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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५५ यदि ब्राह्मण ने चोर, श्वपाक अथवा चाण्डाल का वध कर दिया हो तो वह दिन-रात उपवास कर पंचगव्य का प्राशन करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥२१॥ श्वपाकं १वाऽपि चाण्डालं विप्रः सम्भाषते यदि । द्विजसम्भाषणं कुर्यात् सावित्रीं च सकृज्जपेत् ॥२२॥ यदि ब्राह्मण श्वपाक अथवा चाण्डाल से संभाषण करे, तो वह अन्य ब्राह्मण से संभाषण कर एक बार गायत्री का जप करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥२२॥ चाण्डालैः सह सुप्ते तु त्रिरात्रमुपवासयेत् । चाण्डालैकपथं गत्वा गायत्रीस्मरणाच्छुचिः ॥२३॥ चाण्डाल के साथ सोनेवाला तीन राततक उपवास करे और उसके साथ रास्ता चलनेवाला गायत्री का स्मरण करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥२३॥ चाण्डालदर्शने सद्य आदित्यमवलोकयेत् । चाण्डालस्पर्शने चैव सचैलं स्नानमाचरेत् ॥२४॥ यदि चाण्डाल को देख ले तो सूर्य-दर्शन से शुद्ध हो जाता है, और यदि चाण्डाल का स्पर्श हो ( छू ) जाय तो वस्त्र-सहित स्नान करे तब वह शुद्ध होता है ॥२४॥ चाण्डाल खात वापीषु पीत्वा सलिलमग्रजः । अज्ञानाच्चैकभक्तेन त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥२५॥ यदि कोई ब्राह्मण अज्ञान से चाण्डाल के द्वारा निर्माण कराये गये वापी, कूप अथवा तालाब आदि का जल पी ले, या स्नान कर ले तो १. 'चाऽपि' ।

५६ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- एक भक्त करे, फिर दिन-रात उपवास करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥२५॥ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा कूपगतं जलम् । गोमूत्र यावकाहार स्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् । २६॥ जिस कूप में चाण्डाल ने अपना जलपात्र डाल रखा हो, उस कुएँ का जल पी ले, तो तीन दिनों तक गोमूत्र में जव पकाकर खावे तब शुद्धि होती है ॥२६॥ चाण्डालघटसंस्थं तु यत्तोयं पिवति द्विजः । तत्क्षणात् क्षिपते यस्तु प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२७॥ यदि कोई ब्राह्मण चाण्डाल के घड़े का जल पी ले और ज्ञात होने पर उसी क्षण वमन कर दे, तो उसे शुद्धि के लिए प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥२७॥ यदि न क्षिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति । प्राजापत्यं तदावश्यं कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥ जो चाण्डाल के घड़े का जल पीकर ज्ञात होने पर भी वमन न करे और वह जल उसके शरीर में पच गया हो तो उसे शुद्धि के लिए कृच्छ्र सान्तपन व्रत करना चाहिए ॥२८॥ चरेत् सान्तपनं विप्रः प्राजापत्यमनन्तरः । तदर्द्धं तु चरेद् वैश्यः पादं शूद्रस्य दापयेत् ॥२९॥ ब्राह्मण कृच्छ्र सान्तपन करे, क्षत्रिय चाण्डाल का जल पचाकर प्राजापत्य करे । वैश्य चाण्डाल का जल पचाकर अर्द्धप्राजापत्य तथा शूद्र प्राजापत्य का चतुर्थांश व्रत करे ॥२९॥ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु जलं दधि पयः पिवेत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव प्रमादतः ॥३०॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५७ यदि प्रमाद-वश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इन चार वर्णों में से कोई भी चाण्डाल के बरतन में रखे गये जल, दधि अथवा दूध को पी ले, तो ॥३०॥ ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनां तु निष्कृतिः । शूद्रस्य चोपवासेन तथा दानेन शक्तितः ॥३१॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की शुद्धि ब्रह्मकूर्च तथा उपवास से होती है । शूद्र उपवास तथा यथाशक्ति दान से शुद्ध हो जाता है ॥३१॥ भुङ्क्ते ऽज्ञानाद् द्विजश्रेष्ठश्चाण्डालान्नं कथञ्चन । गोमूत्रं यावकाहाराद् दशरात्रेण शुद्ध्यति ॥३२॥ यदि ब्राह्मण अनजान में किसी भाँति चाण्डाल का अन्न खा ले तो गोमूत्र में पकाये हुए ( यावक ) को दश रात तक खाने से शुद्ध होता है । ३२॥ एकैकं ग्रासमश्नीयाद् ³गोमूत्रयावकस्य च । दशाहं नियमस्तस्य व्रतं ⁴तत्र विनिर्दिशेत् ॥३३॥ दश रात तक गोमूत्र में पके हुए यावक को दश दिन तक एक-एक ग्रास प्रतिदिन खाये तथा उतने ही दिन नियम से रहे तो अनजान में खाये हुए चाण्डाल के अन्न से शुद्धि होती है ॥३३॥ १. ब्रह्मकूर्चम्— अहोरात्रोषितो भूत्वा पौर्णमास्यां विशेषतः । पञ्चगव्यं पिवेत् प्रातः 'ब्रह्मकूर्चम्' इति स्मृतम् ॥ अन्यत्राऽपि— पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः । ब्रह्मकूर्चाभिधानेन विष्णुलोके महीयते ॥ इति । २ '-यावकाहारो' इति । ३. 'गोमूत्रे' इति । ४. 'तत्तु' इति ।

