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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९
विचाराज्जायते बोधोऽनिच्छा यं न निवर्तयेत् ।
स्वोत्पत्तिमात्रात् संसारे दहत्यखिलसत्यताम् ॥७५॥
बोध तो विचार से उत्पन्न हुआ करता है, मुझे बोध न हो
यह चाहने पर भी उस बोध को कोई रोक नहीं सकता । वह
बोध ज्यों ही उत्पन्न हो जाता है त्यों ही इस संसार की सत्यता
को जला देता है [ नष्ट कर देता है ]
तावता कृतकृत्यः सन्नित्यतृप्तिमुपागतः ।
जीवन्मुक्ति मनुप्राप्य प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥७६॥
तत्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने से ही नित्यतृप्ति अर्थात् सर्वा-
धिक सुख को पाकर, जीवन्मुक्ति का महालाभ करके, अपने
प्रारब्ध क्षय की बाट जोहने लगता है ।
आप्तोपदेशं विश्वस्य श्रद्धालु रविचारयन् ।
चिन्तयेत् प्रत्ययैरन्यै रनन्तरितवृत्तिभिः ॥७७॥
गुरु के उपदेश पर [ जिनमें उसने उपास्य के स्वरूप का
प्रतिपादन किया हो ] विश्वास करके, स्वयं उस पर कुछ भी
विचार न करके, अपने उपास्यतत्व का निरन्तर चिन्तन करे ।
ध्यान न रहे कि—इस चिन्तन के बीच में अन्य किसी भी
विषय का विचार न आने पाये ।
यावच्चिन्त्यस्वरूपत्वाभिमानः स्वस्य जायते ।
तावद् विचिन्त्य, पश्चाच्च तथैवामृति धारयेत् ॥७८॥
ऐसा चिन्तन कब तक करते जायें सो भी सुनो—चिन्तन
करते करते ऐसी अवस्था आ जायगी, कि तुम्हें स्वयं ही यह
भाव होने लगेगा कि यह चिन्त्य स्वरूप तो स्वयं मैं ही हूँ। बस

३८० पञ्चदशी
यहीं चिन्तन को समाप्त कर दो और मरणपर्यन्त इस धारणा
को बनाये रक्खो ।
ब्रह्मचारी भिक्षमाणो युतः संवर्गविद्यया ।
संवर्गरूपतां चित्ते धारयित्वा ह्यभिक्षत ॥७९॥
उपासक भी उपास्य रूप का अभिमान कर लेता है यह
बात शास्त्र में देखी गयी है—संवर्ग गुणवाले प्राण की उपासना
करने वाला कोई ब्रह्मचारी, जब भिक्षा करने चला तो उसने
अभिप्रतारि राजा के सामने अपने आप को संवर्ग रूप मानकर
ही भिक्षा की थी । यह बात छान्दोग्य में है ।
पुरुषस्येच्छया कर्तु मकर्तुं कर्तुमन्यथा ।
शक्योपास्तिरतो नित्यं कुर्यात् प्रत्ययसन्ततिम् ॥८०॥
उपासना तो पुरुष की इच्छा पर निर्भर रहती है । वह चाहे
करे, चाहे न करे, चाहे तो उलट पुलट कर डाले । इस लिये
उपासना तो सदा ही करनी चाहिये । [ उसे मरण-पर्यन्त
छोड़ना नहीं चाहिये ]
वेदाध्यायी ह्यप्रमत्तोऽधीते स्वप्नेऽधिवासतः।
जपिता तु जपत्येव तथा ध्यातापि वासयेत् ॥८१॥
जो सावधान वेदपाठी है, या जो सदा जप करता रहता
है, वह दृढ वासना के कारण सुपने में भी वेदपाठ या जप किया
ही करता है । इसी प्रकार उपासक लोग भी उपासना की
वासना को इतना दृढ करें कि सुपने आदि में भी उसी का
ध्यान आने लग पड़े ।
विरोधिप्रत्ययं त्यक्त्वा नैरन्तर्येण भावयन् ।
लभते वासनावेशात् स्वप्नादावपि भावनाम् ॥८२॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१

[Header]
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१

विरोधी विचारों का त्याग करके जब निरन्तर भावना की
जाती है तब संस्कारों की प्रबलता हो जाने से सपने आदि में
भी ध्यान होने लग जाता है ।
भुञ्जानोऽपि निजारब्धमास्थातिशयतोऽनिशम् ।
ध्यातुं शक्तो न संदेहो विषयव्यसनी यथा ॥८३॥
यदि किसी को अपने उपास्य में अधिक श्रद्धा हो तो अपने
प्रारब्ध को भोगते हुए भी विषयव्यसनी की तरह, निरन्तर उपा-
सना कर ही सकता है, इसमें सन्देह मत करो ।
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि ।
तदेवास्वादयत्यन्तः परसंगरसायनम् ॥८४॥
लोक में भी देख लो कि—जिस नारी को परपुरुष का
व्यसन पड़ जाता है, वह घर के [लेपन संमार्जन आदि] कामों
में लगी रहने पर भी, अपने मन से उसी परसंगरसायन का
मज़ा चखा करती है ।
परसङ्गं स्वादयन्या अपि नो गृहकर्म तत् ।
कुण्ठीभवेदपि त्वेतदापातेनैव वर्तते ॥८५॥
परसंग का स्वाद लेने वाली उस नारी के घर के काम भी
बन्द नहीं हो जाते । वे भी बराबर चलते ही रहते हैं । उसके
ये काम तो ऊपर के मन से होते जाते हैं ।
गृहकृत्यव्यसनिनी यथा सम्यक् करोति तत् ।
परव्यसनिनी तद्वन्न करोत्येव सर्वथा ॥८६॥
अपने घर के कामों का ही जिस नारी को व्यसन है, वह
जैसे घर के काम भले प्रकार [जी लगाकर] करती है, परव्यस-
निनी नारी उसकी तरह घर के काम प्रेम से करती ही नहीं ।

