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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पंचभूत का संक्षेप १३

चित्तों को अनन्त शान्तिदायक अखण्ड एकरस तत्व भी भयानक
दीखता है। बालक जैसे जंगल में डरता है इसी तरह अखण्ड तत्व
से भी कई लोगों को भय लगता है। परन्तु उनके डरने का कोई
भी उचित कारण नहीं है। जब कोई समाधि करता है और जब
निश्चित हो जाने की गम्भीर अवस्था आती है और तूष्णींभाव
का उदय होता है, तब उस अखण्ड सद्वस्तु का अनुभव साधकों
को स्पष्ट ही होता है। 'उस समय तो कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा
विचार ठीक नहीं है, क्योंकि शून्य (कुछ नहीं) को जानने वाला
जो कोई तत्त्व है उसको 'कुछ भी नहीं' कहना अनुचित है। शून्य
को तो शून्य का ज्ञान होता ही नहीं है। जब हम निर्मनस्क
होते हैं, उस निर्मनस्क अवस्था का जो साक्षी है, वही तत्त्व सत्
पदार्थ है। इस सत् में इस पसारे को फैलाने की जो शक्ति रहती
है, वह न तो असत् ही है, क्योंकि प्रतीत होती है और न सत्
ही है, क्योंकि वह सदा नहीं रहती। उसकी बाधा हो जाती है।
देवदत्त में देवदत्त की शक्ति भी रहती है, परन्तु शक्ति को और
देवदत्त को दो नहीं गिना जाता। ये दोनों मिल कर एक ही गिने
जाते हैं। इसी तरह ब्रह्म और उसकी शक्ति दो तत्व नहीं गिने
जाते। कहने का तात्पर्य यह है शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता
है। जैसे शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है, ठीक इसी तरह
शक्ति के जो स्थूल कार्य (पृथिव्यादि) हैं उनसे भी द्वैत की शंका
को अवकाश नहीं है। उस शक्ति से, सब से प्रथम आकाश
उत्पन्न हुआ। उसमें जो सत्ता है वह इस सत् से ही आई है। सत्
का ही आकाश बन गया है। 'आकाश की सत्ता' ऐसा कहना
दार्शनिक भूल है। यह सत्ता वायु आदि अगले भूतों में भी गई
है। आकाश उनमें नहीं गया, इसी कारण कहते हैं कि आकाश

१४ पंचदशी
और सत्ता भिन्न भिन्न तत्त्व है । आकाश में से सत्ता को पृथक्
कर लो फिर बताओ आकाश का क्या रूप रह गया है ? सत् से
भिन्न होने के कारण वह तो अब निश्चय ही असत् है। असत् होने
पर भी प्रतीत हो रहा है, यही तो माया का चमत्कार है। आकाश
तो कभी सत् हो ही नहीं सकता और सद्वस्तु में कहीं जरा सा
भी स्थान नहीं है कि उसके अन्दर आकाशादि अन्य पदार्थ समा
सकें। इसीलिये तत्त्वज्ञानी की दृष्टि जब आकाश पर पड़ेगी, तब
वह उसे निस्तत्त्व समझेगा और जब सद्वस्तु पर उसका ध्यान
जायगा तब वह उसे निश्छिद्र किंवा निरन्तर ही समझेगा। यों
प्रत्येक भूत और प्रत्येक भौतिक पदार्थ की असत्ता पर जब
बार बार विचार चलेगा, तब अद्वैत के सत्य होने की बात दृढ़तर
होती जायगी। परन्तु ध्यान रहे कि इस असत्यवासना का
प्रभाव व्यवहार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। वह तो पहले जैसा
ही चलता जायगा। व्यवहार को बन्द कर देने का जो एक वृथा
विचार नवीन साधकों को हो जाता है वह भूल होती है। होना
यह चाहिये कि जो व्यवहार अब तक अपने संकीर्ण दृष्टिकोण
से चल रहा था वही अब व्यापक जगदात्मा के दृष्टिकोण से
चलना चाहिये । इस ज्ञान से पदार्थों का स्वरूप बदल नहीं
जाता है। यह ज्ञान तो केवल हमारे दृष्टिकोण को बदलता है।
ज्ञानी के व्यवहार में अवश्य ही कुछ ऐसा चमत्कार आ जाना
चाहिये कि उसका व्यवहार आकर्षक हो, सदय हो, नमूने का
हो, अनुकरणीय हो, लोकहित में बाधा न डालता हो। ऐसा
जिसका व्यवहार हो वही ज्ञानी है। उस ज्ञानी की जिस परिमाण
से द्वैत की अवज्ञा (अनादर) दृढ़ होगी उसी परिमाण से अद्वैत में
बुद्धि ठहरेगी। यह बुद्धि जब ठहर चुकेगी और संसार समुद्र की