५८ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- अविज्ञातस्तु चाण्डालो यत्र वेश्मनि तिष्ठति । विज्ञाते तूपसंन्यस्य द्विजाः कुर्युItemरनुग्रहम् ॥३४॥ जिसके घर में बिना जाने चाण्डाल निवास करे। फिर ज्ञात हो जाने पर उसे अपने घर से बाहर निकाल देवे और ब्राह्मण का अनुग्रह प्राप्त कर, प्रायश्चित्त करे ॥३४॥ मुनिवक्त्रोद्गतान् धर्मान् गायन्तो वेदपारगाः । पतन्तमुद्धरेयुस्ते धर्मज्ञाः पापसङ्कटात् ॥३५॥ वेद-पारंगत धर्मज्ञ ब्राह्मण उस पतित हुए पुरुष का पराशरादि धर्मज्ञ महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त बताकर धर्मसंकट से उद्धार करें ॥३५॥ दध्ना च सर्पिषा चैव क्षीरे गोमूत्र यावकम् । भुञ्जीत सह भृत्यैश्च* त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ॥३६॥ महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त जिसे उस पतित को करना चाहिए, इस प्रकार है : पतित पुरुष-जिसके घर में अनजाने चाण्डाल ने निवास किया हो-गोमूत्र में पके हुए यावक को दही, घी तथा दूध से भृत्यों के साथ भोजन करे और तीनों काल स्नान भी करे ॥३६॥ त्र्यहं भुञ्जीत दध्ना च त्र्यहं भुञ्जीत सर्पिषा । त्र्यहं क्षीरेण भुञ्जीत एकैकेन दिनत्रयम् ॥३७॥ उपर्युक्त गोमूत्र में पके हुए यावक को खाने की विधि इस प्रकार है-तीन दिन तक ( यावक को ) दही से, तीन दिन तक घृत से तथा तीन दिन तक दूध से । इस प्रकार एक-एक से तीन दिन भोजन करे ॥३७॥

  • 'सर्वैश्च' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५९ भावदुष्टं न भुञ्जीत नोच्छिष्टं कृमिदूषितम्। दधि क्षीरस्य त्रिपलं पलमेकं घृतस्य तु॥३८॥ यदि यावक, अपवित्र (भावदुष्ट), उच्छिष्ट अथवा कृमि से दूषित हो, तो उसे न खावे। तीन दिनों तक यावक से खाये जानेवाले दही तथा दूध का परिमाण प्रतिदिन तीन पल (बारह तोले) तथा घी का परिमाण एक पल (चार तोले) होना चाहिए ॥३८॥ भस्मना तु भवेच्छुद्धिुरुभयोः ताम्र कांस्ययोः। जलशौचेन वस्त्राणां परित्यागेन मृण्मयम् ॥३९॥ काँसे एवं ताँबे के पात्रों की शुद्धि भस्म (राख) से, वस्त्रों की शुद्धि जल के द्वारा तथा मिट्टी के पात्रों की शुद्धि उसे त्यागकर करनी चाहिए ॥३९॥ कुसुम्भं गुड कार्पास लवणं तैल मर्पिषी। द्वारे कृत्वा तु धान्यानि दद्याद् वेश्मनि पावकम् ॥४०॥ कुसुम्भ, गुड़, कपास, नमक, तेल तथा घी और अन्न को घर से बाहर द्वार पर निकालकर उस घर में आग लगा देनी चाहिए जिसमें चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४०॥ एवं शुद्धस्ततः पश्चात् कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम्। १विंशति गा वृषं चैकं दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥४१॥ इस प्रकार घर की शुद्धि तथा अपनी शुद्धि कर उस पुरुष को ब्राह्मण-भोजन कराने के उपरान्त बीस गौ तथा एक बैल का दान करना चाहिए, जिसके घर में चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४१॥ १. 'त्रिंशतं' इत्यपि पाठः।