एवं ध्यानैकनिष्ठोऽपि लेशाल्लौकिकमारभेत् ।
तत्ववित्त्वविरोधित्वाल्लौकिकं सम्यगाचरेत् ॥८७॥
उस नारी के समान ध्यानैकनिष्ठ पुरुष भी अपने लौकिक
कामों को अधूरे तौर पर करते रहते हैं । व्यवहार तत्वज्ञान का
विरोधी नहीं होता, इस कारण तत्वज्ञानी लोग तो लौकिक
कार्यों को भी भले प्रकार निभा ले जाते हैं [ ज्ञानी होते ही
लौकिक व्यवहार छुट जाता है, या छोड़ देना चाहिये, ऐसा
विचार भ्रमपूर्ण है । ज्ञानी लोगों के व्यवहार तो और लोगों
से उत्तम प्रकार के होने चाहियें । उनका व्यवहार दूसरों के
लिये आदर्श का काम दे, ऐसा होना चाहिये ] ।
मायामयः प्रपंचोऽय मात्मा चैतन्यरूपधृक् ।
इति बोधे विरोधः को लौकिकव्यवहारिणः ॥८८॥
जो तत्व ज्ञानी ऐसा समझकर लौकिक व्यवहार करता है
कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मतत्व तो केवल चैतन्य
रूप है, फिर बताओ कि उसे व्यवहार का विरोध कैसे होगा ?
अपेक्षते व्यवहृति र्न प्रपंचस्य वस्तुताम् ।
नाप्यात्मजाड्यं, किंन्त्वेषा साधनान्येव कांक्षति ॥८९॥
व्यवहार को न तो यही ज़रूरत है कि—'प्रपंच सच्चा ही
हो' न वह यही चाहता है कि 'आत्मा जड ही हो।' उसे तो
केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है ।
मनोवाक्कायतद्वाह्यपदार्थाः साधनानि, तान् ।
तत्वविन्नोपमृद्नाति, व्यवहारोऽस्य नो कुतः ॥९०॥
जब कि तत्व ज्ञानी पुरुष मन, वाणी, काय तथा बाहर
के गृह-क्षेत्र आदि पदार्थों का—जो कि व्यवहार के साध-

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३
हैं—उपमर्द [ निवारण ] ही नहीं करता है तब फिर इस ज्ञानी
का व्यवहार क्यों कर नहीं चलेगा ?
उपमृद्नाति चित्तं चेद् ध्यातासौ न तु तत्ववित् ।
न बुद्धिं मर्दयन् दृष्टो घटतत्वस्य वेदिता ॥९१॥
अगर कोई अपने चित्त का उपमर्द करता है तो वह ध्याता
[ उपासक ] है । वह तत्वज्ञानी नहीं है । लोक में भी देखते
हैं कि—घटतत्व का जाननेवाला पुरुष, बुद्धि का मर्दन [ किंवा
उसे एकाग्र ] करता हुआ कहीं भी नहीं देखा जाता ।
सकृत्प्रत्ययमात्रेण घटश्चेद् भासते सदा ।
स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं घटवच्च न भासते ॥९२॥
यदि केवल एक बार के ही ज्ञान से घट का भास सदा के
लिये होजाता है [ और चित्त के निरोध की कोई जरूरत नहीं
रहती है ] तो भला स्वयं प्रकाश यह आत्मा—जो घट से बहुत
ही स्पष्ट है—घट की तरह ही क्यों नहीं भास सकता है ?
[ इस आत्मा के ज्ञान में चित्तनिरोध की कौन-सी आव-
श्यकता है ? ]
स्वप्रकाशतया किं ते तद् बुद्धिस्तत्ववेदनम् ।
बुद्धिश्च क्षणनाश्येति चोद्यं तुल्यं घटादिषु ॥९३॥
ब्रह्म यद्यपि स्वयं प्रकाश तो है, परन्तु ब्रह्म को विषय
करनेवाली बुद्धि ही तो तत्वज्ञान कहाती है, वह बुद्धि तो
क्षणिक है [ इस कारण वह चाहती है कि—उसकी स्थिति ब्रह्म
में बार बार की जांय, उसे बार बार उसमें लगाया जाय ] तो
भाई ! यह आशंका तो घटादियों में भी समान ही है ।

