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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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अथ हुसेन कथा लिख्यते ॥ (नवां समय) संभरिनरेश (पृथ्वीराज) और गज़नी के शाह (शाहबुद्दीन) से कैसे बैर हुआ इसका वर्णन ॥ दूहा ॥ संभरि वै चहुआन कै, अरु गज्जन वै साच ॥ कहौं आदि किम वैर हुव, अति उतकंठ कथाह ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥* शहाबुद्दीन के भाई मीर हुसेन के गुणों और उसकी वीरता की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ बंधय साचि सचाव । मीर हुस्सेन वान धर ॥ निज्ज वान सु प्रमान । वान नीसान बधै सुर ॥ गान तान सुज्जान । बाहु अज्जान वान वर ॥ भेव राज परवान । उच्च जस थान जुमरू भर ॥ उदार चित्त दातार अति । तेग एक वंदै विसव ॥ संकंत साचि साचाव तिन । तेज अजै जयमंत अव ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ १ पाठान्तर–चहुआन । गजन । साहि ॥

  • हमारे पास की सं० १६४७ वाली पुस्तक में इस प्रथम रूपक के नीचे तो इसमें लिखा दूसरा रूपक ही लिखा हुआ है परंतु उसके किनारे पर यह दोहा और लिखा हुआ है सो हम को क्षेपक दीखता है –दूहा ॥ आनंदिय गंधर्व तब, अहो सुनहि द्रिग जेन । अति दिवार कथन कथा, विबर कहै। बर बेन ॥ २ पाठान्तर–साहाब । हुसेन । वान । निज । बांन । प्रमांन । बांन नीसांन बंधे । गांन । तांन । तौन । सुज्जांन । सुज्जांन । आञ्जांन । वांन । परमांन । परखांन । उंच । थांन । जुझ । उदार । संकतं । अजे ॥ ३

३८६ पृथ्वीराजरासो । [ नवाँ समय २ शाहाबुद्दीन की पातुर चित्ररेखा की प्रशंसा, शहाबुद्दीन का उस पर प्रेम, और हुसैन का भी उस पर आसक्त होना और चित्ररेखा का भी मीर को चाहना ॥ कवित्त ॥ दृषि बधु आचार । मीर उमराव जंपि जस ॥ एक पाच साहाब । चित्ररेषा सु नाम तस ॥ रूप रंग रति अंग । गान परमान विचछन ॥ बीन जान बाजान । आनि बतीसइ लच्छन ॥ दस पंच बरष वाचा सुवच । सुप्रसाद साहाब अति ॥ आसिक्क तास हुस्सेन बुच्च । प्रीति परस्पर प्रान गति ॥ छं० ॥ ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥ शाह का यह समाचार सुनकर क्रोध करना ॥ कवित्त ॥ एक सुदिन सुविचांन । साह हुस्सेन सुबुद्धिग ॥ वे काफ़र आतस्स उतँग । दह दिसि नह दुद्धिग ॥ पैसंगी पासंग । लष लप्पां नलवाही ॥ सांई सौं संग्राम । ढक्कि दैवर गुरदाही ॥ गर्दन गुराव मचि मचि मषां । षांषवास अषिय घरह ॥ अन छह नाज लब्भय रवन । करौं तुच्छ तुक्की बरह ॥ छं० ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ हुसैन का शाह की बात न मानना और शाह का आज्ञा देना कि या तो मेरा राज्य छोड़ दो नहीं मारे जाओगे ॥ दूहा ॥ सुनिअ बैन साहाब तब । प्रीत न इंडी बाम ॥ कोपि कह्यो सुरतान तब । छनौ कि इंडौ यांम ॥ छं० ॥५॥ रु० ॥ ५ ॥ ३ पाठान्तर-दृषि । बंध । स नांम । अति अंग । गांन । परमान । विचत्तन । जांन । बाजांन । आनि । लछन । लत्तन । आसिक । हुसेन । प्रांन ॥ ४ पाठान्तर-सदिन । हुसेन । आतस । उतंग । पासंगं । लष । लषां । सांई । सो । गद्द । अनहल । लभ्भेय । लभय । तुझीप ॥ ५ पाठान्तर-सुनिग । इंडिय । वांम । सुरतान । क । यांम ॥

नवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो : ३८० मीर हुसैन का देश छोड़ कर परिवार आदि के साथ नागौर की ओर आना ॥ कवित्त ॥ सुनिय वृत्त हुस्सेन । खेत अप्पन साधारिय ॥ छंडि नयर निस्संक । संक मन साह नसारिय ॥ निसा जाम इक आदि । लई सो पाच परस गुन ॥ तरुनि पुत्र परिवार । सजि सब साज सु अप्पन ॥ परिग्रह सुअप्प अग्गैं करिय । पांन पांन बंधी सिलह ॥ संचह्यौ नैर नागौर इह । तजिय देस निज गंठ गृह ॥ कं० ॥ ६ ॥ छ० ॥ ६ ॥ मीर हुसेन का पृथ्वीराज के यहां आना ॥ दूहा ॥ लै परिगह हुस्सेन गय । दिसि प्रथिराज नरिंद ॥ संभरि वै संभारि कैं । मनु आयौ अह्रदंद ॥ कं० ॥ ७ ॥ छ० ॥ ७ ॥ मीर हुसैन को आदर के साथ पृथ्वीराज का बुलाना और मीर का आकर सलाम करना ॥ कवित्त ॥ पातिसाहि तहिन * नरिंद । साहि पांरोज प्रसन्नौ ॥ घर घर साहि घरंन । छित्ति नीसान दिवन्नौ ॥ पर पठान उंचीगु । मान अगिवान अगन्नौ ॥ तिन में रख्यौ स.हि । आन गज्जन धर थन्नौ ॥ लब्भै सुमीर जंमी जहर । दुनियां दिन लगि दुअन थां ॥ हुस्सेन मीर सलाम करि । गौ चहुआनह पास थां ॥ कं० ॥ ८ ॥ छ० ॥ ८ ॥ ६ पाठान्तर-हुसेन । छंडिय । निसंक । सारोय । जांम । सादिल्लीय पात्र परम गुन । सथि । परगह । बंधिय ॥ ७ पाठान्तर-हुसेन । प्रथीराज । मनो ॥ ८ पाठान्तर-पातसाहि । * अधिक पाठ है । नौसांन । पठांन । गुमांन । मांन । अंगांनौ । अगानौ । मैं । रखै । यांनौ । लभै । जु । दुनी । हुसेन सलांम ॥

३८८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ४ पृथ्वीराज का शिकार खेलना और मीर हुसैन का सुन्दर दास को पृथ्वीराज के पास भेजना ॥ कवित्त ॥ पारधि पहु पृथिराज । रमै षहू पुर पासह ॥ बहिल चीस चिचक्क । ससिष रेसम धर रासह । ह्वै कुरंग फंदेत्त । डोरि बहु बंधि विनानिय ॥ जाम एक दिन आदि । मध्य खेलै मृगयानिय ॥ आयौ बसारि हुस्सेन तहैं । सुन्यौ राज मृगया समय । बुलाय दास सुंदर बिखिय । पठ्यौ प्रत्ति चहुआन तय ॥ छं० ॥ ९ ॥ रू० ॥ ९ ॥ सुन्दर छाया का स्थान देख कर मीर का डेरा डालना ॥ दूहा ॥ उत्तम ठाम सु छांह जड़, करि मुकाम बलवीर ॥ बुलि डेरां विधि विधि बरन, तहां बयट्ठौ मीर ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥ हरम (स्त्रियों) का डेरा पीछे की ओर डाला । दूहा ॥ डेरा हरम सुपिठ रखि, चहु पष्यां बर मीर ॥ पासवांन कुल सील सम, पास राखि बर नीर ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥ सुन्दर दास का पृथ्वीराज के पास जाना, पृथ्वीराज का मीर का कुशल समाचार पूछना और उसका सब हाल कहना ॥ दूहा ॥ सुंदर दास सुपास गय, जहां राज पृथिराज ॥ मिलिय विविधि पुच्छै कुसल, कह्यौ मीर सब साज ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥ ९ पाठान्तर–पारिधिरा । पृथीराज । षटूपूर । तीस । फंदैत । विनानीय । जांम मधि हुसैन । तहां । बुलाय । सुंदरि । पिन्नौय । चहुआन । रय ॥ १० पाठान्तर–उत्तिम । ठांम । मुकांम । बर वीर । बयठौ ॥ ११ पाठान्तर–पिठि । चहुं । पषां । पासवांन । शील । रखि ॥ १२ पाठान्तर–सु पास । राजन । पूंछै । पुछी ॥

नवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३८६ मंत्री, कैमास, चन्द, पुंडीर आदि को बुलाकर पृथ्वीराज का पूछना कि क्या करें क्योंकि दोनों तरफ विपत्ति है एक शाह का कोप दूसरे शरण आए को न रखना धर्म विरुद्ध है ॥ दूहा ॥ बोलि संचि कैमास बर, बोलि चंद पुंडीर ॥ राव पजून प्रसंग नर, गोयँद रा गुन नीर ॥ कूं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ १३ ॥ दूहा ॥ नेह मुष देखे न नृपति, विपति परी दुहु क्रम । इक सरना इक रयद्दन, इक धर रय्यन भ्रम ॥ कूं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥ चन्द का सलाह देना कि जैसे शरणागत होने पर विष्णु भगवान ने मत्स्य रूप धर कर पृथ्वी को अपनी सींग पर रक्खा था वैसे ही आप भी कीजिए ॥ गाथा ॥ मनसा धारि विरंचं । दच्छिन पग अंगुरी नषयं ॥ संभू मंन नरिंदं । सत जुगं आदि कीन पैदासं ॥ कूं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥* कवित्त ॥ संभू मन बरदान । खियै तप जोर ब्रह्म पढि ॥ सरन रखि वसुमती । होत कलपंत काल मचि ॥ नारद धरत बताइ । मच्छ रूपं जगदीसं ॥ दस हजार जोजनं । सृंग रचि ऊरध सीसं ॥ १३ पाठान्तर—मंत्र । पुंरीर । रा पजूंन । गोविंद ॥ १४ पाठान्तर—यक । रखन ॥ १५ पाठान्तर—* यह रूपक और इसके आगे वाले १६ और १७ रूपक संवत १६४७ की प्राचीन पुस्तक में नहीं हैं किन्तु इतर आधुनिक पुस्तकों में हैं ॥ १६ पाठान्तर—रषि । मद्ध । श्रग ॥

