पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९
जाना' यों निद्रा के समय के सुख और अज्ञान दोनों का स्मरण,
सोकर उठा हुआ पुरुष किया करता है [ इस कारण कहना
पड़ता है कि सुप्ति में सुख है ]
परामर्शोऽनुभूतेऽस्तीत्यासीदनुभवस्तदा ।
चिदात्मत्वात् स्वतो भाति सुखमज्ञानधीस्ततः ॥६०॥
जो भी परामर्श होता है वह अनुभूत विषय का ही होता
है [ अनुभव न किये हुए विषय का तो स्मरण हो ही नहीं सकता ]
इस कारण उस समय सुप्ति में सुख का अनुभव माना जाता
है। सुख का अनुभव करने के साधनों के बिना ही वह सुख स्वतः
प्रतीत हो जाता है क्योंकि वह सुख चिदात्मा है [ अर्थात् वह
सुख स्वयंप्रकाशचिद्रूप है ] । उसी स्वयंप्रकाश सुख के सहारे
से ही [ उस सुख को ढकने वाले ] अज्ञान की भी प्रतीति हो
जाती है ।
ब्रह्म विज्ञान मानन्दमिति वाजसनेयिनः ।
पठन्त्यतः स्वप्रकाशं सुखं ब्रह्मैव नेतरत् ॥६१॥
वाजसनेयी शाखा वाले कहते हैं कि- 'ब्रह्म' 'विज्ञान' तथा
'आनन्द' दो रूप का है । इस कारण जो भी स्वयं प्रकाश सुख
है वह सब ब्रह्म तत्व ही है । वह और कुछ नहीं है [फिर सुषुप्ति
के स्वयं प्रकाश सुख को भी ब्रह्मरूप ही मानना चाहिए]
यदज्ञानं तत्र लीनौ तौ विज्ञानमनोमयौ ।
तयोर्हि विलयावस्था निद्राऽज्ञानं च सैव हि ॥६२॥
['मैंने उस समय कुछ नहीं जाना' इस स्मरण की अन्य-
थानुपपत्ति से जिस अज्ञान को हम पहचानते हैं] उसी अज्ञान
में प्रमाता और प्रमाण कहाने वाले विज्ञानमय और मनोमय
१४० पञ्चदशी
दोनों ही विलीन हो जाते हैं। [वे अपने विज्ञानमयत्व आदि
आकार को छोड़कर कारण रूप में पहुँच जाते हैं। अर्थात् उस
समय 'विज्ञानमय' और 'मनोमय' दोनों ही नहीं रहते] उन
'विज्ञानमय' और 'ननोमय' की विलयावस्था 'निद्रा' कहाती
है। उसी निद्रा को विद्वान् लोग 'अज्ञान' भी कहते हैं [सोच
कर देखलो नींद भी तो अज्ञान ही है]
विलीनघृतवत् पश्चात् स्याद् विज्ञानमयो घनः ।
विलीनावस्थ आनन्दमयशब्देन कथ्यते ॥६३॥
[अग्निसंयोग आदि से] पिघला हुआ घृत, पीछे शीतल-
वायु के संयोग से जैसे गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार [जाग्र-
दादि के भोगदायी कर्मों के क्षय हो जाने के कारण] निद्रारूप
से विलीन हुआ अन्तःकरण [फिर जब भोगदायी कर्मों के वश
से, जागरण अवस्था आती है] विज्ञानरूप से घनका [गाढ़ा]
हो जाता है। वह घन विज्ञान ही आत्मा की उपाधि होती है
इस कारण आत्मा भी विज्ञानमय हो जाता है। वही जब पहले
विलीन अवस्था में था— [जब वह अवस्था उसकी उपाधि बन
रही थी] तब उसी को 'आनन्दमय' कहा जाता था।
सुप्तिपूर्वक्षणे बुद्धिवृत्तिर्या सुखविम्विता ।
सैव तद्विम्वसहिता लीनानन्दमयस्ततः ॥६४॥
[ऊपर के श्लोक की बात को अधिक स्पष्ट रीति से यों सम-
झना चाहिए कि] सुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धि-
वृत्ति होती है उसमें जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके
बाद उस प्रतिबिम्ब को लिये ही लिये, वही वृत्ति जब निद्रारूप
से विलीन हो जाती है तब वही 'आनन्दमय' कहाने लगती है।
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१
अन्तर्मुखो य आनन्दमयो ब्रह्मसुखं तदा ।
भुङ्क्ते चिद्विम्बयुक्ताभि रज्ञानोत्पन्नवृत्तिभिः ॥६५॥
वह जो अन्तर्मुख 'आनन्दमय' है वह चिदाभास से युक्त,
तथा अज्ञान से उत्पन्न हुई वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख [किंवा
स्वरूपभूत सुख] को भोगता अर्थात् अनुभव किया करता है।
अज्ञानवृत्तयः सूक्ष्मा विस्पष्टा बुद्धिवृत्तयः ।
इति वेदान्तसिद्धान्तपारगाः प्रवदन्ति हि ॥६६॥
[ उस समय जागरण की तरह् सुख के अनुभव का जो
अभिमान नहीं होता उस का कारण तो यह है कि]—वे अज्ञान-