पंचभूतविवेक का संक्षेप १५

पंचभूतविवेक का संक्षेप १५

कूलंकष लहरें भी जब इस बुद्धि रूपी तट को तोड़ फोड़ नहीं
सकेंगी तब यह पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहाने लगेगा। पाँचों भूत
या पाँचों भूतों से बना हुआ कोई भी पदार्थ 'जब दीखे तभी
उसके सत्य तत्त्व पर दृष्टि पड़ने लगे और उसमें ही जमने भी
लगे तो यही 'द्वैतावज्ञा' कहाती है। यही 'अद्वैत बुद्धि' कही
जाती है और उसे ही 'ब्राह्मी स्थिति' भी कह देते हैं। मरते समय
भी एक क्षण भर के लिये भी यदि किसी को ऐसी उदार स्थिति
हाथ लग जाय तो उसकी मुक्ति अवश्यंभाविनी है। फिर जो
बड़भागी बचपन से ही इस शुभ स्थिति में जमने लगा हो, उसके
विषय में तो पूछते ही क्या हो ? क्योंकि मरते समय जो भ्रान्ति
नष्ट हुई है वह भ्रान्ति फिर कभी भी लौट कर नहीं आयेगी।
मृत्यु को तो इस लोक और परलोक की मध्य सीमा मानते हैं।
उस सीमा पर जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में
उसकी परलोक यात्रा की पूँजी ही जल भुन कर राख हो जायगी।
जिस पुरुष को उपर्युक्त प्रकार की द्वैतावज्ञा स्थित हो गई हो,
जिसे ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो, वह महामना खाट पर
सड़ कर, भूमि पर लोट कर, पूर्ण स्वस्थ रह कर या मूर्च्छावस्था
में प्राणों का त्याग भले ही कर दे, उसे फिर भ्रान्ति कभी भी
नहीं होगी। मूर्च्छा आदि के कारण तत्व का विचार न कर सकने
पर भी ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं हो जाता है। क्या भला कहीं
पढ़ा लिखा आदमी नींद आ जाने से कुपढ़ा हो जाता है ? जिस
महाविद्या को प्रमाणों ने बड़े परिश्रम से जगाया है, वह विद्या
अब कभी भी नष्ट होने वाली नहीं है। क्योंकि वेदान्तों से प्रवल
तो कोई प्रमाण ही नहीं है। वेदान्तों के बताये जिस अद्वैत का
पूर्ण अनुमोदन साधक के अनुभव ने कर दिया है उस अद्वैत की

१६ पंचदशी
बाधा करने को दूसरा प्रमाण कहाँ से आयेगा ? अनुभव से-अपने
तजुर्बे से-बड़ा तो कोई प्रमाण ही नहीं होता। इस प्रकार सत्
जो अद्वैत है और अनृत जो द्वैत है, इन दोनों को हिलामिला
कर जो एक मिश्रण बना लिया गया है, इस मिश्रण को जब
सर्वथा अलगा दिया जाय, जब इन दोनों को अलग अलग समझ
लिया जाय, तो निर्वाण पद किसी के भी रोके रुक नहीं सकेगा।
सारांश यही हुआ कि पंचभूत विवेक करने पर जिस वेदान्त-
सिद्ध अद्वैत का ज्ञान होगा, उसकी बाधा अन्तकाल में भी नहीं
हो सकेगी और विदेहमुक्ति मिल कर ही रहेगी।

3. Pancha Kosha Viveka

[ ३ ]
पंचकोशविवेक का संक्षेप
पंचकोशविवेक नाम के तीसरे प्रकरण में बताया गया है
कि देह, देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
कर्ता [विज्ञान], कर्ता से अन्दर भोक्ता [ आनन्दमय ] बस यह
परम्परा ही तो आत्मा के छिपने की 'गुहा' कहाती है । इस
गुहा में जो ब्रह्म तत्व छिप सा गया है, उसे तो हम तभी जान
सकते हैं, जब कि पहले इन ऊपर के पांचों कोशों का विवेक कर
लें । इस लिये आइये अब नारियल के छिलकों की तरह उन
पांचों कोशों को ही छील कर फेंक दें और गुहाहित ब्रह्मतत्व के
दर्शन करें—
यों तो जैसे ये अन्न, प्राण, मन, बुद्धि और आनन्द नाम
के कोश, आत्मतत्व को ढके बैठे हैं, प्रकट नहीं होने दे रहे हैं,
ठीक उसी तरह ये उसका दर्शन कराने में साधन भी तो हैं । ये
बन्ध भी करते हैं और मोक्ष भी दिलाते हैं । नारियल का छिलका
जैसे नारियल को ढके रहता है, इसी प्रकार नारियल को पाने
की जगह भी तो वही है । जिन पंचकोशों ने आत्मतत्व पर
परदा डाला है, उस तत्व के दर्शन भी तो उन्हीं के अन्दर होते
हैं । यदि ये पंचकोश न हों, तो किसी को आत्मतत्व का ध्यान
भी नहीं आ सकता । उस ब्रह्मतत्व के दर्शन की रीति यह है
कि देह से लेकर आनन्द पर्यन्त जो भी पदार्थ दीख रहे हैं, वे
सब इस प्रकरण में कही रीति से आत्मा नहीं है । किन्तु इन सब
को देखने वाला, स्वयं कभी भी न दीखनेवाला, जो तत्व है,