३६० पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ६ करि सत्त नाव तिष्ठि पर धरे । अनक्रांपित जिम गैन धुअ ॥ ऐसेऊ चंद कहि पीथ सम । गरुअ तन नृप अरग हुअ ॥ छं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ १६ ॥ * जैसे शिवजी गले में विष धारण किए हैं वैसे ही मीर को आप भी रखिए यह चन्द ने कहा ॥ दूहा ॥ संकर गर विष कंद जिम । बडवा अगनि समंद ॥ तै रषहु चहुआन तिम । षां हुसेन कहि चंद ॥ छं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ १७ ॥ * सुन्दरदास से पूछना कि सब स्त्रियां तो सुख से हैं और शाह से झगड़ा होने की बात क्या सच है ? दूहा ॥ मिलिय सु सुंदर दास तँहँ । पुच्छिय विधि विधिवत्त ॥ कहौ सुषी त्रिय सब विवरं । विरस साचि सैं सत्तू ॥ छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥ सुन्दरदास का कहना कि हूर की ऐसी एक पातुर शहाबुद्दीन के पास थी उसको लेकर हुसैन यहां चौहान की शरण में आया है ॥ दूहा ॥ पांच एक्क साचाब संग । हूर नूर गुन गान । वै आयौ हुस्सेन इत । सरन तक्कि चहुआन ॥ छं० ॥ १९ ॥ रु० ॥ १९ ॥ चन्द का पृथ्वीराज की प्रशंसा करना कि जैसे मोरध्वज के यहां अर्जुन ब्राह्मण बन कर शरण गया, भगवान ने सिंह बन कर मांस मांगा, शरणागत द्रोपदी का चीर बढ़ाया, वैसे ही तुमने शरणागत को रखकर क्षत्रिय धर्म की रक्षा की तुम्हारे माता पिता धन्य हैं ॥ १७ पाठान्तर-ते । रख्खौ । चहुआन ॥ १८ पाठान्तर-तहां । पुछिय । सुषि । त्रीय । विसर । सों ॥ १९ पाठान्तर-संग । गांन । हुसेन तब । तकि । चहुआन ॥

नवं समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१ कवित्त ॥ सोरन्नज दै सरन । गयौ दुज दोइ सु अर्जुन । सिंच रूप धरि कन्ह । संस संस्यौ करि गर्जन ॥ दैन चीर अरधंग । नृपति सिर कर वन धाख्यौ ॥ देखि महा सतवंत । प्रगट गोविंद उच्चायौ ॥ धनि धंनि मात पित धंनि तुअ । सरनागत भ्रम तैं रखिय ॥ पिछी कहंत कविचंद सौं । संभरि वै निचि सम उषिय ॥ छं० ॥ २०॥ रू० ॥ २०॥ शाहहुसैन का पृथ्वीराज से मिलना, पृथ्वीराज का आदर देना ॥ दूहा ॥ गयो राज सामंत सम । मिलिग साह हुसैन ॥ आदर नृप किन्नौ अदब । विवच प्रसंनिय वैनं ॥ छं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ २१ ॥ हुसैन को दक्षिण की ओर नागौर की जागीर देना । दूहा ॥ लिये सथ्य पृथिराज पहुं । गयौ सुपुर नागौर ॥ धरमायन कारथ†धवल । दिसि दच्छिन दिय ठौर ॥ छं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २२ ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को घोड़े हाथी आदि देना और दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ना ॥ दूहा ॥ भोजन भष्ये विविध वर, बहु आदर विधि कीन । मान सचातम रखि रज, राज उभय हय दीन ॥ छं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २३ ॥ दूहा ॥ धरिय डोरि हुस्सेन सिर, है बंधिय चैसाल । २० पाठान्तर-देन । धंनि धंनि । धंम । सों ॥

  • यह रूपक हमारी सं० १६४७ वाली प्राचीन पुस्तक में नहीं है पर आधुनिक पुस्तकों में है ॥ २१ पाठान्तर-नृप । प्रसंनीय ॥ २२ पाठान्तर-सथ । प्रथीराज । पहुं । धूंमाइन कायथ । दछिन । दषन । दै ॥ † धर्मोयन कायथ = पृथ्वीराज का दरबार मुंशी था । उसका काम है कि जो जो दरबार में आवें उनको उनकी नियत की हुई ठौर पर बैठावे । ऐसा बरताव अभी तक राजपुताने में प्रचलित है ॥ २३ पाठान्तर-भष । मांन । रखि ॥ उभै ॥

