पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पद्मावत। १८६ फेकरे मूँड़ चँवर जनु लाये। निकस दांत मुख बाहेर आये॥ देह रीछकी रीछ डेराई। देखत दृष्टि धाय जनु खाई॥ रातेनयन निडर जो आवा। देख भयावन सब डरखावा॥ दो० धर्ती पाँयँ स्वर्ग शिर, जानु सहस्राबाहु। चांद सूर्य औ नखतम्हँ, अस देखेजनुराहु॥ वोहितँ वही न मानहि खेवा। राक्षंस देखि हँसा जनु देवा॥ बहुते दिनहिबारै भइ दूजी। अजगरकेर आय मुखपूंजी॥ यहि पद्मिनी विभीषण पावा। जानहु आज अयोध्याछावा॥ जानहु रावन पाई सीता। लंका बसी राम रन जीता॥ मच्छ देख जैसें बकँ आवा। टोयटोय सुइँ पांव उठावा॥ आय नेर होय कीन्ह जोहारू। पूँछा क्षेम कुशल व्योहारू॥ जो विश्वासघात का देवा। बड़ विश्वास करैकी सेवा॥ दो० कहां मीत तुम भूलेहू, औ जायहु केहि घाट। हों तुम्हार अस सेवक, लाय देउँ तुहिं बाँटे॥ गाँढ़ परे जिव बावर होई। जो भल बात कहै भल सोई॥ राजैं राक्षस नेर बोलावा। आगे कीन्ह पन्थ जनु पावा॥ बहुवंसोवै राक्षसकहँ बोला। पैगटेकें भूमि सब डोला॥ तू खेवकैं खेवक उपराहीं। वोहितँ तीरलाव गहिबाहीं॥ तुहितें तीर घाट जो पाऊँ। नौगिरही तोडर पहिराऊँ॥ कुण्डल श्रवणँ देउँ नग लाई। महराकी सौंपों महराई॥ तस राक्षस तोर पूरों आसा। राक्षसाइन की रहै न बासा॥ निगाह १ लाल आंख २ नाम राजा जिसके हज़ार हाथ थे ३ नाव ४ खुशहुआ ५ पेट भरा ६ बगुला ७ खैरियत ८ दग़ाबाज़ ६ यक़ीन १० राह ११—१३ दुःख १२ ख़ुशी १४ खड़ाहूआ १५ ज़मीन १६। मल्लाह १७ नाव १८ नाम ज़ेवर १६ कान २० ॥
१६० पद्मावत। दो० राजैं बीड़ा दीन्हों, नहिं जानों बिश्वासै। इक अपनी भूखकारनै, होय मच्छकर दास॥ राक्षस कहा गुसांइ बिनाती। भल सेवक राक्षसकी जाती॥ छीना लंकदही श्रीरामा। सेवन छोड़ देह भइ श्यार्मा॥ अबहूँ सेवकरे सँग लागे। मानुष भूल होहिं नहिं आगे॥ सेतबन्धराघव जहँ बांधा। तेहिते चढ़ो भारै लें कांधा॥ पै अब तुरत दान कुछ पाऊँ। तुरतगही बहँ बांध चढ़ाऊँ॥ तुरंत जो दान पान हँस दीजे। थोरा दान बहुत पुनि कीजे॥ सेवक राय जो दीजे दानू। दान नाहिं सेवाँ बर मानू॥ दो० दै बाचौं सत ना रहा, हत निरमल जेहिरूप। आंधी बहुत उड़ायके, मारगयो अन्धकूप॥ जहां समुद्र मँझधारँ भँडारू। फिरै पानि पाताल दुआरू॥ फिरफिर पानि वही ठांवमरै। फेर न निकसै जो तहँ परै॥ वही ठांव महिरावन पुरी। हलकातर यमकातेरं चूरी॥ वही ठांव महिरावन मारा। परे हाड़ जनु पड़े पहारा॥ परी रीढ़ जेहि ताकर पीठी। सेतबन्ध अस आवै दीठी॥ राक्षस आन तहां के जुड़े। बोहित भँवर चक्र महँ पड़े॥ फिरे लाग बोहित जस आई। जस कुम्हार घर चाक फिराई॥ दो० राजै कहा रे राक्षस, जान बूझ बौरास। सेतबन्ध यह देखें, कसैनतहां लैजास॥ सुनिबावर राक्षस तब हँसा। जानहु स्वर्ग टूटिभुइँगसा॥ . एतवार १ भूखवास्ते २ जलाना ३ काला ४ बोझ लै जासक्ता ५ ख़िद- मत ६ ख़िदमत का हक़ ७ क़ौल ८ बीचोबीच ९ यमफांस १० पुल ११ नाव १२ आसमान १३॥
को बावर तुम वौरहि देखा । जो बावर मुख लागि सरेखा ॥ बावर तुम जो मूखे कहँआनी । तोहिन सभभी पंथंभुलानी ॥ पंख जो बावर रहि घर माटी । जीभ चढ़ाय भखै सब आँटी ॥ महिरावन की रीर जो परी । कहो सी सेतुबन्ध बुधि हरी ॥ यहि सो आहि महिरावनपूरी । जहँवां स्वर्ग नेर घर दुरी ॥ अब पछताव द्रव्य जस जोरा । करहु स्वर्ग पर हाथ मरोरा ॥ दो० जोहि जियत महिरावन, लेत जगतकर भार । जो मरहाड़ न लैगा, अस होय परा पहार ॥ बोहितें भवहिं भवै सब पानी । नाचैं राक्षस आशतुलोनी ॥ बूडहिं हस्ति घोर मानंवाँ । चहुँदिश आयजुरे मँसखंवा ॥ ततखन राजपंख एकआवां । शिखंर टूटजसडहनेडुलावां ॥ परांदृष्टि वह राक्षस खोटा । ताकेसिजैसुहस्तिं बड़मोटा ॥ आय वही राक्षस पर टूटा । भैंहिलेउड़ा भँवरजल छूटा ॥ बोहितें टूक टूक सब भई । ऐसो न जाना वह कहँ गई ॥ भये राजा रानी दुइ पाटा । दोनों बहे चले दुइ बाटाँ ॥ दो० कार्यों जीव मिलायके, मारकियो दुइ खण्ड । तन रोवत धरतीचला, जीव चला ब्रह्मण्ड ॥ मूरछ परी पद्मावत रानी । कहँजिव कहँपिव ऐस न जानी ॥ जानु चित्र मूरति गहि लाई । पाटा परी बही तस जाई ॥ जन्मत पवन सही सुकवारा । तेहिसो परादुखसमुद्र अपारा ॥ लक्ष्मी माय समुद्र की बेटी । ताकहँ लच्छ होय जें भेटी ॥ भूख के पास आये १ राह २ चींटी ३ नाव ४ उम्मेद पूरी हुई ५ हाथी ६-१३ आदमी ७ तुरंत ८ सौमुगी ६ पहाड़ १०. बाजू ११ निगाह १२ पकड़ना १४ नाव १५ राह १६ बदन १७ आसमान १८ तसवीर १६ दौलत २० ॥
१६२ पद्मावत । खेलत रही सहेली सेती। पाटाजाय लाग तेहि रेती॥ कहेसि सहेली देखो पाटा। मूरतिआय लागि वहि घाटा॥ जो देखहिं त्रिया है श्वासा। फूलमुवां पै मुई न बासा॥ दो० रंग जो राँती प्रेमकी, जानहु वीरबहूट। आयबही दधि समुद्रमें, पै रंग गयो नछूट॥ लक्ष्मी लक्षण बतीसों लखी। कहेसि न मरी सँभारहु सखी॥ कागद पतिरी जैसो शरीरा। पवन उड़ाय परीं मँझनीरों॥ लहरझकोरउड़हिंजलभीजा। तौह रूप रंग नहिं छीजौ॥ आप शीश लै बैठी कोरों। पवनडुलावे सखि चहुँओरा॥ यास्की समुझ परा तन जीउ। मांगेसि पानि बोल कै पीउ॥ पानि पियाय सखी मुखधोई। पद्मिनजान कमलसँग कोई॥ तब लक्ष्मी दुख पूँछ मिलोही। त्रिया समुझ बात कहु मोही॥ दो० देख रूप तोर आगर, लाग रहा चितमोर। केहिनगरी की नागर, काहि नाउँ धनतोर॥ नयन पसार चेत धर्न चेती। देखी काह समुद्रकी रेती॥ आपन कोउ न देखेसि तहां। पूँछेसि को तुम को हम कहां॥ अहैजो सखी कमलसँगकोई१०। सानाहीं मोहिंकहाविछोई११॥ कहांजगत मन पिया पियारा। जससुमेरु विधि१२ गरुसँवारा॥ ताकर गरबी प्रीति अपारा। चढ़ेहिये१४ जनु चढ़े पहारा॥ रहै न गरवी प्रीतिसो झांपी। कैसे जियों भार दुख चांपी॥ कमलंकरी की जोरी नाँहौं। दीन्हबहायउदधि जलमाँहा॥ • सुरझाना १ लाल २ सब गुन जाननेवाली ३ पानी में ४ नुक़सान ५ शिर ६ गोद ७ कोकावेली ८-१० पद्मावत ९ अलग ११ पहाड़ १२ ईश्वर १३ दिल १४ खाविन्द १५ समुद्र १६॥
यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:
पद्मावत। १६३ दो० आवा पवन बिछोहको, पातिपरा बिकरार। तरवरं तजी जो चूरकै, लागै केहिकी डार॥ कहनिन जानहिं हमतोर पीउ। हम तू पाइरहा नहिं जीउ॥ पाटा परी आय तू बही। ऐसोन जानहिंथों कहँ अहही॥ तब सुधि पद्मावत मन भई। सँवरि बिछोहैं मुरछमर गई॥ नयनहिं रक्त सुराही ढारो। जनहु रक्त शिरकाट पियारा॥ खनेहिं चेत खनहो बिकरारा। भा चन्दनबन्दन सबछारा॥ बावर होय सो परी पुनि पाटा। देहु बहाय कन्त जेहि घाटा॥ को मोहिं आग देय रच होरी। जियत न बिछुड़ै सारसजोरी॥ दो० जेहिसर मार बिछोगा, देहु वही शिर आग। लोग कहैं यहि सर चढ़ी, हों सो जरों पिय लाग॥ कायाँ उदधि चितों पिय पाहां। देखौंरतन सो हिरदय माहां॥ जनहु आहि दरपन मम हिया। तेहि महँ बैठि देखावे पिया॥ नयननीरे भीजत मुठ दूरी। अब तेहि लाग मरोंसुठ भूरी॥ पिय हिरदयमहँ भेंट न होई। कोरे मिलाव कहौं केहि रोई॥ श्वास पास नित आवै जाई। सो न संदेश कहै मोहिं आई॥ नयन कौड़िया भइ मँडराहीं। थिरक सार पै आवहि नाहीं॥ मन भँवरी वह कमल बसेरी। है मरजिया न आये हेरी॥ दो० साथी आये नियाथ जो, सके न साथ निबाहि। जो जिय जारे पिय मिले, भेंटरे जिय जर जाहि॥ सती होय कहँ शीर्ष उघारी। घने महँ बीजे घाव जिमियारी॥ १ अलग १-३ पेड़ २ जानवर जिबहकर छोड़ दिया ४ कसी ५ राख ६ चिता ७ बदन ८ समुद्र ९ दिल १० आँसू ११ मुलाकात १२ जो माल के साथी थे १३ शिर १४ बादल १५ बिजुली १६ ॥