१८ पंचदशी
वही तो आत्मा है। आत्मा के न दीखने का यह कारण कदापि
नहीं है कि आत्मा नाम का कोई पदार्थ है ही नहीं, किन्तु उसके
न दीखने का कारण यह है कि वह तो स्वयं ही दीखनारूप है।
जैसे गुड़ को मीठा नहीं किया जा सकता, इसी प्रकार आत्मा
को भी देखा नहीं जा सकता। यों भले ही वह आत्मतत्व किसी
के अनुभव में न आता हो, परन्तु उसकी ज्ञानरूपता में तो लेश-
मात्र भी ठेस नहीं लग सकती है। जिस मूर्ख को तो सब के
जानने वाले उस ज्ञान का ही अनुभव किसी भी तरह न होता
हो, उस मिट्टी के ढेले को भला कौन समझा सकेगा ? जो मन्द
पुरुष ज्ञान को ही नहीं समझ रहा है,उसको ज्ञात [ज्ञान के विषयों ]
का अनुभव भी कैसे हो सकेगा ? “मेरे मुँह में जीभ नहीं है”
यह बात जितनी अयुक्त है, उतनी ही अयुक्त यह बात भी है
कि'मैं ज्ञान को नहीं जानता हूँ। विचार करो कि हमको कभी
घड़े का ज्ञान, कभी वस्त्र का ज्ञान और कभी रूपादि विषयों
का ज्ञान होता है, अपने योगयुक्त मन से ज्ञान के विषय इन
घड़े आदि पदार्थों की उपेक्षा [ अनादर ] कर दो, इन घटादि
सभी पदार्थों में, माला में सूत्र की तरह, जो ज्ञान या चैतन्य
शान्त भाव से अनुगत होकर विराज रहा है, उस शान्त ज्ञान
तक जब दृष्टि पहुँच जाय तब समझ लो कि यह ज्ञान ही ब्रह्म-
तत्व है। यह तत्व स्वयंप्रकाश भी है। इस सब पसारे के दीखने
से पहले यह दीखता है। जब यह आत्मा 'देखने की इच्छा'
नाम की अनुमति दे देता है, तब यह पसारा पीछे से दीखने
लगता है। बात तो यहां तक है कि यह पसारा उसके ही दीखने
से दीखता है। यह आत्मा स्वयं किसी को न दीखता हो [जैसा
कि सुषुप्ति में हो जाता है ] तो यह पसारा दीख ही नहीं सकता।

पंचकोशविवेक का संक्षेप १९

पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
इस पसारे का दीखना सवा सोलह आने इसके दीखने के अधीन
है। यों इस सारे जगत् का साक्षी जो ज्ञानरूप आत्मा है वह
शुद्ध अवस्था में तब ही दीख सकेगा जब कि इन पांचों कोशों का
परित्याग पूर्णतया कर दिया जायगा। अर्थात् इनको आत्मा
समझना छोड़ दिया जायगा। इन सब कोशों को चमकाने वाला
जो ज्ञान नाम का प्रकाश है, वही तो हमारा अपना स्वरूप है।
अविचारपूर्ण दृष्टि के रहते रहते ही दीख पड़नेवाले देहादियों
को जब अनात्मा समझ लिया जाता है, तब विचारक के सामने
आत्मतत्व स्वयमेव आ खड़ा होता है। उस समय उसको चाहो
'तो 'कुछ नहीं' कह दो या 'आत्मा' कह दो या कुछ भी मत कहो।
आत्मतत्व का वर्णन करने में अध्यात्मशास्त्र ने 'नेति नेति' की
निराली भाषा का उपयोग इसी भाव से किया है। सम्प्रदायवाले
इस प्रकरण में एक गाथा कहा करते हैं—किसी मेले में कोई स्त्री
पुरुष बिछड़ गये थे। राज-पुरुषों ने सारे मेले को घेरकर एक द्वार
में से निकाला और द्वार पर खड़ी की हुई स्त्री से पूछते गये कि
क्या यह तुम्हारा पुरुष है? वह सब का निषेध करती गयी 'कि
यह मेरा पुरुष नहीं है।' जब तो उसका पुरुष आया, तब वह
कुछ भी न बोली किन्तु चुपचाप खड़ी रह गयी। कुछ न बोल
कर ही उसने अपने पुरुष को राजपुरुषों को बता दिया। इसी
प्रकार जितना कुछ निषेध किया जा सकता है, उस सब ही का
निषेध कर देने पर, जो तत्व शेष रह जाता है, वही तो आत्मा
है। यही 'नेति नेति' का सरल भाव भी है। यों यह तत्व सत्य
पदार्थ है यह सिद्ध हो चुका। इसकी ज्ञानरूपता भी सिद्ध की
जा चुकी। यही तत्व अनन्त भी है—औरों का तो कहना ही
क्या है, सबसे तीव्र गति वाली कल्पना को भी यदि हजारों वर्ष

