फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
अठारहवां अध्याय द्विग्रहयोग दो-दो ग्रहों के योग का फल दो दो ग्रहों के योग का जन्म कुण्डली में क्या फल होता है यह इस अध्याय में बताया गया है। तिग्मांशुर्जनयत्युषेशसहितो यन्त्राश्मकारं नरं भौमेनाघरतं बुधेन निपुणं धीकीर्तिसौख्यान्वितम् । क्रूरं वाक्पतिनान्यकार्यनिरतं शुक्रेण रङ्गायुधै- र्लब्धस्वं रविजेन धातुकुशलं भाण्डप्रकारेपु वा ॥१॥ कूटस्त्र्यासवकुंभपण्यमशिवं मातुः सवक्रः शशी सज्ञः प्रथितवाक्यमर्थनिपुणं सौभाग्यकीर्त्यान्वितम् । विक्रान्तं कुलमुख्यमस्थिरमतिं वित्तेश्वरं साङ्गिरा वस्त्राणां ससितः क्रियादिकुशलं सार्किः पुनर्भू सुतम् ॥२॥ मूलादिस्नेहकूटैर्व्यवहरति वणिग्बाहुयोद्धा ससौम्ये पुर्यध्यक्षः सजीवे भवति नरपतिः प्राप्तवित्तो द्विजो वा । गोपो मल्लोऽथ दक्षः परयुवतिरतो द्यूतकृत्सासुरेज्ये दुःखार्तोऽसत्यसन्धः ससवितृतनये भूमिजे निन्दितश्च ॥३॥ सौम्ये रङ्गचरो बृहस्पतियुते गीतप्रियो नृत्यविद् वाग्मी भूपगणपः सितेन मृदुना मायापटुर्लम्पटः ।
३३६ फलदीपिका सद्विद्यो धनदारवान् बहुगुणः शुक्रेण युक्ते गुरौ ज्ञेयः श्मश्रुकरोऽसितेन घटकृज्जातोऽन्नकारोऽपि वा ॥४॥ असितसितसमागमेऽल्पचक्षु- र्युवतिसमाश्रयसम्प्रवृद्धवित्तः । भवति च लिखिपुस्तकचित्रवेत्ता कथितफलैः परतो विकल्पनीयाः ॥५॥ (i) यदि जन्म के समय सूर्य और चन्द्रमा एक राशि में हों तो जातक यंत्र और पत्थर के काम में कुशल होता है; सूर्य और मंगल एक साथ हों तो पाप करता है; सूर्य और बुध एक राशि में हों तो निपुण, बुद्धिमान्, कीर्तिवान् और सुखी हो । सूर्य बृहस्पति एक राशि में हों तो क्रूर हो और अन्य लोगों के कार्य में लगा रहे; सूर्य और शुक्र एक साथ हों तो रंग अर्थात् नाचना, गाना, सिनेमा, नाटक आदि से या शस्त्रों द्वारा धनोपार्जन करे; सूर्य शनि एक साथ हों तो धातु (लोहा इत्यादि) के कामों में अथवा बर्तनों के कार्य में कुशल हो ॥१॥ (ii) यदि चन्द्र-मंगल एक साथ हों तो आसव, घड़े दुकानदारी भरत के बर्तन (जो दो धातुओं को मिलाकर बनाया जाता है) आदि का कार्य करे । मातृ सुख के लिये यह योग अच्छा नहीं है । यदि माता जीवित रहेगी तो सम्भवतः बालक उसका आज्ञाकारी न हो । यदि चन्द्र-बुध साथ हों तो जातक मीठे और नम्र वचन बोलने वाला, अर्थ निपुण (धन के कार्य में निपुण अथवा किसी वाक्य या गणित का अर्थ लगाने में निपुण) सौभाग्यवान् और कीर्तिवान् हो । यदि चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ हों तो विक्रमशाली, अपने कुल में मुख्य और बहुत धनी हो किन्तु ऐसा व्यक्ति अस्थिर मति होता है अर्थात् मुस्तकिल मिजाज नहीं होता । यदि चन्द्रमा और शुक्र एक साथ हों तो वस्त्र- क्रिया (कपड़े के कारबार) में कुशल हो । यदि चन्द्रमा और शनि
अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३३७ एक साथ हों तो ऐसी स्त्री का पुत्र हो जिसने द्वितीय बार विवाह किया हो । हमारे विचार से यह योग हिन्दू समाज की उन जातियों पर घटित नहीं होगा जिनमें पुनर्विवाह की प्रथा नहीं है । ॥ २ ॥ (iii) यदि मंगल और बुध एक-साथ हों तो मूल (जड़ वाले पदार्थ—जड़ी बूटी, पौधे, वृक्ष, वृक्ष की छाल आदि), तेल, घी, चिकने पदार्थ, दवा आदि के व्यापार से लाभ होता हैं और जातक बाहु से युद्ध करने वाला भी होता है। यदि मंगल और बृहस्पति एक साथ हों तो किसी नगरी का अध्यक्ष हो या राजा हो या धनवान् ब्राह्मण हो । यदि मंगल और शुक्र एक साथ हों तो गोप (गौओं का मालिक), पहलवान, दूसरे की स्त्रियों में रत, जुआ खेलने वाला और चतुर होता है। यदि मंगल और शनि साथ हों तो दुःखी निन्दित, झूठी प्रतिज्ञा वाला अर्थात् झूठ बोलने वाला होता है। ॥