३८४ पञ्चदशी
तो घटादि भी यह चाहेंगे कि हम में भी बुद्धि को बार बार
लगाया जाय ] ।
घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव, यदा घटः ।
इष्टो नेतुं तदा शक्य इति चेत् सममात्मनि ॥९४॥
घटादि का निश्चय जब होजाता है तब घटज्ञान नष्ट तो हो
जाता है [ अथवा यों समझो कि घटादिज्ञान क्षणिक तो हैं ]
परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत हो तभी उस घट को
ले जा सकते हैं [उसमें चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत
नहीं होती ] तो हम कहेंगे कि—यही बात आत्मा के विषय
में भी समझ लो । [ उसमें भी चित्त को स्थिर कर रखने की
कोई आवश्यकता नहीं होती है ] ।
निश्चित्य सकृदात्मानं यदापेक्षा तदैव तम् ।
वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्नोत्येव हि तत्ववित् ॥९५॥
[ इस बात को आत्मा के विषय में यों समझो कि ] जब
एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय होजाता है, तब फिर
जब कभी अपेक्षा होती है तभी उसके विषय का कथन, मनन
या ध्यान ज्ञानी लोग कर ही सकते हैं ।
उपासक इव ध्यायन् लौकिकं विस्मरेद् यदि ।
विस्मरत्वेव सा ध्यानाद् विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥९६॥
तत्त्वज्ञानी लोग भी, ध्यान करते करते, यदि उपासकों के
समान ही, लौकिक बातों को भूलते हैं, तो भूल जायें । उनका
यह विस्मरण ध्यान की प्रबलता से है, यह विस्मरण ज्ञान के
कारण नहीं है ।

[Header: ध्यानदीपप्रकरणम् ३८५]

[Header: ध्यानदीपप्रकरणम् ३८५]

ध्यानं त्वैच्छिकमेतस्य वेदनान्मुक्तिसिद्धितः ।
ज्ञानादेव तु कैवल्यमिति शास्त्रेषु डिण्डिमः ॥९७॥
ध्यान करना तो तत्वज्ञानी की इच्छा पर निर्भर है [ वह
चाहे तो करे, न चाहे तो न करे] तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः
पन्था विद्यतेऽयनाय ( श्वे. ३-८ ) ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापैः ( श्वे.
२-१५ ) इत्यादि शास्त्र तो डंके की चोट यह कह रहे हैं कि
कैवल्य तो अकेले ज्ञान से ही मिल जाता है [ उसके पाने के
लिये ध्यान आदि किसी की भी आवश्यकता नहीं है ]
तत्त्वविद् यदि न ध्यायेत् प्रवर्तेत तदा बहिः ।
प्रवर्त्ततां सुखेनार्यं को बाधोऽस्य प्रवर्त्तने ॥९८॥
'तत्वज्ञानी लोग यदि ध्यान न करेंगे तो फिर बाहर प्रवृत्ति
करेंगे ही' ऐसा यदि कोई कहे तो हम कहेंगे, तत्वज्ञानी लोग
सुख-पूर्वक बाह्य कामों में प्रवृत्ति करें । उनकी प्रवृत्ति में कोई
बाधा नहीं है ।
अतिप्रसङ्ग इति चेत् प्रसङ्गं तावदीरय ।
प्रसङ्गो विधिशास्त्रं चेन्न तत् तत्त्वविदं प्रति ॥९९॥
यदि कहो कि तत्वज्ञानी की बाह्यप्रवृत्ति मानने पर अति
प्रसङ्ग हो जायगा । तो हम कहते हैं कि [ तुम्हारी बात का
उत्तर तो हम पीछे से देंगे पहिले ] तुम प्रसङ्ग का अभिप्राय
बताओ कि प्रसंग किसे कहते हैं ? यदि कहो कि विधि या
निषेध शास्त्र को प्रसङ्ग कहते हैं । तो हम कहेंगे कि विधि या
निषेध शास्त्र तो ज्ञानी के लिये होते ही नहीं [ वे तो अज्ञानी
पर ही लागू होते हैं ]

३८६ पञ्चदशी
वर्णाश्रमवयोवस्थाभिमानो यस्य विद्यते ।
तस्यैव च निषेधाश्च विधयः सकला अपि ॥१००॥
जिस बेसमझ को देह के वर्ण, देह के आश्रम, देह की
आयु, और देह की अवस्थाओं का अभिमान हुआ रहता है,
[जो अज्ञानी इन सब को अपने ही माना करता है] ये सब
विधि और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिए होते हैं ।
वर्णाश्रमादयो देहे मायया परिकल्पिताः ।
नात्मनो बोधरूपस्येत्येवं तस्य विनिश्चयः ॥१०१॥
तत्वज्ञानी को तो ऐसा दृढ निश्चय हुआ रहता है कि—
इन वर्णाश्रमादि को माया ने देह में ही कल्पित कर लिया है ।
ज्ञानरूप आत्मा के तो कोई भी वर्ण या आश्रमादि नहीं होते हैं।
समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा ।
हृदयेनास्तसर्वास्थो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥१०२॥
जिसने अपने जी से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल कर
फेंक दिया हो, जिसका आशय किंवा ज्ञान निर्मल हो चुका हो,
वह तो मुक्त ही है। ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे,
काम करे या न करे, [यह सब उसकी इच्छा पर ही निर्भर है।
इस बारे में शास्त्र की जुरत उससे कुछ कहने की नहीं होती है]
नैष्कर्म्येण न तस्यार्थ स्तस्यार्थोऽस्ति न कर्मभिः ।
न समाधानजप्याभ्यां यस्य निर्वासनं मनः ॥१०३॥
[औरों ने भी कहा है कि]—जिसका मन वासनाओं से
रहित हो चुका है, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से फिर
उसे कुछ मतलब नहीं रहता । समाधि और जप से उसका कुछ
प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८७

