पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
१४८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व संक्षेप विरद उच्चार कीन । क्यौं सकौं जंपि मो बुद्धि छीन ॥ सुनि राइ दान संज्यौ अपार । है गै सु वस्त्र द्रव्या न पार ॥ छं० ॥ ७१२ ॥ सब सहर नारि श्रृंगार कीन । अप अप्प झुंड मिलि चलि नवीन ॥ थपि कनक थार भरि द्रव्य दूब । पट कूल जरफ जर कसी ऊब ॥ छं० ॥ ७१३ ॥ अछ्छित अनूप रोचन सुरंग । मृदु कमल हास लोइन कुरंग ॥ इक जात मद्धि इक फिरत गेह । पचिराइ परस पर बढत नेह ॥ छं० ॥ ७१४ ॥ दरबार भीर बरनी न जाइ । सुगंध वास नासा अघाइ ॥ बिगसंत बदन छत्तीस बंस । जदुनाथ जन्म जनु जदुन वंस ॥ छं० ॥ ७१५ ॥ रु० ॥ ३६३ ॥ हरें । स्तून । श्चत्र । दिलिय । दिल्लिय । मंडे । बूंदीवाली में=चालीस वर्ष तिन मांस साज । चालीस । पुहवि । हरे । भूम । संप । भूम । वर्णीय । वरनीय । अष्ट बल । लेइ । व्यांहि । हुंनग । ढुंग । थैपि । चाहि । विश्र्द्र । उचार । सकौ । जपि । मै। । सुंनि । राय । दांन । हय । गाय । द्रव्यान । च्चय्राम । श्रंगार । झंड । नवान । कुंल । कल । उब्ब । अक्षित । रौचन । लोइन । कुरंग । जाय । मधि । येह । नैह । जाय । सुगंध । नाशा । अघाय । विगसत । छत्रीस । यदुनाथ । यदुन । जैसे कवि चंद रूपक ३५५ और ३५६ में अपनी प्राचीन गूढ भाषा के गूढार्थ में पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् वर्णन कर आया है; वैसे ही यहां भी वह इन रूपक ३६२ और ३६३ में उन की जन्मपत्री तथा उस के ग्रहों का फलादेश वर्णन करता है । इन दोनों रूपकों के पाठ जहां तक हमारे पास की पुस्तकों से शुद्ध सके वहां तक हमने शोध दिये हैं; कि उन के इतने ही शुद्धने पर जो कई एक शंका अब तक लोग करते थे वह दूर हो गई । और जो इसी तरह और भी कुछ प्राचीन पुस्तकें मिल जावैं और उन से यह रूपक फिर शोध दिये जावैं तो आशा है कि इन रूपकों में लिखी ज्योतिष शास्त्र संबन्धी सब बात मिल जावैं और विद्वानों की जो २ शंका अब भी बाकी रहती हैं वह भी निवारण हो जांय । इस के अतिरिक्त हमारे पाठक यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस रासे जैसी भ्रष्ट लिखित प्राचीन पुस्तकों में अथवा वैसे ही कोई २ बड़े प्रतापी मनुष्यों की जन्मपत्री अथवा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस का कुछ अन्वेषण किया जावे ऐसा कुछ विषय हम को वर्त्तमान समय में कहीं लिखा हुआ प्राप्त होता है उस को यथायोग्य रीति से शोध लेना कैसा कठिन है । उस में भी फिर चंद की जैसी गूढार्थ की कठिनता और ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तियों के मतान्तर पर दृष्टि दियी जावे तो प्रत्येक सज्जन मनुष्य सुख पूर्वक कह सकता है कि यह कार्य बहुत ही कठिन है और जो कदाचित् ऐसी कठिनता का कुछ पता लगा सकें तो हमारे स्वदेशी जगत विख्यात ज्योतिष शास्त्राचार्य पंडित वर श्री बापूदेवजी शास्त्री अथवा उन के शिष्य वर्ग में से भी कोई लगा सक्ते हैं; किन्तु अन्य के वश का यह कार्य नहीं है । इस जन्मपत्री को शोधने के लिये हमने बड़ा परिश्रम कर रक्खा है अर्थात् जितने पाठान्तर रासे की भिन्न २ पुस्तकों में से मिलते जाते हैं और जितनी भिन्न २ प्रकार की पृथ्वीराजजी की जन्मपत्रियें भरतखंड में से मिलती हैं वह भी एकत्र किये जाते हैं और ब्रह्मगुप्त का रचित ज्योतिष शास्त्र का पुस्तक भी प्राप्त करने का उद्योग कर रहे हैं, कि
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[ आदि पर्व ] | पृथ्वीराजरासो । | १४६ जिस का चंद का आश्रय करना उसकी शैली से अनुमान होता है। इस प्रकार से शोध होने पर हम इस जन्मपत्री के विषय में जिन विद्वान के गणित के अनुसार जो बात निश्चय होगी वह प्रकाश करेंगे। किन्तु अभी हम कुछ उन शंकाओं के विषय में भी कहते हैं कि जो इस विषय में महामहोपाध्याय कविराज श्री श्यामलदासजी ने कवि का सरल और स्पष्ट अर्थ न समझ कर केवल प्रतिदून-अनुमान-जन्यभ्रम के वश हो अपने खंडन-ग्रंथ में कियी हैं:- १ प्रथम कविराजजी ने पृथ्वीराजजी के जन्म संवत् के प्रकाश करने वाले रूपक ३५५ के साथ का रूपक ३५६ जैसे अपने खंडन-ग्रंथ में छोड़ दिया है वैसे ही यहां भी उन्होंने रूपक ३६२ को छोड़ कर केवल रूपक ३६३ के आधार पर जन्मपत्री के संबन्धित दोष दिये हैं। इन दोनों स्थलों को हमारे विद्वान पाठक विचार कर समझ सक्ते हैं कि रूपक ३५६ और ३६२ को छोड़ देना उचित था कि नहीं और उन का रूपक ३५५ और ३६३ के साथ पूर्ण संबन्ध है कि नहीं। यदि पूर्ण संबन्ध है तो निर्णय करने के समय उन का त्याग देना किसी वास्तविक पुरातत्ववेत्ता के लिये कैसा अनुचित कर्म है ॥ २ दूसरे जो कुछ दोष इस विषय में दिये गये हैं वह मालूम होते हैं कि किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही दिये गये हैं। किन्तु मैं आशा करता हूं कि डाक्टर हार्नली साहब कि जिनों ने अपने हाथ से रासे के कुछ भाग को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि देकर शोधा है वे भले प्रकार साक्षी दे सक्ते हैं कि इस ग्रंथ के पाठान्तर, अपपाठ, विशेष पाठ और न्यून पाठ आदिक की क्या दशा है और क्या किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही किसी बात का निर्णय होना उचित है ॥ ३ तीसरे यदि रूपक ३६२ न छोड़ दिया गया होता और पुरातत्ववेत्ताओं के निर्णय करने की रीति से ध्यान दिया गया होता तो कविराजजी अपनी कितनीक शंकाओं के समाधान स्वयम् इन रूपकों और भिन्न २ पाठान्तरों से जान सक्ते थे जैसे कि:- (क) रूपक ३६२ से पृथ्वीराजजी के जन्म की दूज तिथि ज्ञात होती है। यदि तिथि की संख्या का शब्द अशुद्ध भी हो तो भी हम कवि के कहे चित्रा नक्षत्र से स्पष्ट अनुमान कर सक्ते हैं कि या तो यह दूज कवि ने पड़वा उपरान्त की ग्रहण कियी है अथवा किसी और तिथी की संख्या वहां भ्रष्ट हो गई है। हम ज्योतिष शास्त्र तो नहीं जानते हैं किन्तु हम लोग पंचद्रावड़ ब्राह्मणों में अभी तक प्राचीन प्रणाली चली आती है कि यज्ञोपवीत होने पर सात वर्ष के बालक को भी पितादि वेदाङ्गों के कुक धुवे अर्थात् गुरु सिखाये कहते हैं उन के अनुसार हम यह कह सक्ते हैं कि हमारे आर्य मासों के नाम नक्षत्रों पर से पड़े हैं और प्रत्येक महिने का नक्षत्र शुदी १४ किंवा पूनम अथवा वदी प्रतिपदा के दिवस में होता है अतएव इस दूज के स्थान में कोई ऐसी ही तिथि थी कि जो भ्रष्ट हो गई है। देखो कविराजजी ने "वैसाख तृतीय पख कृष्ण लग्न" पाठ लिखा है उस के स्थान में हम को सं० १६४७ । १७९० और १८४५ की पुस्तकों में यह "वैसाख मास पष कृष्ण लग्न वा अग्न" पाठ लिखा मिलता है और वह एक प्रकार से ठीक भी दीखता है क्योंकि रूपक ३६२ में कवि तिथि कह आया है अतएव अब वह यहां शेष मास और पक्ष कहता है। चित्रा नक्षत्र के विषय में कुछ गोलमाल किसी पुस्तक में दृष्टि नहीं आती और वैशाख के विषय में कुछ गड़बड़ सी दीखती है अतएव जो कोई चित्रा से चैत्र मास का होना अनुमान करें तो हमारी सम्मति में तो वह कोई आश्चर्य दायक बात नहीं है ॥
