पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
७४ पद्मावत । दो० कान्हेँ समुद्गधस लीन्हेँसि, भा पीछे सब कोय । कोई काहू न सँभारे, आपन आपन होय ॥ कोई बोहितैं जस पवनैं उड़ाहीं । कोई चमकबीजैं परजाहीं ॥ कोई भल जस धाव तुषारूँ । कोई जैस बैल गरियारूँ ॥ कोई हरूँ जानि रथ हांका । कोई गरु पहाड़भा थाका ॥ कोई रेंगहिं जानहु चांटी । कोई टूटि होहिं सर माटी ॥ कोई खाय पवनैं कर झोला । कोई गिरहिं पात ज्यों डोला ॥ कोई परहिं भँवर जल माहीं । फिरत रहहिं कोई दियेन बाहीं ॥ राजा कर भा अगमनैं खेवा । खेवकै आगे सुवा परेवा ॥ दो० कोई दिन मिला सबेरैं, कोई आवा पछरात । जाकर हुत जस साजूँ, सो उतरा तेहिभांत ॥ सतैं समुद्र मानसरेँ आये । सत जो कीन्ह सहेंसैं सिधिपाये ॥ देखि मानसरेँ रूप सुहावा । हियेँ हुलासैं पुरइनैं होयछावा ॥ गा अँधियार रयनैं मसि छूटी । भा भिनसार किरनरवि फूटी ॥ अस्त अस्तैं सबसाथी बोले । अन्ध जो अहे नयनैं विधि खोले ॥ कमल बिकलैं तसबिहँसीं देहीं । भँवर दरश होयहोयरसलेहीं ॥ हँसहिं हंस औ करहिं कुरेरौं । चुनहिं रतनैं मुक्ताहलँ हेरा ॥ जो अस आवसाधि तपयोगू । पूजी आस मानरस भोगू ॥ दो० भँवर जो मूँसौं मानसरेँ, लीन्ह कमलरस आय । घुनजो हियावैं न कैसका, झूर काठ तस खाय ॥ श्रीकृष्णचन्द्रजी १ नांव २ हवा ३-६ बिजुली ४ घोड़ा ५ भारी ६ हलकी ७ चूंटी ८ आगे १० मल्लाह ११ सामान १२ नाम तालाव जिसमें हंस रहते हैं १३-१५ हज़ारतरह की आराम १४ दिल १६ खुश १७ कमल १८ रात १६ सियाही २० सूर्य २१ घाहवाह २२ आंख २३ ईश्वर २४ खिलना २५- २६ कुलेलकरना २७ जवाहर जिसकी पैदाइश खानिसे होती है २८ मोती २६ हिम्मत बांधना ३० नामतालाव ३१ दिलेरी करना ३२ ॥
पद्मावत । ७५ खण्ड तेरहवां सातसमुद्रपार भाव सिंहलदीपखण्ड ॥ पूँछा राजैं कहु गुर सुवा । नजनों आज कहां दिन उवा ॥ पवनैं बास शीतलैं लै आवा । क्या दहतेँ चंदन जनुलावा ॥ कबहुँन ऐसोजुड़ान शरीँरू। पड़ा अगिनमहँ जानहु नीरू ॥ निकसत आव किरन रबि रेखा । तिमिरँ गई निरमलं जगँ देखा उठे मेघ जस जानहु आगे । चमकै बीजै गगनैं परलागे ॥ तेहिऊपर जनु शशि परकासौँ। औसगत्रीवहँ भयोनिरासा और नखतचहुँदिशँ उनियारी । ठावहिंठांवैँ दीप असबारी ॥ दो० और दखिनदिश नेरे, कंचन मेरुँ दिखाउ । जैसे बसंतऋतु आवे, तैसिबास जगँ आउ ॥ तुइँ राजा जस विक्रमँ आदी । तुइँ हरिचंद बैनैँ सतबॉदी ॥ गोपिचंदैँ तुइँ जीता योगा । औ भरथैरीन पूज बियोगौँ ॥ गोरखँ सिद्ध दीन्ह तुहि हाथू । तारी गुरु मछन्दरै नाथू ॥ जीति प्रेम तुइँ भूमिँ अकांशू । दृष्टि परा सिंहल कैलाशू ॥ वै जो मेघ गढ़ेँ लाग अकासा । बजैरी कटी कोटेँ बहुँपासा ॥ और नखत वेहिके चहुँपासा । सेब रानिन की अहैं उड़ासौँ ॥ तेहिपरशशि जोगग्रहत्रहिं भरा राजमंदिर सोने नगजरा ॥ दो० गगनैं सरोवर सहस कमल, कुमुँद तराइँ पास । हवा १ ठंढी २ बदन ३-५ जलना ४ पानी ६ सूर्य ७ अँधियारा ८ पाक साफ़ ६ दुनियां १०-२० बिजुली ११ आसमान १२-३७ चांद १३-३५ रोशनी १४ छोटे नखत १५-३६ चारों तरफ १६ हरजगह १७ सोना १८ नाम पहाड़ १६ राजाविक्रमाजीत २१ नाम राजा २२-२४-२५ सच बोलनेवाला २३ दुखी २६ नाम योगी २७-२८ ज़मीन २६ निगाह ३० क़िला ३१-३३ बुर्ज ३२ महल ३४ तालाव ३८ हज़ार ३६ कोकावेली ४० नखत ४१ ॥
७६ पद्मावत । तुइँ रबि१ उवा भँवर होय, पवन२ मिलाले वास ॥ सो गढ़ देखि गगन३ ते ऊंचा । नयन४ देखिकर ज्ञाननपहुँचा ॥ बिजुरी५ चक्र फिरै चहुँ फेरे । औ जमकात६ फिरहिं यमँ घेरे ॥ धायँ जो बाजा कियमनसाधा । मारा चक्र भयो दुइ आधा ॥ चांद सूर्य औ नखत तराई । तेहिडर अंतरिखं फिरें सबेई ॥ पवनजाय तहँ पहुँचा चहा । मारा तैसो लोटि भुइँ रहा ॥ अगिन उठे जरिबुझे नियानों । धुवांउठा उठि बीच मिलाना ॥ पानि उठा उठिजाय न छुवा । फिरा रोय आय भुइँ चुवा ॥ दो० रवन चहा सौहिं१२ के हेरों१३ उत्तर दशोगयेमाथ १४। शंकरधरा ललाटै भुइँ, और को योगी नाथ ॥ तहां देख पद्मावत रामा । भँवर न जाय न पंखे१६ नामा ॥ अबसिखैं एक देउँ तुहि योगी । पहिले दरशन होय तो भोगी ॥ कंचन मेरु१७ दिखावे जहां । महादेव कर मण्डफ तहां ॥ वह खखरेण्ड जस परवत मेरुँ । मेरुहि १९ लाग होय तस फेरु ॥ माघमास पाछल पख लागें । श्री पंचमी होय यहि आगे ॥ उघरे महादेव कर बारू२२ पूजनजाय सकलै संसारू ॥ पद्मावत पुनि पूजन आई । हैहै वह दिन दृष्टि २४ मिलाई ॥ दो० तुम गवनो वह मण्डफ कहँ, हौ पद्मावत पास । पूजे आय बसन्त जो, पूजे मन की आस ॥ राजै कहा दरश जो पाऊँ । पर्बत काहि गगन कहँ धाऊँ ॥ सूर्य १ हवा २ आसमान ३-२६ आंख ४ बिजुली ५ राँद ६ यमराज ७ दौड़ना ८ पहुँचना ६ बीचोबीच १० सब ११-२३ आखिर १२ सामने १३ देखना १४ शिर १५ उड़नेवाले जानवर १६ सबाह १७ सोने का पहाड़ १८-२०-२१ बीहड़ १६ दरवाज़ा २२ दीदार २४ जाना २५
पद्मावत। ७७ जेहि परबतपर दरशन लीन्हा। शिरसों चढ़ों पायँका कीन्हा॥ मोहिं सो भावै ऊँचे ठाऊँ। ऊँचे लेवों प्रीतम नाऊँ॥ पुरुषै चाहिये ऊँच हियाऊ। दिन दिन ऊँचे राखे पांऊ॥ सदा ऊँच पैसैये बारूँ। ऊँचै से कीजै ब्योहारू॥ ऊँचे चढ़ै ऊँच खंड सूझा। ऊँचे पास ऊँच मति बूझा॥ ऊँच सङ्ग सङ्गत नितै कीजे। ऊँचे लाय जीव बलि दीजे॥ दो० दिन दिन ऊँचहोय सो, जेहि ऊँचे पर जाव। ऊँच चढ़े जो खसिपड़े, ऊँच न छांड़े काव॥ नीच संग नितँ होय निचाई। जैसे हंस काग की नाई॥ नीच से कबहूँ न होय भलाई। नीचहिसों पर होय मुड़ाईँ॥ नीच न कबहूँ जिय महँ तांके। नीच नहीं कबहूँ मुख भाँखे॥ नीच न कबहूँ आवे काज़ा। नीचहि अहै न एकौ लाजा॥ नीचेका सँग कबहूँ न कीजे। नीचे पंथै पाँउ नहिं दीजे॥ नीचे नहिं कीजे ब्योहारूँ। नीच न कबहूँ दीजै भारूँ॥ नीचे केर न कीजे साथा। नीच गहे कुछ आवि न हाथा॥ दो० होय नीच नहिं कबहूँ, जेहि ऊँचै मन भाव। नीच ऊँचते हँसी, नीचे केर स्वभाव॥ हीरामने दे बचों कहानी। चली जहां पद्मावत रानी॥ राजा चला सँवारि सो लत्ताँ। परबतकहँ जो चला परबतीँ॥ का परबती चढ़ि देखे राजा। ऊँच मण्डप सोने सब साजीँ॥ अमृत फर सब लागि अपूरे। औ तहँ लागि सजीवन मूरै॥ जगह १ मर्द २ हिम्मत ३ दरवाज़ा ४ हमेशा ५-७ कुर्बान ६ गुमनामी ८ ख्याल करना ६ मुँह से बोलना १० राह ११ धोखा १२ पकड़ना १३ नाम तोता १४ क़ौल १५ धन १६ तोता १७ सामान १८ नाम बूटी १६
७८ पद्मावत । चौमुख मण्डफ चँहूँ केवारा। बैठे देवता चहूँ दुवारा॥ भीतर मण्डफ चारंखम्भ लागे। जेहि वे छुवे पाप तेहि भागे॥ शंख घंट नितैं बाजहिं सोई। औ बहु होम जाप तहँ होई॥ दो० महादेव कर मण्डफ, सकलैं यात्रा आव। जस इच्छामन जेहिकी, सो तैसो फल पाव॥ खण्ड चौदहवां गवन मण्डफ खण्ड राजा रतनसेन॥ राजा बावर विरह बियोगी¹। चेला सहसें तीस सँग योगी॥ पद्मावत की दरशन आसा। दण्डवतकीन्ह मण्डफचहुँपासा॥ पूर्बद्वार होयके शिरनावा। नावतशीशँ देव पुनि आवा॥ नमो नमो नारायण देवा। कामैं योग सकौं कै सेवाँ॥ तुइँ दयालु सबके उपराँहीं। सेवाकेर आशैं तुहिनाहीं॥ नामोहिं गुनैन जीभ रसबाता। तुइँदयालु गुनैं निरगुनैं दाता॥ पुरवहु मोर दरश की आसा। हौं मारँग जो करौं श्वासा॥ दो० तेहि बिधिविनयै न जान्यो, जेहिबिधि अस्तुति तोर। कर सुदृष्टि औ कृपा, इच्छा पूजै मोर॥ कै अस्तुति जो बहुत मनावा। शब्देँ कोटिमण्डफ मँहँआवा॥ मानुष प्रेम भयो बैकुण्ठी। नाहत काहि छारँ एकमूठी॥ प्रेमहि माहिं बिरह रसरसा। प्रेमके घर मधु अमृतवसा॥ नैतैं धाय जो मरै तो काहा। संतजो करै बैठि तेहिलाहौं॥ एकबार जौं मन दै सेवा। सेवेहि फल प्रसन्नै है देवा॥ चार १ हमेशा २ सर्व ३ दुखी ४ हज़ार ५ दरवाज़ा ६ शिर ७ ख़िदमत ८ दया करनेवाला ९-१३ ऊपर १० उम्मेद ११ हुनर १२ दाना १४ नादान १५ अर्थात् उसी तरह का दम बदम ढूंढनेवाला हूं १६ तारीफ़ १७ निगाह अच्छी १८ आवाज़ १९ माटी २० शराब २१ बदराह २२ फ़ायदा २३ खुश २४॥
