पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
बाहहिं बाहू ताड़ै सलोनी । डोलत बांह आवगत लोनी ॥ तरवन कमलंकली जनु बांधे । बसौ लंक जानहु दुइ आधे ॥ छुद्रघंट कटि कंचन बागा । चलते उठहिं छतीसो रागा ॥ दो० चूँरा पायल अनवट बिछिया पांयनपरी बियोगें । हिये लायटुकहमकहसमंदै नहिंतुमजानअौभोग ॥ अस बारह सोरह धने साजी । छाजनै और बहीपै छाजी ॥ विनवहिंसखी गहेरैका कीजे । जें जिवदीन्ह ताहिजिवदीजे ॥ सँवरि सेज धन मन भइ शंका । ठाढ़ तेवान टेक कर लंकाँ ॥ अनचिन्हा पियकांपोंमनमाहां । का मैं कहब गहैब जो बाहां ॥ वारि वैसगइ प्रीति न जानी । तरुणे भई मै मन्ते भुलानी ॥ यौवनगर्व न कुछ मैं चेता । नेह न जानु श्याम के सेता ॥ अब जो कंत पूँछहि सब बाता । कस मुख होय पीत कै राताँ ॥ दो० हों सुवारि औ दुलहिन, पियसो तरुणै औ तेज । नाजानों कस होय है, चढ़त कन्त की सेज ॥ सुनि धनडर हिरदय तब ताईं । जौलहिरहस मिलानहिंसाईं ॥ कौन कली जो भँवरन राई । डारन टूटि पहुँपै गरुवाई ॥ मात पिता जो व्याहे सोई । जन्म निवाह कंत सँग होई ॥ भरे यमवार चहै जहँ रहा । जाय न मेटा ताकर कहा ॥ ताकहँ बिलंब न कीजे वारी । जो पिय आयसु सोइ पियारी ॥ चलहुवेगि आयसु भा जैसे । कन्त बोलावे रहै सो कैसे ॥ मान न कर थोरा कर लाडू । मान करत रस मानै चाँडू ॥ :: नाम जेवर १-२-८-६ खूबसूरत ३ भँवर ४ कमर ५-७-१६ करंधनी ६ दुखी १० दिल ११ मुलाकात १२ पद्मावत १३ सोहना १४ देर १५ पकड़ना १७ जवान १८-२३ मस्त १६ जवानो का गरूर २० काला या सफेद २१ लाल २२ फूल २४ मरनेके दमतक २५ हुक्म २६ जल्द २७ गुस्सा २८ ॥
१४६ पद्मावत । दो० साजन लिये पठाई, आयसु जाय न मेट । तनमन यौबनसाज सब, देइचलीं लै भेट ॥ पद्मिन गवनैं हंस गये दूरी । हस्तिं लाज मेलहि शिरधूरी ॥ बदनैं देख घटंचन्द छिपाना । दशनैं देखके बीजं लजाना ॥ खंजनैं छिपे देख कै नैना । कोकिलछिपी सुनतमधुवैना ॥ ग्रीवैं देखकर छिपा मयूरू । लंकैं देखकर छिपा सेंदूरू ॥ भौंहधनुष जो छिपा अकारौं । बेनी १२ बासुकिकि छिपापतारा ॥ खड्गैं छिपी नासिका विशेखी । अमृत छिपा अधरैं रसदेखी ॥ पहुँचिहिं छिपा कमल पौनारी । जंघ छिपा कदैली होय वारी ॥ दो० अप्सर रूप छिपाई, जोहि चलै धरैं साज । जहँलग गर्वगहेलजग, सबैछिपीमनलाज ॥ मिलीसो गोहनैं संखी तर्राईं । लीन्हचांद सूर्य पहँ आई ॥ परश रूप चांद देखराई । देखत सूर्य गयो मुरझाई ॥ सोरहकिरनदृष्टि शशिकीन्हा । सहसैं किरन सूर्यकहँ लीन्हा ॥ भा रबि २५ अस्त तर्राईं हँसी । सूर्य न रहा चांद परगँसी ॥ योगी आहि न भोगी कोई । खाय करकटौं गयो परसोई ॥ पद्मावत निरमलं जस गङ्गा । नाहिं युक्ति योगी भिखमङ्गा ॥ आय जगावहिं चेला जागहु । आवा गुरू पांय उठलागहु ॥ दो० बोलहिं शब्दैं सहेली, कानलागगहि माथ । गोरखै आय ठाढ़ भा, उठरे चेला नाथ ॥ हुक्म १ चाल २ हांथी ३ मुँह ४ दाँत ५ बिजुली ६ ममोला ७ मीठी बोली ८ गर्दन ६ कमर १० चीता ११ आसमान १२ चोटी १३ नाम राजा सांपों का १४ तलवार १५ होंठ १६ केला १७ पद्मावत १८ साथ १६ छोटे नखत २०-२६ सूर्य २१-२५ निगाह २२ चाँद २३ हज़ार २४ खिलना २७ टुकड़ा रोटी २८ पाक २६ आवाज़ ३० योगी ३१ ॥
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पद्मावत। १४७ गोरख शब्द शुद्ध भा राजा। रामा सुनि रावन होयं गाजा॥ गही बांह धन सेजवां आनी। अंचल ओट रही छिपारानी॥ सकुची डरी मुरी मन बीरी। गहु न बांहरे योगि भिखारी॥ ओहटैं हो योगी तोर चेरी। आवे बास करंकटों केरी॥ देखि बिभूत छूत मुहिं लागा। कांपै चांद राहु सो भागा॥ योगी तोर तपसी के कयाँ। लागी चहै अंग मोर बयाँ॥ बार भिखारन मांगसि भीखा। मांगो आयस्वर्ग चढ़शीखा॥ दो० योगि भिखारी कोई, मन्दिर नपैसै पार। मांगलेहु कुछ भिक्षा, जाय ठाढ़हो बार॥ अन तुम कारणे प्रेम पियारी। राज छांड़िके भयौं भिखारी॥ नेह तुम्हार जो हिये समाना। चित्तौर सो निसखोहै आना॥ जसमालतिमहँ भँवरवियोगी। चढ़ाबियोग चल्यों ह्वैयोगी॥ भँवर खोज जसपावै केवौं। तुम कारण में जिवपरखेवौं॥ भयौं भिखार नारितुम लागी। दीप पतंग है अँगयोंआगी॥ एकबार मरि मिलै जो आयें। दूसर बार मरै कित जाये॥ किततोहिमीचें जोमरकेजिया। भँवर कमल मिलकैरसपिया॥ दो० भँवर जोपावै कमलकहँ, बहुआरतें बहुआस। भँवर होय न्योछावर, कमल देय हसबास॥ अपने मुहँ न बड़ाई छाजा। योगी कतहूँ होहिं नहिंराजा॥ हौ रानी तू योगि भिखारी। योगिहि भोगिहिकौन चिन्हारी॥ योगी सबै छन्द अस खेला। तू भिखार केहिमाहँ अकेला॥ पकड़ना १ पद्मावत २ दूरहो ३ सूखा टुकड़ा रोटी ४ बदन ५-६ छाया ७ दरवाज़ा ८ आसमान ६ पैठ न सके १० वास्ते ११ दिल १२ दुखी १३ कमल १४ दुख १५-१७ मौत १६॥
१४८ पद्मावत । पवनबांधै अपसबैहिं अकासा। मंसहिं जहांजाहिं तहँ वासा॥ येही आंति सृष्टि बहु छरी। यही भेष रावण सियँ हरी॥ भँवरहिं मीचै नेर जो आवा। केतकि वास लेयकहँ धावा॥ दीपक ज्योति देखिउजियारी। आय पंख ह्वै परा भिखारी॥ दो० र्यनिजोदेखें चन्दमुख, मँसि तनहोयअलोपं । तुहूँ योग अस भूला, होय राजा के रूप॥ अनधनं तूशशेरं निशें माहां। हों दिनेरं जेहिके तूद्याहां॥ चांदहि कहां ज्योति औ कला। सूर्यकीज्योतिचांद निरमलोँ॥ भँवर बास चम्पा नहिं लेई। मालति जहां तहां जिव देई॥ तुमहुत भयों पतंगकी फिरौं। सिंहलद्वीप आय उड़परा॥ सेयों महादेव कर वारूं। तजौं अन्न भा पवनअहारू॥ तुम सों प्रीतिगांठ मैं जोरी। कटै न काटै छुटै न छोरी॥ सियँ भीख रावणकहँ दीन्ही। तूअसनिठुरअन्तरपँटँदीन्ही॥ दो० रंगतुम्हारे रात्योँ, चढ़यों गगने है सूरं । जहँशशिशीतलकहँतपों, मनइच्छा धनपूर॥ योगि भिखारकरेसि बहुवाता। कहेसि रंग देखों तुहि रातौँ॥ कपरा रँगे रंग नहिं होई। हिये औट उपजै रँगसोई॥ चांदकी रंग सूर्य जो राता। देखी जगत साँझ परभाताँ॥ दग्धै विरह नितहोय अँग़ारू। दहक आंच दग्धै संसारू॥ जो मँजीठ औटै बहु आंचा। सो रंग जन्म न डोलै रांचा॥ जरै विरह जो दीपक बाती। भीतर जरि ऊपर है राती॥ सांसरोकिकै १ छिपना २ दुनियां ३ सीताजी ४ मौत ५ रात ६-११ सियाही ७ ग़ायब ८ ऐपश्रावंत ६ चाँद १० सूर्य १२-२० पांकसाफ़ १३ मानिन्द १४ दरवाज़ा १५ छोड़ना १६ श्रीसीताजी १७ ओट १८ आसमान १६ लाल २१ दिल २२ मोर २३ जलाना २४ ॥
पद्मावत। १४६ जर पलाश कोइला के भेसू । तब फूला राता हो टेम् ॥ दो० पान सुपारी खैर तहँ, मिलै करै चकमून। तवलग रंग न राची, जबलग होय न चूना॥ धंन याका सुरँगका चूना। जेहि तननेह दगधै तेहिदूना॥ हौं तुम नेह पियरभा पानू। पेड़ी हुतसन रास बखानू ॥ सुनि तुम्हार संसार बढ़ौनी। योग लीन्ह तनकीन्ह गड़ौनी॥ करहि जो किंगिरीले बैरागी। नेवती होय बिरहकी आगी॥ फेरफेर तन कीन्ह भुजोना। औंट रखंग हिरदय अंचौना॥ सूख सुपारी भा मनमारा। शिरसरोत जनु करवट सारा ॥ हाड़ चून भै बिरहें दही। जानै सोइ जो दगधै इमि सही॥ दो० कै सुजानि बहुपीरा, जेहिं दुख ऐसो शरीर। रक्त पियासे जे अहहिं, का जानै परपीर ॥ योगिहि बहुतछन्द औराहीं। बूँद सेवाती जैसे पराहीं ॥ पड़हिं भूमि परहोय कंचूरू। पड़हिं कदेलिपर होयकपूरू ॥ पड़हिं समुद्र खारजल ओहीं। पड़ेंहि सीप सब मोती होहीं॥ पड़हिं मेरु पर अमृत होई। पड़हिंनागमुख विषहोयसोई ॥ योगी भँवर निठुर ये दोऊ । केहि आपने से कहो सो कोऊ॥ एकठांव यहिथिर न रहाहीं। रसले खेलै अन्तकहँ जाहीं ॥ होयगृही पुनि होय उदासी। अन्तकाल दोनों विश्वांसी ॥ दो० तासों नेह जोदृढ़ करहिं, थिर आयहिसहदेश। योगी भँवर भिखारी दूर रहहिं आदेश ॥ रेझा १ पञ्चायत २ जलन ३-१० चढ़ाई ४ गढ़ौता ५ हाथ ६ महिमान ७ भुजना ८ शिरकटाना ६ इसतरह ११ मकर करना १२ ज़मीन १३ नरकधूर १४ केला १५ पहाड़ १६ जगह १७ क़ायम १८ जाना १६ बेसब्रर २० मज़बूत २१ सलाम २२ ॥
३. राघव चेतन प्रसंग व खिलजी का चित्तौड़ घेरा