१६४ पद्मावत । सेंदुर जरै आग जनु लाई । शिरकी आग सँभार न जाई ॥ छूट मांग सब मोति परोई । बारहिंवार गिरहिं जनु रोई ॥ टूटहिं मोति बिछोहैं के भरे । श्रावण बूँद गिरहिं जनु झरे ॥ फेर फेर कर यौबनै करा । जानहु कनक आगिन महँ जरा ॥ अगिन मांग पै देइ न कोई । पाहुनै पवनैपान सम होई ॥ खीनलंक टूटी दुख भरी । बिनरावनैं केहिवरं होयखरी ॥ दो० रोवत पंख विमोही, जनु कोकिला अरम्भं । जाकर कनक लुटासो, विछुड़ी प्रीतम खम्भ ॥ लक्ष्मी लाग बुझावै जीव । नामर बहिन मिलाहि तोरपीव ॥ पियो पानि होव पवन अधारी । जस हौं तुह समुद्र की वारी ॥ मैं तोंहि लाग लेत पटबाट् । खोजव पितै जहांगलघाटू ॥ हौं जेहि मिलौं ताहिं बड़भागू । राज पाट औ देउँ सुहागू ॥ कहि बुझाय के मंदिर सिधारी । भइज्योनार न जेवै नारी ॥ जेहिरे कन्तकर होय बिछोवौ । कातेहि नींद भूख सुखसोवा ॥ जीव हमार पीव लें आहा । दरशन देव लेव चितचाहा ॥ दो० लक्ष्मी जाय समुद्र पहँ, ये बातैं सब चाल । कहा समुद्र अहे घटमोरे, आन मिलावों काल ॥ राजा जाय तहां बहि लागा । जहां न कोइ संदेशी कागा ॥ तहां एक परबंत हा धूँगा । जहवां सब कपूर औ मूँगा ॥ तहँ चढ़ हेरौं कोइ न साथा । दर्व्यसमेटकुछ लाग न हाथा ॥ रहा जो रावण केर बसेरौ । गोहराये कोइ मिले न हेरा ॥ विरह १ जवानी २ सोना ३ महिमान ४ हवा पानी देते हैं ५ पतली कमर ६ तथा राजा रतनसेन ७ ताक़त ८ मोहजाना ९ बेक़रार १० सोना ११ लड़की १२ याप १३ पद्मावत १४ जुदाई १५ ऊँचा पहाड़ १६ देखना १७ मकान १८ ॥
पद्मावत । १६५ डाढ़ मारके राजा रोवा। कैं चितौरगढ़ राज बिछोवा ॥ कहां मोर सब द्रव्य भंडारू। कहां मोर सब कटककँधारू ॥ कहां तुरंगै मोर बांकावली। कहां मोर हस्ति सिंहली ॥ दो० कहँ रानी पद्मावत, जीव बसे जेहि माहिं। मोर मोर के खोयों मूल, गर्वऔगाहिं ॥ चम्पा भँवरा गुरु जो मिलावा। मांगे राजा बेगि न पावा ॥ पद्मिनि चाह जहां सुन पाऊँ। परों आग औ पानि धसाऊँ॥ ढूंढ़ों पर्वत मेरु पहारा। चढ़ों स्वर्ग औ परों पतारा ॥ कहां सो गुरु पाऊँ उपदेशी। अगमपन्थ कर होय संदेशी ॥ पर्यो आय यह समुद्र अथाहा। जहां न वार न पार न थाहा ॥ सीता हरण राम संग्रामा। हनुमत मिला जिता तब रामा॥ मोहिंन कोइ विनवौं केंहि रोई। को सहाय उपदेशिक होई ॥ दो० भँवर जो पावै कमल कहँ, मन आनंद बहुतकेल । आयपरा कोइ हस्ति तहँ, चूरकिये सो बेल ॥ कासों पुकारौं कापहँ जाऊँ। गाढ़ै मीत होय तेहि ठाऊँ ॥ को यह समुद्र मथे बल बाढ़ा। को मंथ रतन पदारथ काढ़ा ॥ कहां सो ब्रह्मा विष्णु महेषू। कहां सुमेरु कहां वह शेषू ॥ कोचस साज देइ मोहिंआनी। वासुकि दाम सुमेरु मथानी ॥ को दधिसमुद्र मथै जस मथा। करनी सार न कहिये कथा ॥ जौलहि मथन कोइ दै जीवा। सूधी अंगुरि न निकसै घीव ॥ लै नग मोर समुद्र भा बया। गाढ़ परै तौ लै परगटा ॥
पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes): अलग १ फ़ौजभारी २ घोड़ा ३ हाथी ४ गरूरगहिरा ५ जल्द ६ वीहड़ ७ आसमान ८ राह बतानेवाला ९ मुश्किलराह १० मिन्नत ११ दुख १२ हाथी १३ पियारादोस्त १४ जगह १५ महादेवजी १६ पहाड़ १७-२० नामराजासाँपोंका १८ रस्सी १६ ॥
१६६ पद्मावत । दो० लीलरहा अब ढीलैं है, पेटपदारथै मेल । को उजियार करै जग, झांपा चन्द उघेल॥ ए गुसाँईं तू सिरजन हारू । तुझिरजायहि समुद्रअपारू ॥ तुइअसगगन अन्तरिक्षराखा । जहां न टेक न थूनि नखांभा ॥ तुइ जल ऊपर धरती राखी । जगत भार लै भार न थाकी ॥ चांद सूर्य्य औ नखतहिंपाती । तोरे डर धावहिं दिन राती ॥ पानी पवन आग औ माटी । सबकी पीठ तोरहें सांटी ॥ सोइ मूरुख औ बावर अन्धा । तोहिंछांड़ चित्तऔरहिवन्धा ॥ घट घट जगत तोरहै दीठी । हौं अन्धा जेहि सूझ न पीठी ॥ दो० पवनं हिये भापानी, पानि हिये भइ आग । आग हिये भइ माटी, गोरखधन्धे लाग ॥ तुइँ जिवतन मिल बसदैआऊ । तुहीं विछोवेसे करेसि मिलाऊ ॥ चौदहभुवन सो तोरे हाथा । जहँलगिविछुड़ीआवकसाथा ॥ सब कर मर्म भेदतोहिपाहां । रोम जमावसि टूटी जाहां ॥ जानेसि सबै अवस्थान मोरी । जस बिछुड़ी सारसकी जोरी ॥ एक मुई रुर मुई सो दूजी । रहा न जाय आयु अब पूजी ॥ झूरत तपत दरधै का मरों । कल्पोंमाथ वेगे मिसन्तरों ॥ मरों सो ले पद्मावत नाऊँ । तुइँ कँत्तार करेसि इकठाऊँ ॥ दो० दुख तो प्रीतम देखिये, सुख नहिं सोवे कोय । यही ठाउँ तन डरपै, मिलन बिछोवाँ होय ॥ वेडर १ लाल ज़वाहिर २ ईश्वर ३ पैदा करनेवाला ४ आसमान ५ बीचोबीच में लटकाहुश्रा ६ सहारा ७ कोड़ा ८ निगाह ६ हवा १० दिल ११ जुदाई १२ सात परदा आसमान सात परदा ज़मीन १३ भेद १४ हाल १५ उमरतमाम १६ जलाना १७ शिरकटाना १८ जल्द १६ नजात २० ईश्वर २१ जगह २२ जुदाई २३ ॥
An exact line-by-line transcription of the provided page from Padmāvat:
कहिके उठा समुद्रमहँ आवा । काढ़ि कटार ग्रीवै लै लावा ॥ कहा समुद्र पाप अब घटा । ब्राह्मण रूप आय परगटा ॥ तिलक दुवादश मस्तक दीन्हे । हाथ कनकबैशाखी लीन्हे ॥ मुद्राश्रवणैं जनेऊ कांधे । कनकपत्रै धोती तरिबांधे ॥ पांवरे कनक जड़ाऊ पाऊँ । दीन्ह अशीशआयतेहिठाऊँ ॥ कहो कुँवर मोसे संत बाता । काहे लागकरेसि अपघाताँ ॥ परहेसि मरेसिकिकौनैलाजा । आपन जिव देइसकेहिकाजा ॥ दो० जन कटार गर लावसि, समझदेख मन आप । सकत जीव जो काढ़ेसि, महादोष औ पाप ॥ को तुम उतरैं देइ हो पांडे । सो बोलै जाकर जिवभांडे ॥ जम्बूदीप केर हौं राजा । सो मैं कीन्ह जो करतनछाजौ ॥ सिंहलदीप राज घर बारी । सो मैं जाय विवाही नारी ॥ लख बोहितैं दायज ते भरी । नग अमोल औसबनिरेमरी ॥ रतन पदारथ माणिक मोती । हती न खांगीसम्पैतित्योती ॥ चहल घोड़ हस्ती सिंहली । औसँग कुँवर लाख दुइवली ॥ तेहि गोहनैं सिंहल पद्मिनी । इक सो एक चाह रुपमनी ॥ दो० पद्मावत जग रूप मन, कहाँलग कहूँ उहेल । ते समुद्र महँ खोयौ, हौं का जियोँ अकेल ॥ हँसा समुद्र होय उठा अजूरा । जगजोवूडसवकहिकहिमोरा ॥ तोर होय तोहि परै न बेरा । बूझ विचार तुहीं कहु केरा ॥ हाथ मरोर धुनै शिर मांखी । पैतोहिहिये न उघरेआंखी ॥
फुटनोट / शब्दार्थ: गर्दन १ ज़ाहिर २ सोने की लाठी ३ कानमें वाली ४ सोनेकी पंटरी ५ खड़ाऊं ६ खुदकुशी ७ निन्दासे हँसी ८ पाप ६ जवाब १० बदन में जान ११ सज़ावार १२ नाव १३ साफ़ १४ दौलत १५ हाथी १६ साथ १७ रो- शनी १८ तेरेपास रहती १६ दिल २० ॥
१६८ पद्मावत । बहुतैं आय गये शिर मारा । हाथ न रहा झूठ संसारा ॥ जोपै जगतै होत थिरैं मायौँ । सैंततें सिद्धि न पावत राँयौँ ॥ सिद्धै द्रव्य न सैंता गाड़ा । देखा भार चूँव कै छाड़ा ॥ पानी की पानी महँ गई । तुइँ जो जिया कुशल सब भई ॥ दो० जाकर दीन्ह जीव औ कायाँ, लेहि चाह जब चाव। धन लक्ष्मी सब ताकर, लिये तो का पछताव ॥ अनपाँड़ैं पर कहि का हानी । जो पाऊँ पद्मावत रानी ॥ तेंपं के पावा मिलके फूला । पुनि तेहि खोइ सोई पँथै भूला ॥ पुरुषन आपन नारि सराहाँ। मुये गँये सँवरा पै चाहा ॥ कहँ अस नारि जगत उपराहीं। कहँ अस जीव मिलन सुख द्याहीं॥ कहँ अस रहस भोग अब करना । ऐसे जिये चाहि भल मरना ॥ जहँ अस परी समुद्र नगदियाँ । तेहि किम जिया चहै मरजिया ॥ जस ये समुद्र दीन्ह दुख मोको । दै हंत्या भगरों शिवलोकों ॥ दो० का मैं यहिक नशावा, का मैं सँवरा दांव । जाय स्वर्ग पर होयहै, यहिकर मोर नियाव ॥ जो तु मुवा कित रोवस खरा । नामुएँ मरै न रोवै मरा ॥ जो मर भा औ छांड़ेसि कार्याँ। बहुर्र न करै मरन की दाया ॥ जो मर भयो न बूड़े नीराँ । बहत जाय लागे पै तीराँ ॥ तुहौं एक मैं वावर भेटाँ । जैस राम दशरथ कर बेटा ॥ वहूँ नारि कर पड़ा बिछोवाँ । वही समुद्र महँ फिरि फिरि रोवा ॥ दुनियाँ १ क़ायम २ दौलत ३ फ़क़ीर जमा न करता ४ राजा ५ खैरियत ६ बदन ७-१८ पेन्नाहाण ८ नुक़सान ६ मेहनतसे १० राह ११ तारीफ १२ मरन पीछे १३ जवाहरचिरागकी तरह रौशन १४ ईश्वर के सामने १५ आसमान १६ हिलना १७ फिर १८ पानी २० किनारा २१ मुलाक़ाते २२ जुदाई २३ ॥
