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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पद्मावत। १३ जम्बू दीप कहूँ तस नाईं। लङ्कदीप संरपोच न भाई ॥ दीपगुस सहल आरण परा। दीपमहो सिंहल बाँस हरा ॥ ॥ दो० ॥ सत्र संसार औ पृथिवी, आये सातो दीप। एक दीप नहिं आतिम, सिंहल दीप समीप॥ गन्धर्वसेन सुगन्ध नरेशू। सो राजा वह ताकर देशू ॥ लंका सुना जो रावण राजू। तेहु जाहि बर ताकर साजू ॥ छप्पन कोटकटकै दलसाजा। सबै छत्रपति औ गढ़राजा ॥ सोरह सहसै घोड़ घुड़शारों। श्यार्मकरणजसत्रांक तुपारा ॥ सात सहसै हस्ती सिंहली। ईम कैलासं ऐरापति बली ॥ अश्वपतिक शिर मौर कहावे। गजपतीकै अँकुशगर्जै नावे॥ नरपतीकै कहुँ और नरिन्दू। भूपतीक जगे दूसरइन्दू ॥ दो० ऐसो चकैवे राजा, चेहूँखण्ड भू होय । सबै आय शिरनावहीं, सरबर करी न कोय ॥ जोहि दीप नेरे भा जाय। जनु कैलास तीर भा आय ॥ गहन अंबरोंउ लागचहुँपासा। उठी भूमि हतिलागि प्रकासा॥ तरखेरै सबै मलयँगिरि लाये। भइजगछाहिं र्यनि है आये ॥ मिली सुमेर सुहाई छोहां। जेठ जाड़लागै तेहि माहां ॥ वही छाहिं र्यनि है आवै। हरियर सबै प्रकास देखावै ॥ पन्थकै जो पहुँचे सहि घामू। दुख बिसरे सुखहोय विश्रामू ॥ जिन्ह वह पाई छाहिं अनूपों। फिरि न आय सही यहिधूप॥ बराबर १ राजा २ फौज ३ हजार ४-७ अस्तवल ५ घोड़े की जात ६ हाथी ८ बराबर ६ नाम पहाड़ १० नाम हाथी राजा इन्द्र ११ घोड़े सवार १२ हाथी सवार १३ हाथी १४ राजा १५-१६-१७ दुनिया १८ राजा इन्द्र १६ चक्रवर्त्ती २० तमाम दुनिया २१ बराबर २२ नाम पहाड़ २३ गुंजान २४ बाग २५ ज़मीन २६ पेड़ २७ चन्दन २८ रात्रि २६-३१ पहाड़ ३० मुसाफ़िर ३२ आराम ३३ बेमिसाल ३४ ॥

१४ पद्मावत। दो० अस अँबराउँ सघनघन, बरणि न पारौं अन्त। फरी फूली छयों ऋतु, जानहु सदा वसन्त॥ फरे अम्ब अति सघन सुहाये। औ जसफरी औधिक शिरनाये॥ कटहर दार पेड़ सो पाके। बड़हर सो अनूप अतिताके॥ खिरनी पाकर खांड़ अस मीठी। जामुनपाक भँवर अस दीठी॥ तरवर फरे फरे खरहरे। फरे जानि इन्द्रासन परे॥ पुनि महुवा चुव अधिकै मिठासू। मँधु जसमीठ पुहुप जसवासू॥ और खजहजाँ उनकर नाउँ। देखा सब रानी अँवराउँ॥ लागि सबै जस अमृत शाखा। रहै लुभाय सोई जो चाखा॥ दो० लवँग सुपारी जायफल, सब फल फरे अपूर। आस पास घन ईमली, औ घन तार खजूर॥ बसहिं पंखे बोलहिं बहु भाखा। करहिं हुलासैं देखिके शाखा॥ भोरहोत बांसहिं चहि चुँहीं। बोलहिं पांडुकें एके तुहीं॥ सारो सुर्वा जो रहचहिं करहीं। करहिं पखेरूँ और करोरहीं॥ पिव पिवकर जो लाग पपीहा। तुही तुहीकर गड़रूँ केंहा॥ कुहू कुहू कर कोयल राखा। औ बिहँगराजे बोल बहुभाखा॥ दही दही करि महरि पुकारा। हारिल अपनी बोली हारा॥ कुहकहिं मोर सोहावन लागा। होय कराहर बोलहिं कागा॥ दो० जानवन्त पक्षी बनके, फिरि बैठे अँवराउँ²⁰। अपनी अपनी भाषना, लीन्ह दई²¹ करनाउँ॥ पैगें²² पैगें²³ पर कुँवा बावरी। साजी बैठकें औ पावरी²५॥ वारा १-८ बयान २ बहुत ३-४ शहद ५ फूल ६ नाम मेवा ७ गुंजान ८-१० चिड़ियाँ ११ खुशी करना १२ नाम चिड़ियाँ १३-१४ सारस १५ तोता १६ नाम चिड़ियाँ १७-१८ दहियड़ १६ बाग २० ईश्वर २१ क़दम २२-२३ बैठक २४ जीना २५॥

और कुंड बहु ठावहिं ठाऊँ। सर्व तीरथ औ तेहिके नाऊँ ॥ मठ मण्डप चहुँ पास सँवारे। तपी १ जपी २ सब आसन मारे ॥ कोई सुऋषीश्वर कोई संन्यासी। कोई रामयती ६ कोई बिेशवासी ॥ कोई ब्रह्मचर्य पंथ ८ लागे। कोई सो दिगम्बर अचिरैं नागे ॥ कोई सुमहेरवरे योगी ११ यती १२ । कोई एक परखै देवी सती ॥ कोई सरस्वती १७ संत कोई योगी १८। कोई निराशैं पंथ बैठि बियोगी १९॥ दो० सेवरो खेवनों वानप्रस्थी, २१ शिष साधक २२ अवधूत २३। आसन मारे बैठि सब, पांच आत्मा भूत ॥ मानसरोवरै वरणौं २५ काहा। भरा समुद्र अस अति अवगाहा ॥ जल मोती अस निरमले तासू। अमृतबरन कपूरसुबासू ॥ लंकदीपकी शिला अनीई। बांधा सरवर घाट बनाई ॥ खण्ड खण्ड सीढ़ी भुइँ घेरे। उतरहिं चढ़हिं लोग चहुँ फेरे॥ फूला कमल रहा है रातो ३०। सहसैं सहस पखिन ३२ के छाता॥ उलटहिं सीप मोति उतराहीं। चुनहिं हंस औ केलि कराहीं ॥ खनि पतार पानी तहिं काढ़ा। क्षीरसमुद्र निकस तहँ ठाढ़ा ॥ दो० ऊपर पाल चहूँदिशैं, अमृत फल सब रूख। देखि रूप सरवरै का, गई पियास औ भूख ॥ पानि भरी आवहिं पनिहारीं। रूपस्वरूप पद्मिनी नारीं ॥ पद्मगन्ध तिन अङ्ग बसाहीं। भँवर लागि तिन संग फिराहीं ॥ लंकसिंहिनीसारंग ३८ नयनी ३९। हंसगामिनी ४० कोकिलबयनी ४२॥ जगह १-२ तप करनेवाले ३ जप करनेवाले ४ क़िस्म योगियोंकी ५-६ ७-८-१०-११ राह ६ क़िस्म योगी १२-१३-१४-१५-१६-१७-१८-१९ २०-२१-२२-२३ नाम तालाब २४ तारीफ़ २५ बहुत गहिरा २६ साफ़ २७ रंग २८ खुशबू २६ तालाब ३० सुर्ख ३१ हज़ार ३२ चिड़ियाँ ३३ चारोंतरफ़ ३४ नामतालाब ३५ कमलकी खुशबू ३६ बदन ३७ कमर शेरनी की तरह ३८ हिरण ३६ आँख ४० चाल ४१ आवाज़ ४२ ॥