प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से

६० पाराशरस्मृतिः [षष्ठो- पुनर्लेपन खातेन होम जंप्येन शुद्धयति । आधारेण च विप्राणां भूमिदोषो न विद्यते ॥४२॥ प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से शुद्ध करना चाहिए। फिर ब्राह्मणों को बिठाकर भोजन कराना चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणों के बैठने से ही भूमि का दोष नष्ट हो जाता है ॥४२॥ चाण्डालैः सह सम्पर्कं मासं मासार्द्धमेव वा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्धयति ॥४३॥ यदि चाण्डालों का साथ एक महीने अथवा एक पाख तक रहा हो तो १५ दिन तक गोमूत्र में पके हुए जव के खाने से उस पुरुष की शुद्धि होती है ॥४३॥ रजकी कर्मकारी च लुब्धकी वेणुजीविनी । चातुर्वर्ण्यस्य च गृहे त्वविज्ञाता तु तिष्ठति ॥४४॥ धोबिन, चमाइन, बहेलिन ( बहेलिये की स्त्री ) अथवा बाँस से जीविका करनेवाली (घरकारिन) यदि चारों वर्गों के घर में अनजान में निवास कर ले, तो ॥४४॥ ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेव हि । गृहदाहं न कुर्वीत शेषं सर्वं च कारयेत् ॥४५॥ पता लगने पर चारों वर्गों को उसका प्रायश्चित्त करना चाहिए। केवल घर में आग न लगावे, शेष जैसा चाण्डाल के निवास का प्रायश्चित्त कहा है वह सभी प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥४५॥ १. 'जाप्येन' इति । २. 'अनुतिष्ठति' इति ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६१ गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेच्चाण्डालो यदि कस्यचित् । तमागाराद् विनिर्वास्य¹ मृद्भाण्डं तु विसर्जयेत् ॥४६॥ यदि किसी के घर में चाण्डाल चला जाय तो उस चाण्डाल को घर से बाहर निकालकर घर के मिट्टी के बर्तनों को फेंक देना चाहिए ॥४६॥ रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं न त्यजेत्तु कदाचन । गोमयेन तु सम्मिश्रैर्जलैः प्रोक्षेद् गृहं तथा ॥४७॥ जिन मिट्टी के बर्तनों में रस, तेल, घी आदि भरा हो उसका त्याग नहीं करना चाहिए, गोबर से घर को लीप देना चाहिए ॥४७॥ ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूय-शोणितसम्भवे । कृमिरुत्पद्यते यस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥४८॥ यदि ब्राह्मण को व्रण (फोड़ा-घाव) होकर उसमें से खून अथवा पीब बहने लगे अथवा यदि उसमें कीड़े पड़ गये हों तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार करना चाहिए ? ॥४८॥ गवां मूत्र पुरीषेण ²दध्ना क्षीरेण सर्पिषा । त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च कृमिदुष्टः शुचिर्भवेत् ॥४९॥ उस पुरुष को जिसके व्रण में कृमि पड़ गयी हों, तीन दिन तक पञ्चगव्य से स्नान करना चाहिए तथा पञ्चगव्य ही खाना चाहिए तो कृमिदोष से शुद्ध हो जाता है ॥४९॥ क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य पञ्च माषान् ³प्रदाय तु । गोदक्षिणां तु वैश्यस्याऽप्युपवासं विनिर्दिशेत् ॥५०॥ १. ‘विनिःसार्य’ इति । २. ‘दधि-क्षीरेण’ इति । ३. ‘प्रदापयेत्’ इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

६२ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- यदि किसी क्षत्रिय के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे पांच मासे सोने का दान करना चाहिए। यदि वैश्य हो तो उसे एक दिन उपवास कर गो-दान करना चाहिए। इस प्रकार करने से क्षत्रिय तथा वैश्य की शुद्धि होती है ॥५०॥ शूद्राणां नोपवासः स्यात् शूद्रो दानेन शुद्ध्यति । अच्छिद्रमिति यद्-वाक्यं वदन्ति क्षितिदेवताः ॥५१॥ यदि शूद्र के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे उपवास करने की आवश्यकता नहीं है । वह केवल दान मात्र से ही शुद्ध हो जाता है । ब्राह्मण दान के अनन्तर यदि 'अच्छिद्रमस्तु' कह दें, तो ॥५१॥ प्रणम्य शिरसा ग्राह्यमग्निष्टोमफलं हि तत् । जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥५२॥ उन्हें प्रणाम कर, उनके दिये हुए अक्षत को माथे पर चढ़ाने से अग्निष्टोम के तुल्य फल होता है। जप, तप तथा यज्ञादि में कोई छिद्र (दोष-त्रुटि) हो जाय तो ॥५२॥ सर्वं भवति निश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् । व्याधि-व्यसनि-निश्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा ॥५३॥ ब्राह्मणों के द्वारा कहे गये 'अच्छिद्रमस्तु' इस वाक्य मात्र से ही यजमान के समस्त जप, तप तथा यज्ञादि कर्म पूर्ण हो जाते हैं। व्याधि में, व्यसन में, थकी हुई अवस्था में, दुर्भिक्ष तथा राज-विप्लव होने पर, ॥५३॥ उपवासो व्रतं होमो द्विजसम्पादितानि वै । अथवा ब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वे कुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥५४॥ ब्राह्मणों के द्वारा जप, होम तथा व्रत करावे, यदि इस प्रकार ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर अनुग्रह करें तो ॥५४॥