१५० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व (ख) कविराजजी ने कवि के कहे "बारमै सूर सो करन रंग" पर ही विशेष दोष दिया है और उसका बारहवें घर में होना असंभव माना है तथा इतनी ही बात पर दोष देकर अन्य ग्रहों का कुछ शोध नहीं किया है। परंतु जो वे रूपक ३६२ के तीसरे चरण पर कुछ थोड़ी सी भी दृष्टि देते तो उनको मालूम हो जाता कि चंद कवि मेष का सूर्य होना स्वयम् कहता है कि जो संभव भी हैं "दुतिया गुरु मेषह तरनि" इस से यह भी समझ सक्ते थे कि जब मेष का सूर्य बारहवें घर में होना कवि कहता है तब वृष लग्न भी है और "ऊषा प्रकाश इक घरिय रात" से कवि का गूढार्थ भी यह है कि पृथ्वीराजजी का सूर्योदय के पश्चात् जन्म होने से ऊषा एक घड़ी थी अर्थात् ऊषा के एक घड़ी पीछे उनका जन्म हुआ ॥ (ग) कविराजजी के खंडन ग्रंथ में 'गुरू सिद्दु जोग चित्रा नखत्त' पाठ से सिद्दु योग ग्रहण किया है कि जो चित्रा नक्षत्र के साथ वा पास आना असंभव है परंतु थोड़ी सी भी सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते अथवा पुस्तकान्तर में पाठ देखते तो कितनेक पुस्तकों में सिद्धि पाठ जैसे हम को मिल गया वैसे मिल जाता ॥ (घ) कविराजजी ने अपने खंडन ग्रंथ में बड़ी २ सूक्ष्म युक्तियों से सूक्ष्मतर अनुमान किये हैं परंतु एक इस स्थान पर वे बड़ी ही बेतरह चूक गये हैं। उन्हों ने 'गुरु नाम करन सिसु परम हित्त' का गुरु पाठ से धोखा खाकर यह अर्थ किया है कि 'गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा' किंतु यह अर्थ बिलकुल ही असत्य है। यद्यपि इस गुरु पाठ का पुस्तकान्तर में गर पाठ स्पष्ट मिलता है परंतु वह न भी मिले तथापि पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान इस छंद की प्रत्येक तुक की एक दूसरी से संगति मिला कर भले प्रकार जान सक्ते हैं कि कवि "तिथि वारं च नक्षत्रं योगं करण मेवच" के अनुसार यहां यह कहता है कि "गर नामक करण शिशु को परम हितकारी है" न कि यह कि-गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा-हमारे हे सज्जन पाठको! आप सोचो, विचारो, न्याय करो, और सत्य २ कहो कि यह महा अनर्थ करने वाली भूल है कि नहीं और जो हम इतना परिश्रम केवल स्वदेश वत्सलता से उत्थापित हो कर न करते तो हमारे देश की हिन्दी भाषा और ऐतिहासिक विद्याओं की कितनी हानि संभव थी। राजपूताने के कितनेक कवि लोग अपने को हिन्दी भाषा के काव्यों में ऐसा उत्कृष्ट समझते हैं कि मानो अन्यदेशीय उनके आगे कुछ माल ही नहीं है परंतु इस अवसर पर हमको मिस्टर जोन बीम्स साहब Mr. John Beames का यह कहना स्मरण आता है कि "The Pandits of Rajputana even do not understand Chand beyond the general drift of the poem." "राजपूताने के पंडित भी चंद के काव्य को उसके एक साधारण भावार्थ के सिवाय नहीं समझते हैं" ॥ (ङ) कविराजजी के लिखे पाठ में "पंच में थान परिसोम भोम" है और हम को पुस्तकान्तर में "पंच दुग्ग थान परि सोम भोम" पाठ मिला है। क्या इस से जन्म पत्री के ग्रहों में कुछ अंतर नहीं पड़ जाता है? और क्या जब तक कि अनेक प्राचीन पुस्तकों से इन रूपकों का पाठ मिलान कर के शुद्ध न किया जावे तब तक जन्मपत्री को अशुद्ध कह देना मानों सहसा सिद्धान्त कर लेना नहीं है? यदि कोई २ विद्यमान पुरातत्त्ववेत्ता अपने सहसा सिद्धान्त कर लेने को अच्छा समझ लेना अयोग्य नहीं समझेंगे और वे इस प्रचार को एक कलम बंद नहीं कर देंगे तो पुरातत्त्वविद्या को निःसीम हानि पहुंचनी संभव है। यहां कन्या का चंद्रमा और पृथ्वीराजजी का पृथ्विीराज नाम होने के कारण उनकी कन्या राशि का होना स्पष्ट है। और
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ। १५१ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म होने पर क्या २ आश्चर्यदायक बात हुई ॥ कवित्त ॥ भयौ जनम पृथिराज । ढुग्ग पर छरिय सिपर गुर ॥ भयौ भूमि भूचाल । धमकि धम धम्म अरिनि पुर ॥ गठन कोट सें लोट । नीर सरितन बहु वढ्ढिय ॥ भै चक भय भूमिया । चमक चक्रित चित चट्टिय ॥ घुरसान थान पन्न भल परिय । ग्रभ पात भय ग्रभनिय ॥ बेताल बीर विकसे मनह । हुंकारत पच्छ देवनिय ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ रु० ॥ ३६४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी की बाल अवस्था के चरित्रों का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वरष वधै विय बाल । पिथ्य वढ्दै इक मासह ॥ घरी दीघ पल पध्य । मास लखिय त्रप तासद्द ॥ मनिगन कंठला कंठ । महि केहरि नष सोहत ॥ घूघर वारे चिहुर । रुचिर वानी मन मोहत ॥ ज्योतिष शास्त्र के एक अचल धुवे के अनुसार यह अनुमान कर लेने का काम भी चंद ने हमारे ऊपर ही छोड़ दिया है कि कन्या के चंद्रमा के साथ केतु भी है क्योंकि राहु और केतु सदा परस्पर सात में स्थान में रहते हैं ॥ ३६४ पाठान्तर:-जन्म । प्रिथीराज । पृथीराज । प्रथ्यिराज । दुग । डुंग । भूबाल । धंम । कोट । सै । लोट । वहि । वढिय । भैचक्क भय भूमियान । भय चक्रित भूमिया । चमकि । चढिय । घुरसांन । धांन । परीय । यभ । यभ । वैताल । विकसैं । नयन । हुंकारन । दैवनीय ॥ इस रूपक में जो कुछ आश्चर्यदायक बातों के भाव कवि ने कहे हैं वह कोई वास्तविक आश्चर्य नहीं है किन्तु कवि लोग बड़े २ प्रतापी पुरुषों के जन्मादि के वर्णन में अद्भुत रस का प्राश्रय करके प्रायः ऐसा प्रसंग बांधा करते हैं । देखो जैसे यहां "धमकि धम धम्म अरिन पुर" अथवा 'घुरसान थान पल भल परिय" कवि ने कहा है । वैसे ही तबकात नासरी नामक फारसी तवारीख़ में देखो कि महमूद गज़नी जिस रात्रि को उत्पन्न हुआ था उसी समय सिन्धु नदी के किनारे के एक मंदिर का फट जाना उस में लिखा है । उस से केवल इतना ही समझ लेना चाहिये कि महमूद मंदिरों को भ्रष्ट करने और मूर्तियों को तोड़ फोड़ डालने वाला हुआ है अतएव कवि ने उस के जन्म समय भी वैसा ही उस के प्रताप का एक चिन्ह वर्णन किया है । इस रूपक में बीर और अद्भुत रस मिले हुए हैं अंतएव आतेप करने वाले अथवा किसी कोमल हृदय वाले मनुष्य के कान उस के पढ़ते ही खड़े हो जाते हैं, अर्थात्, रस अपना प्रभाव उस को प्रत्यक्ष दिखा देता है ॥ ३६५ पाठान्तर :- बघे । पिथ । बाधे । पल पलघ । पष्य । पष । लष्यीय । लषीय । घष । मनिगनि । कंठला । मधि । केहरि । सौहत । वाले कैंस । वारे केस । केसरि । सुमंडि । सुंमं । दरसन । ज्योति । ज्योति । जरत । रक । किन । हुलसि । परत ॥