१६ पद्मावत। आवहिंझुण्डसोपांतिहिपांती। गवनें१सुहायसुभांतिहि२ भांती॥ कनक३कलश४मुखचन्ददिपाहीं। रहसकेलिसे आवहिंजाहीं॥ जासों वै हेरें७ चखें नारी। बांके नयन जनुहनहिं कटारी॥ केशॆं मेघवर शिर ता पाहीं। चमकहिंदशनैं१० वीजुं११ कीनाईं॥ दो० माथे कनकॆं१२ गागरी, आवहिं रूप अनूपैं१३। जेहिकी ये पनिहारी, ती रानी केहि रूप॥ तालतलावा बरणि१४न जाहीं। सूझै वारपार कुछ नाहीं॥ फूलीकुमुदि१५केति१६ उजियारो।मानहुँ उये गगनैं महँ तारे॥ उतरहिं मेघ चढ़हिं लै पानी। चमकहिं मच्छवीर्जु कीवानी॥ तैरहिंपंखी१८सुसंगहि संगा। श्वेतें पीतैं२१ राती२२ बहु रंगा॥ चकई चकवा केलि कराहीं। निशौँ विछोहदिनहिंमिलिजाहीं॥ करलहिंसारस करहिं हुलासा। जीवन मरनसुएकहिं पासा॥ कम्पासो२५ डहनकें बकें लेदी२८। रही अपूरमीन२९ जलभेदी॥ दो० नगअमोल तेहितालहि, दिनहिंवरहिं जसदीप। जो मरजिया होयतेहि, सो पावै वह सीप॥ आसपास बहु अमृत बौरी। फरीं अपूर होय रखवारी॥ नारँग नींबूर तुरंज जँभीरा। औ बदाम बहु बेद अँजीरा॥ गुलंगुल तुरंज सदाफर फरे। नारँग अति रौंती रस भरे॥ किसमिस सेव फरे नौ बाता। दाड़िमैं दाख देखि मनराताँ॥ लागि सुहाई हरफारेवरी। उनयरहीं केला की घौरी॥ चलना १ तरह २ सोना ३ घड़ा ४ चमकना ५ खुशी से उछलती कूदती ६ देखना ७ आँख ८-६ बाल १० दाँत ११ त्रिजुली १२-१६ सोना १३ बेमिसाल १४ तारीफ़करना १५ कोकांवली १६ नामनखत १७ आसमान १८ चिड़िया २० सफ़ेद २१ पीली २२ लाल २३ रात्रि २४ नामजानवरपरिन्द मछली पकड़ कर खाजानेवाले २५-२६-२७-२८मछली २६ बागीचा ३०लाल ३१-३३ अनार ३२॥

पद्मावत। १७ फरीतूत कमरख औ ब्योजौँ । राय करौंदा बेर चिरौंजी ॥ सुगन्धराव छुहारा दीठे १। और खजहजाँ २ खाटे मीठे ॥ दो० पानि देहिं खण्डवॉनी ३, कुवहिं खांड़ नहिं भेल । लागी घरी रँहँटकी, सींचहिं अमृत बेल ॥ पुनि फुलवारि लाग चहुँपासा । बृक्षे ४ बेदहिचन्दन झइबासा ॥ बहुत फूल फूली घन बेली । क्यौँड़ा चम्पा गोंद ६ चमेली ॥ सुरंग गुलाल क़दम औ गूजा । सुगंध बकोरी गन्धब पूजा ॥ जाहीजूही बर्गचन लावा । पहुपं ५ सुदरसन लागसुहावा ॥ नागेसर सदबँर्ग ७ हवारी । औ शिंगारहार फुलवारी ॥ सुमन जर्द बहु खिली सेवती । रूपमंजरी और मालती ॥ मोलसिरी बेली औ करना । सबै फूल फूले बहु बरना ॥ दो० तेहि शिर फूल चढ़हिं वै, जेहि माथे मन भाग । आह्नेह सदा सुगन्धबहै, जनु बसंत औ फाग ॥ सिंहलनगर दीख पुनि बसा । धनिराजा अस जाकर दसा ॥ ऊँची पँवरी ८ ऊँच उड़ासाँ ९ । जनु कैलास इन्द्रकर बासा ॥ राउ रंक सब घर घर सुखी । जो देखे सो हँसता मुखी ॥ रचि रचि साजे चन्दन चूरा । मोती अगरे १० मैद करपूरा ॥ सब चौपारहिं चन्दन खँभा । तहिं राजा तब बैठो सभा ॥ जनु सभा देवतहिं की जुरी । परी दृष्टि ११ इन्द्रासन पूरी ॥ सबै गुणी औ पण्डित ज्ञाता । संस्कृते १२ सबके मुख राताँ १३॥ दो० अलखहिं १४ पन्थ सँवारैं, जनु शिवलोक अनूपं १५ । घरघरनारिपद्मिनीमोहहिं, सबअपसरनैं १६ केरुप १७॥ नाम मेवा १ देखना २ खजूर ३ माली ४ पेड़ ५ फूल ६ गेंदा ७ रंगबरंग ८ जीना ९ महल १० केसर ११ निगाह १२ संस्कृत जबानके सब बोलनेवाले १३ लाल १४ ईश्वरकोराह १५ बेमिसाल १६ स्वर्गकी औरतें १७ ॥