सर्वान् कामानवाप्नोति द्विजसम्पादितैरिह ।

ऽध्यायः भाषाटीकासहिता ६३ सर्वान् कामानवाप्नोति द्विजसम्पादितैरिह । दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वै बाल-वृद्धयोः ॥५५॥ इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा व्रतादि से पुरुष की समस्त अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। ब्राह्मणों को भी दुर्बल, बालक तथा वृद्ध पर विशेष रूप से अनुग्रह रखना चाहिए ॥५५॥ अतोऽन्यथा भवेद् दोषस्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः । स्नेहाद् वा यदि वालोभाद् भयादज्ञानतोऽपि वा ॥५६॥ इसके अतिरिक्त यदि बिना कारण ही ब्राह्मण अनुग्रह करे तो दोष होता है, क्योंकि किसी पर स्नेह, लोभ, भय तथा अज्ञान से किया गया अनुग्रह ॥५६॥ कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति । शरीरस्याऽत्यये प्राप्ते वदन्ति नियमं तु ये ॥५७॥ ब्राह्मणों के लिए ही पाप का कारण बन जाता है। इसलिए दुर्बल बालक तथा वृद्ध के अतिरिक्त किसी पर भी स्नेहादिवश ब्राह्मण अनुग्रह न करे। शरीर के नाश होने की अवस्था में जो उसे नियम तथा व्रत का उपदेश करता है ॥५७॥ महत्कार्योपरोधेन न स्वस्थस्य कदाचन । स्वस्थस्य मूढाः कुर्वन्ति वदन्ति नियमं चं^१ ये ॥५८॥ अथवा किसी बड़े कार्य में लगे या स्वस्थ व्यक्ति को उपदेश नहीं देते एवं वे मन्दबुद्धि उपदेशक स्वस्थों के लिए नियम का उपदेश नहीं करते ॥५८॥ ते तस्य विघ्नकर्तारः पतन्ति नरकेऽशुचौ । स्वयमेव व्रतं कृत्वा ब्राह्मणं योऽवमन्यते ॥५९॥ १. 'तु' इति ।

६४ पाराशरस्मृतिः षष्ठो- इस प्रकार उपदेश करनेवाले लोग उस पुरुष के कार्य में विघ्न उत्पन्न करते हैं और अनुचित नरक में गिरते हैं। तथा जो ब्राह्मण के उपदेश के बिना ही स्वयं व्रत, नियम आदि का आचरण करते हैं ॥५९॥ वृथा तस्योपवासः स्यान्न स पुण्येन युज्यते । स एव नियमो ग्राह्यो यमेकोऽपि वदेद् द्विजः ॥६०॥ ब्राह्मण के अपमान को करनेवाले उपपुरुष ( जिसने ब्राह्मण के उपदेश के बिना ही व्रत तथा उपवास का अनुष्ठान किया है) का किया हुआ समस्त व्रत एवं उपवास व्यर्थ है, उसे कोई फल नहीं प्राप्त होता । इसलिए व्रत अथवा उपवास वेदज्ञ ब्राह्मण के उपदेश करने पर ही फलप्रद होता है ॥६०॥ कुर्याद् वाक्यं द्विजाना च त्वन्यथा भ्रूणहा भवेत् । ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं तीर्थभूता हि साधवः ॥६१॥ ब्राह्मणों की आज्ञा माननी चाहिए। न मानने पर भ्रूणहत्या-जैसा महापाप लगता है। ब्राह्मण चलने-फिरनेवाले तीर्थ ही हैं। इसी प्रकार साधुजनों को भी तीर्थ-स्वरूप ही समझना चाहिए ॥६१॥ तेषां वाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्ति मलिना जनाः । ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः ॥६२॥ ब्राह्मणों के वाक्यरूप जल से मलिन पुरुष भी शुद्ध हो जाते हैं। ब्राह्मण जिस बात को कहते हैं, देवता लोग भी उस बात को मान लेते हैं ॥६२॥ सर्वदेवमयो विप्रो न तद्-वचनमन्यथा । उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः ॥६३॥

