फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१५ मकान जीर्ण होगा ? यदि चौथे घर में शत्रु ग्रह हो तो उस मनुष्य की जमीन, सवारी तथा भूमि का और लोग अपहरण कर लेंगे ? ॥१४॥ (v) (क) यदि पंचम भाव शुभ राशि और शुभ ग्रह के नवांश में हो या पंचम भाव शभग्रह-युक्त हो तो जातक बुद्धिमान् और निष्कपट होता है । यदि पंचमेश उत्तम भाव में बैठ कर वैशेषिकांश में हो तब भी यही फल । संस्कृत में "सौम्य" शब्द आया है । सौम्य के दो अर्थ हैं शुभ और बुध । एक टीकाकारने सौम्य का अर्थ 'बुध' किया है । किन्तु हमारे विचार से यहाँ सौम्य का प्रयोग शुभ के अर्थ में किया गया है ॥१५॥ (vi) (क) नीचे कुछ योग दिये हैं जिनमें से किसी के होने से जातक को घोर शत्रु पीड़ा होती है और वह शत्रु पीड़ा का निराकरण नहीं कर सकता : (१) पाप ग्रह छठे में हों, (२) लग्नेश बलवान् षष्ठेश से दृष्ट या युत हो (३) छठे घर का स्वामी पाप ग्रह से दृष्ट या युत केन्द्र में हो । [संस्कृत के मल श्लोक से एक और भी अर्थ निकलता है कि लग्नेश के छठे घर में होने से भी शत्रु पीड़ा होती है; यदि बलवान् षष्ठेश से दृष्ट या युत हो तो और अधिक पीड़ा होगी] ॥१६॥ (ख) यदि लग्नेश षष्ठेश से बहुत अधिक बली हो और लग्नेश सौम्य-ग्रह की राशि और अंश में हो और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हो और चतुर्थेश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो तो जातक दृढ़ शरीर वाला, नीरोग और भाग्यवान् होता है । ॥१७॥ (ग) यदि षष्ठेश दुःस्थानमें (६, ८, या १२ में) नीच राशि या शत्रु राशि में या अस्त हो और षष्ठेश की अपेक्षा लग्नेश बलवान्
३१६ फलदीपिका हो तथा सूर्य नवम में हो तो जातक शत्रु पर विजयी होता है और शत्रु का नाश होता है। इस श्लोक में पाठान्तर भी है जिसके अनुसार पाठ हो जायेगा “शत्रुनाशो रिपौ शुभे”। ऐसा पाठ मानने से सूर्य नवम में हो इसकी बजाय अर्थ होगा; छठे घर में शुभग्रह हो तो शत्रु पर जातक विजयी होता है।॥१८॥ (घ) (१) छठे घर का स्वामी जिस भावेश के साथ हो। (२) छठे घर का स्वामी जिस भाव में बैठा हो। (३) जो भावेश छठे घर में बैठा हो। यह तीनों शत्रुता करेंगे। उदाहरण के लिये षष्ठेश पंचम में बैठा हों या पंचमेश षष्ठ में बैठा हो या पंचमेश, षष्ठेश एक साथ बैठे हों तो पुत्र शत्रुता करेगा।॥१९॥ (vii) यदि सातवें भाव का शुभग्रहों से सम्बन्ध हो और सप्त- मेश बलवान् हो तो जातक की स्त्री सर्वगुणों से युक्त, पति पुत्रवती और साध्वी होती है।॥२०॥ (viii) (क) अष्टमेश यदि केन्द्र के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान में हो और लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश दुर्बल हो तो न आधि होती है न विघ्न होते हैं, न क्लेश होते हैं और जातक चिरायु होता है।॥२१॥ (ix) (क) यदि सूर्य या मंगल नवम में हो और नवम का स्वामी दुःस्थान में पड़ा हो अथवा पापग्रही के मध्य में हो तो जातक के पिता का मरण हो जाता है अर्थात् जातक का पिता अल्पायु होता है।॥२२॥ (ख) यदि दिन में जन्म हो और सूर्य सुस्थान में हो तथा शुभ ग्रह से वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता दीर्घायु *दक्षिण भारत में नवम से पिता का विचार करते हैं किन्तु उत्तर भारत में पिता का विचार दशम से किया जाता है।
सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१७ होता है। यदि रात्रि में जन्म हो और शनि सुस्थान में शुभ ग्रह वीक्षित हो और नवमेश बलवान् हो तो जातक का पिता चिरायु होता है। ॥२३॥ (ग) यदि सूर्य और चन्द्रमा, शनि और मंगल से त्रिकोण में हो तो बालक के माता पिता उसे छोड़ देंगे किन्तु यदि इन पर (सूर्य चन्द्र पर) बृहस्पति की दृष्टि हो तो जातक सुखी और चिरायु होगा। ॥२४॥ (घ) यदि शनि नवमेश होकर चर राशि में बैठे और शुभ-ग्रह से दृष्ट न हो और सूर्य दुःस्थान में हो तो जातक को उसके पिता के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति पालता है। ॥२५॥ (ङ) यदि नवम स्थान में चर राशि हो और शनि से युत या दृष्ट हो अथवा नवमेश चर राशि में बैठा हो और श ने से युत वा दृष्ट हो – इन दोनों में से कोई योग हो और व्ययेश बलशाली हो तो जातक किसी के यहाँ गोद जाता है। ॥२६॥ ( x ) (क) यदि दशम में शुभ-ग्रह हो और दशम का स्वामी बलवान् होकर अपनी राशि में या अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में बैठे या लग्न का स्वामी बलवान् होकर दशम में बैठे तो जातक का राजा के समान भाग्य होता है और वह दीर्घायु भी होता है। उसके यश का बहुत विस्तार होता है और उसकी प्रवृत्ति भी धर्म- कर्म में होती है। ॥२७॥ (ख) यदि दशम में सूर्य या मंगल हो तो जातक प्रतापी और लोक-प्रिय होता है और यदि दशमेश सुस्थान में बैठा हो तो अत्याधिक प्रताप से कार्य साधन करता है। यदि दशम में सौम्य ग्रह हो तो जातक प्रशंसा के योग्य उत्तम व्यापार वाली क्रियायें करता है। किन्तु यदि दशम में शनि राहु या केतु हो तो मनुष्य दुष्कर्म करने वाला होता है। ॥२८॥
३१८ फलदीपिका (xi) (क) (१) लाभेश जिस भाव के स्वामी के साथ हो (२) लाभेश जिस भाव में हो (३) जो ग्रह या जो भावेश लाभ में बैठे हों इन तीनों के अनुरूप वस्तु का लाभ कहना चाहिये। उदाहरण के लिये लाभेश पंचम में बैठे या पंचमेश लाभ में बैठे या लाभेश, पंचमेश एक साथ हों तो विद्या, पुत्र, बुद्धि, सट्टे से लाभ कहना क्योंकि पंचम से इनका विचार किया जाता है। इसी प्रकार यदि लाभेश, सप्तमेश का सम्बन्ध हो या सप्तमेश लाभ में बैठे या लाभेश सप्तम में बैठे तो स्त्री से, साझेदारी से या व्यापार से लाभ कहना। ॥३०॥ (xii) जो भावेश बारहवें घर में बैठे या बारहवें घर का स्वामी जिस भाव में बैठे उस भाव के अनुरूप वस्तु का नाश कहे। उदाहरण के लिये चतुर्थेश व्यय में हो तो सवारी का व्यय, या भूमि का व्यय, व्ययेश यदि पंचम में हो तो पुत्र द्वारा या सट्टे से धन का व्यय कहना चाहिये। ॥३०॥ भावसिद्धिकाल अब यह बताते हैं कि किसी भाव सम्बन्धी फल कब होगा। भावेशस्थितभांशकोणमपि वा भावं तु वा लग्नपो लग्नेशस्थितभांशकोणमुदयं वाऽयाति भावाधिपः । संयोगेऽपि विलोकनेऽपि च तयोस्तद्भावसिद्धिं तदा ब्रूयात्कारकयोगतस्तनुपतेर्लग्नाच्च चन्द्रादपि ॥३१॥ किसी भाव की प्राप्ति या फल निम्न लिखित कालों में से किसी समय होते हैं : (१) भावेश जिस राशि और अंश में हो उस से त्रिकोण में गोचरवश जब लग्नेश आवे (२) लग्नेश जिस राशि में या उससे और अंश में है उसमें या उससे त्रिकोण में जब गोचरवश भावेश आवे।
सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३१९ (३) जब लग्नेश और भावेश गोचरवश एक दूसरे को देखें या एक दूसरे से युक्त हो जायें (४) जब भाव कारक गोचरवश उस स्थान पर आवे जहाँ जन्म कुण्डली में लग्नेश वा चन्द्र राशि का स्वामी हो (५) जब लग्नेश गोचरवश उस भाव में आवे- जिस भाव सम्बन्धी विचार करना हो । चन्द्रलग्न से भी इसी प्रकार विचार करना चाहिये । ॥३१॥ यद्भावेशास्थितर्क्षाशत्रिकोणस्थे गुरुर्यदा । गोचरे तस्य भावस्य फलप्राप्तिं विनिर्दिशेत् ॥३२॥ यह देखिये कि जिस भाव का विचार करना है उसका स्वामी किस राशि और किस अंश में है । जब गोचरवश बृहस्पति उस राशि और अंश से त्रिकोण में आता है तब उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है। ॥३२॥ लग्नारिनाथयोगे तु लग्नेशाद्दुर्बले रिपौ । तदा तद्वशगः शत्रु र्विपरीतमतोऽन्यथा ॥३३॥ जब गोचरवश लग्नेश और षष्ठेश का योग हो अर्थात् दोनों मिल तो क्या फल होगा ? यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश दुर्बल हो तो जातक के वश में शत्रु आ जाता है और यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश बली हो तो जातक स्वयं शत्रु के वश हो जाता है । ॥३३॥ यद्भावपस्य तनुपस्य भवत्यरित्वा- तत्कालशत्रु वशतोऽरिमृतिस्थितो वा । स्पर्धां तदा वदतु तेन च गोचरस्थ- स्तद्वत्सुहृत्वमपि संयुतिमैत्रतश्च ॥३४॥
३२० फलदीपिका जिस भावेश की और लग्नेश की तात्कालिक या नैसर्गिक या एक-दूसरे से षष्ठ-अष्टम रहने के कारण शत्रुता हो—उन दोनों का लग्नेश और उस भावेश का-जब गोचरवश योग हो तो उस भाव सम्बन्धी शत्रुता या स्पर्धा या कलह का कारण होना चाहिये। किन्तु यदि लग्नेश और किसी भावेश की नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता हो और लग्नेश तथा उस भावेश का गोचरवश योग हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख, नवीन मित्रता आदि कहना। आगे तेईसवें अध्याय में एक कुण्डली दी गयी है उसमें लग्नेश सूर्य है और षष्ठेश शनि है, दोनों नैसर्गिक शत्रु भी हैं और तात्कालिक भी और एक दूसरे से छठे, आठवें हैं इसलिये जब जब सूर्य-शनि योग होगा तब-तब शत्रु सम्बन्धी त्रास होगा और उसी कुण्डली में सूर्य लग्नेश है तथा बृहस्पति पंचमेश है। दोनों नैसर्गिक मित्र भी है और तात्कालिक भी, इस कारण जब जब सूर्य और बृहस्पति का योग होगा तब-तब पंचम भाव सम्बन्धी शुभ प्राप्ति होगी ? ॥३४॥ लग्नेशयद्भावपयोस्तु योगो यदा तदा तत्फलसिद्धिकालः। भावेशवीर्ये शुभमन्यथान्य- ल्लग्नाच्च चन्द्रादपि चिन्तनीयम् ॥३५॥ लग्नेश गोचरवश जब किसी भावेश से योग करे तो उस भाव सम्बन्धी सिद्धि या फल प्राप्ति होती है। मान लीजिये कोई मनुष्य मकान या भूमि खरीदने वाला है और प्रश्न करता है कि कब गृह लाभ या भूमि लाभ होगा तो देखिये कि जन्म कुंडली में लग्नेश- चतुर्थेश योग होने वाला है क्या ? जब लग्नेश चतुर्थेश योग हो तब गृह लाभ या भूमि लाभ होगा। किन्तु यह सम्भव तभी होगा जब
सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३२१ चतुर्थेश बलवान् हो । भावेश के बलवान् होने से ही कार्य सिद्धि होती है। यदि भावेश दुर्बल है तो लग्नेश भावेश का योग होने पर भी कार्य सिद्धि नहीं होगी । दशा, अन्तर्दशा का भी विचार कर लेना चाहिये । जैसे ऊपर लग्न कुण्डली और लग्नेश से विचार बताया गया है उसी प्रकार चन्द्र कुण्डली (चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर) विचार करना चाहिये । ॥३५॥