पद्मावत । ७६ सुनिकै शब्दै मण्डफ झंकारा । बैठो आय पूरब कें द्वारा ॥ पिंडे चढ़ाय छारै चित आंटी । माटी होय अन्त जो माटी ॥ दो० माटी मोल न कछुलहै, औ माटी सब मोल । दृष्टि जो माटी सो करै, माटी होय अमोल ॥ बैठि सिंह छाला होय तपा । पद्मावत पद्मावत जपा ॥ दृष्टि समाधि वही सों लगी । जेहि दर्शन कारण बैरागी ॥ किंगरी गँहे बजावे मूरी । भोर सांझ सुनिके नितैं पूरी ॥ कन्था जरै अगिन जनु लाये । बिरहँदँदौरैं जरत न बुझाये ॥ नयनराते निशि मारगै जागे । चंपै चकोर जानु शशि लागे ॥ कुण्डल गँहे शीशँ भुँइलावा । पांवरेँ होउँ जहां वै पावा ॥ जटा छोरके बार बहारों । जेहि पंथ आव शीश तहँवारों ॥ दो० चारहुचक्र फिरे मनखोजत, डंडै नरहँ थिर बार । होयके भस्म पवनँ सँगधाऊं, जहां सो प्रान अधार ॥ पद्मावत तहँ योगैं संयोगा । परी प्रेमवश गँहे बियोगी ॥ नींद न परी रयन जो आवे । सेज केवांच जानु कोइलावे ॥ दहै चन्द औ चन्दन चीरैं । दग्धै करै तन बिरह गँभीरूँ ॥ कल्पसमानै रयन ही बाढ़ी । तिलै तिल मरु युग युग परगाढ़ी ॥ गँहे बीन मगै रयन विहाँये । शशिवाहनै नितैं रहै उनाये ॥ पुनि धुनि संग और ही लागे । ऐसी बिथा रयन सब जागे ॥ आवाज़ १ चंदन २ बिभूति ३ निगाह ४-५ वास्ते ६ पकड़ना ७-१६-३६ हररोज़ ८ गुदड़ी ६ जंगल १० आंखलाल ११ रात १२-२६ राह १३-२० आंख १४ चांद १५ शिर १७ खड़ाऊं १८ दरवाज़ा १६ न्योछावर २१ चारों तरफ़ २२ घड़ी २३ क़ायम २४ हवा २५ अर्थात् फ़क़ीरी का हाल २६ लेना २७ दुख २८ जलना ३०-३२ कपड़ा ३१ भारी ३३ बराबर ३४ तिलके बराबर कम और करन से ज्यादह ३५ पकड़ा ३६ शायद ३७ आख़िर ३८ हिरन चांद के रथका ३६ हमेशा ४० आवाज़ ४१ ॥
८० पद्मावत। १ कहां सो भँवर कमल रसलेवा। आय परीहोय घरन परेवो॥ दो० सो धनी बिरहपतंग भइ, जरा चहैं तेहि दीप। कंतै न आवभृंग होय, को चन्दन तन लीप॥ परी बिरह बन जानौ घेरी। अगमँ असूझ जहांलग हेरी४॥ चतुरदिशा चितवे जनु भूले। सो बन कौन जो मालतिफूले॥ कमल भँवर ओही वन पावे। कोमिलाय तनतपन बुझावे॥ अंग अंग अस कमल शरीरा। हियँ भा पियर प्रेम की पीरा॥ चहीदरशराँवि कीन्हविकाशू। भँवरदृष्टि मनलागचकासू॥ पूँछे धायँ बौरि कहु वाता। तुइँजस कमल करी रंगराताँ॥ केसरबरनें रंग भा तोरा। मानहुँ मनहि भयो कुछ फोरा॥ दो० पवन न पावै संचरी, भँवर तेहों नहिं बैठि। भूलकुरंगिनें कसभई, जानु सिंहँ तुइ डीठि॥ धाय सिंह धेरै खात्यों भारी। कीतसें रहत अहे जसवारी॥ जो बनसुनो किं नवेँल बसन्ता। तेहिबन परा हस्तमैमन्ताँ॥ अब जोबन बौरी को राखा। कुंजरै विरहबिखा सें शाखा॥ मैं जानो जतिन रस भोगू। जोवनकठिनँ सतापवियोगूँ॥ जोबन गरुश्रा पेल पहारू। सहि न जाय जोवनकर भारू॥ जोबन अस मँनमत्तै न कोई। नवे हस्तै जो अंकुश होई॥ जोबन भरि भादों जस गङ्गा। लहरें देइ समाय न अङ्गा॥ दो० पखों अथाह धायहौं, जोवन उदधिगँभीरँ। कबूतर १ पद्मावत २ खाविन्द ३ मुश्किल ४-२२ देखना ५ दिल ६ सूर्य ७ खिलना ८ निगाह ६ लौंडी १० लड़की ११-२० लाल १२ पीला १३ हिरनी १४ शेर १५ शेर ने क्या मारा है १६ अर्थात् लड़काँई में कैसी थी १७ नया १८ हाथी मस्त १६-२१-२६ दुख २३ बोझ २४ मस्त २५ समुद्र गहरा २७॥
पद्मावत । ८१ तहँ चितवों चारहुदिशि को गहि लावे तीरै । पद्मावत तुइ समुद्र सयानी । तुइ सरै समुद्र न पूजी रानी ॥ नदी समाय समुद्र महँ आई । समुद्रडोल कहु कहाँ समाई ॥ अवहीं कमलकरी हियँ तोरा । अइहै भँवर जो तोकहँ जोरा ॥ जोबन तुरी हाथ गहि लीजे । जहां जाय तहँ जाय न दीजे ॥ जोबनैं जोर माँते गज अहे । गहहु ज्ञान अंकुश जिमि रहे ॥ अवहिं बारँ तुइँ प्रेम नखेला । काजानिस कस होय दहेलाँ ॥ गगनें दृष्टि करपाय तराहीं । सूर्य देखकर आवत नाहीं ॥ दो० जब लग पीउ मिले तुहि, साधि प्रेमकी पीर । जैसे सीप स्वातिकहँ, तप समुद्र मैंभैं नीरै ॥ दहतैं धार्य जोबन औ जीव । जानहु परा अगिनिमहँ घीव ॥ करवट सहों होत दुइ आधा । सही न जाय बिरहकी दाधा ॥ बिरह समुद्र बिपहर अस भारा । भँवर मेल जिव लहरनमारा ॥ विरह नाग होय शिर चढ़ डसा । वही अगिन चन्दनमहँ बसा ॥ जोवन पंखी बिरह बियाधूँ । केहरि भयो कुरङ्गिंन खाँधूँ ॥ कनक पानि कित जोबन कीन्हा । औटन कठिनैं बिरह वह दीन्हा जोबन जलहि बिरहमैंसि छुवा । भूलहिंभँवर फिरहिं भासुवाँ ॥ दो० जोबन चन्द उजास, विरह भयो सँग राहु । घटतहि घटत खीनँ भय, कहेन पैरों काहु ॥ १७२ नयनँ जो चक्र फिरे चहुँओरा । चरची बायैं समाय न कोरा ॥ चारों तरफ १ पकड़ना २ किनारा ३ बराबर ४ दिल ५ घोड़ा ६ जबानी ७ हाथी मस्त ८ लड़की ६ मारी १० आसमान ११ नज़र १२ बीच १३ पानी १४-२३ जलना १५ दाया १६ परदार जानवर १७ बहेलिया १८ शेर १६ हिरन २० खाना २१ सोना २२ मुश्किल २४ सियाही २५ तोता २६ बारीक २७ कहि नहीं सकता २८ आंख २६ दाया ३० ॥
८२ पद्मावत । कहेसि प्रेम उपजा जो बारी । बांधि सत्तमन डोलन भारी ॥ जेहिजिय मनहिं सत्त होय भारू । परे पहार नहिं बांके बारू ॥ सती जो जरी प्रेम पै लागी । जोसतहिये तो शीतल आगी ॥ जोबन चांद जो चौदसें करा । विरहकीचिंगगी सो पुनिजरा ॥ पवन बन्धु सो योगी यती । कामबन्ध सो कामिनें सती ॥ आव बसन्त फूल फुलवारी । देव बारैं सब जोहहिं बारी ॥ दो० तुम पुनि जाहु बसन्त लै, पूज मनावहु देव । जीव पाय जग जन्म है, पिय पाई कै सेवँ ॥ जबलगअवैधिआय नियराई । दिनयुगयुगविरहिनकहँजाई ॥ नींद भूखनिश् दिनगइदोऊ । हिये मांझ जस कलपै कोऊ ॥ रोमरोम जनु लागहिं चांटे । सूतें सूत जनु वेधे कांटे ॥ दग्धै कराह जरे जस घीव । बेगें न आव मलयगिरि पीव ॥ कौन देवकहँ जाय परोसों । जेहि सुमेरु हियें लाय गिरासों ॥ गूंजे जो फलसासहि परगंटे । अवहोय सुअै चहहिं हम घंटे ॥ भइ संयोगें जुरा अस मरना । भूखहि गई भोगका करना ॥ दो० यौवन चञ्चल ढीठ है, करे न कीजै काज । धन कुलवन्त जो कुलधरै, की जीवन मनलाज ॥ तेहिं वियोगें हीरामैनँ आवा । पद्मावत जानहु जिव पांवा ॥ कंठ लगाय सुआँ सों रोई । अधिकमोहें जोमिले विछोई ॥ आगउठी दुख हिये गंभीरेँ । नयनेंहिं आय चुवा होय नीरूँ ॥ पैदा होना १ लड़की २-६ दिल ३-२०-३१ ठंडा ४ चांद चौदहीं के बराबर ५ हवा ६ औरत ७ दरवाज़ा ८ ख़िदमत १० हद ११ रात १२ बीज १३ सूराख़ १४ गर्म १५ जल्द १६ चन्दन १७ पूजन १८ नाम पहाड़ १६ छिपा २१ ज़ाहिर २२ हर रगमें भरा है कि दम वदम घटती है २३ मुलाक़ात २४ कामवाला २५ दुःख २६ नाम तोता २७-२८ बहुत पियारा २६ बिछुड़ाहुआ ३० भारी ३२ आंख ३३ पानी ३४ ॥
॥ पद्मावत ॥ ८३ रही रोय जब पद्मिनि रानी । हँसि पूँछहिं सब सखी सयानी ॥ मिले रहस भा चाहे दूना । कित रोई जो मिले बिछोना ॥ तेहिकें उतरै पद्मावत कहा । बिछुरन दुख जो हियैं भर रहा ॥ मिलत हिये आयै सुख भरा । वह दुख नयननीर होय ढुरा ॥ दो० बिछुरंता जब भेटे, सो जाने जेहि नेहँ । सुख सुहेला उगवै, दुःखझरै जिमि मेहँ ॥ खण्ड पन्द्रहवां मुलाकात खण्ड पद्मावत औ हीरामन ॥ पुनि रानी हँसि कुशलै पूँछा । कितं गे वनहिकै पिंजर ढूँछा ॥ रानी तुम युगयुग सुखपाटूँ । छाजै न पंखी पिंजर ठाटू ॥ जो भा पंख कहां थिरें रहना । चाहे उड़ा पंख जो डहनों ॥ पिंजर महँ जो परेवां घेरा । आय मँजोरै कीन्ह तहँ फेरा ॥ दिवसकें आय हाथ पै मेला । तेहि डर बनोबासकहँ खेलौं ॥ तहां जाय ब्याध नर सांघा । छूट न जाय मीच कर बांधा ॥ वें घर बेचा ब्राह्मण हाथा । जम्बूद्वीप गयौं तेहि साथा ॥ दो० तहां चित्र चित्तौरगढ़, चित्रसेन कर राज । टीकों दीन्ह पुत्रकहँ, आप लीन्ह शिवसाँजै ॥ बैठि जो राज पितौँ कर ठाँऊँ । राजा रतनसेन तेहि नाऊँ ॥ का वरँणों धन देश दुवारा । जहँ असनगउपजौं उजियारा ॥ धन माता औ पिता बखाना । जेहिके वंश अंशै असआना ॥ खुश १ जबाब २ दिल ३-४ आंसू ५ मुहब्बत ६ जिस तरह ७ बादल ८ खैरियत ६ कहां १० तख्त ११ सोहना १२ जानवर परिन्द १३-१६ कायम १४ बाजू १५ बिल्ली १७ एक दिन १८ जाना १६ तसवीर २० राजतिलक २१ मरना २२ बाप २३ जगह २४ तारीफ़ २५ पैदाहोना २६ अक़बालवाला २७ ॥
