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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पातञ्जलयोगदर्शन

(साधारण हिंदी भाषाटीकासहित)


टीकाकार—

हरिकृष्णदास गोयन्दका


संवत् २००७, प्रथम संस्करण, १५,२५०

मूल्य ।।।) सजिल्द १)

पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

पातञ्जलयोगदर्शनके प्रधान विषयोंकी सूची

समाधिपाद १

सूत्रविषयपृष्ठ
१-४ग्रन्थके आरम्भकी प्रतिज्ञा, योगके लक्षण और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन... १-२
५-११चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण... २-९
१२-१६अभ्यास और वैराग्यका प्रकरण... ९-१३
१७-२२समाधिका विषय ...... १३-१९
२३-२९ईश्वर-प्रणिधान और उसके फलका कथन... १९-२३
३०-४०चित्तके विक्षेपोंका, उनके नाशका और मनकी स्थितिके लिये भिन्न-भिन्न उपायोंका वर्णन... २३-३०
४१-५१समाधिके फलसहित अवान्तर भेदोंका वर्णन... ३१-३९

साधनपाद २

सूत्रविषयपृष्ठ
१-२क्रियायोगके स्वरूप और फलका निरूपण... ४०-४२
३-९अविद्यादि पाँच क्लेशोंका वर्णन... ४२-४८
१०-१७क्लेशोंके नाशका उपाय और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन... ४८-५५
१८-२२दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका तथा दृश्यकी सार्थकताका कथन५६-५९
२३-२७प्रकृति-पुरुषके अविद्याकृत संयोगका स्वरूप और उसके नाशके उपायभूत अविचल विवेकज्ञानका निरूपण५९-६४
२८-५५विवेकज्ञानकी प्राप्तिके लिये अष्टाङ्गयोगके अनुष्ठानकी आवश्यकता, आठों अङ्गोंके नाम तथा उनमेंसे पाँच बाह्य अङ्गोंके लक्षण और उनके विभिन्न अवान्तर फलोंका वर्णन६४-८२

( ३ )

विभूतिपाद ३

सूत्रविषयपृष्ठ
१-३{ धारणा, ध्यान और समाधि--इन तीनों अङ्गोंके स्वरूपका प्रतिपादन ...८३-८४
४-८निर्बीज समाधिके बहिरङ्ग साधनरूप संयमका निरूपण ...८४-८६
९-१२चित्तके परिणामोंका विषय ...८६-८९
१३-१५प्रकृतिजनित समस्त पदार्थोंके परिणामका निरूपण ...९०-९५
१६-४८फलसहित भिन्न-भिन्न संयमोंका वर्णन ...९६-११९
४९-५५{ विवेकज्ञानका और उसके परम फलरूप कैवल्यका निरूपण ...११९-१२४

कैवल्यपाद ४

१-५ | { सिद्धियोंकी प्राप्तिके पाँच हेतुओंका तथा जात्यन्तर-परिणामका विषय ... | १२५-१२९ ६-७ | { ध्यानजनित परिणामकी संस्कारशून्यता (निराशयता) का प्रतिपादन और योगीके कर्मोंकी महिमा ... | १३०-१३१ ८-११ | साधारण मनुष्योंके कर्मफल-प्राप्तिके प्रकारका वर्णन ... | १३१-१३३ १२-२४ | अपने सिद्धान्तका युक्तिपूर्ण प्रतिपादन ... | १३४-१४३ २५-३४ | { विवेकज्ञानका विषय और धर्ममेघ समाधि तथा कैवल्य-अवस्थाका निरूपण ... | १४४-१५०


॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥

निवेदन

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥

योगदर्शन एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और साधकोंके लिये परम उपयोगी शास्त्र है। इसमें अन्य दर्शनोंकी भाँति खण्डन-मण्डनके लिये युक्तिवादका अवलम्बन न करके सरलतापूर्वक बहुत ही कम शब्दोंमें अपने सिद्धान्तका निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थपर अबतक संस्कृत, हिन्दी और अन्यान्य भाषाओंमें बहुत भाष्य और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। भोजवृत्ति और व्यासभाष्यके अनुवाद भी हिन्दी-भाषामें कई स्थानोंसे प्रकाशित हो चुके हैं। इसके सिवा 'पातञ्जलयोगप्रदीप' नामक ग्रन्थ स्वामी ओमानन्दजीका लिखा हुआ भी प्रकाशित हो चुका है; इसमें व्यासभाष्य और भोजवृत्तिके सिवा दूसरे-दूसरे योगविषयक शास्त्रोंके भी बहुत-से प्रमाण संग्रह करके एवं उपनिषद् और श्रीमद्भगवद्गीतादि सद्ग्रन्थोंके तथा दूसरे दर्शनोंके साथ भी समन्वय करके ग्रन्थको बहुत ही उपयोगी बनाया गया है। परन्तु ग्रन्थका विस्तार अधिक है और मूल्य अधिक होनेके कारण सर्वसाधारणको सुलभ भी नहीं है। इन सब कारणोंको विचारकर करीब दो वर्ष पहले पूज्यपाद भाईजी श्रीजयदयालजीकी आज्ञासे मैंने इसपर यह 'साधारण हिन्दी-

( ५ )

भाषाटीका' लिखनी आरम्भ की थी। टीका थोड़े ही दिनोंमें लिखी जा चुकी थी, परन्तु उसी समय 'कल्याण' के उपनिषदङ्कका निकालना निश्चय हो गया; अतः ईशावास्योपनिषद्से लेकर श्वेताश्वतरोपनिषद् तक नौ उपनिषदोंकी टीका लिखनेका भार मुझपर आ पड़ा। इस कारण योगदर्शनकी टीकाका संशोधनकार्य नहीं हो सका एवं प्रेसमें भी छापनेके लिये अवकाश नहीं रहा। इसके सिवा और भी व्यापार-सम्बन्धी काम हो गये, अतः प्रकाशनकार्यमें विलम्ब हुआ। इस समय सरकारका कागजोंपरसे कंट्रोल उठ जानेसे एवं प्रेसमें भी छपाईके लिये कुछ अवकाश मिल जानेसे यह टीका प्रकाशित की जा रही है।

यह तो पाठकगण जानते ही होंगे कि मैं न तो विद्वान् हूँ और न अनुभवी ही। अतः योगदर्शन-जैसे गम्भीर शास्त्रपर टीका लिखना मेरे-जैसे अल्पज्ञ मनुष्यके लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है। तथापि मैंने इसपर अपने और मित्रोंके सन्तोषके लिये जैसा कुछ समझमें आया, वैसा लिखनेकी धृष्टता की है। इसके लिये अनुभवी विद्वान् सज्जनोंसे सानुनय प्रार्थना है कि इस टीकामें जहाँ जो त्रुटियाँ रह गयी हों, उनकी सूचना देनेकी कृपा करें, ताकि दूसरे संस्करणमें आवश्यक सुधार किया जा सके।

समाधिपाद

इस ग्रन्थके पहले पादमें योगके लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन करते हुए चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण बतलाये गये हैं। वहाँ सूत्रकारने निद्राको भी चित्तकी वृत्तिविशेषके अन्तर्गत माना है (योग० १।१०), अन्य दर्शनकारोंकी भाँति इनकी मान्यतामें निद्रा वृत्तियोंका अभाव-

( ६ )

रूप अवस्थाविशेष नहीं है। तथा विपर्ययवृत्तिका लक्षण करते समय उसे मिथ्याज्ञान बताया है। अतः साधारण तौरपर यही समझमें आता है कि दूसरे पादमें 'अविद्या'के नामसे जिस प्रधान क्लेशका वर्णन किया गया है (योग० २।५), वह और चित्तकी विपर्यय-वृत्ति—दोनों एक ही है, परन्तु गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर यह बात ठीक नहीं मालूम होती। ऐसा माननेमें जो-जो आपत्तियाँ आती हैं, उनका दिग्दर्शन सूत्रोंकी टीकामें कराया गया है (देखिये योग० १।८; २।३, ५ की टीका)। द्रष्टा और दर्शनकी एकतारूप अस्मिता-क्लेशके कारणका नाम 'अविद्या' है (योग० २।२४), वह अस्मिता चित्तकी कारण मानी गयी है (योग० ३।४७; ४।४)। इस परिस्थितिमें अस्मिताके कार्यरूप चित्तकी वृत्ति अस्मिताकी भी कारणरूपा अविद्या कैसे हो सकती है—यह विचारणीय विषय है।