अप्प सु चिन्द्यि अवर दिन, रज पठवै रसाल ॥ छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ २४॥ कवित्त ॥ तरकंस पंच गिरंभ । तीन प्रति षगत तीन सच ॥ खुरासान कंमांन । पंच परमान मान जह ॥ गज सु एक सिंघ लीय । श्वेत तन मह रत्ति चह ॥ गुंजते मधुप कपोल । गज्ज भज्जै प्रेमल सच ॥ हय पंच साजि साकति सुनग । ऐराकी कुल उच्च जिहि ॥ अंमोल बज्र इक लाल दोय । रिंझ समिप्पय राज सचि ॥ छं० ॥२५॥॥२५॥ दूहा ॥ राजन रषिय सब्ब इह, प्रनवेज प्रति मंत । उभै परस्पर गंठि परि, संचिय पेम सुमंत ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६ ॥ शहाबुद्दीन का चार दूत अजमेर भेजना ॥ दूहा ॥ च्यारि दूत अजमेर पुर, थिर मुक्केसु विहान । आखेटक बन देषि कै, तक्कि गए चहुआन ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को कैथल, हासी, हिसार का पर्गना देना और शिकार में साथ रखना, यह सब समाचार दूतों का शहाबुद्दीन से कहना ॥ कवित्त ॥ आखेटक चहुआन । पास हुस्सेन संपत्तौ ॥ बार आइ चहुआन । भाइ घन ताहि दिषत्तौ ॥ नीति राव कुटवाल । तास अच राज सु अप्पिय ॥

  • वर कैथल हंसि हिंसार । राजपहो दै थप्पिय ॥ इह चरित देषि सब दूत तब । जाइ संपते साहि दर ॥ चरावर चरित जुग्गिनी पुरह । कत्थिय बत्त सें मुष्षंधर॥ छं० ॥२८॥ रु०॥२८ २४ पाठान्तर-धरी । हुसेन । चीन्हे । पठवै ॥ २५ पाठान्तर-तीन । पतंग । खुरासांन । कंमांन । पच परमांन मांन जिहि । सिंघलीय । मद रति । गज । भंजे । परिमल । है । उंच जिहि । दुइ । रोज ॥ २६ पाठान्तर-रषिय । घन । २७ पाठान्तर-यिह । मुके । मुक्कै । विहान । चहुआन ॥ २८ पाठान्तर-चहुआन । हुसेन । संपत्तौ । आय । भाद्र । दिर्षंतौ । नीतिराज । कुटं- बार । * अधिक पाठ है ॥ कैथल । हांसी । हिंसार । पटो । थपीय । जाय । साहिवर । चवर । चरित । जुगिनी । सुष ॥

नवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३६३ साहाबुद्दीन का क्रोध करना और अरब खां को पृथ्वीराज के पास भेजना कि भला चाहो तो हुसैन को निकाल दो ॥ छंद पद्धरी ॥ संभरिय बत्त साहाव दीन । उच्चरिय बैन अति कोप कीन ॥ मुक्कौँ दूत चहुआन पास । कढौ हुसैन जो जीव आस ॥ छं० २९ ॥ बेखियौ पांन तातार तव्व ॥ संजाव पांन उमराव सव्व ॥ पुच्छी सु बत्त किय दूत सार । थप्पी सु बत्त पुरमान वार ॥ छं० ३० ॥ आरव्व सेष लीनौ बुलाइ । बैब्रद्ध वृद्ध बुद्धी सुनाइ ॥ बंछै सुप्रेम सक लेहिं साचि । लज्जी अनंत आदब्ब थाचि ॥ छं० ॥३१॥ उच्चर्र्यौ बैन साहाव भास । आरब्य जाहु चहुआन पास ॥ अरबखाँ से कहना कि पहिले हुसैन के पास जाना जो वह पातुर को दे दे तो हम क्षमा कर देंगे, जो वह गर्व करके न मानै तो पृथ्वीराज के पास जाकर हमारा पत्र देकर समझाना ॥ अप्पै जु पाच हुस्सैन जाम । जैखाउ सम्भ हुसेन ताम ॥ छं० ॥ ३२ ॥ मुक्कों सुगुनह कीनौ पसाव । मैं दीन पच्छ करि खिमा दाव ॥ छंडै न पाच हुस्सेन गव्व । चहुआन भिज्जै सामंत सव्व ॥ ३३ ॥ जंपियै वयन चहुआन साइ । कढौ हुसेन नागौर थाइ ॥ अज़ीज पांव तुम सच उच्च । लिप्यौ सु पच हम परम रुच ॥ ३४ ॥ कढौ हुसेन तुम देस अंत । बंकै जो पेम सानौँ सुसंत ॥ रख्या हुसेन जो असु परेस । चतुरंग सेन सज्जीं विसेस ॥ छं० ॥ ३५ ॥ २९ पाठान्तर—उच्चरीय । मुक्तों । कढौ । हुसेन । नौं ॥ २९ ॥ ततार । तब । सब । पुछी । कीय । पुरसांन ॥ ३० ॥ आरब शेष । वृद्ध वृद्ध । बुद्धीय । बछै । पिम्म । लेहिं । बज्जी । चांदब । थाहिं ॥ ३१ ॥ उच्चर्यौ । वैनं । आरब । हुसैनं । जांम । संम्प । हुसेन । तांम ॥ ३२ ॥ मुक्क्यो । मैं । पछ । हुसेन । यब । सब । अंब ॥ ३३ ॥ बैन । सांइ । धाइ । अज़ीजखांन । संच उच्च । लिप्यै । रुच ॥ ३४ ॥ बक्कौ । जौ । यु । मांनौँ । रखौ । जौँ । तौ चतुरंग । सज्जी ॥ ३५ ॥ करौ । ॥ ३६ ॥ उच्चरि । गुंमांन । कहै । मांनौ । जाहु । शीघ्र । बांम । करौं । निस्मांम ॥ ३७ ॥ सथ । असहनन । नरयान । रथ । आरब । दोय । पष ॥ ३८ ॥ ४