सत्रहवां अध्याय निर्याणप्रकरण तत्तद्भावादष्टमेशस्थितांशे तत्तत्त्रिकोणगे । व्ययेशस्थितभांशे वा मन्दे तद्भावनाशनम् ॥१॥ किसी भाव सम्बन्धी नाश कब होगा यह विचार करना हो तो यह देखिये कि विचारणीय भाव से अष्टम और द्वादश के स्वामी कहाँ पर हैं । जब शनि गोचरवश वहाँ (विचारणीय भाव से गिनने पर आठवें और बारहवें के स्वामी जहाँ पर हों उस राशि और नवांश पर) आवेगा तब विचारणीय भाव का नाश होता है । ऊपर जो स्थान बताये गये हैं, जहां शनि हानि करता है वहाँ से नवम और पंचम राशियों पर आने पर भी शनि अनिष्ट करेगा । ॥१॥ उदाहरण के लिये आगे अष्टकवर्ग प्रकरण में जो कुंडली दी गई है वह देखिये । मान लीजिये दशम भाव का नाश (नौकरी या पिता के लिये अनिष्ट) कब होगा ? दशम भाव में वृष है । इससे अष्टम धनु है—इसका स्वामी तुला के कुंभ नवांश में है जब शनि तुला के कुंभ नवांश या इसके त्रिकोण कुंभ के कुंभनवांश गा मिथुन के कुंभ नवांश पर आवेगा तब होगा । ॥ निर्याणशनिः ॥ इस श्लोक में यह बताते हैं कि मनुष्य की मृत्यु के समय शनि गोचरवश कहाँ पर होगा ।
सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२३
रन्ध्रेशो गुलिको मन्दः खरद्रेक्काणपोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तद्भांशत्रिकोणे रविजे मृतिः ॥२॥ यह देखिये कि निम्नलिखित ग्रह किन राशियों और किन नवांशों में हैं। (१) अष्टमेश (२) गुलिक (३) शनि (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी । जब शनि गोचरवश उपर्युक्त स्थानों पर (राशि और नवांश) या उपर्युक्त स्थानों से नवम या पंचम होता है तब जातक की मृत्यु होती है। ॥२॥ उद्यद्द्द्रेगाणनाथस्य तथा रन्ध्राधिपस्य च । रन्ध्रद्रेक्काणपस्यापि भांशकोणे गुरौ मृतिः ॥३॥
यह देखिये कि निम्नलिखित कहाँ हैं (१) जन्म लग्न जिस द्रेष्काण
में है उस द्रेष्काण का स्वामी (२) अष्टमेश (३) जन्म लग्न से २२वें
द्रेष्काण का स्वामी । उपर्युक्त तीनों जिस राशि या अंश में हों उस
[
३२४ फलदीपिका सूर्य के गोचरवश मृत्युकाल बताया है उसका आशय यह नहीं है कि उस समय मृत्यु हो ही जायगी क्योंकि शनि तीस वर्ष में, बृहस्पति १२ वर्ष में और सूर्य एक वर्ष में पूरा परिभ्रमण कर ही लेता है। इन गोचरों को बताने का उद्देश्य यही है कि मारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा हो और उसमें यह निर्णय करना हो कि किस वर्ष, किस मास में मृत्यु होगी तब ऊपर लिखे प्रकार से देखना चाहिये। ॥४॥ रन्ध्रप्रभोर्वा भानोर्वा भांशकोणं गते विधौ । मृतिं वदेत्सर्वमेतल्लग्नाच्चन्द्राच्च चिन्तयेत् ॥५॥ चन्द्रमा जब गोचरवश उस राशि या नवांश पर आवे जहाँ अष्टमेश है अथवा जहाँ सूर्य है अथवा गोचरवश जब चन्द्रमा उपर्युक्त स्थानों से त्रिकोण (नवम-पंचम) पर आवे तब जातक की मृत्यु हो सकती है। जिस प्रकार उपर्युक्त श्लोकों में लग्न से विचार बताया गया है उसी प्रकार चन्द्रलग्न से भी यह सब विचार करना चाहिये । लग्नेशहीनयमकण्टकभांशकोणं प्राप्तेऽथवा शनिविहीनहिमांशुभांशम् । याते गुरौ स्वमरणन्त्वथ राहुहीन- भूसूनुभांशकगुरौ सहजप्रणाशः ॥६॥ (१) लग्नेश की राशि, अंश, कला में से यमकंटक की राशि, अंश, कला घटाइये। जो शेष बचे उसको कहिये “क”। (२) शनि की राशि, अंश, कला में से चन्द्रमा की राशि, अंश, कला घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये “ख”। उपर्युक्त “क” और “ख” जिन राशि
सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२५ और नवांश में हों उन राशि नवांश पर या उनसे नवम, पंचम जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब जातक की मृत्यु होती है । राहु की राशि, अंश, कला में से मंगल की राशि, अंश, कला घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये "ग" । "ग" जिस राशि और नवांश में है उस स्थान पर या उससे नवम-पंचम जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब जातक के भाई की मृत्यु हो सकती है । ।६।। भानोः कण्टकवर्जितस्य भवनांशे वा त्रिकोणे गुरौ तातो नश्यति कण्टकोनगुलिकक्षांशत्रिकोणे शनौ । अर्कोनेन्दुगृहांशकोणगगुरौ चन्द्रोनमन्दात्मज- क्षेत्रेऽशेऽप्यथवा त्रिकोणगृहगे मन्दे जनन्या मृति ॥७॥, सूर्य की राशि, अंश, कला से यमकंटक की राशि, अंश कला घटाइये । जो शेष बचे उसे कहिये "क" । "क" जिस राशि और नवांश में है उस पर या उससे नवमपंचम गोचरवश बृहस्पति आता है तब जातक के पिता की मृत्यु हो सकती है । यमकंटक की राशि, अंश, कला में से मान्दि (गुलिक) की राशि, अंश, कला घटाइये, जो शेष बचे उसे कहिये "ख" । "ख" जिस राशि और नवांश में है उस पर या उससे नवमपंचम पर जब गोचरवश शनि आवे तब जातक के पिता की मृत्यु हो सकती है । सूर्य-स्पष्ट में से चन्द्र स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उसे कहिये 'ग' । "ग" जिस राशि और नवांश में हो उस पर या उससे नवम पंचम जब गोचरवश बृहस्पति आवे तब जातक की माता की मृत्यु हो सकती है । चन्द्र-स्पष्ट में से मान्दि-स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उसको कहिये "घ" । "घ" जिस राशि और नवांश में है उस पर या उससे नवम
३२६ फलदीपिका या पंचम जब गोचरवश शनि आवे तो माता की मृत्यु हो सकती है । ॥७॥ वदेत्प्रत्यरिनक्षत्रनाथाच्च यमकण्टकम् । त्यक्त्वा तद्भवने कोणे गुरौ पुत्रविनाशनम् ॥८॥ जन्म नक्षत्र से पांचवें नक्षत्र का स्वामी जो ग्रह है उसकी राशि, अंश, कला में से यमकंटक की राशि, अंश, कला घटाइये । जो शेष बचे उस स्थान पर या उससे नवमपंचम जब गोचरवश बृहस्पति आवे तो पुत्र की मृत्यु हो सकती है । ॥८॥ लग्नार्कमान्दिस्फुटयोगराशेरधीश्वरो यद्भवनेोपगस्तु । तद्राशिसंस्थे पुरुहूतवन्द्ये तत्कोणे वा मृतिमेति जातः ॥९॥ निम्नलिखित को लीजिये : लग्न स्पष्ट, सूर्यस्पष्ट और मान्दि- स्पष्ट । जो योग आवे उस राशि का स्वामी कहाँ है यह देखिये । उस स्वामी के स्थान पर या उससे नवम पंचम जब गोचरवश बृहस्पति आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है । ॥९॥ मान्दिस्फुटे भानुसुतं विशोध्य राश्यंशकोणे रविजे मृतिः स्यात् । धूमादिपञ्चग्रहयोगराशि- द्रेक्काणयातेऽर्कसुते च मृत्युः ॥१०॥ (i) मान्दि स्पष्ट में से शनि स्पष्ट घटाइये, जो शेष बचे उस पर या उससे नवमपंचम जब गोचरवश शनि आवे तो जातक की मृत्यु होती है ।
सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२७ (ii) धूम आदि पांचों उपग्रहों को जोड़िये। जोड़ने से जो राशि और द्रेष्काण आवे उस पर जब गोचरवश शनि आता है तो जातक की मृत्यु हो सकती है। ॥१०॥ विलग्नमान्दिस्फुटयोगभांशं निर्याणमासं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः । निर्याणचन्द्रो गुलिकेन्दुयोगो लग्नं विलग्नार्किसुतेन्दुयोगः ॥११॥ (i) लग्न स्पष्ट और मान्दि-स्पष्ट को जोड़िये, जो योग आवे वह मृत्यु का मास हुआ अर्थात् उस राशि में जब सूर्य आवेगा तब जातक की मृत्यु होगी। (ii) मान्दि स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट को जोड़िये, जो राशि आवे उस राशि पर मृत्यु के समय चन्द्रमा होगा । (iii) लग्न स्पष्ट, मान्दि-स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट को जोड़िये । जो योग आवे वह मृत्यु के समय लग्न होगा । ॥११॥ मान्दिस्फुटोदितनवांशगतेऽमरज्ये तद्द्वादशांशसहिते दिननाथसूनौ । द्रेष्काणकोणभवने दिनपे च मृत्यु र्लग्नेन्दुमान्दियुतभेशगतोदये स्यात् ॥१२॥ यह देखिये कि मान्दि किस नवांश में है। इस नवांश में जब बृहस्पति आवे; यह देखिये कि मान्दि किस द्वादशांश में है; इस द्वादशांश में जब शनि आवे; और मान्दि किस द्रेष्काण में है, उस द्रेष्काण में या उनसे नवमपंचम जब गोचरवश सूर्य आवे तब जातक
३२८ फलदीपिका की मृत्यु होगी । मृत्यु के समय लग्न कौन सा होगा ? जातक की जन्मकुण्डली में लग्न, चन्द्रमा और मान्दि स्पष्टों को जोड़िये । जो योग आवे उस राशि का स्वामी कहाँ बैठा है यह देखिये । जिस राशि में बैठा है वही राशि मृत्यु के समय लग्न होगी । ॥१२॥ गुलिकं रविसूनुं च गुणित्वा नवसंख्यया । उभयोरैक्यराश्यंशगृहगे रविजे मृतिः ॥१३॥ मान्दि स्पष्ट को नौ (९) से गुणा कीजिये तथा शनि स्पष्ट को ९ से गुणा कीजिये । दोनों का योग कीजिये । यह योग जिस राशि और जिस नवांश पर आवे उस पर जब गोचरवश शनि आता है तो जातक की मृत्यु हो सकती है । स्फुटे विलग्ननाथस्य 'विशोध्य यमकण्टकम् । तद्राशिनवभागस्थे जीवे मृत्युर्न संशयः ॥१४॥ लग्नेश-स्पष्ट में से यमकंटक घटाइये और यह देखिये कि कौन सी राशि और कौनसा नवांश आता है । जब बृहस्पति गोचरवश इस नवांश पर आता है तो जातक की निस्सन्देह मृत्यु होगी । ॥१४॥ षष्ठावसानरन्ध्रेशस्फुटैक्यभवनं गते । तत्त्रिकोणोपगे वाऽपि मन्दे मृत्युभयं नृणाम् ॥१५॥ षष्ठेश, अष्टमेश, और द्वादशेश इन तीनों ग्रहों की राशि, अंश कला जोड़िये । अर्थात् इन तीनों के ग्रह स्पष्ट जोड़िये । जोड़ने से जो राशि आवे उस राशि में या उससे नवम पंचम जब शनि आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है । ॥१५॥
सत्रहवां अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२९ उद्यद्द्रैष्काणपतिराशिगते सुरेड्ये तस्य त्रिकोणमपि गच्छति वा विनाशम् । रन्ध्रत्रिभागपतिमन्दिरगेऽथ मन्दे प्राप्ते त्रिकोणमथवास्य वदन्ति मृत्युम् ॥१६॥ यह देखिये कि जन्म लग्न में जो द्रेष्काण है उसका स्वामी कहाँ है । जब बृहस्पति इस द्रेष्काण पति के ऊपर से गुजरे या उससे नवम- पंचम गोचरवश जावे तो जातक को मृत्युभय होता है । यह बृहस्पति के गोचर वश फल बताया गया है । अब इसी श्लोक में शनि के गोचरवश कब मृत्युभय होगा यह बताते हैं: यह देखिये कि अष्टम भाव मध्य पर कौन सा द्रेष्काण है । और यह द्रेष्काण पति कहाँ पर है । जब शनि इस द्रेष्काण-पति की राशियों में से गुजरता है या उससे नवम पंचम जाता है तो जातक को मृत्युभय होता है।* ॥१६॥ विलग्नजन्माष्टमराशिनाथयोः खरत्रिभागेश्वरयोस्तयोरपि । शशाङ्कमान्योरपि दुर्बलांशक- त्रिकोणगे सूर्यसुते मृतिर्भवेत् ॥१७॥