वृत्तियां बहुत ही सूक्ष्म होती हैं [वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट
नहीं होतीं।] बुद्धिवृत्तियां तो बहुत ही स्पष्ट होती हैं। यह बात
वेदान्तसिद्धान्त के पारङ्गत लोग बताते हैं।
अज्ञान वृत्तियों का पता नहीं चलता कि वे कैसी कैसी हैं
और कितनी हैं? जब तो उन अज्ञान वृत्तियों से बुद्धिवृत्तियें बन
जाती हैं, तब हम को मालूम पड़ता है कि हमारे अन्दर इतना
कूड़ा कचरा भरा पड़ा है। जब तक हमारा अज्ञान बुद्धिवृत्तियों
के रूप में प्रकट नहीं हो जाता तब तक हम अपने आप को
बड़ा महात्मा समझ बैठते हैं। एकान्त में जाकर साधन करने
से यह एक बड़ी कमी रह जाती है कि अज्ञान वृत्तियों को
बुद्धिवृत्ति बनने का अवसर ही नहीं मिलता और यों हमें अपने
विषय में मिथ्याज्ञान या मिथ्याभिमान हो जाता है। समाज
में रह कर साधन करने से हमारे अन्दर के अज्ञान की बार-
बार बुद्धिवृत्ति बनती रहती है और हमें अपने अज्ञान का पता
चलता रहता है। यों हम दुरभिमान से भी बचते हैं और उस
४४२ पञ्चदशी
अज्ञान को हटाने में भी तत्पर रहते हैं अर्थात् हमारे साधन की
परीक्षा नित्य ही होती रहती है। इस दृष्टि से व्यवहार के साथ
साथ साधन करना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है। व्यवहार
से हट कर आत्मसाधन करने वाले लोग प्रायः करके व्यवहार
के झंझट में स्थिर बुद्धि नहीं रह सकते हैं। यों साधन का यह मार्ग
बहुत से साधकों को अधूरा रख देता है ऐसा मालूम पड़ता है।
माण्डूक्यतापनीयादिश्रुतिष्वेतदतिस्फुटम् ।
आनन्दमयभोक्तृत्वं ब्रह्मानन्दे च भोग्यता ॥६७॥
माण्डूक्य और तापनीय आदि श्रुतियों में यह बात अत्यन्त
ही स्पष्ट है कि 'आनन्दमय' तो भोक्ता है तथा 'ब्रह्मानन्द'
भोग्य है ।
एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनतां गतः ।
आनन्दमय आनन्दभुक् चेतोमयवृत्तिभिः ॥६८॥
[सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो-
मुखः (माण्डूक्य ५) इस माण्डूक्य श्रुति में कहा गया है कि]
सुषुप्ति का जो अभिमानी है, वह जब एकीभाव को प्राप्त हो
जाता है, उसमें जब प्रज्ञानघनता आजाती है, तब वह आनन्द-
मय किंवा आनन्द प्रचुर हो जाता है। वही आनन्दमय, [जिन
में चैतन्य की अधिकता रहती है—जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब से
से युक्त होती हैं] उन अपनी चेतोमय वृत्तियों से आनन्द को
भोगा करता है ।
विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुतन्दुलपिष्टवत् ॥६९॥
जो आत्मा पहले जागरणकाल में विज्ञानमय आदि
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
मय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुमय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपो-
मय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतजोमय, काममय
अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय आदि] आकारविशेषों से युक्त
था, वही अब लय के कारण [विज्ञान आदि उपाधियों के विलीन
हो जाने के कारण] एकरूप हो जाता है। मानो बहुत से चावलों
को पीस कर उन की एक पिष्ठी बना ली गयी हो । [इसी को
उसका एकीभाव कहते हैं ]
प्रज्ञानानि पुरा बुद्धिवृत्तयोऽथ घनोऽभवत् ।
घनत्वं हिमबिन्दूना मुदग्देशे यथा तथा ॥७०॥
[उस श्रुति के प्रज्ञानघन शब्द का अर्थ यह है कि]—पुरा
अर्थात् पहले जाग्रदादि के समय घटादि को विषय करने वाली
प्रज्ञान नाम की जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थीं, अब [सुषुप्ति-
काल के आजाने पर जब कि कोई भी घटादि विषय नहीं रहते
तब] उन सब वृत्तियों का एक घन हो जाता है [अब उनका