१८ पद्मावत। पुनि देखी सिंहलकी बाटो। नवोनिद्धि लक्ष्मी सबहाटोँ ॥ कनकें हाटैं सबकुहकेंहिं लीपी। बैठि महाजन सिंहलद्विपी ॥ रचीहतोड़ाँ रूप न ढारे। चित्र कटावअनेक सँवारे ॥ सोनरूप भल भयो पसारा। धवलैशिरिपोतहिं घरवारा ॥ रतनें पदारथमाणिकैं मोती। हीरालाल सँवारे जोती ॥ औ कपूर बेना कस्तूरी। चन्दन अगर रहा भरिपूरी ॥ जिनयहिहाँटैन लीन्हविसाहाँ। तिनकहँआनहाँट कितलाहाँ॥ दो० कोई करै विसाहना, काहू केर विकाय। कोई चलै लाभ सों, कोई मूर गँवाय ॥ पुनि सुशृंगार हाँटै भलदेखा। किये शृंगार बैठितहँ वेश्याँ ॥ मुख बीरी शिरचीर कुसुम्भी। काननकनकें जड़ाउखुम्भी ॥ हाथबीन पुनि मृगौँ भुलाहीं। नरमोहहिंसुनिपैगँ न जाहीं॥ भौंहधनुष तेहि नयनैँ अँहेरी। मारहिं बाणसान सों हेरी ॥ अलकैं कपोलैँ होलहँसदेहीं। लाय कटाक्ष मारजनु लेहीं ॥ कुचैँ कंचुकैँ जानहिंजगैं सारे। अंचल दीन्ह सुभावहि टारे ॥ केते खेलार हार तेहि पांसा। हाथ झारि उठिचले निरासा ॥ दो० चेटक लाय हरहिं मन, जबलहिहैं गाँठिफेट। सांटै नाट पुनि भई बटराऊँ, ना पहिचान न भेट॥ लैके फूल बैठि फुलहारी । प्रान अपूरव घरे सँवारी ॥ राह १ दुनियाकी दौलत २ बाजार ३-५-१५-१७-२१ सोना ४-२३ केसर ६ दसनी ७ मुसव्वरी ८ बहुत ९ आरास्ता १० चूना ११ जवा- हिर १२ मूंगा १३ मुश्क १४ मोललेना १६ फ़ायदा १८-२० खरीदारी १६ तवायफ़ २२ बाल २४ हिरण २५ कदम २६ आंख २७ शिकारी २८ देखना २६ बाल ३० गाल ३१ छाती ३२ अँगिया ३३ संसार ३४'जादू ३५ मुफ़लिस ३६ मुसाफिर ३७ माली ३८ ॥

पद्मावत। १६ सोंधौ सबे बैठि ले कांधे। भल कपूर खैरी² बांधे ॥ कतहूँ पण्डित पढ़ें पुराना। धर्मपंथ कर करहिं बखानों ॥ कतहूँ कथा कहै कुछ कोई। कतहूँ नाच कूद भल होई ॥ कतहूँ चरहटौ पंखी लावा। कतहूँ पाखंड नाच नचावा ॥ कतहूँ नाद शब्दैं हो भला। कतहूँ नाटक चेटर्क कला ॥ कतहूँ काहु ठगविद्या लाय। कतहूँ मानुष लीन बोराय ॥ दो० उरपंत चोरदूंते गठछोरा, मिलेरहहिं तेहिपांच। जोबहुभांतिसजगैं भाअगमन, गंठै ताकरपैबांच ॥ पुनि आई सिंहल गढ़पासा। कावरणों १४ जनुलाग अकासा॥ तरहिं१५ करहिंवासुकि१६ कीपीठी। ऊपर इन्द्रलोकपर दीठी१७॥ परखोहैं चहुँदिशि सबबांका। कांपैजांघ जायनहिं झांका॥ अगम असूक देखि डरखाये। परै सुसप्तै पतारहिं जाये ॥ नवँ पँवरी२१ बांकी नवखण्डा। नवो जो चढ़े जायब्रह्मण्डा॥ कंचनकोट२२ जड़े नगशीशा। नखतहिंभरीबीजैं पुनिदीशा॥ लङ्काजाहिऊँचगढ़ ताका। निरखि२५ न जाय दृष्टि२६ मनथाका॥ दो० हियैं नसमायदृष्टि२७ नहिं पहुँचै, जानहिंठाढ़सुमेरै२८। कहँलग कहौं उँचाई, कहँलग बरणों३० फेर ॥ ततगढवाणिजैं३१ चलैजगसूरू। नाहिंत होयवाजि३२ रथचूरू ॥ पँवरी३३ नवों वज्र३४ की साजे। सहसैं सहसैं तहँ बैठे पाजे३७॥ हलवाई १ लड्डू २ राह ३ वयान करना ४ बाज़ार ५ गाना ६ आवाज़ ७ करनाटक ८ जादू ९ मकार १० चुगुल ११ होशियार १२ गांठी १३ तारीफ़ १४ जड़ १५ नामसांप १६ देखना १७-२५ खाई १८ चारौंतरफ़ १६ मुश्किल २० सीढ़ी २१ सोनेका क़िला २२ बिजुली २३ क़िला २४ नज़र २६ दिल २७ निगाह २८नामपहाड़ २९ तारीफ़ ३० सौदागर ३१ घोड़ा ३२ मकान ३३ पत्थर ३४ हज़ार ३५-३६ पियादा ३७॥