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८७
आत्मासङ्गस्ततोऽन्यत् स्यादिन्द्रजालं हि मायिकम् ।
इत्यचंचलनिर्णीते कुतो मनसि वासना ॥१०४॥
आत्मा असंग पदार्थ है, उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल
के समान मायिक है । ऐसा स्थिर निर्णय कर चुकने के बाद
मन में वासना कैसे उठेगी ? भाव यह है कि—तत्त्वज्ञानी के
मन में वासना नहीं उठती । फिर बताओ कि वह उस वासना
को हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ?
एवं नास्ति प्रसङ्गोऽपि कुतोऽस्यातिप्रसञ्जनम् ।
प्रसङ्गो यस्य तस्यैव शङ्क्येतातिप्रसञ्जनम् ॥१०५॥
[प्रकृत बात तो इतनी ही है कि] इस प्रकार जब ज्ञानी
को प्रसङ्ग ही नहीं है तब फिर उसे अतिप्रसङ्ग कैसे हो जायगा ?
यह अतिप्रसङ्ग तो उसी को होता है जिसको कि प्रसङ्ग का
बन्धन हो। [प्रसङ्ग वाला पुरुष जब प्रसङ्ग की अवहेलना करता
है तब वह उसकी अतिप्रसक्ति कही जाती है ।]
विध्यभावान्न बालस्य दृश्यतेऽतिप्रसंजनम् ।
स्यात् कुतोऽतिप्रसङ्गोऽस्य विध्यभावे समे सति ॥१०६॥
[यह बात लोक में भी देखी जाती है] बालकों पर विधि-
शास्त्र नहीं चलता तो उनकी अतिप्रसक्ति भी नहीं मानी जाती।
ज्ञानी और बालक दोनों को ही विधि या निषेध शास्त्र का अभाव
समान है। फिर इस विचारे ज्ञानी को ही अतिप्रसङ्ग कैसे हो
जायगा ?
न किञ्चिद्वेत्ति बालश्चेत् सर्वं वेत्येव तत्त्ववित् ।
अल्पज्ञस्यैव विधयः सर्वे स्यु र्नान्ययोर्द्वयोः ॥१०७॥
यदि कहो कि बालक तो कुछ भी नहीं जानता ।

३८८ पञ्चदशी
अज्ञता उस पर विधि का जोर नहीं चलने देती] तो हम कहेंगे
कि ज्ञानी सब कुछ जानता है [उसकी सर्वज्ञता उस पर विधि
का अंकुश नहीं रखने देती] देखो विधि के अधिकार की बात
तो इतनी ही है कि—जो अल्पज्ञ है, उसी के लिए ये विधि
और निषेध शास्त्र बनाये गये हैं। अज्ञ और सर्वज्ञ के लिए
विधि या निषेध कुछ भी नहीं होता।
शापानुग्रहसामर्थ्यं यस्यासौ तत्वविद् यदि ।
तन्न, शापादिसामर्थ्यं फलं स्यात्तपसो यतः ॥१०८॥
यदि कहो कि—ऐसा भी क्या तत्वज्ञानी, जो किसी को
शाप या वरदान तक न दे सके ? जिसमें ये दोनों सामर्थ्य हों
लोक में तो उसी को तत्वज्ञानी [या पहुँचा हुआ महात्मा] सम-
झते हैं। यह विचार ठीक नहीं है। क्योंकि शापादि सामर्थ्य
तो उनके तप का फल है [यह कोई तत्वज्ञान का फल नहीं है]
व्यासादेरपि सामर्थ्यं दृश्यते तपसो बलात् ।
शापादिकारणा दन्यत् तपो ज्ञानस्य कारणम् ॥१०९॥
यदि कहो कि व्यास जैसे तत्वदर्शी में भी शापानुग्रह-
सामर्थ्य [ शाप और वरदान की शक्ति ] था तो हम कहेंगे कि
उनमें वह सामर्थ्य ज्ञान के कारण नहीं था। वह तो उनके
तपोबल से था। तप भी दो प्रकार का होता है—एक तप
तत्व ज्ञान का कारण है, दूसरे तप से शाप और अनुग्रह का
सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
द्वयं यस्यास्ति तस्यैव सामर्थ्यज्ञानयोर्जनिः ।
एकैकं तु तपः कुर्वन्नेकैकं लभते फलम् ॥११०॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९
दोनों प्रकार के तप जिसने किये हों, उसी में सामर्थ्य और
ज्ञान दोनों पाये जा सकते हैं। जो तो अकेले अकेले तप को
करेगा! उसे तो एक ही एक फल मिल सकता है ।
सामर्थ्यहीनो निन्द्यश्चेद् यतिभि र्विधिवर्जितः ।
निन्द्यन्ते यतयोऽप्यन्यै रनिशं भोगलम्पटैः ॥१११॥
जिन ज्ञानी पुरुषों में शापादि का सामर्थ्य नहीं है और
[ ज्ञानी होने के नाते ] विधि से रहित हैं, तो ऐसे ज्ञानी को
विहित कर्मों का पालन करने वाले लोग निन्द्य समझते हैं।
इसका उत्तर यह है कि—यदि ऐसी निन्दा से डरोगे तो फिर
उन विध्यनुसारी लोगों की निन्दा भी तो विषयलम्पट लोग
सदा किया ही करते हैं [ वे तो कर्मी को पाखण्डी और पोप
नाम से पुकारते हैं। इस निन्दा से जैसे सच्चे कर्मी को कुछ
दुःख नहीं होता, इसी प्रकार कर्मी की निन्दा से सामर्थ्यहीन
ज्ञानी को दुःख नहीं हो सकता ]
भिक्षावस्त्रादि रक्षेयुर्यद्येते भोगतृप्तये ।
अहो यतित्वमेतेषां वैराग्यभरमन्थरम् ॥११२॥
यदि ये लोग भी भोग की तृप्ति के लिये भोजन वस्त्रादि
का उपार्जन करने लगें तो वह उनका यतिपन ही क्या हुआ ?
[ फिर उन्हें गृहस्थ आश्रम में ही कौनसी आफ़त थी । भाव
यह है कि यतिधर्म में दीक्षित पुरुष अपने व्यष्टि अहं के
लिये कुछ भी काम नहीं कर सकता है । उसे तो व्यष्टि अभि-
मान का पोषण करने वाली प्रत्येक बात से परहेज करना
चाहिये । नहीं तो उसका यतिधर्म नष्ट हो जाता है ]