३॥ (iv) यदि किसी जन्मकुण्डली में बुध और बृहस्पति एक साथ हो तो जातक नाटक में काम करने वाला (स्टेज पर) गाने का शौकीन और नृत्यकला जानने वाला होता है। यदि बुध और शुक्र साथ हों तो जातक वाग्मी (अच्छा बोलने वाला) ज़मीन का स्वामी, गण (चुनी हुई संस्थाओं) का अध्यक्ष होता है। यदि बुध और शनि एक साथ हो तो मायापटु (बहुत चालाक) और लम्पट हो । (v) यदि बृहस्पति और शुक्र एक साथ हों तो जातक उत्तम विद्या वाला, धनवान्, स्त्रियों से युक्त और बहुत गुणों से सम्पन्न होता है। यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो जातक नाई का, कुम्हार का या भोजन बनाने वाले का कार्य करे ऐसा मन्त्रेश्वर महाराज का मत है। हमारे विचार से बृहस्पति ज्ञान का प्रतीक है और शनि वैराग्य का इस कारण बृहस्पति व शनि एक साथ हों तो जातक अन्तर्मुखी वृत्ति वाला होता है। ॥ ४ ॥ (vi) यदि शुक्र और शनि एक-साथ हों तो जातक की दृष्टि में कुछ कमी हो । ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति, वृद्धि किसी युवती का
३३८ फलदीपिका आश्रय लेने से होती है। ऐसा व्यक्ति लिखने में, चित्रकारी में, पुस्तक आदि के कार्य में दक्ष होता है। ऊपर दो-दो ग्रहों के एक साथ होने का फल बताया गया है। यदि दो से अधिक ग्रह एक साथ हों तो ऊपर कहे हुये फलों का तारतम्य कर फलादेश करना चाहिये । ॥५॥ भूपो विद्वान् भूपतिर्भूतुल्य- श्चन्द्रे मेषे मोषको निर्धनश्च । निस्स्वः स्तेनो लोकमान्यो महीशः स्वाढ्यः प्रेष्यश्चापि दृष्टे कुजाद्यैः ॥६॥ युग्मस्थेऽयोजीविभूपज्ञदृष्टा- श्चन्द्रे दृष्टे तन्तुवायोऽधनी च । स्वर्क्षे योधप्राज्ञसूरिक्षितीशा लोहाजीवो नेत्ररोगी क्रमेण ॥७॥ राजा ज्योतिर्विद्धनाढ्यो नरेन्द्रः सिंहे चन्द्रे नापितः पार्थिवेन्द्रः । दक्षो भूपः सैन्यपः कन्यकायां निष्णातः स्याद्भूमिनाथश्च भूपः ॥८॥ शठो नृपस्तौलिनी रुक्मकार श्चन्द्रे वणिक् स्यात्पिशुनः खलश्च । कीटे नृपो युग्मपिता महीशः स्याद्वस्त्रजीवी विकृताङ्गवित्तः ॥९॥
अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३३९ धूर्तो हयाङ्गे स्वजनं जनेशं नरौघमाश्रित्य शठः सदम्भः । भूपो नरेशः क्षितिपो विपश्चि- द्धनी दरिद्रो मकरे हिमांशौ ॥१०॥ कुम्भेऽन्यदारनिरतः क्षितिपो नरेन्द्रो वेश्यापतिर्नृपवरो हिमगौ नृमान्यः । अन्त्येऽघकृत्पटुमतिर्नृपतिश्च विद्वान् दोषैकहग्दुरितकृच्च कुजादिदृष्टे ॥११॥ (i) यदि चन्द्रमा मेष में हो और उस पर सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि की दृष्टि हो तो क्रमशः निम्नलिखित फलें होते हैं (१) गरीब (२) राजा हो (३) विद्वान् (४) राजा (५) राजा के समान (६) चोर । (ii) यदि चन्द्रमा वृषभ में हो और सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति शुक्र या शनि से देखा जाय तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है । (१) नौकर (२) धनहीन (३) चोर (४) लोकमान्य (५) राजा और (६) धनी । ॥६॥ (iii) मदि चन्द्रमा मिथुन का हो और सूर्य, मंगल बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि से दृष्ट हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है (१) निर्धन (२) लोहे का काम करने वाला (३) राजा (४) विद्वान् (५) साहसी (६) तानेबाने या कपड़े का काम करने वाला । (iv) यदि चन्द्रमा कर्क में हो और सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति, शक्र, शनि की उस पर दृष्टि हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है । (१) नेत्र-रोगी (२) योद्धा (३) विद्वान् (४) बुद्धिमान्