केवल एक चिद्रूप ही हो जाता है] जैसे कि उत्तर दिशा में बरफ़
की बहुत सी बूंदों का घनाकार पिण्ड हो गया हो ।
तद्घनत्वं साक्षिभावं दुःखाभावं प्रचक्षते ।
लौकिकास्तार्किका यावद्दुःखवृत्तिविलोपनाव् ॥७१॥
यह जो वेदान्तों में साक्षी कहाने वाली प्रज्ञानघनता है उसी
को तो लौकिक लोग [जिन्हें शास्त्र का संस्कार ही नहीं है] तथा
तार्किक आदि लोग, दुःखाभाव कहते हैं या समझते हैं। क्योंकि
उस समय जितनी भी दुःखवृत्तियां होती हैं उन सभी का विलय
हो जाता है [वे लोग इसी बात को न समझ कर उस प्रज्ञान-
घनता को ही दुःखाभाव समझ बैठते हैं]
४४४ पञ्चदशी
अज्ञानविम्बिता चित् स्यान्मुखमानन्दभोजने ।
भुक्तं ब्रह्मसुखं त्यक्त्वा बहिर्यात्यथ कर्मणा ॥७२॥
[उस श्रुति के चेतो मुख का अर्थ यह है कि]—सुषुप्ति-
काल के ब्रह्मानन्द को भोगने का मुख [साधन] अज्ञानवृत्ति में
प्रतिबिम्बित चैतन्य ही तो है [उस ब्रह्मानन्द को भोगता हुआ
भी वह उसे छोड़कर जो कि दुःखों के घर [इस जागरण] में
आता है उसका कारण यह है कि—यह जीव पुण्य पाप नामक
कर्मपाश में बंधा हुआ है, इस कारण उस] कर्म से प्रेरित हुआ
यह जीव, साक्षात् देखे हुए भी ब्रह्मानन्द को छोड़ कर, बाहर
निकल आता है अर्थात् जाग पड़ता है ।
कर्म जन्मान्तरेऽभूद् यत् तद्योगाद् बुध्यते पुनः ।
इति कैवल्यशाखायां कर्मजो बोध ईरितः ॥७३॥
पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः इस
कैवल्यशाखा में कहा गया है कि—जन्मान्तर में किये हुए कर्मों
से यह प्राणी फिर जागरण में आ जाता है । अर्थात् जागरण
अवस्था यों ही बिना कारण के नहीं आजाती किन्तु यह कर्मज है ।
कंचित्कालं प्रबुद्धस्य ब्रह्मानन्दस्य वासना ।
अनुगच्छेद् यतस्तूष्णीमास्ते निर्विषयः सुखी ॥७४॥
[सुप्ति में ब्रह्मानन्द भोगना मिलजाता है इसका चिह्न भी
सुनलो]—जब आदमी जाग जाता है तब भी थोड़ी देर तक
सुषुप्ति में जिस ब्रह्मानन्द का अनुभव उसने किया था उसी
के संस्कार चालू रहते हैं। जभी तो जागने के प्रारम्भ में बिना
ही विषय के सुखी होकर यह प्राणी चुपचाप बैठा रहता है
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५
[ इसी से जानते हैं कि उस ने ब्रह्मानंद को भोगा था और अब
भी उसके संस्कारों से वह सुखी हो रहा है ]
कर्मभिः प्रेरितः पश्चान्नानादुःखानि भावयन् ।
शनै र्विस्मरति ब्रह्मानन्दमेषोऽखिलो जनः ॥७५॥
[फिर सदा मौन होकर ही क्यों नहीं बैठा रहता इसका
कारण भी सुन लो] पूर्वोक्त कर्मों से प्रेरित हुए सभी प्राणी पीछे
से जब संसार के नाना दुःखों की भावना करने लगते हैं तब
फिर ये सभी प्राणी धीरे धीरे [हाय ! हाय ! उस जगज्जीवन]
ब्रह्मानन्द को भूल जाते हैं ।
प्रागूर्ध्वमपि निद्रायाः पक्षपातो दिने दिने ।
ब्रह्मानन्दे नृणां, तेन प्राज्ञोऽस्मिन् विवदेत कः ॥७६॥
[ब्रह्मानन्द में संशय न करने का एक यह भी कारण है
कि] सभी मनुष्यों को नींद से पहले और नींद के पीछे ब्रह्मा-
नन्द में स्नेह बना रहता है [जभी तो निद्रा के आदि में कोमल
शय्या आदि का संपादन करते हैं। निद्रा समाप्त हो जाने पर
उस ब्रह्मानन्द को न छोड़ने के कारण चुप चाप बैठे रहते हैं]
ऐसी अवस्था में कौन समझदार होगा जो इस आनन्द में
विवाद करेगा ?
ननु तूष्णीं स्थितौ ब्रह्मानन्दश्चेद् भाति, लौकिकाः।
अलसाश्चरितार्थाः स्युः, शास्त्रेण गुरुणात्र किम् ॥७७॥
जो ब्रह्मानन्दानुभव गुरुशुश्रूषा आदि प्रयासों से मिला
करता है वह अगर चुप रहने मात्र से किसी को मिल सकता
हो तब तो लौकिक पामर लोग तथा आलस में पड़े रहने वाले
४४६ पञ्चदशी
अहदी लोग सभी कृतार्थ हो जाने चाहिये । फिर श्रवणादि
परिश्रम की क्या आवश्यकता रह जायगी ?