२०
पंचदशी


देश और काल के विस्तृत मैदान में दौड़ते जांय, फिर जहां हम
पहुँच सकेंगे, वहाँ भी और उससे आगे भी यह ज्ञान रहता है।
यों इसमें देश और काल की कोई मर्यादा ही नहीं है। यह ज्ञान
सर्वरूप भी है—पदार्थों को दिखाने वाला सूर्य का प्रकाश जैसे
पदार्थों के ही आकार का हो जाता है, या जैसे पदार्थों के अन्दर
रहनेवाले पांच भूत पदार्थों के ही आकार के हो जाते हैं, इसी
प्रकार यह ज्ञान भी सब पदार्थों के रूप का हो जाता है। यह तो
सब पदार्थों का आत्मा है क्योंकि यह उनके अन्दर बैठा बैठा सब
को दिखाता रहता है। यों यह तत्व प्रत्येक पहलू से अनन्त है।
यह एक ही तत्व कभी तो 'ईश्वर' हो जाता है और कभी 'जीव'
बन जाता है। जगत् की निर्माणशक्ति जब हमारे ध्यान में आती
है तब ईश्वर रूप में यही तत्व हमें याद आता है। जब पांचभौतिक
शरीर की ओर हमारा ध्यान जाता है तब यही तत्व हमें जीव मालूम
पड़ने लगता है। तात्पर्य यह है कि जो जो उपाधियां हमें दीखती हैं
उन सभी के साथ यह तत्व अठखेलियां करता रहता है—यह उन
सभी में रमा हुआ रहता है। जब हम न तो सृष्टि को देखें और न
शरीरों का ही ध्यान करें, तब तो केवल अनन्त व्यापक चेतना का
ही अखण्ड साम्राज्य हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। तब
योगी के अवाक् रह जाने की ऊँची से ऊँची अवस्था आती है।
ईश्वर और जीव दोनों ही तत्व अपनी अपनी उपाधि के कारण
से ही हैं। ये दोनों उपाधियुक्त चेतना हैं। जो महापुरुष इन
उपाधियुक्त चेतनाओं को छोड़कर निरुपाधि चेतना से आँख भिड़ा
देगा, जिस साधक का यह त्राटक कभी भी खण्डित नहीं होगा,
जो साधक बड़े बड़े साम्राज्यों को चलाता हुआ भी इस व्यापक
चेतना को नहीं भूलेगा, जिस महापुरुष के अन्तस्तल में यह बात

[Page Header: पंचकोशविवेक का संक्षेप २१]

[Page Header: पंचकोशविवेक का संक्षेप २१]

बैठ जायगी कि इस ईश्वरभाव और जीवभाव का जन्म तभी होता
है जब हम शक्तियों और कोशों की ओर को ध्यान दे बैठते हैं,
यदि हम इन दोनों की ओर को ध्यान बँटाना ही छोड़ दें तो
फिर ब्रह्मभाव ही शेष रह जाता है। ऐसा ज्ञान पाते ही साधक
लोग पूर्ण रूप से ब्रह्म हो जाते हैं। अपनी उपाधियों को तोड़
फोड़कर अपने व्यापक रूप को कमा लेते हैं। वेदान्तसम्प्रदाय
में बताये हुए चारों साधनों से युक्त जो अधिकारी लोग उपर्युक्त
प्रकार से पांचों कोशों का विवेक करके, उस गुहाहित ब्रह्म का
साक्षात्कार कर लेते हैं तो यह बात बेझिझक कही जा सकती
है कि वे तो ब्रह्म तत्त्व ही होगये हैं। 'न जायते म्रियते वा
विपश्चित्' ऐसे ज्ञानी पुरुष का फिर मरना जीना छूट जाता है।
क्योंकि ब्रह्म का तो जन्म ही नहीं होता है। उसने तो विवेक
के द्वारा अपने अमर ब्रह्मभाव को जगा लिया है।

4. Dvaita Viveka

[ ४ ]
द्वैतविवेक का संक्षेप
द्वैतविवेक नाम के चौथे प्रकरण में बताया गया है कि—द्वैत
दो तरह का होता है । एक ईश्वर का द्वैत, दूसरा जीव का द्वैत ।
इन्द्रियों से दीख पड़ने वाला संसार ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत
है । इस द्वैत के विषय में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार जीवों
के जो भिन्न भिन्न प्रकार के मनोविचार बनते हैं वही तो जीव का
बनाया हुआ द्वैत कहाता है । ईश्वर जिन पदार्थों को बनाता है
वह तो उनका स्वरूप ही बनाता है । ईश्वर के बना देने से ही
वे हमारे ( जीवों के ) काम के नहीं हो जाते हैं । वे तो हमारे
काम के तभी होते हैं जब हमें उनके विषय में कुछ ज्ञान हो
जाय, जब हम उनका ध्यान करने लग पड़ें, जब हम उन्हें
सुखदायी या दुःखदायी मान बैठें तथा उनको पाने या छोड़ने
का कर्म ( उद्योग ) करने लगें । यही कारण है कि ईश्वर की
सृष्टि के अनन्त पदार्थों में से केवल वे ही थोड़े से पदार्थ हमारे
भोग में आते हैं जिनका हम ध्यान किया करते हैं जो हमारे मन
में बस जाते हैं, या जिनके पाने या छोड़ने का उद्योग हम किया
करते हैं । यों इस जगत् को ईश्वर बनाता है और अपने ज्ञान
तथा कर्म के द्वारा जीव इसको भोगता है । जब ईश्वर मायावृत्ति
नाम का संकल्प करता है तब इस जगत् की उत्पत्ति हो जाती है ।
अत्यन्त बहिर्मुख होने के कारण हम लोगों का संकल्पबल तो नष्ट
प्राय हो गया है । कछवी अपने बच्चों को केवल संकल्प के
बल से पालती है । जो काम दूसरे प्राणी अपने बच्चों को दूध