३४० फलदीपिका (५) राजा और (६) लोहे के पदार्थ से आजीविका कमाने वाला। ॥७॥ (v) यदि चन्द्रमा सिंह में हो और भिन्न-भिन्न ग्रहों से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से राजा (२) म० से राजा (३) बु० से ज्योतिष शास्त्र जानने वाला (४) बृ० से धनाढ्य (५) शु० से राजा और (६) श० से नाई होता है । जो नाई नहीं होते वे नाई सदृश काम करने वाले होते हैं । (vi) यदि चन्द्रमा कन्या राशि में हो और सूर्य आदि ६ ग्रहों से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सू० से राजा (२) मं० से चतुर (३) बु० से राजा (४) बृ० से सेनापति (५) शु० से चतुर (६) श० से भूमिनाथ (ज़मीन का स्वामी) । ॥८॥ (vii) यदि चन्द्रमा तुला में हो और सूर्य आदि ग्रहों में से किसी से दृष्ट हो तो क्रमशः निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से खल (दुष्ट) (२) मं० से शठ (शैतान) (३) बु० से राजा (४) बृ० से सोने का काम करने वाला (५) शु० से व्यापारी (६) श० से चूगल खोर । (viii) यदि चन्द्रमा वृश्चिक में हो तो उस पर भिन्न-भिन्न ग्रहो की दृष्टि का निम्नलिखित फल होता है (१) सूर्य से दृष्ट हो तो निर्धन (२) मंगल से राजा (३) बुध से दृष्ट हो तो जुड़वे बच्चों का पिता या माता (४) वृहस्पति से दृष्ट हो तो राजा (५) शुक्र से दृष्ट हो तो वस्त्र से आजीविका कमाने वाला (६) शनि से हो तो विकृत अंग वाला । ॥९॥ (ix) यदि जन्म के समय चन्द्रमा धनु में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो तो विविध ग्रहों की दृष्टि के अनुसार निम्नलिखित फल होता है। (१) सू० से दृष्ट हो तो दम्भ युक्त (२) मंगल से धूर्त (३) ब० से हो तो बहुत से आदमियों का स्वामी (४) वृहस्पति से दृष्ट
अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४१ हो तो राजा या बहुत से आदमियों पर हुकूमत करने वाला (५) शुक्र से दृष्ट हो तो बहुत से आदमियों को आश्रय देने वाला और (६) शनि से दृष्ट हो तो शठ हो । (x) यदि जन्म के समय चन्द्रमा मकर में हो और चन्द्रमा किसी ग्रह से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है। (१) सू० से दरिद्र (२) मं० से भूप (३) बु० से नरेश (४) बृ० से भूपति (५) शु० से बुद्धिमान् या विद्वान् और (६) शनि से धनी होता है । ॥१०॥ (xi) यदि चन्द्रमा कुम्भ राशि में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो तो विविध ग्रहों से दृष्ट होने का निम्नलिखित फल हैं। (१) सू० से लोकमान्य (२) मं० से अन्य व्यक्तियों की स्त्री में रत (३) बुध से भूमि का स्वामी (४) बृ० से नरेन्द्र (५) शु० से वेश्याओं का प्यारा (६) श० से राजाओं में श्रेष्ठ । (xii) चन्द्रमा के मीन में होने से और किसी ग्रह से दृष्ट होने से निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से दुष्ट कर्म करने वाला (२) मं० से पापी (३) बु० से बुद्धिमान् (४) बृ० से राजा (५) शु० से विद्वान् (६) श० से केवल दोषों पर दृष्टि रखने वाला । ॥११॥ चन्द्रमा के विभिन्न नवांशों में होने का और उस पर विविध ग्रहों की दृष्टि का फल आरक्षको वधरुचिः कुशलश्च युद्धे भूपोऽर्थवान्कलहकृत्क्षितिजांशसंस्थे । मूर्खोऽन्यदारनिरतः सुकविः सितांशे सत्काव्यकृत्सुखपरोऽन्यकलत्रगश्च ॥१२॥ बौधे हि रङ्गचरचोरकवीन्द्रमन्त्र- गेयज्ञशिल्पनिपुणः शशिनि स्थितेऽंशे ।