इस पादके सतरहवें और अठारहवें सूत्रोंमें समाधिके लक्षणोंका वर्णन बहुत ही संक्षेपमें किया गया है, उसके बाद इकतालीसवेंसे लेकर इस पादकी समाप्तितक इसी विषयका कुछ विस्तारसे पुनः वर्णन किया गया है; परंतु विषय इतना गम्भीर है कि समाधिकी वैसी स्थिति प्राप्त कर लेनेके पहले उसका ठीक-ठीक भाव समझ लेना बहुत ही कठिन है। मैंने अपनी साधारण बुद्धिके अनुसार उन सूत्रोंकी टीकामें विषयको समझानेकी चेष्टा की है, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि इतनेसे ही पाठकोंको सन्तोष हो जायगा; क्योंकि सूत्रकारने आनन्दानुगत और अस्मितानुगत समाधिका स्वरूप यहाँ स्पष्ट शब्दोंमें नहीं बताया, इसी प्रकार

( ७ )

ग्रहण और ग्रहीताविषयक समाधिका विवेचन भी स्पष्ट शब्दोंमें नहीं किया; अतः विषय बहुत ही जटिल हो गया है। यही कारण है कि बड़े-बड़े टीकाकारोंका संप्रज्ञातसमाधिके स्वरूपसम्बन्धी विवेचन करनेमें मतभेद हो गया है, किसीके भी निर्णयसे पूरा सन्तोष नहीं होता। मैंने यथासाध्य पूर्वापरके सम्बन्धकी सङ्गति बैठाकर विषयको सरल बनानेकी चेष्टा तो की है, तथापि पूरी बात तो किसी अनुभवी महापुरुषके कथनानुसार श्रद्धापूर्वक अभ्यास करनेसे वैसी स्थिति प्राप्त होनेपर ही समझमें आ सकती है और तभी पूरा सन्तोष हो सकता है, यह मेरी धारणा है।

प्रधानतया योगके तीन भेद माने गये हैं—एक सविकल्प, दूसरा निर्विकल्प और तीसरा निर्बीज। इस पादमें निर्बीज समाधिका उपाय प्रधानतया पर-वैराग्यको बताकर (योग० १।१८) उसके बाद दूसरा सरल उपाय ईश्वरकी शरणागतिको बतलाया है (योग० १।२३), श्रद्धालु आस्तिक साधकोंके लिये यह बड़ा ही उपयोगी है। ईश्वरका महत्त्व स्वीकार कर लेनेके कारण इनके सिद्धान्तमें साधारण बद्ध और मुक्त पुरुषोंकी ईश्वरसे भिन्नता तथा अनेकता सिद्ध होती है। योगदर्शनकी तात्त्विक मान्यता प्रायः सांख्यशास्त्रसे मिलती-जुलती है। कई लोग यद्यपि सांख्यशास्त्रको अनीश्वरवादी बतलाते हैं, परन्तु सांख्यशास्त्रपर भलीभाँति विचार करनेपर यह कहना ठीक मालूम नहीं होता; क्योंकि सांख्यदर्शनके तीसरे पादके ५६ वें और ५७ वें सूत्रोंमें स्पष्ट ही ईश्वरकी साधारण पुरुषोंकी अपेक्षा विशेषता स्वीकार की गयी है। अतः सांख्य और योगके तात्त्विक विवेचनमें वर्णनशैलीके अतिरिक्त और कोई मतभेद प्रतीत नहीं होता।

( ८ )