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३
पिलाकर निकालते हैं वही काम कछवी अपने संकल्प से कर
डालती है। संयम करते करते संयमी लोगों के संकल्प में फिर कर्म
की शक्ति आ जाती है। संकल्प में से ही तो कर्म में बल आता है।
तत्त्वज्ञानी के कर्म में और संकल्प में दोनों जगह बल रहता है।
ईश्वर को कर्म करना ही नहीं पड़ता। उसको केवल संकल्प
करना पड़ता है। बस कर्म अपने आप हो जाता है। यों वे
संकल्प से सृष्टि बना लेते हैं। जब जीवात्मा इस ईश्वरोत्पादित
जगत् के विषय में अपने मनोवृत्ति नाम के संकल्प दौड़ाता है,
तब यह जगत् उसके भोग का साधन बनता है, नहीं तो नहीं
बनता। ईश्वर तो मणि को एक ही तरह का बनाते हैं, परन्तु
जिसको वह मिलती है, वह हर्ष करता है। जिसे नहीं मिलती,
वह पछताता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें न पाने का हर्ष
होता है और न उन्हें न मिलने का पछतावा ही होता है। यों
एक मणि में तीन आकार सिद्ध होते हैं —एक 'प्रिय' दूसरा
'अप्रिय' तीसरा 'उपेक्ष्य'। ये तीनों ही आकार जीवों की भिन्न-
भिन्न बुद्धियों के अनुसार ही होते हैं। इन आकारों के बनाने में
ईश्वर का हाथ सर्वथा नहीं होता। देखते हैं कि सम्बन्धियों
के भेद से एक ही स्त्रीपिण्ड दादी, माता, पत्नी, पुत्री, पौत्री
आदि अनेक रूपों में देखी जाती है। वह जो ईश्वरनिर्मित
मांसमय स्त्रीपिण्ड है, वह तो अवश्य ही एक तरह का रहता है,
परन्तु मनोमयी स्त्रियां एक में ही अनेक हो जाती हैं। क्योंकि
भोक्ताओं के मन भिन्न-भिन्न होते हैं। श्रम के समय में, मनोराज्य
के समय में और स्मृति के समय म तो मनोमय पदार्थों से ही
हमारा व्यवहार होता है। इन अवस्थाओं में ईश्वर का बनाया
पदार्थ होता ही नहीं। जाग्रत् काल में भी मनोमय पदार्थों से ही

[Page Header: २४ पंचदशी]

व्यवहार होते हैं। परन्तु जाग्रत् समय के मनोमय पदार्थों को
अत्यन्त सावधानी से जान लेना चाहिये। जब हमारा मन किसी
पदार्थ को देखता है, तब वह उसी पदार्थ के रूप का हो जाता
है। आंख बन्द करके ध्यान करते ही वही रूप हमारे मन में
दीखा करता है। यों जब हम जागरण के समय किसी पदार्थ को
देखते हैं तब वहां दोहरे पदार्थ होते हैं—जैसे एक मिट्टी का घड़ा
दूसरा मन का घड़ा। मिट्टी के घड़े को तो हम प्रमाणों से जानते
हैं। परन्तु हमारा मनोमय घड़ा प्रमाणों से नहीं दीखता। वह
तो साक्षी आत्मा से प्रकाशित हुआ करता है। हमको जो वस्तु
बन्धन में डालती है वह यह 'मनोमय' ही तो है। यह हो तो
सुख दुःख होते हैं, नहीं तो नहीं होते। बाह्य पदार्थ नहीं भी
होते, तब भी सुपने आदि में मनोमय पदार्थों से जीव को सुख
दुःख हो जाते हैं। सुपने की मनोमयी स्त्री के संग से वीर्यपात
हो जाता है। समाधि, सुषुप्ति या मूर्छाकाल में बाह्यपदार्थ बने भी
रहते हैं, परन्तु तब मनोमय पदार्थ न होने से जीवों को सुख दुःख
नहीं होते। पुत्र दूरदेश में गया हो और वह जीता हो तब उस
का पिता वंचक के कहने से उसे मरा समझ कर रो देता है।
क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ मर गया है। पुत्र मर भी गया हो
परन्तु उसका समाचार न मिला हो तब नहीं रोता। क्योंकि
उसका मनोमय पदार्थ तो जीवित ही है। यों यह स्पष्ट है कि
मानस जगत् ही बन्धन करने वाला है। इस मानस द्वैत को
नष्ट करने के दो उपाय हैं एक 'योग' दूसरा 'ज्ञान'। योग में
मनोनिरोध करना पड़ता है, उससे मानस संसार बनना रुक तो
जाता है, परन्तु वह बीजरूप में तो रहता ही है। जब भी मनो-
निरोध करना छोड़ेंगे, तुरन्त मानस द्वैत आ खड़ा होगा और वह