¹विप्रसम्पादितं यस्य सम्पूर्णं तस्य तत्फलम् ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६५ ब्राह्मण सर्वदेवमय है, उसका कहा गया कोई भी वचन व्यर्थ नहीं होता । जो ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर उपवास, व्रत, स्नान तथा तीर्थ करते हैं ॥६३॥ ¹विप्रसम्पादितं यस्य सम्पूर्णं तस्य तत्फलम् । अन्नाद्ये कीटसंयुक्ते मक्षिका-केशदूषिते ॥६४॥ उन्हीं को उस स्नान, व्रतादि का सम्पूर्ण फल होता है । अन्न आदि किसी वस्तु में यदि कीड़ा पड़ जावे अथवा मक्खी या केश पड़ जावे, तो ॥६४॥ तदन्तरा स्पृशेच्चापस्तदन्नं भस्मना स्पृशेत् । भुञ्जानश्चैव यो विप्रः पादं हस्तेन संस्पृशेत् ॥६५॥ उसमें जल छोड़ देवे पश्चात् भस्म छिड़क देवे तो उस अन्न की शुद्धि हो जाती है । जो ब्राह्मण भोजन के समय अपने हाथ से पैरों को छू लेवे ॥६५॥ स्वमुच्छिष्टमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते भुक्तभाजने । पादुकास्थो न भुञ्जीत पर्यङ्के² संस्थितोऽपि वा ॥६६॥ उसे उच्छिष्ट भोजन का पाप लगता है, अथवा उच्छिष्ट पात्र में भोजन करने से जो पाप लगता है वह उसे भी लगता है । खड़ाऊँ पर बैठकर भोजन न करे अथवा पर्यंक ( खटिया ) आदि पर बैठकर भी भोजन नहीं करे ॥६६॥ श्वान-चाण्डालदृष्टौ³ च भोजनं परिवर्जयेत् । यदन्नं प्रतिषिद्धं स्याद्भक्ष्याशुद्धिस्तथैव च ॥६७॥ १. 'विप्रैः' इति । २. 'पर्यङ्कस्थ-स्थितोऽपि' इति क्वचित्पुस्तके पाठः । ३. 'दृक् चैव' इति । ५

६६ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- कुत्ता अथवा चाण्डाल के देखते भोजन नहीं करे। जो अन्न नहीं खाना चाहिए और जिस भाँति अन्न की शुद्धि होती है ॥६७॥ यथा पराशरेणोक्तं तथैवाऽहं वदामि वः। शृतं द्रोणाढकस्याऽन्नं काक-श्वानोपघातितम्॥६८॥ पराशर ने इस विषय में जैसा कहा है, वह सब मैं आप लोगों से कहता हूँ। यदि द्रोण अथवा आढक में भरे हुए अन्न को कुत्ता अथवा कौआ जूठा कर दे, तो ॥६८॥ 'केनेदं शुद्ध्यते ? चे'ति ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्। काक-श्वानावलीढं तु द्रोणान्नं न परित्यजेत् ॥६९॥ 'उसकी शुद्धि किस प्रकार होगी?' इसपर पराशर का मत है कि कुत्ता अथवा कौआ यदि द्रोण परिमाण अन्न को दूषित कर दे तो उसका त्याग नहीं करना चाहिए ॥६९॥ वेद-वेदाङ्गविद्-विप्रैर्धर्मशास्त्रानुपालकैः। प्रस्था द्वात्रिंशतिर्द्रोणः १स्मृतो द्विप्रस्थ आढकः ॥७०॥ वेद, वेदाङ्ग को जाननेवाले तथा धर्मशास्त्रों का पालन करने वाले ब्राह्मणों ने ३२ प्रस्थ का द्रोण कहा है और दो प्रस्थ को आढक कहा है ॥७०॥ ततो द्रोणाऽऽढकस्यान्नं श्रुति-स्मृतिविदो विदुः। काक-श्वानावलीढं तु गवाघ्रातं खरेण वा ॥७१॥ इसलिए श्रुति तथा स्मृति को जाननेवाले ब्राह्मणों ने कहा है कि यदि द्रोण वा आढक परिमाणवाले अन्न को कौआ या कुत्ता जूठा १. 'प्रस्थाश्चत्वार आढकाः' इति।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६७ कर दे अथवा गौ और गधे ने उसे सूँघ लिया हो, तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिए ॥७१॥ स्वल्पमन्नं त्यजेद् विप्रः शुद्धिद्रोणाऽऽढके भवेत् । अन्नस्योद्धृत्य तन्मात्रं यच्च लालाहतं भवेत् ॥७२॥ परिमाण में यदि अन्न थोड़ा हो तो उसे ही कौआ, कुत्ता के द्वारा जूठा करने पर गौ अथवा गधे से सूँघे जाने पर, त्याग करे। किन्तु द्रोण अथवा आढक परिमाणवाले अन्न को जितने में लार लगी हो उसे निकालकर फेंक दे, शेष की शुद्धि इस प्रकार करे ॥७२॥ सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य हुताशेनेव तापयेत् । हुताशनेन संस्पृष्टं सुवर्णसलिलेन च ॥७३॥ निकालने से शेष अन्न को सोने के जल से धोकर आग में तपा देवे, तब वह शुद्ध हो जाता है। क्योंकि सोने के जल से धोकर आग में तपा देने से, ॥७३॥ विप्राणां १वेदघोषेण भोज्यं भवति तत्क्षणात् । स्नेहो वा गोरसो वाऽपि तत्र शुद्धिः कथं भवेत् ? ॥७४॥ तदनन्तर ब्राह्मणों के वेद-घोष से अन्न भोजन के योग्य हो जाता है। यदि कोई स्नेह (घी, तेल) अथवा गोरस (दूध, दही) आदि कुत्ते, कौवे ने जूठा कर दिया हो, अथवा गौ, गधे ने उसको सूँघ लिया हो तो उसकी शुद्धि किस प्रकार करनी चाहिए ? ॥७४॥ १. 'ब्रह्मघोषेण' इति ।