उपर्युक्त तीन भेदोंमेंसे संप्रज्ञातयोगके दो भेद हैं। उनमें जो सविकल्प योग है, वह तो पूर्वावस्था है, उसमें विवेकज्ञान नहीं होता। दूसरा जो निर्विकल्प योग है, जिसे निर्विचार समाधि भी कहते हैं, वह जब निर्मल हो जाता है (योग० १ । ४७), उस समय उसमें विवेकज्ञान प्रकट होता है; वह विवेकज्ञान पुरुषख्यातितक हो जाता है (योग० ३ । ३५), जो कि पर-वैराग्यका हेतु है (योग० १ । १६)। तथा प्रकृति और पुरुषके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होनेके साथ ही साधककी समस्त गुणोंमें और उनके कार्यमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाता है। उससे चित्तमें कोई भी वृत्ति नहीं रहती, यह सर्ववृत्तिनिरोधरूप निर्बीज समाधि है (योग० १ । ५१)। इसीको असंप्रज्ञातयोग तथा धर्ममेघ समाधि (योग० ४ । २९) भी कहते हैं, इसकी विस्तृत व्याख्या यथास्थान की गयी है। निर्बीज समाधि ही योगका अन्तिम लक्ष्य है, इसीसे आत्माकी स्वरूपप्रतिष्ठा या यों कहिये कि कैवल्यस्थिति होती है (योग० ४ । ३४)।

निरोध-अवस्थामें चित्तका या उसके कारणरूप तीनों गुणोंका सर्वथा नाश नहीं होता; किन्तु जड-प्रकृति-तत्त्वसे जो चेतन-तत्त्वका अविद्याजनित संयोग है, उसका सर्वथा अभाव हो जाता है।

साधनपाद

इस दूसरे पादमें समस्त दुःखोंके कारण अविद्यादि पाँच क्लेशोंको बताया गया है; क्योंकि इनके रहते हुए मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वे संस्काररूपसे अन्तःकरणमें इकट्ठे होते रहते हैं, उन संस्कारोंके समुदायका नाम ही कर्माशय है। इस कर्माशयके

( ९ )

कारणभूत क्लेश जबतक रहते हैं, तबतक जीवको उनका फल भोगनेके लिये नाना प्रकारकी योनियोंमें बार-बार जन्मना और मरना पड़ता है एवं पापकर्मका फल भोगनेके लिये घोर नरकोंकी यातना भी सहन करनी पड़ती है । पुण्यकर्मोंका फल जो अच्छी योनियोंकी और सुखभोगसम्बन्धी सामग्रीकी प्राप्ति है, वह भी विवेककी दृष्टिसे दुःख ही है ( योग० २ । १५ ); अतः समस्त दुःखोंका सर्वथा अत्यन्त अभाव करनेके लिये क्लेशोंका मूलोच्छेद करना परम आवश्यक है । इस पादमें उनके नाशका उपाय निश्चल और निर्मल विवेकज्ञानको ( योग० २ । २६ ) तथा उस विवेक-ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय योगसम्बन्धी आठ अङ्गोंके अनुष्ठानको ( योग० २ । २८ ) बताया है । इसलिये साधकको चाहिये कि बताये हुए योगसाधनोंका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करे ।

विभूतिपाद

इस तीसरे विभूतिपादमें धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीनोंका एकत्रित नाम 'संयम' बतलाकर भिन्न-भिन्न ध्येय पदार्थोंमें संयमका भिन्न-भिन्न फल बतलाया है, उनको योगका महत्त्व, सिद्धि और विभूति भी कहते हैं। इनका वर्णन यहाँ ग्रन्थकारने समस्त ऐश्वर्यमें वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये ही किया है । यही कारण है कि इस पादके सैंतीसवें, पचासवें और इक्यावनवेंमें एवं चौथे पादके उन्तीसवें सूत्रमें उनको समाधिमें विघ्नरूप बताया है । अतः साधकको भूलकर भी सिद्धियोंके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये ।

कैवल्यपाद

इस चौथे पादमें कैवल्यपद प्राप्त करनेयोग्य चित्तके स्वरूप-का प्रतिपादन किया गया है ( योग० ४ । २२-२३, २६ ) ।

( १० )

साथ ही योगदर्शनके सिद्धान्तमें जो-जो शङ्काएँ हो सकती हैं, उनका समाधान किया गया है। अन्तमें धर्ममेघ समाधिका वर्णन करके (योग० ४।२९) उसका फल क्लेश और कर्मोंका सर्वथा अभाव (योग० ४।३०) तथा गुणोंके परिणाम-क्रमकी समाप्ति अर्थात् पुनर्जन्मका अभाव बताया गया है (योग० ४।३२) एवं पुरुषको मुक्ति प्रदान करके अपना कर्तव्य पूरा कर चुकनेके कारण गुणोंके कार्यका अपने कारणमें विलीन हो जाना अर्थात् पुरुषसे सर्वथा अलग हो जाना गुणोंकी कैवल्य-स्थिति और उन गुणोंसे सर्वथा अलग होकर अपने रूपमें प्रतिष्ठित हो जाना पुरुषकी कैवल्य-स्थिति बतलाकर (योग० ४।३४) ग्रन्थकी समाप्ति की गयी है।

