) की सिद्धि की जाती है । उपनय को उपमान प्रमाण की जरूरत पड़ती है; क्योंकि इस उपनय में 'वैसा ही' यह उपसंहार होता है, या 'वैसा नहीं' यह उपमान- धर्म प्रतिषिद्ध होने पर विपरीतधर्मा (वैधर्म्ययुक्त) उपसंहार सिद्ध हो सकेगा । 'प्रतिज्ञा से उपनय तक का अर्थ या स्वभाव प्रतिबद्धलिङ्ग हैं'-ऐसा प्रतिपादनसामर्थ्य दिखाना निगमन का अर्थ होने से उसमें सब प्रमाणों का सम्मिश्रण स्पष्ट ही है । इनका परस्पर सम्बन्ध यों समझना चाहिये-पहली बात तो यह है कि वाक्य में में प्रतिज्ञा के न रहने पर आश्रयरहित हेत्वादि की प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । हेतु के न रहने पर वाक्य में साधनत्व किसका दिखायेंगे ! उदाहरण और साध्य में किसका उप- संहार करेंगे ! किसके कथनानन्तर प्रतिज्ञा का पुनर्वचन करेंगे कि वाक्यपूर्ण हो जाये ! दूसरी बात यह है कि उदाहरण के न कहने पर किसके साथ समानता या असमानता मानकर साध्य की सिद्धि दिखायेंगे और किस साधर्म्य की अपेक्षा से उपसंहार करेंगे ! उपनय के बिना साध्य में अनुपसंहृत साधक धर्म अर्थसिद्धि नहीं कर सकता ! निगमन के बिना प्रतिज्ञादिकों का परस्पर सम्बन्ध अभिव्यक्त न हो पायेगा, तब उनकी एक प्रयोजन से प्रवृत्ति, 'तथा' ऐसा प्रतिपादन किसका होगा ! अब अवयवों का फलनिरूपण करते हैं—साध्य धर्म का धर्मी से सम्बन्ध-बोधन १. उदाहरणसूत्रव्याख्यावसर इत्यर्थः । २. प्रतिज्ञादिनिगमनान्तानाम् ।
५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० उदाहरणेन समानस्य विपरीतस्य वा साध्यस्य धर्मस्य साधकभाववचनं हेत्वर्थः, धर्मयोः साध्यसाधनभावप्रदर्शनमेकत्रोदाहरणार्थः, साधनभूतस्य धर्मस्य साध्येन धर्मेण सामानाधिकरण्योपपादनमुपनयार्थः, उदाहरणस्थयोर्धर्मयोः साध्यसाधन- भावोपपत्तौ साध्ये विपरीतप्रसङ्गप्रतिषेधार्थं निगमनम् । न चैतस्यां हेतूदाहरणपरिशुद्धौ सत्यां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वं प्रक्रमते । अव्यवस्थाप्य खलु धर्मयोः साध्य- साधनभावमुदाहरणे जातिवादी प्रत्यवतिष्ठते । व्यवस्थिते तु खलु धर्मयोः साध्यसाधनभावे दृष्टान्तस्थे गृह्यमाणे साधनभूतस्य धर्मस्य हेतुत्वेनोपादानम्; न साधर्म्यमात्रस्य, न वैधर्म्यमात्रस्य वेति ॥ ३९ ॥ न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् [ ४०-४१ ] तर्कलक्षणम् इत ऊर्ध्वं तर्को लक्षणीय इति । अथेदमूच्यते— अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः ॥ ४० ॥ अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे १ जिज्ञासा तावज्जायते—जानीयेममर्थमिति । अथ जिज्ञासितस्य वस्तुनो व्याहतो धर्मौ विभागेन विमृशति—किंस्विदित्थम्, आहो- प्रतिज्ञा का प्रयोजन है। उदाहरण के तुल्य या विपरीत साध्य धर्म के प्रति साधकत्व- बोधन ही हेतु का प्रयोजन है । लिङ्ग-लिङ्गी की व्याप्ति को एक दृष्टान्त में बोधन करना उदाहरण का प्रयोजन है । साधनभूत धर्म