पुनि जो रामि खोई भा मरा । तब एकान्त भयो मिल तरा॥ तस मर होहु मूँद अब आंखी । लावों तीरें टेकैबैशाखी ॥ दो० बावर अन्ध प्रेमका लुब्धो, सुनत वही भा बाट । निमिषे एक महँ लेगा, पद्मावत जेहि घाट ॥ पद्मावत कहँ दुख तस बीता । जस अशोकबिरखातर सीता॥ कनकलता दुइ नारंग भरी । तेहिकभार उठसकै नहिंखरी॥ तेहिपस्थलंकभुअंगिनि डसा । शिरपर चढ़े हिये परगसा ॥ रहि मरनालि टेक दुख दाधी । आधीं कमल भई शशिशि आधी ॥ नलिने खण्डहुइतसकरहाऊँ । रोमाँवली बिसूख कहाऊँ ॥ रही टूट जिमि कंचने तागू । को प्रिय मिलवै देइँ सुहागू ॥ पान न खावै करै उपासू । फूल सूख तन रही न बासू ॥ दो० गगनधर्ति जल बुड़गये, बूड़त होय निसास । पिय पियचातुकै ज्योंररै, मरै सेवात पियास ॥ लक्ष्मी चंचल नारि परेवा । जेहि संत होय छरै कै सेवा ॥ रतनसेन आवै जेहि बाटाँ । अगमने जायबैठ तेहिघाटा ॥ और भई पद्मावत रूपा । कीन्हेसि छांह जरै जेहि धूपा ॥ लखसोकमल भँवरहोय धावा । श्वास लीन्ह वहबासनपावा॥ निरखत आय लक्ष्मी दीठी । रतनसेन तब दीन्हीं पीठी ॥ जाभल होत लक्ष्मी नारी । तजमहेश कित होत भिखारी ॥ पुनि धन फिर आगे है रोई । पुरुष पीठ कसदीन्ह निखोई ॥
- बहुत कोशिश किया १ किनारा २ लाठी पकड़ ३ मस्त ४ पल ५ सोने की डाली तथा छाती ६ वालनागिन की तरह ७ छाती ८ कमर पकड़के ६ चाँद १० कमल ११ छाती के बाल १२ सोता १३ आसमान ज़मीन १४ पपीहा १५ सच्चे को छजती १६ राह १७ पहिले १८ देखना १६ देखा २० महादेवजी २१ पद्मावत रूप लक्ष्मी २२ बेदर्द २३ ॥
२०० पद्मावत ।
दो० हौं रानी पद्मावत, रतनसेन तुइँ पीउ । आय समुद्रमहँ छांड़े, अब रोय देत मैं जीउ ॥ मैं हौं सोई भँवर औ भोजूं । लेत फिरौं मालतिकर खोजूँ ॥ मालति नारि भँवर अस पीउ । कहँ वह बासरहै थिरै जीउ ॥ कातुइँ नारि करेसि अस रोई । फूल सोई पै वास न होई ॥ भँवर जो सब फूलनकर फेरा । बासन लेइ मालतिहि हेरौ ॥ जहां पाव मालति कर बासू । वँती जिव दै होवै दासू ॥ कित वह वास पवन पहुँचावे । नवतन होय पेट जिव आवे ॥ हौं वह वास जीव बल देउँ । और फूलकी वास न लेऊँ ॥ दो० भँवर मालतिहि पै चहै, काँटन आवे दीठि । सौंहैं भाल खाये हिये, पै फेरे नहिं पीठ ॥ तब हँस कह राजा वह ठाऊँ । जहां सो मालति चल लै जाऊँ ॥ लै सो आय पद्मावत पासा । पानि पियाई मरत पियासा ॥ पानी पिया कमल जस तपा । निकसामूर्य्यसमुद्रमहँ छिपा ॥ मैं पावा पिय समुद्र के घाटा । राजकुँवर मनदिपै ललाटों ॥ दशने दिपै जस हीरा ज्योती । नयन कचूरै भरेजनु मोती ॥ भुजौ लङ्क उर केहरि जिता । मूरति कान्ह देखि गोपिता ॥ जस नल तपतै दमर्नेहिं पूंछा । तस बिन प्राणपिंडै है लूंछा ॥ दो० जस तुइँ पदकै पदारथ, तैसरतन तुहिं योग । मिला भँवर मालतिकहँ, करहु दोउदिशि भोग ॥ पदक पदारथ खीन जो होती । सुनतहिरतन चढ़ीमुखज्योती ॥ १ राजाभोज १ पत्ता २ क़ायम ३ देखना ४ न्योछावर ५ नयाबदन ६ निगाह ७ सामने काँटा ८ छाती ६ शिर १० दाँत ११ कटोरी १२ बाहु कमर छाती चीताकीसी १३ रानी दमन १४ बदन १५ खाली १६ लाल जवाहर १७ ॥
पद्मावत। २०१ जानहु सूर्य्य कीन्ह परकाशू । दिन बहुरा भा कमल बिकाशू ॥ कमल जो बिहँस सूर्य्य सुख दरसा । सूर्य्य कमल दृष्टि सो परसा ॥ लोचननै कमल, श्रीमुखसूरू । भयो अत्यंत दुहूँ रस रूरू ॥ मालति देख भँवरै गा भूली । भँवर देख मालति बनफूली ॥ देखा दरश भये इक पासा । वह बहकी वह बहकी आसा ॥ कंचनदाह दीन्ह जनु जीव । उगा सूर्य्य लूटगा सीवं ॥ दो० पांयपरी धन पीयके, नयनन सों रज मेट । अचरजभयोसबनकहँ, भईशशिकमलहिभेंट ॥ जन काहूकहँ होय विछोऊँ । जस वेमिले मिलैसबकोऊ ॥ पद्मावंत जो पावा पीऊ । जनु मरजियेपरा तन जीऊ ॥ कै न्योछावर तन मन वारे । पांयन परी घाल कै नौरे ॥ नैवैं अवतार दीन्हविधि आजू । रही छौर मानुष भइ साजू ॥ राजा रोय घालँगँरेपागा । पद्मावत के पांयन लागा ॥ तनजियमहँविधि दीन्ह विछोऊ। असनगरीतबचीन्हनकोऊ ॥ सोई मार छौर के मेटा । सोइ जियाय करावे भेटा ॥ दो० महमद मीतजोमनवसै, तेही मिला विधिआन । संपति विपति पुरुषकहँ, काहलाभ का हान ॥ लक्ष्मी सों पद्मावत कहा । तुम प्रसाद पायौं जो चहा ॥ जो सब खोय जाहिं हम दोऊ । जो देखें भल कहैं न कोऊ ॥ जे सब कुँवर आय हम साथी । औजितहस्ति घोरआवाथी ॥ जो पावे सुख जीवन भोगू । नाहित मरनभरन दुखरोगू ॥ रोशनी १ मिलना २ निगाह ३ आंख ४ सूर्य्य ५ दोनों खुशहुये ६ तथा पद्मावत ७ तथा राजा ८ सोना औटाहुया ६ जाड़ा १० चांद ११ जुदाई १२. गरदन १३ नई पैदायश १४ ईश्वर १५-१८ राख १६ गलेमें पगड़ी १७ धूर १६ फ़ायदा २० नुक़सान २१ हाथी २२ ॥
तब लखमी गइ पिताँ के ठाऊँ। जो यहिकर सबचूड़सो पाऊँ॥ तब सो जरी अमृत लै आवा। जोमरहतैसोछिड़कजियावा॥ एक एक कै दीन्ह सो आनी। भा संतोष मन राजा रानी॥ दो० आय मिले सब साथी, हिलमिलकरहिंअनन्द। भई प्राप्त सुख संपति, गयो छूट दुख धन्ध॥ और दीन्ह बहुरंतन पषानों। सोनरूपजोमनहिं न आना॥ जे बहु मोल पदार्थ नाऊँ। कातेहि बरनै कहूं तुमठाऊँ॥ तेहिकर भाव रूप को कहा। इकइक नग सृष्टि वरलहा॥ हीर फार बहु मोल जो अही। ते सब नग चुनचुनके गंही॥ जो इक रतन भुनावै कोय। करै सोई जो मनमहँ होय॥ द्रव्य गर्व मन गयो भुलाई। हेमसमलच्छमनहिंनहिंचाई॥ लघुदीर्घ जो द्रव्य बखाना। जो जेहिचही सोई तेहिमाना॥ दो० बड़ औ छोट दोउसम, स्वामिकारजी सोय। जोचाही जेहि काजकहँ, वही काज सो होय॥ खण्ड उनतीसवां समुद्र और लक्ष्मीखण्ड॥ दिन दश रही जाय पहुनाई। पुनि भइविदा समुद्रसोजाई॥ लखमी पद्मावत सो भेटी। जो सो कहा अपनी सोवेटी॥ समुद्र न दीन्ह पानकर वीरा। भरके रतनै पदारथ हीरा॥ और पांच नग दीन्ह विशेखी। श्रवणै सुनी नयननहिंदेखी॥ एक सो अमृत दूसर हंसू। औ तीसरं पंखी कर बंसू॥ चौथ दीन्ह शावकैसादूरू। पांचों परस जो कंचैनमूरू॥ वाप. १ सञ्जीवनमूर २ जो मरगये थे ३ सच ४ पत्थर ५ जवाहर. ६ रंग ७ दुनियां का मोल ८ लेना ९ गरूर १० हमारे बराबर कोई नहीं ११ छोटे बड़े १२ जवाहर १३ कान १४ शेरका बच्चा १५ सोना १६॥
पद्मावत। २०३ तुरत तुरङ्गम१ दोउ चढ़ाई। जल मानुषअँगवासँगलाई॥ दो० भेंटे समुदिनै तब कियो, फिरे नाय कै माथ। जलमानुष तबहींफिरे, जबसो आयजगनाथ॥ जगन्नाथ दरशन कहँ आये। भोजन रींधा भात पकाये॥ राजैं पद्मावत सों कहा। साँठ नाँठ कछुगाँठ न रहा॥ साँठै होय जासों सो बोला। नँठै जोपुरुषै पातज्योंडोला॥ साँठें रङ्क चलै मौर्राई। नए रावें सब कहँ बौराई॥ साँठै आव गर्व तन फूला। नँठेहि बोल बुद्धिवलभूला॥ साँटें जागनींद निशि जाई। नए कहै होय औंघाई॥ साँठें दृष्टि ज्योति हो नयना। नठहिये मुखआव न बैनाँ॥ दो० साँठें रहे सिधै न तन, नँठहि आगैरें भूख। बिनगांठै वृक्ष निपत्तैंज्यों, ठाढ़ ठाढ़ पै सूख॥ पद्मावत बोली सुनु राजा। जीव गये धन कौने काजा॥ रहा द्रव्य तब कीन्ह न गांठी। पुनिकितमिले चलैजोनांठी॥ मुक्ती साँठै गांठ जो करे। सांकरैं परे सोई उपकैरै॥ जेहि तन पंख जाय जहँताका। पैगै पहार होय जो थाका॥ लक्ष्मी रही दीन्ह मोहिं वीरा। भरके रतन पदारथ हीरा॥ काढ़ एक नग बेगें भुजाहू। बहुरे लच्छैं फेर दिन पाऊ॥ द्रव्य भरोस करै जन कोई। सांठ सोई जो गांठी होई॥ दो० जोर कटकै पुनि राजा, घरकहँ कीन्ह पयानै। -- घोड़ा-१ मुलाकात २ लक्ष्मी ३ दौलत गई ४ दौलत ५- बेदौलत ६-१२ मर्द ७ कमीनामालदार ८ अकड़िके ६ राजा १० गरूर ११ मालदार १३ रात १४ गरीब १५-२० निगाह १६ दिल १७ आवाज़ १८ दिलजंमई १६ बहुत २१ वेरुपया २२ बेपत्ता २३ दौलत जातीरही २४ दौलत होनेके समय २५ संगी २६ काम आवे २७ क़दम २८ जल्द २६ दौलत ३० फ़ौज ३१ कूच ३२ ॥