- मूल श्लोक में शब्द आया है रन्ध्रत्रिभागपति मन्दिरगेऽथ इसके दो अर्थ हो सकते हैं अष्टम भाव में जो द्रेष्काण है उसका स्वामी जिस राशि में है उसमें से जब शनि गुज़रे तो मृत्यु समय या जब उससे नवमपंचम जावे तो जातक को मृत्युभय हो सकता है ।
३३० फलदीपिका यह देखिये कि निम्नलिखित दो-दो में से कौन सबसे अधिक दुर्बल है: (i) लग्न से अष्टम राशि का स्वामी और जन्म-राशि से अष्टम राशि का स्वामी (ii) जन्म लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी और चन्द्रलग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (iii) चन्द्रमा और (iv) मान्दि। इन मे जो सबसे दुर्बल हो वह जिस नवांश में है उस नवांश से जब शनि गोचरवश या इससे नवम या पंचम जाता है तो जातक को मृत्युभय होता है । ॥१७॥ लग्नाधिपस्थितनवांशकराशितुल्यं रन्ध्राधिपस्य गृहमापतिते घटेशे । तस्मिन्वदेन्मरणयोगमनेकशास्त्र- संक्षुण्णखिन्नमतिभिः परिकीर्तितं तत् ॥१८॥ यह देखिये कि लग्नेश किस नवांश में है। इस नवांश की राशि को कहिये "क"। अष्टमेश किस राशि में है—जिसमें हो उसे कहिये "ख"। मेष से जितनी दूर "क" राशि है, "ख" से उतनी ही दूर राशि पर जब गोचरवश शनि जाता है तब जातक की मृत्यु हो सकती है। ऐसा उन विद्वानों का मत है जिन्होंने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है । ॥१८॥ शशाङ्कसंयुक्तदृगाणपूर्वतः खरत्रिभागेशगृहं गतेऽपि वा । त्रिकोणगे वा मरणं शरीरिणां शशिन्यथ स्यात्तनुरन्ध्ररिःफगे ॥१६॥ अब यह बताते हैं कि मृत्यु के समय चन्द्रमा कहाँ होगा । इस श्लोक में यह बताया गया है कि निम्नलिखित किन्हीं स्थानों में चन्द्रमा मृत्यु के समय हो सकता है ।
सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३१ (i) जन्म कालीन जिस द्रेष्काण में चन्द्रमा हो उसमें जब गोचर वश चन्द्रमा आवे (ii) जन्म में चन्द्रमा जिस स्थान पर है वहाँ से गिनने पर जो बाइसवाँ द्रेष्काण हो उस २२वें द्रेष्काण के स्वामी की राशि। (iii) ऊपर (i) तथा (ii) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे नवम या पंचम (iv) लग्न में (v) लग्न से अष्टम या (vi) लग्न से द्वादश ।॥१९॥ निधनेश्वरगतराशौ भानाविन्दौ तु भानुगतराशौ । निधनाधिपसंयुक्ते नक्षत्रे निर्दिशेन्मरणम् ॥२०॥ यदि जन्म लग्न से अष्टम का स्वामी जहाँ बैठा है उस राशि में सूर्य गोचरवश जा रहा हो और चन्द्रमा (क) जिस राशि में जन्म कुण्डली में सूर्य बैठा हो उस राशि में जा रहा हो (ख) या जन्म लग्न से अष्टमेश जन्मकुण्डली में जिस नक्षत्र में हो उस नक्षत्र में चन्द्रमा गोचरवश हो तो जातक की मृत्यु हो सकती है।* ॥२०॥ यो राशिर्गु लिकोपेतः तत्त्रिकोणगते शनौ । मरणं निशिजातानां दिविजानां तदस्तके ॥२१॥
- जब दशा-अन्तर्दशा मारक ग्रह की हो तब शनि गोचरवश कब मारक होगा और गुरु गोचरवश कब मारक होगा, यह सब निकाल लेने पर सूर्य और चन्द्रमा के अनिष्ट गोचर का विचार करना चाहिये अन्यथा सूर्य तो एक वर्ष में और चन्द्रमा एक मास में सब राशि भ्रमण कर लेता है।