वर्णाश्रमपरान् मूढा निन्दन्त्वित्युच्यते यदि ।
देहात्ममतयो बुद्धं निन्दन्त्वाश्रममानिनः ॥११३॥
यदि यह कहो कि मूढ [ अर्थात् विषयलम्पट और पामर ]
लोगों की निन्दा से वर्णाश्रम धर्म को पालने वाले [ कर्मी ]
की कुछ हानि नहीं होती है । फिर वे भले ही उनकी निन्दा
करते रहें, तो हम कहेंगे कि—देह को ही आत्मा मानने वाले,
आश्रमों का अभिमान करने वाले, कर्मी लोग तत्वज्ञानी की
निन्दा भी भले ही किया करें, उसकी भी उससे कुछ भी हानि
नहीं हो सकती ।
तदित्थं तत्वविज्ञाने साधनानुपमर्दनात् ।
ज्ञानिनाचरितुं शक्यं सम्यग् राज्यादि लौकिकम् ॥११४॥
[ प्रकृत बात तो यही हुई कि ] उक्त रीति से तत्वज्ञान हो
जाने के बाद लौकिक व्यवहार जिन मन आदि साधनों से
चलता है, उनका उपमर्द किंवा विनाश नहीं हो जाता, इस
लिये तत्वज्ञानी लोग लौकिक राज्य [ उस जैसे बड़े-बड़े काम
भी] भले प्रकार चला ही सकते हैं। [ज्ञानी होने का यह अभि-
प्राय कदापि नहीं है कि ज्ञानी पुरुष निकम्मा होकर क्षयरोगी
की तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाय या कहीं एकान्त गुफ़ा
में ही जा पड़े। जिन लोगों का विचार यह है कि ज्ञान हो जाने
पर तो कुछ काम हो ही नहीं सकता । वे तो तत्वज्ञान को
एक प्रकार का पक्षाघात रोग मानते हैं। ज्ञान तो मन की एक
उच्चतम अवस्था है । शरीर आदि के व्यापारों पर उसका कुछ
भी प्रभाव नहीं पड़ता । ज्ञान हो जाने पर भी शरीर आदि के
व्यापार ज्यों के त्यों चलते रह सकते हैं । ज्ञान होने पर केवल

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९१

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ध्यानदीपप्रकरणम् ३९१
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इतना अन्तर होता है कि वे काम अब तक जिस संकीर्ण दृष्टि-
कोण से हो रहे थे अब उससे न होकर व्यापक दृष्टिकोण से
होने लग पड़ते हैं। यों तत्व ज्ञानी लोग राज्य जैसे बड़े कामों
को औरों से अच्छी तरह कर सकते हैं। ज्ञानी में लोभ आदि
न रहने से उसके सभी काम आदर्श काम होते हैं।]
मिथ्यात्वबुद्धया तत्रेच्छा नास्ति चेत् तर्हि मास्तु तत् ।
ध्यायन्वाथ व्यवहरन् यथारब्धं वसत्वयम् ॥११५॥
उन सबको मिथ्या समझ लेने के कारण, ज्ञानी को उनकी
इच्छा ही न रहती हो तो न रहो। [हम तो कहते हैं कि]
ज्ञानी लोग अपने प्रारब्ध के अनुसार, चाहें तो ध्यान करते
रहें या फिर व्यवहार में लगे रहें।
उपासकस्तु सततं ध्यायन्नेव वसेद्, यतः !
ध्यानेनैव कृतं तस्य ब्रह्मत्वं विष्णुतादिवत् ॥११६॥
उपासक लोगों को तो सदा ध्यान में ही लगे रहना चाहिए।
क्योंकि उपासक तो ध्यान के प्रताप से ही ब्रह्मता को पाता है।
उपासक की ब्रह्मता प्रमाणों से समझ में नहीं आती। जैसे कि
ध्यान के प्रताप से ही अपने में जो विष्णुता संपादित होती है
वह पारमार्थिक विष्णुता नहीं होती। [उसे तो केवल ध्यान से
ही क़ायम रखना पड़ता है।]
ध्यानोपादानकं यत्तद्ध्यानाभावे विलीयते ।
वास्तवी ब्रह्मता नैव ज्ञानाभावे विलीयते ॥११७॥
जो बात ध्यान से ही उत्पन्न हुई है, वह तो ध्यान के न
रहने पर विलीन हो ही जायगी। परन्तु ब्रह्मता ऐसी नहीं होती
है। वह तो वास्तव होती है। इस कारण उस ब्रह्मता को जानने