· १५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व केसर सु संडि सुभ भाल छवि । दसन जोति हीरा हरत ॥ नहं तखप दुक्क थह छिन रहत । हुलसि हुलसि उठि उठि गिरत ॥ छं० ॥ ७१७ ॥ रू० ॥ ३६५ ॥ दूहा ॥ रज रंजित अंजित नयन । घुंठन डोलत भूसि ॥ लेत बलैया मात ऋषि । भरि कपोल मुख चूंमि ॥ छं० ॥ ७१८ ॥ रू० ॥ ३६६ ॥ पद्धरी ॥ अंगुरिन लग्गि रगि चलत बाल । सर मड्डि उठत गज हंस चाल ॥ मिलि बाल जाल फबि रची केलि । बढि रही दुंद जनु बीज बेलि ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ जनु रमत कमल दल अमल अंग । तप तेज बढ्ढि मुख पिच नग्ग ॥ सब देव तेज देखंत चंग । उद्धार अंग अदभुत प्रसंग ॥ छं० ॥ ७२० ॥ सँग बाल बैठि भोजन करंत । परिवार वस्तु लै हठ धरंत ॥ आदर अदब्ब सघ्धीन देत । बगसीस करत चिय परम हेत ॥ छं० ॥ ७२१ ॥ है हत्थि चढत बढ़त अनंद । मन मौज वैज कवि पढत छंद ॥ जिन हृदय कमल विद्याल चेत । छल छेद भेद तिन बुद्धि लेत ॥ छं० ॥ ७२२ ॥ पाइक्क संग कायक्क केलि । धरि धूप ध्वथं बाहंत खोलि ॥ गचि बग्ग हत्थ फेरत तुरंत । नट नृत्य निपुन धावत कुरंग ॥ छं० ॥ ७२३ ॥ जल केलि करत मिलि सजन संग । अल्लोल कलभ जनु सरति रंग ॥ पकवांन पांन सुगंध पूर । सादक्क सु सोद सुख सुखन जूर ॥ छं० ॥ ७२४ ॥ खेलत अखेट संग श्वानडोर । बग्गुर बधंत खर गोस कोर ॥ सुख घरिय पहर दिन पष मास । सोमेस सूर चित बढत आस ॥ छं० ॥ ७२५ ॥ जिम राम कृष्ण सुष नंद गेह । संभरिय राय तिम दसा देह ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रू० ॥ ३६७ ॥ ३६६ पाठान्तरः-अजांत । घूठन । डौलत । वलइया । मुंख चूंम ॥ ३६७ पाठान्तरः-लाँगि । लगि लगि । लोल । कैलि । अग । तैनि । बढि । पचिगं । पन्त्रि नग । तैज । द्वेषत । उद्दार । अद्भूत । सुरंग । संग । बैठ । करत । वस्तू । वस्त । हठि । अद्वब । सधीन । दीय । हथि । वढत । मोज । वोज । रिदे । सुहेत । विद्यां सु । छल । वेदि । भैदि । छेदिं । बुधि । पाइक । झाइक । कैलि । घोप । धौप । हथ । बाहंत । वग । हथ । नृत्य निपुन्य । तुरंग । फैलि । अलोल । सरणि । सुगंघ । पुर । षैलतं । आखेट । संगि । स्वांन । डोरि । बगुरि ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५३ कवित्त ॥ कै दसरथ गृह राम । (कै)* धाम वसुदेव कृष्ण वर ॥ कै कलि कस्यप कूप । जानि उपज्यौ किरनाकर ॥ कृष्ण गेह कै काम । (कै)* काम अंगज जनु अनुरुध ॥ (कै)* नन्न कस्यप अवतार । किधौं कौमार दृष्य रुध ॥ लपिन बत्तिस वहुतरि कला । बालु बेस पूरन सगुन ॥ क्रीडंत गिलोल्ल जब लाउ कर । (तत्र*) मार जानि चापक सु मन ॥ छं० ॥ ७२७ ॥ रु० ॥ ३६८ ॥ दूहा ॥ छुटत गिलोल्ला हथ्य तैं । परत चोट पयल्ल ॥ कमल नयन जनु कामिनी । करत कटाक्ष क्यल्ल ॥ छं० ॥ ७२८ ॥ रु० ॥ ३६६ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी का गुरु राम से सब प्रकार की विद्या सीखना ॥ दूहा ॥ कोइक दिन गुर राम पैं । पढ़ी सु विद्या अप्प ॥ चवदसु विद्या चतुर वर । लई सीप पट लिप्प ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रु० ॥ ३७० ॥ संघत । पगौस । कैरि । कोरि । धारोय । परक । पष । सोमेस । सुर । चित्त । वष्ठि । षष्ठि । रांम । कष्युं । सुभि । येह । जिम रांम नंद सुप कृष्ण येह । संभरीय । राव । दैह ॥
- यह शब्द पाठ में विशेष हैं । ऐसे उदाहरण इस ग्रंथ की लिखित पुस्तकों में बहुत हैं और वह भी किसी २ में ऊपर से लिखे हुए हैं । इस का कारण मुझे विचार करने से यह मालूम होता है कि किसी कवि ने पढ़ने के समय अर्थ के लगाने की सुगमता के लिये इन संबन्ध के सूचन करने वाले शब्दों को संकेत की भांति लिख लिये होंगे और ऐसी पुस्तक से प्रती करने वाले लेखकों ने उन को पाठ में मिलाकर प्रती कर दियो है । इस मेरे समाधान की पुष्टि में कई एक ऐसे स्थल में मेरे पास की प्राचीन पुस्तकों में बतला सक्ता हूं । अतएव इन को कवि की भूल अथवा Poetical licence नहीं समझना चाहिये ॥ ३६८ पाठान्तरः-कैं । यिह । रांम । धांम । कैं । कश्यप । जांनि । उप्पज्ज्यौ । किरनांकरि । गेह । कांम । कांम । अनिरुद्ध । कश्यप । किधौ । किधौं । कौंमार । ईश्व । लष्यन । लषन । बत्तीस । बहोतरि । वैश । सुगन । जांनि । चांपक । सुंमन ॥ : इस रूपक की पहिली चार तुकों के चरण कई एक पुस्तकों में उलट पलट हैं जैसे कि पहिली तुक के दूसरे चरण के स्थान में तीसरी तुक का दूसरा चरण; दूसरी तुक के स्थान में चौथी तुक; तीसरी के दूसरे में पहिली का दूसरा; और चौथी के स्थान में दूसरो तुक है ॥ ३६६ पाठान्तरः-हुथ । हांथ । तैं । पयल । कांमिनी । कटाछि । कटाक्ष । कयल्ल ॥ ३७० पाठान्तरः-पंचह । पंद्रह । पंच कोइक । पै । पें । सू । चउदह । चंउदै । लइ शीपि षट लिप ॥
१५४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व पद्धरी ॥ लिखि सिष्य कुँच्चर पृथिराज राज । गुरु द्रोन पास सुत धर्म्म ताज ॥ ॐ नमो सिद्धि प्रथमं पठाय । सब भाव भेद अच्छर बताय ॥ छं० ॥ ७३० ॥ दस पंच † दिन्न अध्येन कीन । दस च्यारि सार सब सीष लीन ॥ सीषी सु कला दस अठ च्यारि । तिन नाम कहत कवि अग्ग सारि ॥ छं० ॥ ७३१ ॥ गुरु गीत बाद बाजिच नृत्य । सोचक सु वाच्य संविचार वृत्य ॥ मनि मंच जंच वास्तुक विनोद । नैपथ विलास सुनि तत्त मोद ॥ छं० ॥ ७३२ ॥ साकुन्न कला क्रीडन विसार । चिचन सु जोग कवि चवत चारु ॥ कुसु सेष कला जुत इंद्र जाल । सुचि क्रम विचार आचार लाल ॥ छं० ॥ ७३३ ॥ सौभग प्रयोग सुगंध वस्त्र । पुनरोक्त छंद वेदोक्त घस्त ॥ बानिज्ज विनय भांषित्त देस । आवद्ध जुद्ध निर्जुद्ध सेस ॥ छं० ॥ ७३४ ॥ बरनंत समय हस्ती तुरंग । नारी पुरुष पंषी विचंग ॥ भू भू कटाछ सुलेष सल्य । वृष कल्प प्रण उत्तर विजय ॥ छं० ॥ ७३५ ॥ सुभ सास्त्र कहे गनिकच पठन । लिषतव्य चिच्च कविता वचन ॥ व्याक्रन्न कथा नाटकक छंद । अविधांन दरस अलंकार बंध ॥ छं ॥ ७३६ ॥ धातक सु कर्म्म सुभ अर्थ जानि । सुर सरी कला बहुतारि बषान ॥ छं० ॥ ७३७ ॥ रू० ॥ ३७१ ॥ दूहा ॥ कला बहुत्तर करि कुसल । अति निबद्ध जिय जानि ॥ हेत आदि जानन निपुन । चतुरासीत विग्यान ॥ छं० ॥ ७३८ ॥ रू० ॥ ३७२ ॥ † इस दसपंच शब्द को पंद्रह ही दिन का वाचक नहीं समझना किन्तु कुछ दिन अथवा कुछ समय अथवा थोड़े दिनों का वाचक समझना उचित है क्योंकि रूपक ३७० में स्पष्ट कोइक दिन पाठ आय गया है ॥ ३७१ पाठान्तर :—लिपि । शिष्यि । सिषि । कुंचरं । कुंच्छर प्रिथीराज । पृथीराज । गुरं गुर । द्रोणा । पासि । ध्रम । नमः सिद्धिं । पठाइ । भैद । अष्यर । बताइ । बताई । अध्ययन । अध्यैन । दस पंच छिद्दा अध्येन कीन । सीषि । अठ । नांम । कहित । अंग । सार । गुर । नत्य । सौचक । नृत्य । वास्तुन । विनौद । नैपथ । सुंनि । तत । साकुन । शाकुंन । विस्तार । विचार । सू जोग । कुंस । युत । सोभग । प्रयोग । पुनरुक्ति । वैदोक्त वस्त । बांनिज । भाषित आवध । युद्ध । नियुद्ध । सैस । पुरुष । वचंग । भूं भूं । सुलेष ब्रष । छंद । उत्तर । विजयं । कहै । पठंन । लिषितं व्याचित्र । लिपिव्य । वचन । व्याक्रन । नाटकं । नाटिक । दरसन । अलंकार । शुभ । जांनि । जांण । वषांनि । ३७२ पाठान्तर :—बहुतरि । जांनि । जांनन । विद्धान । विग्यांन ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १५५ अरिल्ल ॥ चतुरासीत विद्यानन जानन । भर मन मन आसंका भाजन ॥ मतिचा बीर सदा मन मोदन। बहुतरे विविध छचीस विनोदन ॥ बृं० ॥ ७३८॥ दरसन श्रवन गीत बर बादी । नृत्य व्रत्य पाठक पुनि आदी ॥ लेषक वित्त बाज वक्त्रवनि । सस्त्र सास्त्र जुद्धाकर तत्वनि ॥ बृं० ॥ ७४० ॥ जुद्ध गनित पंषी गज तुरगा । आषेटक द्रूतन जल उरगा ॥ जंचन मंच मछोछ्व पचन । पुप्फ कला फल कथा सु चिचन ॥ बृं० ॥ ७४१ ॥ करन पदारथ आयुध केली । बलकरि सूचह तत्व पहेली बृं० ७४२॥ रू० ३७६॥ दूहा ॥ कमल वदन रवि तेज कर । लषन संति बत्तीस ॥ कल नित प्रति सीषत कला । आवध धरन छतीस ॥ बृं० ॥ ७४३ ॥ रू० ॥ ३७७ ॥ साटक ॥ विद्या वंस विचार सत्य विनयं, सौच्यं समाधीनता ॥ सन्मानं संस्थान सौष्य विजयं, सौजन्य सौभाग्ययं ॥ संपूर्णं च सरूप रूप प्रसनं, चित्तं सदा चारनं ॥ सांगीतं च सजोग चारु सकलं, विस्तारयंते कन्ना ॥ बृं० ॥ ७४४ ॥ रू० ॥ ३७८॥ दूहा ॥ गुन गरिष्ठ गौ विप्र प्रति । पूजक दान वरीस ॥ सव्व आदि दै निपुन अति । सास्त्रह सत्तावीस ॥ बृं० ॥ ७४५ ॥रू० ॥ ३७८॥ श्लोक ॥ संस्कृतं प्राकृतं चैव । अपभ्रंशः पिशाचिका ॥ मागधी शूरसेनी च । षट् भाषाश्चैव ज्ञायते * ॥ बृं० ॥ ७४६ ॥ रू० ॥ ३८० ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के बत्तीस लक्षणों का वर्णन ॥ श्लोक ॥ विनयीगुरजनज्ञाता । सर्वज्ञः सर्व पालकः ॥ शरीरं शोभतेश्रेष्ठं । द्वात्रिंश तस्य लक्षणम् * ॥ बृं० ॥ ७४७ ॥ रू० ॥ ३८१ ॥ ३७६ पाठान्तर :- चक्र रचिति । विद्यानंन । जांनन । भानन । मोदन । नृत्य २ । चक्रवनि । चक्रवन । शस्त्र । शास्त्र । सासत्र । युद्धा । तत्वन । युद्ध । तुरंगा । आस । पेटक । उरंगा । जञ्चन । महोच्छव । प्पफ्फ । किला । करण । केली । आयुद्ध । पहेली ॥ ३७७ पाठान्तर :- तेज । तेय । लषन । लपन । बतीस । शीषत । सीषति । आयुध आउध । रन ॥ ३७८ पाठान्तर :- सार । सौख्यं । समाधीनता । समाधानता । सनमानं । संनमान । सौजन्य । सूरूप । चारणं संगीतं । संगीत । सयोग । विस्तारयंते ॥ ३७९ पाठान्तरः- विप्र । दांन । सवद । दे । सासत्रह ॥
- इन रूपकों के इन चौथे चरणों में ९ नव अक्षरों को देख कर कुछ आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि संस्कृत भाषा के ग्रंथों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जैसे कि दुर्गापाठ के अध्याय-२ श्लोक १ में "महिषे सुराणामधिपे" ॥ ३८१ पाठान्तर :-संस्कृतं । प्राकृतं । अपभ्रंसं । अपभ्रंसि । पिसाचिका । मांगधी । सूरसेनीं ।
१५६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व काव्यजाति ॥ अरि तर वर तुंगो । कहनार्थे कुहारो ॥ कुल कमल प्रकासो । तेज तप्तो दिनेस ॥ दरसन रस सेवी । कामिनी काम मूर्त्ति ॥ पर वर प्रति पंचं । पालनं पार्थवानां ॥ छं० ॥ ७४८ ॥ रू० ॥ ३८२ ॥ अरिल्ल ॥ सूरिज ज्यौं तप सचु कमोदन । फूलत अंग महा मन मोदन ॥ भूपति भूप प्रतापन भारी । दृढ करि रावन ज्यौं अहंकारी ॥ छं० ॥ ७४९ ॥ रू० ॥ ३८३ ॥ श्लोक ॥ ज्ञानधर्मार्थकामंच । बल शत्रू सिंघासनं ॥ समारंभचित्तेश्चैवा । भिधानं अष्टधा स्मृतं ॥ छं० ॥ ७५० ॥ रू० ॥ ३८४ ॥ दूहा ॥ पाघ वीराजत सीस पर । जरकस जोति निचाय ॥ मनौं मेर के सिषर पर । रह्यौ अछ्प्पति आय ॥ छं० ॥ ७५१ ॥ रू० ॥ ३८५ ॥ ता पर तुररा सुभत अति । कहत सोभ कवि नाथ ॥ मनु सूरिज के सीस पर । धिषन धस्यौ धनु हाथ ॥ छं० ॥ ७५२ ॥ रू० ॥ ३८६ ॥ श्रवन विराजत स्वाति सुत । करत न बनै बषान ॥ मनु कमल पत्र अयज रहै। ओस उडग्गन आन ॥ छं० ॥ ७५३ ॥ रू० ॥ ३८७ ॥ कंठ माल मोतीन की । सोभत सोभ विसाल ॥ मेरु सिषर पारस फिरत । जानि नखिचन मान ॥ छं० ॥ ७५४ ॥ रू० ॥ ३८८ ॥ मिस भौंने सु मयंक मुख । निपट विराजत नूर ॥ मनौं वीर उर काम को । उगे आनि अंकूर ॥ छं० ॥ ७५५ ॥ रू० ॥ ३८६ ॥ भाषां । चैव । ध्यायते । विनयं । जनं । ग्याता । सर्व्वज्ञं । पातकं । शरीरे । सरीरे । सोभ्यते । सोभते । अष्टं । वृत्तिक्षमपि लक्षणै ॥ ३८२ पाठान्तर :-अति । धर तुंगौ । कट्टनार्थे । कुठारौ । प्रकाशौ । तप्तौ । दिनैसः । सैवी । मूर्त्ति । पंच । पार्थवाना ॥ ३८३ पाठान्तर :-सूरिज । सुरज । ज्यो । ज्यौं । शत्रू । फूलति । भूर्प । ह्यौं ॥ ३८४ पाठान्तर :-ध्यानं । सत्रु । सिंघासनं । वत्ते चैव । अभिधानं ॥ ३८५-८६ पाठान्तर :-शीस । ज्योति । कै । शिषर । शिषर । परि । अह्व्यति । अष्टपति । जूरा । सैभै मनुं । मनौ । सूरिज । मनौं सूरज । कै । शीस पर । परि । धषन । विराजित । षषांनं । मनौ । मनौं । अयजु । रहे । औस । पयोफन । पयोकर्ण । आंनि । शोनत्व । शौभ । विशाल । सोभति । मेर । शिषर । पास । जनन । द्विज्जन । मिसि । निषट । मनोँ । कांम । कै । ऊगे । उगै । आंनि । अंकूर ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५७ अरिल्ल ॥ आनन इंदु उदोत सु मानौं । जानन भोज विचषन जानौं ॥ रवि ज्यौं सहुन के तन तापन । कामिनि कौं मकरध्वज मानन ॥ छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८० ॥ अरिल्ल ॥ जा सरनागत मानव वंछै । जा सरनागत दानव डूछै ॥ जा सरनागत देव विचारै । सो प्रिथिराज पृथीपति सारै ॥ छंदं ॥ ७५७ ॥ रु० ॥ ३८१ ॥ दूहा ॥ प्रिथ्विराज पति प्रिथ्विपति । सिर मनि कुन्नी छतीस ॥ नृप सिप पर मित जस तजै। ते गुन वरनि बतीस ॥ छंदं ॥ ७५८ ॥ रु० ॥ ३८२ ॥ तिन सहाय असुरह सुभट । सत सामंत रु सूर ॥ तिन सु कित्ति प्रगटी करन। कछी चंद कवि पूर ॥ छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८३ ॥ कवित्त ॥ चहूआन कै वंस । वीर मानिक पुच दस ॥ ता सु कित्ति कवि चंद । जनम लग्गै जंपत जस ॥ ज्यौं वीत्यौ भारत्थ । आदि अंतच त्यौं जंपौं ॥ वय वानी सु प्रमान । लग्न सगनह गुन थप्पौं ॥ ज्यौं भयौ जनम कवि चंद कौ । भयौ जनम सामंत सब ॥ इक थान मरन जनमच सु इक । चल्लहि कित्ति ससि लग्गि रव ॥ छंदं ॥ ७६० ॥ रु० ॥ ३८४ ॥ ॥ एक दिन रात्रि को चंद की स्त्रीका रस में आकर पृथ्वीराज जी की आदि से अंत तक कीर्त्ति वर्णन करने के लिये चंद को कहना ॥ गाथा ॥ समयं इक निसि चंदं । वाम वृत्त वहि रस पाई ॥ दिद्धी ईस गुनेयं । कित्ती कहो आदि अंताई ॥ छंदं ॥ ७६१ ॥ रु० ॥ ३८५ ॥ ३८० पाठान्तर :-आनंन । इंदु । इंद । उद्दोत । समानौ । मानौ । ज्ञांनन । जातन । भौज । विचख्यन । जांनो । भांन । शत्रुंन । सचुंन । कै । कांमिनी । कुं । मकरधज । मांनन ॥ ३८१ पाठान्तर :-मांनव । इच्छै । दांन । वंछैः । सरनागति । सो । प्रथ्वीराज । पृथ्विपति ॥ ३८२ पाठान्तर :-प्रिथीराज । प्रिथ्वीपति । प्रथ्वीराज पृथ्वी पति । शिर । कुंली । शिप । तजे । तै । कु तीन । छत्तीस ॥ ३८३ पाठान्तर :-आसुरह सुरह । कित ॥ ३८४ पाठान्तर :-चहुआंनारैं । चहुवाना कै । वंश । मांनिक । मानक । स । जन्म । लगे । लगै । ज्यो । वित्यौ । भारथ । ज्यो । जंप्यो । वांनी । प्रमांन । लगन लगनह । मगनं । थप्यो । जन्म । कौ । सामंत । थांन । मरेण । जन्म दिन इक । जनंम । कित्त । शसी । ससो । रिव । रवि ॥ ३८५ पाठान्तर :-यांहू । इस । कहों ॥
