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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

२६६ फलदीपिका तृष्णासृक्कोपपित्तज्वरमनलविषास्त्रातिकुष्ठाक्षिरोगान् गुल्मापस्मारमज्जाविहतिपरुषतापामिकादेहभङ्गान् । भूपारिस्तेनपीडां सहजसुतसुहृद्वैरियुद्धं विधत्ते रक्षोगन्धर्वघोरग्रहभयमवनीसूनुरुर्ध्वाङ्गरोगम् ॥१४॥ भ्रान्तिं दुर्वचनं दृगामयगलघ्राणोत्थरोगं ज्वरं पित्तश्लेष्मसमीरजं विषमपि त्वग्दोषपाण्ड्वामयान् । दुःस्वप्नं च विचर्चिकाग्निपतने पारुष्यबन्धश्रमान् । गन्धर्वक्षितिहर्म्यवाहिभिरपि ज्ञो वक्ति पीडां ग्रहैः ॥१५॥ गुल्मान्त्रज्वरशोकमोहकफजान् श्रोत्रार्तिमोहामयान् देवस्थाननिधिप्रपीडनमहीदेवेशशापोद्भवम् । रोगं किन्नरयक्षदेवफणभृद्विद्याधराद्युद्भवं जीवः सूचयति स्वयं बुध

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६७ जब सूर्य रोग कारक ग्रह होता है तब निम्नलिखित रोगों की सम्भावना होती हैं, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है । (१) पित्त (१) उष्ण ज्वर ( बुखार ) (३) शरीर में जलन रहना (४) अपस्मार (मिर्गी) (५) हृदय रोग (हार्ट डिजीज) (६) नेत्र रोग (७) नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी (८) चर्मरोग (९) अस्थि स्रुति (१०) शत्रुओं से भय, (११) काष्ठ (१२) अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा (१३) स्त्री या पुत्रों से पीड़ा (१४) चोर या चौपायों से भय (१५) सर्प से भय (१६) राजा, धर्म- राज (यम) भगवान्भूतेश (रुद्र) से भय होता है । चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है (१) निद्रा रोग (या तो नींद न आवे या बहुत नींद आवे या सोते सोते चलना इसे सन्यास रोग भी कहते हैं) (२) आलस्य (३) कफ, (४) अतिसार (संग्रहणी) (५) पिटक, कारबंकिल (६.) शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आवे या ठंड के कारण जो बुखार हो (७) सींग वाले जानवर वा जल में रहने वाले जानवर मगर मच्छ आदि मे भय (८) मंदाग्नि (भूख न लगना) (९) अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है—जब जठराग्नि के मन्द हो जाने से भूख नहीं लगती है तो भोजन की इच्छा नहीं होती है) (१०) स्त्रियों से व्यथा (११) पीलिया (१२) खून खराबी (१३) जल से भय । (१४) चित्त की थकावट । (१५) बाल ग्रह- दुर्गा-किन्नर- धर्मराज (यम )-सर्प और यक्षिणी से भय होता है ।। ३ ।। मंगल निम्नलिखित रोग और क्लेश उत्पन्न करता है । (१) तृष्णा- बहुत अधिक प्यास लगना (२) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप) (३) पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय (४) कुष्ठ (कोढ़) (५) नेत्र रोग- (६) गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज) (७) अपस्मार (८) मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं (९) खुजली (१०) चमड़े में खुरदरापन (११)