३३२ फलदीपिका यदि जातक का जन्म रात्रि का हो तो यह देखिये कि गुलिक किस राशि में है। उस राशि से जब त्रिकोण में गोचरवश शनि आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है और यदि दिन का जन्म हो तो गुलिक जिस राशि में है उससे सप्तम राशि में जब गोचरवश शनि आवे तो मृत्युप्रद हो सकता है ।।२१।। गुरुराहुस्फुटैक्यस्य राशिं यातो गुरुर्यदा । तदा तु निधनं विद्यात्तत्त्रिकोणगतोऽथवा ॥२२॥ बृहस्पति स्पष्ट और राहु स्पष्ट को जोड़ लीजिये। जो राशि आवे उसमें गोचरवश जब बृहस्पति जावे या उस राशि से नवम या पंचम गुरु गोचर में हो तो मृत्युप्रद हो सकता है ।।२२।। अष्टमस्य त्रिभागांशपतिस्थितगृहं शनौ । तदीशनवभागाक्षं गते वा मरणं भवेत् ॥२३॥ (१) लग्न से गिनने पर अष्टम भाव मध्य पर जो द्रेष्काण हो उस द्रेष्काण का स्वामी जन्मकुण्डली में जहाँ बैठा है उस राशि में गोचरवश जब शनि आवे तो जातक की मृत्यु हो सकती है । (२) जन्म लग्न से अष्टमेश जिस नवांश में हो उस नवांश राशि में भी जब शनि गोचरवश भ्रमण करे तो मृत्यु कर सकता है। ।।२३।। जन्मकाले शनौ यस्य जन्माष्टमपतेरपि । राशेरंशकराशेर्वा त्रिकोणस्थे शनौ मृतिः ॥२४॥ (१) जन्म कुण्डली में शनि जिस राशि और अंश में है उस राशि या उस अंश में या उससे नवमपंचम जब गोचरवश शनि
सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३३ जावे तो मृत्यु कर सकता है। (२) जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में है उस राशि काँ स्वामी जिस राशि या अंश में हो या उसमे नवम या पचम जब गोचरवश शनि हो तो मृत्युप्रद हो सकता है। (३) जन्म लग्न से अष्टमेश जिस राशि या अंश में हो उसमें या उससे नवम पंचम यदि गोचर वश शनि हो तो मृत्यु कर सकता है। ॥२४॥ निशीन्दुराशौ चेज्जन्म मान्दिभेंऽशे शनौ मृतिः । दिवार्कभे चेत्तद्द्यूनत्रिकोणे वा शनौ मृतिः ॥२५॥ (१) यदि रात्रि का जन्म हो तो मृत्यु तब होगी जब शनि गोचरवश उस राशि और अंश में जा रहा हो जिस में चन्द्रमा या मान्दि हो (२) यदि दिन में जन्म है तो मृत्यु उस समय होगी जब जिस राशि और अंश में सूर्य हो उसमें अथवा उससे ५वें, ७वें या ९वें जब गोचरवश शनि जावे । ॥२५॥ रन्ध्रेश्वराद्यावति भे मान्दिस्तावति भे ततः । शनिश्चेन्मरणं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२६॥ जन्मकुण्डली में यह देखिये कि अष्टमेश से मान्दि कितने राशि और कितने अंश दूर है। जब मान्दि से इतनी ही राशि और इतनी ही अंश की दूरी पर शनि गोचरवश आवे तब जातक की मृत्यु होगी, यह सद्गुरुओ का कथन है । ॥२६॥ जन्मकालीनभृगुजात्कामशत्रुव्यये रवौ । मरणं निश्चितं ब्रूयादिति सद्गुरुभाषितम् ॥२७॥
३३४ फलदीपिका यह देखिये कि जन्मकुण्डली में शुक्र किस राशि में है । इस राशि से जब गोचरवश ६ठे, ७वें या १२वें सूर्य हो तब मृत्यु होगी । ऐसा तो प्रति वर्ष तीन बार होता है इसलिये जैसा पहले बता चुके हैं जब अन्य बातों से पूर्ण मारक का योग आता है तभी यह विचार करना चाहिये कि मृत्यु कब होगी । ॥२७॥ तिष्ठन्त्यष्टमरिःफषष्ठपतयो रन्ध्रत्रिभागेश्वरो मान्दिर्यद्भवनेषु तेष्वपि गृहेष्वार्कीज्यसूर्येन्दवः । सर्वे चारवशात्प्रयान्ति हि यदा मृत्युस्तदा स्यान्नृणां तेषामंशवशाद्वदन्तु निधनं तत्तत्त्रिकोणेऽपि वा ॥२८॥ यह देखिये कि निम्नलिखित कुण्डली में किन राशियों में हैं:— (१) अष्टमेश (२) व्ययेश (३) षष्ठेश (४) अष्टम भाव मध्य जिस द्रेष्काण में है उसका स्वामी (५) मान्दि। जब गोचर वश शनि, बृहस्पति, सूर्य और चन्द्र उपर्युक्त राशियों में जा रहे हो तो जातक की मृत्यु हो सकती है अथवा उपर्युक्त जिन नवांशों में हो उन नवांशों में या उनसे नवम पंचम जब शनि, गुरु, सूर्य, चन्द्र गोचर- वश जावें तो मृत्यु हो सकती है । ॥२८॥