विशेष वक्तव्य

इस प्रकार इस ग्रन्थमें बहुत ही थोड़े शब्दोंमें आत्मकल्याण-के बहुत ही उपयोगी और प्रत्यक्ष उपाय बताये गये हैं।

पाठकोंको चाहिये कि ग्रन्थका रहस्य समझनेके लिये उसे आद्योपान्त पढ़कर उसपर विचार करें। जिस किसी विषयका वर्णन प्रकारान्तरसे कई जगह हुआ हो, उसके सभी स्थलोंपर दृष्टि डालकर पूर्वापरके विरोधाभासको मिटाकर उसकी संगति बैठावें। जबतक अपने मनमें पूरा संतोष न हो जाय तबतक उसकी खोज करते रहें। दूसरे टीकाकारोंने उसकी संगति किस प्रकार लगायी है, वर्तमान अनुभवी सज्जनोंका उस विषयपर क्या कहना है और मूल-ग्रन्थसे सरलतापूर्वक बिना किसी प्रकारकी खींचतानके क्या भाव झलकता है—इन सब बातोंपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर कुछ समाधान हो सकता है।

( ११ )

जैसे विवेकज्ञानका स्वरूप, उसके अवस्थाभेद और फल आदि-का आशय समझना हो तो प्रथम पादके ४८ और ४९, द्वितीय पादके २६से २८, तृतीय पादके ३५, ३६, ४९, ५२, ५३, और ५४ तथा चतुर्थ पादके २५, २६ और २९—इन सब सूत्रोंको सम्मुख रखकर उनपर विचार करना चाहिये। यदि अविद्याके स्वरूपका निर्णय करना हो तो प्रथम पादके ८, द्वितीय पादके ३, ४, ५, १२, २४ और २५ तथा चतुर्थ पादके ११, २८ और ३०—इन सब सूत्रोंको सामने रखकर विचार करें। एवं यदि समाधिके स्वरूपको उसके अवान्तर भेदोंसहित भलीभाँति समझना हो तो प्रथम पादके १७ से २२ और ४१से ५१, तृतीय पादके ३, ९ से १२, ३५, ३७, ४४, ४७, ४९ और ५० तथा चतुर्थ पादके १, २९, ३०, ३२ और ३४—इन सब सूत्रोंपर दृष्टिपात करके गम्भीरतापूर्वक भलीभाँति विचार करना चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य प्रसङ्गोंका विवेचन करते समय भी तद्विषयक समस्त सूत्रोंपर ध्यान देना चाहिये। ऐसा करनेसे ग्रन्थका आशय समझनेमें बड़ी सुगमता होती है, यह मेरा अनुमान है।

इस ग्रन्थमें पुरुषविशेष ईश्वरका प्रतिपादन करके उसकी शरणागतिको आत्म-साक्षात्कारका कारण बताया है, परन्तु उस ईश्वरको जाननेका कोई भिन्न साधन नहीं बताया गया। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि वहाँतक न तो मन-बुद्धि आदि प्राकृत तत्त्वोंकी पहुँच है और न उस प्रकृतिस्थ पुरुषकी ही। वह एकमात्र प्रकृतिसे अलग विशुद्ध आत्मतत्त्वसे ही प्रत्यक्ष किया जा सकता है; जैसा कि श्वेताश्वतरोपनिषद्में कहा है—

( १२ )

यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
(२।१५)

‘जब योगी यहाँ दीपकके सदृश (प्रकाशमय) आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है, उस समय वह उस अजन्मा, निश्चल, समस्त तत्त्वोंसे विशुद्ध परमदेव परमात्माको जानकर सब बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है।’

कोई भी सच्चा सम्बन्ध सजातीय तत्त्वसे ही हो सकता है, विजातीयसे नहीं। ईश्वरका सजातीय तत्त्व आत्मा ही है; अतः उसीसे उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, अन्य जड तत्त्वोंसे नहीं।