फिरैं पांच कुतवार सुभँवरी । काँपै पाउँ चापत वे पँवेरी ॥ पँवेरिहिं पँवेरि सिंह गढ़गाढ़े । डरपहिं रायं देखि तहँ ठाढ़े ॥ बहु बनाव वे नाहर गढ़े । जनु गाजहिं नाहहिं शिर चढ़े ॥ टारहिं पूँछ पसारें जीहा । कुंजर डराहिं कि गंजरलीहा ॥ कनक शिलागढ़ सीढ़ी लाई । जगमगाहिं गढ़ ऊपर ताई ॥ दो० नवौखण्ड नवपँवेरी, औतहँ बज्र केवार । चार बसेरे सो चढ़े, सुनै सो उतरै पार ॥ नवँपँवरी पर दसौंदुवारा । तेहिपर बाजिगह बरियारा ॥ घड़ी सो बैठि गिनै घरियारी । भरी मु अपनी अपनी वारी ॥ जोहि घड़ी पूजे वह मारा । घड़ी घड़ी घरियार पुकारा ॥ मरा जो डांड़ै जगतैं सब डांड़ा । का निश्चिन्त माटीकर भांड़ा ॥ तुम तेहि चाक चढ़ेहो कांची । अबहिं न फिरी नथिरह्वै बांची ॥ घड़ी जो भरी घटी तुम आऊँ । का निश्चिन्त सोवे जो बटाऊँ ॥ पहरहि पहरगूजर नितें होई । हिया न सोगा जागन सोई ॥ दो० मुहम्मदज्यों जल भरत, रहँटघड़ी की रीति । घड़ीजो आई ज्यों भरी, ढरी जन्म गा बीति ॥ गढ़परनीर खीर दुइनदी । पानि भरेँ जैसे सुरपदी ॥ और कुण्ड एक मोती चूरू । पानी अमृत कीच कपूरू ॥ वहां का पानी राजा पिया । वृद्धे होय न हिं जबलग जिया ॥ कंचनबृक्ष एक तेहि पासा । जस कल्पतरु इन्द्र कैलासा ॥ महल १-२-३ शेर ४ मर्द ५ शेर ६ हाथी गस्त ७ सोना ८ किला ९ मकान १० पत्थर ११ मुक़ाम १२ सच्चाई १३ नव मकान तथा आंख कान नाक मुंह गुदा लिंग नवइंद्री बदनकी १४ दशवां दरवाज़ा तथा ब्रह्माएड १५ घाटा १६ दुनिया १७ ग़ाफ़िल १८-२१ आदमी १९ उमर २० मुसाफ़िर २२ हमेशा २३ पानी २४ दूध २५ बूढ़ा २६ सोनेकापेड़ २७ नाम दरख्त जो स्वर्गलोक में है २८ ॥

पद्मावत। २१ मूले^१ पतार स्वर्ग^२ वहशाखा। अमरबेलिको पावको चाखा॥ चन्द्रपातै^३ औ फूल तरोंईं। होयउजियार नगर जहँताईं॥ वैफल पावै तप करि कोई। बृद्धखाय नवयौवनै^४ होई॥ दो० राजा भये भिखारी सुनि वह अमृत भोग। जेपावा सो अमर भा, न कुछ व्याधि नहिं रोग॥ गढ़ै^६ पर बसहिं चारै^७ गढ़पती^८। अश्वपँगजंपमुवपं^९ नरंपैती^१०॥ सबकधौरहरे^११ सोने साजा। औ अपने अपने घर राजा॥ रूपवन्ते^१२ धनवन्ते^१३ सभोगी। परसैंपषाणपवँरै^१५ तेहिलागी॥ भोग परसैं सदा सबमाना। दुख चिन्ता कोई नहिं जाना॥ मँदिर मँदिर सबके चौपारी। बैठि कुँवर सबखेलहिं सोरी॥ पांसा ढरहिं खेल भल होई। स्वर्ग वान सरपूंजनं कोई॥ भाटबरन केहिं कीरति^२२ भली। पावहिं हस्तिं^२३ घोड़ सिंहली॥ दो० मँदिर मँदिर सबकी फुलवारी, चोवा चन्दन बास। निशि^२४ दिनरहै वसन्तवहँ, छहऋतुबारहमास॥ पुनि चलि देखा राजदुवारा। मानुषफिरहिं पायनहिंबारों॥ हस्तिं सिंहली बांधे बारैं^२४। जनुसजीव^२५ सबठाढ़ पहारा॥ कवन्योश्वेतै^२८ पीतैं रतनौरे। कवन्योहरे धूमैं असकारे॥ बरनेंबरन गगनैं^३३ जसमेघा। उठहिं गगनैं^३५ बैठिजनुठेघाँ॥ सिंहल के बरने^३७ सिंहले। इकइक चाहसो इकइकबले॥ जड़ १ आसमान २ पत्ता ३ नखत ४ नवजवान ५ हमेशा ६ क़िला ७ घोड़ेका सवार ८ हाथीका सवार ९ ज़मीनका मालिक १० राजा ११ महल १२ खूबसूरत १३ दौलतमन्द १४ नसीबवर १५ पारस पत्थर १६ दरवाज़ा १७-२७ हँसीखुशी १८ चौसर १९ बराबरी २० तारीफ़ २१ नेकनामी २२ हाथी २३-२६ रात्रि २४ दखल २५ जानदार २८ सफ़ेद २९ ज़र्द ३० लाल ३१ धुंवां ३२ रंगबैरंग ३३ आसमान ३४-३५ पहाड़ ३६ बयान करना ३७॥

२२ पद्मावत । गिरि ¹पहाड़परवतकहिपेलहिं। वृक्षउचारिभारि मुखमेलहिं ॥ मत्त² मतँगसबगरजहिंवांधे । निशि³ दिनरहहिंमहावतकांधे ॥ दो० धरती⁴ भार अँगोही, पांव धरत उठ हाल। कच्छप : कुर्महि टूटिभुइँफाटी, तेहि हस्तिहि की चाल ॥ पुनि बांधे उजियार तुरंगौँ । कावरणों जस उनके रंगा ॥ लेलं समन्दै चालजगजाने। हांसलँ वोरैं क्याहिवखौने ॥ परी¹⁴ कुरंगैं मेंहो बहुभांती। करेंर कोकलाँ ह चलाहँसुपांती ॥ तीखं तुखारे चांद औ बांके। तड़पहिंतवहिंवाँजि विनहांके ॥ मनते अगमनै डोलहिंवागा । देतउसास गगनै शिरलागा ॥ पावहिं सांससमुदपर धावहिं। वूड़ि न पांव पार है आवहिं ॥ थिरनरहैं रिस लोह चबाहीं। भाजहिंपूँछ शीश उपरौहीं ॥ दो० अस तुखारे सब देखे, जनु मनके रथवाँहि। नयन पलक पहुँचावहीं, जहँ पहुँचाकोइचाहि ॥ राजसभा सब देखे बैठे । इन्द्रसभा जनुपरगइ डीठे²६॥ धनि राजा अससभा सँवारी । जानहुँ फूलिरही फुलवारी ॥ मुकुटबन्द सब बैठे राजा । दैर निशानसबजेहिकेसाजा ॥ रूपवन्तै मनदिपै लिलाटैं। माथे छात्र बैठि सब राजा ॥ जानो कमल सरोवरै फूले । सभाकि रूप देखि मन भूले ॥ पान कपूर मेदैं कस्तूरी³५ । सुगन्धवास भरिरही अपूरी ॥ मांझैं ऊँच इन्द्रासन साजा । गन्ध्रवसेन बैठि तहँ राजा ॥ . पहाड़ १ मस्त २ रात्रि ३ ज़मीन ४ कछुवा ५ हाथी ६ घोड़ा ७ तारीफ ८ नामज्ञात वा रंग घोड़ों के ६-१०-११-१२ वयान करना १३ नाम ज्ञात व रंग घोड़ों के १४-१५-१६-१७-१८-१६ शोरू २० घोड़ा २१-२२-२६ पहिले २३ आसमान २४ शिर उठाये हुये २५ गाड़ीवान २७ आँख २८ निगाह २६ फ़ौज ३० खूबसूरत ३१ माथा ३२ तालाव ३३ केसर ३४ मुश्क ३५ बीचों बीच ३६ ॥