२६४ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १० भंजौं सुनै नागौर ढेस । जीवंत बंदि बंधौं नरेस ॥ सामंत सूर सब करौं अंत । बंधौ सुबंध सा तहनि कंत ॥ छं० ॥ ३६ ॥ उच्चरि गुमान तन बत्त सूल । संक्षेप कहै मानौं स धूल ॥ तुम जाउ सिघ्र नागौर बाम । मति करौ एक छिन घर विश्राम ॥ ३७ ॥ तीन सौ सवार और रथ देकर अरब ख़ां को रवाना करना ॥ सै तीन दीन असवार सथ्थ । आरुढन दीन नरयान रस्थ ॥ एक महिने में अरब ख़ां का नागौर पहुंचना ॥ संच्यो शेष आरब्ब राह । दो पख पत्त नागौर थ्राह ॥ छं० ॥ ३८ ॥ रु० ॥ २८ ॥ अरब ख़ां का हुसैन से मिलकर समझाना, हुसैन का न मानना ॥ दूहा ॥ गय आरब नागौर धर । मिल्यौ साह हूसेन ॥ भोजन भष्प सुभाव किय । विविध प्रसन्नीय बैन ॥ छं० ॥ ३९ ॥ रु० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ कही बत्त हूसेन सम । जो कहि साच सहाब ॥ नह मंनिय सोमंत दिय । दिय आरब्ब जबाब ॥ छं० ॥ ४० ॥ रु० ॥ ३१ ॥ अरब ख़ां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ दूहा ॥ गयो शेष आरब्ब दर । लही षवर प्रथ्रिराज ॥ बोलि मक्तू संडिय सज्ज । सामंतन सब साज ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ दूहा ॥ मंझ सल्ल आरब्ब गय । मिंल्ल मंनिय सनमान ॥ दै आसन पुच्छिय कुसल । चाहुआन सुलतान ॥ छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३० पाठान्तर-हुसैन । भप । बिबह । प्रसंचे । बैन ॥ ३१ पाठान्तर-हुसेन । साहाब । नंह । आरब ॥ ३२ पाठान्तर-आरब । पबरि । पृथीराज । मक्ल । सांमंतां । सम राज ॥ ३३ पाठान्तर-आरख । सनमांन । पुछिय । कुशल । चाहुवांन । सुरतान ॥

नवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ अरब खां का कहना कि हुसैन खां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ छंद पद्धरी ॥ उच्चरौ वैन आरब्ब सेष । सल्लाम बहुत पनि एक एष ॥ कढ्ढौ हुसेन तुम देस अंत । साचाव साचि वंकौ सुसंत ॥ इं० ॥ ४३ ॥ जुगमीत अच्छिय उवरै न आदि । इस ताउ आउ बहु वैन सादि ॥ जंपे सुं दैल जे कहे साचि । कढ्ढो न वत्त गंभीर आचि ॥ ळं० ॥ ४४ ॥ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल हो गया, भौहें चढ़ गईं ॥ संभखिय वत्त प्रथिराज संत । त्रिकुटी कङ्कर द्विग रक्त जंत ॥ आरक्त मुष्प स्तुत ओन बुंद । कनमन्तिय कोप रोमांच जिंद ॥ इं० ॥ ४५ ॥ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसैन पृथ्वीराज के शरणागत है, छत्री का धर्म उसे छोड़ने का नहीं है ॥ उच्चरौ कोपि कैमास वानि । अतासनि आर्य सिंचौ सुजानि ॥ आरब्ब बोल दोल्यौ विरूर । सुरतान जानि जंप्यौ गहूर ॥ इं० ॥ ४६ ॥ पनि वुद्ध खच्चौ प्रथिराज तूर । ऋतुवित्त जुद्ध सामंत सूर ॥ हुस्सेन आइ प्रथिराज थान । जोधांन भ्रम पचीय आन ॥ ळं० ॥ ४७ ॥ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज, चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ जंपै सुवैन चहुभ्रंनि कन्ह । द्विग पनि रक्त रोमांच तंन ॥ रज भ्रम विषम बुझक्कै न साच । अनि राच्च जेम जंपै विराह ॥ इं० ॥४८॥ गज्जै न लज्ज कोपैं मृगिंद्र । उत्कृष्ट सूर सिर सहि न निंद्र ॥ गुरु तज्जि जंपि गोइंद राज । लग वैन गीर गरु वत्त साज ॥ इं० ॥४९॥ संज्वान तेज सम तेज बान । निरभै सुतासु चंपै पयान ॥ उच्चल्यौ चंद पुंडीर कोप । आदीत भाज रस दून छोर ॥ इं० ॥ ५० ॥