बाढं, ब्रह्मेति विद्युश्चेत् कृतार्था स्तावतैव ते ।
गुरुशास्त्रे विनात्यन्तं गम्भीरं ब्रह्म वेत्ति कः ॥७८॥
‘यह ब्रह्मानन्द है’ ऐसा यदि कोई उनमें से पहचान जाय
तो वह अवश्य ही कृतार्थ हो कर रहे । परन्तु गुरु और शास्त्र
के बिना [मन वाणी से अगम्य सर्वज्ञ सर्वान्तर सर्वात्मरूप]
उस गम्भीर ब्रह्म को और किस उपाय से कौन जान सकता
है ? [अर्थात् गुरु और शास्त्र के बिना इस तत्व का पता नहीं
चलता]
जानाम्यहं त्वदुक्त्याद्य कुतो मे न कृतार्थता ।
शृण्वत्र त्वादृशो वृत्तं प्राज्ञंमन्यस्य कस्यचित् ॥७९॥
यदि यह पूछा जाय कि—तुम्हारे कहने से मैं ब्रह्मानन्द
को जान तो गया हूँ परन्तु मैं कृतार्थ क्यों नहीं हो पाया हूँ ?
इसके उत्तर में अपने जैसे किसी प्राज्ञाभिमानी का वृत्तान्त सुन
लीजिये ।
चतुर्वेदविदे देयमिति शृण्वन्नवोचत ।
वेदाश्चत्वार इत्येवं वेद्मि मे दीयतां धनम् ॥८०॥
किसी तुम्हारे जैसे ने यह सुना था कि—चतुर्वेदज्ञ को
यह बहुत सा धन दे दो । बस इस बात को सुन कर वह कह
उठा कि वेद चार हैं यह तो मैं जानता ही हूँ और यों मैं चतु-
र्वेदज्ञ हो गया हूँ, इस कारण यह धन मुझे ही दे दो [ इसी
तरह तुम भी कहते हो कि मैं ब्रह्मज्ञ हो गया हूँ मैं कृतार्थ क्यों
नहीं हुआ ?]
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७
संख्यामेवेष जानाति न तु वेदानशेषतः ।
यदि तर्हि त्वमप्येवं नाशेषं ब्रह्म वेत्सि हि ॥८१॥
यह तो संख्या को ही जानता है, वेदों के स्वरूप को यह
सम्पूर्ण रीति से नहीं जानता है, ऐसा यदि तुम कहो तो हम
कहेंगे कि तुम भी तो ऐसे ही सम्पूर्ण ब्रह्म को नहीं जानते हो ।
अखण्डैकरसानन्दे मायातत्कार्यवर्जिते ।
अशेषत्वसशेषत्ववार्ताविसर एव कः ॥८२॥
[शंका करने वाला कहता है] जो अखण्ड एक रस आनन्द
है, जिसमें माया और उसका कार्य कुछ भी नहीं है, उसमें
सम्पूर्ण और अधूरे की बात को अवसर ही कहाँ है ?
शब्दानेव पठस्याहो तेषामर्थं च पश्यसि ।
शब्दपाठेऽर्थबोधस्ते संपाद्यत्वेन शिष्यते ॥८३॥
[उत्तर] 'अखण्डैकरस' 'अद्वितीय' 'सच्चिदानन्दरूप' इत्यादि
शब्द ही शब्द कहना जानते हो अथवा उनका जो स्वगतादि-
भेदशून्यता रूपी गम्भीर अर्थ है उसको भी पहचानते हो ?
क्योंकि मुख से शब्दों का उच्चारण कर देने पर भी तुम्हें अर्थ
बोध करना शेष रह ही जाता है ।
अर्थे व्याकरणाद् बुद्धे साक्षात्कारोंऽवशिष्यते ।
स्यात् कृतार्थत्वधीर्यावत् तावद् गुरुमुपास्व भोः ॥८४॥
व्याकरणादि से परोक्षज्ञान जब कर लिया जाता है, तब भी
संशयादि को हटा कर प्रत्यक्ष करना शेष रह ही जाता है। जब
तक तुम्हारी बुद्धि तुम्हें अपने कृतार्थ होने का नीरव संदेश न
सुनादे तब तक तुम गुरु की उपासना करते रहो। [जब कृतार्थत्व
बुद्धि उत्पन्न हो जाय तभी ज्ञान की सम्पूर्णता समझ लेना]
१४८ पंचदशी
आस्तमेतद् यत्र यत्र सुखं स्याद् विषयैर्विना ।
तत्र सर्वत्र विद्ध्येतां ब्रह्मानन्दस्य वासनाम् ॥८५॥
इस सब को यहीं छोड़कर अब प्रकृत बात कहते हैं कि—
जहां जहां [ तूष्णींभाव आदि के समय ] विषयानुभव के बिना
भी सुख होता हो वहां सभी जगह इस ब्रह्मानन्द की वासना को
समझ लो ।
विषयेष्वपि लब्धेषु तदिच्छोपरमे सति ।
अन्तर्मुखमनोवृत्तावानन्दः प्रतिबिम्बति ॥८६॥
विषयों के मिल जाने पर भी जब उन विषयों की इच्छा
शान्त हो जाती और मन अन्तर्मुख होता है तब उस अन्तर्मुख
मन में इसी आनन्द का प्रतिबिम्ब पड़ा करता है । [ यही
'विषयानन्द' किंवा दुनियादारी का सुख कहाता है ]
ब्रह्मानन्दो वासना च प्रतिबिम्ब इति त्रयम् ।
अन्तरेण जगत्यस्मिन्नानन्दो नास्ति कश्चन ॥८७॥
'ब्रह्मानन्द' 'वासनानन्द' तथा 'विषयानन्द' इन तीन
आनन्दों के बिना जगत् में कोई आनन्द ही नहीं है ।
'ब्रह्मानन्द' वह है जो सुषुप्ति में स्वप्रकाशरूप से भासा
करता है । 'वासनानन्द' वह है जो कि चुप बैठने पर विषयानु-
भव के बिना ही प्रतीत हुआ करता है। अभिलषित विषय