६८ पराशरस्मृतिः [ सप्तमो- अल्पं व¹रित्यजेदन्नं स्नेहस्योत्पवनेन च। अनलज्वालया शुद्धिर्गोरसस्य विधीयते ॥७५॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे प्राणहत्यादि-निष्कृतिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ यदि स्वल्प थोड़ा अन्न काकादि से उपहत हो, तो उसे फेंक देना चाहिये। परन्तु यदि चिकना घृत या तेल हो तो उसे कुशों के द्वारा ऊपर उछालना चाहिए और यदि गोरस (दूध, दही आदि) हो तो आग पर रख देने से शुद्ध हो जाता है ॥ ७५ ॥ इस प्रकार आचार्य पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र का छठा अध्याय समाप्त ॥६॥ * ७. सप्तमोऽध्यायः अथाऽतो द्रव्यसंशुद्धिः पराशरवचो यथा। दारवाणां तु पात्राणां तत्तक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ १ ॥ इसके अनन्तर पराशर मुनि के मतानुसार द्रव्यों की शुद्धि कहता हूँ। काठ के बने हुए पात्र यदि अमेध्य वस्तु के सम्पर्क से दूषित हो जायें तो उन्हें किञ्चित् छील देने से शुद्धि हो जाती है ॥१॥ मार्जनाद् यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि। चमसानां ³ग्रहाणां च शुद्धिः प्रक्षालनेन तु ॥ २ ॥ १. 'तत्र' इति। २. चमत्यस्मिन्नसौ चमसः। पलाशदिकाष्ठनिर्मितो यज्ञियपात्रविशेषः। ३. गृह्यतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या सोमाधारभूतं ग्रहशब्देनाभिधीयते।

ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६९ यज्ञकर्म में यज्ञीय पात्रों की शुद्धि हाथ से पोछ देने पर होती है । किन्तु चमस एवं ग्रह नामक यज्ञीय पात्र जल से धोने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥२॥ चरूणां च स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा । भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यते ॥ ३ ॥ चरु पात्र तथा स्रुव की शुद्धि गरम जल में डाल देने से होती है। काँस का बरतन भस्म (राख) से तथा ताँवे का बरतन खटाई से शुद्ध होता है ॥३॥ रजसा शुद्ध्यते नारी विकलं या न गच्छति । नदी वेगेन शुद्ध्येत लेपो यदि न दृश्यते ॥ ४ ॥ स्त्री यदि नीचादि सम्पर्क से दूषित न हो तो रजस्वला हो जाने पर शुद्ध हो जाती है । (केवल मानस-व्यभिचार करने पर) । (अथवा पीतल का बरतन मिट्टी से रगड़ने पर शुद्ध होता है) । यदि नदी में कोई लेप (विकृत पदार्थ) न दीख पड़े, तो वह वेग से शुद्ध हो जाती है ॥४॥ वापी-कूप-तडागेषु दूषितेषु कथञ्चन । उद्धृत्य वै कुम्भशतं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ ५ ॥ यदि वापी, कूप और तड़ाग (तालाब) किसी कारण से दूषित हो गये हों तो उनमें से सौ घड़ा जल निकालकर पंचगव्य डालने से शुद्ध हो जाते हैं ॥५॥ अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी । दशवर्षा भवेत् कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥ ६ ॥ १. चरति होमादिकमस्मादसौ चरुः ।

७० पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- आठ वर्ष की कन्या 'गौरी' नव वर्ष की 'रोहिणी', तथा दश वर्ष की 'कन्या' कही जाती है। इससे अधिक अवस्था होने पर वह कन्या 'रजस्वला' कही जाती है ॥६॥ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम् ॥ ७ ॥ बारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर जो लोग कन्यादान नहीं करते उनके पितर उस कन्या का रज प्रति मास पीते रहते हैं। अतः दश वर्ष की अवस्था में कन्यादान कर देना चाहिये ॥७॥ माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्या रजस्वलाम् ॥ ८ ॥ यदि कन्या विवाह के पहले ही रजस्वला हो गयी हो, तो रजस्वला कन्या को देखकर उसके माता, पिता तथा जेठे भाई नरक में जाते हैं ॥८॥ यस्तां समुद्वहेत् कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असम्भाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥ ९ ॥ उस रजस्वला कन्या से जो ब्राह्मण मद से मोहित होकर विवाह कर लेता है, उसे 'वृषलीपति' कहते हैं। द्विजातियों को उससे सम्भाषण नहीं करना चाहिए और उसको पंक्ति से बाहर कर देना चाहिए ॥९॥ यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः । स भैक्षभुग् जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्विशुद्ध्यति ॥१०॥ जो ब्राह्मण एक रात भी (वृषली) रजस्वला कन्या का सेवन करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षान्न का भोजन करता हुआ गायत्री का जप करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥१०॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७१ अस्तङ्गते यदा सूर्ये चाण्डालं पतितं स्त्रियम् । सूतिकां स्पृशतश्चैव कथं शुद्धिविधीयते¹ ? ॥११॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर यदि पतित पुरुष, चाण्डाल अथवा सूतिका स्त्री का स्पर्श हो जावे तो उन द्विजातियों की शुद्धि किस प्रकार होगी ? ॥११॥ जातवेदं सुवर्णं च सोममार्गं विलोक्य च । ब्राह्मणाऽनुमतश्चैव स्नानं कृत्वा विशुद्ध्यति ॥१२॥ जातवेद ( अग्नि ), सुवर्ण तथा चन्द्रमा ( चन्द्रमा के अभाव में चन्द्र-पथ ) को देखकर द्विजाति, ब्राह्मणों की आज्ञा से स-चैल ( वस्त्र- सहित ) स्नान करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१२॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी ब्राह्मणीं तथा । तावत्तिष्ठेन्निराहारा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति ॥१३॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी किसी दूसरी रजस्वला ब्राह्मणी से छू जावे तो उन दोनों रजस्वलाओं को तीन दिनों तक उपवास करना चाहिए । फिर स्नान कर शुद्ध हो जाती हैं ॥१३॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी क्षत्रियां तथा । अर्द्धकृच्छ्रं चरेत् पूर्वा पादमेकं त्वनन्तरा ॥१४॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला तथा क्षत्राणी रजस्वला परस्पर एक दूसरे को उस अवस्था में छू लें, तो ब्राह्मणी रजस्वला अर्द्धकृच्छ्र तथा क्षत्राणी रजस्वला पादकृच्छ्र व्रत करे तब उनकी शुद्धि होती है ॥१४॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी वैश्यां तथा । पादहीनं चरेत् पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥१५॥ १. 'विशिष्यते' इति क्वचित्पुस्तके ।