३४६ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १२ गज्जनै कांन केतुक सहाब । गरु अत्त वत्त जंपै कहाव ॥ हुस्सैन आइ प्रथिराज थान । सरनै सुकांन कढ्ढै नियान ॥ कूं० ॥ ५१ ॥ दल सज्जि सीम चंपै सुसाद्दि । दल भंजि ग्रहै प्रथिराज नाद्दि ॥ अरब खां का अपना निरादर होता देख उठ आना और ग़ज़नी को कूच करना तथा शहाबुद्दीन से सब समाचार कहना ॥ मानी न खेष आरब्ब बत्त । सामंत सूर देषे विरत्त ॥ कूं० ॥ ५२ ॥ आदरह मंद तजि उठ्यौ खेष । अंधार बदन द्रिग बहि तेष ॥ पुच्छीय जुगति नृप मचल जानि । उठि गर्व दुष्प मन छीन मानि ॥ कूं० ॥ ५३ ॥ चढि चल्यौ खेष रह साद देस । गज्जनै गयै। मन मानि रेस ॥ गय मचल साद्दि मिल्लि कहिय बत्त । सिर धूनि रीस करि नैन रत्त ॥ कूं० ॥ ५४ ॥ उठि गयौ साह बद्दल मछल्ल । आसंन साजि बैठो सथल्ल ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ । दर्बार करके शहाबुद्दीन का तातार ख़ां, अरब ख़ां, मीर जलाम, कासाम, खुरासा ख़ां, रहन मन्जन ख़ां, रुस्तम ख़ां, हाजी ख़ां, ग़ाज़ी ख़ां, जस्मन ख़ां, गज़नी ख़ां, सुहब्बत ख़ां, मीर ख़ां, आदि सरदारों को बुला कर सलाह करना ॥ कवित्त ॥ सजि आसन साचाव । साह काजी मत बैठा ॥ बोलि मक्कू तत्तार । बोलि आरबू दिन जेठा ॥ ३४ पाठान्तर-उचस्यौ । वैन । आरब । शेष । संलाम ॥ ४३ ॥ युगमौत । अथि । उवरें । वैन । जंपै । कहै । भाह । नाह । ॥ ४४ ॥ तथ्य । तथ । प्रथौराज । भृकटी । आरक्त । मुष्य । श्रुत्ति । कलि ॥ ४५ ॥ उचस्यौ । बांनि । आरन्य । संच्यौ । जांन । आरब । सुरतांन । जांनि ॥ ४६ ॥ प्रथीराज । अतुलित । युद्ध । हुसैन । यांन । जोधांन । बिब्रीय । आंन ॥ ४७ ॥ जंपै । चहुवांन । बुझै ॥ ४८ ॥ गर्जे । कोपें । मृगेंद्र । मृगेंद्र । उतकृष्ट । नरिंद्र । तजि । जपि । गोयंद । बैन ॥ ४८ ॥ तेज़वांन । निरभैं । सतास । पयांन । उचस्यौ । उप ॥ ५० ॥ गजनौ । केतक । जंपे । हुसेन । प्रथोराज । यांन । कांन । नियान ॥ ५१ ॥ सजि । सीस । प्रथौराज । मांनी । आरब । शेष । विरत्त । शेष । पुक्किय । नृप । जांनि । दुष । मांनि ॥ ५३ ॥ गजनैं । मांनि । धुनि । नैन ॥ ५४ ॥ मद्दल । सुथल्ल ॥ ५५ ॥