के मिलने पर जब कि मन अन्तर्मुख हो जाया करता है तब
जो उसमें आत्मानन्द का प्रतिबिम्ब हो जाता है वह तो
'विषयानन्द' कहाता है ।
शंका—इसी प्रकरण के ११ वें श्लोक में “आनन्दस्त्रिविधो 'ब्रह्मा-
नन्दो' 'विद्यासुखं' तथा 'विषयानन्दः” इस प्रकार तीन तरह का आनन्द
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९
बताया है । अब यहां ब्रह्मानन्द वासनानन्द और आनन्द का प्रतिबिम्ब
नों नये ही तीन भेद कर दिये हैं। यह पूर्वोत्तर विरोध है। इसके अति-
रिक्त इसी प्रकरण के 'यावद्यावदहंकार'इस ९८ वें श्लोक में तथा'तादृक्
प्रमान्' इस १२१ वें श्लोक में निजानन्द और मुख्यानन्द का भी वर्णन
है। तथा अगले आत्मानन्द प्रकरण में 'मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासु मात्मानन्देन
बोधयेत्'उससे भिन्न ही आत्मानन्द का वर्णन आया है। अद्वैतानन्द के
पहले श्लोक में योगानन्द नाम का भेद भी मालूम हो रहा है। अद्वैता-
नन्द के १०५ श्लोक में अद्वैतानन्द एक नया ही भेद देख रहे हैं। ऐसी
अवस्था में इन तीनों आनन्दों के अतिरिक्त और कोई आनन्द है ही
नहीं" यह कहना विरुद्ध प्रतीत होता है। उत्तर-अन्तःकरण वृत्तिरूप
होने के कारण से विद्यानन्द भी विषयानन्द में ही अन्तर्भूत हो जाता है।
तथा निजानन्द मुख्यानन्द आत्मानन्द योगानन्द और अद्वैतानन्द नाम
के सभी आनन्द ब्रह्मानन्द से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसी प्रकरण के
९८ वें श्लोक में जिस निजानन्द का वर्णन है वह भी ब्रह्मानन्द से अति-
रिक्त तत्व नहीं है क्योंकि इससे अगले १०० वें श्लोक में इस निजानन्द
को ही ब्रह्मानन्द कहा है। मुख्यानन्द भी ब्रह्मानन्द ही है क्योंकि आगे
आनन्दवासना की उपेक्षा करके मुख्यानन्द की भावना, तत्पर होकर
करने की बात कही है यों इस में ब्रह्मानन्द को ही मुख्यानन्द कहा है।
आत्मानन्द और अद्वैतानन्द तो ब्रह्मानन्द ही है। इस कारण ब्रह्मानन्द
वासना और प्रतिबिम्ब वाला भेद ठीक ही है।
तथा च विषयानन्दो वासनानन्द इत्ययम् ।
आनन्दौ जनयन्नास्ते ब्रह्मानन्दः स्वयंप्रभः ॥८८॥
यों आनन्द के तीन प्रकार का होने पर भी जो स्वयंप्रकाश
आनन्द 'विषयानन्द' को और 'वासनानन्द' को उत्पन्न किया
करता है उसी को 'ब्रह्मानन्द' जानना चाहिये।
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४५० पञ्चदशी
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यः स्वप्रकाशचिदात्मके ।
ब्रह्मानन्दे सुप्तिकाले सिद्धे सत्यन्यदा शृणु ॥८९॥
सुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति इत्यादि 'श्रुतियों'
से, 'मैं सुख पूर्वक सोया था' इत्यादि परामर्श के और तरह से
न हो सकने वाली 'युक्ति' से तथा सुषुप्ति के 'अनुभव' से अब
तक यह सिद्ध किया जा चुका है कि सुषुप्ति काल में स्वयंप्रकाश
ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में भी ब्रह्मानन्द को
जानने का जो उपाय है उसका वर्णन किया जायगा उसे सुन लो।
य आनन्दमयः सुप्तौ स विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥९०॥
सुषुप्तिकाल का जो उपरिवर्णित 'आनन्दमय' है, वह जब
विज्ञानमयता को पाता है तब फिर स्थानभेद के कारण कर्मानु-
सार 'स्वप्न' या 'जागरण' में आता है ।
नेत्रे जागरणं कण्ठे स्वप्नः सुप्तिर्हृदम्बुजे ।
आपादमस्तकं देहं व्याप्य जागर्ति चेतनः ॥९१॥
(नेत्र में 'जागरण' रहता है कण्ठ में 'स्वप्न' होता है हृदय
कमल में 'सुषुप्ति' होती है ।) यह जीव केवल नेत्र ही नहीं किन्तु
पैर से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त करके जागा करता है ।
आत्मा का स्वाभाविक स्थान हृदय है परन्तु अहंकार और
ममता की प्रेरणा से जब वहां नहीं रहा जाता तब आत्मा का
प्रतिबिम्ब विषयभोगलिप्सा के लिये मलिन हो जाता है तब
जाग्रत अवस्था में तो नेत्र तथा स्वप्न अवस्था में कण्ठ उस के