८४ - पद्मावत । लंक्षन बतीसों कुल निरमलाँ १। बरणिँ २ न जायरूप औ कला ॥ वेहौं लीन्हैं ३ अहा अस भागू । चाहै सोने ४ मिला सुहागू ॥ सुनग देख इच्छा भइ मोरी । है यह रतने ५ पदारथ जोरी ॥ है शशिर ६ योग यही पै भानूँ । तहँ तुम्हार मैं कीन्ह बखानूँ ७ ॥ दो० कहां रतन रतनागढ़, कंचनं ८ कहां सुमेर । दैव जो जोरी दुहुँलिखी, मिली सो कौनहि फेर ॥ सुनिके विरह चिनग वह परी । रतन पाव जो कंचनर्करी ९ ॥ कठिनें १० प्रेम बिरहा दुख भारी । राज छांड़िभा योगि भिखारी ॥ मालति लाग भँवर जस होय । होयबावरे ११ निसरा बुधिखोय ॥ कहेसि पतंग होय रस लेऊं । सिंहलद्वीप जाय पगँ १२ देऊं ॥ पुनि वह कोउ न छांड़ अकेला । सोरहसहँसे १३ कुँवर भयचेला ॥ और गिनै को संग संहँई १४ । महादेव मँढ़ मेला जाई ॥ सूर्य पुरुषै १५ दरशन की ताई । चिंतवे चन्द्र चकोर की नाई ॥ दो० तुम बौरी १६ रस योग जेहिं, कमलहि जस अरघान । तस सूरज परकाशैँ १७ कै, भँवर मिलायो आन ॥ हीरामने १८ जो कही यहि बाता । सुनिके रतन पदारथ राता ॥ जैसे सूर्य्य देख है ओपाँ १९ । तसभा विरह कामदल कोपाँ २० ॥ सुनिके योगी केरे बखानूँ २१ । पद्मावत मनभा अभिमानूँ २२ ॥ कंचनकँरी २३ न कांचहि लोभा । जो नगजड़े होय तस शोभा ॥ कंचन जो कसिये कै ताता । तब जाने वह पीतेँ २४ कि रातौँ २५ ॥
- पाक साफ़ १ बयान करना २-७ उसका मोल लियाहुआ ३ जवाहर लाल ४ चांद ५ सूर्य ६ सोना ८ सोने की अंगूठी ६-२३ मुश्किल १० दीवाना ११ क़दम १२ हज़ार १३ फ़ौज १४ मर्द १५ लड़की १६ उजियारा १७ नाम तोता १८ उदय होना १९ गुस्सा करना २० तारीफ़ २१ ग़रूर २२ पीला २४ लाल २५ ॥
पद्मावत । ८५ नगकरमर्म सो जड़िया जाना। जड़ै जो असनगदेखें बखानाँ॥ को अस हाथ सिंहें मुख घालै। को यह बात पिताँ सों चालै ॥ दो० स्वर्ग इन्द्र डर कांपै, बासुँकि डरै पतार। कहँ ऐसो वर पृथ्वी, मोहिं योग संसार ॥ तुइँरानी शशि कञ्चन कलाँ। वह नगरतन सूरै निरमलौँ ॥ विरह बिजागे बीजगा कोई। आग जो छुवै जाय जर सोई॥ आगबुझायधोय जल गाढ़े। वह न बुझाय आग अतिबाढ़े॥ बिरहकी आग सूरै जरकपा। रातहि दिवसैं जरै औ तपा॥ खनहि स्वर्ग खनजाय पतारा। थिरै न रहै यहि आग अपारा॥ धनि सो जीव दगधै इभि सहा। ऐसो जरै दूसर नहिं कहा ॥ सुलगसुलग भीतर होय श्यामाँ। प्रगटै होय नहिं काढ़ै नामा॥ दो० काह कहौं ओही सों, जो दुख कीन्ह निमेट। तेहिदिन आग करों यह बाहर, जेहिदिन होय सुभेट॥ सुना जो असधनै जारा कयौँ। तनभा सांचै नयनै भामयाँ ॥ देखों जाय जरै जसभानू। कञ्चनै जरै अधिकै होये बानूँ ॥ अब जो जरै सुप्रेम वियोगी। हत्यामोहिंजेहिकारणैयोगी॥ हीरामन सो कही रस बाता। सुनिके रतनै पदारथ राता॥ योगी योग सँभारहिं छाला। देहों झुकै देहों जैमालौँ ॥ आव बसन्त कुशल सो पाऊं। पूजा मिसँ मण्डफकहँ आऊँ॥ भेद १ देखना २ तारीफ ३ शेर ४ बाप ५ आसमान ६ नाम राजा सांपों का ७ खाविन्द ८ ज़मीन ६ चांद १० सूर्य ११-१४-२७ पाकसाफ़ १२ आग १३ दिन १४ कभी १६ क़ायम १७ जलन १८ इसतरह १६ सियाह २० ज़ाहिर २१ औरत तथा पद्मावत २२ बदन २३ सांचा २४ आंख २५ मोम २६ सोना २८ बहुत २६ खरा ३० दुखी ३१ सबब ३२ जवाहर ३३ मुख ३४ जिसके गलेमें पड़े उसी के साथ शादी हो ३५ बहाना ३६ ॥
गुरु के बचन फूल हियें गाथे । देखों नयनं चढ़ाऊँ माथे ॥ दो० कमल बरण तुम बरना, मैं माना पुनि सोय । चांद सूर्य्य कहँ चाही, जोरी सूर्य्य वह होय ॥ हीरामनेँ जो कही रस बाता । पाँय पान भयो मुख राताँ ॥ चला सुआ तब रानी कहा । भा जो पराउ जो कैसे रहा ॥ जो नित्तं चलै सँवारहि पाखा । आज जो रहा काल्हकोँ राखा ॥ नाजनो आजकहां दिनउवा । आयहिमिलै चलहिमिलसुवाँ ॥ मिलके बिछुर मरनकी आनीं । कत आयहु जो चलहि निदानीं अनरौनी जो रहतोँ राँधौं । कैसे रहौं बचनें करे बांधा ॥ ताकर दृष्टि ऐसो तुम्ह सेवा । जैसे कुञ्ज मन् सेज परेवा ॥ दो० बसै मीने जल धरँती, अम्बौ वर्ष प्रकास । जो प्रीति पै दोउ महँ, अन्तैं होहिं एकपास ॥ आवा सुआ बैठिजहँ योगी । मारगं नयनें वियोगें वियोगी ॥ आय प्रेमरस कहा संदेशू । गोरख मिला मिला उपदेशू ॥ तुमकहँ गुरु मयाँ बहुकीन्हा । कीन्ह अदेश आवकहँ दीन्हा ॥ शब्द्दी एक होय कहा अकेला । गुरु जसभृङ्ग पतँग जस चेला ॥ भृङ्गी ओही पंखेँ पै लेइ । एकहि बार चहै जिव देइ ॥ ताकहँ गुरु मयाँ भलकीन्हा । नवअवतारें ज्ञानें बहुदीन्हा ॥ होय अमर अस मरके जिया । भँवरकमल मिलके मधुपिया ॥ दो० आवै ऋतुबसन्त जब, तब मधुकैरै तवबास । दिल १ आंख २-२१ रंग ३ नाम तोता ४ लाल ५ हररोज़ ६ तोता ७ बराबर ८ कहां ६ जल्द १० ऐ रानी ११ नज़दीक १२ क़ौल १३ निगाह १४ नाम जानवर परिन्द १५ मछली १६ ज़मीन १७ पानी १८ आखिर १६ राह २० जुदाई २२ दुखी २३ नाम फ़क़ीर २४ नसीहत २५ मेहरबानी २६-३३ सलाम २७ बात २८ नाम कीड़ा २६-३०-३१ पांखी ३२ नया जन्म ३४ अक़्ल ३५ हमेशा ज़िन्दा ३६ भँवरा ३७ ॥
योगीयोग जो इमि सहै, सिद्ध समापत तास ॥ (१) खण्डसोलहवां बसन्तखण्ड ॥ दई दई कर सुरत गँवाई । श्रीपञ्चमी पूजि तब आई ॥ भयो हुलास नवल ऋतुमाहां । क्षण न सुहाय धूप औ छाहां ॥ पद्मावत सब सखी हँकारी । जानवन्त सिंहलकी बारी ॥ आज बसन्त नवल ऋतुराजा । पंचम होय जगत सबसाजा ॥ नवल श्रृँगार बनाहंत कीन्हा । शीशे परोसहिं सैंदुर दीन्हा ॥ बिकँसे कमल फूल बहुवासा । भँवरआय लुब्धे चहुँ पासा ॥ पियर पात दुख भरे निपौते । सुख पलहा उपजी होय शैते ॥ दो० अवधि आय सो पूजे, जो इच्छा मन कीन्ह । चलहु देवमढ़ गोहनें, चहो सो पूजा दीन्ह ॥ फिरे आन ऋतु बाजन बाजे । औ श्रृंगार बारहि सब साजे ॥ कमल करी पद्मावत रानी । होय मालति जानौ बिगसानी ॥ तारामन्दे पहिर भल चोला । भरी शीश संवनखत अमोला ॥ सखी कुमोद सहंसदश सङ्गा । सबै सुगन्ध चढ़ाये अङ्गा ॥ सब राजा रायनकी बारी । बरन बरन पहिरैं सब सारी ॥ सबै स्वरूप पद्मिनी जाती । पान फूल सैंदुर सब राती ॥ करें कलोलें सुरङ्ग रँगीली । औ चोवा चन्दन सब खेली ॥ दो० चहुँदिशि रही वासना, फुलवारी अस फूल । वे बसन्त सों फूली, गा बसन्त वहि भूल ॥ इसतरह १ कामिल २ खुशी ३ नया ४-६ भुलाना ५ जहांतक ६ लड़की ७-२०-२७ दुनियां ८ पेड़ १० शिर ११-२३ दाख १२ खिलना १३-२१ लपटना १४ झरना १५ पैदा १६ लाल १७-२६ हद १८ साथ १९ नाम कपड़ा २२ कोफावेली २४ हज़ार २५ बदन २६ रंगवरंग २८ खुशी ३० चारों तरफ ३१ ॥
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८८ पद्मावत। भई अहा पद्मावत चली। छत्तिसकुंरि भइ गोहनें भली ॥ भई गौरि संग पहिर पटोरा। ब्रह्मनिआय सहसें सँगैं मोरा ॥ अग्रवारि गजगवर्न करेई। वैसि पांव हंस गत देई ॥ चन्देलिनि ठमकहिं पगैं ढारा। चल चौहान होय झनकारा ॥ चली सुनारि सुहांग सुहाती। औ कलवारि प्रेममधुमाती ॥ बानिनि चली सिंदुर दियेमांग। कैथिनिचली समाय न आंगा ॥ पटयनि पहिरि सुरंग तन चोला। औ बरइन मुखखात तमोला ॥ दो० चली पवनें सँग गोहनें, फूल डार लिये हाथ। विश्वनाथ की पूजा, पद्मावत के साथ ॥ ठाठेरिन बहु ठाठर कीन्हा। चली अहीरिन कांजर दीन्हा ॥ गूजरि चली गोरस की माती। बढ़यनि चली भागकी ताती ॥ चली लुहारिन बांके नयना। भाटिन चली मधुरै अतिवयनों॥ गन्धिन चली सुगन्ध लगाये। छीपिन चली सो चीर रँगाये ॥ रँगरेजिन बहु रँगती सारी। चली युक्ति सो नाउनि वारी ॥ मालिनि चली हार लिये गांथे। तेलिनि चली फुलायलमाथे ॥ किये श्रृंगार बहु वेश्या चली। जहँलग मूँदी बिकेंसी कली ॥ दो० नटनी डोमिनि दारिन, सहनायन परकार। निरततें नांदे बिनोदें सों, विहँसत खेलत नार ॥ कमल सुभाष चली फुलवारी। फर फूलन की इच्छा वारी ॥ आप आप महँ करहिं जोहारू। यह बसन्त सबकहँ त्योहारू ॥ चही मनोरों झूमक होई। फर औ फूल लियो सब कोई ॥ छत्तीस क़ौम १ साथ २-१९ गौरब्राह्मण ३ हज़ार ४ चंदन ५-६ हाथी की चाल ६ क़दम ७ शराब ८ हवा १० ईश्वर १२ मीठी, १३ चोल १४ लाल १५ खिलना १६ नाचना १७ गाना १८ ख़ुशी १६ साहेब सलामत २० रसमगाने औ बजाने की २१ ॥