इस शास्त्रमें प्रकृतिके चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर—इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व माने गये हैं; उनमें प्रकृति तो जड और परिणामशील है अर्थात् निरन्तर परिवर्तन होना उसका धर्म है तथा मुक्त पुरुष और ईश्वर—ये दोनों नित्य, चेतन, स्वप्रकाश, असङ्ग, देशकालातीत, सर्वथा निर्विकार और अपरिणामी हैं। प्रकृतिमें बँधा हुआ पुरुष अल्पज्ञ, सुख-दुःखोंका भोक्ता, अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेवाला और देशकालातीत होते हुए भी एकदेशी-सा माना गया है।

इसके सिवा, योगशास्त्रमें वर्णित साधनोंका प्रायः उपनिषद्, गीता, भागवत आदि सभी धर्मग्रन्थ समर्थन करते हैं। अतः प्रत्येक साधकको इस ग्रन्थमें बताये हुए साधनोंका श्रद्धापूर्वक सेवन करना चाहिये।

विनीत—हरिकृष्णदास गोयन्दका

[मुद्रा: पुस्तकालय]

पातञ्जलयोगदर्शन


(चित्र: गुरु-शिष्य संवाद)


अथ योगानुशासनम् ।

१. प्रथम पाद — समाधिपाद (सूत्र १-५१)

श्रीपरमात्मने नमः

पातञ्जलयोगदर्शन

साधारणहिंदीभाषाटीकासहित

समाधिपाद—१

अथ योगानुशासनम् ॥१॥

‘परम्परागत योगविषयक शास्त्र आरम्भ करते हैं।’

**व्याख्या—**इस सूत्रमें योगविषयक शास्त्र आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके योगसाधनकी कर्तव्यता सूचित की गयी है ॥१॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार योगशास्त्रके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके अब योगके सामान्य लक्षण बतलाते हैं—

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥

‘चित्तकी वृत्तियोंका निरोध (सर्वथा रुक जाना) योग है।’

**व्याख्या—**इस ग्रन्थमें प्रधानतासे चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको ही ‘योग’ नामसे कहा गया है ॥२॥

पा० यो० द० १—

पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध— योगका सर्वोपरि फल बतलाते हैं—

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥

'उस समय द्रष्टाकी अपने रूपमें स्थिति हो जाती है।'

व्याख्या— जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; अर्थात् वह कैवल्य-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग० ४।३४) ॥३॥

सम्बन्ध— क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता ?—इसपर कहते हैं—

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥

'दूसरे समयमें (द्रष्टा) वृत्तिके रूपवाला-सा (रहता) है।'

व्याख्या— जबतक योगसाधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता, तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य-कर्तव्य है ॥४॥

सम्बन्ध— चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियोंमें बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं—

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥

'(उपर्युक्त) क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेदोंवाली वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी होती हैं।'

व्याख्या— ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले

समाधिपाद-१ ३

लक्षणोंके अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती है तथा दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंका क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती है। इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटाकर फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करना चाहिये ॥५॥

सम्बन्ध—उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते हैं—

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥

'(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति—(ये पाँच हैं)।'

व्याख्या—इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है, अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ॥६॥

सम्बन्ध—उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं—

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥

'प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—(ये तीनों) प्रमाण हैं।'

व्याख्या—प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है, उसको इस प्रकार समझना चाहिये—

(१) प्रत्यक्ष प्रमाण—बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके द्वारा

पातञ्जलयोगदर्शन

जाननेमें आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो चित्तकी वृत्तियोंको रोकनेमें सहायक हैं, जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है। तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ नित्य और सुखरूप प्रतीत होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।

(२) अनुमान प्रमाण—किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना—इत्यादि। इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।

(३) आगम प्रमाण—वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको 'आगम' कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण

समाधिपाद-१ [५]

और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है, (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है; और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योगसाधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥

सम्बन्ध—प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं—

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

'जो उस वस्तुके स्वरूपमें प्रतिष्ठित नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान विपर्यय है।'

व्याख्या—किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना—यह विपरीत ज्ञान ही विपर्यय-वृत्ति है—जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिन साधनोंसे यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-