का साध्य धर्म से सामानाधिकरण्य बतलाना उपनय का कार्य है । उदाहरण में मिले धर्मों का साध्य-साधनभाव बन जाने पर साध्य में विपरीत प्रसङ्ग का निषेध बतलाना निगमन का प्रयोजन है । हेतु और उदाहरण का इतना स्पष्ट व्याख्यान कर देने पर वाद में साधर्म्य तथा वैधर्म्य के प्रतिषेध से जातिनिग्रहस्थान का बाहुल्य नहीं हो पायेगा; उदाहरण में लिङ्ग- लिङ्गी के धर्मों का साध्यसाधनभाव अनङ्गीकार करके जातिवादी प्रतिषेध का बाहुल्य करता है । दृष्टान्तस्थ धर्मों का साध्यसाधनभाव व्यवस्थित ( प्रमित, शुद्ध ) रूप से स्वी- कार कर लेने पर तो साधनभूत धर्म का ही हेतुरूप से ग्रहण होगा, न कि साधर्म्यमात्र या वैधर्म्यमात्र के हेतुत्व का ॥ ३९ ॥ अवयनिरूपण के बाद तर्क का लक्षण दिखाना चाहिये, अतः अब उसे कहते हैं— सम्यक्तया अविज्ञात अर्थ में कारणोपपत्ति द्वारा उसके तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा करना 'तर्क' कहलाता है ॥ ४० ॥ भली भाँति न जाने हुए अर्थ को जानने की इच्छा होती है—'इस अर्थ को जान लूँ'। तदनन्तर उस जिज्ञासित वस्तु के विरुद्ध धर्मों पर विभागशः विचार करता है—'क्या यह १. अविज्ञायमान०-पाठा० ।
४०. सू० ] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५५
४०. सू० ] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५५ स्विन्नेत्थमिति । विमृश्यमानयोर्धर्मयोरेकं कारणोपपत्त्या अनुजानाति—सम्भ- वत्यस्मिन् कारणं प्रमाणं हेतुरिति, कारणोपपत्त्या स्यात्-एवमेतन्नेतरदिति । तत्र निदर्शनम्-योऽयं ज्ञाता ज्ञातव्यमर्थं जानीते तं 'तत्त्वतो भो जानीयं' इति जिज्ञासते । 'स किमुत्पत्तिधर्मकः ? अनुत्पत्तिधर्मकः ?' इति विमर्शः । विमृश्य- मानेऽविज्ञाततत्त्वेऽर्थे यस्य धर्मस्याभ्यनुज्ञाकारणमुपपद्यते तमनुजानाति-‘यद्य- यमनुत्पत्तिधर्मकः, ततः स्वकृतस्य कर्मणः फलमनुभवति ज्ञाता । दुःखजन्मप्रवृत्ति- दोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरमुत्तरं पूर्वस्य पूर्वस्य कारणमुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग इति स्यातां संसारापवर्गौ । उत्पत्तिधर्मके ज्ञातारि पुनर्न स्याताम् । उत्पन्नः खलु ज्ञाता देहेन्द्रियबुद्धिवेदनाभिः सम्बध्यत इति नास्येदं स्वकृतस्य कर्मणः फलम्, उत्पन्नश्च भूत्वा न भवतीति तस्याविद्यमानस्य निरुद्धस्य वा स्वकृतकर्मणः फलोपभोगो नास्ति । तदेवमेकस्यानकशरीरयोगः शरीर- वियोगश्चात्यन्तं न स्यात्' इति । यत्र कारणमनुपपद्यमानं पश्यति तन्नानुजानाति । सोऽयमेवंलक्षण ऊहस्तर्क इत्युच्यते । ऐसी हैं' या 'क्या यह ऐसी नहीं हैं' । दोनों धर्मों पर विचार करता हुआ वह किसी एक धर्म के बारे में कारणोपपादन से अनुमान करता है कि 'इसमें यह कारण, यह हेतु, यह प्रमाण स्पष्ट है । कारणोपपादन से यह ऐसा ही है या ऐसा नहीं हैं' । उदाहरण—कोई प्रमाता ज्ञातव्य अर्थ को साधारणतः जानता है, तब उसे 'अरे, इसे सम्यक्तया ( भली भाँति ) जान लूँ'—ऐसी जिज्ञासा होती है । 