पद्मावत। २३ दो० छत्र गगन १ लगताकर, सूर्यदिपै २ तस आप। सभा कमल जनु विगसी ३, माथे बड़ परताप ॥ साजा राजमंदिर कैलाश । सोनेका सब भूमि अकाशू ॥ सातखंड धवराहर ४ साजा। वही सँवारसकै अस राजा ॥ हीरा ईंट कपूर गिलावा । औनगलायस्वर्ग लयलावा ॥ जानवन्त सबै उरेहै उरेहे । भाँतिभांति नगलागउबेहे ॥ झाकटाव सब आनहु भाँती । चित्रं ८ कटावसो पांतिहिपांती ॥ लागखंभमँणि माणिकजड़े । निशि ११ दिनरहै दीपजनु बरे ॥ देखि धौरहेरै कर उजियारा । छिपगये चांद सूर्य औ तारा ॥ दो० साजीसाज बैकुण्ठजस, तससाजी खंडसात । चौहरैं चौहर भाव तस, खंडखंड ऊपर जात ॥ वरणौं राजमंदिर रनिवासू । अप्सरैंहिं भरा जान कैलासू ॥ सोरह सहसँ १६ पद्मिनी रानी । एक एकते रूप बखानी ॥ अतिस्वरूप औ अतिसुकुमारी । पान फूलकी रहहिं अधौरी ॥ तेहि ऊपर चम्पावति रानी । महा स्वरूप पाट परधौंनी ॥ पीठं बैठिरहि किये शृंगारू । सब रानी वहँ करहिं जुहारू ॥ नितै नवरंग अङ्गमा सोई । प्रथमवैयसँ न शिर पर कोई ॥ सिंहलद्वीप महँ जेती रानी । तिनमहँकनकँ सुबारहबानी ॥ दो० कुँवर बतीसो लक्षणी, अससबमांह अनूपै। जानुवन्त सिंहल द्विपी, सबै बखानी रूप ॥


पाद-टिप्पणी (शब्दार्थ): १ आसमान १-६ चमकना २ खिलना ३ ज़मीन ४ महल ५ मुसव्वरी ७ तरह बतरह ८-६ तसवीर १० जवाहिरात ११ रात १२ मकान १३ अलग १४ बयान करना १५ स्वर्गकी औरत १६ हज़ार १७ सहारा वा खुराक १८ महारानी १६ तख़्त २० हमेशा २१ पहिलीउमर २२ सोना ख़ालिस २३ बेमिसाल २४ बयान करना २५ ॥

२४ पद्मावत । [जन्म खण्ड] चम्पावत जो रूप मनमाहां। पद्मावतिकी ज्योति कि छांहां ॥ भइ चाहै असकथा जो होनी । मेटिनजाय लिखी जसहोनी ॥ सिंहलद्वीप भयो तबनाऊँ । जो असदिया बरा तेहिठाँऊँ ॥ प्रथमँ सो ज्योतिगगनै निर्मई। पुनि सुपितासाथे मनभई ॥ पुनिवह ज्योतिमातघटें आई। तिनहिं उदरें आदर बहुपाई ॥ जस अवधानै पूरहै मासूं । दिनदिन हिये होयपरकासूँ ॥ जस अंचल महँ छिपयेदिया । तम उजियार दिखावै हियाँ ॥ दो० सोने मंदिर सँवारा, औ चन्दन सब लीप। दियाजोमनशिवलोक महँ, उपर्जा सिंहलद्वीप ॥ भै दशमास पूरि भइ घरी । पद्मावति कन्या अवंतरी ॥ जानो सूर्य किरण हतगाढ़ी । सूरज किरण घाट वह बाढ़ी ॥ भानिशि महँदिनकरपरकाँसू । सब उजियार भयो कैलासू ॥ इतनी रूप मूर्ति परगँटी । पून्यो शँशि सुखीनँ द्वैघटी ॥ घटतहिं घटत अमावस भये । दिनदुइ लाज गाडभुइँ गये ॥ पुनि जो उठी दुइज है उये। शशिनिकलंकविधिहि निरमये॥ पद्मगन्ध बेधा जग बासा । भँवर पतंग भ्रमै चहुँपासा ॥ दो० इतनी रूपभई कन्या, जेहि स्वरूप नहिं कोय । धन सुदेश रूपवन्ता, जहां जन्म अस होय ॥ भई छठिरात छठी सुखमानी । रहस कूदसो रयन बिहानी ॥ भा बिहान पण्डित सब आये। काढ़ि पुराण जन्म अरथाये॥ उत्तर्म घड़ी जन्म भा तामू । चांदउआ भुइँ दिपा अकासू ॥ जगह १ पहिले २ आसमान ३ पेट ४-५ हमल ६ रोशनी ७ दिल ८ पैदा होना ६-१० राति ११ उजियारा १२ ज़ाहिर होना १३ पूर्णमासीका चांद १४ पतला १५ ब्रह्मा १६ कमलकी खुशबू १७ रात्रि १८ अच्छी १९ ॥