२६८ फलदीपिका देह भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाय) (१२) राजा, अग्नि, और चोरों से भय (१३) भाई, मित्र, पुत्रों से कलह (१४) शत्रुओं से युद्ध (१५) राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं ॥४॥ बुध नीचे लिखे हुये रोग और क्लेश उत्पन्न करता है, (१) भ्रान्ति (बहम, ) सोचने में अव्यवस्था हो जाय, विचार में तर्क शक्ति न रहे, व्यर्थ की चिन्ता से मन उलटा पलटा सोचने लगे, मन में मिथ्या चिन्ता, विना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जावे —यह सब भ्रान्ति के लक्षण हैं (२) दुर्वचन बोलना— (३) नेत्र रोग (४) गले का रोग (५) नासिका रोग (६) वात, पित्त कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर (७) विष की बीमारी (८) चर्म रोग (९) पीलिया (१०) दुःस्वप्न, खुजली (११) अग्नि में पड़ने का डर—लोग जातक के साथ परुषता (कठोरता) का व्यवहार करें या जातक स्वयं अन्य लोगों के साथ परुषता का व्यवहार करे (१२) श्रम (परिश्रम का काम करना पड़े) (१३) गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होते हैं। अब वृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं वह सब बताते हैं । (१) गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटोज (२) अंतड़ियों का ज्वर (मोती झरा) (३) मूर्च्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है (४) कान के रोग (५) देव स्थान सम्बन्धी पीड़ा अर्थात् मन्दिर आदि की जायदाद लेकर मुकदमे बाजी (६) ब्राह्मणों के शाप से कष्ट (७) किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह या अदालती कार्रवाई । (८) विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव (९) अपने गुरुओं—माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट व्यवहार या उनके

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६९ प्रति कर्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है यह दैवी नियम है ।। ६ ।। अब शुक्र ग्रह के कारण क्या क्या रोग, क्लेश आदि होते हैं वह बताये जाते हैं :—(१) रक्त की कमी के कारण पीलापन (२) कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, मूत्र रोग, प्रमेह जननेन्द्रिय आदि में रोग—पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्ट्रेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से) (४) वीर्य की कमी (५) संभोग में अक्षमता (६) अत्यन्त संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता (७) शोष (शरीर का सूखना) (८) योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय । (९) शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है। अब उन रोग और क्लेशों का वर्णन करते हैं जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं :— (१) वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग (२) टांग में दर्द या लंगड़ाना, (३) अत्यधिक श्रम के कारण थकान (४) भ्रान्ति (भ्रान्ति किसे कहते है? जहाँ बुध के रोग बताये गये हैं वहां विस्तार से समझाया गया है)। (५) कुक्षि (काँख में रोग) (६) शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाय (७) नौकरों से कष्ट—नौकर नौकरी छोड़ कर चलें जायें या धोखा या दगा दें। (८) भार्या और पुत्र सम्बन्धी विपत्ति (९) अपने शरीर के किसी भाग में चोट (१०) हृदय ताप (मान- सिक चिन्ता) पेड़ या पत्थर से चोट (११) पिशाच आदि की पीडा (१२) आपत्ति ॥८॥ अब राहु ग्रह के कारण क्या क्लेश, रोग चिन्ता आदि होते हैं वह बताते हैं:—(१) हृदय रोग (२) हृदय में ताप (जलन) (३) कोढ़ (४) दुर्मति (५) भ्रान्ति (६) विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियां (७) पैर में पीड़ा या चोट (८) स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट (९) सर्प और पिशाचों से भय ।

२७० फलदीपिका अब केतु क्या शारीरिक या मानसिक कष्ट, क्लेश उत्पन्न करता है यह बताते हैं—ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय। अब गुलिक के कारण क्या कष्ट होते हैं यह बताते हैं। गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है ॥९॥ मन्दारान्वितवोक्षिते व्ययधने चन्द्रारुणौ चाक्षिरुक् शौर्याद्याङ्गिरसो यमारसहिता दृष्टा यदि श्रोत्ररुक् । सोग्रे पञ्चमभे भवेदुदररुग्रन्ध्रारिनाथान्विते तद्वत्सप्तमनैधने सगुदरुच्छुक्रे च गुह्यामयः ॥१०॥ षष्ठेऽर्केऽप्यथवाष्टमे ज्वरभयं भौमे च केतौ व्रणं शुक्रे गुह्यरुजं क्षयं सुरगुरौ मन्दे च वातामयम् । राहौ भौमनिरीक्षिते च पिलकां सेन्दौ शनौ गुल्मजं क्षीणोन्दौ जलभेषु पापसहिते तत्स्थेऽम्बुरोगं क्षयम् ॥११॥ अब रोग के कुछ अन्य योग बताये जाते हैं:—(१) यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों और उनको मंगल और शनि देखते हों तो नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि सूर्य चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे घर में हो और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो संभवतः उस आँख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाय। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा । ऊपर जो योग बताया गया है वह यदि बारहवें घर में होगा तो बाएँ नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई—एक दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो और उसको शनि या मंगल देखता हो

चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २७१ तो दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उस को मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुए सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखे तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो विशेष कष्ट समझना चाहिये ऐसा हमारा अनुभव है। हमारा यह भी अनुभव है कि यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है। (२) यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युत या दृष्ट हों तो कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है ग्यारहवें से बाँये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पाँच गुणों में से) शब्द से सम्बन्ध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पाँच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथिवी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से सम्बन्धित होने के कारण यह कहा गया है कि यदि बृहस्पति मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी—या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण) होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है इस लिए मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में

२७२ फलदीपिका करेगा। शनि वायु प्रधान है इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के हिसाब से “त्रिदोष” हैं जिनके कुपित हो जाने से या असामञ्जस्य से शरीर में रोग होते हैं। (३) मंगल पंचम में होने से उदर रोग होता है। (कोई भी उग्र- ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है। पांचवां स्थान पेट का है। (४) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बन्धी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है। (५) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहां पाप ग्रह बैठे हों या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं। ॥ १० ॥ (१) यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो ज्वर (बुखार) का भय (२) यदि छठे या आठवें घर में मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म) (३) छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि) (४) यदि छठे या आठवें घर में वृहस्पति हो तो क्षय (यक्ष्मा, टी. बी. आदि) (५) यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग) (६) यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा) (७) यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण यथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण—पेट में पसलियों के नीचे—दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बांयीं ओर प्लीहा (तिल्ली, होती है) (८) यदि कृष्ण

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७३ पक्ष का क्षीण चन्द्र पाप ग्रह के साथ हो और जल राशि* में छठे या आठवें हों तो अम्बू रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी० बी० आदि) का रोग होता है ॥ ११ ॥ जातो गच्छति येन केन मरणं वक्ष्येऽथ तत्कारणं रन्ध्रस्थैस्तदवेक्षकैर्बलवता तस्योक्तरोगैर्मृतिः । रन्ध्रक्षोक्तरुजाथवा मृतपतिप्राप्तर्क्षदोषेण वा रन्ध्रेशेन खरत्रिभागपतिना मृत्युं वदेन्निश्चितम् ॥१२॥ ग्रहेण युक्ते निधने तदुक्तरोगैर्मृतिर्वाऽथ तदीक्षकस्य ग्रहैर्विमुक्ते निधनेऽथ तस्य राशेः स्वभावोदितदोषजाता ॥१३॥ अग्न्युष्णज्वरपित्तशस्त्रजमिनश्चन्द्रो विसूच्यम्बुरु- ग्यक्ष्मादि क्षितिजोऽसृजा च दहनक्षुद्राभिचारायुधैः । पाण्ड्वादि भ्रमजं बुधो गुरुरनायासेन मृत्युं कफात् स्त्रीसङ्गोत्थरुजं कविस्तु मरुता वा संनिपातैः शनि ॥१४॥ कुष्ठेन वा कृत्रिमभक्षणाद्वा राहुर्विषाद्वाथ मसूरिकाद्यैः । कुर्याच्छिखी दुर्मरणं नराणां रिपोर्विरोधादपि कीटकाद्यैः ॥१५॥ लग्नादष्टमराशेः स्वभावदोषोद्भवं वदेन्मृत्युम् । निधनेशस्य नवांशस्थितराशिनिमित्तदोषजनितं वा ॥१६॥