७२ पाराशरस्मृतिः [ सप्तमो- यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी वैश्य रजस्वला स्त्री से छू जाय तो ब्राह्मणी रजस्वला त्रिपादकृच्छ्र तथा वैश्य की रजस्वला स्त्री पादकृच्छ्र व्रत करे। इस प्रकार दोनों की शुद्धि होती है ॥१५॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ब्राह्मणी शूद्रजां तथा । कृच्छ्रेण शुद्धयते पूर्वा शूद्रा दानेन शुद्धयति ॥१६॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी शूद्र जातीय रजस्वला स्त्री से स्पृष्ट हो जाय तो ब्राह्मणी सम्पूर्ण कृच्छ्र व्रत करे तथा शूद्रा स्त्री केवल दान से शुद्ध होती है ॥१६॥ स्नाता रजस्वला या तु चतुर्थेऽहनि शुद्धयति । कुर्याद् रजोनिवृत्तौ तु दैव-पित्र्यादि कर्म च ॥१७॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करने के उपरान्त शुद्ध हो जाती हैं। परन्तु जब तक रज से उसकी पूर्ण निवृत्ति नहीं हो जाती, तब तक वह देवता तथा पितृकार्य करने की अधिकारिणी नहीं होती ॥१७॥ रोगेण यद्रजः स्त्रीणामन्वहं तु प्रवर्त्तते । नाऽशुचिः सा ततस्तेन तत् स्याद् १वैकालिकं मलम् ॥१८॥ यदि स्त्री को नित्य-प्रति रोग के कारण रज निकलता हो तो वह उस रज से अपवित्र नहीं होती। क्योंकि वह अकालिक धातुगत मल है ॥१८॥ साध्वाचारा न तावत् स्याद् रजो यावत् प्रवर्त्तते । रजोनिवृत्तौ गम्या स्त्री गृहकर्मणि चैव हि ॥१९॥ जब तक स्त्री को रज निकलता रहे तब तक वह देव तथा पितृकर्म की अधिकारिणी नहीं रहती। रजोनिवृत्ति के उपरान्त ही वह संभोग के योग्य तथा गृह-कर्म के योग्य होती है ॥१९॥ १. 'वैकारिकं मल' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहित। ७३ प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥२०॥ स्त्री रजोधर्म के प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन रजकी ( धोबिन ) के तुल्य होती है । फिर चौथे दिन स्नान के उपरान्त शुद्ध होती है ॥२०॥ आतुरे स्नान उत्पन्ने दशकृत्वो ह्यनातुरः । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुद्ध्येत् स आतुरः ॥२१॥ यदि किसी आतुर को स्नान करना आवश्यक हो, तो अनातुर ( स्वस्थ पुरुष ) दश बार स्नान कर प्रत्येक स्नान के अनन्तर उसका स्पर्श करने से वह आतुर पुरुष शुद्ध हो जाता है ॥२१॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः । उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥२२॥ यदि कोई जूठे मुँहवाला ब्राह्मण किसी दूसरे जूठे मुँहवाले पुरुष अथवा कुत्ता या शूद्र का स्पर्श कर ले, तो वह ब्राह्मण एक रात उपवास कर पंचगव्य ( गौ का दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र ) का प्राशन करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥२२॥ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण स्पर्शे स्नानं विधीयते । तेनोच्छिष्टेन संस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२३॥ यदि जूठा मुँहवाला ब्राह्मण किसी अनुच्छिष्ट शूद्र से छू जाय तो स्नान करे और यदि शूद्र जूठे मुँहवाला हो, उससे ब्राह्मण छू जाय तो प्राजापत्य व्रत करे ॥२३॥

७४ पराशरस्मृतिः [सप्तमो- भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं सुरया यन्न लिप्यते । सुरामात्रेण संस्पृष्टं शुद्ध्यतेऽग्न्युपलेखनैः१ ॥२४॥ जो काँस पात्र में मद्य का स्पर्श न हुआ हो, तो वह भस्म से मलने पर शुद्ध हो जाता है । किन्तु मद्य के स्पर्श हो जानेपर अग्नि में तपाकर माँजने से उसकी शुद्धि होती है ॥२४॥ गावाघ्रातानि कांस्यानि श्व-काकोपहतानि च । शुद्ध्यन्ति दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टानि यानि च ॥२५॥ जिस काँस के पात्र को गौ ने सूंघ लिया हो, कुत्ता अथवा कौवे ने उसे दूषित कर दिया हो अथवा शूद्र के द्वारा वह उच्छिष्ट कर दिया गया हो वह दश बार क्षार ( खट्टे ) पदार्थ के द्वारा मलने से शुद्ध होता है ॥२५॥ गण्डूषं पादशौचं च कृत्वा वै कांस्यभाजने । षण्मासान् भुवि निक्षिप्य उद्धृत्य पुनराहरेत् ॥२६॥ काँस के बरतन में कुल्ला कर देने पर अथवा पैर धो लेने पर छः महीने तक उसे पृथ्वी में गाड़े । तदनन्तर उसका व्यवहार करे ॥२६॥ आयसेष्वायसानां च सीसस्याग्नौ विशोधनम् । दन्तमस्थि तथा शृङ्गं रौप्यं सौवर्णभाजनम् ॥२७॥ लोहे के पात्र के अशुद्ध हो जाने पर उसे लोहे से रगड़े । शीशे के पात्र क अशुद्ध हो जाने पर उसे अग्नि में तपावे । दाँत, हड्डी, सींग, चाँदी एवं सोने के बने हुए पात्र, ॥२७॥ मणिपात्राणि शङ्खश्चेत्येतान् प्रक्षालयेज्जलैः । पाषाणे तु पुनर्धर्षः शुद्धिरैवमुदाहृता ॥२८॥ १. ‘-ऽग्न्युपलेपनैः’ इति पुस्तकान्तरे ।