'यह ज्ञातव्य अर्थ उत्पत्तिधर्मक है या अनुत्पत्तिधर्मक ?'—यह 'विमर्श' कहलाता है । उस अविज्ञाततत्त्व वाले अर्थ का विमर्श करने पर जिस धर्म की स्वीकृति का कारण उपपन्न हो जाये, उसका वह अनुमान करता है । जैसे—"यदि यह ज्ञाता अनुत्पत्तिधर्मक है तो स्वकृत कर्मफल का अनुभव करता है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्याज्ञान—ये उत्तरोत्तर अपने से पूर्व पूर्व के कारण हैं, उत्तरोत्तर के अपाय से बाद में कुछ शेष नहीं रह जाता, तब मोक्ष हो जाता है । अतः उस ज्ञाता के—संसार तथा अपवर्ग, दोनों हो सकते हैं । उस ज्ञाता के उत्पत्तिधर्मा होने पर ये—संसार तथा अपवर्ग, उसको नहीं नहीं बनेंगे; क्योंकि उत्पन्न ज्ञाता देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना से सम्बद्ध रहता है इसलिये यह स्वकृत कर्म का फल नहीं बन सकता ( क्योंकि वह ज्ञाता अनित्य होने से कालान्तरभावी फल का अधिकरण नहीं बन सकता ) । उत्पन्न होकर वह पुनः न उत्पन्न हो—यों अपना विनाश या निरोध होने पर स्वकृतकर्म-फल वह कैसे भोगेगा ! इस तरह एक का अनेक शरीरों के साथ सम्बन्ध, तथा वियोग भी नहीं बनेगा ।" जहाँ कारण उत्पन्न नहीं होता वहाँ वह कोई अनुमान भी नहीं कर पाता । इस तरह के लक्षणों वाली यह जिज्ञासा तर्क कहलाती है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति ? अनवधारणात् । अनुजा- नात्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या, न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चि- नोति—'एवमेवेदम्' इति । कथं तत्त्वज्ञानार्थ इति ? तत्त्वज्ञानविषयाभ्यनुज्ञालक्षणानुग्रहभावितात् १ प्रसन्नादनन्तरप्रमाणसामर्थ्यात्तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इत्येवं तत्त्वज्ञानार्थ इति । सोऽयं तर्कः प्रमाणानि प्रतिसन्दधानः प्रमाणाभ्यनुज्ञानात् प्रमाणसहितो वादेऽपदिष्ट२ इति अविज्ञाततत्त्वमनुजानाति–यथा सोऽर्थो भवति तस्य ३तथा- भावस्तत्त्वमविपर्ययो याथातथ्यम् ॥ ४० ॥ निर्णयलक्षणम् एतस्मिंश्च तर्कविषये— विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः ॥ ४१ ॥ स्थापना = साधनम्, प्रतिषेधः = उपालम्भः । तौ साधनोपालम्भौ पक्षप्रति- उक्त जिज्ञासु का वह तर्क 'तत्त्वज्ञान के लिये' क्यों कहा जाये, उसे तत्त्वज्ञान' ही क्यों न मान लिया जाये ? अवधारण ( निश्चय ) न होने से उसे तत्त्वज्ञान नहीं कहा जा सकता । वह कारणोपपत्ति से किसी एक धर्म को लेकर समझने से अनुमान ही कर पाता है, उनमें भेद नहीं कर पाता, न उनके भेद का प्रयास करता है । न 'यह ऐसा ही है'—यों निश्चयकर पाता है ! यह 'तत्त्वज्ञान के लिये' कैसे है ? तत्त्वज्ञानविषय अभ्यनुज्ञायुक्त जिज्ञासा से भली भांति भावित होने के बाद प्रमाण का समर्थन पाकर तत्त्वज्ञान होता है—इसलिये 'तत्त्व- ज्ञान के लिये' कहा । ऐसा यह तर्क प्रमाणों का समर्थन करता हुआ प्रमाणस्वीकृति से प्रमाणों के साथ हुआ वाद में व्यवहृत होता है । यों वह जिज्ञासु अविज्ञात तत्त्व का अनुज्ञान करता है—'जो अर्थ जैसा है उसका वैसा ही होना तत्त्व है' । इसे ही 'अविपर्यय' या 'याथा- तथ्य' कहते हैं ॥ ४० ॥ इस तर्क के विषय में— विचारकर पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय करना 'निर्णय' कहलाता है ॥ ४१ ॥ वाद में स्वपक्षस्थापन साधन है, परपक्षप्रतिषेध उपालम्भ है, ये साधन-उपालम्भ क्रमशः पक्षप्रतिपक्षाश्रित हैं, एक दूसरे के विरुद्ध हैं, परन्तु साथ (एक वाद में) ही रहते हैं, इन्हें ही पक्ष-प्रतिपक्ष कह देते हैं । ( वाद में ) इन दोनों में से किसी एक की निवृत्ति १. '०णानूहाद्भा०' इति पाठ० । २. 'उपदिष्टः', कुत्रचिच्च 'प्रदिष्टः' इति पाठ० । ३. 'यथाभावः' इति पाठ० ।
सूत्र में ‘विमृश्य’ का अर्थ है विमर्श करके। यह विमर्श पक्ष-प्रतिपक्ष को नियम से
४१. सू०] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५७ पक्षाश्रयौ व्यतिषक्तावनुबन्धेन प्रवर्त्तमानो पक्षप्रतिपक्षावित्युच्येते। तयोरन्यतरस्य निवृत्तिः, एकतरस्यावस्थानमवश्यम्भावि। यस्यावस्थानं तस्यावधारणं निर्णयः। नेदं पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं सम्भवतीति, एको हि प्रतिज्ञातमर्थं हेतुतः स्थापयति, प्रतिषिद्धं१ चोद्धरति द्वितीयस्य। द्वितीयेन स्थापनाहेतुः प्रतिषिद्ध्यते, तस्यैव प्रतिषेधहेतुश्चोद्ध्रियते स निवर्त्तते, तस्य निवृत्तौ योऽवतिष्ठते तेनार्थाव- धारणं निर्णय इति ? उभाभ्यामेवार्थविधारणमित्याह। कया युक्त्या? एकस्य सम्भवो द्वितीय- स्यासम्भवः, तावेतौ सम्भवासम्भवौ विमर्शं सह निवर्त्तयत उभयसम्भवे। उभयासम्भवे त्वनिवृत्तो विमर्श इति। विमृश्येति विमर्शं कृत्वा। सोऽयं विमर्शः पक्षप्रतिपक्षाववद्योत्य२ न्यायं प्रवर्त्तयतीत्युपादीय्त इति। एतच्च विरुद्धयोरेकधर्मिस्थयोर्बोद्धव्यम्। यत्र तु धर्मिसामान्यगतौ विरुद्धौ धर्मौ हेतुतः सम्भवतः तत्र समुच्चयः; हेतुतोऽर्थस्य तथाभावोपपत्तेः। यथा तथा एक की स्थापना अवश्यम्भावी है। जिसकी स्थापना हो उसका निश्चय करना ही ‘निर्णय’ कहलाता है। शङ्का—यह पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थावधारण नहीं बन पायेगा; क्योंकि इसमें वादी पक्ष प्रतिज्ञात अर्थ की स्थापना हेतु से उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी = प्रतिपक्ष उस स्थापनाहेतु का खण्डन करता है। पुनः वादी प्रतिवादी के मत का निराकरण कर स्वस्थापनाहेतु का मण्डन करता है। यों अन्त में एक के ही विजयी होने पर दूसरे के हट जाने से पक्ष या प्रतिपक्ष में से किसी एक के ही निर्णय की स्थिति बनेगी, अतः सूत्र में ‘पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा’—यह पद निरर्थक है ? दोनों से अर्थावधारण होता है—ऐसा ही मानते हैं। किस युक्ति से ? एक (वादी) का स्थापनापक्ष ‘संभव’ तथा दूसरे (प्रतिवादी) का खण्डनपक्ष ‘असम्भव’ कहलाता है, ये दोनों (सम्भव और असम्भव) मिलकर ही विमर्श (संशय) की निवृत्ति करते हैं। दोनों (वादी-प्रतिवादी) के होने पर तो वह (वाद) निवृत्त नहीं होगा, अतः विमर्श ही कहलायेगा, ‘निर्णय’, नहीं। सूत्र में ‘विमृश्य’ का अर्थ है विमर्श करके। यह विमर्श पक्ष-प्रतिपक्ष को नियम से स्वविषय बनाकर न्याय को प्रवृत्त करता है, अतः वाद में इसका ग्रहण करना आव- श्यक है। तथा विरुद्ध होते हुए एकधर्म में रहने वाले सम्भव असम्भव का ही यह विमर्श समझना चाहिये। यह विरोध व्यक्तिभेद और कालभेद से द्विविध है। जहाँ दोनों विरुद्ध १. प्रतिषेधमित्यर्थः। वाद्युक्तहेतोर्दूषणमिति भावः। २. नियमेन विषयीकृत्य।
५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ‘क्रियावद् द्रव्यम्’ इति लक्षणवचने यस्य द्रव्यस्य क्रियायोगो हेतुतः सम्भवति तत् क्रियावत्, यस्य न सम्भवति तदक्रियमिति । एकधर्मिस्थयोश्च विरुद्धयोर्धर्म- योरयुगपद्भाविनोः कालविकल्पः, यथा—तदेव द्रव्यं क्रियायुक्तं क्रियावत्, अनु- त्पन्नोपरतक्रियं पुनरक्रियमिति । न चायं निर्णये नियमः—विमृश्यैव पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णय इति; किन्त्विन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नप्रत्यक्षेऽर्थावधारणं निर्णय इति । परीक्षा- विषये तु विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः, शास्त्रे वादे च विमर्शवर्जम् ॥ ४१ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् । धर्म धर्मसामान्य में ही युक्ति द्वारा व्यवस्थित हैं, वह 'समुच्चय' (सामान्य मेलन) कहलाता है; क्योंकि हेतु से विरुद्ध-धर्मद्वयोपपत्ति होती है, जैसे—'द्रव्य क्रियावान् है' इस लक्षणवाक्य में जिस द्रव्य का क्रियायोग हेतु से संभव है वह 'क्रियावान्' है, जिसका क्रियायोग संभव नहीं है, वह 'अक्रिय' है । तथा ऐसे धर्म जो विरुद्ध हों, तथा एकधर्मी में रहते हों, परन्तु एक कालावच्छिन्न न (अयुगपद्भावी) हों, वह 'कालविकल्प' कहलाता है । जैसे—वही द्रव्य जब क्रियायुक्त रहता है तब 'क्रियावान्' कहलाता है, जब वह अनुत्पन्नोपरतक्रिय (उसमें क्रिया न रहे) हो तो 'अक्रिय' कहलाता है । निर्णय में यह नियम नहीं है कि वह सन्देह करके पक्ष-प्रतिपक्ष से अर्थावधारण करे तभी निर्णय कहलाये; अपितु इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष से उत्पन्न प्रत्यक्षविषयक अर्थ का अव- धारण भी निर्णय कहलाता है । परीक्षास्थलों में ही विमर्श करके पक्षप्रतिपक्ष से अर्था- वधारण निर्णय कहलाता है, शास्त्र और वाद के स्थलों में इस निर्णय-लक्षण में 'विमृश्य' पद की आवश्यकता नहीं है ॥ ४१ ॥ वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य (सहित न्यायदर्शन) में प्रथमाध्याय के प्रथमाह्निक का व्याख्यान समाप्त ॥
कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ]
[ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ] वादलक्षणम् तिस्रः कथा' भवन्ति—वादः, जल्पः, वितण्डा चेति । तासाम्— प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्ष- परिग्रहो वादः ॥ १ ॥ एकाधिकरणस्थौ विरुद्धौ धर्मो पक्षप्रतिपक्षौ, प्रत्यनीकभावाद्-अस्त्यात्मा, नास्त्यात्मेति । नानाधिकरणस्थौ विरुद्धौ न पक्षप्रतिपक्षौ, यथा—नित्य आत्मा, अनित्या बुद्धिरिति । परिग्रहः = अभ्युपगमव्यवस्था । सोऽयं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । तस्य विशेषणं प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः—प्रमाणतर्कसाधनः, प्रमाण- तर्कोपालम्भः । प्रमाणैस्तर्केण च साधनमुपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति। साधनम् = स्थापना । उपालम्भः = प्रतिषेधः । तौ साधनोपालम्भौ उभयोरपि पक्षयोर्व्य- तिषक्तावनुबद्धौ च यावदेको निवृत्त एकतरो व्यवस्थित इति निवृत्तस्योपालम्भः, व्यवस्थितस्य साधनमिति । वाद, जल्प, वितण्डा भेद से कथा तीन प्रकार की होती हैं, उनमें— प्रमाण तथा तर्क द्वारा स्वपक्षस्थापन-परपक्षनिषेध से युक्त, सिद्धान्त के अनुकूल, प्रतिज्ञादि पञ्चावयव सम्पन्न, पक्ष-प्रतिपक्षसहित वाक्यसमूह को 'वाद' कहते हैं ॥ १ ॥ एक अधिकरण में रहनेवाले, परस्पर विरोधी होने से विरोधी धर्म एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष कहलाते हैं। जैसे—'आत्मा हैं' और 'आत्मा नहीं हैं', ये दोनों वाक्य एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष हैं, क्योंकि एक ही अधिकरण की सत्ता का स्थापन या निषेध किया जा रहा है । अनेक अधिकरणवाले विरोधी धर्म आपस में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन पाते । जैसे 'आत्मा नित्य हैं' और 'बुद्धि अनित्य हैं', ये दोनों वाक्य परस्पर में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन सकते; क्योंकि यहाँ नित्यता-अनित्यता की स्थापना या निषेध पृथक् अधिकरण में किया जा रहा है। परिग्रह = स्वीकृति की व्यवस्था । ऐसा यह पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह 'वाद' कहलाता है । 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ' वाद का विशेषण है । अर्थात् इस वाद में प्रमाण तर्क ( स्वपक्ष में ) उपस्थित किये जाते हैं तथा ( परपक्ष के ) प्रमाण तर्क का खण्डन होता है । 'साधन' का अर्थ है 'स्थापना', उपालम्भ का अर्थ है 'प्रतिषेध' । ये साधन और उपालम्भ दोनों ही पक्षों में लगे हुए हैं, उनमें अनुबद्ध है । जहाँ एक निवृत्त हुआ दूसरा स्थित हो ही जायगा । संक्षेप में निवृत्त का निषेध तथा व्यवस्थित की स्थापना ही वाद का लक्ष्य है। १. नानाप्रवक्तृकविचारविषया वाक्यसन्दृब्धिः कथा'—इति तात्पर्यटीकासम्मतं कथालक्षणम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० जल्पे