१५० पद्मावत। थलथल नगन होहिं जेहि ज्योती। जलजल सीपन उपजहिं मोती॥ बनबन बृक्ष न चन्दन होई। तनतन विरह न उपजें सोई॥ जहँउपजा सो औट मरगयो। जन्म निरारें १ न कबहूँ भयो॥ जलअम्बुज २ रबि रहै अकासा। जो प्रीति जानहुँ इकपासा॥ योगी भँवर जो थिरै न रहाहीं। जेहि खोजहिं तहँ पावै नाहीं॥ मैंतो पावा आपन जीव। छांड़ सेवात जाय नहिं पीव॥ भँवरमालती मिलै जो आई। सो तर्ज आनफूल कित जाई॥ दो० चम्पाप्रीति जो तेल है, दिन दिन आकर वास। गलगल आप हेराय जो, सुयहिं न छांडै पास॥ ऐसैं राजकुँवर नहिं मानौ। खेल सारँपांसा तब जानौ॥ कच्ची बारहिंबार फिरासी। पकी तौ फिर थिर न रहासी॥ रहै न आठ अठारह भाखा। सोरह सत्रह रहै सो राखा॥ सतयें धरे सो खेलनहारा। द्वारा ग्यारा जासु न मारा॥ तूं लीन्हेसि आछे मन दुवा। औ यगसार चहेसिपुनि छुवा॥ हौं तूनेह रच्यों तोहि पाहीं। दसों दांत तोरे हियँ माहीं॥ तंव चौपर खेलौं कै मर्या। जो तरहेलें होय सो तिया॥ दो० जेहिमलि बिछुरन औतपन, अंते तंत तेहिनन्त। तेहिमलि कंचन को सहै, पर बिन मिलै न चन्त॥ बोलों बचन नारि सुनि सांचा। पुरुपका बोल संस्रौ वांचा॥ यहि समलाग्योतुहि असनारी। दिनतोहिं पास और निशेंसारी॥ मैं पर बारहिंबार मनायों। शिरसों खेल निपटजिवलायों॥ पैदा १ अलग २ कमल ३ सूर्य्य ४ क़ायम ५ छोड़ना ६ चौपर ७ दिल ८ मेहरबानी ६ जो मेरे साथ बाजी हारजाय १० आख़िरको सुख ११ सोना १२ रात १३॥
पद्मावत । १५१ भल भांती मैं रचना राची। मारेसि तोहि सबै कै काची॥ पाक उठायों आशक रीता। हौं जीतहि हारा तूँ जीता॥ मिलके युगनहिं होहुँ निरौरी। कहां बीच दोती दिन हारी॥ अब जिव जन्म जन्म तुहि पासाँ। चढ़यों योग आयों कैलासा॥ दो० जाकर जिव बसि जेहि से, तेहि पुनि ताकर टेक। कनकें सुहागन बिछुड़ हि, औट मिलहिं जो एक॥ वेहँसीथनै सुनिके सत बाता। निश्चै तू मोरे रँगराताँ॥ निश्चै भँवर कमल रसरसा। जो जेहि मन सो तेहि मन बसा॥ जब हीरामन भयो सँदेशी। तूहुत मँडफ गयौ परदेशी॥ तोर रूप तस देखेउँ लोनाँ। जनु योगी तू मेली टोना॥ सिधि गुटका जो दृष्टि कमाई। पारे मेल रूप बेसं याई॥ भुक्ति देन कहँ मैं तुहि डीठाँ। कमल नयन होय भँवर जो बैठा॥ नयन पुहुपे तू अलि भ्रासोभी। रहा बेध तस उड़सि न लोभी॥ दो० जाकर आश होय जे कहँ, तहँ पुनि ताकर आस। भँवर जो दाढ़ौ कमलका, कसन पाव रस बास॥ कौन मोहनी धौं हुत तोही। जो तोहि बिथा सो उपर्जी मोही॥ बिन जलमीनें तपै जस जीउ। चातुर्क भयौं कहत पिउ पीउ॥ जरों विरह जस दीपक बाती। मँग जोवत भइ सीप से बाती॥ डार डार ज्यों कोयल भई। भयौं चकोर नींद निशँ गई॥ मोरे प्रेम प्रेम तुहुँ भयो। राता हेम अगिन ज्यों तयो॥ हीरादि पहिं जोसूर उदोती। नाहत कित पाहनैं कहँ योती॥ अलग १ दो तीन का क्या कामहै २ मददगार ३ सोना ४ पद्मावत हँसी ५ यक़ीन ६ मस्त ७ खूबसूरत ८ निगाह ९ पारा मिलाके चांदी किया १० भीख ११ देखना १२ फूल १३ भंवरा १४ आशिक़ १५ पैदा होना १६ मछली १७ पपीहा १८ राह १९ रात २० लाल सोना २१ चमक २२ सूर्य्य २३ पत्थर २४॥
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१५२ पद्मावत । रबि परकाशें कमल बिकासा । नाहत कित मधुकर कित वासा ॥ दो० तासों कौन अँतरपटै, जो अस प्रीतम पीव । न्योछावर करिय आपहूँ, तन मन योवन जीव ॥ हँसि पद्मावत मानी बाता । निश्चै तू मोरे रँग राता ॥ तू राजा धनिकुल उजियारा । अस कै चरचों मर्म तुम्हारा ॥ पै तू जम्बूदीप बसेरा । का जानेसि कस सिंहल मेरा ॥ का जानेसि सुमानसरे केवाँ । सुनि सुभँवर भा जिव परलेवाँ ॥ ना तू सुनी न कोई दीठी । कैसें चित्रै होय चित पैठी ॥ जौलहि अगिन फरै नहिं भेदू । तौलहि औटनु वहिन हिं मेदू ॥ कहँ शङ्कर तू ऐसो लखावा । मिला अलख तस प्रेम चखावा ॥ दो० जेहिके सत सँघाती, तांकर डर सो अमेट । सो सत कहु कैसे भा, दुहुँ भांत सो भेट ॥ सत्य कहूँ सुनि पद्मावती । जहँ सतपुरुष तहां सरस्वती ॥ पायौं सुवा कहे वह बाता । भानिश्थै देखत मुख रातो ॥ रूप तुम्हार सुन्यों अस नीका । ना जेहिं चढ़ा काहुँ कहँ टीका ॥ चित्र कियों पुनि लैलै नाऊँ । नयन हि लाग हिये १२ भा ठाऊँ ॥ हौं भा सांच सुनत वह घड़ी । तुम होय रूप आय चित चढ़ी ॥ हौं भा काठ मूर्ति मन मारे । जहँ जहँ कर सब हाथ तुम्हारे ॥ तुम जो डोलावहु सोई डोला । मवन सांस जो दीन्ह तो बोला ॥ दो० कोइ सोवै कोइ जागै, अस हौं गयो विमोहि १३ । परगट गुप्तै न दूसर, जहँ देखौं तहँ तोहि ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes): ओट १ भेद २ नाम तालाव ३ कमल ४ जानपर खेला ५ देखना ६ तसवीर ७ शोला ८ अतर ९ ईश्वर १० लाल ११ दिल १२ दीबाना १३ ज़ाहिर वा छिपा १४ ॥-
पद्मावत। १५३ विहँसी¹ धन सुनके सतभाऊ। हों रामा तू रावण राऊ ॥ रहि जो भँवर कमलकी आसा। कस न भोग मानै रसबासा॥ जस सत कहा कुँवर तू मोही। तस मन मोर लाग पुनि तोही॥ जबहुत कहिगा पंख सँदेशी। सुन्यों कि आवाहै परदेशी ॥ तबहुत तुम बिन रहै न जीउ। चातुकै² भयों कहत पिउपीउ ॥ भयों चकोर सो पन्थे³ तिहारे। समुद्रसीप जस नयन पसारे ॥ विरह भयों देंहि⁴ कोयलकारी। डार डार जिमि पीउ पुकारी॥ दो० कौनसोदिनजबपिउमिलै, बहुमन रातौ जासु । वह दुख देखे मोर सब, हौं दुख देखों तासु ॥ कहि सतभाव भई कँठलागू। जनु कंचन⁵ औ मिला सुहागू॥ चौरासी आसन पर योगी। षटरस बन्दक चतुर सो भोगी॥ कुसुमँमाल⁶ अस मालति पाई। जनु चम्पा गँहि डार नवाई ॥ कलीवेध⁸ जनु भँवर लुभाना। हनों राहु अर्जुन के वाना ॥ कंचने॑ कली जड़ी नगज्योती। वरमा सों बेधा जनु मोती ॥ नाँग॑¹ जानि कीरे॑² नख दिये। अधरै॑³ आम्बरस जानहु लिये॥ कौतुककेल करहिं दुख नसा। कन्दैहिं कुरलहि जनुसैरैं हँसा॥ दो० रही वसाय वासना, चोवा चन्दन मेदे॑⁶। ३१६ जो अस पद्मिन रँवी, सो जानै यह भेद ॥ रतनसेन सो कन्त सुजानू। षटरस पण्डित सोरह बानू ॥ तस द्वै मिले पुरुष औ गोरी। जैसी विछुड़ी सारस जोरी ॥ १ हँसी १ पपीहा २ राह ३ जलना ४ दीवाना ५ सोना ६ कुसुमकी जोड़ी की तरह छाती ७ पकड़ना ८ कली में भँवरा ने सूराख किया ६ तीर निशाने पर मारा १० सोने की कलीसा बदन मोती की तरह वरमा से बेधा ११ तोता १२ होठ १३ कुल्लेल १४ तालाब १५ अतर १६ भोगना १७॥
१५४ पद्मावत । रची सारे दोनों इक पासा। द्वै युग युग आवहिं कैलासा॥ पिय धन गहि दीन्ही गलबाहां। धन विछुड़ी लागी उरमाहां॥ ते छक रस नव केल करेहीं। चोक लाय अधरन रस लेहीं॥ धनै नवसात सात औ पाँचा। पूरुष दश तेरह किम बांचा॥ लीन्ह बिधांसे विरह धनसाजा। औ सबरचन जीतह तराजा॥ दो० जनहुँ औटकै मिलगये, तस दोनों भये एक। कंचन कसत कसौटी, हाथ न कोऊ टेकँ॥ चतुर नारि चित अधिकै चहूँटी। जहां प्रेम बाढ़ी किम छूटी॥ कुरला काम कीरै मनुहारी। कुरला जहँतहँ सोनसुनारी॥ कुरला होय कंतकेरै तोखू। कुरला गहै पांव धन मोखू॥ तेहि कुरलौं सो सुहाग अभागी। चंदन जैस श्यामकंठ लागी॥ गेंद गोंदकै जानहुँ लिये। गेंद चाहि धनकोमलै भये॥ दाड़िम दाखें बेलरस चाखा। पियके खेल धन जीवन राखा॥ भयो बसन्तकली मुख खोली। बैन सुहावन कोकिल बोली॥ दो० पिउ पिउ करत जीभ धन सूखी, बोली चातुर्क भांति। परीसो बूँद सीप जनु मोती, हियँ पेरी सुख शांति॥ भयो जूझ जस रावण रामा। सेज बिधांसे विरह संग्रामौ॥ लीन्ह लंक कंचन गढ़ँ टूटा। कीन्ह शिंगार अहा सब लूटा॥ औ योबन मेमन्तै बिधांसा। बिचला विरहजीव लै नासा॥ १ चौपड़ १ होंठ चूसना २ पद्मावतहारी ३ राजा जीता ४ लूटना ५ सोना ६ पकड़ना ७ बहुत ८ मस्ती में काम का तोता आया ६ जोश में सोना सुनार के हाथ से आया १० गलवा किया आचिन्दने ११ गलचा करके पैर औरतका वास्ते फ़रागतके पकड़ा १२ गलचा १३ जैसे गेंदेने गोंद के फूल को गोद में लिया १४ गेंदासे नर्म १५ अनार १६ अंगूर १७ आवाज़ १८ पपीहा १६ दिल २० लूटना २१ लड़ाई २२ कमर २३ सोने का क़िला तथा चदन २४ मस्त २५ ॥