३९२ पञ्चदशी

वाला ज्ञान जब नहीं भी रहता तब भी वह नष्ट नहीं हो जाती।
[वह तो तब भी बनी ही रहती है। अथवा सच्ची ब्रह्मता उसका
ज्ञान जब नहीं भी रहता, तब भी विलीन नहीं हो जाती है।
वह तो तब भी बनी ही रहती है।]
ततोऽभिज्ञापकं ज्ञानं न नित्यं जनयत्यदः ।
ज्ञापकाभावमात्रेण न हि सत्यं विलीयते ॥११८॥
क्योंकि वह ब्रह्मभाव नित्य है इसलिए ज्ञान तो उसका
ज्ञापक [बोधक] ही हो सकता है। जनक नहीं हो सकता।
केवल ज्ञापक के न रहने से ही सत्य पदार्थ नष्ट नहीं हो जाता
[अभिप्राय यह है कि-ब्रह्मता यदि ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली
होती तो ज्ञान के नष्ट होते ही नष्ट हो जाया करती। परन्तु वह
नष्ट नहीं होती, इसी से जानते हैं कि-ब्रह्मता उत्पन्न ही नहीं
होती। वह तो नित्य है।]
अस्त्येवोपासकस्यापि वास्तवी ब्रह्मतेति चेत् ।
पामराणां तिरश्चां च वास्तवी ब्रह्मता न किम् ॥११९॥
यदि कोई कहे कि-उपासक भी वास्तव ब्रह्म ही होता
है, तो हम कहेंगे कि इतना ही क्यों कहते हो ? क्या पामर
मनुष्य और पशु पक्षी भी वास्तव ब्रह्म नहीं हैं ?
अज्ञानादपुमर्थत्व मुभयत्रापि तत् समम् ।
उपवासाद् यथा भिक्षा वरं ध्यानं तथान्यतः॥१२०॥
यदि कोई कि-पामर मनुष्यों और पशु पक्षियों को तो
अपनी ब्रह्मता का ज्ञान नहीं होता, इस कारण उनकी ब्रह्मता
उनके किसी मतलब की नहीं होती, [ऐसी अज्ञात ब्रह्मता को
कोई भी पुरुषार्थ नहीं मानता है] तो हम कहेंगे कि यह बात

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९३

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९३
दोनों पक्षों में समान है [ उपासक को भी तो अपनी ब्रह्मता
का निश्चय नहीं होता है इसी कारण उसकी ब्रह्मता अपुरुषार्थ
होती है ]। हां इतनी बात तो है कि भूखे रहने से जैसे भीख
मांगना श्रेष्ठ होता है, इसी प्रकार और सब बातों से ध्यान
[ उपासना ] अच्छा माना जाता है।
पामराणां व्यवहृते वरं कर्माद्यनुष्ठितिः ।
ततोऽपि सगुणोपास्ति र्निर्गुणोपासना ततः ॥१२१॥
पामर लोगों के व्यवहार से तो कर्मानुष्ठान ही श्रेष्ठ है,
उससे सगुणोपासना भली है। सगुणोपासना से भी निर्गुणो-
पासना का दर्जा ऊंचा होता है।
यावद् विज्ञानसामीप्यं तावच्छ्रैष्ठ्यं विवर्धते ।
ब्रह्मज्ञानायते साक्षान्निर्गुणोपासनं शनैः ॥१२२॥
ज्यों-ज्यों विज्ञान की समीपता आती जाती है, त्यों त्यों
श्रेष्ठता की मात्रा बढ़ने लगती है। [ निर्गुणोपासना के सर्व-
श्रेष्ठ होने का कारण यही है कि—] यह उपासना अन्त में धीरे
धीरे ब्रह्म ज्ञान के रूप में परिणत होजाती है ।
यथा संवादिविभ्रान्तिः फलकाले प्रमायते ।
विद्यायते तथोपास्ति र्मुक्तिकालेऽतिपाकतः ॥१२३॥
फल मिलने के समय में जैसे संवादिभ्रम प्रमाज्ञान हो
जाता है, इसी प्रकार अतिपक्व हो जाने के कारण, मुक्ति का
समय आ जाने पर 'उपासना' ही 'ब्रह्मविद्या' हो जाती है ।
संवादिभ्रमतः पुंसः प्रवृत्तस्यान्यमानतः ।
प्रमेति चेत् तथोपास्ति र्मान्तरे कारणायताम्॥१२४॥