३४२ फलदीपिका स्वांशेऽल्पगात्रधनलुब्धतपस्विमुख्यः स्त्रीप्रेष्यकृत्यनिरतश्च निरीक्ष्यमाणे ॥१३॥ सक्रोधो नरपतिसंमतो निधींशः सिंहांशे प्रभुरसुतोऽर्तिहिंस्रकर्मा । जीवांशे प्रथितबलो रणोपदेष्टा हास्यज्ञः सचिवनिकामवृद्धशीलः ॥१४॥ अल्पापत्यो दुःखितः सत्यपि स्वे मानासक्तः कर्मणि स्वेऽनुरक्तः । दुष्टस्त्रीष्टः कोपनश्चार्किभागे चन्द्रे भानौ तद्वदिन्द्रादिदृष्टे ॥१५॥ (i) यदि जन्म के समय चन्द्रमा मंगल के नवांश में हो (मेष या वृश्चिक नवांश) और सूर्य आदि किसी ग्रह से देखा जाता हो तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सूर्य से रक्षा करने वाला (२) मं० से वध में रुचि रखने वाला (३) बु० से युद्ध में कुशल (४) बृ० से राजा (५) शु० से धनवान् (६) श० से कलह करने वाला । (ii) यदि चन्द्रमा वृषभ या तुला नवांश में हो और किन्हीं ग्रहों से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से मूर्ख (२) मं० से दूसरे की स्त्रियों में रत (३) बु० से उत्तम कवि (४)
अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४३ पर काम करने वाला अर्थात् नाटक-सिनेमा आदि के कार्यों से सम्बन्धित (२) मं० से चोर (३) बु० से कवि (४) बृ० से मंत्री (५) शु० से गान-विद्या जानने वाला (६) श० से शिल्प निपुण । (iv) यदि चन्द्रमा कर्क नवांश में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो तो निम्नलिखित फल होता है । (१) सू० से छोटे शरीर वाला (२) मं० से लोभी (३) बु० से तपस्वी (४) बृ० से मुख्य अर्थात् श्रेष्ठ पद को प्राप्त (५) शु० से किसी स्त्री की मातहती में काम करने वाला (६) श० से अपने कार्य में लगा हुआ । ॥१३॥ (v) यदि चन्द्रमा सिंह नवांश में हो तो विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल यह है । (१) सू० से क्रोधी (२) मं० से राजा का कृपापात्र (३) बु० से खज़ाने का स्वामी अर्थात् धनी (४) बृ० से उच्चपदाधिकारी (५) शु० से पुत्रहीन (६) श० से क्रूर कर्म करने वाला हिंसक । (vi) यदि चन्द्रमा धनु या मीन नवांश में हो तो विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल निम्नलिखित होता है (१) सू० से जिसके बल की बहुत ख्याति हो (२) रणोपदेष्टा अर्थात् रण के लिये या सैनिकों को आदेश देने वाला (३) बु० से हास्य रस कुशल (४) बृ० से मंत्री (५) शु० से कामवासना रहित (६) श० से वृद्धों की तरह स्वभाव वाला । ॥१४॥ (vii) यदि चन्द्रमा मकर या कुंभ नवांश में हो तो विविध ग्रहों से दृष्ट होने का निम्नलिखित फल होता है (१) सू० से थोड़ी सन्तान (२) मं० से दुःखी (३) बु० से अभिमानी (क) बृ० से अपने कर्म में अनुरक्त (५) शु० से दुष्ट स्त्री का प्यारा (६) श० से क्रोधी । नोट—जैसे चन्द्रमा के विविध नवांशों में होने से और विविध