॥ पद्मावत ॥ १५५ टूटी अंग अंग सब मेशा। छूटी मांग अंग भये केशा ॥ कंचुक चूर चूर भइ तानी। टूटि हार मोती झहरानी ॥ बारँ तांइ सलोनी टूटी। बांहू कँगन कलाई फूटी ॥ चन्दन अंग छूट तस मेटी। बेसर टूटि तिलक गा मेटी ॥ दो० पुहुप शिंगार सँवार सब यौवन नवल बसन्त । अरगजै ज्यौ हिय लायके मरगज कीन्हों कन्त ॥ विनय करै पद्मावत बाला । सुथनै सुराही पियो पियाला ॥ पिय आयसु माथे पर लेऊँ। जो मांगै नय नय शिर देऊँ ॥ पै पिय बचन एक सुनि मोरा । चाखो पिय मधु थोरा थोरा ॥ प्रेम सुरा सोई पै पिया। लखैन कोऊ कि काहूँ दिया ॥ चुवा दाखै मधु जो इकबारा। दूसर वार लेत बेसँभारा ॥ एक वार जो पीके रहा। सुखजीवन सुख भोजनलहा ॥ पान फूल रस रंग करीजै। अधरै अधरसौं चाखाकीजै ॥ दो० जो तुम चाहो सो करो ना जानों भल मन्द । जो भावै सो होय मोहिं, तुम पिय चहूँ अनन्द ॥ सुनि धने प्रेम सुराके पिये । मरेना जिवन डरा हिन हिं हिये ॥ जहँ मधु तहां कहां निस्तारा। की सुधुमरहां की मतवारा ॥ सो पीजानि पिये जो कोई। पै न अघाय जाय पर सोई ॥ जाकहँ होय वार इकलाहाँ। रहै न वह बिन ओही चाहा ॥ गर्व दर्व सब देइ बहाई । कै सब जाव न जाय पियाई ॥ रातहि दिवस रहै सब भीजा। लाभै न देख न देखी छीजाँ ॥ अंगिया १ नाम जेवर २ राजाके मुलाक़ातसे ३ फूल ४ खुशबू ५ दलमल ६ शराब मुहब्बत सुराही से कम कम पियो ७ हुक्म ८ बात ६ शराब १० अंगूर ११ होंठ १२ पद्मावत १३ दिल १४ फ़ायदा १५-१७ दिन १६ नुक़सान १८॥
१५६ पद्मावत । भोर होत तब पलहु शरींरू । पाय घुमरहों शीतल नीरू ॥ दो० एकबार भर देहु पियाला, बारबार को मांग । मुहम्मदकिमन पुकारे, ऐसो दांव जेहिखांगै ॥ भयों बिहान उठा रँबि साईं । चहुँदिशि आई नखतं तराईं ॥ सबनिशं सेजमिला शशिसूरू । हारचीर बलियाँ भइ चूरू ॥ सुधनं पान चून भइ चोली । रंगरँगील निरँगै भइ डोली ॥ जागत रैयनि भयो भिनसारा । भइ बेसँभारे सोत वेकरारा ॥ अलकैं तुरंगिनि हिरदयै परी । नारँगैं छुइ नागिन विषभरी ॥ लँरी मुरी हिये हार लपेटे । सुरैसरि जनु कालिन्दी भेंटे ॥ जनुप्रयागैं आयलें बिचमिली । बेनी भइ सो रोमावली ॥ दो० नाभी लोंभेते गये, काशीकुण्डैं कहाव । देवतामरहिंकलंपशिर, आपहिंदोल नलाव ॥ विहँसि जगावर्हि सखीसयानी । सूर उठा उठि पद्मिनिरानी ॥ सुनत सूरै जनु कमल बिकासाँ । मधुकैर आयलीन्हमधुवासा ॥ जनहुँ मातबसैं पानी वरसी । अतिविपभरफूलीजनुअरसी ॥ नयनकमल जानहु दुइखोले । चितवनमृगै सोअतिजनुभूले ॥ तन बेसँभार केश औ चोली । चितअचेतजनु वाली भोली ॥ कमलमांझ जनु केसरै दीठी । यौवन हुत सो गँवाई बैठी ॥ भये शशि गहेगहन अस गहे । बिथरे नखत सेजभर रहे ॥ नशा १ ठण्डापानी २ कमी ३ सूर्य तथा राजा ४-८ सहेली ५ रात ६ चाँद ७ चूड़ी ६ पद्मावत १० बेरौनक ११ रात १२ बेहोश १३ बालकीलटै १४ छाती १५ तथा छातियां १६ पँचलरौ वा सतरलरी १७ छाती १८- गङ्गा जी तथा छाती १६ यमुना तथा छाती के बाल २० नाम तीरथ २१ नाम मुकाम २२ त्रिवेनी २३ लालच २४ मणिकर्णिका कुण्ड २५ शिरकटाना२६ गुनाह २७ सूर्य २८-२६ खिलना ३० भँवर ३१ मस्तीवसी ३२ हिरन ३३ ज़र्दरङ्ग ३४ चाँद ३५ तथा हारके मोती ३६ ॥
पद्मावत। १५७ दो० बेल जो राखी इन्द्रकहँ, पवन बास नहिं देहि। लाग्यो आय भँवर तेहि, कली बेध रस लेहि॥ हँसि हँसि पूँछै सखी सरेखी¹। जनहु कुसुंद² चन्दनमुखदेखी³॥ रानी तुम ऐसी सुकुमारा। बास फूल तन जीव तुम्हारा॥ सहिनहिंसकोहृदय पर हारू। कैसे सहो कन्तकर भारू॥ बदनकमलविक्सते⁴ दिनराती। सो कुंभलातकहो केहिमांती॥ अधर⁵ कमल जो सहत न पानू। कैसे सहा लाग मुख भानू⁶॥ लंक⁷ जो पैंग देत मुरझाई। कैसे रही जो राव न राँई⁸॥ चन्दन चोप⁹ पवन अस पीव। भयो चित्रसम¹⁰ कसभा जीव॥ दो० सब अरगजे¹¹ मरगजे¹² भयो, लोचन¹³बिंबे¹⁴ सरोजेँ¹⁵। सत्य कहो पद्मावत, सखी परीं सब खोज ॥ कहौं सखी आपन सतभाऊ। हों जो कहत कस रावनराऊ¹⁶॥ कांपों भँवर पहुंपैं¹⁷ पर देखे। जनुशशि¹⁸गहन तैसिमोहिलेखे॥ आज मर्म¹९ मैं जाना सोई। जस पियार पिय और न कोई॥ डर तवलग अह मिलानपीव। भानुँ²⁰ की दृष्टि²¹ छूटा सीवै²²॥ जतखन भानुलिन्हपरकासूँ²³। कमलकलीमनकीन्ह बिकासूँ²⁴॥ हिये²⁵ छोहँ²⁶ उपजों²⁷ ओसीवें²⁸। पिय न रिसाय लेव परजीव॥ हतजोअपारविरहदुख दूखा। जनहुअगस्त्यउदधि²९जलसूखा॥ दो० हमहुँ रंग बहु जानव, लहरें जेंत समुंद। पिय लैगये चतुराई, सक्यों न एको बुन्दे ॥ होशियार १ कोकाबेली २ छाती ३ मुँह ४ खिलना ५ होंठ ६ सूर्य तथा राजा ७ कमर ८ तथा राजकी सुहबत ६ तसवीर १० खुशबू ११ दलमल १२ आँख १३ कुन्दरू की तरह लाल १४ कमल १५ तथा औरत मर्द की सुहवत १६ फूल १७ चाँद १८ भेद १९ सूर्य २० निगाह २१ जाड़ा २२ रोशनी २३ खिलना २४ दिल २५ मेहरबानी २६ पैदा २७ खिदमत २८ समुद्र २६ दांव ३० ॥
१५८ पद्मावत । करि शिंगार तापन कहँ जाऊँ । ओही देखों ठांवहिं ठाऊं ॥ जो जियमहँ तो वही पियारा । तनमहँ सोइ न होय निरारों ॥ नयनहि महँ तो वही समाना । देखों जहां न देखों आना ॥ आपहिं रस आपहि पै लेई । अधरैं सहस लागे रस देई ॥ हियौ थार कुच कंचन लाडू । अगमन भेंट दीन्ह कै चाडू ॥ हुलसी लङ्क लई सो लसी । रावेनें रहस कसौटी कसी ॥ यौबन सबै मिला वह जाई । हौंरी बिच हुत गयो हेराई ॥ दो० जस कुछ दीजे धरने कहँ, आपन लेह सँभार । तस शिंगार सबलीन्हेसि, कीन्हेसि मोहिं ठठार ॥ एरी छबीली तुहिं छब लागी । नेत्र गुलाल कंत सँग जागी ॥ चम्प सुदरशन अस भा सोई । सोन जर्द जस केंसरै होई ॥ बैठि सँवर कुचै नारँग बारी । लागी नखें अधरैं रंगधारी ॥ अधरैं अधरसों भीज तंबोरी । अलकावलि सुरसुरगइ मोरी ॥ राय सुँनी तुम्ह औ रतमूँहीं । अलि मुखलाग भईफुलचुँहीँ ॥ जैसे शिंगार हार सों मिली । मालति ऐसी सदारहिखिली ॥ पुनि शिंगाररस किरौं नेवारी । कदम सेवति पियहिपियारी ॥ दो० गोंद कलीसम बिकैंसी, ऋतु बसन्त औ फाग । फूलहु फरहु सदा सुख, औ सुख सुफल सुहाग ॥ कहि यह बात सखी उठ धाई । चम्पावतैं कहँ आय सुनाई ॥ आज निरँगैं पद्मावत बारी । जीव न जाने पवनअधारी ॥ जगह १ अलग २ होंठ ३ छाती ४ सोने के लड्डुवासी छातियां ५ पहिले ६ पियार ७ खुश होना ८ कमर ६ तथा राजा १० धरोहर ११ आँख १२ खाविंद १३ पीली १४ छाती १५ लड़की १६ नाखून लगनेसे रंगजाता रहा १७ होठपर पानकी लाली १८ बाल १६ लाल २० सुर्ख मुँह २१ भँवर २२ नाम चिंड़िया २३ बराबर २४-२५ खिलना २६ मायपद्मावत २७ बेरंग २८ ॥
पद्मावत । १५६ तड़क तड़क गौ चन्दन चोला । धड़क धड़क डर उठै न बोला ॥ अहे जो कली कमल रस पूरी । चूर चूर होय गई सो चूरी ॥ देखो जाय जैसी कुँभलानी । सुनि सुहाग रानी बेहँसानी ॥ ले सँग सबही पद्मिन नारी । आई जहाँ पद्मावत बारी ॥ आय रूप सबही जो देखा । सोन बरन होयरही सो रेखा ॥ दो० कुसुम फूल जस मखी, निरँगै देख सब अंग। चम्पावत भइ वारी, चूँब केश औ मंग ॥ सब रनवास बैठि चहुँ पासा । शशिमंडल जनु बैठ अकासा ॥ बोली सबहिं वारि कुँभलानी । करहु शिंगार देहु खड़वानी ॥ कमल कली कोमल रंगभीनी । अतिसुकुमार लङ्क की छीनी ॥ चांद जैसी धन बैठि गिरासी । सहस किरन होय सूर्य विकासी ॥ तेहिके भारै गहन अस गही । भइ निरंग मुखज्योति न रही ॥ दर्ब वार कुछ पुण्य करेहू । औ लै बर्र संन्यासहि देहू ॥ भरके थार नखत गजमोती । वरंती कीन्ह चांदकी ज्योती ॥ दो० कीन्ह अरगजा मखना, औ सुख दीन्ह नहान । पुनि भइ चांद जो चौदस, रूप गयो द्विप भान ॥ पटवैहि घेर आन सब छोरी । सारी कंचुकै पहिर पैंतोरी ॥ पहँदयीं और कैस्यौं रौती । बायरलै पिंडवाँही गुजराती ॥ चकवों चीर मखोनौ लीने । मोति लाग औ छापे सोने ॥ सुरंग चीर भल सिंहलदीपी । कीन्ह जो छापा धनवहछीपी ॥ पेमचौं डुरयाँ और बुँदेरी । श्यामँ सेतें पीरी औ हेरी ॥ हँसना १ पीली २ चेरंग ३-८ चाँद ४ शरबत ५ कमर पतली ६ किसके मुलाकात के लूकसे ७ दरवाज़ा ६ न्योछावर १० खुशबूदार उबटन ११ सूर्य १२ दारोगा तोशाखाना १३ अँगिया १४ रेशम १५ नाम कपड़ा १६- १७-१८-२०-२१-२२-२४-२५-२६ लाल १८ खूबसूरत २३ काला २४ सफ़ेद २५॥