निवास स्थान बन जाते हैं ।
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१
देहतादात्म्यमापन्नस्तप्तायःपिण्डवत्ततः।
अहं मनुष्य इत्येवं निश्चित्यैवावतिष्ठते ॥९२॥
[ देह को व्याप्त करने की रीति यह है कि] तपे हुए लोह-
पिण्ड के साथ जैसे अग्नि का तादात्म्य हो जाता है इसी तरह
मनुष्य जाति वाले देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर 'मैं
मनुष्य हूँ' यह निश्चय करके बैठ जाता है। [ फिर उसे अपने
मनुष्य होने में थोड़ा सा भी संशय नहीं रहता ]
उदासीनः सुखी दुःखी त्यवस्थात्रयमेत्यसौ ।
सुखदुःखे कर्मकार्ये, त्वौदासीन्यं स्वभावतः ॥९३॥
[देह के साथ तादात्म्याभिमान कर लेने के कारण] यह जीव
उदासीन, सुखी, दुःखी इन तीन अवस्थाओं को प्राप्त होता है,
इन तीनों अवस्थाओं में से सुख और दुःख ये दोनों कर्मजन्य
हैं [अर्थात् सुखी या दुखीपन भी कर्मजन्य ही है] परन्तु
औदासीन्य तो स्वभाव से ही होता है [जब कर्म बन्द हो जाता
है तब उदासीनता स्वभाव से ही आ जाती है। उसके लिए
कर्म की आवश्यकता नहीं होती।]
बाह्यभोगान् मनोरज्यात् सुखदुःखे द्विधा मते ।
सुखदुःखान्तरालेषु भवेत् तूष्णीमवस्थितिः ॥९४॥
'बाह्य भोग' तथा 'मनोराज्य' से दो दो प्रकार सुख दुःख
होते हैं [ एक बाह्य भोगों से मिलने वाले सुख दुःख दूसरे
मनोराज्य से मिलने वाले सुख दुःख] परन्तु कभी कभी ऐसा
भी होता है कि न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। सुखों
और दुःखों के बीच बीच चुप रहने की अवस्था आती है।
४५२ पञ्चदशी
न कापि चिन्ता मेऽस्त्यद्य सुखमास इति ब्रुवन्।
औदासीन्ये निजानन्दभानं वक्त्यखिलो जनः ॥९५॥
जब कोई मनुष्य यह कहता है कि आज मुझे कुछ भी
चिन्ता नहीं है, इस लिये आज मैं सुख पूर्वक बैठा हूँ, तब वह
दूसरे शब्दों में यह स्वीकार कर रहा है कि उदासीनता के
समय स्वरूपानन्द की स्फूर्ति हुआ करती है [इससे यह जान
लेना चाहिय कि जागरण काल में भी आत्मानन्द का भान
प्राणियों को होता ही है।]
अहमस्मीत्यहंकारसामान्याच्छादितत्वतः।
निजानन्दो न मुख्योऽयं, किन्त्वसौ तस्य वासना ॥९६॥
[इस आनन्द को ब्रह्मानन्द न मानकर वासनानन्द ही
मानने का कारण भी सुन लो] यह उपर्युक्त आनन्द 'मैं हूँ' ऐसे
एक सामान्य [सूक्ष्म] अहंकार से आवृत रहता है [इस आनन्द
को भोगते समय अपने 'देवदत्तादिपने' का विचार नहीं रहता
किन्तु मैं हूँ ऐसा एक सामान्य (अस्पष्ट) अहंकार बना रहता
है] इस कारण यह आनन्द मुख्य आनन्द नहीं है। किन्तु यह
तो मुख्यानन्द की वासना है। [इसी से इसको 'वासनानन्द'
कहते हैं।] मुख्य आनन्द में मैं हूँ ऐसा अहंकार नहीं रहना
चाहिये।
नीरपूरितभाण्डस्य बाह्ये शैत्यं न तज्जलम्।
किन्तु नीरगुणस्तेन नीरसत्तानुमीयते ॥९७॥
जल से भरा हुआ जो घड़ा है, उसके बाहर की ओर जब
स्पर्श करते हैं, तब जो शैत्य प्रतीत होता है, वह शैत्य 'जल'
नहीं है [क्योंकि उसमें द्रवपना नहीं पाया जाता।] वह शैत्य
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
तो जल का गुण है। उस शैत्य से तो जल के होने का अनु-
मान भर हुआ करता है।
यावद्यावदहङ्कारो विस्मृतोऽभ्यासयोगतः ।
तावत्तावत्सूक्ष्मदृष्टे र्निजानन्दोऽनुमीयते ॥९८॥
[प्रकृत बात तो यह हुई कि] निरोध समाधि के अभ्यास
से जितना जितना अहंकार का विस्मरण होता जायगा—अहम्
आदि वृत्तियें विलीन होती जायंगी और योगी के चित्त में
सूक्ष्मता आती जायगी] उतना ही उतना निजानन्द अनुभव में
आने लगेगा अथवा उतना ही उतना निजानन्द व्यक्त होने
लगेगा ऐसा अनुमान से जाना जाता है।
अनुमान यों करना चाहिए—जिन क्षणों में हम अहंकार
का संकोच करने बैठते हैं, उनमें पिछले पिछले क्षणों में, पहले
पहले क्षणों से अधिक आत्मानन्द आविर्भूत होता जाता है।
क्योंकि अहंकार का संकोच करने वाले क्षणों की लम्बाई उत्त-
रोत्तर बढ़ती ही जाती है। अहंकार के विस्तार ने आत्मानन्द