३४४ फलदीपिका ग्रहों के दृष्ट होने से उपर्युक्त फल बताया गया है वैसा ही फल तब भी समझना चाहिये जब सूर्य किसी नवांश में हो और किसी ग्रह से दृष्ट हो । उदाहरण के लिये सूर्य धनु नवांश में हो और चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वही फल समझिये जो चन्द्रमा के धनु नवांश में होकर सूर्य से दृष्ट होने पर होता है। या दूसरा उदाहरण लीजिये चन्द्रमा के तुला नवांश में होकर शनि से दृष्ट होने का फल बताया गया हैं वही सूर्य के तुला नवांश में होकर शनि दृष्ट होने का होगा। ।।१५।। सूर्यादितोऽत्रांशफलं प्रदिष्टं ज्ञेयं नवांशस्य फलं तदेव । राशीक्षणे यत्फलमुक्तमिन्दो- स्तद्द्वादशांशस्य फलं हि वाच्यम् ।।१६।। ऊपर श्लोक १२ से १५ तक जो फल बताया गया है वह चन्द्रमा के विविध नवांशों में स्थित होने का और विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल है। और श्लोक ६ से ११ तक जो फलादेश बताया गया है वह चन्द्रमा के विविध राशि में स्थित सोकर विविध ग्रहों से दृष्ट होने का फल है। अब एक नई बात कहते हैं। मान लीजिये चन्द्रमा मेष राशि में है और बृहस्पति से दृष्ट है । इसका जो फल है वह तब भी होगा जब चन्द्रमा मेष द्वादशांश में हो और बृहस्पति से दृष्ट हो । अर्थात् राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का जो फल वही द्वादशांश में स्थित होकर दृष्ट होने का फल होता है। इस कारण चन्द्रमा किस द्वादशांश में है और किस ग्रह से दृष्ट है यह देख कर इलोक ६ से ११ के आधार पर चन्द्र द्वादशांश का फल भी कहना चाहिये । ।।१६।।
अठारहवां अध्याय : द्विग्रहयोग ३४५ वर्गोत्तमस्वपरगेषु शुभं यदुक्तं तत्पुष्टमध्यलघुताऽशुभमुत्क्रमेण । वीर्यान्वितोंऽशकपतिर्निरुणद्धि पूर्वं राशीक्षणस्य फलमंशफलं ददाति ॥१७॥ यदि चन्द्रमा वर्गोत्तम में हो तो ऊपर जो शुभ फल बताया गया है वह अधिक मात्रा में होगा। यदि अपने नवांश में हो तो वर्गोत्तम की अपेक्षा शुभ फल कुछ कम होगा और यदि अन्य नवांश में हो तो शुभ फल और भी थोड़ा होगा। और यदि कोई अशुभ फल बताया गया है और चन्द्रमा वर्गोत्तम में है तो वर्गोत्तम में होने से अशुभ फल कम होगा। स्व नवांश में हो तो अशुभ फल साधारण होगा और शत्रु नवांश में है तो अशुभ फल बहुत अधिक होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्गोत्तम में होना शुभता को बढ़ाता है, अशुभता को कम करता है और शत्रु नवांश में होना शुभता को कम करता है अशुभता को बढ़ाता है। अब एक दूसरी बात और कहते हैं। चन्द्रमा के दो फल बताये हैं (१) राशि में स्थित होकर दृष्ट होने का फल (२) नवांश में स्थित होकर दृष्ट होने का फल। अब यह कहते हैं कि यदि चन्द्रमा जिस नवांश में है उस नवांश का स्वामी बलवान् है तो नवांश का फल ही विशेष रूप से फलित होगा। राशि का फल उतना नहीं होगा अर्थात् नवांश के स्वामी के बली होने से नवांश को अधिक महत्त्व देना चाहिये। ॥१७॥
उन्नीसवाँ अध्याय दशाफल भक्त्या येन नवग्रहा बहुविधैराराधितास्ते चिरं सन्तुष्टाः फलबोधहेतुमदिशन्सानुग्रहं निर्णयम् । ख्यातां तेन पराशरेण कथितां संगृह्य होरागमात् सारं भूरिपरीक्षयातिफलितां वक्ष्ये महाख्यां दशाम् ॥१॥ जिन पराशर मुनि ने नव-ग्रहों की बहुत प्रकार से आराधना की और जिनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर नव-ग्रहों ने उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान किया कि किस ग्रह की कैसी दशा जाती है उन पराशर के वाक्यों के फलादेश सम्बन्धी सिद्धान्तों की बारंबार परीक्षा कर और उनकी सत्यता का अनुभव कर मैं मन्त्रेश्वर महादशा के विषय में, पराशर ने जो कुछ कहा है उसका सार बतलाता हूँ । ॥१॥ अग्न्यादितारपतयो रविचन्द्रभौम- सर्पामिरेड्यशनिचन्द्रजकेतुशुक्राः । तेने नटः सनिजया चतुधान्यसौम्य- स्थाने नखा निगदिताः शरदस्तु तेषाम् ॥२॥ किस नक्षत्र में जन्म होने से कितने वर्ष की दशा होती है और बाद में किस ग्रह की कितने वर्ष की दशा आती है यह नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा ।