  • होरासार के मत से 'अलिझषमकर कुलीरा जलात्मका' अध्याय १ श्लोक ८, । कर्क, वृश्चिक, मकर और मीन जलराशि हैं ।

२७४ फलदीपिका पैत्त्यज्वरोष्णैर्जठराग्निनाजे वृषे त्रिदोषैर्दहनाच्च शस्त्रात् । युग्मे तु कालश्वसनोष्णशूलै- रुन्मादवातारुचिभिः कुलीरे ॥१७॥ मृग्ज्वरस्फोटजशत्रुजं हरौ स्त्रियां स्त्रियागुह्यरुजा प्रपातनात् । तुलाधरे धीज्वरसंनिपातजं प्लीहालिपाण्डुग्रहणोरुजालिनि ॥१८॥ वृक्षाम्बुकाष्ठायुधजं हयाङ्गे मृगे तु शूलारुचिधीभ्रमाद्यैः । कुम्भे तु कासज्वरयक्ष्मरोगै र्जले विपद्वा जलरोगतोऽन्त्ये ॥१९॥ पापर्क्षयुक्ते निधने सपापे शस्त्रानलव्याघ्रभुजङ्गपीडा अन्योन्यदृष्टौ व्यशुभौ सकेन्द्रौ कोपात्प्रभोः शस्त्रविषाग्निजैर्वा ॥२०॥ सौम्यांशके सौम्यगृहेऽथ सौम्य- सम्बन्धगे वा क्षयभे क्षयेशे । अक्लेशजातं मरणं नराणां व्यस्ते तदा क्रूरमृतिं वदन्ति ॥२१॥ मृत्यु का कारण अब मृत्यु का कारण तथा किस प्रकार मृत्यु होती है यह बताते हैं।

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७५ (क) (१) जो ग्रह अष्टम में होते हैं या अष्टम को देखते हैं—उनमें जो बलवान् होता है—उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है । आठवाँ आयु का स्थान है । ऊपर बता चुके हैं कि कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है । (२) यदि आठवें भाव में ग्रह हो या ग्रह देखते हों तब तो किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो—ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी । यह बताते हैं कि आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं—उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो उसके दोष से—उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पाँचवें घर में हो तो उदर (पेट के) रोग से, चौथे घर में बैठा हो तो हृदय रोग से—यदि अष्ट- मेश सूर्य या मंगल हां तो पित्तज रोग, से, शनि हो तो वात रोग से, इत्यादि । जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो २२वां द्रेष्काण होता है उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है । ऊपर जो योग अष्टम भाव सम्बन्धी बताये गये हैं वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो २२वाँ द्रेष्काण हो—उस २२वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो—उस स्वामी के जो रोग हों—उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है ॥१२॥ (ख) जो ग्रह आठवें घर में हों या आठवें घर को देखते हैं उन ग्रहों में जो बलवान् हो उसके रोग/दोष से मृत्यु होती है । यदि कोई ऐसा ग्रह न हो तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके जो रोग हैं उनके कारण मृत्यु होती है । '१३वाँ श्लोक एक प्रकार से १२वें श्लोक की ही व्याख्या है । ।। १३ ।। (१) सूर्य—अग्नि, उष्णज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है । (२) चन्द्रमा—विषूचिका (हैजा), जलोदर, Oedema (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की