पद्मावत । २५ कन्याराशि उदय जग १ किया । पद्मावती नाम जस दिया ॥ सूर २ पुरुष ३ सों भयो गुरेरू ४ । किरणयाम उपर्जो जग हीरा ॥ तेहिते अधिकै पदारथकरा । रतनज्योति उपर्जा निरमराँ ५॥ सिंहलद्वीप भयो अवत़ारू ६। जम्बूद्वीप जाय जमवारू ७॥ दो० राघौराय अयोध्या उपंजे, लषणवतीसो संग । राजाराउ रूप सब भूले, दीपक जैसो पतंग ॥८२ आयु जन्मपत्री जो लिखी । दै अशीश फिरे ज्योतिषी ॥ पांच वरषमहँ भई जो बारी । दीन्ह पुराण पढ़े वै सारी ॥ भइ पद्मावति पण्डित गुनी । चहूँ खण्डके राजहिं सुनी ॥ सिंहलद्वीप राज घर बारी । महास्वरूप दई ११ अवतारी ॥ इक पद्मिनी औ पण्डित पढ़े । व्वहि कहँ योग गुसोई गढ़े ॥ जाकहँ लिखी लंख अस होनी । सो असपाव पढ़ी औलोनी १५॥ सप्तैद्वीप के वर जो आवहिं । उत्तर पावहिं फिरफिरजावहिं ॥ दो० राजा कहै गर्व १७ किये, हौं इन्द्र शिवलोक । को सरवरि है मोसों, कासों करों विरोक १८॥८३ बारहें वरष माहँ भइ रानी । राजैं सुना संयोग सयानी ॥ सात खण्ड धवराहरं तासू । सो पद्मिनि कहँ दीन्हउडामूँ ॥ औ दीन्हीं सँग सखी सहेली । जो सँग करें रहस रसकेली ॥ सबै नवै लै पीसंग न सोई । कमलपास जनु विगसी कोई २३॥ सुआ एक पद्मावति ठाउँ । महापण्डित हीरामणि नाऊँ ॥ दई २५ दीन्ह पंख असजोती । नयनैं रतनमुखमाणिक मोती ॥

दुनिया १ सूर्य्य २ मुलाक़ात ३ पैदा होना ४-६-८-१० बहुत ५ पाक ७ मरजा ६ ईश्वर ११-१३-२५ पैदा किया १२ रेखा १४ खूबसूरत १५ सातोंमुल्क १६ ग़रूर १७ बराबर १८ टीका विवाहका १६ महल २० मकान २१ कुँआरी २२ फूलना फोकायेलीका २३ जगह २४ जानवर २५ आँख २७ मूंगा २८ ॥

२६ पद्मावत । कंचनबरनं सुआ अतिलोनां । मानोमिला सुहागहि सोना ॥ दो० रहहिं एक सँग दोऊ, पढ़ें शास्त्र औ वेद । पढ़ना शीशँ डुलावहीं, सुनत लाग तस भेद ॥ भई अनन्त पद्मावति बारी । रचिरचि विधि सबकला सँवारी॥ जगँ बेधा तेहि अंगसुवासा । भँवर आय लुब्धे चहुँपासा ॥ बेनी नाग मलयगिरि पीठी । शशि माथे होय दूजपैठी ॥ भौहैं धनुष साधि शर फेरे । नयनें कुरंग भूल जनुहेरे ॥ नासिकँ कीर कमेलमुखसोहा । पद्मिनिरूपदेखिजगे मोहा ॥ माणिक अधरैं दर्शन जनु हीरा । हियहुलसै कुच कनकँ जँभीरा ॥ केहरि लंकै गवनु गजँ हरी । सुरनर देखि माथ भुइँधरी ॥ दो० जगँ कोउदृष्टि न आवै, अपसरनै होय अकास । योगी यती संन्यासी, तप साधहिं तेहि आश ॥ राजैं सुना दृष्टि भइआना । बुद्धि जो देसँग सुआँ सयाना ॥ भयो रजायँसु मारहिं सुऔं । सबरे सुना चाँद जहँ उआ ॥ शत्रु सुऔं के नाऊ बारी । सुनि धाये जस धाय मँजारी ॥ तब लग रानी सुऔं छिपावा । जवलग आवमँजारि नपावा ॥ पिताँ कि आयसु माथे मोरे । कहोजाय बिनवैं करंजोरे ॥ पंखन कोई होय सुजानू । जाने भुक्ति कि जानि उड़ानू ॥ सुऔं जो पढ़े पढ़ाये बयनौँ । तेहि कतवध जेहिहिये ननयनौँ ॥ सोनेका रंग १ खूबसूरत २ शिर ३ ब्रह्मा ४ दुनिया ५-२४ गूंजना ६ चोटी ७ चन्दन ८ चाँद ६ तीर १० आँख ११-४६ हरिण १२ नाक १३ तोता १४-२६- २१-३३-३५-४३ संसार १५ मूंगा १६ होंठ १७ दाँत १८ खुशहोनो १६ छाती २० सोना २१ चीताकी कमर २२ चालहाथी और सिंह की तरह २३ निगाह २५-२७ इन्द्रलोककी परी २६ अक़्ल २८ हुक्म ३०-३८ दुश्मन ३२ बिल्ली ३४-३६ बाप ३७ अरज़ करना ३६ हाथ जोड़ना ४० अक़्लमन्द ४१ खाना ४२ बोली ४४ मारना ४५ ॥

पद्मावत। २७ दो० माणिकै मोती देखावह, हिये² न ज्ञान करलेय। दाड़िमै दाखैं छांड़िकै, आंब ठौर फर लेय॥ तेतो फिरी उतर अस पावा। बिन वा सुये हिये डर खावा॥ रानी तुम जुग जुग सुख पाउ। हो अज्ञाँ वनवासकहँ जाऊ॥ मोती जो मलीन होय कला। पुनि सोपानि कहाँ निरमला॥ ठाकुर अन्त चहे जेहि मारा। तेहि सेवक कहिकहां उबारा॥ जेहि घर काल मँजारी नाचा। पंखिहि नाउँ जीव नहिंबांचा॥ मैं तुम राज बहुत सुख देखा। जो पूँछहिँ दिये जाय न लेखा॥ जो इच्छौं मन कीन्ह सुजेंवा। यह पछतावचल्यों बिनसेंवा॥ दो० मोरै सोई निसोगों, डरै न अपनी दोसें। केला अकेल करै का, जो भयो बेरै परोस॥ रानी उत्तर दीन्ह कै मयाँ। जो जिवजायरहै किमिकयाँ॥ हीरामणि तू प्राण परेवा। आखनलाग करत तेहिसेवा॥ तुहिसेवा बिछुरन नहिं आखौं। पींजर हिये घालिकै राखौं॥ हौं मानुष तू पंखे पियारा। धर्म प्रीति तहां को मारा॥ का प्रीति तनहमाँह बिलाय। सोई प्रीति जियसाथ जो जाय॥ प्रीतिभारली हिये न शोच। वही पन्थ भल होयकिं पोच॥ प्रीति पहाड़ भार जो काधा। किततेहि छूटलाय जिवबाधा॥ दो० सुआँ नरहै खुरकै जी, अबहुँ कालसो आव। शत्रै अहै जेहि करियाँ, कहूसो बूड़ा नाव॥ मोती १ दिल २-६-२०-२२ अनार ३ अंगूर ४ जवाब ५-१६ परवानगी ७ साफ़ ८ बिलार ६ जानवर परिन्दा १० हिसाव ११ जो मनने चाहा सो खाना खाया १२ बेग़म १३ पाप १४ बेरीका पेड़ १५ मेहरबानी १७ बदन १८ जानवर परिन्द १६-२१ तोता २३ अंदेशाभरा हुवा २४ दुश्मन २५ मल्लाह २६॥