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३४७
| नक्षत्र | नक्षत्र | नक्षत्र | ग्रह | दशावर्ष |
|---|---|---|---|---|
| कृत्तिका | उ० फा० | उ० षा० | सूर्य | ६ |
| रोहिणी | हस्त | श्रवण | चन्द्र | १० |
| मृगशिर् | चित्रा | धनिष्ठा | मंगल | ७ |
| आर्द्रा | स्वाती | शतभिषा | राहु | १८ |
| पुनर्वसु | विशाखा | पू० भा० | बृहस्पति | १६ |
| पुष्य | अनुराधा | उ० भा० | शनि | १९ |
| आश्लेषा | ज्येष्ठा | रेवती | बुध | १७ |
| मघा | मूल | अश्विनी | केतु | ७ |
| पू० फा० | पू० षा० | भरणी | शुक्र | २० |
३४८ फलदीपिका
ऋक्षस्य गम्या घटिका दशाब्द- निघ्ना नताप्ता स्वदशाब्दसंख्या । रूपैर्नगैः संगुणयेन्नतेन हृतास्तु मासा दिवसाः क्रमेण ॥३॥
जन्म के समय किसी ग्रह की कितनी दशा भोग्य थी यह निकालने का प्रकार बताते हैं । यह देखिये कि जन्म के समय चन्द्रमा किस नक्षत्र में है और जन्म के बाद कितने घड़ी तक उस नक्षत्र में और रहेगा । जितनी घड़ी तक और रहेगा उन घड़ियों को महादशा के मान से गुणा कीजिये और ६० से भाग देकर यह निकाल लीजिये कि भोग्य वर्ष कितने आये । इसको एक उदाहरण से स्पष्ट किया जाता हैं । मान लीजिये जन्म के समय पुनर्वसु नक्षत्र के बीस घड़ी शेष थे । श्लोक २ में बताया गया है कि पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म होने से बृहस्पति की महादशा में जन्म होता है इस कारण बृहस्पति की दशा में जन्म हुआ । बृहस्पति की दशा कितनी शेष है ?
२० × १६ / ६० = १६ / ३ = ५ वर्ष ४ महीने
मन्त्रेश्वर महाराज के कथन में और अन्य ज्योतिष के ग्रन्थों में यह अन्तर है कि मन्त्रेश्वर महाराज के कथनानुसार सदैव ६० से भाग देना चाहिये किन्तु अन्य ग्रंथों के अनुसार नक्षत्र का जितना पूरा मान हो उससे भाग देना चाहिये । देखिये 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' दसवाँ प्रकरण । इसे नीचे समझाते हैं ।
मंत्रेश्वर महाराज के बताये हुए प्रकार में और भारतीय ज्योतिष की भुक्त भोग्य महादशा निकालने के प्रकार में थोड़ा अन्तर है ।
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३४९ दोनों पद्धतियों में अन्तर निम्नलिखित है:— (i) प्रचलित पद्धति-नक्षत्र के जितने घड़ी पल बीत चुके और जितने घड़ी पल बाकी हैं—दोनों को जोड़ कर—नक्षत्र की कुल घड़ियां निकालते हैं। इसे कहिये 'क' जितने घड़ी पल नक्षत्र के बाकी हैं इन्हें कहिये 'ख'। अब मान लीजिये बृहस्पति की दशा में जन्म है तो भोग्य दशा कितनी हुई ? ∵ यदि 'क' में १६ वर्ष ∴ तो १ में १६/क वर्ष ∴ 'ख' में १६/क × ख/१ वर्ष अब भाग देकर जो वर्ष आवे—वे वर्ष, मास, दिन लिख लीजिये (ii) मंत्रेश्वर के मत से १६/६० × ख/१ वर्ष अन्तर यह हुआ कि इसमें—सम्पूर्ण नक्षत्र मान नहीं निकालते । 'क' को सदैव ६० घड़ी मानते हैं। केवल 'ख' निकालकर उसी पर गणित कर भोग्य दशा निकालते हैं। रविस्फुटं तज्जनने यदासीत् तथा विधश्चेत्प्रतिवर्षमर्कः । आवृत्तयः सन्ति दशाब्दकानां भागक्रमात्तद्दिवसाः प्रकल्प्याः ॥४॥ इस श्लोक में यह बताते हैं कि महादशा में किस प्रकार का वर्ष लेना है। ३६० दिन का चांद्र वर्ष या नक्षत्रवर्ष या सौर वर्ष। दक्षिण