२७६ फलदीपिका बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है। (३) मंगल--जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है। (४) बुध--पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रान्ति (स्नायु सम्बन्धी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे 'पाण्डु' आदि रोग होते हैं--यकृत की ख़राबी से होते हैं। (५) बृहस्पति--कफ का अधिष्ठाता है और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता। (६) शुक्र--जब प्राणहरण करता है तो इसमें हेतु यह होता है कि अतिस्त्री प्रसंग के कारण वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाने से बीमारी का शिकार हो जाता है। मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग भी शुक्र के अन्तर्गत आ जाते हैं। (७) शनि--सन्निपात. वातजरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है। ॥ १४ ॥ (८) राहु--कुष्ठ (कोढ़ से) या food-poisoning विष या जर्म्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददौड़े, फुंसिया आदि हो जावें, उससे मृत्यु करता है। (९) केतु--जब मृत्यु करता है तो दुर्मरण होता है। दुर्मरण का अर्थ है अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कत्ल करदे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों से या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु के

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७७ काटने से Septic हो जावे या भोजन आदि के ज़रिये विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जावें । ।। १५ ।। (ग) (१) जन्म लग्न से आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें घर को जो देखते हैं वे सभी आ गये) । (२) या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो उस नवांश राशि के रोग या दोष से मृत्यु होती है । (घ) ऊपर कई बार राशियों के रोग/दोष का हवाला दिया गया है। ग्रहों के रोग/दोष तो बताये हैं। किस-किस राशि के कौन कौन से रोग स्वाभाविक हैं, अब यह बताते हैं:— (१) मेष राशि—पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठराग्नि, (पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग । (२) वृष—त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण । (३) मिथुन—श्वास की बीमारी, दमा, उष्णशूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते) हैं । (४) कर्कट—पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्षण वाले रोग—anorexia) (५) सिंह—जंगली पशुओं के कारण मृत्यु, ज्वर, स्फोट, (फोड़ा) शत्रुओं के कारण । (६) कन्या—स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग), ऊपर से गिरने से । (७) तुला—धीज्वर (brain fever) सन्निपात । (८) वृश्चिक—प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु रोग ।

२७८ फलदीपिका। (९) धनु—पेड़ के कारण (कोई पेड़ गिर जाने से या किसी पेड़ को काटते समय), जल, लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से । (१०) मकर—शूल (पेट का दर्द-एपिण्डीसाइटिज़ आदि, पेट में फोड़ा आदि, colic pain) अरुचि-मन्दाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस- स्नायु मण्डल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से । (११) कुंभ--खाँसी, ज्वर, क्षय । (१२) मीन—पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से । (ङ) यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुए दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो सरकार की नाराज़गी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है। ॥ २० ॥ (च) यदि (१) बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो या सौम्य ग्रह के साथ बँठा हो अथवा (२) बारहवें घर में सौम्य ग्रह बँठा हो और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती । यदि इससे उल्टा हो अर्थात् (१) बारहवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो अथवा (२) बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है । ॥ २१ ॥

चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २७९ जन्म के पहिले, मृत्यु के बाद की स्थिति । स्वोच्चे स्वमित्रे सति सौम्यवर्गे व्ययाधिपे चोर्ध्वगतिं ससौम्ये विपर्ययेऽधोगतिमेव केचित्- ऊर्ध्वास्यशीर्षोदयराशिभेदात् ॥२२॥ कैलासं रविशीतगू भृगुसुतः स्वर्गं महीजो महीं वैकुण्ठं शशिजो यमो यमपुरं सद्ब्रह्मलोकं गुरुः । द्वीपान् भोगिवरः शिखी तु निरयं सम्प्रापयेत्प्राणिनः सम्बन्धाद्व्ययनायकस्य कथयेत्तत्रान्त्यराश्यंशतः ॥२३॥ धर्मेश्वरेणैव हि पूर्वजन्म वृत्तं भविष्यज्जननं सुतेशात् । तदीशजातिं तदधिष्ठितर्क्षं दिशं हि तत्रैव तदीशदेशम् ॥२४॥ स्वोच्चे तदीशे सति देवभूमिं द्वीपान्तरं नीचरिपुस्थलस्थे । स्वर्क्षे सुहृद्भे समभे स्थिते वा सम्प्राप्नुयाद्भारतवर्षमेव ॥२५॥ आर्यावर्तं गीष्पतेः पुण्यनद्यः काव्येन्द्रोश्च ज्ञस्य पुण्यस्थलानि । पङ्गोर्निन्द्या म्लेच्छभूस्तीक्ष्णभानोः शैलारण्यं कीकटं भूमिजस्य ॥२६॥

