पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
२२ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व दूहा ॥ करियै भक्ति कवि चंद हर । हरि जंपिय इह भाइ ॥ ईस स्याम जू जू कहै । नरक परंतच जाइ ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रू० ॥ ३२ ॥ श्लोक ॥ परात्परतरं यांति । नारायण परायणं ॥ न ते तत्र गमिष्यंति । ये दुष्यंति महेश्वरं ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रू० ॥ ३३ ॥ साटक ॥ गंगाया अगुलत्त वसनं मसनं, लच्छी उमा दोवरं ॥ संख्ं भूत कपाल माल असितं, वैजंति माला धरी ॥ चर्म मद्य विभूति भूतिक युगं, विभूति साया क्रमं ॥ पापं विचरति मुक्ति अप्पन वियं, बीयं वरं देवयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ३४ ॥ ॥ कवि की आशा का स्वरूप वर्णन ॥ गाहा ॥ आसा मच्चीव कव्बी । नवनववित्तीय संग्रहं ग्रंथं ॥ सागर सरिस तरंगी । वोहत्थयं उत्थियं चञ्चयं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥ ३५ ॥ ॥ चंद का काव्य समुद्र कैसा है ॥ दूहा ॥ काव्य समुद्र कवि चंद कृत । सुगति समप्पन ग्यान ॥ राजनीति बोहिथ सुफल । पार उतारन यान ॥ छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ३६ ॥ छंद प्रबंध कवित्त जति । साटक गाह दुहत्थ ॥ लघु गुर मंडित खंडिय, छ । पिंगल अमर भरत्थ ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ३७ ॥ ३२ पाठान्तरः - करिये । ३३ पाठान्तरः - यांति । ज्ञे । यह श्लोक चंद के शुद्ध संस्कृत काव्य रचन का प्रथम उदाहरण है ॥ ३४ पाठान्तरः - अगुलत्त । वसनमसनं । लछी । कपालमाल । चमभूतिकयुगं । मायाक्रमं । मुक्तिं । वरंदेवयं ॥ ३५ पाठान्तरः - क्रित्ती ॥ ३६ पाठान्तरः - ग्यांन । यांन । ३७ पाठान्तरः - भरत्य ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । २३ ॥ कोई अशुद्ध पढ़ने वाला चंद को काव्य-संबन्धि दोष न दे ॥ कवित्त ॥ अति ढंक्यौ न उघार । सलिल जिमि छिप्पि सिवालह ॥ वरन वरन सोभंत । चार चतुरंग विसानह ॥ विमल अमल वानी विसाल । वयन वानी वर अंनन ॥ उक्तिन वयन विनोद । जोइ स्रोतन सन अंनन ॥ युत अयुत जुक्ति विचार विधि । वयन छंद हुक्यौ न कछ ॥ घटि बढ़ि मति कोई पढ़इ । तौ चंद दोस दिज्जो न वह ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ३८ ॥ ॥ इस ग्रंथ में चंद ने क्या २ कथन किया है ॥ श्लोक ॥ उक्ति धर्मे विशालस्य । राजनीति नवं रसं ॥ षट् भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रू० ॥ ३६ ॥ ॥ रासे को रसिया सरस उच्चारैं ॥ कवित्त ॥ चरन नीम अच्छिर सुरंग । पाट बहु गुरु विधि संडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष्प । उक्ति रस गौरव नि छंडिय ॥ जुगति छोह विस्तारिय । सीढियन घाट सु बहिय ॥ मछि मंडन सेधान । याहि संडन जस सहिय ॥ ३८ पाठान्तरः - पिप्पि । विशाल । विच्चार । पढई । दिज्जो । दिन्नै । ३९-कवि का यह संस्कृत श्लोक हमारे पाठकों के सदा ध्यान में रखने योग्य है इस के सूक्ष्म विचार से हम जान सक्ते हैं कि पटभाषा और कुरान की भाषा के जो २ शब्द इस महाकाव्य में प्रयोग हुए हम देखते हैं वह कवि ने जानकर प्रयोग किये हैं और कुरान की भाषा के शब्दों के प्रयोग का विषय कोई आश्चर्यदायक भी नहीं है क्योंकि मुसलमानों का प्रवेश भरत- खंड में शहाबुद्दीन गोरी के बहुत ही पहिले हो गया है । इस के अतिरिक्त हम को यह भी निश्चय मानना चाहिये कि चंद संस्कृत भाषा में निपुण था और षट्भाषा और कुरान की भाषा से भी अपरिचित नहीं था और जो २ छंद इस महाकाव्य में संस्कृत भाषा में लिखे हमारे दृष्टि आते हैं वह उस की संस्कृत-काव्य-रचन शक्ति के उदाहरण रूप हैं । यह श्लोक चंद के माने हुए पिंगल छंद सूत्रम् के अनुसार लौकिक अनुष्टुप अर्थात् अष्टात्तर पद छंद है । इस रूपक के विशेष पाठान्तर अन्य पुस्तकों में दृष्टि नहीं आते किन्तु केवल विशालं के स्थान में विसालं और पुराणं के स्थान में पुरानं पाठ हैं ॥ ४० पाठान्तरः-अछिर । सुरंग । समुष्पं । मुप्प । गैपिंत । सिढियन । मेधान । याहि । चित्ररंग । विश्वकर्म कर्म । उच्चारिय ॥
२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व .घन तर्क उतर्क वितर्क जति । चिच रंग करि करि. अनुसरिय ॥ विश्वकर्म कवि निर्मेइय । रसियं सरस उच्चरिय ॥ ॥ छं० ॥ ८४ ॥ रू० ॥ ४० ॥ ॥ रासे का तत्त्वज्ञान कैसे होगा ॥ अरिल्ल ॥ तर्क वितर्क उतर्क सु जत्तिय । राज सभा सुभ आसन अत्तिय ॥ कवि आदर सादर बुध चाचौ । पढ़ि करि गुन रासौ निर्बाचौ ॥ ॥ छं० ॥ ८५ ॥ रू० ॥ ४१ ॥ धर्म्म अधर्म्म न बुद्धि बिचारौ । नयन नारि नियन नेह निचारौ ॥ कोक कला कज केलि प्रकासौ । अरथ करौ गुन रासौ भासौ ॥ ॥ छं० ॥ ८६ ॥ रू० ॥ ४२ ॥ पारासर जो पुत्त विचासद्द ॥ सतवंती ग्रब्भं गुर भासद्द ॥ प्रब्ब अठार सवा लष लष्यै । तौ भारथ गुर तत्त विसष्यै ॥ ॥ छं० ॥ ८७ ॥ रू० ॥ ४३ ॥ ॥ जो रासे को सुगुरु से पढता है वह कुमति नहीं दरसाता ॥ कवित्त ॥ रासौ बर बुद्धि सिद्धि । सुद्धि सो सब्व प्रमानिय ॥ राजनीति पाइयै । ग्यान पाइयै सु जानिय ॥ उकति जुगति पाइयै । अरथ घटि वढि उन मानिय ॥ या समान गुन आप । देव नर नाग बखाणिय ॥ अंविभ्रत भंत व्रतच गुनित । गुन चिक्कण सरसइय ॥ जो पढ़य तत्त रासौ सुगुर । कुमति मति नहिं दरसइय ॥ ॥ छं० ॥ ८८ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ ४१-४३-इस रूपक के छंद का नाम कवि ने अरिल्ल प्रयोग किया है कि जिस का लक्षण यह है :- ॥ अरिल्ल ॥ लघु दीरघ को नेम न कीजै । ऐसे ही तुक चार भरीजै ॥ षोडश कला कली बिच धारै । छंद अरिल्ला शेष उच्चारै ॥ पाठान्तर :- सुजतिय । मतिय । पढ़ि शब्द के पहिले तौ शब्द का पाठ पुस्तकान्तर में विशेष है । पटि । नारिनिय । कौक । कंन्नाकल । अरथ शब्द के पहिले तौ शब्द किसी २ पुस्तक में विशेष है । ग्रभं । लख । लखै । नारथ ॥ ४४ पाठान्तर :- राज । नीति । पाईयै । उक्ति । पांइयै । पांईयै । उन । मांनियं । व्रतह । सरसइय शब्द के पहिले किसी २ पुस्तक में मध्य शब्द का विशेष पाठ है । सरसईयं । दरसईयं ॥
आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासो । २५ ॥ रासा किस को अच्छा और किस को बुरा प्रतीत होता है ॥ दूहा ॥ कुमति मति दरसंत तिहिं । बिधि बिना न अव्वान ॥ तिहिं रासौ जु पवित्र गुन । सरसौ बन्न रसान ॥ ॥ छं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ४५ ॥ ॥ इस ग्रंथ के काव्य की संख्या का कथन ॥ दूहा ॥ सत सहस नष सिष सरस । संकल आदि मुनि दिष्य ॥ घट बढ मत कोऊ पढौ। मोहि दूसनं नवसिष्य ॥ छं० ॥ ९० ॥ रु० ॥ ४६ ॥ ॥ रासे के ढँके हुए अर्थ के विषय में कवि का कथन ॥ गाहा ॥ अरथं ढंकिन सहसा । उघारै वनत्थि एकलया ॥ मभझं मभझ प्रमानं । चतुर स्त्री चारयं जेमं ॥ छं० ॥ ९१ ॥ रु० ॥ ४७॥ ॥ इस ग्रंथ के विष का संक्षेप कथन ॥ कवित्त ॥ दानव कुल छत्रीय । नाम ढुंढा रष्स वर ॥ तिहिं सु जोत प्रथिराज । सूर सामंत अस्ति भर ॥ जीह जोति कवि चंद । रूप संजोगि भोगि श्रम ॥ इक्क दीह उपन्न । इक्कं दोहै समाय क्रम ॥ जथ कत्थ तथ्य होइ निर्मये । जोग भोग राजन खत्तिय ॥ बज्रंग बाहु अरि दल मलन । तासु कित्ति चंदह कत्तिय ॥ ॥ छं० ॥ ९२ ॥ रु० ॥ ४८ ॥ अरिल्ल ॥ प्रथम राज चहुवांन पिथ्य वर । राजधान रंजे जंगल धर ॥ मुष सू भट सूर सामंत दर । जिन्हि बंध्यो सुरतांन प्रान भर ॥ ॥ छं० ॥ ९४ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ ४५ पाठांतर:-दरसंन । तिहि । तिहि । रसानं ॥ ४६ पाठांतरः-कोऊ ॥ इस में “सत सहस” से कवि एक लाख की ग्रंथ संख्या बताता है और यह भी कहता है कि घटं बढं पठ करके मुझे दोष मत देना । कोई २ कवि जो यहां सत शब्द से सात का अर्थ अनुमान करते हैं वह मेरी सम्मति में अयुक्त प्रतीत होता है ॥ ४७ पाठांतरः-ढकिनं । नवत्थियं । मझ । मझ ।- ४८-५० पाठांतरः-रष्षसं । तिहि । जिह । संजोगी । भोगी । उपन्ने । जोगराज । नाल- हिय । बज्रंगबाँहुं । अरि दलं मलनं । कुत्तीं । चंदं ॥ ४७ ॥ सुर ॥ ४८ ॥ मित्त । बंधो । कित्ति । अष्यो । तिथि ॥ ४९ ॥
२६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व अरिल्ल ॥ हं कवि चंद मित्त खेवच पर । अरु सुचित सामंत सूर बर ॥ बंधौं कित्ति प्रसार सार सच । अछ्छों बरनि भंति थित्ति थह ॥ ॥ छं० ॥ ९४ ॥ रू० ॥ ५० ॥ ॥ राजा परीक्षित की तक्षक दंशन और जन्मेजय की सर्पसत्र कथा ॥ हनुफाल ॥ इति हनूफालय छंद । कल बरनि बरनि सुकंद ॥ नहि नाल पिंगल जोर । दुज हुंतो दुजनिय भोर ॥ ९४ ॥ संसार बंधन दोय । इक पर्यौ विद्य समाय ॥ तन देहू अच्छर एक । नहिं पिंग पिंगल सेक ॥ ९५ ॥ किचि काज मरन सुविप्प । लहि नाग रूप सु अप्प ॥ हरि हस्यौ बाचन आइ । तिहिं कह्यो पिंगल चाइ ॥ ९६ ॥ द्वै विद्य रूप सु अङ्ग । खो गयौ छल करि सङ्ग ॥ खो तच्छ बीर प्रमान । जुग जुगनि निश्चल ध्यान ॥ ९७ ॥ इक हुंतो सिंगिय रिष्य । तप करै बाल विसिष्य ॥ नृप गयौ बर आखेट । दिषि अप्य मृतक बेट ॥ ९८ ॥ बाराह रूप प्रमान । लग्गयौ सु ब्रह्म धियान ॥ दह बार बूझ्यौ राज । दुज दिय न उत्तर काज ॥ ९९ ॥ लखि चित्त विच सपूत । यां भयो रिष अवधूत ॥ रूंध्यो ताम तामस राज । लियो गीन मंच विराज ॥ १०० ॥ कस्सान कोनक्क संधि । नृपराज दुज गलबंधि ॥ फिरि गयो ग्रेह प्रमान । आयो सु बालक थान ॥ १०१ ॥ ५० दृष्टि में रखने की बात है, जैसे महाभारतादि महापुराणों में समग्र ग्रंथ के आशय का सार एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार श्लोकों में वर्णन किया गया है वैसे ही चंद ने भी अपने इस महाकाव्य का सार इन ( ४८ से ५० तक ) तीन रूपकों में वर्णन किया है ॥ ५१ पाठान्तरः-हनुफाल । हनूफाल । विह्यस । मोय । न । न । अच्छर । हर्यो । तिहिं । चायि । द्वे । तंछ्य । जुगिंनि । हुंतो । रीष्य । बालवि । सिष्य । बुझ्यौ । दियऊ । चित्र । चित्रस । कोनक्क । नवि । तुल्लि । तिहिं । अति लोल दिषि रिषि लोड । लोई । समोई ॥ हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद कवि ने इस कथा को महाभारत के आदि पर्व के अध्याय ४० से ५८ तक और भागवत के पहिले स्कंध के अध्याय १८ और १६ और दूसरे स्कंध के पहिले १ अध्याय से उद्धृत और संक्षिप्त करके वर्णन कियो है । यदि कोई इस कथा
आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासौ । २६ खिजि कच्चौ नैन भरीव । तस नाम रूप सरीव ॥ पै जुन्न बालक बुद्धि । गलि गर्भ क्यौं न वितुद्धि ॥ १०२ ॥ तिच्छि तजिय तात ह्मान । धरि कोप अंग निधान ॥ करि क्रोध अंखि सुरत्त । छविजानि लग्गिय लत्त ॥ १०३ ॥ जिहि जियत पुच्च अप्प । को तांत लब्भय दप्प ॥ रिस करौं जोब प्रमान । जरै तीन लोक अमान ॥ १०४ ॥ रिस तेज कंपत बाल । दिप्यो सु तात विसाल ॥ वह लग्गि ब्रह्म धियान । भयौ कोटि तामस नाम ॥ १०५ ॥ अति ना रत्न दिखि रिखि लोइ । दिख्या सु तात समोइ ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ५१ ॥ कवित्त ॥ जोरि हत्थ थुति संच । फिर्यो पर दच्छि लग्गि पथ ॥ रुधिर नयन आरक्त । कंठ लग्ग्यौ सु मुक्ति भय ॥ भूत द्वार वीभार । गाजि आये सुत मग्गं ॥ भर भर भर उच्चार । रोस दावा नल लग्गं ॥ जिहि चच्चौ अप्प मो तात गर । गनिव सत्त दिन में प्रमति ॥ जो हत्यो अप्प तक्षक सुन्नत । कै काया अन्न सुगति ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ५२ ॥ साटक ॥ धंन्यो धंन्य सु बाल तापन तपं । बालं वलं विव्हलं ॥ सोयं पुच कि सोस दोस चि विधं । वानीय गद् गद् गलं ॥ एवं भूप विसाल भूमि भरतं । धर्मं धरा राजनं ॥ तं तेजं नवि चोर व्याघ्र विघनं । नैवापि संतापयं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५३ ॥ और चंद के काव्य को उक्त भारत औ भागवत से मिलाकर सूक्ष्म विचार कर देखे तो वह निः- संदेह यह अनुमान कर सक्ता है कि चंद संस्कृत भाषा अच्छी जानता था और यह बड़े बड़े ग्रंथ भी उस के पढ़े हुए थे क्योंकि चंद के कोई २ छंद उक्त ग्रंथों के श्लोकों के ठीक अनुवाद प्रतीत होते हैं । इस हनूफाल छंद के चारों पाद बारह २ मात्रा के होते हैं ॥ ५२ पाठान्तरः-फिर्र्यौ । लग्यौ । विभार । जाजि । आइय । आईय । हत्यो । प्रमत्ति । प्रमित्त । कैकाया । सुयति ॥ ५३ पाठान्तरः-धन्यौ धन्य । तनं । बाल । भरनं । तेजंन । विचोर । विघन ॥
२८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दत्वा आप मिदं श्रुतं गुरु वरं । मृत्यं च राजा नयं ॥ सत्यँ संप्त दिनानि पानि पवरं । नैवं चलते पयं ॥ त्वं आपं चय लोक जाखति बरं । भुंजे वरं पुचयं ॥ एकँ दीछ सुतप्य प्रापति पदं । त्रैलोकयं चासयं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५४ ॥ दूहा ॥ सब रिखि सँ सो पुच तू । वय दिक्खौ परमान ॥ मानहु डम्बर सें उदै । बढति कला बर भान ॥ छं० ॥ ११० ॥ रू० ॥ ५५ ॥ कवित्त ॥ पुच कंठि रिखिराज । जाइ नृप थान सु वत्तौ ॥ पंथ कुज्जह संगह्यौ । रिषि आपान विरत्तौ ॥ अति सु दीन सिर नोच । ऊंच नहिं भाल उचाइय ॥ दिष्टि दिष्ट राजन चरित्त । मंगन नृप आइय ॥ एकांग एक जोगिन्द्र वर । धातु न बंधे हथ्थ पर ॥ करि काज रिखि आयौ घरहि । उरच धरइर लग्ग डर ॥ छं० ॥ १११ ॥ रू० ५६ ॥ गाहा ॥ जो जंप्यो रिष पुत्तं । प्रलयं होइ सत्तियं कालं ॥ जं आवडू तं भ्रंमं । सो किज्जै राजनं बज्जयं ॥ ॥ छं० ॥ ११२ ॥ रू० ॥ ५७ ॥ चोटक ॥ नृप कंठि प्रजंक प्रजंक पला । मुहु मुंदिरु भानक मोद कला ॥ नृप दीन छल्यौ बहु चित्त चितं । सुछल्या जनु पोनय पीप पतं ॥ ॥ छं० ॥ ११३ ॥ पतनं गुर जानि चरन्न लग्यौ । बहुश्यां रिषिराज सु प्रान दग्ग्यौ ॥ ॥ छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ ५४ पाठान्तरः- म्रतंच । मृत्यंच । पानिपहरं । पय । आप हूलाति । तैलाकयं ॥ ५५ पाठान्तरः-मै । मे । तूं । परसान । संवत् १६४७ की पुस्तक में हमारा लिखा पाठ है और इतर पुस्तकों में "मानहु इंदौ वर उदै" है ॥ ५६ पाठान्तरः-जाय । संपत्तौ । आपन । ऊंच । नह । नहि । द्रिष्ट । वप । आईय । जोगिन्द । हथ । किंहि । घरह । उर । घर । अहुर । र्जागग ॥ ५७ पाठान्तर :-झो । झंप्यों । पुत्रं । भावै । भाव । इतं । जो । कीजै ॥ ५८ पाठान्तरः-चिप । वप । फला । दला । मुहुमंदिरू । भान । कमोद । न्रंप । बहुचित । जुनु । पोनय । बहुयौं । किसी पुस्तक में सु शब्द नहीं है ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । २६ गाहा ॥ मनो रिपि छह्यं प्रानं । बल्लीकं जीवनं गुरयं ॥ जो फल लग्यौ पच्छ । तौ कालं रिप खो वरयं ॥ ॥ छं० ॥ ११५ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ दूहा ॥ दूय चिंतय रिषि राज गुर । पुच्छिय अन रिष राज ॥ द्यौं उधार होइ आप वर । कहो कृपा करि आज ॥ ॥ छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ६० ॥ कवित्त ॥ मद संडी इक पुरुष । निसा भइव अध रत्ती ॥ वरंगना अंगने । डस्यौ अच्चि परत धरत्ती ॥ सुरापान आसिष्य । गयौ करहुं तव छुद्दिय ॥ उच्चारन चा राम । जाय वैकुंठ सु ठहिय ॥ परताप नाम सद गति भइय । कीर कहत परिषत्त सम ॥ भागवत्त सुनच्चि जो इक्क चित । तौ सराप छुद्दय अक्रम ॥ ॥ छं० ॥ ११७ ॥ रू० ॥ ६१ ॥ ज दिन आप तुच्चि भयौ । त दिन परिखोक घर घघर ॥ पसू पंषि जन्र खंडि । कुंडि मुनिवर समाधि उर ॥ कुंडि चक्र घरि रष्षि । कूप तूं मात परिष्षत ॥ पंडव वंस प्रतष्ष । तषत भ्रम धारी दिप्पत ॥ अचरिज्ज कहा तुम उद्धरन । होइ प्रसन सुकदेव कहि ॥ दिन सत्त अवधि अंतर बहुत । धरि सु उद्धरै छिनक महि ॥ ॥ छं० ॥ ११८ ॥ रू० ॥ ६२ ॥ धरनि रूप करि धेन । भ्रम्स वछरा संग लीयै ॥ झारषंड महि चरत । देषि कलिजुग कुपि चीयै ॥ चरन तीन भद्धांत । प्रजा सब आय पुकारिय ॥ चढि करि तें नृपराज । बद्ध्य परि ताच्चि बक्कारिय ॥ ५८ पाठान्तर :- प्रान । वलीकं । लगौ । पछू । पछं । तो ॥ इस के छंद का नाम सं० १६४७ की पुस्तक में गाथा है ॥ ६० पाठान्तर :-चिंतन । रिपिराज । पुछिय । होय । आप ॥ ६१-६३-यह तीन रूपक सं० १७१० और सं० १६४७ की पुस्तक के अतिरिक्त उस से पीछे की जितनी पुस्तक अब तक मेरे देखने में आई हैं उन सब में हैं परन्तु जब तक उन से भी पहिले की पुस्तकें न प्राप्त हों तब तक इन रूपकों को हम निश्चय रूप से क्षेपक नहीं कह सक्ते । इन को
३० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व कित्ति कीर अंग लग्गौ परस। तिहि कारन इह उपजिय॥ आषेट जाय पन्नग मृतक। सिंगी, गर घत्तिय, षिज्ञिय॥ ॥ छं०॥ ११८॥ रू०॥ ६३॥ तोटक॥ इति चोटक छंद सुसंत गुरं। दिन सात पळ्यौ हरि गंग कुरं॥ त्रितकाल विकालह चित्त धरं। क्खित पत्त छिमा पिवु लाइ भरं॥ ॥ छं०॥ १२०॥ नृपराज परीक्षत तत्त गुरं। धरि ध्यान कह्यौ बदळीष धरं॥ जून काल सु तप्पय देव नरं। नृप ग्यान सुन्यौ वपु व्यास वरं॥ ॥ छं०॥ १२१॥ रू०॥ ६४॥ साटक॥ या विद्या बदळीत राजन गुरं। आपो रिषं तारयं॥ पून्यं राज सु इन्द्र धारन घरं। विद्या अमारा पुरं॥ अभ्भोयं सुधनं तु मातुळ इयं, सोहं च.रंत्तारयं॥ स्त्रा ध्यानं रिषिराज राजन वरं। पापापच्चारं परं॥ ॥ छं०॥ १२२॥ रू०॥ ६५॥ चौपाई॥ अति किसलय सुस कोमल अंग। जानु कि सुक्किय देहिय अंग॥ [L17: क्रिष्ण दिपायन दीपन व्यास। कोपिन एकिन मंडल चास॥ ॥ छं०॥ १२३॥ रू०॥ ६६॥ दूहा॥ किसनदीप दीपाय नह। कही रिषी सब बत्त॥ जु कछु सराप सु उद्धस्यो। परनराज गेह गत्त॥ ॥ छं०॥ १२४॥ रू०॥ ६७॥ कवित्त॥ तितै आय बर ब्रह्म। अप्प रिषि रिषि सु पुकारं॥ कै तच्छक नृप छतहु। न तरु तच्छक मरै धारं॥ पाठान्तर यह हैं:-अधरत्ती। वारंगन। अंग। ने। काहुं। भागवत्त। जोइ ककचित॥ ६१॥ जदि। न। तदि। न। परिसिक्क। घर। रषि। परीषत। प्रतप्य। प्रपेषि। प्रसत्र। घम। संग। लियै। हियै। वष्प। परिताहि। घटिय॥ ६३॥ ६४ पाठान्तर:-तोटकछंद। क्तिं। पिबुलाइ। त्रितकाल। तत। नून॥ ६५ पाठान्तर:-गुरु। यम्भोयं। सुधनं। मातुल। तारयं। ध्यान। राजं॥ ६६ पाठान्तर:-सु। सकोमल। देहीय। देही। अयंग। किस्ना। दीपायन। चंद्रायना॥ ६७ पाठान्तर:-रषी। वत। जु। उधर्यो। आगत्त। ६८ पाठान्तर:-तंछक। हतहुं। तक्कक। भई। भइय। मान। तों। निधान। धरि। चित। ध्यान।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३१ उभय चित्त चिंतयौ । भय्य श्री नाग सु मानं ॥ नृप न हतो तौ मरन । अचित नृप रिष्य निधानं ॥ दुच्च भंति चित्त चिंता सुचित । धरिय ध्यान चित जान जिय ॥ सत विप्प आइ लिय बोर बर । आय च्छ्य राजन सु दिय ॥ ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रू० ॥ ६८ ॥ कवित्त ॥ दिय च्छ्यं सधि कीट । सुफल लेइ राजन धारिय ॥ क्रम खंडन लागंत । निकरि कीटं कित कारिय ॥ छिनक मधि बाढंत । भए पुनि पंचनि नारिय ॥ नृपय हुकम मुष दियौ । करो सो काम कररिय ॥ फिरि आय राय दिष्टह वविय । क्रम्म मद्धि उसनह फनिय ॥ जं जाच जीह कलि हंस छत । भय्य देह ब्रन अप्पनिय ॥ ॥ छं० ॥ १२६ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ तव जनमेजय पुत्त । दिसा दच्छिन जन मुकिय ॥ तहां धन अंतर वैद । दरक चढ़ि लैन सु तकिय ॥ करिय षेद चलि अप्प । सत्तस चेला संग धारिय ॥ आस्तीक जु धुर नाग । तव सु तकूक विचारिय ॥ कत्त तक्कि रूप छुकुटी भय्य । गच्छिय गुरु पुठ्ठे उसिय ॥ अप काज सिप्प सिष्पं दइय । विप्र रूप तकूक हँसिय ॥ ॥ छं० ॥ १२७ ॥ रू० ॥ ७० ॥ दूहा ॥ आस्तीक जु गुर बैर कजि । पढि विद्या ग्रह नाग ॥ जनमेजय न्रिप सो मिलिय । मंड्यौ अप्पन जाग ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रू० ॥ ७१ ॥ ६६ पाठान्तरः-भरा । किसी २ पुस्तक में सो शब्द का पाठ नहीं है । आई राइ । दिष्ट । भईय । भईये ॥ ७० पाठान्तरः-दक्षिन । जनमु । किय । धन । अंतरवेद । सुत । किय । तक्षक । छलन । किं । भईय । पुट्ठे । सिष्यं । सिष्यां । दरह । तक्षक । ७१ पाठान्तरः-तिहित । बढ़स । यत । विप्पं । सचारख । रषि । जानिलु । बात । नृहरिय । मल्ल । होम । मंत । तक्षक । पैतो । अनी । मंत्र ॥
३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व कवित्त ॥ ति चित्त वैर सिसु वरन । सपत विप दोख सु चारव ॥ नृप जनमेजय नाम । भयौ तामस उत गारव ॥ तात वैर सिसु दषि । जियन खोइ लोडू विचारै ॥ जातिहु बातन हरिय । सच्छ बंध्यौ जनु जारै ॥ होमंत सक्ति तच्छक सु नग । इन्द्र सरन पत्तौ तबै ॥ सुनि कन्न राज तामस भयौ । करहु मंत साधन सवै ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७२ ॥ भुजंगी ॥ करी अस्तुती यं स्वहा इंद्र जोगं । तहां इंद्र आयौ सुरं नाग भोगं ॥ दूतं देव सादेव सारन्न आयौ । तिनं काटि दीयंत खो पाप पायौ ॥ ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रु० ॥ ७३ ॥ कवित्त ॥ अभय दान आतुरह । अंन उग्राह पान दत ॥ सरन रषि भय नरन । कढ्ढि मुक चित्त खंडि सत ॥ तय लगि कग्ग कराल । स्वान ससन ऊ वासै ॥ रुधिर चरम अरु असति । वस्न वस्नन ऊ नासै ॥ जो दूय जोइ जग उच्चरै । जननि जाय ग्रब्भह गरै ॥ तिन काज राज प्रारत्थिये । जियत तक्षक तन उब्बरै ॥ ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रु० ॥ ७४ ॥ दूहा ॥ नृप चिंता बहु लग्गि मन । ज्यौं जुथ वाय चिकाल ॥ यौं नृप राजत राज कुल । पुनर जनम दुष ज्वाल ॥ ॥ छं० ॥ १३२ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ ७२ पाठान्तरः-करि । अस्तुति । स्वाहां । सारन । तिन । सह ॥ इस रूपक के छंद का नाम हम ने शोध करके भुजंगी रक्खा है और सं० १६४७ की तथा सं० १७९० की पुस्तकों में भी यही नाम लिखा है किन्तु इतर पुस्तकों में चंद्रायना नाम लिखा है वह अशुद्ध है ॥ ७४ पाठान्तरः-आतुरहै । अन । कढि । मु । कहित । तुय । ड़ । उं । जोइयै । गभह । कारज । प्रार्थिय । उबरै ॥ ७५ पाठान्तरः-च्रिंत । पुनरजनम ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३३ ॥ वर्तमान आबू पर्वत के उद्धार की कथा ॥
॥ उस तक्षक का आबू पर अपना अर्बुद नाम धर रहना ॥ कवित्त ॥ स तछ आवू प्रमान । मंदीयौ सू अचल कर ॥ गरब गरूर तें विडुरिं । सुडरु रह्यौ जु संत धुर ॥ अचल ईस प्रति ताम । अचल आचित्त अचल घर ॥ देव देव प्रारत्थि । इन्द्र मुक्किय इंडिय धर ॥ अरबुद नाम धर जुत्तिया । दूर तपित थथराइया ॥ कलपान पुहुप अरु वस्त्र गुरु । झांच गुरु गुर झाइया ॥ छं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७६ ॥ ॥ गालव ऋषि के शिष्य उत्तङ्ग का उपाख्यान ॥ दूहा ॥ सो आवू उद्धार विधि । कह्यौ कथा * परबंध ॥ ज्यौं अनादित्या रिष्य मुख । सुनी सु गुर समबंध ॥ छं० ॥ १३४ ॥ रु० ॥ ७७ ॥ गुरु गालव उत्तंग सिष । बहु विद्या पढ़ि जाम ॥ पय लग्गौ गुर राज कें । कहौ दक्कुना काम ॥ छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७८ ॥ वाघा ॥ गालव रिषि सिष्य उतंग । दिय विद्या बुध क्रम क्रम अंग ॥ गुर दषिन कज्जैं गुर जच्चै । गुर पतनी तब मंगि विरच्चै ॥ १३६ ॥ कुंडल जच्चि षिचिया कानं । अप्यौ जासु दषिना दानं ॥ दिवस अठमी व्रत अपंडै । चरचौं दान विप्र श्रुत मंडै ॥ १३७ ॥ ७६ पाठान्तर :- सो । तक्षक । आ । चित । बर । मुकिय । रूडीय । जुतिय । तप्यित । छाईया ॥ स = वह का वाचक और तछ = सर्प = तक्षक का वाचक जैसे रु० ५१ की ८ तुक में तच्छ प्रयोग हुआ है ॥ ७७ पाठान्तर :- रिष्य ॥ ७८ उतंग । जास । कै । दछना ॥ ७६ पाठान्तर :- उत्संग । दखिन । गुरपतनी । मंगि । दत्तिना । अपंडे । मंडे । करे । संपनी । न्रिप । प्रस॑से । संसष्ये । तव्यक । बीच । रपै । अंचल । इपै । इपे । ठठौ । ताम विराम ।
- हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद अर्बुद के उद्धार की कथा अर्बुद खण्ड अर्थात् आबू महात्म्य नामक संस्कृत ग्रंथों से संग्रह करके वर्णन करता है । जिन पाठकों के पढ़ने में अथवा सुनने में यह ग्रंथ आये हैं वे जान सक्ते हैं कि कवि ने थोड़े में बहुत ही आशय लिया है और उत्तङ्ग का उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व के पौष्यपर्वाध्याय नामक द्वितीय अध्याय में से भी कवि ने संग्रहीत किया है ॥ ३
३४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व चल्यौ रिषि चमंके ताम । गुर गुरनी कों करै प्रनाम ॥ चिंतत इष्ट चल्यौ वर राहं । संपत्तौ यौँ सद नृप ठाहं ॥ १४८ ॥ जच्चै कुंडल बिखिय पासं । खोइ समर्पै विधि बर तासं ॥ विप्र प्रसंसै समपे कुंडल । कढि डर तच्छक बीच नीच छल ॥ १४९ ॥ लै कुंडल चल्यौ हरषे मन । आय्यौ राज विप्र अन्यो अन ॥ क्रम्यौ विप्र राह चंचल चर । छलि तच्छक लीनें कुंडल वर ॥ १५० ॥ क्रमयौ विप्र पुठि अति चंचल । धरि अहि रूप सु गयौ रसातज ॥ विख दूखै ठट्ठौ रिषि तामं । दुमत चित्त भय विघ्न विरामं ॥ १५१ ॥ अस्तुति इन्द्र करन लग्यौ रिषि । नंब्बौ बासव खिनक वज्र सिष ॥ त्रित अखित दीयौ आखंडल । धर रिषि तक्खि घात विख मंडल ॥ १५२ ॥ पैठा विप्र नागपुर ठासं । धोम प्रगहै मंच विरामं ॥ दूख्यौ पुरष एक षट आरं । फेरे चक्र तास फिरि तारं ॥ १५३ ॥ दूख्यौ बाह्र बाह्र सत वारं । उंच तेज आजेज अपारं ॥ यौँ नर नारि अश्व वर नामं । वे अह्र हय्य बेई सम कामं ॥ १५४ ॥ चिसत सठि तां तंति ठार्यं । अद्ध खेत स्यामं अध तार्यं ॥ अहि धुत्तेन उपाडू सबाहं । फुंकत पुंकू सधुम्स सराहं ॥ १५५ ॥ पुंकत पुंख धार धुस चली । लग्गै नाग अंग सह थल्ली ॥ प्रगटे अंसू पलक्क उघ धत्ति । अंप्यो कुंडल नाग मान छति ॥ १५६ ॥ ग्हि कुंडल अप्ये गुर वालं । गुर विद्यां अप्पी अभिरामं ॥ दुज वर वज्र पैठ जेहा धर । बिख अखित तिव थान मंडि थिर ॥ छं० ॥ १५७ ॥ रु० ॥ ७९ ॥ दूहा ॥ बिख अथाह तिवि थान भय । बहुत संवच्छर वित्त ॥ पृथुल कराल कराल भौ । जिम जिम काल बितित्त ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८० ॥ वर्ज । आक्षत । दियौ । रिखि । पैठो । बैठो । धोमं । ठाम । बिराम । फेरै । वाह्र । जो । तामं । बे । हथ । वे । ईस । मकामं । बेइम । सठि । ता । तँति । ठार्य । उपाय । स्याम । धुत्तेन । फूंकत । सधुम । धूम । लगे । थली । अंशू । कुंड । आप्यो । हित्ति । मनि । यही । रामं । पेठि । आक्षेत । आक्षित । ८० पाठान्तर :- वित । प्रियमुल । प्रभार । विवित ॥
३६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व हल्ली खेत अच्छी जलही समूहं । अचै शेष षीरं सु सानौ ससुहं ॥ धराचल्लि भागीरथी विम्ब आगं । मिटै अघघ ओघं तनं दुष्ष दागं ॥ १५७ ॥ सुभं उच्च चंदोल बीचं विराजं । मनो खुग्ग आरोह सोपान साजं ॥ नरं नीच नीरं तटं श्रोन प्रस्सं । तवै अग्ग देवं गुनं अब्ब अस्सं ॥ १५८ ॥ परै मख्खू कच्छेवरं धंषि कुद्दी । भजी कावखं गिड्ड गोमाय लुद्दी ॥ तटं श्रोन अच्छी थलं वारि छल्ल । घिनं मक्सिरू चंदोल बीचं वचल्लै ॥ १५९ ॥ तिनं खातसं देह आनूप धारै । वरं उर्वसी चामरं बिक्खू नारै ॥ धरै ध्यान भावं तिनं दुक्ख दब्बै । मिटै मज्जनं अघ्घ साजंम सब्बै ॥ १६० ॥ अलंकृत गंगा तनं तेज खोवै । मनौ दाचनं दाच दाहंन जो वै ॥ सुयं गंग गंगे सु गंगा प्रकारं । धरै नाम गंगा जमं किं करारं ॥ १६१ ॥ त्रिपथ्थी त्रिगामी विराजंत गंगा । मचा स्वग्ग लोकं नरं नारि चंगा ॥ रहहं घरी ज्यौं फिरै तीन लोकं । मचा दिव्य धुन्वी नवं निगम लोकं ॥ १६२ ॥ कलाखी सुचीरं गुफा फारि नागं । प्रगट्टीय मातंगि मानुष्य आगं ॥ रची नष्य अच्छी सुयं ताप अंजै । मचा वहराजं दिवं दुर्ग रंजै ॥ १६३ ॥ अचयं भीषमं मात बहु पाप षंडै । जमं ज्वाल ज्वालं तसं तेज चंडै ॥ रहं रोच रंगी घरं सीस गंगे । मचा मोचनी सात दुग्गा उतंगे ॥ १६४ ॥ बरं काख काखा जलं खेत रूपं । तहां उपनी मात आंबंग नूपं ॥ अई गाम सहं सु सामुह जेतं । डह्यौ नाम गंगा उतंगा विचेतं ॥ १६५ ॥ घरद्वार दारं कला तूं प्रगट्टी । करी मुक्ति मग्गं मचा पाप मही ॥ तिनं नाम खोनै कियं तोय पीजै । कियं संम्रनं देव संज्यान कीजै ॥ १६६ ॥ कियौ गच्चि तें पंथ उग्गाच्चि साजं । तुंही तापिनी तेज तूं तेज राजं ॥ तुंही मध्य वारानसी खोच्छ दैनी । कही काल दुष्यं कटनं क्रपैनी ॥ छं० ॥ १६७ ॥ रू० ॥ ८३ ॥ दूहा ॥ जब लगि रज तन मात की । रहै अंग सो बांइ ॥ तब लगि काल न संपजै । क्रम पाप सब जाइ ॥ छं० ॥ १६८ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ मंजने हल्लै । अपसा । जम । दाहं । दाहनं । जोहै । त्रिपंथी । नाग । घटा ताम । मंगा । महादिव्य । नवं । निगम । महावट्टराजं । पदिव दुर्ग । भीषम । जालं । महामोहनी । अनूपं । ध्यै। समरनं संभ्यान । मोच्छ । मोक्ष । दुष्च ॥ ८४ पाठान्तर :—सोलाइ ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३७ गाथा ॥ क्रमं अघं सब भंजै । दिव्यं करै देह सा रूपं ॥ सुरगं करै सु गामी । अह्रं नाम रसन उच्चारं ॥ कृं० ॥ १६९ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ॥ मंदाकिनी गंगा का उभरना और गौ का तिरकर निकलना ॥ दूहा ॥ सुनि गंगा सुवयन रिषि । उभरी आय प्रमान ॥ ताहि तिरंतह नंदिनी । आई तट बिल थान ॥ कृं० ॥ १७० ॥ रू० ॥ ८६ ॥ रिषि सिष्य धाये सु सब । धर कड्डी तँह गाव ॥ सो कड्हिवि मंदाकिनी । गइ पयाल फिरि ठाव ॥ कृं० ॥ १७१ ॥ रू० ॥ ८७ ॥ बिल अथाह दिष्यौ सु रिष । चित चिंता परपत्त ॥ को निकसै या माधिगत । गत भयानक घत्त ॥ कृं० ॥ १७२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट ऋषि का उस अथाह बिल बूरने को हिमालय के पास एक पुत्र मांगने जाना ॥ विछप्परी ॥ चिंते रिषि देखि बिल दुक्खित । उर लग्गी अति चिंत मम्झिझ चित ॥ पूछवि रिषि सिष्य कत कामं । सुहै न कोइ बुद्धि बल तामं ॥ १७३ ॥ चिंतै ध्यान अप्प रिषि राजं । याहि सपूरन को थिर काजं ॥ चिंतत रिषि ध्यान उर भासं । है सत पुत्त हेम गिरि जासं ॥ १७४ ॥ एक पुत्त जाचौं तिन पासं । विन्न पूरे पूरै उर आसं ॥ क्रम्यौ राज रिषी दिसि उत्तर । देषी मन आनंद दिव्य धर ॥ १७५ ॥ गौ रिषि राज पास गिर राजं । इष्ष अग्ग पति आसन साजं ॥ मैना सहित आय पग लग्गे । अरघ पाद करि अचवन लग्गे ॥ कृं० ॥ १७६ ॥ रू० ॥ ८९ ॥ ८५ पाठान्तरः-क्रम । सारूपं । सुंगामी ॥ ८६-८८ पाठान्तरः-सुनयन । तिरेत ॥ ८६ ॥ धाए । कढी । तहां । कढवि । गई । ठांव ॥ ८७ ॥ परप्रत । मधि । घत ॥ ८८ ॥ ८९ पाठान्तरः-चिंते । दुक्रत । कोई । संपूरन । नासं । हेमगिरि । पुत्र एक । पू । पूरं । रिषि । उत्तर । मान । रिषिराज । गिरि राजं । दूष्ये । मेना । पय । लागे ॥
३८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ सुनि सुवचन गिरि राज कौ । कहि रिषि कारन बात ॥ पुत्त एक जच्चूं तुमहि । गरित सपूरन गात ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रू० ॥ ९० ॥ ॥ हिमालय का अपने सब पुत्रों को ऋषि का अभिप्राय कहना ॥ कवित्त ॥ तब सुचिंत गिर ईस । पुत्त सबे निज स्रव्वं ॥ कहि कारन षिति षात । अप्य रष्यौ कुल अव्वं ॥ इत्त सु रिषि सुत ब्रह्म । नाम वाचिष्ट महा मंति ॥ धर्म्म पार तप पार । पार श्रुत कर्म परम गति ॥ जच्चे सु षोइ तुम एक कहुँ । चिंतिय चत कारज्ज रिषि ॥ संब षो वास बिल उद्धरै । पद पामौ परमुच अषि ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रू० ॥ ९१ ॥ ॥ हिमालय के बड़े पुत्र का उत्तर देना कि वह भूमि निषिद्ध है ॥ कवित्त ॥ तब अष्पहि अग्र पुत्त । सुनहु गिरि राज चिंत चित ॥ पिता बाच रिष काज । कोइ खंडहि सुक्रम्स चित ॥ उह सु भूमि निषेध । थान जानहु तुम सब्बं ॥ अंग क्रंम अरु देव । षेव जाजन नहि अव्वं ॥ कुच्छित्त देस कारन विक्रम । तहँ सु केम किज्जै गमन ॥ अप्पियै प्रान मंग्गै जो रिषि । पै दुष्ट थान थप्पहिँ न तन ॥ छं० ॥ १७९ ॥ रू० ॥ ९२ ॥ ॥ वशिष्ठ का प्रत्युत्तर दे कहना कि वह भूमि बड़ी रम्य है ॥ कवित्त ॥ तब जंपे सुत ब्रह्म । सुनौ गिरि राज पुत्त सम ॥ इहि सु भौमि बिल थान । रम्य मंडहि सु तप्प दम ॥ ९०. पाठान्तर :-गिरिराज । संपूरन ॥ ९१ पाठान्तर :-ईसं । रख्यौ । महामति । परमगति । कहुं । संव । संवसौ । परमुच ॥ ९२ पाठान्तर :-गिरिराज । सुक्रम । रुव्व । अव्व । तहां । कहहां । पै ॥ ९३ पाठान्तर :-जंपै । सुन्न । गिरिराज । तिथ । गंधर्व । मूर्त्तिमान । सज्जै । तिसर । धात्र । महि ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३६ सर्वै देव इच्छि वास । तिव्य लब्धै रिषि स्वव्वं ॥ विप्र ब्रज वर वच्छि । सु गुन गंध्रव सव कव्त्रं ॥ किन्नरच्च क्रम सुत धर्म धर । सुरति मान सज्जैति सिर ॥ हरि ब्रह्म ईस संवास सच । जो आक्रम चि इक्क गिर ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८३ ॥ ॥ और वहां आगे वाल्मीक ऋषित्व को प्राप्त हुवे हैं ॥ पद्धरी ॥ रमनीक ठाम वाचिष्ट राज । तहां वसहि देव देवच्च विराज ॥ इच्छि थान पुव्व क्रत युग प्रमान । रिषि कियो तप्प जर्जित विधान ॥ १८१ ॥ वाल्मीक वीर इक्क वधिक रूप । अति पाप क्रंम आघात कूप ॥ भंजै सु मग्ग तिन भ्रम्म थान । पायौ सु हरिय दरसन विधान ॥ १८२ ॥ चित संप चक्र गद्द पदम वाहु । तन स्याम सुभित पीतच्च प्रबाहु ॥ दिप्प्यौ सु लछी तन रूप सील । कीनी बह तन तिन निसप ढील ॥ १८३ ॥ आयौ सु दिट्ठ गोविन्द वीर । जानी न पुव्व भ्रम्मह सरीर ॥ द्विति दिप्पि दिट्ठ कामच्च कद्दूर । विंक्यो सु पाप मध्यां सम्मूर ॥ १८४ ॥ तव आय रिप्प उपदेस दीन । किचि काज इच्छां यह क्रंम कीन ॥ अग्नी रु बंध तिय मात पुत्त । वंटहि कि पाप पापच्च सजुत्त ॥ १८५ ॥ तिच्छि जाइ कह्यौ वर भीन्न मान । वंक्यौ न पाप किन अंग थान ॥ लग्ग्यौ चरन्न कर धनुष तोरि । आघात घात बानी सजोरि ॥ १८६ ॥ व्याघात नाम सो वधिक थान । भ्रम भ्रग्यौ इक्क वहूक्रच्छ निधान * ॥ छं० ॥ १८७ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ गाथा ॥ यों कत्थियं रिषि राजं । तुम कोइ दिवस भ्रमन करि अध्यं ॥ फुनि हम दरसन प्रापं । सध्यं गुर मंच दे कानं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ८४ पाठान्तर :- जु । धर्म । दर्शन । लछि । वीर । धर्मह । धरमह । विंक्यौ । मथांस । भूर । रिपि । दृट्ठां । रह्वां । क्रम । त्रिय । पुत । संजुत । चरन । तोरी । भ्रग्यो । इक । वृक्ष ।
- यह पंक्ति कर्नल टोड साहब वाली पुस्तक में नहीं है ॥ ८५ पाठान्तर :- कोई । प्रमं । ससथ्य । मरा । मरा । गहिय । भट्टै । अब । अबयो ॥
४० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
सरां सरां यह कहियं । गच्छियं भगताय अंगयं नेहं ॥ भिद्दे तु चक्रम मंटी । दृही निय अब यो देहं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८६ ॥ दूहा ॥ बांबी फिर अंगच बली । अंग उदैट्टी जाम ॥ क्षीन सबद मुख निक्कसे । धीर धीर कै राम ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८७ ॥ तब धरि सधि कयौ सु रिषि । दिषि प्रबत्न तप पार ॥ बाल्मीक रिषि सो भयौ । सुनि गिरि सुअन विचार ॥ छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ हिमालय के मध्यम पुत्र नंद का वशिष्ट के साथ आना स्वीकार करना ॥ कवित्त ॥ सुनि सु बचन सिरि सुअन । सर्व विधि राम वाच रचि ॥ मध्य पुत्र गिरि नंद । सोय उच्चरयौ वाच सचि ॥ हौं सु पंग बिन पाय । क्रंम्मि सक्यों न राह दुर ॥ जाय परौं षित घात । करौं उद्दार वाच धुर ॥ पित बाच राम सज्ज्र्यौ सु बन । बाच सु हरिचंद अव्व वहि ॥ सोइ बाच तात ऋत कज्ज रिषि । कोइ सचुक्कहि मुंष मचि ॥ छं० ॥ १८२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट का अर्बुद नाग को कहना कि जो तू नंद गिरि को उठा ले चले तौ हमारा कार्य सिद्ध हो ॥ पहरी ॥ अर्बुदा अचल अर्बुदति नाम । क्रित काम पयच षोरौ सु कांम ॥ धर नंद नंद नंदन प्रमान । उच्चार सार लै जाहु थान ॥ १८४ ॥ ८६ पाठान्तर :- बांकी । निक्कसै । कौं ॥ ८७ पाठान्तर :- दिषि । रिष ॥ ८८ पाठान्तर :- गिगिर । सोइ । हों । उच्चर्यौ । पाद । क्रमि । झंमि । सकों । सक्कौं सक्कै । परों । करों । कोई । चुक्कहि । मुष ॥ इस रूपक की पांचवीं तुक के वाच और सज्ज्र्यौ शब्दों के बीच में राम शब्द किसी २ पुस्तक में लेखक ने लिखना छोड़ दिया है । तथा इसी तुक के दूसरे पाद का पाठ हमारे पाठ के सिवाय किसी २ पुस्तक में "पिता वाच सिर अंबु वहि" करके भी है ॥ १०० पाठान्तर :- इस की पहिली तुक के पहिले पाद का पाठ हमने सं० १६४७ की
४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व प्रविस कियो गारत्त गिरि । जय जय वचन सरीर हुअ ॥ भै मग मगन सुतन सब्वे सु गिरि । उवरन्नौ नाक सुनाग धुन्न ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ १०२ ॥ ॥ बिल का पुर जाना और पुष्प वृष्टि सहित जैजैकार होना ॥ दूहा ॥ उबरन्नौ नाक सु नाग धुन्न । दिव अस्तुति परमान ॥ पुष्प वृष्टि इच्छां करिय । जय जय बंधौ तान ॥ छं० ॥ १८९ ॥ रु० ॥ १०३ ॥ ॥ नग का हिलना ॥ दूहा ॥ गात सकल गिरि जात को । सब बूड्यौ सम नाग ॥ उबरि नास सैलह तहां । सो हलची बिन लाग ॥ छं० ॥ २०० ॥ रु० ॥ १०४ ॥ ॥ नग के हिलने से वशिष्ट चिंता कर ईश आराधन करने लगे ॥ दूहा ॥ नास सुद्दल हल्ल्यौ सुनग । उर अति चिंता जग्ग ॥ अति आतुर वाचिष्ट रिषि । ईस अराधन लग्ग ॥ छं० ॥ २०१ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ ॥ वाचिष्ट ऋषि ने महादेव का यह आराधन किया ॥ खाटक ॥ ईसंजा गिरिजानने वगरयं । उच्छंग मातंगिनी ॥ चर्मेजा वड्जामवंत जलजं । बुंदं तयं उज्जलं ॥ रख्यं जारति कर्न कामति मलं । दल्यंति तीयं पुरं ॥ त्रिपुरारिं तन तुंग तारन गुरं । जैजै हरं ईसयं ॥ छं० ॥ २०२ ॥ रु० ॥ १०६ ॥ उच्चरि । अगै । पच्छ । संपन । तथ ॥ इस की अंत की तुक का पाठ किसी २ पुस्तक में “भू मग सुतन सबै सुगिरि । उवस्यौ नाक सु नाक धुन्न” है ॥ १०३ पाठान्तरः-उबयौ । नाक । हयां ॥ १०४ पाठान्तरः-यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और जब तक कि वह इस से भी प्राचीन पुस्तक में नहीं मिले तब तक उस को क्षेपक नहीं कह सक्ते । सोह । लह्यो । बुड्यौ ॥ १०५ पाठान्तरः-नाग । वाशिष्ट । आराधन । लग ॥ १०६ पाठान्तरः-उद्धंग । छलजं । जलदं । रिपं । करन । दलंयंति ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ४३ भुजंगी ॥ नमो आदि नाथं स्वयंभू सनाथं । नहीं मात तातं न को मंगि वातं ॥ जटा जूटयं सेषरं चंद्र भालं । उरं चार उद्दारयं रुंड मालं ॥ २०३ ॥ अनीलं असन्नं उपब्बीत राजं । कलं काल कूटं करं सूझ साजं ॥ वरं चंग ओधूत विंभूत ओपं । प्रलै कोटि उग्रंसि कालं अनोपं ॥ २०४ ॥ करी चर्म कंधं हरी पारिधानं । वृषं वाहनं वास कैलास थानं ॥ उमा अंग वामं सु कामं पुरष्यं । सिरं गंग नेचं त्रयं पंच मुष्यं ॥ २०५ ॥ नमः संभवायं सरव्वाय पायं । नमो रुद्रयायं वरहाय सायं ॥ पसूपत्तए नित्तए मुग्गयाए । कपहीं मछादेव भीमं भवाए ॥ २०६ ॥ मषघ्नाय ईसानए चंबकाए । नमो धम्मए धातए अद्धकाए ॥ कुमारो गुरव्वे नमो नील ग्रीवे । नमो व्याधए बाघए हिच्छ जीवे ॥ २०७ ॥ नमो लोहिते नील सिष्षंडए तं । नमो शूलिने चक्षुषे दिव्यए तं ॥ बसूरेतवे संव्वदेवस्तुतेवं । नमो पिंग जाटिष्टाए देव देवं ॥ २०८ ॥ नमो तप्प मानाय ब्रषं धुजाए । नमो ब्रह्मचारी त्रयंब्रह्मकाए ॥ सिवं चातमे चातगे स्वर्गचाए । नमो विश्वमावित्तए विश्वराए ॥ २०९ ॥ नमस्ते नमस्ते नमो सीतताए । नमो सर्ववन्नायने संकराए ॥ नमो ब्रह्मवक्ताय भूत पिताए । नमो वाचपे विश्वपे भूतपाए ॥ २१० ॥ नमो सीससाहस्रए नीतएसं । सहस्रंभुजा नैन साहस्त्र तेसं ॥ नमो पादसाहस्र आसंखकनं । नमो वन्हि चीरन्य हीरन्यवर्ने ॥ २११ ॥ नमो भक्ति आकंपनं संभु देवं । थिरं रिद्धि दाता मनं वच सेवं ॥ प्रसनो भवो ईस तब्बे न कब्बै । तनं ताप विन्नासए चित्त तब्बे ॥ छं० ॥ २१२ ॥ रु० ॥ १०७ ॥ १०७ पाठान्तर :- स्वंभू । समार्थं । नही । मंगी । चंदभालं । उर । रुंडमालं । असनं । उपंवीत । कलंकालकूटं । विभूत । सिकाले । अलोपं । करि । बंधं वृपवाहनं । वासं । थानं । दामं । कुरष्यं । गंगा । नैनं । उद्रप्रायं । सरवाय । वरदाय । पशू । पत्त । ए । नित । ए । मुग्ग । जाए । कपट्टरी । कर्पट्टरी । मषंघ्नाय । इसं । नए । धम्म । ए । धात । ए । गुव्वं । नल । व्याध । ए । बाघ । ए । ट्ठिच्छ । सिषंड । एतं । दिव्य । एतं । वसूदेवते के श्वदेवनं । स्तुतेवं । ब्रषंध । जाये । त्रयब्रह्म । काए । खर्श । चाये । विश्वमा । वित्तए । नमस । ते । नमस । ते । सीत । ताए । साहस । एनीत । एसं । सहस्र । नैन । सहस्र । आसंप । कर्ने । हिरन्य । संभा विनास । ए । चित्त ॥ सं० १६४७ की पुस्तक में इस छंद की ८ वीं तुक में को निस्सए शब्द नहीं है ॥