१५८ : पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चंद का अपने घर में कथा कहना और उस की स्त्री का उसे सुनते हुए जो स्मरण आवे वह पूछते जाना ॥ दूहा ॥ एक दिवस कवि चंद कथ । कही अपनें भौन ॥ जिम जिम श्रवनत संभरी । तिम पुछि सारंग नैन ॥ छं० ॥ ७६२ ॥ रु० ॥ ३८६ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उस से पूछना कि कौन दानव, मानव, और नृप कीर्त्ति करने के योग्य है ॥ दूहा ॥ कह्यौ. कंत सौं कंति इम । हौँ पूछौं गुन तोहि ॥ को दानव मानव सु को । को नृप कित्तिक होहि ॥ छं० ॥ ७६३ ॥ रु० ॥ ३८७ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को गूढ उपलक्षणों के द्वारा उत्तर दे कहना कि केवल हरि कीर्त्ति करने योग्य है क्योंकि उस की भक्ति के विना मुक्ति नहीं है ॥ कवित्त ॥ पेट काज चढि बंस । परैं फर हरैं अवनि पर ॥ पेट काज रिन भौम । मरै मारैं सु ठुरैं धर ॥ पेट काज बंधि भार । पार पाछारन पारैं ॥ पेट काज तरु तुंग । छिन्न परि घर पर ढारै ॥ दूति पेट काज पापी पुरुष । वधै बह लछ्की चरन ॥ नर वर सुक्रम कछा नच करै ॥ इहै उदर दुब्भर भरन ॥ छं० ॥ ७६४ ॥ रु० ॥ ३८८ ॥ ... इस रूपक से अंत तक कवि इस आदि पर्व का तो उपसंहार और दशम की कथा का प्रसंग अपनी स्त्री के वार्तालाप के द्वारा बड़े गूढार्थ में वर्णन करता है । हम आशा करते हैं कि काव्य के रसिक इस प्रसंग के दोहों और उन के अर्थ के गांभीर्य को अनुभव करके बहुत ही प्रसन्न होंगे ॥ ३८६ पाठान्तर :- सुदिन । वद । कहोय । अपनै । भौन । श्रवनंत । श्रवनन । श्ववनह । पूछीय । सारंग । नेन ॥ ३८७ पाठान्तर :- कंति । सो । सों । सौ । कंत । ईम । हौं । है । पुछ्यौँ । पूछूं । गुंन । तोहि को । दांनव । मांनव कौ । कौं । को नप । कसिं । कहोहि ॥ ३८८ पाठान्तर :- काजि । वंस । वंश । परंयइं फरअकहरैं । परहूं । फरहरहं । पेट । काजि । रन । भोमि । मरे । मारे । मरै । मरैं । मारैं । सुं । ठरे । ठरइं । पेट । काजि । पाहारम । पैटू । काजि । तरु । त्रिंच । तिन । त्रिन । परि । परिय । टारै । इन । इत । काजि । पुरुष । बंधै । बधे । लछी । चर । सुक्रमम् । कह । करहि । इहइ । ईह । भरख ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५६ कवित्त ॥ मेह बिना नहि तेह । नेह बिन गेह चरस रन ॥ पिय बिन तिय न उमंग । अंग श्रृंगार रूप रस ॥ नायक बिन नह सेन । दंत बिन भुक्ति न होई ॥ तेग त्याग तैं रहित । कछै कीरति को लोई ॥ बिन नीर मीन राजन कहूं । छवी बिन सूर तरिन ॥ मन वच क्रम तिम जानि जिय । न है मुक्ति हरि भक्ति बिन ॥ छं० ॥ ७६५ ॥ रु० ॥ ३९९ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि चित्रनेवाले को चित्र कि जिस से तू दुस्तर के पार उतरै-चहुवान की कीर्ति कविने से वह क्या रंजैगा ॥ दूहा ॥ चिचनहारे चिचि तुं । रे चतुरंगौ नाह ॥ का चहुआन सु कित्ति कवि । मन मनुष्य हरि जाह ॥ छं० ॥ ७६६ ॥ रु० ॥ ४०० ॥ कवित्त ॥ तत्त चीन पुत्तरी । पंच बंधी कर नंचै ॥ आसा नदी सपूर । जीय मनोरथ संचै ॥ बहु तरंग तिस्नाह । राग बहु ग्रेह कुरंगी ॥ का चहुआना कित्ति । कंत धीरज तिर भंगी ॥ मन मोह मूढ विस्तारि रह्यौ । चिंता तट घट भंजह्य ॥ उत्तरहि पार दुत्तर कवी । का चहुआना रंजह्य ॥ छं० ॥ ७६७ ॥ रु० ॥ ४०१ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि मैं चहुआन का ऋण उतारता हूं ॥ दूहा ॥ कहे गुपत गुन तैं भले । मो जिय हूय अंदेस ॥ रिन अप्पौ चहुआन कौ । पुब्बह पिथ्थ नरेस ॥ छं० ॥ ७६८ ॥ रु० ॥ ४०२ ॥ ३९९ पाठान्तर :- बिना । नह । तेहु । नेह । यह । गेह । पीड । त्रिय । तीय । श्रृंगार । सैन । दन्त । खिन । भुक्ति । होइ । तैग । त्याग । तै । नन । लोइ । जीवन । नही । सूरं तरिन । सूर तरिज । बच । क्रम । कम । जानि । जीय । सु न । है । नही मुक्ति हरि भक्ति बिनां ॥ ४०० पाठान्तर :- चित्रनहारे । श्रं । चहुंवांन । कवि । मनुछ ॥ ४०१ पाठान्तर :- तत्र । तत । पुतरी । पूतली । बंधा । नच्चै । नच्चै । नंदी । संपूर् । जीव । मनोरथ । वहां । संचै । बहुतं । रंग । तृस्नाह । बहुं । येह । कुरंगी । कां चहुवांना । मौह । मुंढ । यतां । भंजर्दय । उत्तरिहि । उतरहि । हुतर । कट्टी । कां । चहुवांन । रंजईय । रंजरह ॥ ४०२ पाठान्तर :- कहे । तै । तें । भलो । भलैं । मो । रंह । अंदेश । रिण । अप्पो । की । पुब्बइ पंच नरेस । पुब्बह पित्यि नरेस ॥
॥ चंद की स्त्री का कहना कि राजा को ऋण देता है तौ गोविन्द को क्यों नहीं सुमरता ॥ दूहा ॥ चिंचनहारे हेरि चिंत । चिंचन हेरि कविंद ॥ जो रिन अप्पै राज कौ । तौ सुमरै न गुविंद ॥ छं० ॥ ७६९ ॥ रु० ॥ ४०३ ॥ भ्रम जल मन संदान करि । भ्रम जल भेष न फेरि ॥ चित्त न अप्पै चित्त कौं । चिंचनहारे हेरि ॥ छं० ॥ ७७० ॥ रु० ॥ ४०४ ॥ ॥ चंद का उत्तर देना कि मैं कमलासन को देख कर अकुलाया हूं केवल भक्ति विलंब करने वाली है ॥ दूहा ॥ कमलासन देषत थक्यो । भगत विलंबन चार ॥ क्रोध अप्प सब जग ग्रसै । ग्रसंत न लग्गै वार ॥ छं० ॥ ७७१ ॥ रु० ॥ ४०५ ॥ ॥ तथा चंद का कहना कि संसार में जो कुछ और सर्वव्यापी है वह कमलासन ही है उसी की उपमा करके मैं पृथ्वीराज जी की कीर्त्ति वर्णन करता हूं ॥ भुजंगी ॥ वही तत्त चैलोक संसार सारं । वही तारनं सत्त भौ सिंध पारं ॥ जगत्तं अधारं निराधार वोची । वही अव्वदा संपदा नित्य सोची ॥ छं० ॥ ७७२॥ वही भेद संचं गजानंत लोयं । वही पूरनं ब्रह्म संसार भोयं ॥ नवं भक्ति कौ संव ही रूप धारी । भयौ ब्रह्म बुझ्यौ वही सिद्ध तारी ॥ ७७३ ॥ जगत्तं सुरत्तं वही है निनारं । वही वासना वासुदेवं प्रकारं ॥ वही भक्त हथ्थं नच्यौ कप्पिमानं । वही यै वही यै वही यै निधानं ॥ छं० ॥ ७७४ ॥ इकं एक अचिज्ज कीनें गुसांई । चवै चंद जो रंग गोव्यंद पाई ॥ वही की उपम्मा करै कित्ति भासैं । वही सब्ब संसार मज्झे प्रकासैं ॥ छं० ॥ ७७५ ॥ वही अंतरंगी सुरंगौ निनारं । वहै राज राजीव लोचन सारं ॥ छं०॥७७६ ॥ रु०॥४०६ ॥ ४०३-४०४ पाठान्तर :- चिंचनहारे चित्त तूं । कवि चंद । ज्यौ अप्पो । अपैं । को । तौ । समरै । समरि । गोविन्द ॥ ३६८ ॥ मंदा करि । भैष न फैरि । चित्तन अप्पो । अपैं । को । चिंचनहारे ॥ ४०५ पाठान्तर :- दैषत । क्रोध । सप्पै । यहै । लगो । लगै ॥ ४०६ पाठान्तर :- तत्त । तारणं । भव । सिंधु । जगतं । सोही । ऊंही । ऊही । सरदा । सोही । भेद । मंत्र । गंजा मंत । लोयं । पूरन । सोयं । भोयं । नव । भांति । शव । भयौ । जगतं । सुरंतं । हेनि । हैनि । वासता । वास । है वं । वास हेवं । भक्ति हथ्थं । कष्यिमानं । कपिमानं । नधानं । वहीं यै वही यै निधानं निधानं । इकं । अकं । अंकं । अश्चिर्ज । कीनै । कीने । गुंसाइ । गुसाई । जौ । रंगी । गोविद । उपमा । करे । भासै । कही । सकल । मझे । प्रकासै । कहै । लोवंच ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६१ ॥ चंद की स्त्री उसे कहती है कि ब्रह्म रूप ब्रह्म से देख जो उसे देखता है उसे वह दीखता है, नर की कीर्त्ति मत गा क्योंकि उस से और कोई बलवंत नहीं है ॥ दूहा ॥ ब्रह्म देषि ब्रह्मान्तरव । हरि दिषियन दिष्पाइ ॥ बिज्ज छटा अभ्यांन मन । गोपी हरि गो गाहू ॥ छं० ॥ ७७७ ॥ रु० ॥ ४०७ ॥ ब्रह्म ब्रह्म घररात वर । नर जानी न गुविंद ॥ सकल घटं घट हरि रमै । ज्यौं अनेक घट चंद ॥ छं० ॥ ७७८ ॥ रु० ॥ ४०८ ॥ जस अपजस लामिष्ट दोइ । अवगति गति न बुझाइ ॥ गोप ग्वाल वृझै नहीं । गोपन बूझी गाइ ॥ छं० ॥ ७७९ ॥ रु० ॥ ४०६ ॥ कवित्त ॥ कढ़ि मद्धियन बल कित्तौ । एक दट्टं हरि धारिय ॥ कढ़ि वासिग बल कित्तौ । सु पुनि करि नेत्रां सारिय ॥ सुमुंद कित्तौ गरुअत्त । अप्प भुज जोर छिलोरिय ॥ कित्तौक सबल मेरु गिरि । कमठ होइ पिट्ठ तौल्लिय ॥ लघु वली सेस वंमानवै । सुर असुरानन दिठ्ठ सह ॥ कवि चंद अवर बल वैम कढ़ि । कह तौ हरि बलवंत कह ॥ छं० ॥ ७८० ॥ रु० ॥ ४१० ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को उत्तर दे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस है ॥ दूहा ॥ चिय धर ज्यौ नर ज्यौ सु कवि । नर कित्ती नन गाहू ॥ अंग अंग हरि रूप रस । ब्रन दिषाइ सुनाइ ॥ छं० ॥ ७८१ ॥ रु० ॥ ४११ ॥ ४०७ पाठान्तर :- ब्रह्नांतरवर। हरिर्पादिपियन दिपायं । विन । अपांन । गौपो । गौ । पाय ॥ ४०८ पाठान्तर :- ब्रंह्म ब्रंह्म । जांनी । गोविंद । घटमै । ज्यौ । मै रामचंद्र ॥ ४०६ पाठान्तर :- लामिष्टकी । बुझाय । ग्योप । बुझो । बुझै । गौपन । बुझी । गाय ॥ ४१० पाठान्तर :- दठ्ह । धारीय । कितो । किनो । फुंनि । सारीय । सारी । समुंद । किसौ । गुरु घत्त । गुरुवत्त । अप्प य । भुज । जोर । हिलोरीय । कितक । मेरु । मेर । गिर । होइ । पिठह । तौलिय । शैस । असुरार्डन । दिठं । कहै । त । बलिवंत । कहि ॥ ४११ पाठान्तर :- चीय । सुं किती लाई । गाय । ब्रचि । दिपाई । दिपाय । सुंनाई । सुनाय ॥ २१
१६२ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस वर्णन कर दिखाओ ॥ दूहा ॥ अंग अंग हरि रूप रस । विविधि विवेक वरेन ॥ सुकति समर्प्पन कंत रस । जुग तिनि जोग सरेन ॥ छं० ॥ ७८२ ॥ रु० ॥ ४१२ ॥ ॥ चंद का उत्तर दे कहना कि कान दे सुन मैं वर्णन कर दिखाता हूं ॥ दूहा ॥ कह्यो आंसि सौं कंत इम । जो पूछै तंत ओचि ॥ कान धरौ रसना सरसं । बन्नि दिषाऊं तोचि ॥ छं० ॥ ७८३ ॥ रु० ॥ ४१३ ॥ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथ्वीराज रासो को आदि पर्व्वनाम प्रस्ताव संपूर्ण ॥ ४१२ पाठान्तर :- विविध । वरचं । सुगति । जुंग । जोग । सरचं ॥ ४१३ पाठान्तर :- आंमिन । सौ । जो । पुछइ । पुछै । कांन । दिषांऊं नौहि ॥
॥ उपसंहारिणी टिप्पणी ॥ यद्यपि इस महाकाव्य के महाकवि चंद बरदाई ने इस आदि पद्य का उपसंहार अपनी निज काव्य-रचन-शैली के अनुसार ३८५ रूपक से लेकर ४१३ तक में बड़े गूढ़ार्थ के साथ वर्णन कर दिया है परंतु यह भी उचित और अत्यावश्यक है कि हम भी हमारी शैली के अनुसार हमारी टिप्पणी के उपसंहारार्थ कुछ थोड़ा सा अपने पाठकों की सेवा में सविनय निवेदन करें कि जिस से सर्व साधारणों को हिन्दीभाषा के इस महाकाव्य का कुछ स्वरूप-ज्ञान हो ॥ इस महाकाव्य का नाम पृथ्वीराजरासो है और यह दो शब्दों से मिलकर बना है अर्थात् पृथ्वीराज और रासो। इस संज्ञा का अर्थ यह होता है कि "पृथ्वीराज का रासो"। ग्रंथकर्त्ता ने पृथ्वीराज नामक संज्ञा से, हमारे उन पृथ्वीराजजी चौहान को अपने इस महाकाव्य का नायक [ग्रंथ-संज्ञा] वर्णन किया है, कि जो विक्रम के बारहवें शतक में हमारे स्वदेशी अंतिम राजरा- जेश्वर अर्थात् बादशाह हुए हैं; कि जिन की शूरवीरता का अभिमान आज तक प्रत्येक आर्य को है, और जिन के नाम का ओटा रात्रिदिन की बोल चाल में हमारे देश के सर्व साधारण दिया करते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वे एक कैसे बड़े कट्टर आर्य और शूरवीर राजा हुए हैं; कि जिनों ने सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी को कई बार घोर युद्ध कर २ के पराजित किया था परंतु होनहार परम बलवान होती है कि जिस से अचिंतित घटनां भी झट उपस्थित हो जाती है। देखो, ईश्वरही की इच्छा हिन्दुओं की बादशाहत स्थिर रखने की न थी, कि दैवयोग से पृथ्वीराजजी चौहान जैसे शूरवीर राजा, सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी के हाथ से, अपनी अंतिम लड़ाई में, अंत को प्राप्त हुए। वह भी फिर कैसे-कि वे हिन्दुओं की बादशाहत के सब ठाठ पाटरूपी सर्वस्व को मानो अपने साथ ही लोकान्तर में लेगये और जगत को यह निर्देश कर गये कि लौकिक में जो प्रायः यह कहा करते हैं कि किसी के अंत समय उसके साथ कुछ नहीं जाता है यह एक प्रकार से असत्य है-अब रहा हिन्दी रासो शब्द वह संस्कृत रास अथवा रासक से है और संस्कृत भाषा में रास के "शब्द, ध्वनि, क्रीडा श्रृंखला, विलास, गर्जन नृत्य और कोलाहल आदि" के अर्थ और रासक के काव्य अथवा दृश्यकाव्यादि के अर्थ परम प्रसिद्ध हैं। मालूम होता है कि ग्रंथकार ने संस्कृत भारत शब्द के सदृश रासो शब्द को भावार्थ से महाकाव्य के अर्थ में ग्रहण कर प्रयोग किया है। यह रासो शब्द आज कल की ब्रज भाषा में भी अप्रचलित नहीं है किन्तु अन्वेषण करने से वह काव्य के अर्थ के अतिरिक्त अन्य अनेक अर्थों में भी प्रयोग होता हुआ विद्वानों को दृष्टि आवेगा, जैसे:-"हमने चौदैके गदर को एक रासो जोड़ौ है-कल बहादर सिंघजी की बैठक में चंदर नैं गदर कौ रासो गायो हो-फिर मैं ने भरतपुर के राजा सूरजमल को रासो गायो सो सब देखते ही रह गये-अंजी ये कहा रासो है-मैं तो कल्ल एक रासे मैं फंस गयौ या सूं तुम्हारे वहां नाँय आय सक्यौ-अजी रामगोपाल बड़ौ दिवारिया है, वाके रासे में फंस कैं रुपैया मत बिगाड़ दीजो-हमने आज घिन कौ रासो निमटांय दीनौ है-देखो साब! रासे के संग रासो है, बुरो मत मानौं"-तथा लुगाइयें भी गाया करती हैं।
१६४ उपसंहारिणी टिप्पणी । गीत ॥ मत काची तोन्ह रखियो घानी नान्द कहंगी आँत रासा गुर राख, पक्कावा, मत काचा । इत्यादि ॥ १ ॥ जिण लोगन की रास उठेगी तोन्ह के खाक उठावेगा, हल जोत, नहीं पछतावेगा । इत्यादि ॥ २ ॥ २ यद्यपि इस महाकाव्य का केवल नाम सुनते ही उस का विषय यह प्रतीत होने लगता है कि उस में पृथ्वीराजजी चौहान के जन्म से लेकर मरण तक के ही सब चरित्र वर्णन किये गये हैं; [विषय] परंतु उस के गर्भित वृत्तों की परीक्षा करने से जानने में आता है कि महा कवि चंद ने उस में पृथ्वीराजजी के चरित्रों के साथ ही उन के सब समकालीन शूर, सामंत, आधीन राजा इष्ट मित्र और सगे संबन्धी और सहायक यावदार्य राजकुलों के भी कुछ न कुछ चरित्र और शौर्य वर्णन किये हैं । अतएव यह कदापि नहीं समझा जा सक्ता कि यह महाकाव्य पृथ्वीराजजी चौहान के नायक होने के कारण से केवल चौहानों की ही बापौती का ग्रंथ है किन्तु वह वास्तव में यावदार्य राजकुलों का सर्वस्व है । देखो, पृथ्वीराजजी से लेकर जिन २ शूर वीरों के चरित्र उस में वर्णन किये गये हैं उन सब की विद्यमान संतान वर्तमान काल की हमारी श्रीमती भारत-राजराजेश्वरी विक्टोरिया के सिंहासन के चारों ओर उपस्थित होकर अपनी २ प्रतिष्ठा के अनुसार तन मन और धन के द्वारा परम राज-भक्ति को प्रकाश कर रहे हैं और श्रीमती के प्रस्वेद के साथ मानो अपना रक्त तक बहाने को प्रस्तुत खड़े हैं । क्या पृथ्वीराज- जी के एक बड़े शूर वीर सामंत पञ्जनजी के वंश में श्रीमहाराज साहब जयपुर और उनके राज वंशीय सरदार नहीं हैं ? क्या पृथ्वीराजजी के सगे संबन्धी जयचंदजी के वंशज श्रीमहाराज साहब जोधपुर और कृष्णगढ़ और उनके भाई बेटे नहीं हैं? क्या पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और परम शूर धीर संहायक रावल समरसीजी की कुलीन संतान में श्रीमहाराज साहब नैपाल, श्रीमहाराणाजी साहब उदयपुर, श्रीदरबार डूंगरपुर और प्रतापगढ़ अपने २ राजवंशी उमराव और सरदारों के सहित नहीं हैं? क्या चौहानजी के अनेक वंशज बूँदी, कोटा सिरोही, नीमराणा, भदावर, बेदला, कोठारिया, और पारसोली आदि के राजा महाराजा और सरदारों को आज हम अपनी आंखों से नहीं देखते हैं ? इसी तरह अन्य सब की विद्यमान संतानों को भी हमारे पाठक स्वयम् विचार देखें और इस थोड़े में ही बहुत कर के समझ लें कि इस महाकाव्य का विषय बारहवें शतक के यावदार्य राजकुलों के संवलित चरित्रों से परम विभूषित है ॥ ३ इस पृथ्वीराज रासे को जो हम अपने लेखों में महाकाव्य कर के लिखते हैं वह कुछ [काव्य] अन्यथा और आश्चर्यदायक नहीं है किन्तु साहित्यदर्पण में महाकाव्य का जो नीचे लिखा हुआ लक्षण लिखा है उस से वह विशेषांस में मिलता हुआ है:- सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्त गुणान्वितः ॥ एकवंशभवा भूपाः कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद्वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् । आदौ नमस्क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा ॥ क्वचिन्निन्दा खलादीनां सताञ्च गुणकीर्त्तनम् । एकवृत्तमयैः पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकैः ॥ नातिस्वल्पा नातिदीर्घाः सर्गा अष्टाधिका इह । नानावृत्तमयः क्वापि सर्गः कश्चन दृश्यते ॥
उपसंहारिणी टिप्पण । १६५ सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथायाः सूचनं भवेत् । सन्ध्या सूर्य्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासराः ॥ प्रातर्मध्याह्न मृगया शैलर्तुवनसागराः । सम्भोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वराः ॥ रणप्रयाणोपयम मन्त्रपुत्रोदयादयः । वर्णनीया यथायोगं साङ्गोपाङ्गा अमी इह ॥ कवेर्वृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा । नामास्य सर्गोपादेयकथया सर्ग नाम तु ॥ सा० द० ५५९ ॥ जब कि वह महाकाव्य के लक्षण के अनुसार वास्तविक् एक महाकाव्य है तो फिर उस के रचनेवाले का भी साहित्यशास्त्र में एक अच्छा व्युत्पन्न महाकवि होना क्या अनुमान नहीं किया जा सक्ता है ? जैसे कि इस महाकाव्य का विषय पृथ्वीराजजी चौहान और उन के समकालीन यावदार्य राजकुलों के चरित्रों से संवलित् है वैसे ही उसका काव्य भी भिन्न २ प्रकार के छंदों से विभूषित अनेक प्रकार के काव्यों का एक ऐसा संवलित काव्यात्मक है कि जिस को हम किसी एक प्रकार के काव्य की संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते हैं । उसके काव्य को श्राव्य-काव्य की संज्ञा देने में तो हम आशा करते हैं कि किसी विद्वान को भी कुछ शंका न होगी किन्तु सूक्ष्मतर अन्वेषण करने से ज्ञात होगा कि उस में दृश्य-काव्य के अनेक अंगों का भी कवि ने अपनी सूक्ष्मतर युक्तियों से ऐसा समावेश किया है कि उस को कोई दृश्य-काव्य का अच्छा व्युत्पन्न परीक्षक झट शोधकर जान सक्ता है । क्या हम यह नहीं विचार सक्ते कि इस महाकाव्य के छंदों को कवि ने रूपक के नाम से क्यों गिने हैं ? इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से यहां तक भी स्पष्ट विदित हो सक्ता है कि महाकवि चंद ने उसको काव्य की अनेक उत्तमताओं के इन तीन मूलों से भी भले प्रकार विभूषित किया है । प्रथम तो महाकवि ने अपने वचन का शृंगार, रस, अनुप्रास, और अलङ्कारादिक से परम विचित्र किया है। दूसरे उसने भाव में योज रक्खा है। तीसरे इस महाकाव्य के सब छंद प्राचीन और नवीन प्रकार की गानविद्या के अनुसार गाये भी जा सक्ते हैं । इस के अतिरिक्त महाकवि ने पृथ्वीराजजी और उनके समकालीन यावदार्य राजकुलादि के इतिहास भी जहां तक उस से हो सके हैं भले प्रकार से वर्णन किये हैं। हिन्दी भाषा में साहित्यशास्त्र और सब पौराणिक अनुवाद विषयक ग्रंथ जो अब तक प्राप्त हो सके हैं वह बारहवें शतक के अथवा उस के पहिले के नहीं है किन्तु वे सब इधर के समय के रचित हैं अतएव हम को समझना चाहिये कि चंद ने संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों के आधार से ही यह महाकाव्य रचन किया है और जब कि यह बात ऐसे ही है, तो फिर हमको उस के परम परिश्रम के लिये कितना आभारी होकर उसकी प्रशंसा करना चाहिये । क्या हमको इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से चंद की उक्ति, साहित्यशास्त्र विषयिक नियम, और पौराणिक कथा आदि में उसका संस्कृत भाषा के अनेक विद्या ग्रन्थों का अनुकरण करना नहीं दृष्टि आता है ? जहां तक हिन्दी भाषा के ऐसे अनेक ग्रंथ कि जो चंद के पीछे के रचित हैं हमारे पढने में आये हैं, उन सब से यही ज्ञात होता है कि उनके रचनेवाले चंद कवि जैसे संस्कृत भाषा से भले प्रकार परिज्ञात नहीं थे और उनों ने चंद की शैली का ही निःसंदेह अनुकरण किया है । हमारे कहने का सारांश यह है कि इस महाकाव्य को उसके अति क्लिष्ट और हमारी बुद्धि को चल विचल कर देनेवाला होने के कारण निन्दनीय नहीं ठहराना चाहिये किन्तु साहित्यशास्त्रादि के संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों को हाथ में लेकर और अपने हृदय को चारण और भाटादि के वंश परंपरा के हाड-बैर के दुराग्रह से शुद्ध करके सूक्ष्मतर परीक्षा करनी चाहिये कि उस से हमको निःसंदेह यह ज्ञात हो जावेगा कि हमारे स्वदेशी और यूरोपियन बड़े २ विद्वान जो इस महाकाव्य की प्रशंसा अब तक करते चले आये हैं वह वास्तव में वैसा ही अमूल्य महाकाव्य है और वह ऐसा भी है-कि मानों चंद अपने समय