२८० फलदीपिका स्थिरे स्थिरांशाधिगतः सपापः पृष्ठोदयेऽधोमुखभे च संस्थः । तदीश्वरो वृक्षलतादिजन्म स्यादन्यथा जीवयुतः शरीरी ॥२७॥ लग्नेशितुः स्वोच्चसुहृत्स्वगेहान् तदीश्वरो याति मनुष्यजन्म । समे मृगाः स्युर्विहगाः परस्मिन् द्रेष्काणरूपैरपि चिन्तनीयम् ॥२८॥ तावेकराशौ जननं स्वदेशे तौ तुल्यवीर्यौ यदि तुल्यजातौ । वर्णो गुणस्तस्य खगस्य तुल्यः संज्ञोदितैरेव वदेत्समस्तम् ॥२९॥ (क) (१) यदि बारहवें घर का मालिक अपनी उच्च राशि, मित्र की राशि में बैठा हो और सौम्य वर्ग (होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश आदि) में हो या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो तो उसकी (मरण के बाद) ऊर्ध्वगति (ऊपर की ओर गति अर्थात् स्वर्ग की ओर) होती है। किन्तु यदि बारहवें घर का मालिक अपनी नीच राशि, शत्रु की राशि या क्रूर वर्गों में बैठा हो और क्रूर ग्रह के साथ बैठा हो तो अधोगति (नीचे की ओर अर्थात् नरक की ओर गति) होती है। (२) कुछ का विचार है कि बारहवें घर में ऊर्ध्वास्य राशि हो बारहवें घर का मालिक ऊर्ध्वास्य राशि में हो तो ऊर्ध्वगति अन्यथा अधोगति होती है। (३) कुछ अन्य का मत है कि शीर्षोदय राशि ऊर्ध्वगति कारक

चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २८१ हैं, पृष्ठोदय राशि अधोगति कारक है । शीर्षोदय राशियाँ मिथुन, कन्या, तुला वृश्चिक और, कुंभ हैं । पृष्ठोदय मेष, वृष, कर्क, धनु और मकर हैं। मीन उभयोदय है । (ख) (१) मरण के बाद की अवस्था का विचार (i) बारहवें घर में जो ग्रह हो या ग्रह हों उनसे (ii) बारहवाँ घर जिस नवांश में हो उस नवांश में जो ग्रह हो उससे या जो ग्रह हों उनसे (iii) बारहवें घर का स्वामी जिस ग्रह या जिन ग्रहों से सम्बन्ध करता --उनसे, करना चाहिये । (२) यदि सूर्य या चन्द्र उपर्युक्त ग्रह हों तो जातक मरण के बाद कैलास (शिव लोक) को जाता है; मंगल हो तो पुनः पृथ्वीपर शीघ्र जन्म ले लेता है। बुध हो तो वैकुंठ को जायगा; बृहस्पति ब्रह्म लोक को ले जावेगा; शुक्र स्वर्ग को; शनि यमपुरी को, राहु हो तो दूसरे द्वीपों को केतु हो तो नरक गामी होगा ॥२३॥ आगे के जन्म का विचार बारहवें घर से बताया गया है । अब पूर्व जन्म का विचार किस भाव से करना चाहिये यह बताते हैं । पूर्व जन्म का विचार नवें घर से करे। इसी प्रकार, मृत्यु के बाद क्या अवस्था होती है—यह तो ऊपर बता चुके हैं किन्तु जिस जिस लोक में मरने के बाद जीव जाता है—उस उस लोक में कुछ समय के बाद “क्षीणे पुण्ये मर्त्य लोकं विशन्ति” गीता के इस कथन के अनुसार रह कर पुनः पृथ्वी पर जन्म कहाँ होगा—कैसी अवस्था में होगा इत्यादि का विचार पाँचवें घर से करना चाहिये । (४) जाति, देश आदि का विचार किस दिशा में पूर्व जन्म या किस दिशा में भविष्य जन्म होगा—इन सब बातों का विचार नवम से, नवमाधीश, से नवम में बैठे हुए ग्रह या ग्रहों से (पूर्व जन्म के विषय में) । तथा पंचम से, पंचमाधीश से, पंचम में बैठे हुए ग्रह या ग्रहों से (पुनर्जन्म के विषय में) करना चाहिये ।२४।।