१६० पद्मावत। सात रंग सो चित्रं चितेरे। भरके दीठं जाहिं नहिं हेरे॥ चन्दनोताँ जो खरदुकें भारी। बांसपूरै झिलमिलंकी सारी॥ दो० पुनि अभरणँ बहु काढ़ा, आनोभांति जुड़ाउ। फेरफेर सब पहिरहिं, जैस जैस मन भाउ॥ रतनसेन गये अपनी सभा। बैठे पाटैं जहां अठ खंभा॥ आयमिले चितौर के साथी। सबै विहँसके दीन्हा हाथी॥ राजांकर भल मानहु आई। जें हमकहँयह भूमि दिखाई॥ जो हम कहँ नहिं एतनरेसू। तब हम कहां कहां यहि देशू॥ धनि राजा तुइँ राज विशेखा। जेहिकीरजायसुसबकुछदेखा॥ भोग बिलास सभी कुछ पांवा। कहां जीभ तस अस्तुतिआवा॥ अब तुमआयअन्तरपटसाजा। दरशन कहँ न तपावहु राजा॥ दो० नयनें सेराने भूखगइ, देख दरश तुम आज। आजभयो अवतोरँ नव, औसव भे नये काज॥ हँसके राज रजायसुँ दीन्हा। मैं दरशन कारणें तप कीन्हा॥ अपनी योग लाग अस खेला। गुरुभा आप कीन्ह तुम चेला॥ अहकमोर बर्षारितु देखहु। गुरु चीन्ह के योग्य विशेपहु॥ जो तुम तपसाधा मोहिं लागी। अब जन हिये १६ होहु वैराँगी॥ जोजेहिं लाग सहै तप योगू। सो तेहिके सँग मानै भोगू॥ सोरह सहसँ पद्मिनी मांगी। सबै दीन्ह नहिं काहू खाँगी॥ सबके धौरहरं सोने साजा। सब अपने अपने घर राजा॥ दो० हस्तिं घोर औकापर, सबहि दीन्ह बड़ साज। तसवीर १ निगाह २ क़िस्म लहँगा ३-४ नाम कपड़ा ५-६ ज़ेवर ७ तख़्त ८ ज़मीन ६ राजा १० आंख ठंडी ११ नई पैदाइश १२ हुक्म १३ वास्ते १४ तथा रीना १५ दिल १६ दुखी १७ हज़ार १८ कमी १९ महल २० हाथी २१॥
भये गृहस्त सब लखपती, घरघर मानहु राज ॥ पद्मावत सब सखी बोलाई। चीर पटोरे हार पहिराई ॥ शीशं सबन के सेंदुर पूरा। शीश पूर सब मांग सिंदूरा ॥ चन्दन अगर चित्रसम भरी। नयन चार जानहुँ औतेरी ॥ जानु कमलसँग फूली कोई। औ सो चांद संगतंरई उई ॥ धन पद्मावत धनतोर नाहूँ। जेहि अभरण पहिरा सबकाहू॥ बारह अभरण सोरह शिंगारा। तोहिसोहेपियर्शोशमस्यारा ॥ शशि सुकलङ्की राहुहि पूजा। तुइनिकलङ्कनकोइसरं दूजा ॥ दो० काहूँ बीन गहा करै, काहूँ नाद मृदंग । सब दिन अनन्दबधावा, रहसकूद इकसंग ॥ पद्मावत कहि सुनहु सहेली। हौं सों कमलतुमकुमुदने बेली ॥ कलश मानिहौं तेहिदिनआई। पूजा चलो चढ़ावहिं जाई ॥ मँझै पद्मावतका जो विवानू। जनु परभाते उठे रतिभानू ॥ आस पास वाजत चौडोला। झाँझे मृदंगे झाँझ डफ ढोला ॥ एक संग सब सोंधी भरी। देव दुवारे उतर भईं खरी ॥ अपने हाथ देव अन्हवावा। कलशसहसें इकघूंटैभरवावा ॥ पोता मँडफ अगर औ चन्दन। देवभशअरगजै औ बिन्दन ॥ दो० कै प्रणाम आगे भई, विनयं कीन्ह बहुभांति । रानी कहा चलहु घर, सखी होत है राति ॥ भइनिशै धने जसशौशि परकैसी। राजेदेखिभूमि फिरबसी ॥ किस्म कपड़ा १ शिर २ तसवीर के बराबर ३ छोटे नखत ४-६ कोका- बेली ५-१२ खाविंद ७ ज़ेवर ८ चाँद ६-२७ बराबर १० हाथ ११ बीच १३ भोर १४ लाल सूर्य्य १५ नाम बाजा १६-१७-१८ सहेली १६ हज़ार २० घीव २१ खुशबू २२ दंडवत् २३ आजज़ी २४ रात २५ पद्मावत २६ रोशनी २८ ज़मीन २६ ॥
१६३ पद्मावत ! भइकटकैई शरद शशिआवा । फेर गगन रविचाही छावा ॥ मुनि धनै धनुष भौंहकरफेरी । काम कटाक्षै मकोरतैंहेरी ॥ जानैहुँ न कै बीच पै खाचों । पितासौं हों आज न बाचौं ॥ काल्ह न होय रहे सुख रामा । आज करों रावणसंग्रामा ॥ सैनै शिंगार मुहूँ है सजा । गजंगतचालअँचलगकधुजा ॥ नयनसमुद्र खड्ग नासिकों । सरबरे जूभको मोसोंजिता ॥ दो० हों रानी पद्मावती, मैं जीता सुख भोग । तू सरबेरे कर तासों, जसयोगी तोहि योग ॥ हौ असयोगि जान सब कोऊ । बीरैं श्रृंगार जिते मैं दोऊ ॥ वहँ तो हनूँ बीर घट माहीं । यहँतो कामकटकैं तुम्हपाहीं ॥ वहां तो हर्य चढ़के महि मंडों । यहां तो अधरं अमीरसखंडों ॥ वहां तो खड्ग नरन्दहि मारों । यहां तो बिरहतुम्हार सँहारों ॥ वहां तो गजैं पेलों होय केहेरै । यहां तो कुचै कामिनकरहेहर ॥ वहां तो लूटौं कटकैं खँडारू । यहां तो जीत तुम्हार शिंगारू ॥ वहां तो कुम्भस्थलें गजनाऊँ । यहां तो गजकलश हिकरलाऊँ ॥ दो० पड़ा बीच तब घर घर, प्रेमै राज के टेक । मानौ भोग छहू ऋतु, मिल दोनों होय एक ॥ खण्ड चौबीसवां छहऋतुबारहमास ॥ प्रथमै बसन्तनवलऋतु आई । सुऋतु चैत बैशाख सुहाई ॥ हुक्म १-आसमान पर सूर्य्य तथा कोठे पर जाना २ पद्मावंत ३ रामज़ा ४ कोर से देखना ५ भौंह चढ़ाके न बचोगे ६ क़सम ७ रावण की तरह लड़ो ८ फ़ौज ६-१७-२४ हाथी १०-२१ तलवार ११ नाक १२ बराबरी १३-१४ मैदान लड़ाई वा भोग १५ हनुमान् जी १६ घोड़ा १८ ज़मीन १६ होंठ २० शेर २२ औरत की छाती से काम २३ नाम हाथी २५ प्रेमने बीचबचाव कर दिया २६ पहिले २७ ॥
पद्मावत । १६३ चन्दन चीर पहिर धन अंगा। सेंदुर दीन्ह बेहँसि भरमंगा ॥ कुसुमहार औ परबलँबासू। मलयागिरि छिड़ैंका कैलासू ॥ सूर सेपेती फूलन दासी। धन औ कन्त मिले सुखबासी ॥ पियसँयोगैं धन यौवन बारी। भँवर पुहुपसँग करहिं धमारी ॥ होय फाग भल चाचर जोरी। बिरह जरायदिन्ह जसहोरी ॥ धनशशि सीत तपी पियसूरू। नखतशिंगार होंहिं सबचूरू ॥ दो० जेहि घर कंता ऋतुभली, आव बसन्ता नित्त । सुखभर आवहिं देवँहरे, दुःख न जाने कित्त ॥ ऋतु ग्रीष्म की तपननहिं तहां। जेठ असाढ़ कन्तघर जहां ॥ पहिरे सुरंग चीर धन झीना। परमलै मेदरहीं तन भीना ॥ पद्मावत तन सीरे सुबासा। नैहर राज कन्त घर पासा ॥ औ बड़ि जूड़ तहां सोनारों। अगर पोत सुखै नन्तउहारा ॥ सेते बिछावन सूर सेपेती । भोग बिलास कराहमुखसेती॥ अधर तँबोर कपूर भीउसैना। चन्दन चरच लाव नितबैना ॥ भा अनन्द सिंहल सब कहूँ। भागवन्त कहँ सुख ऋतुछहूँ ॥ दो० दाड़िम दाखें लेहिरस, बरसहिं आंब छुहार। हरिय रतन सोतों कर, जो अस चाखनहार ॥ ऋतुपावस बरसै पिव पावा। सावन भादौं अधिकै सुहावा ॥ पद्मावत चाहंत ऋतु पाई। गगनै सुहावनभूमि सुहाई ॥ कोकिल वैन पांत बर्गे छूटी। धनै निसरी जनु बीरबहूटी ॥ पद्मावत १-२७ खुशबूदार २-चन्दन ३ तोशक लिहाफ़ ४-१७ मुला- क़ात ५ फूल ६ चाँद ७ ठंडा ८-१३ गर्म ९ सूर्य १० महादेवजी ११ बहुत खुशबू १२ रात के रहने का मकान १४ फ़र्श १५ सफ़ेद १६ होंठ १८ अनार १६ अंगूर २० तोता २१ बरसात २२ बहुत २३ आसमान २४ ज़मीन २५ बगुला २६ ॥
१६४ पद्मावत । चमकबीजैं बरसै जल सोना । दादुरे मोरशब्दै मुठलोना ॥ रँगरातीपिय सँग निशँ जागी । गरजेगगनं चौंक कँठलागी ॥ शीतल बुन्द ऊँच चौपारा । हरियर सब देखै संसारा ॥ मलयसमीर वास सुखबासी । बेल फूल सेज सुख दासी ॥ हरियर भूमि कुसुम्भी चोला । औधनपियसँग रचो हिंडोला ॥ दो० पवन झकोरे हैं हरषै, लागै शीतल बास । धनजानी यहि पवनहै, पवनसो अपने पास॥ आयशरदऋतुअधिकैपियारी । नाउँकुवारकातिकउजियारी ॥ पद्मावत भइ पूनोकलों । चौदह चांद उई सिंहला ॥ सोरह किरण शृंगार बनावा । नखतभरामूर्य्यशशि पावा ॥ भा निर्मलै सब धर्ति अकासू । सेज सँवार कीन्ह बलदासू ॥ श्वेतैं बिछावन औ उजियारी । हँसहँस मिलहिंपुरुषऔनारी ॥ सोने फूलहिं पृथिवी फूली । पियधनसों धनपियसोंभूली ॥ नैंधै अंजनदैखंजनै देखावा । होय सारस जोरी रस पावा ॥ दो० यहिऋतु कन्थापासजेहि, सुखतिनके हियमांह । धन हँस लागी पियगले, धनगल पियकेबांह ॥ आयशिशिरऋतुतहां न सीऊ । अगहन पूष जहां घरपीऊ ॥ धनै औपियमहँखीवै सुहागा । दुहूँअंगें एकै मिललागा ॥ मनसों मन तनसों तन गहा । हियें सोंहिय बिचहारनरहा ॥ जानहुँ चन्दन लाग्यो अंगा । चन्दन रहे न पावै संगा ॥ भोगकरहिं सुख राजा रानी । वहँ लेखे सबसृष्टि जुड़ानी ॥ बिजुली १ मेढक २ आवाज़ ३ रात ४ आसमान ५ हवा ६ ज़मीन ७ १४ खुश ८ बहुत ६ पूर्णमासीका चाँद १० चाँद ११ साफ़ १२ सफ़ेद १३ आँख १५ ममोला १६ जाड़ेका मौसिम १७ पद्मावत १८ जाड़ा १६ वदन २० छाती २१ सारी दुनियां २२ ॥