को ढक रक्खा था। अब अहंकार का संकोच होने से वह
निजानन्द उघड़ने लगता है—फैलने लग पड़ता है। तात्पर्य यह
है कि—जैसे जैसे अहंकार का संकोच बढ़ने लगेगा तैसे तैसे
निजानन्द भी बढ़ता ही जायगा।
सर्वात्मना विस्मृतः सन् सूक्ष्मतां परमां व्रजेत् ।
अलीनत्वान्न निद्रैषा ततो देहोऽपि नो पतेत् ॥९९॥
जब अहंकार का विस्मरण पूर्णरूप से हो जाता है तब यह
परम सूक्ष्म हो जाता है [सब वृत्तियों के विलीन हो जाने पर
भी] अन्तःकरण का स्वरूप विलीन नहीं होता इसलिए उसे
४५४ पञ्चदशी
निद्रा नहीं कह सकते [निद्रा तो वही है जब कि बुद्धि कारण
रूप में पहुँच गई हो] अन्तःकरण के स्वरूप का विलय न होने
से ही योगी का देह निद्रा की तरह गिर नहीं पड़ता [इससे
समझ लेना चाहिए कि अन्तःकरण का स्वरूप अभी विलीन
नहीं हुआ है।]
न द्वैतं भासते नापि निद्रा तत्रास्ति यत् सुखम् ।
स 'ब्रह्मानन्द' इत्याह भगवानर्जुनं प्रति ॥१००॥
गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा
है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय, और नींद भी
न आय, उस समय जो सुख किसी को भासता हो, बस वही
'ब्रह्मानन्द' है।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१०१॥
गीता के ब्रह्मानन्दबोधक वे श्लोक ये हैं—धीर बुद्धि के
सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना करो। जब मन
को आत्मसंस्थ कर चुको [जब मन को यह निश्चय करा चुको
कि यह सब कुछ आत्मा ही है 'आत्मा से भिन्न यह कुछ भी
नहीं है'] तब बस फिर कुछ भी न सोचो। [यह तो योग की
अन्तिम हालत है।]
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥१०२॥
[ऐसी ऊँची अवस्था को जो योगी लाना चाहें वह पहले
यह करें कि] जो मन [स्वभाव दोष से ही] चंचल है, जो अस्थिर
है [जो एक विषय में बंध कर कभी नहीं रहता] ऐसा मन जिस
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५
जिस शब्दादि कारण को लेकर बाहर निकल पड़ता हो, उस
उस शब्दादि की ओर से उसे रोक कर [ उन उन शब्दादियों
के मिथ्यात्व आदि दोष दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश
देकर, वहाँ से हटा कर] आत्मा के वश में करता जाय। [इस
प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा
में ही शान्त होने लगेगा । ]
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥१०३॥
[ मन के शान्त होने पर जो होता है उसे भी सुन लो ।
संसार की मोह ममता आदि ही बड़े क्लेश कहाते हैं। ये क्लेश
रजोगुण से उत्पन्न होते हैं] वह रजोगुण जिसका शान्त हो
चुका हो, इसी कारण जिसका मन प्रशान्त हो गया हो [ जिसके
मन में विक्षेपों का उठना सर्वथा रुक गया हो। 'यह सब ब्रह्म
ही है' इस निश्चय के कारण] जिसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो गई
हो जो [जीवन्मुक्त हो गया हो] जो अकल्मष अर्थात् धर्माधर्म
से छूट चुका हो, ऐसे इस योगी को ही उत्तम सुख मिलता
है [अर्थात् उस सुख के क्षय हो जाने या उसस अधिक सुख
के होने का दोष नहीं होता । ]
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥१०४॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ॥१०५॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥१०६॥
४५६ पञ्चदशी
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥१०७॥
[ऊपर के संक्षिप्त अर्थ को गीता में ही विस्तार पूर्वक यों
समझाया गया है कि] जिस समय चित्त योगसेवा के प्रताप
से सब विषयों से हटकर उपराम को पा लेता है, जिस समय
समाधिभावना से शुद्ध किये हुए अन्तःकरण के द्वारा आत्मा
अर्थात् ज्योतिः स्वरूप पर चैतन्य को देख देख कर [विषयों
में नहीं किन्तु] अपने आप में ही तुष्ट होने लगता है॥१०४॥
जिस समय आत्मा में स्थित हुआ यह योगी आत्यन्तिक
[अर्थात् अनन्त] तथा केवल बुद्धि से गृहीत होने वाले अतीन्द्रिय
[अर्थात् इन्द्रियों की पकड़ में न आने वाले किंवा विषयों से