२८२ फलदीपिका यदि ग्रह उच्च राशि का हो तो देव भूमि (स्वर्ग), नीच राशि या शत्रु राशि का हो तो द्वीपान्तर, यदि ग्रह अपनी राशि या मित्र राशि का हो तो भारत वर्ष में ही समझना चाहिये । २५॥ (घ) अब भारत वर्ष में किस प्रदेश का किस ग्रह से विशेष सम्बन्ध है यह बताते हैं (i) सूर्य— पर्वत और जंगल (ii) चन्द्रमा—पुण्य नदी (जिनमें स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है—यथा गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि (iii) मंगल —कीकट देश, दरिद्र तथा कुत्सित देश— आजकल जिस प्रदेश को बिहार कहते हैं—उसका एक भाग भी "कीकट" देश माना जाता है (iv) बुध—पुण्य स्थल, जिन्हें तीर्थ कहते हैं, यथा श्री रामेश्वरम्, श्री रंगम्, द्वारका, अयोध्या, आदि (v) बृहस्पति आर्यावर्त—हिमालय और विन्ध्य जिसकी उत्तर और दक्षिण की सीमा हैं तथा पूर्व और पश्चिम की सीमा समुद्र तक है (vi) शुक्र जो स्थान चन्द्रमा के बताये गये हैं, वही (vii) शनि—निन्दनीय स्थान, म्लेच्छ भूमि ॥२६॥ (ङ) ऊपर श्लोक २४ में पूर्व जन्म के विषय में बताया है । अब पुनः उसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि जिन ग्रहों का ज़िक्र ऊपर श्लोक २४ में किया गया है—वे स्थिर राशि या स्थिर नवांश में हों और साथ ही साथ पृष्ठोदय राशि में भी हों और अधो मुख राशि में भी हों तो जन्म वृक्ष (पेड़) लता (बेल) आदि में हुआ था (नवम भाव के विचार से) या वृक्ष, लता आदि रूप में होगा (पांचवे भाव के) विचार से) । यदि स्थिर नवांश. पृष्ठोदय आदि में न हो तो मनुष्य योनि (मनुष्य शरीर) समझना चाहिये । अर्थात् ऊर्ध्वास्य राशि हो, शीर्षोदय राशि हो, चर राशि, चरनवांश का सम्बंध हो तो (नवम का ऐसा हो तो पूर्व जन्म में) मनुष्य ही था पंचम का ऐसा सम्बन्ध हो तो भविष्य जन्म या पुनर्जन्म मे मनुष्य ही होगा । मनुष्य का अर्थ मनुष्य योनि