२८ पद्मावत । ৹खण्डतीसरा स्नानखण्ड पद्मावत ॥ एक दिवसे कवन्यो तहँआय । मानसरोवरें २ चली अन्हाइ ॥ पद्मावति सब सखी बोलाई । जनुफुलवार सबे चलिआई ॥ कोइचम्पाँ कोइगोँदै सहेली । कोइ सुकेतै करुणाँ रसवेली ॥ कोइँ सुगुलाल सुदरशनँ राती । कोइबकाउं कोइबकचनें भांती ॥ कोइ सो बोलसेरै पुहपावैती । कोइ जाही जूँही सेवैती ॥ कोइ सुवर्ने जर्द ज्यों केसरँ । कोइ शिंगारहोरै नागेसेरँ ॥ कोई कूजाँ सतबैरग चँबेली । कोई २२ कदम सुरसरैस बेली ॥ दो० चलीं सबै मालेंती संगहि, फूले कमल कुमोद । बेध रही गुण गन्धरब, वास बरमला मोद ॥ खेलत मानसरोवरें गई । जाय पालें २७ पर ठाढ़ी भई ॥ देखि सरोवरें हँसली केली । पद्मावति सोँ कहहिं सहेली ॥ ए रानी मन देखु बिचारी । यहि नैहर रहना दिन चारी ॥ जबलग अहे पिताकेरँ राजू । खेलिलेहु जो खेलहि आजू ॥ पुनि सासुर हम गवनबैं काले । कितहमकितयहसरवैरैँ पाँले ॥ कितआवन पुनिआपन हाथा । कित मिलके आवब एक साथा ॥ सासुननँद बोलहि जियलेहीं । दारुणैँ ससुर न निसरे देहीं ॥ दो० पीउ पियार सब ऊपर, सो पुनि करै वह काहि । तेहि सुख राखहिकी दुख, वह कस जन्म निबाहि ॥ सरवैरैं तीर पद्मिनी आई । खोपौँ छोड़ि केश बिखराई ॥ शेशि मुखअँगैँ मलीगैरै रानी । तामहँ झाप लीन्ह अरधानी ॥ दिन १ नाम तालाब २-१६ नामफूल ३-४-५-६-७-८-६-१०-११-१२-१३३- १४-१५-१६-१८-१६-२०-२१-२२-२३-२४ ज़ाफ़रान १७ कौकाबेली २५ किनारा २७-३२ तालाब २८-३१-३४ बाप २६ जाना ३० मुश्किल ३३ चोटी ३५ चांद ३६ बदन ३७ चन्दन ३८ ॥

पद्मावत । २६ उनई घटा पराजग छाहां। शंशि की शरण लीन्ह जनु राहू॥ छिपगये दिनभानु कीदसा। तेहि निशि नखतचांद परगसा॥ भूल चकोर दृष्टि तेहि लावा। मेघघटा महँ चन्द दिखावा ॥ दशन दामिनी कोकिलभाखै। भौहैं धनुष गगन लैराखै ॥ नयन खंजन दुइ केल करेहीं। कुच नारंग मधुकैरै रसलेहीं ॥ दो० सरोवर रूप विमोहा, हिये हिलोर करै। पाउँ छुवे मगैं पाउँ, तन मन लहरें दे ॥ (५१) धरी तीर सब कंचुक सारी । सरवर महँ पैठीं सब वौरी ॥ पानी तीर जानि सब बेलैं। हुलसैंहिं करहिंकामकी केलैं॥ करलैं केश विषहरैं विषभरे। लहरें लेहिं कमल मुख धरे ॥ नवल वसन्त संवारे कैरी। होय प्रकट जानहु रस भरी ॥ उठी कोप जस दाँड़िम दाखौं। भई अनन्त प्रेमकी साखा ॥ सरवर नहिं समाय संसारा। चांद नहाय बैठिलिये तारा ॥ धनसों नीर शेशि तैंरई उई। अबकित दृष्टि कमलऔकोई॥ दो० चकई बिछुर पुकारी, कहां मिलहो नांह। (५२) एकचन्दनिशि स्वर्ग महँ, दिनदूसरजलमांह ॥ लागीं केलकरैं मँझ नीराँ। हंस लजाय बैठिहै तीराँ ॥ पद्मावतिकौतुक कहँराखे। तुमहिंशशि होहितराये नहिंराखे ॥ बाद मेल के खेल पसारा। हार देव जो खेलत हारा ॥ दुनिया १ चांद २-३१-४१ सूर्य ३ रात्रि ४ खिलना ५ निगाह ६-३३ दाँत ७ बिजुली ८ कोकिला कीसी बोली ६ कमान १० आसमान ११-३६ आँख १२ छाती १३-१८ भँवर १४ तालाब १५-१६-२६ दिल १६ शायद १७ लड़की २० खुशहोना २१ मुलायम २२ बाल २३ सांप २४ कली २५ ज़ाहिर २६ अनार २७ अंगूर २८ पानी ३०-३८ नखत ३२ क़ोकाबेली ३४ राति ३५ बीच ३७ किनाग ३६ तमाशा ४० नखत ४२ ॥