३९४ पञ्चदशी
जो पुरुष संवादिभ्रम से किसी वस्तु को उठाने दौड़ा है,
उसे [उस भ्रम से प्रमाज्ञान नहीं होता किन्तु उसे] किसी दूसरे
प्रमाण से प्रमाज्ञान हो जाता है। ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे
कि इसी प्रकार उपासना भी स्वयं तो ब्रह्मज्ञान नहीं हो जाती।
किन्तु दूसरे ज्ञान का कारण बन जाती है। [अर्थात् निर्गुणोपा-
सना निदिध्यासन रूप होकर अपरोक्ष ज्ञान को उत्पन्न कर
देती है।]
मूर्तिध्यानस्य मन्त्रादेरपि कारणता यदि।
अस्तु नाम तथाप्यत्र प्रत्यासत्तिर्विशिष्यते ॥१२५॥
यदि कहो कि—यों तो [चित्त की एकाग्रता के सम्पादन
के द्वारा] मूर्ति का ध्यान या मन्त्रादि भी अपरोक्षज्ञान के
कारण होते हैं तो हम इस बात को स्वीकार करते हैं। परन्तु
इस निर्गुणोपासना में इतनी विशेषता है कि यह उपासना ज्ञान
के सबसे अधिक समीप होती है।
निर्गुणोपासनं पक्कं समाधिः स्याच्छनैस्ततः।
यः समाधिर्निरोधाख्यः सोऽनायासेन लभ्यते ॥१२६॥
[वह निर्गुणोपासना ज्ञान के समीप यों है कि] यह
निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब इसकी सविकल्प समाधि
हो जाती है। फिर उस सविकल्प समाधि की ही निर्विकल्प
समाधि बन जाती है। यह निरोध नाम की समाधि निर्गुणो-
पासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है।
निरोधलाभे पुंसोऽन्तरसङ्गं वस्तु शिष्यते।
पुनः पुनर्वासितेऽस्मिन् वाक्याज्जायेत तत्त्वधीः ॥१२७॥
निरोध का लाभ हो जाने पर किंवा निर्विकल्प समाधि हो

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९५

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९५
जाने पर, पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है । इस
असंग वस्तु की भावना जब बार बार की जाती है तब तत्वमसि
आदि वाक्यों से तत्वज्ञान [ कि ब्रह्मनाम का सत्य मैं ही हूँ
यह ज्ञान ] उत्पन्न हो ही जाता है ।
निर्विकारासङ्गनित्यस्वप्रकाशैकपूर्णताः ।
बुद्धौ झटिति शास्त्रोक्ता आरोहन्त्यविवादतः ॥१२८॥
उस समय तो निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता,
एकता, तथा पूर्णता नामक उदार धर्म; जिन का कि शास्त्रों
में वर्णन आता है, झटपट बुद्धि में बैठ जाते हैं । फिर उसे
इनके विषय में विवाद या संशय नहीं रहता [ जब तक निरोध
का लाभ नहीं हो जाता,तब तक निर्विकारता,असंगता, स्वप्रका-
शता आदि का सच्चा अर्थ किसी की कल्पना में आता ही
नहीं । इन शब्दों के अन्दर जो अनन्त खजाना भरा पड़ा है
वह उक्त साधन किये बिना किसी को दीखता ही नहीं । ]
योगाभ्यास स्त्वेतदर्थोऽमृतविन्दादिषु श्रुतः ।
एवं च दृष्टद्वारापि हेतुत्वादन्यतो वरम् ॥१२९॥
अमृतबिन्दु आदि उपनिषदों में उसी [निर्विकल्प समाधि
को सिद्ध करने] के लिये योगाभ्यास का करना बताया है ।
[क्योंकि निर्गुण उपासना प्रत्यक्षज्ञान के सब से अधिक निकट
है । उससे एक यह दृष्ट फल भी होता है कि निर्विकल्प समाधि का
लाभ हो जाता है] यों यह निर्गुण उपासना सगुण उपासना
से बहुत ऊँची वस्तु है । यह निर्गुणोपासना दृष्ट [ निर्विकल्प-
समाधिलाभ] और अदृष्ट[ज्ञान का साधन होने से]दो प्रकारों
से सगुणोपासना आदियों से श्रेष्ठ वस्तु है ।