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २८३ समझना चाहिये—स्त्री या पुरुष दोनोंके लिये मनुष्य का प्रयोग किया जाता है। हमारा यह मत है कि पुरुष प्रत्येक जन्म में पुरुष ही होता है—स्त्री प्रत्येक जन्म में स्त्री ही होती है। पुरुष प्राण और योषा प्राण (स्त्री प्राण) की यह विशेषता है ॥२७॥ (च) (१) यदि नवमेश—उस राशि में हो जिसमें लग्नेश उच्च का होगा या जो लग्नेश की स्व राशि है तो पूर्व जन्म में जातक मनुष्य देह धारी था (२) यदि पंचमेश उस राशि में हो जो लग्नेश की उच्च राशि है अथवा लग्नेश की स्व राशि है तो जातक पुनर्जन्म के बाद मनुष्य ही होगा। (३) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो की लग्नेश की सम राशि है (अर्थात् न मित्र, न शत्रु) तो पूर्व जन्म में पशु था। (४) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की सम राशि है तो पुनर्जन्म के बाद पशु होगा। (५) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो लग्नेश की नीच राशि या शत्रु राशि है तो पूर्व जन्म में जातक पक्षी था। (६) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की नीच राशि या शत्रु राशि है तो पुनर्जन्म 'पक्षी' योनि में होगा। (छ) ऊपर जो २८वें श्लोक में नवमेश या पंचमेश के विचार से फल बताये गये हैं यह नवमेश पंचमेश किस द्रेष्काण में हैं—उस द्रेष्काण का क्या रुप है—इसके अनुसार भी विचार करना चाहिये। ॥२८॥ (१) यदि नवम और पंचम भावों के मालिक एक ही राशि में हो तो उस ही देश में जन्म (पूर्व) था और होगा (पुन- र्जन्म) ।

२८४ फलदीपिका (२) यदि यह दोनों (नवम और पंचम के मालिक) समान बली हों तो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म एक ही जाति में था और होगा (३) पूर्व जन्म का हाल नवमेश के वर्ण, गुण आदि जो विविध ग्रहों के प्रथम अध्याय में बताये गये हैं उनके अनुसार बताना चाहिये, तथा पुनर्जन्म का विवरण पंचमेश के वर्ण, गुण आदि के अनुसार कहना चाहिये । ग्रहों के स्वरूप, जाति, प्रकृति, स्वभाव आदि पहिले संज्ञाध्याय में बता चुके हैं। ।।२७।। २१ श्लोक से २९ श्लोक तक पूर्व जन्म और पुनर्जन्म का हाल जानने के सिद्धान्त दिये गये है । व्यावहारिक दृष्टि से इनकी उपयो- गिता कुछ नहीं है । शास्त्रीय दृष्टि से यह दिलचस्प प्रकरण है । कर्म विपाक नामक एक ग्रंथ में पूर्व जन्म का विशेष विवरण जानने के लिये विस्तार पूर्वक फला देश दिया गया है । परन्तु यह कहा नहीं जा सकता कि कहाँ तक वह ठीक है क्यों कि इसका निश्चय करने का कोई साधन नहीं कि कहाँ तक यह फल ठीक बैठते हैं ।।२९।।

पन्द्रहवां अध्याय भावचिन्ता भावाः सर्वे शुभपतियुता वीक्षिता वा शुभेशै- स्तत्तद्भावाः सकलफलदाः पापदृग्योगहीनाः । पापाः सर्वे भवनपतयश्चेदिहाहुस्तथैव खेटैः सर्वैः शुभफलमिदं नीचमूढारिहीनैः ॥१॥ तत्तद्भावात् त्रिकोणे स्वसुखमदनभे चास्पदे सौम्ययुक्ते । पापानां दृष्टिहीने भवनपसहिते पापखेटैरयुक्ते । भावानां पुष्टिमाहुः सकलशुभकरीमन्यथा चेत्प्रणाशं मिश्रं मिश्रैर्ग्रहेन्द्रैः सकलमपि तथा मूर्तिभावादिकानाम् ॥ नाशस्थानगतो¹ दिवाकरकरैर्लुप्तस्तु यद्भावपो² नीचारातिगृहं³ गतो⁴ यदि भवेत्सौम्यैरयुक्तेक्षितः⁵ । तद्भावस्य विनाशं वितनुते तादृग्विधोऽन्योऽस्ति चेत् तद्भावोऽपि फलप्रदो न हि शुभश्चेन्ना