१६६ उपसंहारिणी टिप्पण। तक के हिन्दी भाषा के सर्व प्रकार के काव्यों का एक अमूल्य संग्रह हमारे लिये प्रस्तुत कर के हमारी हिन्दी भाषा को अति धनाढ्यकर गया है। क्या यह बात पक्षपात रहित विद्वानों को अति आश्चर्य और अट्टाट्टहास कराने वाली नहीं है, कि हम इस महाकाव्य को अभी तक बहुत ही अच्छी तरह से पढ़ पढ़ा और समझ समझा तो सक्ते ही नहीं और न इस महाकाव्य में यूनी- वर्सिटी University की परीक्षा की शैली के अनुसार परीक्षा देकर उत्तीर्ण हो सक्ते हैं किन्तु उसको दोष देकर विध्वंस करने को तो हम सब से आगे आखड़े होने को प्रसन्नतापूर्वक तयार हैं? निदान किसी कवि के कहे अनुसार जो जिस के गुण को नहीं जानता वह उस की निन्दा निरंतर करता है:-“न वेत्ति, यो यस्य गुणप्रकर्षं स तस्य निन्दां सततं करोति। यथा किराती करिकुंभजाता मुक्ताः परित्यज्य विभाति गुंजाः” ॥ जैसे इस महाकाव्य का काव्य अनेक प्रकार के काव्यों का एक संवलित् काव्य है वैसे ही उसकी भाषा भी उसके ग्रंथकर्त्ता के समय तक की अनेक प्रकार की प्राचीन हिन्दी भाषाओं की एक अति संवलित् भाषा | हिन्दीभाषा है। यदि किसी को इसमें कुछ संदेह हो तो वह इस आदि पर्व्व को ही ध्यान देकर पढ़ देखे कि उसके किसी छंद की तो कैसी भाषा है और किसी की कैसी। क्या विद्वानों से यह बात छिपी हुई है कि भाषा और काव्य का नित्य-संबन्ध नहीं है? जब कि उन में नित्य-संबन्ध का होना यथार्थ है तो फिर क्या प्रत्येक का अपने २ अनेक प्रकारों से संवलित् होना भी स्वतः सिद्ध नहीं है? इस महाकाव्य की भाषा के योज को वह विद्वान भले प्रकार से जान सक्ते हैं कि जो वर्त्तमान समय में फिलौलोजिस्ट Philologists अर्थात् शब्दोत्पत्तिविद्याज्ञ कहलाते हैं। और वैसे तो हमारे पढ़ने में वर्त्तमान समय के ऐसे २ सहसा सिद्धान्त कर लेने वाले विद्वानों के भी लेख आये हैं कि जिनों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वाक्य भी कहा है, कि इस महाकाव्य के महाकवि को अनुस्वार और विसर्ग तक के प्रयोग करने का बोध नहीं था। और विद्वान भलेई ऐसा कहने में सम्मत हों परंतु हमारे मुख से तो इस महाकाव्य के काव्य को देखते हुए ऐसा सुन कर वारंवार यही निकलता है कि-त्राहि गोविन्द! त्राहि गोविन्द!! ग्रंथकर्त्ता ने इस ग्रंथ को जिस भाषा में लिखा है वह उसने स्वयम् ही इस आदि पर्व्वके रूपक ३९ में स्पष्ट कह दिया है और जैसा उसने कहा है वैसी ही भाषा हम इस महाकाव्य की पाते भी है। फिर आश्चर्य क्या है? वह यही है-कि न तो हम इस ग्रंथ को आदि से लेकर अंत पर्य्यंत पढ़ते हैं, न समझते हैं, न कवि के अभिप्राय को लक्ष में लाते हैं, न यह विचारते हैं कि बड़े २ विद्वान कि जिन के वचन पर अनेक मनुष्य विश्वास करते हैं उनके सिर पर कुछ सम्मति देते समय बड़ी भारी जिम्मेदारी अर्थात् अनुयोज्यता का बोझ भी रक्खा हुआ है कि नहीं-किन्तु, जो मन में आया वही हम लिख डालते हैं; क्योंकि न तो चंद कवि, न पृथ्वीराजजी चौहान, और न रावल समरसीजी हम से हमारे ऐसा कहने के लिये अब लड़ने को आ सक्ते हैं, और न किसी क्षीर-नीर का सा न्याय करने वाले विद्वान का हमको डर है। देखो, हमने हमारी प्रथम टिप्पण में ही कह दिया है कि इस महाकाव्य की हिन्दी भाषा तीन प्रकार की है। प्रथम षट्- भाषा-और-कुरान-की भाषा-की-योनिवाली दूसरें षट्-भाषा-और-कुरान-की-भाषा-के- सम, और तीसरे देशी-प्रसिद्ध। इसके अतिरिक्त विद्वानों को इस महाकाव्य की भाषा की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से ज्ञात होगा कि चंद कवि ने साहित्यदर्पण में लिखे हुए भाषा के प्रयोग के निम्न लिखित नियमों का भी अपने निज विचार और शैली के संस्कार सहित इस महाकाव्य के रचने में कुछ अनुकरण किया है:-
उपसंहारिणी टिप्पणी । १६७ पुरुषाणामनीचानां संस्कृतं स्यात्कृतात्मनाम् । शौरसेनी प्रयोक्तव्या तादृशीनाञ्च योषिताम् ॥ आसामेव तु गाथासु महाराष्ट्रीं प्रयोजयेत् । अत्रोक्ता मागधीभाषा राजान्तःपुरचारिणाम् ॥ चेटानां राजपुत्राणां श्रेष्ठिनां चार्द्ध मागधी । प्राच्या विदूषकादीनां धूर्तानां स्यादवन्तिका ॥ योधनागरिकादीनां दाक्षिणात्या हि दीव्यताम् । शकाराणां शकादीनां शाकारीं संप्रयोजयेत् ॥ बाह्लीकभाषा दिव्यानां द्राविडी द्रविडादिषु । आभीरेषु तथाऽभीरी चाण्डाली पुक्कसादिषु ॥ आभीरी शाबरी चापि काष्ठपत्रापजीविषु । तथैवाङ्गारकारादौ पैशाची स्यात् पिशाचवाक् ॥ चेटीनामध्येनीचानामपि स्यात् शौरसेनिका । बालानां पण्डकानाञ्च नीचग्रहविचारिणाम् ॥ उन्मत्तानामातुराणां सेवे स्यात् संस्कृतं क्वचित् । ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य दारिद्र्योपस्कृतस्य च ॥ भिक्षुत्वन्ध्यरादीनां प्राकृतं संप्रयोजयेत् । संस्कृतं संप्रयोक्तव्यं लिङ्गिनीषूत्तमासु च ॥ देवीमन्त्रिसुतावेश्या स्वपि कैश्चित्तथोदितम् । यद्देशं नीचपात्रन्तु तद्देशं तस्य भाषितम् ॥ कार्य्या तश्चौत्तमादीनां कार्य्यो भाषाविपर्य्यः । योषित् सखीबालावेश्या कितवाप्सरसां तथा ॥ वैदग्ध्यार्थं प्रदातव्यं संस्कृतं चान्तरान्तरा ॥ सा०द० ४३२ ॥ इस बात की कुछ परीक्षा हम इस आदि पर्व्व में ही कर सक्ते हैं । देखिये रूपक ३३, ३६, आदि शुद्ध संस्कृत भाषा में हैं और रूपक १६, २२, ४७, ५७, ५९, इत्यादि में षट्भाषाओं का सादृश्य और नाटकों में प्रायः संस्कृतादि भाषाओं का सादृश्य है । इसी प्रकार हमारे पाठक इन भाषा संबन्धी सब बातों को इस समय ग्रन्थ में अन्वेषण कर जांच देखें । यदि इस प्रकार की परीक्षा करने पर सब विद्वानों की सम्मति में यही तुलेगा कि चंद कवि वज्र-मूर्ख था तौ हम भी उस को-बड़ा-वज्र-मूर्ख कहने लगेंगे क्योंकि वह हमारा कोई संबन्धी नहीं है और न हम को हमारे कहे का कुछ हठ है बरुक हमारा सिद्धान्त यही है कि सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग । इस महाकाव्य की भाषा में दो एक वर्ष से एक यह भी बड़ी भारी शंका लोगों ने खड़ी कियी है कि उस में आठ या १० दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द हैं और फारसी शब्द अकबर बादशाह के समय से हिन्दी भाषा में मिले हैं अतएव यह महाकाव्य सं० १६४० से १६७० के बीच में क्रित्रिम बना है । हम इस बात से बिलकुलही असहमत हैं और ऐसा अनुमान करने- वाले को हम समझते हैं कि उसने न तौ यह पृथ्वीराज रासा कभी आदि से अंत पर्य्यंत अच्छी तरह से पढ़ा है और न उसको ऐतिहासिक विद्या का पूरा २ बोध है क्योंकि यह अनुमान बिलकुलही अदृढ़ और अपरिपक्व है । बरन अब तक के ऐतिहासिक शोधों के अनुसार हमारी सम्मति में फारसी शब्दों का मेल हमारे भरतखण्ड की बोलचाल की भाषाओं में सातवें शतक तक पाया जा सक्ता है कि फिर इस बारहवें शतक की हिन्दी भाषा की तौ क्याही कथा कहनी है ! टुक विचार कर देखिये कि किसी देश की भाषा में अन्य देशीय भाषा के शब्दादि का मेल बहुधा करके प्रथम बोलचाल की भाषा में ही हुआ करता है न कि किसी मृतः प्रायभाषा में और वह विदेशियों के किसी देश में आने जाने, बसने बसाने, रहने सहने, मिलने मिलाने वाणिज्य करने कराने राज्य के बदलने बदलाने, मत के बिगड़ने बिगड़ाने आदि के कारणों से ही हुआ करता है । तदनन्तर आप नीचे लिखे कारणों को विचार कर देखिये और निर्णय कीजिये कि चंद की हिन्दी में जो फारसी शब्दों के प्रयोग संबन्धी दोष दिये जाते हैं वह वास्तव में यथार्थ हैं अथवा नहीं :- १ पृथ्वीराज रासे के किसी भी समय में आठ या दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द नहीं हैं और जब प्रत्येक समय में नहीं हैं तब समय ग्रन्थ में भी न होना स्वतः सिद्ध है।