३० पद्मावत । सँवरहिं सांवर गोरहिं गोरी । आपन आपन लीन्हसजोरी ॥ बूझौ खेल खेलौ एक साथा । हारि न होय पराये हाथा ॥ आजहिं खेल बहुरि कित होय । खेलगई कित खेलै कोय ॥ धनि सो खेल खेल रस प्रेमा । रेंवतई और कुशलै क्षेमा ॥ दाँव. दो० मुहम्मदबारजो प्रेमकी, ज्योंभावे त्यों खेल । ६३। तेलहिं फूलहिंवासज्यों, होय फुलायल तेल ॥ सखी एक तैं खेल न जाना । भई अचेतै मनहारगँवाना ॥ कमल डारगहि भई बिकरारौ । कासों पुकारों आपन हारा ॥ कित खेले आयौं एक साथा । हार गँवाय चल्यौं ले हाथा ॥ घर पैठत पूँछब यह हारू । कौन उतरै पावव पैसारू ॥ नयन सीप आंसू तस भरे । जानहु मोति गिरहिं सबढरे ॥ सखिन कहा बौरी कोकिला। कौनपानी जेहिपबुनूँ नहिं हिला ॥ हार गँवाय सो ऐसे रोवा । हरे हराये लेव जो खोवा ॥ दो० लागीं सबमिलि हेरी, बूड बूड एक साथ । कोई उठी मोतीले, काहू घोंघा हाथ ॥ कहा मानसेरं चहा सुपाई । पारस रूप यहां लगि आई ॥ भा निरमलै तेहिपायन परशे । पावा रूप रूप के दरशे ॥ मली समीर बासु तनआई । भा शीतल तनतपनबुझाई ॥ नाजानौंकौनपवँनै लेआवा । पुण्यदशा भइ पाप गँवावा ॥ ततछन हार बेगि उतराना । पावा सखहिं चन्द विहसाना ॥ बिक्सौ कमलदेखिशशि रेखा। भइतेहि रूप जहां जो देखा ॥ ठकुराई १ खैरियत २ बेहोश ३ बेकरार ४ जवाव ५ आँख ६ हवा ७-१४ ढूंढना ८-६ नाम तालाब १० पाक ११ चन्दन १२ ठंडा १३ जल्द १४ फूलना १६ चांद १७ ॥

पद्मावत । ३१ पावा रूप रूप जस चहा । शशि$^{१}$ मुख सब दरपन है रहा ॥ दो० नयन$^{२}$ जो देखे कमल भये, निरमलै नीर$^{३}$ शरीरँ । हस्त$^{५}$ जो देखे हँस भये, दशनँ$^{६}$ जोति नग हीर ॥ खण्ड पद्मावति तहँ खेल दुलारी । सुआँ मंदिर महँ देखि मँजारी ॥ कहिसि चलौं जौलहि तन पांखा । जिव लै उड़ा ताक बन ढांखा ॥ जाय परा वन खंडँ$^{९}$ जिव लीन्हा । मिले पंखे$^{१०}$ बहु आदर कीन्हा ॥ आन धरी आगे फरशाखा । भुक्ति$^{११}$ न मिटी जबलहि राखा ॥ पाय भुक्ति$^{१३}$ सुख मन में भयो । दुख जो अहा बिसर सब गयो ॥ ए गुसैयाँ तू ऐसो विधाता$^{१४}$ । जानवंत जिव सब का भुकेँ दाता ॥ पाथर महँ नहिं पतंग बिसारा । जहँ तहँ सँवर दीन्ह तुइँ चारा ॥ दो० तौलहि साग बिछोह कर, भोजन पड़ा न पेट । पुनि बिसरा भा सँवरना, जनु सपने भइ भेंट$^{१५}$ ॥ पद्मावति पहँ आय भँडौरी$^{१६}$ । कहिसि मंदिर महँ परी मँजारी ॥ सुआँ जो उत्तरँ$^{१७}$ देत अहा पूंछा । उड़गा पिंजर न बोलै छूछा ॥ रानी सुना जो सुख सब गयो । जनु निशि$^{२०}$ परी अस्त दिन भयो ॥ गहने गही चन्द की किरा । आंसु गगनँ$^{२२}$ जस नखतहिं भरा ॥ टूटिवार सरवरँ$^{२३}$ बह लागे । कमल बूडि मधुकरैँ$^{२४}$ उड़ भागे ॥ यहिविधि आंसु नखत हो चुये$^{२७}$ । गगनँ छांड सरवरँ महँ उये ॥ भरहिं चुवहिं मोतिन की माला । अव संकेत बाँधा चहुपालाँ ॥ दो० उड़गा सो ठाँ कहँ बसा, खोज सखी सो तास ॥


पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes): चांद १ आंख २ पांक ३ पानी ४ बदन ५ हाथ ६ दांत ७ तोता ८-१६-२६ चिड़ी ९-१८ जंगल १० उड़ने वाले जानवर हमजिन्स ११ खुराक जंगली १२-१३ ईश्वर १४ रोजी देने वाला सबका १५ मुलाक़ात १६ रसोईवरदार १७ जवाब २० राति २१ आसमान २२-२५ तालाव २३-२६ भँवर २४ रंज २७ चारों तरफ २८ ॥

वहहै धर्ती¹ की स्वर्ग² का, पवन³ न पावै वास ॥ चहूँ पास समझावहिं सखी । कहांसु अव पावेगा पखी ॥ जवलहि पिंजर अहा परेवों । अहा बांध कीन्हेसि नितसेवा ॥ तेहि बन घन जो छूटेपावा । पुनिफिरवां दै होय कितआवा ॥ वै उड़ाम फुरहरी खाई । जो भा पंख पांख तनलाई ॥ पिंजर जेहक सौंप तेहिगयो । जो ज़ाकर सो ताकर भयो ॥ दशबाटें⁵ जेहि पिंजरमाहां । कैसे बांच मँजारी⁶ पाहां ॥ ये धर्ती अस कंतन लीले । अश्वपति⁸ गजपतिबहुवरकीले ॥ दो० जहँ न राति नहिंदिवर्स है, तहां न पान न खांन । तेहि बन सोतों है बसा, फेरि मिलावै आन ॥ सुवै¹¹ तहां दिनदश कैलकाटी । आयो व्याधै ढुका लै ठाटी ॥ पैगें पैग भुइँ चापत आवा । पंखहि¹⁴ देखि सबै डरखावा ॥ देखो कुछ अचरज अनभलौं । तरवरै एक आवत होचला ॥ यह बन रहंत गये हम आऊँ । तरवरै चलत न देखा काऊ ॥ आजजोतरवरे चलभलनाहीं । आवहु यह बनछांड़ पराँहीं ॥ वैतो उड़ै और बन ताका । पण्डितसुओं भूल मन थाका ॥ शाखा देखि राज जनु पावा । बैठिनिचिंते चूल्हा वह आवा ॥ दो० पांचे बाणकर खोंचा, लासा भरे सो पांच । पांखभरा तन उरझा, कित पारधिन बांच ॥ बन्दभौं सुओ करतसुखकेली । चूरै पंखमेलेसि घरठेली²७ ॥ ज़मीन १ आसमान २ हवा ३ उड़नेवाला जानवर ४-१४ ताबेदार वा क़ैदी ५ दशराह तथा इन्द्री बदनके सुराख ६ बिल्ली ७ घोड़े का सवार ८ दिन ६ तोता १०-११-२१-२५ बहेलिया १२ क़दम बाक़दम १३ बुरा १५ पेड़ १६- १८-१६ उमर १७ भागना २० ग़फ़िल २२ कंपा २३ क़ैद २४ बाजू को तोड़के २६ मोरी २७ ॥