निग्रहस्थानविनियोगाद् वादे तत्प्रतिषेधः । प्रतिषेधे कस्यचिदभ्यनुज्ञा- नार्थम् ‘सिद्धान्ताविरुद्धः’ इति वचनम् । ‘सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः’ ( १. २. ६ ) इति हेत्वाभासस्य निग्रहस्थानस्याभ्यनुज्ञा वादे । ‘पञ्चावयवोपपन्नः’ इति—‘हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्’ (५. २. १२), ‘हेतूदाहरणाधिकमधिकम्’ (५. २. १३) इति च—एतयोरभ्यनुज्ञानार्थामिति । अवयवेषु प्रमाणतर्कान्तर्भावे, पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणं साधनोपालम्भव्यति- षङ्गज्ञापनार्थम् । अन्यथोभावपि पक्षौ स्थापनाहेतुना प्रवृत्तौ वाद इति स्यात् । अन्तरेणापि चावयवसम्बन्धं प्रमाणान्यर्थं साधयन्तीति दृष्टम्, तेनापि कल्पेन ‘साधनोपालम्भौ वादे भवतः’ इति ज्ञापयति । ‘छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपा- लम्भो जल्पः’ इति वचनाद् विनिग्रहो जल्प इति मा विज्ञायि, छलजातिनिग्रह- स्थानसाधनोपालम्भ एव जल्पः, प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भो वाद एव—इति मा क्योंकि निग्रहस्थान को जल्प में स्वीकार किया गया है, अतः उसका वाद में प्रयोग नहीं होता । निग्रहस्थान के निषिद्ध होने पर भी किसी एक की अभ्यनुज्ञा ( स्वीकृति ) के लिये लक्षण में सिद्धान्ताविरुद्ध पद दिया गया है । ‘अभ्युपेतसिद्धान्त के विरोध में जो अर्थ है वह विरुद्ध होता हैं’ ( १. २. ६ )—इस ‘विरुद्ध’ हेत्वाभासरूप निग्रहस्थान की वाद में स्वीकृति है । पञ्चावयवोपपन्न पद ‘“पञ्चावयवों में किसी एक अवयव से हीन वाक्य का प्रयोग ‘हीन’ निग्रहस्थान होता है” (५. २. १. १२) तथा “एक से कार्य सिद्ध होनेपर भी वाक्य में अधिक हेतु या उदाहरणों का प्रयोग ‘अधिक’ निग्रहस्थान कहलाता है” (५. २. १३) इन दोनों निग्रहस्थानों की स्वीकृति के लिये है । अवयवों में प्रमाण तथा तर्क का अन्तर्भाव हो सकने पर भी उनका लक्षण में पृथक् ग्रहण स्थापना तथा निषेध का व्यतिषङ्ग ( अनुबन्ध ) बतलाने के लिये किया है । अन्यथा वाद में प्रवृत्त दोनों ही पक्ष अपने-अपने अर्थ की स्थापनामात्र करेंगे, तब पक्ष- स्थापनामात्र ‘वाद’ कहलाने लगेगा । तथा अवयव-सम्बन्ध के विना भी प्रमाण अर्थ की साधना कर देते हैं—ऐसा लोक में देखा जाता है । इस कल्प में प्रमाण से ‘स्थापना’ और ‘प्रतिषेध’ वाद में हो सकते हैं—यह ज्ञापित करते हैं । उक्त दोनों पदों के ग्रहण का यह भी प्रयोजन है कि अनुपद वक्ष्यमाण ‘छल जाति-निग्र- हस्थान-साधनोपालम्भयुक्त पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह जल्प कहलाता है’ ( १. २. २ )—इस वचन से ‘जल्प वादगत निग्रहरहित होता है’—ऐसा न समझ ले । अथ च, यह भी न समझ बैठे कि ‘छल-जाति-निग्रहस्थान साधनोपालम्भ ही जल्प है’ या ‘प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ ही वाद CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri