भारतकोश
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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

२८८ . पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समयं ८ हरसिंह का युद्ध ॥ कवित्त ॥ हकि कह्वर हरसिंह । बध्य नरसिंह विज्झिगय ॥ लथ्य बध्य लोहांन । उपरं तरं तर परि दग्गिगय ॥ नंधि अद्ध नरसिंह । भयौ हरसिंह उद्ध वरं ॥ दौरि राव चामंड । दई तरवारि पिठ्ठ पर ॥ कर फौरि मुक्कि डर अद्धधर । भयौ विबंधव बंटि घर ॥ हरिसिंह बस्यौ हरिसिंघ पुर । रवि मंडल बज भेदि करि ॥ कं० ॥ ४८ ॥ रु० ॥ २४ ॥ दूहा ॥ भेद्यौ रवि मंडल सु पहु । करि प्राक्रमम प्रमान ॥ धनि चालुक पित मात धनि । निकासि न षोयौ मान ॥ कं० ॥ ४९ ॥ रु० ॥ २५ ॥ नरसिंह का युद्ध ॥ कवित्त ॥ करि उप्परि तें दूरि । तरच्च नरसिंघ सु उट्टिय ॥ तवै भरकि अगवान । आइ सिर सार सु बुट्टिय ॥ जब नरसिंघ नरंन । करन कट्ठी कहारिय ॥ धखि धथ्य गत्त बध्य । तेन उदरं विच फारिय ॥ पर भूमि सूर भगवान भिरि । चल्यौ प्रांन जरद्ध अय ॥ है है सु सबद मृत लोक भय । जै जै सुर सुर लोकजय ॥ कं० ॥ ५० ॥ रु० ॥ २६ ॥ कैमास का युद्ध ॥ मोकंच गढि गोकंच सुजान । मद मोकन कुंदिय ॥ तुहिय वीज अकास । सीस कैमास अछुहिय ॥ २४ पाठान्तर-बथ । लथ । बथ । लोहांन । उप्पर । धर लग्गिय । चामुंड । फौरि । मुकि । अध । बिबंधव ॥ २५ पाठान्तर-प्रमांन । मांन ॥ २६ पाठान्तर-उठिय । तब । भगवांन । कंटारिय । हथ । बथ । विचि । फारी । भगवांन । सुसद । म्रत ॥

पाँचवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । २८६ तुरस फहि कटि गुरज । सुकुट करि रेष रिपेसर ॥ असि कट्टत वर रोस । उदर वर बचिय सु ओझर ॥ विन पत्त मत्त जनु डंड डक । रंभ पंभ कर कटीयध्वज ॥ तिच्चि काज साज साकत्त सुरर । सु गुरुर पठाइय गुहरध्वज ॥ छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २७ ॥ माधव खवास का युद्ध ॥ कवित्त ॥ काम धाम रिम राच । स्याम जिम धाम पिथ्यपति ॥ पत्त लत्त दिय रोस । फद्दि किप्पाट थाट भजि ॥ धसिय मध्य माधव षवास । आय पत्तौ तहां आरौ ॥ लगिग वथ्थ विन नत्थ । संड मल्ल मच्चि अपारौ ॥ जम दट्ट कट्ठि चालुक चँपि । दिच्छ पाँनि पावार उर ॥ मंडलु दिनेस में भेद करि । सुपाट परट्टिय ब्रह्म पुर ॥ ॰ छं० ॥ ५२ ॥ रू० २८ ॥ कन्ह का युद्ध ॥ कवित्त ॥ परि भूमि पावार । उररि भंजन किवार दुव ॥ तव लगि कन्ह तमंकि । आइ पहुंच्यौ अंतकलुच्च ॥ मुक्कि रोस असि तमसि । घाइ सिर जाइ रह्यौ उत ॥ मनहुं सत्ति वल्ल दैन । अंग जनु हन्यौ अजा सुत ॥ तिन हनत सिंभु धुन हनिय सिर । राज गेह मधि समर हुच्च ॥ हल चलकि मच्चि कोलाहलह । हाय हाय दरबार हुच्च ॥ छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २९ ॥ २७ पाठान्तर—सुजानि ! वीन । आकास । शीस । रिषीसर । औझर । उझर । कटीय । स्वन । तिहिं । तक्के सुरर ॥ २८ पाठान्तर—कांम । धांम । स्यांम । घांम । प्रथ्यपति । पत । लत । पट्टि । क्लिपाट । मधि । लगि । बथ । नथ । मच्चि । जमदठ । चालुक । चंपि । दिठ । गै । परठिय ॥ २९ पाठान्तर—तमकि । हुअ्र । मुकि । शिर । मनहुं । शक्ति । देन । हलहलिकि । मचि । हाइहाइ ॥

२६० पृथ्‍वीराजरासो । [पांचवां समय १० चालुकों के मारे जाने से दरबार में कोलाहल होना ॥ दूहा ॥ कोलाहल दरबार भौ । सुनि चालुक मत सध्य ॥ धसिय पौरि गज मत्त सम । पुच्छत पुच्छत कथ्य ॥ छंदं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३० ॥ झिंक रुधिर उठ्ठत गिरिय । परिय सच परिधारि ॥ दिषि चालुक भत तेह टग । कुलच्च बाजि जनु डारि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ कवित्त ॥ संकर सिंघ कि कुट्टि । कुट्टि इन्द्रच्च कि गरुअ गज ॥ कि महिष कुट्टि मय मत्त । भरिय दीयौ कि दुट्ठ कजि ॥ भौ कि हांस रस रोस । मद्धि रावन्त विरच्चिय ॥ कोलाहल बल कूक । मज्झ रावर छल मचिय ॥ चालुक्क षवास ताकथ्य कथि । कोलाहल इन जानि घर ॥ कुंडिय सयल बोच्चिय नृपति । हनिग कन्ह सारंगधर ॥ छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ दूहा ॥ अर प्रताप दरबार के । ढार घरे मय मत्त ॥ सुनत बत्त इह कन्हि परे । मनु निस तुहि नछत्त ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ कवित्त ॥ निसि षह तुहि नछिच । रोस महिषा कुटि वातन ॥ परि कि दीप पातंग । सिंघ जनु कुट्टि क्षुधा तन ॥ यों तुहैं भर भरन । अररि भैभीर सुभग्गिय ॥ मनहुँ परा पति चुनत । परिय सिंचान अचिंतिय ॥ परि रौर पौरि दीनी दरकि । धरकि कूच कन्ह पौरि बिचि ॥ झेलत सब संत कलहंत जनु । पारथ सम भारत्थ मचि ॥ छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३४ ॥ दूहा ॥ माया मोह विरत्त मन । तन तिनुका सम डारि ॥ ३० पाठान्तर-सथ । मत । पुछत । कथ ॥ ३१ पाठान्तर-बाजं । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ३२ पाठान्तर-भरीय । दीपि । मधि । रावत । विराचिय । मन्न । मचिय । कथ । जांन ॥ ३३ पाठान्तर-मत । बत । मनौं । नछिच ॥ ३४ पाठान्तर-नक्छित्र । परियं । संघ । मनौं । मनहुं । अचितीय । दीनीय । बच । पेलंत । स । भारंथ ॥ ३५ पाठान्तर-विरतं । पिय ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥

२६२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १२ ,

दूहा ॥ पच भरैं जुग्गिनि रुधिर । ग्रिधियं मंस डकारि ॥ नचौ ईस उमया सहित । रुंड माल गल धारि ॥ कूं० ॥ ६६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ कंद पद्धरी ॥ दरवार ताल रुधि भरित वारि । द्रुक हथ्थ·रत चढ़ी किनारि ॥ तिन मधि मग्न तरु जिम मजंत । धर धारि मारि जे धुकत मंत ॥ ॥ कूं० ॥ ६७ ॥ रु० ॥ ४० ॥ दूहा ॥ * खेल मच्यौ दरबार सन्नि । मत्त गवार बसंत ॥ सिर भ्रुक बिनु धावइ करै । सुभट सुअंगध कंत ॥ ॥ कूं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४१ ॥ कंद लघुनाराच ॥ धुंकंत धार धार सैं । बकंत मार मार सैं ॥ झुकंत झार झार सैं । तकंत सार तार सैं ॥ ६९ ॥ डकंत भूत डाक सैं । कसंत बीर बाक सैं ॥ परंत छीन पाइट्टै । झरंत हथ्य घाइट्टै ॥ ७० ॥ खरंत संत मंत सैं । घुरंत घाइ घंत सैं ॥ सुभग्ग अंगुली थिरैं । फबी सुकैर विध्युरैं ॥ ७१ ॥ नचंत घाइ नारदं । ठरै सुधाइ ठारदं ॥ अभक्कि रुद्धि अम्भसे । बबक्कि रह बह से ॥ ७२ ॥ चबक्कि ढाक चक्कए । चवक्कि कुंभ चक्कए ॥ म्रोरित्त मुच्छ मुच्छए । चढ़ी सु आनि चच्छए ॥ ७३ ॥ चलंत हाथ चंचलं । परंत बांन पंचलं ॥ भिदंत भांन मंडलं । भयौ सु नष्ट कुंडलैं ॥ ७४ ॥ बहंत मोष बहए । छराकि लग्गि छहए ॥ कटंत सीस कहए । रिनंक षत्त फहए ॥ ७५ ॥ फटंत फंफ फेफरं । गटंत पेषि केफरं ॥ बजंत घाव घुंमरे । मनौं परेव घुंमरे ॥ ७६ ॥


३९ पाठान्तर-ग्रिधय । ग्रिधिय ॥ ४० पाठान्तर-हथ्थ । रत । चढ़ी । मधि । ते ॥ ४१ पाठान्तर-मत्त । गवांर । बन्नु । धावहं ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥

पांचवां समय १३] पृथ्वीराजरासो । २६३ कुट्टैं सिरं करायरं । कपास ज्यौँ पिंजारयं ॥ फुटंत घौ सुषोपरी । कि जोग पच टोपरी ॥ ७७ ॥: कटंत जंघ कुंभए । मनौ सुरंभ गिंभए ॥

  • परीय संझ सामयं । चलुक्क रक्ख नामयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥ सांझ हो गई परन्तु लड़ाई न रुकी । कवित्त ॥ परिय संझ जग मंझ । टरिय कंकन रंकन धन ॥ भरिय पच जुगिनीय । करिय सिव माल सीस घन ॥ मुरिय न श्रित चालुक्क । धरिय रसरोस कन्ह हिय ॥ पैरि चलिय दरबार । सोच गज घटि उपटिय ॥ मय मत्त मार मनौ उररि । झररि झर्रि भगिय अनिय ॥ द्वै घरिय लोह बुट्ठौ लचरि । पेख कयौ किगवारनिय ॥ ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ४३ ॥ दूहा ॥ कान्ह जाइ संमुह परत । कला एक मचि रारि ॥ सत सारघ दूनौ कटै । भजै अबर तजि ढार ॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ४४ ॥ कान्ह चौहान का युद्ध जीतना । करपा ॥ झरै (सार) सिर मार विकरार रक्तन भरत । परत धरनीथ द्वैरै जरकि जूपी ॥ चक्क चहुवांन चालुक्क भृत उपर चर । कोपियं कन्द मनौं काल रूपी ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रुंड भकरुंड किय तुंड मुंडन रुइत । वाचि सिर सार मनौँ मेच बुट्ठै ॥ ४२ पाठान्तर-धकंत । सौं । हकंत । हूँ । हथ । घाय । पिरें । पीरें । विस्तरै । घाय । भभकि । रुंधि । भट्ट । भट्ठ । वर्षकि । रद । बद । हवकि । हक्कए । चवकि । चक्कए । मोरित्त । म्रोरिर । मुंक्क । मुरु । मुक्कए । श्रॉनि । चक्रए । नट । रिनेंकि । पत । मनौ । कुटं । शिरं । ज्यौं । यों । मनौँ । * यह पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ४३ पाठान्तर-शिव । चालुक । पैट । चलीय । घट । उपटिय । भाठीय ॥ ४४ पाठान्तर-जाय । समुह । दूनौं । कटे । भजि ॥ ४५ पाठान्तर- अधिक पाठ है । धरनि । मनौ । जम । दारि । नृघात । † यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥

२६४ पृथ्वीराजरासो। [ पांचवां समय १४ कूछ करि जूछ संम्रुच्छ को कोक धर । रोस रिम राच जेम जीव कुद्है ॥ कुं० ॥ ८२ ॥ पांनि करि पांनि अरि पांनि करंनीय छक । सीस अरी पारि सब षेत सींच्यौ ॥ भ्रात सोमेस नृपघात भंजन भरम । षेत भयकार षय काल षीज्यौ ॥ कुं० ॥ ८३ ॥ रु० ॥ ४५ ॥ श्लोक ॥ हनिनं निनायकं सेना, कथितं न च पूर्वयम् । अयुद्धं चक्रतं एषां, विना स्वामि रणे युधम् ॥ कुं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ४६ ॥ प्रतापसिंह आदि के मारे जाने का समाचार सुनकर पृथ्वीराज का अप्रसन्न होना ॥ दूहा ॥ नीठ बिसासत अप्प भर, गह्यौ कन्ह चहुआन । गए ग्रेह लै सकल मिलि, प्रथीराज अकुलान ॥ कुं०॥ ८५ ॥ रु० ॥ ४७॥ पारि श्रित्त चालुक्क भर, मध अजमेर प्रमान । सात भ्रात भीमच्च छते, रन जीत्यौ भर कांन ॥ कुं० ॥ ८६ ॥ *रु० ॥ ४८ ॥ पृथ्वीराज की अप्रसन्नता सुनकर कान्ह चौहान का घर बैठ रहना, तीन दिन तक अजमेर में हरताल पड़ना ॥ बत्त सुनी तब कन्ह नें, षिज्यौ कुँअर प्रथिराज । बैठि रहें तब निज सुघर, अंदरवार समाज ॥ कुं० ॥ ८७ ॥ †रु० ॥ ४८ ॥ तीन दिवस अजमेर में । परी इंद हटनार ॥ हूछ कोछ बज्यौ विषम । लग्यौ सु भूत भुआर ॥ कुं० ॥ ८८ ॥ रु० ५० ॥ मधि बजार चलि रुधिर नदि । रुस्त तुंड घन मुंड ॥ बर्कि कान्ह चहुआन करि । तिल तिल सम तन तुंड ॥ ॥ कुं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ५१ ॥ ४६ पाठान्तर-हननं । यं । असुहुं । स्वामी । रिने । जुधं ॥ ४७ पाठान्तर-अप । चहुंआन । अकुलांन ॥ ४८ पाठान्तर-मध्य । प्रमान । * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ४६ पाठान्तर-बत । षिजयं । कुंअरं । प्रथीराज । रहै । † यह रूपक कौलफील्ड वाली पुस्तक में नहीं है ॥ ५० पाठान्तर-हट । हटतार । भुक्तार ॥ ५१ पाठान्तर-चहुवांन । तिन ॥

पांचवां समय १५ ] . पृथ्वीराजरासो : २६५ सात दिन तक कान्हके न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥ कवित्त ॥ सात दिवस जब गए । कन्ह दरबार न आए ॥ तब प्रथिराज कुँआर । अप्प मनए गृह जाण ॥ तुम ऐसी क्यौं करौ । अप्प सिर चढिय सुकाई ॥ कहिहैं सब चहुआन । छने चालुक्क सुराई ॥ आणि विषैं अप्पन सुघर । सो रावर ऐसी करिय ॥ इक दोस अप्प लग्ग्यौ खरौ । बत्त वित्तरीय जग बुरिय ॥ ॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ५२ ॥ कान्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर मोछ पर ताव रख सकता है ॥ दूहा ॥ कही कन्ह चहुआन तब । सो बैठें कोइ आनि ॥ सभा मद्धि संभरि अवर । मुच्छ धरै क्यौं पानि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु० ॥ ५३ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी बांधे रहा कीजिए ॥ करी अरज प्रथिराज वर । जो मानौ इक कन्ह ॥ सभा बुराई जौ मिटै । चष बँधि पह रतन ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु० ॥ ५४ ॥* पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कान्ह के आंख में बांध देना । तब प्रथिराज विचार करि । चष आछौ हो पह ॥ बहुरि कोइ भर भोरछी । धरत परै इक बह ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रु० ५५ ॥ ५२ पाठान्तर-कुंआर । अप । शिर । काइय । कहिहैं । चालुक । राइय । विषै । करौय । लग्यौ । विस्तारिय ॥ ५३ पाठान्तर-कोई । आंनि । मधि । संभरी । मुछ । पांनि ॥ ५४ पाठान्तर-पृथ्वीराज । जौँ । माँनौँ । जौँ । बधि । * संवत् १६४० की प्रति में यह नहीं है ॥ ५५ पाठान्तर-पृथ्वीराज । घंट । बट ॥ ६ !

२६६ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १६ मनी बत्त सुसत्य मन । लै जराव को पह ॥ राजन कन्ह चष बंधवी। मनौं सिरी गज घट ॥ कूं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ५६ ॥ कवित्त ॥ पाव लष परिमान । मोज किंमति ठहराइय ॥ तौल टंक इक्कीस । नयन आकार सवारिय ॥ जरिय जवाहर मद्धि । अरक उद्योत प्रकासिय ॥ दिष्टि मंडि देषंत । दुअन उर चंदर चासिय ॥ कंचन किखाव नगाथ कज्ज । पट्टी बंधिय चंद भट ॥ तिहि बेर कन्ह चहुआन चष । रूप प्रगटि अति षिचि षट ॥ कूं० ॥ ८५ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ † दूहा ॥ पाटी बंधिय कन्ह चष । हूह ओपम करि अषि ॥ तन सरवर जज बीर रस । ओटा बंधि सुरषि ॥ कूं० ८६ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ † पट्टी रात दिन बँधी रहती थी ॥ दूहा ॥ सो पट्टी निस दिन रहै । छोरि देइ द्वै ठाम ॥ कै सिज्या वामा रमत । कै कुहत संग्राम ॥ कूं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ५९ ॥ करि सुचित्त चित्त कन्ह कों । प्रथीराज रस भाइ ॥ अवर सूर सामंत सब । रहे चीय सुख पाइ ॥ कूं० ॥ ८८ ॥ रु० ६० ॥ एक बाज ऐराक्क बर । हंस नाम अवनीस ॥ साजि साजि राजन रजक । कन्ह कीन वगसीस ॥ कूं० ॥ ८९ ॥ रु० ६१ ॥ जम दढ इक्क जराव जरि । एक उंच सिर पाव ॥ नर (सु*) नाचर वर कन्ह कों । कीनौँ कुँअर पसाव ॥ कूं० १०० ॥ रु० ॥ ६२ ॥ ५६ पाठान्तर-मानी । सति । पट । राज हथ चष कन्ह वंधि । मनुं । सरी । घट ॥ ५७ पाठान्तर-परिमांन । ठहराईय । तोल । मंधि । ५८ पाठान्तर-अषि । रषि ॥ †ये दोनो रूपक संवत १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ ५९ पाठान्तर-निशि । सेज्या । संयाम ॥ ६० पाठान्तर-चित्त । भाय । चाय । पाय ॥ ६१ पाठान्तर-ए । नांम ॥ ६२ पाठान्तर-शिरपाव । *अधिक पाठ है ॥ कों । कोनी । कुंअर ।

पांचवां समय १० ] पृथ्थीराजरासो । २६७ कान्ह चौहान की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ भारत्थ भीम वर ॥ इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ द्रोनाचारज वर ॥ इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ दससीस बीसभुज ॥ इसौ कन्ह चहुआन । जिसौ अवतार बारि सुज ॥ जुध बेर इम्म तुहै जुरिन । सिंघ तुहि लषि सिंघनिय ॥ प्रथिराज कुँअर साहाय कज । दुरजोधन अवतार जिय ॥ छं० ॥ १०१ ॥ रु० ॥ ६३ ॥ दूहा ॥ जहँ जहँ राजन काज हुअ । तहँ तहँ होइ समत्थ ॥ मेर हथ्थ बथ्थह भरै । नर नाहां नर नत्थ ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु० ॥ ६४ ॥ चालुक्य राजा भीम का अपने भाइयों के मारे जाने का समाचार सुन कर बहुत दुःखी होना ॥ गाथा ॥ फुट्टिय वत्त प्रहासं । अनिलं बसिजम परिमउयं ॥ सुनियं चालुक भीमं । सारँग सुत हंत चहुआनं ॥ छं० ॥ १०३ ॥ रु० ॥ ६५ ॥ जल्लियं चालुक नाथं । अग्गि विलत्तिय उच्चर मन्नायं ॥ मुक्किय नृप नीसासं । मंनिय दुष भ्रात अप्पायं ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ६६ ॥ भीम का पृथ्वीराज से भाइयों के पलटे में लड़ाई मांगना ॥ दूहा ॥ अति दुख मन्यौ भीम चिय । लिखि कग्गद चहुआन ॥ सत्त भ्रात मेरे हते । इहै बैर अप्पांन ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रु० ॥ ६७ ॥ ६३ पाठान्तर—इसां । चहुवान । जिसो । भारथ । द्रोणाचारिज । एम । इम । सिंहनीय । प्रथीराज । दुर्योधन ॥ ६४ पाठान्तर—जहां २ । तहां २ । होय । समय । हथ । बथह । भरैं । नृथ ॥ ६५ पाठान्तर—बत । सुनीयं । सारंग । चहुवांनं ॥ ६६ पाठान्तर-लग्गि । मनीय ॥ ६७ पाठान्तर—कगर । चहुवांन । सात । अप्पांन ॥

२६८ पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १८ पृथ्वीराज का उत्तर देना कि हम तयार हैं जब चाहै आओ ॥ सुनिय राज चहुआन वर । दिय कग्गद फिरि तेह ॥ जब तुम मंगौ बैर वर । तब हम बैर सुदेंच ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रु० ६८ ॥ भीम का चढ़ाई के लिये तय्यार होना पर सरदारों के कहने से वर्षा ऋतु भर ठहर जाना ॥ कवित्त ॥ बाँचि कग्गद चालुक्क । रोस लग्यौ अयान कह ॥ करो सेन सब एक । चलो अजमेर देस रह ॥ तब कह्यो बीर परधान । मास पावस्स रहैं घर ॥ करि कातिग घन कटक । छनै चहुआन सोम बर ॥ सुनि राज अप्प मन्यौ सुद्धिय । उत्तरु सब जन अवर नर ॥ उपसम्म रोस चालुक्क नृप । षिन षिन वित्तिय जेम थिर ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रु० ॥ ६९ ॥ उपसंहार का कथन ॥ दूहा ॥ रहै राज अजमेर मधि । संभरेस चहुआन ॥ निसि दिन यौँ क्रीला करै । ज्यौं अवतार सुकान्ह ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ७० ॥ इति श्री कवि चन्द विरचिते पृथिराजरासके कन्हाष्षपट्ट बन्धनं नाम पञ्चम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ५ ॥ ६८ पाठान्तर-कग्गर । मगौ ॥ ६९ पाठान्तर-बंचि । कग्गर । लगौ । अयासकह । अयासकहि । रहि । प्रधान । मांस । पावस । कात्तिक । मन्यौ । उपसंमि । वित्तोय ॥ ७० पाठान्तर-चहुवांन । यों । ज्यां ॥

अथ आखेटक वीर वरदान वर्णन समय लिख्यते ॥ ⁓⁓⁓ ( छठां समय ) पृथ्वीराज के कुँअरपने के तपतेज का वर्णन । कवित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । वर्ष विय सपत समर तन ॥ समुच्च तेज असहेंज । हरन तम शेर समर गन ॥ उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन लुच्च ॥ भुज भुजंग वर जोर । जोर ब्रंनह संचुन भुच्च ॥ अनभंग अंग जनु अंगदह । पवन पाइ आखेट सहि ॥ सँग डारि श्वान जीवन लषै । सवन अग्ग अपजह निवहि ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ कवित्त ॥ वर्षत सोभा नैन । मैन जनु मुदित सरित सर ॥ हरष हास मुख कंति । विकासि जनु कमल सूर वर ॥ मधुर सबद गुंजार । जानि गंभीर हरिय सद ॥ गयन गरुअ गज भंति । चलत कुल चालि वेद वद ॥ चहुआन सूर सोमेस सुच्च । धुअ जनु सुच्च अवतार लिय ॥ मन हरनि हरत मन पिष्पि कै । जनुँ विधिना अप हथ्थ किय ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ छंद पद्धरी ॥ रहै सुभट यह प्रथिराज संग । जै पैज गंग सुच्च कप्पि पंग । षट रस विलास अंनन अपार । भुक्तंत भोग भट सुभट लार ॥ छं० ॥ ३ ॥ १ पाठान्तर–सं० १६४७ की पुस्तक में इस का ऐसा पाठ है:–“कुअरपन पृथीराज । वर्ष विय बीस समर वरय । समुह तेज अस हेज । जोर ब्रंनह संचुन भय । भुज भुजंग वर जोर । हरन तरोर समरगन । उर किवार भुज वज्र । अंग वज्रंग पलन मन” ॥ बाकी दोनों तुक जैसे के तैसे हैं ॥ २ पाठान्तर–शोभा । नैन । मैंन । उदित । सरनि । कांति । विकसित । जांनि । कुलि । चहुआन । सुय । मंन । पिषिकैँ । हथ ॥

३०० पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २ सुरनाथ संग सुर सकल सोभ । बंसह छतीस चहुआन ओप ॥ नव कुलह मध्य नव नाग जानि । तिम जूथ मद्धि गज राज बानि ॥ कुं० ॥४ उडगनन मद्धि गुरदेव कंति । बरनी न जाइ सुत सोम भंति ॥ छह पंच मद्धि ज्यौं इनुअ लंक । तिम पिथ्य कत्थ बल परत बंक ॥कुं०॥५॥ नव ग्रहन मद्धि जनु सूर तोष । ढग भ्रम क्रम संमर अढोष ॥ क्रीडंत अंग रंगह हुलास । विश्नवा पुत्र जनुँ अनक वास ॥ कुं० ॥ ६ ॥ कर तांनि बान कंमांनि धारि । अनभूल घात नंधे उतारि ॥ अद्भुत बान विद्या अभंग । लहै दाव घाव वज्रंग अंग ॥ कुं० ॥ ७ ॥ पाइक अंक खेलत कितेक । गद्दि चिन सुदंत कुहंत एक ॥ आखेटनि पुन लखि जीव घात । गज सिंघ रिंछ कपि कोल पात ॥ कुं० ॥ ८ ॥ है लखै सक्क करि भेद खेद । दिष्षंत नयन सालोच भेद ॥ गज चिगक हूच्छ जानंत सब्ब । नाटक निवास सम सेस कब्ब ॥ कुं० ॥ ९ ॥ सम सिल्प सास्त्र वसु कंम क्रंम । सब वेद रीत रोपंत भंम ॥ यौं तपौ पिथ्य अजमेर मांचि । सोमेस सूर चहुआन छांचि ॥ कुं० ॥ १० ॥ छं० ॥ ३ ॥ पृथ्वीराज की दिनचर्या का वर्णन । कवित्त ॥ प्रथम जामि निसि रज्ज । कज्ज दैगै दिषत जगि ॥ दुतिय जाम संगीत । उक्त्व रस कित्ति काव्य जगि ॥ तितिय जाम भोजन । ससय चव जाम विलंघिय ॥ सुप्प सुलष उर अप्प । वारि अप्पी उर वंसिय ॥ घरियार रढिय बंदी पढ़िय । आनि सूर सोमेस जस ॥ उठि ब्रह्म मुहूरत गज बर । हय पष्षरिय सिकार रस ॥ कुं० ॥ ११ ॥ छ० ॥ ४ ॥ ३ पाठान्तर-प्रथीराज । कपि । अनन । ज्यो वंश । छतीश । चहुवांन । उप । मधि । जानि । मधि । प्रथीराज । बांनि । मंधि । गुरदैव । जाय । मधि । ज्यौं । पिथ । कथ । मधि । समेर । विलास । बांन । अनभूल । वांन । पायक । अंग । अन । सिंह । रींछ । यह । हय । सक । दिषंत । चिगिकू । हूछ । शिल्प । शासन । यों । पिथ । छाह ॥ ४ पाठान्तर-जांमि । निसरज । काज । दिषत । जांम । त्रतीय । जांनि । भोजन । समप । जांम । बिलसीय । अप । अप्पियं । वंसीय । बंदिन । ब्रह्म । महूरत । पपरीय ॥

छठां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ३०१ पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना । कवित्त ॥ कर पद मत्त धनुष्ष । ढाल आनन सुचक्क रथ ॥ पटह छींस घन सह । विपुछ बद्धीय समग पथ ॥ इक बंधिय इक बधिय । एक भंभिय भ्रम भीर ॥ इक्क सु मृग विफुरीय । इक्क चिकरीय दीन सुर ॥ कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन । दिग्घ सह दिग अंत भौ ॥ संकिय सयल्ल जिम रंक उर । द्रुम अरन्य आतंक भौ ॥ छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ ५ ॥ अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना । कवित्त ॥ जंगल धर सुकुमार । करत आखेट सपत्तौ ॥ संग सूर सामंत । गहन गिरि बोह सुरत्तौ ॥ एक सहस सँग स्वान । एक सत चीते संगह ॥ उभै सत्त सँग हिरन । करत मन पवन सुभंगह ॥ सम विषम विचर वन सघन घन । तहां सव्य जित तित्त धुन्न ॥ भूल्यौ सुसंग कवियन वनह । और नचीं जन संग दुन्न ॥ छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ६ ॥ एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना । दूहा ॥ विपन विचर जपल अकल, सकल जीव जड जाल ॥ परसंपर बेली विटप, अवलंबि तरु तमाल ॥ छं० ॥ १४ ॥ सघन छांह रवि करन चष, पग तर पसु भजि जात ॥ सरित सोह सम पवन धुनि, सुनत श्रवन झचनात ॥ छं० ॥ १५ ॥ गिरि तट इक सरिता सजल, झिरत झिरन चिहुँ पास ॥ सुतरु छांह फल अमिय सम, बेली विसद विलास ॥ छं० ॥ १६ ॥ ५ पाठान्तर-घत्त । धनुंक । धनुंक । धनुप । आंनन । चक । चध । सद। बदिय । दृक । म्रगा । बिफुरिय । चिहु । उर । दिघ । भ्रंस । सकल । सयलं ॥ ६ पाठान्तर-करन । आखेटक । संपतौ । हृद । बोहर । संग । साथ । त्तिंत । भूल्यो । कबियन ॥

३०२ | पृथ्वीराजरासो । | [छठां समय ४] तहां सु अँबतर॒ रिषि इक, अस तन अंग सरंग। दव दह्यौ जनु द्रुम कोइ, कै कोइ भूत भुअंग ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ ७ ॥ गाहा ॥ जप माला म्रिग छालो । गेटा विभूतं जोग पहार्यं ॥ कुविजा खप्पर धय्यं । रिद्धं सिद्धाय बचनयं मभं ॥ कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ८ ॥* कविचन्द का ऋषि के पास जाकर पूछना कि आप कौन हैं ? दूहा ॥ चंद पिषि चर्यौ सुमन, इक कोइ रूप अलेष । पग परसैं दरसैं दरस, उत्तिम भूत अशेष ॥ कूं० ॥ १९ ॥ करि बंदन कविचंद कहि, को तुम आदि अनादि । तुम दरसन बिन दिन गए, ते सब बीते वादि ॥ कूं० ॥ २० ॥ तुं † धाता करतार तुं ,भरता चरता देव। तुं दत्ता गोरस तुची, प्रसन होउ प्रभु मेव ॥ कूं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ ९ ॥ ऋषि का पूछना कि तुम कौन हो इस बीहड़ बन में कैसे आए । दूहा ॥ कहै जंगम तुं कौन नर, क्यों आगम ह्वां कीन । जीव जंत घन विघन बन, जीव जीव बल छीन ॥ कूं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ १० ॥ चन्द का अपना परिचय देना । गाहा ॥ दरसन देव मुनिंदं । चंदं विरहं च दुप्पदं दायं ॥ अव मुक्का कम्म सुफलियं । दिष्पे सुफल रूप तपसीयं ॥ कूं० ॥ २३ ॥ देवान वरं सिद्धाण दरणं । गुरं नरिंद सनमानं ॥ गय भुम्मि दब्ब नट्ठा । पां मिज्जे पुण्य रेहायं ॥ कूं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ ११ ॥ ७ पाठान्तर—उपरल । परस्पर । अवलंबि ॥ १४ ॥ झूहनांत । झहनाट ॥ १५ ॥ गिर । भरत । भरन ॥ १६ ॥ अंतर । तह । जती । अंग न रंग । द्रुम ॥ १७ ॥ ८ पाठान्तर—विभूत । पटार्य । मभं । मंमं ॥

  • यह रूपक सं० १६४७ वाली पुस्तक में नहीं है । ९ पाठान्तर—पिषि । को । परसों । दरसों ॥ १९ ॥ तूं । भर्ता । तूं । दंता । तुहीं । होहि ॥ २१ ॥ † यह संस्कृत त्वम् का पहिला हिन्दी रूप है । .१० पाठान्तर—जती । तूं । कौंन ॥ ११ पाठान्तर— गाथां । दंसनं । चंदं न विरहं इदेहं दंदायं । चंदम । दंदाई । कर्म । दिषे । सकल ॥ २३ ॥ सिद्धान । दसनं । भूमि । भूमि । पा । मिजै । पुन्य । रेहा इं ॥ २४ ॥

छठां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३०३ दूहा ॥ भद्द जानि कवियन नृपति, नाथ नाम सो चंद । आनस में गंगा बही, अव्व गए सब दंद ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥ जती का प्रसन्न होकर एक मंत्र बतलाना जिसके वश में बावन बीर हैं । कवित्त ॥ प्रसन्न चंद सम जतिय । दिन्न इक मंच दृष्ट जिय ॥ इष्ट आराधत भद्द । प्रगट पचास बीर विय ॥ करि साधन इष्ट साध । व्याधि नासत फल धारिय ॥ गुरु उपदेसद्द पाइ । सकल आधीन अकारिय ॥ धरि कान मंच लीनौ कविय । परसि पाइ अग्गै चलिय ॥ करवे सुपरिप्पा मंच की । रचि आसन अग्गैं बलिय ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥ चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और बीरों का प्रगट होना । दूहा ॥ भली बुरी निर्मित कछू, मेटि न सक्कै कोइ । याही सों भवतव्यता, कहत संयाने लोइ ॥ छं० ॥ २७ ॥ पसु आखेटक करन कौं, संग नृपति वरदाइ । ऐसे में इष्ट भावई, अकसमात हुअ आइ ॥ छं० ॥ २८ ॥ मंच परिख्या करन कौं, बन मझ बैठ्यौ चंद । रचि रचना सुचि स्नान करि, धूप दीप पढ़ि छंद ॥ छं० ॥ २९ ॥ रचि आसन्न गनेस मँछ, सिद्धि बुद्धि लखि लाभ । पुनि मंचह भैरव जपत, उक्कु गरजिय अभ ॥ छं० ॥ ३० ॥ गैन गद्दर गंभीर धुनि, सुनि ससंक भय गात । आनन अग गच्च गंज हुअ, जानि उलक्का पात ॥ छं० ॥ ३१ ॥ सुप दाता माता पिता, सेवक सरन सधार । उपवन बैठे चंद जहँ, द्वै पचास पधार ॥ छं० ॥ ३२ ॥ मंच जंच धारंत मन, आकर्षे जब चंद । प्रगट दरस दीने सबन, कवि उर बध्यौ अनंद ॥ छं० ॥ ३३ ॥ १२ पाठान्तर-नृपति । नांम । आल समैं । आल समय । अब ॥ १३ पाठान्तर-दीन । भट । प्रंचास । ए । नासन । धारीय । अकारीय । पाय । अगों । आगै । करनें । करनैं । परंख्या । अगों ॥

३०४ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ६ महा पुरुष पिष्षै जबै, तब सुअ हरष सरीर। दंडव्रत अंजुलि करिय, मन आनंद सधीर ॥ कूं० ॥ ३४ ॥ दू० ॥ १४ ॥ बीरों के रूप आदि का वर्णन ॥ कंद पद्धरी ॥ आनंद चंद दरसंत इंद। सोभा सुभंत वज्रंग दंड ॥ तन तेज तरनि ज्यौं घनह श्रोप। प्रगटी कि किरनि धरि अगिन कोप ॥३५॥ चंदन सुलेप कस्तूर चिच । नभ कमल प्रगटि जनु किरन मिच ॥ जनु अगनित नग छवि तन विसाल। रसना कि बैठि जनु भ्रमर व्याल॥३६॥ मृग मद अयूष जनु पिउष पान। प्रभु मुदित मगन नासा रसान ॥ मईन कपूर छवि अंग हंति । सिर रची जानि विभूत पंति ॥ ३७ ॥ कज्जल सुरेश रचि नेन पंति । सुत उरग कमल जनु कोर पंति ॥ चंदन सुचिच रुचि भाल रेश । रजगुन प्रकासतें अरुन भेष ॥ ३८ ॥ रोचन लिलाट सुभ मुदित मोद । रवि बैठि अरुन जनु आनि गोद ॥ घूंघर घसंकि पाइन विसाल । नृत्तंत जननि जनु अग्ग बाल ॥ ३८ ॥ धूसरस भूर बनि वार सीस । छवि बनी मुकट जनु जटा ईस ॥ बनि विसद कंठ इक्क बेलि माल । आभाति उडग्गन निसापाल ॥ ४० ॥ चंपकनि पुहुप बनि कंठ कांति । रस रमत अमर जनु पीत पंति ॥ नृत्तंत एक संगीत अंत। नारद रिझि कर धरत तंति ॥ ४१ ॥ इक्क परत बध्य इक्क खरंत छय्य । गज नहनि केलि जनु सरित सध्य ॥ इक्क प्रगट होत इक्क दुरै जात । परसंत परस्पर सुमन दात ॥ ४२ ॥ क्कित एक होत गिर गरुअ देह । गरजंत एक जनु घटा मेह ॥ इक्क उघटि सब्द संगीत ताल । इक्क पढत भाष नागह विसाल ॥ ४३ ॥ इक्क ब्रह्म पोष सम करत घोष । पौरांनं प्रगट इक्क वचत मोष ॥ दाढाय इक्क चवैत फुनिंद । इक्क धरत ध्यान जानिक मुनिंद ॥ ४४ ॥ इक्क गरनि मुंड मुष रुंड एक । कुंजर सधार गिर तरन तेक ॥ इक्क मुष्य अगिग ज्वाला उठंत । इक्क परह देह बरिषा उठंत ॥ ४५ ॥ १४ पाठान्तर-निमित । भवितव्यता । सयानं ॥ २७ ॥ को । नृपति । असैं । आय ॥ २८ ॥ परिष्या । को। बैठौ । स्रान । परि । चंद ॥ २९ ॥ गनर्डस । तहां । बुधि । उक । गरजिय ॥ ३० ॥ गगन । आंनन । अंगं । गय गंज । औ । जानिक । उलका ॥ ३१ ॥ जहां । तहां द्वै ॥ ३२ ॥ धारता । आकर्षे । बढयौ ॥ ३३ ॥ पुरुष । पिषे । जबैं । हर्ष । शरीर ॥ ३४

एका करत गाज चिक्कार एक । इक सहत सुद्रुत गिरि उड़त केक ॥ इक करत रूप गिरि सिषर कोइ । एका रूप बहुत इक एक होइ ॥ ४६ ॥ धसकंत धरनि इक खात घात । इक स्वास उड़त उपवनह पात ॥ पिपीय चरित ए चंद भट । हर्षित हुल्लास मन में अघट ॥ ४७ ॥ रोमंच अंग उब्भार देह । भैभीति भंति तहँ दिषि एह ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ १५ ॥ कवित्त ॥ जिन देवन दरसंत । देव दानव चिय संकचि ॥ किंनर जप गंध्रब्ब । सर्व सनमुख जिन कंपचि ॥ सिध साधक जिन दरसि । तरसि संकट थिय विखम ॥ महाबीर वलवंत । कचन सचि सकै तिनं क्रम ॥ अद्भुत चरित चंदह चरचि । सुर विचित्त चिय हथ्थ क्रिय ॥ आराधि संच मन ताप सह । सावधान सम्भारि जिय ॥ छं०॥४९॥रू०॥१६॥ दूहा ॥ फुनि सुदिष्ट दूरी करन, अकल भयानक भीर । विना मंत्र को वसि करै, महाकाय वे वीर ॥ छं० ॥ ५० ॥ अनरिति फल काहू करन, किहिकर अनरित फूल । दिव्य वस्त्र काहू करन, नाना वरन अचूल ॥ छं० ॥ ५१ ॥ सत्त मंत को दिष्यित, रज मय के दीसंत । तामस के पिष्ये प्रबल, क्रोध कलह किरतंत ॥ छं० ॥ ५२ ॥ को इक कुंजर मद वहत, कोइक सिंघ सरूप । को इक पन्नग विष गरल, को इक दिष्यित भूप ॥ छं० ॥ ५३ ॥ ब्रह्मरूप को इक बढ़त, को इक तापस भेष । जूप रूप तसकर सुको, छिन में भेष अलेष ॥ छं० ॥ ५४ ॥ अग्निज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह । चक्र पवन डंडूर को, केतन कंकर षेह ॥ छं० ॥ ५५ ॥


१५ पाठान्तर-ज्यों । उप । आन ॥ ३५ ॥ अग्नित । अमर ॥ ३६ ॥ सिगमद । पियूप । पानि । अंगहुंति । विभूति ॥ ३७ ॥ नैन । प्रकाश ॥ ३८ ॥ आंनि । घुघर । घर्मकि । पांयन । रसाल । नृत्यंत । अग ॥ ३९ ॥ वेलि । आभाकि । उड़गन । निशापाल ॥ ४० ॥ नृत्यंत । नारद । रीझ ॥ ४१ ॥ हथ । तरुन । स्वस्थ्य । दुरे ॥ ४२ ॥ शब्द ॥ ४३ ॥ ब्रह्म पोपं । पोरान । एक । ध्वांन जांनि कै । जान कि । मुष । अग्नि । बुठंत ॥ ४५ ॥ चिकार । उठंत ॥ ४६ ॥ घमकंति । स्वांस । पिपिय । पिष्यिय । चरित्रं । भट । मैं । अघट्टि । ॥ ४७ ॥ उभार । भय । तहां । दिषि ॥ ४८ ॥ १६ पाठान्तर-जप्प । गंधर्व । सिद्ध । महावीर । अदभुत । चरितं । हथ । सावधानं ॥

३०६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय ८ सुमन दृष्टि कोइक करत, के फल अन्न रसंस । रुधिर मंस तन चमकते, आप परस्पर संस ॥ छं० ॥५६॥ रू० ॥ १७॥ चन्द का बीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥ दूहा ॥ दिषि चंद आनंद मन, धनि मुझ गुर उपदेस । महा पुरुष पिषे प्रसन, ओ मन मिटि अंदेस ॥ छं० ॥ ५७॥ रू० ॥ १८ ॥ चन्द का बीरों की पूजा करना ॥ कवित्त ॥ सनमुख अंजुलि जाई, करी दंडौत सबन कहुँ ॥ कुसुमंजलि सिर मंडि । धूप नैवेद समुच्च सहुँ ॥ आरति सबनि उतारि । नयन नैनह सब मिलिय ॥ रहे पिषि सब बीर । जांनि पंनग वच षिल्लिय ॥ किंनो सुभ गति भव भवना । चित चंचल सुस्थिर करिय ॥ भय चंद चंद तन मन प्रसन । अस अछूत पुज्जिय रखिय ॥ छं०॥५८॥ रू० १८ ॥ चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशासन मंत्र ग्रहण करना ॥ कवित्त ॥ जिन बीरन बसि करन । जोग जोगी हठ मंडहि ॥ जिन बीरन बसि करन । दुंद आराधन तंडहि ॥ जिन बीरन वसि करन । चरन सत गुर अभ्यासहि ॥ जिन बीरन बसि करन । प्रेत भूतन विसवासहि ॥ सो बीर पंच हुअ सहज सें । जती एक परसाद किय ॥ प्रथिराज भाग बरदाहु बर । सचु समन् इह मंच दिय ॥ छं० ॥ ५८॥ रू० ॥ २० ॥ क्षेत्रपालों (बीरों) का पूछना कि हम लोगों को क्यों बुलाया है ॥ १७ पाठान्तर—करण । भयानक । बे ॥ ५० ॥ काहूं कद्दण । बर्षे ॥ ५१ ॥ सत । मत । दिषियत । में । पिषे । कृत्यंतं ॥ ५२ ॥ पंन्नग । दिषित ॥ ५३ ॥ कोई । भेस । अभेस ॥ ५४ ॥ बरसं । मंदूर ॥ ५५ ॥ केइ । करतह । रसस । मंतं । आपस पद परसंस ॥ ५६ ॥ १८ पाठान्तर—दिषि । पिषे । प्रसंन । अंदेश ॥ १९ पाठान्तर—जाई । दंडोत । कहौं । कहुं । नैवद । सहौं । सहुं । सबन । नैन । नैनन । मिलिय । पिषि । जांनि । खिलिय । किनी । भवना । सुथिर । प्रसंन । पूजित ॥ २० पाठान्तर-अधंम आतम भ्रम मंडहि । वाशिकरन । विसवासहि । सोइ । पृथ्वीराज । शत्रु ॥

छठां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३०७ दूहा ॥ बेतणउ तव चंद सौं । किन्न हुकम तुंफेव ॥ जंच संच आराध हुत । क्यौं आकर्षे सेव ॥ छं० ॥ ६० ॥ रू० ॥ २१ ॥ चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥ साटक ॥ आकर्षय च देव सेव सवयं, पिथ्यं हितं कारनं । विपमं वंक सहाय आय.भहं, घहं भया भैकरं ॥ इच्छेयं मन पेमयं च वरयं, दंडं दत्तं दारुनं । श्रीवीराधि सुरिंद चंद नमयं, चर्नस्य सर्नागतं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ रू० ॥ २२ ॥ चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे आप राम-रावण आदि की लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही पृथ्वीराज की भी करना ॥ कवित्त ॥ मद्दनि मच्चि जब सुरनि । जुद्ध असुरां सुर जब्बह ॥ अमरन अमिय अभीय । मोहि असुरन तव तब्बद्द ॥ काली सुर मच्छिास । त्रिपुर जित्तिय महिषासुर ॥ जालंधर भसमास । राम दसकंध अभंगुर ॥ जहँ जहँ सुदेव वंकम परिय । करिय अभय तुम देव तव ॥ देवाधि देव दानव दलन । चरन सरन हम रप्पि अब ॥ छं० ॥ ६२ ॥ रु० ॥ २३ ॥ बीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़ पड़े तब स्मरण करना ॥ कवित्त ॥ षिनक मैंण'रचि देव । बचन चंदह उच्चारिय ॥ हम प्रसंन तुझ सेंव, सुनहु भटं सुभ कारिय ॥ समर संग तुअ राज, जब सु संकट षल जानिय । तहाँ सुमरंत सु चंद, दंड हंनिहैं सुन मानिय ॥ २१ पाठान्तर-सों हुकंम । सु ॥ २२ पाठान्तर-पिथं । वंक । सुभटं । घंटं । इच्छेयं । सुरीदं । चरनस्य । सरनागतं ॥ २३ पाठान्तर-मह्न । प्रचि । असुरांन । जबह । अमिय । अमीय । मोह । तबह । रांम । दसमथ । जहां २ । संकट । रषि ॥

सिर धारि चंद बाचा लइय, सदा प्रसन सेवक रहै । करि क्रिपा नाथ भहं सरिस, विवरि नाम बीरन कहै ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २४ ॥ भैरव का एक बीर को आज्ञा देना कि सब बीरों का नाम बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥ दूहा ॥ तब भैरव इक गन सरिस, किंन हुकम घर नंद । विवरि नाम वीरन सबन, कहि पिछनावहु चंद ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २५ ॥ सब बीरों का नाम गुण कथन ॥ दूहा ॥ वज्रपाट ता नाम गन । घन तन घोर भयंक्क ॥ पृथुक नाम बरनत सबन । सुनत मिटै तन संक्क ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ २६ ॥ छंद पद्धरी ॥ गुन ईस चरन गुन गहर गाइ । फल सिद्धि बुद्धि जा नाम पाइ ॥ बानिय प्रसंन जो प्रथम होइ । करौं प्रसन बीर पचास दोइ ॥ ६६ ॥ आहूक्क बीर यह प्रथम खेव ॥ तिचि प्रसन प्रसन सब जानि देव ॥ वपुलाडू बीर हंनत बिनोद ॥ जिचि प्रसन सदा आनंद सोद ॥ ६७ ॥ बुँदिआइ बीर बन्दौ सनेह ॥ जल मय सुथलनि करि करसि सेह ॥ आनल्लप्रचारिय प्रबल बीर ॥ जिचि जुरत दनुज अरधरै भोर ॥ ६८ ॥ नारीय क्रीडनह दोड कोडू ॥ ब्रह्मा उपास करै टूक दोडू ॥ सूचीय अंज अनगंज बीर ॥ बज्रह सुभंजि दोइ करै चीर ॥ ६९ ॥ समसान लोटना बीर बंक ॥ तिचि पीर भीत अन संक भंक ॥ गढ उपडनाडू तो बीर नाम ॥ क्रोधंत कूट नह लखै ठाम ॥ ७० ॥ सामुद्र तिरन हूह बीर बाव ॥ सप्तम समुद्र मनु वहत बाव ॥ सामुद्र सोष अनभंग बीर ॥ दनु देव समुद्रन घरत नीर ॥ ७१ ॥ २४ पांठान्तर-मोंन । वचन । उच्चारिय । उच्चारीय । प्रसन । हुव । हुअ । भटं । कारीय । जानीय । तहां । दंड हमें सनमानीय । सनमांनिय । सदां । प्रसंन । करिं । भट्ठह । बिचारि । नांम । कहैं ॥ २५ पाठान्तर-दोहरा । नांम ॥ २६ पाठान्तर-नांम । पृथक । प्रयुक्त । बरनन । मिटे ॥