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

बन्धन करेगा ही। मानसद्वैत को सदा के लिये नष्ट कर देनेवाला
उपाय, ब्रह्मतत्व का—अपने व्यापक आत्मतत्व का—ज्ञान ही है।
ईश्वर का द्वैत आंखों के सामने खड़ा भी रहे परन्तु उसको मिथ्या
( बाधित होजाने वाला ) समझ लेने से ही, पारमार्थिक अद्वैत का
ज्ञान हो सकता है। जब पारमार्थिक अद्वैत का ज्ञान हो जाता
है तब मानससंसार का बनना सदा के लिये रुक जाता है।
जब प्रलय हो जाती है—जब अद्वैत ज्ञान करानेवाले गुरु
या शास्त्र नहीं रह जाते और जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करने
वाला द्वैत नहीं रहता है—तब तो अद्वितीय तत्व समझ में आ
ही नहीं सकता। अद्वैत तत्व तो तभी समझ में आता है जबकि
इसका विरोधी द्वैत सामने दिखाई देता हो। यदि द्वैत दिखाई
न देता हो तो अद्वैत जैसे गहन तत्व को जानने का कोई साधन
ही हमारे पास नहीं रह जाता। यों ईश्वर का निर्मित द्वैत अद्वैत-
ज्ञान का बाधक ही नहीं है प्रत्युत साधक भी है। सत्य संकल्प
उस ईश्वर के बनाये हुए उसको हटा देना हम अल्पशक्ति जीवों के
वस का काम भी तो नहीं है। कोई कोई साधक यह मनाया
करते हैं कि स्त्री बच्चे मर जांय तो मैं छूट जाऊँ। उनको यह सम-
झना चाहिये कि ईश्वर के संकल्प से उत्पन्न हुए स्त्री बच्चे तभी
मरेंगे जब ईश्वर का संकल्प पूरा हो जायगा। इन निष्फल संकल्पों
से क्या होना है ? करने की बात तो केवल इतनी ही है कि
तुम उनको अपना मानना छोड़ दो। हमारा इनसे जो मानस
सम्बंध है उसी से तो.हम बँध रहे हैं। उसे न हटाकर, ईश्वर
की चीज़ को बिगाड़ने की इच्छा तो उपहासास्पद इच्छा ही है।
हमको तो इस ईश्वर के द्वैत के रहते रहते ही अपना अद्वैत मार्ग
साफ़ कर लेना.है। इससे द्वेष करना ठीक नहीं है। जैसे मानस

२६ पंचदशी
द्वैत से राग करना बन्धनकारक है वैसे ही ईश्वर के द्वैत से द्वेष
करना भी बन्धनकारक ही है। जीव के द्वैत के दो भेद हैं—एक
शास्त्रीय दूसरा अशास्त्रीय। आत्मा और ब्रह्म का विचार शास्त्रीय
मानस जगत् है। इस द्वैत को तत्वज्ञान हो चुकने के बाद
छोड़ देना चाहिए। अशास्त्रीय द्वैत के दो भेद हैं—एक काम
क्रोध आदि, दूसरा मनोराज्य। ये रहेंगे तो तत्वज्ञान होगा नहीं।
किसी तरह तात्कालिक उपाय कर देने से यदि ज्ञान हो भी
जायगा तो वह ठहरेगा नहीं। तत्वज्ञान के बाद जीवन्मुक्ति की
अवस्था आनी ही चाहिये। उसमें गीता वाली दैवी संपत्ति आनी
ही चाहिए। जो पुरुष काम क्रोधादि के झंझटों में उलझा पड़ा
है, उसका ज्ञान 'ज्ञान' नहीं है। वह मुक्ति रूप फल को देनेवाला
नहीं है। वह तो कोरा ( बन्ध्य ) ज्ञान है। ज्ञान हो जाय
और काम क्रोध आदि न छोड़े जांय, व्यवहार में शुद्धि न आजाय,
ज्ञानी का व्यवहार यह न कहने लग पड़े कि इसके व्यवहार
में देहात्मवाद काम नहीं कर रहा है, तो वह ज्ञान ऐसा ही निर-
र्थक है जैसे कि औषध सेवन करके पथ्यसेवन न किया जाय।
जिसके मन से विषयसुख की लालसा नहीं मिटी है उसको
हज़ार ज्ञान होजाय तौ भी उसकी जन्मपरम्परा टूटनेवाली नहीं
है। जो ज्ञानी होकर भी कामादि को नहीं छोड़ता है उसका
बहुत बड़ा पतन होता है। कारण यह है कि अज्ञानी लोग
जिस ईश्वर तत्व से डरकर या कर्मगति से भय मानकर पाप-कर्म
से बचते हैं वह भय तो इसके मन से जाता रहता है। ऐसा
ज्ञानी अवश्य ही पतित हो जाता है। ज्ञान होने से पहले मनो-
दोष अज्ञानी को सताते हैं, अब ऐसे कोरे ज्ञानी की लोक में
निन्दा भी होने लगती है। यों इस शुष्क ज्ञान से तो वह अज्ञान