३५० फलदीपिका भारत में कई स्थलों में, विशेष कर केरल में, ३६० दिन का चांद्र वर्ष लेते हैं किन्तु उपर्युक्त श्लोक के अनुसार जन्म के समय सूर्य जिस राशि, अंश, कला, विकला पर था उसी राशि, अंश कला, विकला पर जब लौट कर आवे तब एक वर्ष मानना और इसी वर्ष मान से महादशा निकालना। इसी सौर वर्ष का बारहवाँ भाग मास और इस मास का तीसवाँ भाग दिन समझना चाहिये । दशाफल भानुः करोति कलहं क्षितिपालकोप- माकस्मिकं स्वजनरोगपरिभ्रमं च । अन्योन्यवैरमतिदुःसहचित्तकोपं गुप्त्यर्थधान्यसुतदारकृशानुपीड़ाम् ॥५॥ क्रौर्याध्वभूपैः कलहैर्धनार्त्तिं वनाद्रिसंचारमतिप्रसिद्धिम् । करोति सुस्थो विजयं दिनेश- स्तैक्ष्ण्यं सदोद्योगरतिं सुखं च ॥६॥ मनःप्रसादं प्रकरोति चन्द्रः सर्वार्थसिद्धिं सुखभोजनं च । स्त्रीपुत्रभूषाम्बररत्नसिद्धिं गोक्षेत्रलाभं द्विजपूजनं च ॥७॥ बलेन सर्वं शशिनस्तु वाच्यं पूर्वे दशाहे फलमत्र मध्यम् । मध्ये दशाहे परिपूर्णवीर्यं तृतीयभागेऽल्पफलं क्रमेण ॥८॥
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५१ भौमस्य स्वदशाफलानि हुतभुग्भूपाहवाद्यैर्धनं भैषज्यानृतवञ्चनैश्च विविधैः क्रौर्यैर्धनस्यागमः । पित्तासृग्ज्वरबाधितश्च सततं नीचाङ्गनासेवनं विद्वेषः सुतदारबन्धुगुरुभिः कष्टोऽन्यभाग्ये रतः ॥९॥ सौम्यः करोति सुहृदागममात्मसौख्यं विद्वत्प्रशंसितयशश्च गुरुप्रसादम् । प्रागल्भ्यमुक्तिविषयेऽपि परोपकारं जायात्मजादिसुहृदां कुशलं महत्त्वम् ॥१०॥ धर्मक्रियाप्तिममरेन्द्रगुरुर्विधत्ते संतानसिद्धिमवनीपतिपूजनं च । श्लाघ्यत्वमुन्नतजनेषु गजाश्वयान- प्राप्तिं वधूसुतसुहृद्युतिमिष्टसिद्धिम् ॥११॥ क्रीडासुखोपकरणानि सुवाहनाप्तिं गोरत्नभूषणनिधिप्रमदाप्रमोदम् । ज्ञानक्रियां सलिलयानमुपैति शौक्र्यां कल्याणकर्मबहुमानमिलाधिनाथात् ॥१२॥ पाकेऽर्कजस्य निजदारसुतातिरोगान्- वातोत्तरान्कृषिविनाशमसत्प्रलापम् । कुस्त्रीरतिं परिजनैर्वियुतिं प्रवास- माकस्मिकं स्वजनभूमिसुखार्थनाशम् ॥१३॥ कुर्यादहिः क्षितिपचोरविषाग्निशस्त्र- भीतिं सुतार्तिमतिविभ्रमबन्धुनाशम् ।
३५२ फलदीपिका नीचावमाननमतिक्रमतोऽपवादं स्थानच्युतिं पदहृतिं कृतकार्यहानिम् ॥१४॥ विधुंतुदे शुभान्विते प्रशस्तभावसंयुते दशा शुभप्रदा तदा महीपतुल्यभूतिदा । अभीष्टकार्यसिद्धयो गृहे सुखस्थितिर्भवे- दचञ्चलार्थसंचयाः क्षितौ प्रसिद्धकीर्तयः ॥१५॥ पाथोनमीनालिगतस्य राहो- र्दशाविपाके महितं च सौख्यम् । देशाधिपत्यं नरवाहनाप्ति- र्दशावसाने सकलस्य नाशः ॥१६॥ केतोर्दशायामरिचोरभूपैः पीडा च शस्त्रक्षतमुष्णरोगः । मिथ्यापवादः कुलदूषितत्वं वह्नेर्भयं प्रोषणमात्मदेशात् ॥१७॥ (i) (क) इस श्लोक में सूर्य की दशा का फल बताते हैं । यहाँ सूर्य का खराब फल बताया गया है । इससे अनुमान होता है कि सूर्य अनिष्ट स्थान का स्वामी हो, अनिष्ट स्थान में पड़ा हो तब यह फल घटित होगा । सूर्य अपनी दशा में कलह कराता है । अकस्मात् राजा का कोप होता है । कुटुम्ब में रोग हो और परिभ्रमण करावे । परस्पर—आपस में बैर हो, चित्त में दुःसह कोप, और गुप्त धन तथा
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५३