उपेक्ष्य तत् तीर्थयात्राजपादीनेव कुर्वताम् ।

३९६ पञ्चदशी

उपेक्ष्य तत् तीर्थयात्राजपादीनेव कुर्वताम् ।
पिंडं समुत्सृज्य करं लेढीति न्याय आपतेत् ॥ १३० ॥
[जो निर्गुणोपासना अपरोक्षज्ञान को सिद्ध कर सकती है]
उसे छोड़ कर जो अविचारी लोग तीर्थाटन और जप तप ही
करते रहते हैं,उनका परिश्रम तो उस जैसा ही है जो हाथ में से
गुडपिण्ड को फेंक कर हाथ को ही चाट रहा हो [अर्थात् उनका
परिश्रम वृथा होता है] ।
उपासकानामध्येवं विचारत्यागतो यदि ।
बाढं, तस्माद् विचारस्यासंभवे योग ईरितः ॥१३१॥
इस बात को तो हम भी स्वीकार करते हैं—कि आंतमतत्व
के विचारों को छोड़ कर निर्गुणोपासना करने वाले उपासक
भी इसी श्रेणी के हैं [वे गुड फेंक कर हाथ चाटने वाले के
समान ही अविचारशील हैं] इसी कारण से शास्त्रकी सम्मति तो
यही है कि जिस को विचार करना असंभव होता है उसी के
लिये योग [उपासना] का विधान किया गया है ।
बहुव्याकुलचित्तानां विचारात् तत्वधी र्नहि ।
योगो मुख्यस्ततस्तेषां धीदर्पस्तेन नश्यति ॥१३२॥
जिन पुरुषों के चित्त अत्यन्त व्याकुल हुए रहते हैं, उनको
विचार से तत्वज्ञान नहीं हो सकता । उनके लिये तो योग
ही मुख्य उपाय है । क्योंकि योग करने से उनका धीदर्प नष्ट
हो जाता है ।
अव्याकुलधियां मोहमात्रेणाच्छादितात्मनाम् ।
सांख्यनामा विचारः सन्मुख्यो झटिति सिद्धिदः॥१३३॥
जिन पुरुषों की बुद्धि व्याकुल नहीं होती है, जिनका

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९७

ध्यानदीपप्रकरणम् ३९७
आत्मा केवल मोह के आवरण में छिपा रहता है, उनके लिये तो
'सांख्य' नाम का तत्व विचार ही मुख्य उपाय है । क्योंकि
उनको उसीसे झटपट सिद्धि मिल जाती है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥१३४॥
[योग और सांख्य (उपासना और तत्वज्ञान) दोनों ही
तत्वज्ञान के द्वारा मुक्ति को दे देते हैं। यह बात गीता में भी
कही गयी है । ] कि—सांख्यमार्गी लोग जिस पद को पाते
हैं योगमार्गी लोग भी वहाँ पहुँच जाते हैं। जो ज्ञानी सांख्य
और योग को फल में एक समझ लेता है—इनमें भेद नहीं
जानता है, वही शास्त्र के मर्म का जानने वाला है।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्य मिति हि श्रुतिः ।
यस्तु श्रुते र्विरुद्धः स आभासः सांख्ययोगयोः ॥१३५॥
[ श्वेताश्वतर श्रुति में भी कहा है कि ] इस जगत् का जो
मूल कारण है,वह सांख्य या योग किसीसे भी जाना जासकता
है । आज कल 'सांख्य और योग' नामसे प्रसिद्ध शास्त्रों में जो
बहुत सी बातें श्रुति के विरुद्ध दीख पड़ती हैं वे 'सांख्य' या
योग नहीं है। वे तो 'सांख्या-भास' 'योगाभास' हैं। [आभास की
बाधा जैसे होजाती है वैसे ही उनकी भी बाधा होजायगी ]
उपासनं नापि पक्वमिह यस्य परत्र सः ।
मरणे ब्रह्मलोके वा तत्वं विज्ञाय मुच्यते ॥१३६॥
इस जन्म में जिस की उपासना ( योग ) परिपक्व न हो
चुकी हो, वह आगे चल कर या तो मरते समय या ब्रह्मलोक
में पहुँच कर, तत्व को जान जाता है और मुक्त हो जाता है।

३९८ पञ्चदशी
[उपासक तत्वज्ञान होने से पहले बीच में ही मर जाय तो
भी मोक्ष से वंचित नहीं रह जाता है ] ।
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति यच्चित्तस्तेनं यातीति शास्त्रतः ॥१३७॥
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरं तं तमेवैति ( प्र. ८-६)
प्राणी अपने मरण काल में जिस जिस भाव को स्मरण करके
शरीर को छोड़ता है, उसी उस भाव को प्राप्त हो जाता है।
यच्चित्तस्तेनैव प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथा संक-
ल्पितं लोकं नयति ( प्र. ३-१०) [मरते समय जैसा चित्त
अर्थात् संकल्प होता है, मरते समय जिस देवता मनुष्य पशु
पक्षी और वृक्ष आदि के शरीर को अच्छा मान लेता है, उस
संकल्प से वह अपनी सब इन्द्रियों के साथ मुख्य प्राण में
आ जाता है अर्थात् तब केवल प्राण व्यापार चलता है। इन्द्रिय
व्यापार रुक जाता है। वह प्राण तेज अर्थात् उदान से युक्त हो
कर भोक्ता को भी संकल्पानुसारी लोक में ले जाता है। कर्म
करते समय जैसे संकल्प रहे हैं मरते समय वे वासना रूपसे
प्रकट होते हैं। अगले जन्म में उन ही वासनाओं का शरीर बन
जाता है। मरण के बाद जैसा शरीर मिलना होता है, वैसी ही
वासनायें होती हैं और वे ही योनियां मुमूर्षु को दीखा करती हैं]
ऊपर के गीतावाक्य तथा इस श्रुति के कथनानुसार मरते
समय के ज्ञान से मुक्ति मिलने की बात समझ में आती है।
अन्त्यप्रत्ययतो नूनं भाविजन्म, तथा सति ।
निर्गुणप्रत्ययोऽपि स्यात् सगुणोपासने यथा ॥१३८॥