[Page Header: द्वैतविवेक का संक्षेप | २७]

[Page Header: द्वैतविवेक का संक्षेप | २७]

ही अच्छा था। तत्त्वज्ञान का इतना तो दृष्टफल होना ही
चाहिये कि तत्त्वज्ञानी का व्यवहार उसका रहन सहन, उसकी
बात-चीत, सब में अलौकिकपना हो और उसके व्यवहार से
उसकी पूजा हो, लोग उसको श्रद्धा से देखें। कामादि के साथ
ही साथ, सब दोषों के मूल मनोराज्य को भी, बन्द कर देना
चाहिये। मनोराज्य को जीतने के लिये निर्विकल्प समाधि करनी
चाहिये। सविकल्प समाधि करने से निर्विकल्प समाधि होने
लगती है। जिसको तत्व का ज्ञान हो जाय, जो एकान्त वास
करता हो अर्थात् हृदय में बहुतायत से रहने लग पड़ा हो,
जिसके बुद्धि दोष नष्ट हो गये हों वह, लम्बे प्रणवों को बोलकर
मनोराज्य को जीत सकता है।
जब मनोराज्य पर विजय मिल जाती है तब साधक के वृत्ति-
शून्य मनकी हालत गूँगे पुरुष की-सी हो जाती है। गूँगा जैसे
कुछ भी नहीं बोलता इसी प्रकार उसके गूँगे मन में वृत्तियों का
उत्पन्न होना रुक जाता है। 'दृश्य नहीं है' इस ज्ञानरूपी झाडू
को पकड़ कर, मनरूपी मन्दिर में से, दृश्यरूपी कूड़े को निकाल
कर, फेंक दिया जाय तो निरतिशय मोक्ष सुख अन्दर से उमड़
ही पड़ता है। कामादि अवस्थाओं के नष्ट हो जाने पर, जब
वासनाओं से शून्य गम्भीर मौनावस्था का प्रादुर्भाव हो जाता
है, तब इस दशा से उत्तम दशा और कोई भी नहीं है। ऐसा
परमपद जिन लोगों ने पा लिया हो, उनको भी कभी-कभी भोग-
दायी कर्मों के प्रभाव से विक्षेप हो ही जाता है। परन्तु उनके
अभ्यास की प्रबलता उस विक्षेप को ठहरने ही नहीं देती।
उनकी बुद्धि फिर तुरन्त ही समाहित हो जाती है। हाँ जिन
महापुरुषों को विक्षेप होना सर्वथा बन्द हो गया हो, उनको तो

२८ पंचदशी
ब्रह्मज्ञानी कहना भी ठीक नहीं है । अध्यात्मविद्या के पारंगत मुनि
लोगों का कहना है कि वे तो साक्षात् ब्रह्मतत्व ही—सर्वव्यापक
आत्मतत्व ही—हो चुके हैं । जीव के बनाये हुए द्वैत को जब
कोई प्राणी सम्पूर्ण रूप से छोड़ चुकेगा, तभी उसे जीवन्मुक्ति
की ऊँची से ऊँची हालत प्राप्त हो सकेगी, इसी विचार को लेकर
हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से, जीव के बनाये हुए द्वैत
को, मुमुक्षु लोगों के सुभीते के लिये, छांट कर रख दिया है ।

5. Mahavakya Viveka

महावाक्यविवेक का संक्षेप

'महाश्रोत्रिय' 'महाराजा' 'महायात्रा' 'महाप्रस्थान' 'महा-
ज्ञानी' आदि जैसे शब्द हैं वैसा ही यह 'महावाक्य' भी है।
इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि—जिस से बड़ा, जिससे
व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य न हो सकता हो। दूसरा
अर्थ यह भी हो सकता है कि—जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य
बोलना ही पड़ता हो। या यों कहो कि बोलने की आवश्यकता
ही न रह जाती हो। जो प्राणी दिन रात बहिर्मुख बने रहते हैं,
जो प्राणी आठों पहर इन्द्रियद्वारों पर ही डटे रहते हैं, उनमें से
कोई जब किसी नाटक के नटों, या पालतू तोते मैनाओं के समान
इन महावाक्यों को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीं कहते हैं।
हम तो केवल उन महामना मुनियों की ओर को संकेत करना
चाहते हैं, जिनके हृदयधाम में धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला
में सृष्टि के पदार्थों की स्वाधीन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान
भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो। वे जब अपने एकान्त हृदय-
मन्दिर के मौनप्रदेश में बैठकर इन वाक्यों को बोल बैठते हैं
और जब उनके हृदय-प्रदेश में सदा के लिये सन्नाटा छा जाता
है—जिसके बाद एक भी अन्यर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीं पड़ा
सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता
हो, तब इन वाक्यों को 'महावाक्य' कहना बड़े ही गौरव की
बात प्रतीत होती है। यह प्रकरण आगमप्रधान है—इसमें कुतर्क
और व्यर्थ विवाद को थोड़ा सा भी अवकाश नहीं है। इसमें