अन्न को अग्नि से भय हो तथा पुत्र और स्त्री को भी कष्ट हो । ॥ ५ ॥ (ख) यदि सूर्य उत्तम स्थान में हो तो क्रूरता से, सफ़र (यात्रा) से, राजाओं द्वारा एवम् कलह से धन-प्राप्ति कराता है । मनुष्य वनों में और पहाड़ों में घूमता है, अति प्रसिद्धि प्राप्त हो, जातक सदैव उद्योगशील हो । उसके स्वभाव और कार्य में तीक्ष्णता हो और विजय और सुख प्राप्त हो । ॥ ६ ॥ (ii) (क) चन्द्रमा की महादशा में मन प्रसन्न रहता है । सब प्रकार की कार्य सिद्धि, धन सिद्धि होती है । सुख पूर्वक भोजन प्राप्त होता है । स्त्री, पुत्र आभूषण, वस्त्र, रत्न, गौ और कृषि की भूमि का लाभ हो । जातक ब्राह्मणों का पूजन (सम्मान) करे । ॥ ७ ॥ (ख) उपर्युक्त फल पूर्ण रूप से तब घटित होगा जब चन्द्रमा पूर्ण बली हो । शुक्ल पक्ष की प्रतिपद् से दशमी तक—इन दस दिनों में चन्द्रमा मध्यम बली होता है इस कारण चन्द्रमा के इन दस दिनों में मध्यम फल होगा। बीच के दस दिन में अर्थात शुक्ल पक्ष की एका- दशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा पूर्ण बली होता है। इस कारण ऐसा चन्द्रमा पूर्ण शुभ फल देगा और अन्तिम दस दिन में— कृष्ण पक्ष की षष्ठी से अमावस्या तक चन्द्रमा क्रमशः निर्बल होता जाता है । इस कारण ऐसा चन्द्रमा थोड़ा शुभ फल देता है । एक अन्य मत से ५ कला तक क्षीण बली, ६ से १० कला तक मध्यम बली, १० से १५ कला तक पूर्ण बली । ॥ ८ ॥ (iii) (क) यदि मंगल की दशा हो तो अग्नि, राजा, युद्ध आदि से धन प्राप्त होता है। जातक को झूठ बोलने से, धोखा देने से, औषधि से तथा विविध प्रकार के क्रूर कर्मों से भी धन लाभ होता है ।
३५४ फलदीपिका मंगल की महादशा के समय पित्त-प्रकोप, रक्त-प्रकोप, ज्वर, आदि की पीड़ा होती है । वह नीच स्त्री का सेवन करेगा । अपने पुत्र, स्त्री, बन्धु और गुरुओं से विद्वेष होगा और वह दूसरों के भाग्य में लगा हुआ रहेगा। अर्थात् उसके उद्योग से अन्य लोगों का भाग्योदय होगा । ॥ ९ ॥ (iv) जब बुध की महादशा होती है तब मित्रों से समागम होता है । स्वयं को सुख प्राप्त होता है, विद्वान् लोग प्रशंसा करते हैं । यश प्राप्त होता है और गुरुओं की कृपा होती है । मनुष्य की वाणी में प्रगल्भता(अपने आशय को शक्तिपूर्ण शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता) होती है । बुध की महादशा में मनुष्य परोपकार करता है और उसको स्वयं की स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी हर्ष तथा महत्व प्राप्त होता है । ॥ १० ॥ (v) बृहस्पति की दशा में मनुष्य धार्मिक कार्य करता है, उसे संतान प्राप्ति या संतान संबंधी हर्ष प्राप्त होता है। राजा उस मनुष्य की प्रतिष्ठा करे अर्थात् उसका सम्मान करे । अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी उसकी प्रशंसा करें; हाथी, घोड़े तथा सवारी की प्राप्ति हो । हृदय की आकांक्षाएँ पूर्ण हों । अपनी स्त्री, पुत्र, मित्रों से समागम और सौहार्द हो ॥ ११ ॥ (vi) शुक्र की महादशा में जातक को क्रीड़ा और सुख के साधन, उत्तम सवारी, गौ, रत्न, भूषण, निधि (द्रव्य) स्त्रियों से आनन्द, ज्ञान क्रिया (जिन बातों से ज्ञान वृद्धि हो), जल यात्रा राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त हों । शुक्र की महादशा में घर में शुभ कार्य होते हैं । (vii) शनि की महादशा में जातक की स्त्री या पुत्र को रोग हो, स्वयं को भी वात आदि की पीड़ा हो, खेती नष्ट हो-दुष्ट वाणी