दिवसेहिं भानुँ अलोपभा, वासुँकिइन्द्रसकान ॥ चितोर आय नेर भा राजा । फिरा जियत इन्द्रासनगाजा ॥ बाजन बाजे होय अडोरों । आवहिंवहलहस्तिंत्रौ घोरा ॥ पद्मावत चंडोल जो बैठी । पुनिगईउलटस्वर्गसों दीठीँ ॥ यहि मन ऐंठा रहै न सूधा । बिपतिनसँवरै सम्पतिलुब्धाँ ॥ सहस बरस दुखसहै जो कोई । घड़ी एक सुख बिसरै सोई ॥ योगिन यही जान मन मारा । तेहुँ न यह मन मरै अपारा ॥ रहै न बांधा बर भा जेही । तेलियां मार डार पुनि तेही ॥ दो० मुहम्मदयहियमनअमरै है, कहुकितमाराजाय । कहां सदाशिव आवैं, घटते घटत विलाय ॥ कुँवर जो बहिवहि घाटनलागी । बहु बेकरार सोय जनुजागी ॥ विकल अचेत चेत तिनकहा । सङ्ग साथ नहिं दूसर रहा ॥ कहां रहे आये हम कहाँ । जानी नहीं किजायहिकहां ॥ जागहिं दयाँदृष्टि कै आपी । खोलसोनयनदीन्हविधिझांपी ॥ जेहि के सङ्ग पद्मिनी बांची । बहुतअनन्दैं बहुतनृतें नाची ॥ अबमगैं मिले आयजगनाथा । सबै आयकें नावहिं माथा ॥ अतिदुख मिले आयके राजा । सोई ते गये उनकेकाजा ॥ दो० सो हीरामन रतन रवि१७, सो पद्मावत लाल । सो पद्मावत सो कुँवर, सो प्रीतम प्रतिपाल ॥ नागमती कहँ अगमेंजनावा । गई तपन वर्षा जनु आवा ॥ रही जो मुइनागिनिजसतुर्चा । जिव पायें तिनकी भइसुचा ॥ दिन १ सूर्य्य २ नामराजासांप ३ शेर ४ हाथी ५ आसमान ६ निगाह ७ दौलत में दीवाना ८ हज़ार ६ संखिया ज़हर १० हमेशा ज़िन्दा ११ मेहरवानी की निगाह १२ खुश १३ नाच १४ शायद १५ राजा के काम को १६ सूर्य्य १७ आगम १८ चमड़ा १६ ॥
४. गोरा-बादल की वीरता व राजा की मुक्ति
पद्मावत । २०५ सब दुख जस केंचुलगा छूटी। होय निसरी जस बीरबहूटी ॥ जस भुइँदहि असाढ़ पलहाई। परहिं बूँद औ सोंध बसाई ॥ वहीभाँति पलही सुखवारी। उठी करलिनइकोंपसँवारी ॥ हुलस गंग जिमि बाढ़े लेई। यौवन लाग हिलोरे देई ॥ काम धनुषशरै दै भइ ठाढ़ी। भाग्यो बिरह रहे जो बाढ़ी ॥ दो० पूँछहिं सखी सहेली, हृदयँ देख आनन्द । आज बदन तुम निरमल, कहाँउवाहैचन्द ॥ अबलगसखीपवनरहि ताताँ। आजलागमोहिंशीतलगाताँ॥ र्महि हुलसी जसपावसँछाँहाँ। तसहुलासेउपजौजियमाहां ॥ दशौ दावकै गा जो दशहरा। पलटा सोई नाव लै महरा ॥ अब यौवन गङ्गा होय बाढ़ा। औटन कठिन मार सबकाढ़ा॥ हरियर सब देखे संसारा। नई चाँर जनुमा अवतारा ॥ भाग्यो बिरह करत जो दाहूँ। भामुख चन्द छूटगा राहू ॥ लहिकहिंनयनहारहिये खिला। को धौं हितू आयके मिला॥ दो० कहतहिं बात सखिनसो, ततखने आवा भाट। राजा आय नेर भा, मंदिर बिछायों पाँट ॥ सुनतहि खन राजां कर नाऊँ। भा हुलास सबठावहिं ठाऊँ ॥ पलटा जनु वरपारृतु राजा। जस असाढ़ आवै देरै साजा॥ देख से छत्र भई जगछाहां। हस्तिं मेघ उनये जगमाहां ॥ सैनं पूर आई घनघोरा। रहस चाव बरषे चहुँओरा ॥ धर्तिस्वैर्ग अब होय मिलावा। भरहिंपुखरऔतालतलावा ॥ उसीतरह १ बागीचा २ कमान-तीर ३ दिल ४-१५ मुंह ५ पाकसाफ़ ६ गर्म हवा ७ ठण्ढाबदन ८ ज़मीन ६ बरसात १० खुशी ११ पैदा होना १२ नईतरह १३ जलाना १४ तुरन्त १६ तख़्त १७ फ़ौज १८-२० हाथी १६ ज़मीन-आसमान २१ ॥
२०६ पद्मावत । उठीलहकमँहिसुनितेहिनामा । ठांवहिं ठांव दूब असजामा ॥ दादुर मोर कोकिला बोले । हतजोअलौपेजीभसबखोले ॥ दो० भये असवार पंथमें, मिले चले सब भाय । नदी अठारह खण्डा, मिली समुद्रकहँजाय ॥ बाजत गाजत राजा आवा । नगर चहूँदिश बाजवधावा ॥ बिहँस आय मातासों मिला । रामहि जनु भेंटी कौशिला ॥ साजे मन्दिर बन्दनवारा । औ बहुहोय सो मंगलचारा ॥ पद्मावत कर आव विमानू । नगमतिदहकउठी तसभानू ॥ जनहु छांह महँ धूप देखाई । तैसे झौर लाग जो आई ॥ सही न जाय सौतकी झारा । दूसरे मन्दिर दीन्ह उतारा ॥ भई उहां चौखण्डबखानी । रतनसेन पद्मावत आनी ॥ दो० पुहुप सुगन्ध संसार महँ, रूप बखान न जाय । हेमसेतं उग्रगाजना, जगत पात पहिराय ॥ बैठ सिंहासन लोग जोहारा । निर्धनी निरगुणेँ द्रव्यओहाराँ ॥ अगनितें दान निछावरकीन्हा । मँगतन दान बहुतकै दीन्हा ॥ तैरी हस्ति लै महावतमिला । तुलसी लै उपरोहित चले ॥ बेटा भाय कुँवर जेत आवहिं । राजा हँसहँस गले लगावहिं ॥ नेगी गेजें मिले अरकाना । पंवरथ वाजे घर मंतयानाँ ॥ मिले कुँवर कापर पहिराये । देकर द्रव्य तिनघरहिं पठाये ॥ सबकी दर्शा भई पुनि दुनीं । दानं दांग सबै जग सुनी ॥ ज़मीन १ मेढक २ ग़ायब ३ पहिले ४ चंडोल ५ सूर्य्य ६ आग ७ चारों तरफ़ मशहूर ८ फूल ६ मिस्ल बर्फ़सफ़ेदबहार के मोसिम में हरेहरे पत्ते लहराते हैं १० ग़रीब ११ बेहुनर १२ जमा करना १३ बेहिसाब १४ घोड़ा १५ हाथी १६ हक़दार १७ मस्त १८ शक्ल १६ ख़ैरात और इनआम २० ॥
[Header] पद्मावत । २०७
दो० बाजै पाँचशब्दै नित, सिद्धै बखानै भाट । छत्तिस गौरी षटदरशन, आय जुरे वह पाटै ॥ सब दिन राजा दान देवावा । भई निश नागमती पहँ आवा ॥ नागमती मुख फेरिकै बैठी । सोनहिंकरहि पुरुष सो दीठी ॥ ग्रीषमँ जरत छोड़ कै जाय । सो मुख कौन देखावे आय ॥ जोह जरै परबत वन लागी । उठी झारि पंखी उड़ भागी ॥ अब शाखा देखी औछांहां । कौने रहस पसारेसि बांहां ॥ कौन्ह्यो थिरक बैठि तेहिदारा । कौन्ह्यो कली केलिकुरबारा ॥ तू योगी होयगा बैरागी । हौं जरिछार भयों तुहि लागी ॥ दो० काह हँसो तुम मोसों, कियो और सो नेह । तुहिं मुख चमकै बीजुली, मुहिं सुख बरषे मेह ॥ नागमती तू पहिल बिवाही । कठिनै सुप्रीति दही जसदाही ॥ बहुते दिनन आव जो पीउ । धनै न मिलै धन पाहन जीउ ॥ पाहन लोह पोढ जग दोऊ । सोउ मिलैं जो होय बिछोहू ॥ भलाहिं सेत गङ्गाजलै दीठा । यमुन जो श्याम नीर अतिमीठा ॥ काह भयो तन दिनदशदहा । औ बरषा शिर ऊपर अहा ॥ कोइ कहि पास आशकै हेरा । धनवहदरश निराश न फेरा ॥ कण्ठ लायके नारि मनाई । जरी जो बेल सींच पलहाई ॥ दो० सहस अठारह शाख फर, दाड़िम दाखें जँभीर । सबै पंख मिल आय जोहारे, लौट वही भइ भीर ॥
[Footnotes] नगारा-शहनाई-करनाल-तुरही-झांझ १ तारीफ़ २ योगी-जंगम-से- वरा-संन्यासी-ब्राह्मण-दरवेश ३ तख़्त ४ मर्द ५ शीत ६ घड़ी गरमी ७ आग ८ किसकली के लिये कुलेल मचाते थे ९ राख १० तख़्त मुहब्बत जली जैसा जलना चाहिये ११ नागमती १२ पत्थर १३ जुदाई १४ सफ़ेद गंगाजल तथा पद्मावत १५ सियाह पानी १६ थोड़े दिन जली १७ उम्मेद १८ ना उम्मेद न करना चाहिये १९ हज़ार २० अनार २१ अंगूर २२ ॥
२०८ पद्मावत । जो भा मेरुँ भयो रँग राता । नागमती हँसि पूँछी बाता ॥ कहु जो कन्त परदेश लुभाने । कसधन मिली भोगकसमाने ॥ जो पद्मावत मुठ है लोनी । मोरे रूप कि सरवरै होनी ॥ जहां राधिका अप्सर माहां । चन्द्रावल सरपूर्र्जे न छाहां ॥ भँवर पुरुष असरही न राखा । तजै दाखँ महुवा रस चाखा ॥ तज नागेसरं फूल सुहावा । कमल बसेंधी सो मन लावा ॥ चौ अन्हवाय भरे अरगजाँ । तौहु विसायँध वहिनहिंतजा ॥ दो० काह कहूं हूं तोसों, कुछ नहिं तोरे भाव । यहां वात मुखमोसों, वहां जीव वह ठांव ॥ दुखकि कथाकहिर्र्यनिबिहानी। भयो भोर जहँ पद्मिन रानी॥ भानुँ देखशैशिवदन मलीना । कमलनयनरोती तनखीनों ॥ रयनिनखतगिनकीनहबिहानू । विमलेँ भई देखी जस भानू ॥ सूर्य हँसा शैशि रोय उफारा । टूटआंसु जस नखतहिं माराँ ॥ रही न राखी होय निसासी । तहँवा जाउ जहांनिशिँ वासी ॥ हौं कै नेह कुवां महँ मेलीं । सींचहिलाग मुरानी बेली ॥ भये दुइ नयन रहँट की घरी । भरहिं लै ढारेँ छूछी भरी ॥ दो० शुभ्र सरोवरँ हंसजल, घटातो होयबिछोयेँ । कमल प्रीति नहिं परँहरे, सूख बेल पर होय॥ पद्मावत तुइँ जीव पराना । जियते जगतपियारन आना॥ तुइँजिमकमलबसीहियेँ माहां । हौंहोयअलि वेधातोहिंपाहां ॥ मालति कली भँवर जो पावा । सोतज आनफूल कितभावा॥ : हमबिस्तरों में मस्त १ खूबसूरत २ बराबरी ३-४ मर्द ५ अंगूर ६ चोवा ७ खुशबू ८ रातविताई ६ सूर्य १० चांद ११-१५ लाल १२ पतली कमर १३ रंजज्यादा हुआ सूर्य को देखके १४ माला १६ रात १७ तालाव १८ जुदाई १६ छोड़ना २० दिल २१ भँवर २२ ॥