३० पंचदशी

जिन महावाक्यों का उल्लेख है वे सभी प्राणियों के अन्दर गुप्तभाव
से रहनेवाले 'पूर्ण अहं' का वर्णन करनेवाले हैं। क्षुद्र अहं ने
जीवात्माओं को संकुचित कर रखा है। विचार की आँच से
जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे
देता है। आंख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आंखों
के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही
अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है। उसी पुण्य-
कीर्ति अवस्था की ओर संकेत करनेवाले ये महावाक्य हैं।
जितने भी वेदादि सच्छास्त्र हैं वे इसी पूर्ण अहं की आवाजें हैं।
मनन में गहरे उतरे हुए लोगों को ही ऐसी ईश्वरीय आवाजें सुनाई
पड़ा करती हैं। इसी कारण वेदों को 'अपौरुषेय' कहा जाता है।
वेदों को कोई पुरुष बनाता नहीं किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने
की बातें हैं। इसी लिये वेदों को ऋषियों के द्वारा प्रकट होना
बताया जाता है। इस प्रकरण में जिन 'महावाक्यों' का वर्णन है
उनकी मृतप्राय आवाजें जनसाधारण के हृदयों में भी सुनाई तो
पड़ती हैं, परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण
इनको अनसुनी कर देते हैं। सभी प्राणी अपने जी में अपने
आप को बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैं। सभी को
अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सब से अच्छा, प्रतीत होता है।
सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चूकते नहीं हैं।
परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका
किसी को भी पता नहीं है। हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही
सोया पड़ा हुआ 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। अन्दर जो निःशब्द
भाषा में 'अहं ब्रह्मास्मि' की अखण्ड रटना चल रही है, उसी से
यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है। हमारे रोम रोम में

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

'अहं ब्रह्मास्मि' यह महामन्त्र समाया हुआ है। मौत ने सारे
संसार को अपने जबड़े में दबा रक्खा है परन्तु उस मौत को भी
निगल जानेवाला यह अन्दर का 'अहं ब्रह्मास्मि' कभी मरना
जानता ही नहीं। इस अन्दर के 'अहं ब्रह्मास्मि' को इस मांस
की चादर ने लपेट रक्खा है। अब तो हमें क्षुद्र देहाभिमान के रूप
में इस 'अहं ब्रह्मास्मि' की निर्बल (मुरदा) आवाज़ कभी कभी
सुनाई पड़ जाती है। अब इसमें ब्राह्मतेज नहीं रह गया है।
अन्दर के इस 'अहं ब्रह्मास्मि' को—सोये पड़े हुए इस ओम् को—
हम साधकों को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा। जब यह पूरा पूरा
जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा, तब
यह देहाभिमान को, किंवा क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर
देगा। देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यहीं 'अहं
ब्रह्मास्मि' फिर ब्रह्माण्ड भर में फैल जायगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड
पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा। ऐसी दिव्य
अवस्था जब आ जाती है तब ही 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों
के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है। नहीं तो कोरे
शाब्दिक [शास्त्रीय] ज्ञान से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है।
गुड़ कहने मात्र से किसी का मुँह मीठा नहीं हो जाता है—राम
राम रटने से तोता मुनि नहीं हो जाता है। ऐसी दिव्य अवस्था
जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है। तब
शोक भय दीनता आदि ठहर नहीं पाते हैं। जिन लोगों के
पवित्र मानस में इस तरह के अपौरुषेय महावाक्य सुनाई पड़ने
लगते हैं, जिनके हृदय में पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है,
वे ही मुनि हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं, उनको ही विदेह मुक्ति
मिल सकती है। जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीं

३२ पञ्चदशी
होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि .
महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैं, जिस प्रकार अन्य
अपशब्द बन्धनकारक होते हैं। क्योंकि अनुभव रहित पुरुष जब
इन महावाक्यों को कहते हैं तब वे आत्मघात कर बैठते हैं क्योंकि
उनमें दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैं।
मुख्य महावाक्य. चार हैं। एक 'प्रज्ञानं ब्रह्म' दूसरा
'अहं ब्रह्मास्मि' तीसरा 'तत्त्वमसि' चौथा 'अयमात्मा ब्रह्म'
ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है-उसका
ज्ञान इन ( या इन जैसे ) वाक्यों से ही हो पाता है। आत्मा
सच्चिदानन्द स्वरूप है, यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता
है। परन्तु 'यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्व दोनों एक ही तत्व
हैं, इस बात को जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं है।
प्रज्ञानँ ब्रह्म
चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर
निकलती है, उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है,
उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता है और
शब्दों को सुना करता है। नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की
वृत्ति बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो
चैतन्य किंवा प्रज्ञान है, उसी प्रज्ञान से तो यह संसार भले बुरे
गन्धों को सूँघा करता है। वागिन्द्रिय से ढके हुए उसी
चैतन्य किंवा प्रज्ञान से ये सब शब्द बोले जाते हैं। रसना के
द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उसको जिस
चैतन्य ने अपनी उपाधि बना लिया है, उसी से तो ये स्वादु
या अस्वादु रस पहचाने जाते हैं। इतना ही नहीं और भी