उत्पन्न न होने वाले ऐसे किसी अपूर्व] सुख का अनुभव किया
करता है। उस आत्मा में स्थित हुआ यह योगी उस आत्म तत्व से
च्युत नहीं होता [अर्थात् उसे कभी नहीं भूलता] ॥१०५॥ जिस
आत्मा को पाकर दूसरे लाभों को उससे अधिक मानना छोड़
देता है, जिस आत्मतत्व में स्थित हुआ यह योगी बड़े भारी
दुःखों से भी [शस्त्रों के भयंकर घावों से भी—प्रह्लाद के समान]
विचलित नहीं होता ॥१०६॥ दुःखों के संयोगों का वियोग
कर देने वाली उस पवित्र अवस्था को ही 'योग' जान लो।
जिस 'योग' का वर्णन पहले कर चुके हैं उस 'योग' को निश्चय
[अर्थात् अध्यवसाय] से निर्वेद रहित मन से करना
चाहिए ॥१०७॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥१०८॥
द्वैतानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५७
द्वैतानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५७
विगतकल्मष अर्थात् योग में आने वाले विघ्नों को पार कर
डालने वाला यह योगी, सदा ऊपर कही रीति से आत्मा का
अनुसन्धान करता करता करता, बिना ही प्रयास के ब्रह्म सम्बन्धी
[अर्थात् अविनाश्वर सर्वातिशायी ] सुख को पा लेता है ।
उत्सेक उदधे र्यद्वत् कुशाग्रेणैकविन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद् भवेदपरिखेदतः ॥१०९॥
कुशाग्र से उठाई हुई एक एक बूंद से समुद्र का उत्सेक
अर्थात् बहिःसेचन किया जाय तो यह किसी समय में जाकर
तभी हो सकता जब कि इस काम से कभी भी खिन्न न हुआ
जाय और इस काम को लगातार जारी रखा जाय । ठीक इसी
प्रकार मन का निग्रह भी यदि अखिन्न होकर किया जाय तो काल
पाकर हो ही सकता है। [इस रीति से समुद्र को सुखा डालने
का जैसा पक्का धीरज टिट्टिभी में था वैसा दृढ निश्चय करके यदि
कोई बैठ जाय तभी मन का निग्रह किया जा सकता है]
एक टिट्टिभी के अण्डों को समुद्र ने बहा लिया था। अपने
अण्डों को निकालने के लिए उस टिट्टिभी ने समुद्र को सुखा-
देने का निश्चय किया । अब वह अपनी चोंच में एक एक बूंद
लाती थी और समुद्र से बाहर डाल जाती थी। उस टिट्टिभी
में उस बड़े समुद्र को सुखा देने का इतना लम्बा अखण्ड धीरज
था। वैसा लम्बा अखण्ड धीरज जिन साधकों में होगा वे ही
मन का निग्रह कर सकेंगे। जो तो यह सोचते होंगे कि हमें
प्रयत्न करते करते महीनों बीत गए अभी तक मनोनिग्रह नहीं
हो पाया ऐसे अधीर साधक लोग इस मार्ग में अवश्य ही निराश
होंगे।
४५८ पञ्चदशी
बृहद्रथस्य राजर्षेः शाकायन्यो मुनिः सुखम् ।
प्राह मैत्रारूयशाखायां समाध्युक्तिपुरःसरम् ॥११०॥
गीता में ही नहीं मैत्रायणी शाखा में भी शाकायन्य नाम
के किसी मुनि ने, अपने शिष्य बने हुए बृहद्रथ राजर्षि के प्रति
ब्रह्मसुख का कथन समाधि का वर्णन करके किया है।
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति ।
तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥१११॥
[उस में कहा गया है कि] ईधन को जला चुकने वाली
अग्नि जैसे अपने कारण [अग्नि] में ही शान्त हो जाती है
[अपने लपट आदि विशेष आकारों को छोड़ कर केवल अग्नि
मात्ररूप में आ जाती है] ठीक इसी प्रकार यह अन्तःकरण भी
निरोध समाधि का अभ्यास करने से राजस आदि सब वृत्तियों
के नष्ट हो जाने के कारण अपनी योनि अर्थात् केवल सत्त्वरूप
में शान्त हो जाता है [उस समय सत्व ही सत्व शेष रह जाता
है अन्तःकरण नहीं रहता]
स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यकामिनः ।
इन्द्रियार्थविमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥११२॥
जो मन सत्यकामी हो चुका है, [सत्य आत्मा के सिवाय
जिसे और किसी की कामना ही नहीं रह गयी है इसी कारण]
जो अपने कारण में शान्त हो बैठा है इसी लिए शब्दादि विषय
की ओर से जिसने अपना मुख मोड़ लिया है [जो बाह्यज्ञान
से शून्य हो गया है] ऐसे [संस्कारी] मन की दृष्टि में कर्म के
वश से प्राप्त होने वाले [साधनों के अधीन] सुखादि अनृत हो