फाग खेलि पुनि दाहवैं होली । सेततखेंहं उड़ावब झोली ॥ आज छांइ पुनि दिवसैं न दूजा । खेल बसन्त लेहु कै पूजा ॥ भा आयसु पद्मावत केरा । फेरन आय करब हम फेरा ॥ तसहम कहँ होयहै रखवारी । पुनि हम कहां कहां यह बारी ॥ दो० पुनि रै चलब घर आपने, पूज विश्वेश्वर देव । जेहिको होय खेलना, आज खेल हँस लेव ॥ काहूँ गही अम्ब की डारा। कोई बिरह जम्बू अति छारा ॥ कोइ नारंग कोइझारै चिरौंजी। कोई कटहरे बड़हरे कोइ न्यौजी ॥ कोइ दाड़िमैं कोइ दाखें खैरीं। कोइ सदाफैर तुरंजे जँभीरी ॥ कोइ जैफैर कोइ लोंग सुपारी। कोइ कमरुख कोइ कोंबों छारी ॥ कोइ बिजोरैं कोइ नरियारैंघूरी। कोइइमली कोइ महुवाखजूरी ॥ कोइ हरफा कोइ चोर करौंदा । कोइ अनार कोइ बेरिकिसौदा ॥ काहू गही केला की घौरी । काहू हाथ पड़ी निमकौरी ॥ दो० काहू पाई नेरे, काहू कहँ गये दूर। काहू खेल भयो विषै, काहू अमृत मूर ॥ पुनि बीनहिं सब फूल सहेली । जो जेहि आस पास सब बेली ॥ कोइ क्यौड़ा कोइ चम्पनेवारी । कोई केतकि मालति फुलवारी ॥ कोई सतवैरंग गोंद औ करना। कोई चमेलि नागैसर बरना ॥ कोइ सुगुलावै सुदर्शनै कूजों । कोइ सोन जैद भलपूजा ॥ कोइ सोवोलसै पुहुप बैंकोरी । कोई रूपमँजरी औ गोरी ॥ कोइ शृंगार हार तेहि पाहां । कोई सेवँती कदम्ब की छाहां ॥ १ जलाना २ राख धूर २ दिन ३ हुक्म ४ बागीचा ५ नाम देवता ६ लेना ७ आंब ८ जामुन ६ नाम मेवा फ़सली १०-११-१२-१३-१४-१६ अनार १५ अंगूर १६ खिरनी १७ नाम मेवा १८-२०-२१-२२ टुकड़ा २३ ज़हर २४ नाम फूल २५-२६-२७-२८-२६-३०-३१-३२-३३-३४-३५-३६-३७-३८॥
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६० . पद्मावत। कोइ चन्दन फूलहिं जनु फूली। कोइ अजाने बिरवातर भूली॥ दो० कोइ फूल पाव कोइ पाती, जेहिक हाथ जेहि भांट। कोइ हार चीरें उरझानी, जहां छुवे तहँ कांटे॥ फरफूलन सब डार भिराई। कुण्ड बांध के पंचम गाई॥ बाजत डोलैं दंद औ भेरें४। मन्दिर तूरें झांझ चहुँ फेरें॥ सींगी शंखे डफसंगम बाजे। बंसकार महुवरें सुरसाजे॥ और कहा जित बाजन भले। भांति भांति सब बाजत चले॥ रथहिं चढ़ी सब रूप सुहाई। लिये वसन्त मड़मँडफ सिधाई॥ नवलें बसन्त नवल वै बौरी। सेंदुर बूका करें धमारी॥ खनेहिं चलहिं खन चांचर होई। नाच छूट भूला सब कोई॥ दो० सेंदुरखेहें उठी तस, गगनैं भयो तस राते। राति सकलें महिं१८ धर्ती, राति बृक्षवन पांत॥ यहिविधि खेलत सिंहल रानी। महादेव मठ जाय तुलानी॥ सकलें देवता देखन लागे। दृष्टि२१ पाप सब उनके भागे॥ ये कैलास सुनें अप्सरी। कहांते आय टूटि भुइँ परी कोई कहै पद्मिनी आई। कोइ कह शेशि औ नखत तराई॥ कोई कहै फूल फुलवारी। फूली सबै देखके वारी२४ एक स्वरूप औ सेंदुर सारी। जानहु दिया सकलें में हि वारी सुरछ परै जोई मुख जोहे। मानहु मिरगं दवारहिं मोहे दो० कोई परा भँवर होय, वास लीन्हे जनु चांपे२७। कोइ पतङ्ग भा दीपक, कोइ अधजर तन कांप॥ नाम फूल १ कपड़ा २ नाम बाजा ३-४-५-६-७-८-६-१० नया ११ लड़की १२-२४ कभी १३ धूर १४ आसमान १५ लाल १६ सब १७-२० ज़मीन १८-२५ पहुँचना १६ निगाह २१ चांद २२ छोटे नखत २३ हिरन २६ चम्पा २७ पांखी २८॥
पद्मावत गई देव दुआरा । भीतर मँडफ कीन पैसारा ॥ देवै संशय भा जिय केरा । भागों केहिदिशि मण्डफ घेरा ॥ एक जुहारे कीन्ह औ दूजा । तिसरे आय बढ़ायसि पूजा ॥ फर फूलन सब मँडफ भरावा । चन्दन अगर देव अन्हवावा ॥ भरि सेंदुर आगें भइ खरी । परसि देव पुनि पांयन परी ॥ और सहेली सबे बिवाहीँ । मोकहँ देवकि तुहुँवरें नाहीं ॥ हौँ निरगुन जेँ कीन्ह न सेवा । गुनें निरगुनें दाताँ तुम देवा ॥ दो० वरसंयोगों मोहिं मिलवहु, कलशं जातहौँ मान । जा दिन इच्छा पूजै, बेग चढ़ातुं आन ॥ इच्छे इच्छ बिनती जस जानी । पुनि करे जोरिठाढ़ भइ रानी ॥ उतरें को देय देव सोगयो । शब्दे कोट मण्डफ महँ भयो ॥ काटिप्यारों जैसे परेवा । सोगयो ईश उतरें को देवा ॥ भये जीव बिन नाउत ओझा । विषभइ पूरि कालभयें गोझा ॥ जो देखे जनु विषहेरें डसा । देख चरित पद्मावत हँसा ॥ भल हम आय मनावा देवा । गाजन सोय को मानै सेवा ॥ को इच्छा पुरवै दुख खोवा । जहिंमन आय सो तनतन सोवा ॥ दो० चहुँदिशि सखी उठावहिं, शीशें बिकल नहिं डोल । धर कोइ जीवन जानो, मखरे बकत कुबोल । ततखने आय सखी तहँसानी । कौतुक एक न देखहु रानी ॥ पूर्व दौरै मठ योगी छाये । नाजनो कौन देश ते आये ॥ जनु उन योग तन्त अब खेला । सिद्धे होय निसरे सब चेला ॥ १ सलाम १ जाविन्द २ बेहुनर ३-५ हुनर ४ देनेवाला ६ खाविन्द लायक ७ आरजू ८-१० जल्द ६ हाथ ११ जवाब १२-१६ आवाज १३ छोड़ देना १४ देवता १५ सांप १७ ख़िदमत १८ चारों तरफ १६ शिर २० यकायक २१ दर- वाज़ा २२ कामिल २३ ॥
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६२ पद्मावत। उन महँ जो एक गुरू कहावा। जस गुड़ दे काहू बौरावा ॥ कुँवर बतीसो लक्षण राता। दर्शये लषन कहे एक बाता ॥ जानो आहि गोपचन्दै योगी। की सुप्राय भरथरी वियोगी ॥ वे पिङ्गलै गये कजरी आरनं। ये सिंहल सोवहिं केहिकारन ॥ दो० यह मूरत यह मुद्रा, हम न देख अवधूत । जानहुँ होहिं न योगी, कोइ राजा के पूत ॥ सुनि सुबात रानी रथ चढ़ी। कहँ अस योगी जो देखों मढ़ी ॥ लै सँगसखी कीन्ह तहँफेरा। योगिआयजनु अपछरँनहिं घेरा॥ नयन कचूरे प्रेम मधु भरे। भइ सुदृष्टि योगी सो ढुरे ॥ योगीदृष्टि दृष्टिसों लीन्हा। नयनें रूप नयनहिं जिवदीन्हा॥ जो मधु छकतपरा तेहिपाले। सुध न रही वह एक पियाले ॥ पड़ा मंत गोरख कर चेला। जिवतन छांड़िस्वैरगे कहँ खेला ॥ किंगरी गही जो हुत बैरागी। मरती बार वही धुन लागी ॥ दो० जेहि धन्ध जाकर मन बसे, सपने सूझसुगन्ध । तेहिकारणे तपसी तपसाधहिं, करहिंप्रेमचितबन्ध॥ पद्मावत जस सुना बखानूं। सहसँ किरा देखे तस भानू ॥ मेलिसँ चन्दन मगँख नजागा। अधिको सोतसीर तनलागा॥ तब चन्दन आखेरें हियें लिखी। भीख लई तुम योग न सिखी ॥ बौर आय तबगा तुइँ सोई। कैसे भुक्ति परापत होई ॥ ० बत्तीस हुनर जाननेवाला १ अंदाज से बात करता है २ नाम योगी ३-४-१४ नाम रानी ५ जंगल ६ इन्द्रलोक की परियां ७ आंख पियाले की तरह ८ शराब ९-१३ निगाह १०-११ आंख १२ आसमान १५ जाना १६ . बाजा १७ पकड़ना १८ वास्ते १६ तारीफ़ २० हज़ार २१ सूर्य २२ . क २३ शायद २४ बहुत २५ ठंडा २६ हर्फ़ २७ दिल २८ भीख २६ दरवाज़ा ३० रोज़ी ३१ ॥
text पद्मावत । ६३
अब जो सूर¹ अहे शशिर राता। आये चढ़ सुगगन³ पुनि साता॥ लिखंसो बात सखिन सो कही। यही ठांवे हों बरिते रही॥ परगट हों तो होय असभंगू। जगत दियांकर होय पतंगू॥ दो० जासों चख हेरों१०, सोई ठांव जिव देय। यह दुख कतहूँ न निसरौं, को हत्या अस लेय॥ कीन्ह पयान सबहिं रथ हांका। पर्वत छांड़ सिंहलगढ़ ताका॥ बलि¹² भये सबै देवता बैली। हत्यारिन हत्या लै चली॥ को असहितू मुवे गहि बाँहीं। जोपै जिय आपन तन नाहीं॥ जौलह जिव आपन सब कोई। बिन जिव कोइन आपन होई॥ भाई बन्धु औ मीत¹³ पियारा। बिन जिव घड़ी न राखै पाराँ॥ बिन जिव पिण्डैं छोर कर कूरा। छार मिलावै सो हित पूरा॥ तेहि जिव बिना अमर भा राजा। को उठि बैठि करब सो काजा॥ दो० परिकायौ भुइँ लोटै, कहारे जिव बलिभीव। को उठाय बैठारे, बाजै पियारे जीव॥ पद्मावत सो मंदिर पैठी। हँसत जाय सिंहासन बैठी॥ निशें सोती मुनि कथा वहारी। भा बिहान सब सखी हँकारी॥ देवपूज जस आयों काली। स्वप्न एक निश देख्यों आली॥ जनु शेशि उदय पूर्वदिश लीन्हा। औरवि२६ उदय पश्चिम दिश कीन्हा॥ पुनि चलि सूर चांद पहँ आवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो भिरावों॥ दिन औ रात जानहु भय एका। राम आय रावण गढ़ छेका॥
सूर्य १-२६ चांद अर्थात् रात को आधे २ आसमान अर्थात् क़िला ३ जगह ४ बच्चे ५ ज़ाहिर ६ नुक़सान ७ दुनियां ८ पांखी ६ आंख से देखों १० कूच ११ क़ुर्बान १२ ज़बरदस्त १३ दोस्त १४-१६-२० मरे की बांह पकड़े १५ रख नहीं सक्ता १७ वदन १८-२१ राख १६ पहुँचना २२ रात २३ बुलाया २४ चांद २५ मुलाक़ात २७ ॥