नवां समय १३ ] · पृथ्वीराजरासो । ३६० मीर जमांम कमांम । षांन षुरसांन न्यांन वर ॥ षांन रहंनं महंनं । षांन रुस्तंम मचा भर ॥ हाजीय षांन गाजीय षां । षांन जर्मन बंधव सुचिय ॥ गजनौय षांन महुवत्ति षां । मीर षांन सब बोलि लिय ॥ कूं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥ तातार ख़ां का कहना कि तुरन्त पृथ्वीराज पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ कवित्त ॥ कहै साचि साहाब । अहो तत्तार षांन सुनि ॥ जिन जुमत्ति उपज्जै । कहै सब षांन जानि मन ॥ गौ आरब चहुआन । फेरि आयौ सु सुनिय सब ॥ रुस्त रप्पि हुस्सेन । बोलि सामंत राज अब ॥ जंपिय तत्तार संजो सयन । छनै राज प्रथ्रिराज रन ॥ है गै सुबंध बंधौ रिनच । मेरे कि गहि कुद्है सुतन ॥ कूं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ खुरासान ख़ां का तातार ख़ां से कहना कि उसके बल को भी विचार लो जल्दी न करो ॥ दूहा ॥ कहै षांन षुरसांन तब । अहो षांन तत्तार ॥ चाहुआन सामंत बल । चिंति सुधिविधि विचार ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ अरब ख़ां का कहना कि उसका बल अतुल है तुम लोगों ने देखा नहीं है इससे ऐसा कहते हो ॥ दूहा ॥ कहै सेष आरब अतुल । बल सामंत नरिंद ॥ अबे न तुम दिषिय नयन । सजो सैन बिन बंध ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ शाह का बल पराक्रम का हाल पूछना ॥ दूहा ॥ कहै साचि आरब्ब तुम । कहौ सूर सामंत ॥ कछा क्रांति प्राक्रम कहा । सत्ति पयं पहु तंत ॥ कूं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ३९ ॥ ३५ पाठान्तर-बोल । मरु । जिठै । जमांम । कमांम । षुरसांन । न्यांन । महंनं ॥ ३६ पाठान्तर-मति । ऊपजै । जांनि । चहुआन । स सुनिय । हुसेन । सजौ । हनै । मेरै ॥ ३७ पाठान्तर-कहें । चित्त सुबुद्धि विचार ॥ ३८ पाठान्तर-जै । शेष । दिषिय ॥ ३९ पाठान्तर-आरब । तुत्र । क्रांति । सत्य ॥

३६८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १४ अरब खां का पृथ्वीराज के बल की प्रशंसा करना ॥ कवित्त ॥ दृष्ट मंच उच्चार । दिष्ट उठ्ठ चित इक्क थर ॥ क्रमत पेषि पच्चीस । भिल्लन सन एक्क दृष्टि पर ॥ सहस सुभर बाधंत । एक्क सामंत पराक्रम ॥ जामच्च दुप्पल्ल करै । ताम बाधंत वीर दस ॥ सिर परै सुचक्कै धर भिरै । परै श्रोन उठ्ठे सधर ॥ असिधार सूर उठ्ठै किलकिकि । एह पराक्रम सूर नर ॥ छं० ॥६१॥ रु० ॥४०॥ तातार खां का अरब खां की बात को हँसी में उड़ा देना, अरब खां का कहना कि अपनी आंख से न देखने से ऐसा कहते है। ॥ कवित्त ॥ हस्यौ षान तातार । एम घाजी सम वदिय ॥ जय रुनची बिन बषत । मरन भै डरै न कहिय ॥ कहि आरब तत्तार । अहो सामंत न दिष्टिय ॥ अतुल तेज बल अतुल । अतुल बल देव सुरषिय ॥ वे साम अंग रत्ते अतुल । अतुल मत्त कैमास भर ॥ उमरा अनंत देषे अनत । अतुल बल पहुचै न नर ॥ छं० ॥६२॥ रु० ॥४१॥ शाह का क्रोध करके तातार खां को चढ़ाई के लिये प्रस्तुत होने की आज्ञा देना ॥ दूहा ॥ कहै साचि गोरी गहअ । अहो षान तत्तार ॥ काल्हि तरीक सुडंच दिन । चढि अरि सद्धौ सार ॥ छं० ॥६३॥ रु० ॥४२॥ दूहा ॥ उठि गोरी दिन्ने बहुरि । गयौ सु अंदर साह ॥ बहुरि षान मीरं बरा । अति चंचल तुर ताह ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ४३ ॥ ४० पाठान्तर--उच्चार । उठ । इक्क । पच्चीस । दृषि । दुप्ल । तांम । परै । सुहक्कै । उठैं । ऊठैं । ४१ पाठान्तर--तत्तार । वदिय । भय । कहिय । काहि । दिषिय । रषिय । सांम । उंमरा । अनंत ॥ ४२ पाठान्तर--काल्हि । तेरीक सुं । सधौ ॥ ४३ पाठान्तर--दिनं ॥

नवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासो । ३६६ शाह के जी में रात दिन चौहान की चिंता लगी रहना ॥ दूहा ॥ तपै साचि गोरी सबर । चित सान्नै चहुआन ॥ वैरोचन की साप ज्यौं । कीटी अंग प्रमान ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ अरिल्ल ॥ जग्गत निसि झंपत सुरतानह । घरी सत्त रहि सेष प्रमानह ॥ जगि आयस दिय दीन निसानह । चिंता साचि चढी चहुआनह ॥ छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ४५ ॥ सेना के साथ चढ़ाई के लिये शाह का तयार होना ॥ छंदमोतीदाम ॥ भए सुर तीन धुनक निसान । चल्यौ अश्व सज्जि सिल्है सुरतान ॥ चढे सब पांन सु उम्मर मीर । सजे सचनइ बजे रस बीर ॥ छं० ॥ ६७ ॥ बजे सब बाज भयानक भाइ । चितैं चिय्बुद्धि जिनैं जन नाइ ॥ चल्यौ सब सज्जिय सेन गरिष्ट । परी दस दिग्ग सुध्रुधरि दिष्ट ॥ छं० ॥ ६८ ॥ अशकुन होना सवह सियांन सुसेन कपोत । सनंमुष साचि दिष्यो दज दोत ॥ भयौ दिसि वामिय काग्ग करार । रुक्यौ दिवि धोमय धूम गभार ॥ छं० ॥ ६९ ॥ सनंमुष देषिय जंबुक सेन । विरो मिन्नि चंपचि भग्गचि तेन ॥ क्रमें तस उप्पर गिद्ध असंख । चवै सुर रुद्र पसारिय पंष ॥ छं० ॥ ७० ॥ ४४ पाठान्तर-चहुआन । भृंग । प्रमानं ॥ ४५ पाठान्तर-जगत । जंपत । सुरतानंह । सत्त । रही । प्रमानंह । निसानंह । निसानंह । चहुआनह ॥ ४६ पाठान्तर-मोतीदाम । निसांन । साजि । सित्ल्हे । सुरतांन ॥ ६७ ॥ रजे । चितैं । जिनैं । सज्जिय । गरिद्व । दिग्ध । घुंवरी । दिष्ट ॥ ६८ ॥ सिंचाम । वांमीय ॥ ६९ ॥ ऊपर । पसारीय ॥ ७० ॥ सुरतांन । रहो । कहु । कहैौ । आज । गह्यो चल मंनहु चढि सगुंन ॥ ७१ ॥ भयै भये । प्रथीराज । बलु । सामंत ॥ ७२ ॥ हनों । चहुवांन । गहौं । मुक्क । जुझ ॥ ७३ ॥ चल्यौ । सुरतांन । गजिय । निसांन । जलं थल हूअ थलं जल चार । ७४ ॥ लप । समुझिन । सुरतांन । मिलांन २ । चहुवांन ॥ ७५ ॥

४०० | पृथ्वौराजरासो । | [ नवां समय १६ अरब खां का कहना कि आज ठहर जाइए शकुन अच्छा नहीं है ॥ गही सुरतान सु आरब बग्ग । रहौ दिन आज सगुंन न जग्ग ॥ रहै कुहु अज्ज ततार सुदिन । मची चढि चल्लहु मन्नि सगुन्न ॥ कं० ॥७१॥ सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी बात है जो इतना बिचार करते हैं ॥ कहै सुरतान अहो तुम क्रूर । भयं भय क्षित्यु सु भंषहु नूर ॥ कहा बल जुद्ध कहै प्रथिराज । कित्तौ बल सामत जुडिच्च साज ॥ कं० ॥७२॥* छनां रन सूर जिके चहुआन । गहैं जुध राज सु छंडिय प्रान ॥ कहा डर काफर दाषहु मुक्झ । कहा भर आवध आंगरि जुक्झ ॥ कं ॥ ७३ ॥ * नसंनि चमंकि च्ल्यौ सुरतान । टमंकिय गज्जिय न्ह निसान ॥ जल व्यल होय थलं जल भार । असमग्गह मग्ग चल्लै गछिन्लार ॥ कं० ॥७४॥ मिल्यौ इक साहन लष समुंद । समुझिकन कंन भयो सुर मुंद ॥ चल्थौ सुरतान मिलान मिलान । बढी अति चिंत दुनी चहुआन ॥ कं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ४६ ॥ शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का यह समाचार नागौर में हुसैन को देना ॥ दूहा ॥ गयौ साचि चहुआन घर । दिण मिलान मिलान ॥ गए सुचर नागौर पुर । कही षबरि सुरतान ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुनकर सरदारों को बुला- कर सिंध तक शाह के पहुंचने का हाल कहना ॥ कवित्त ॥ सुनिय षबरि प्र थराज । कचिय जे चरन चरित सद्द ॥ बोलि मंत्रि कयमास । बोलि चामंड गुभक्क गद्द ॥

  • यह ७२ और ७३ दो छंद सं० १६४७ वाली पुरानी पुस्तक में नहीं किन्तु इतर में हैं ॥ .४१ पाठान्तर-चहुवान । धर । दीए । मिलांन २ । सुंचर । सुरतांन ॥

नवां समय १० ] पृथ्वीराजरासो । ४०१ बोल्लि चंद पुंडीर । बोल्लि पीची प्रसंग बर ॥ बोल्लि गज्जि गहिल्लोत । बोल्लि काकन्द नाह नर ॥ बोलेति सव्व सामंत भर । कही वत्त सो कहिय चर ॥ सासंत संत भर सव्व मिल्लि । सिंधु सुचंपिय साह घर ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ४८ ॥ लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥ दूहा ॥ कहत सव्व सामंत मति । चढि दल्ल सजौ समंकि ॥ सुनिव मंति कायमास कहि । करहु निसान तमंकि ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ युद्ध की तयारी होना ॥ गाथा ॥ भय टामंक निसानं । पत्तं निज गेह सूर सामंतं ॥ वाजे वज्जि अनेकं । चय संगे राज चहुआनं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रु० ॥ ५० ॥ गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशिर्वाद देना, बहुत कुछ दान कराना और वेद मंत्र से तिलक करना ॥ छंद पद्धरी ॥ आये सुनाम गुर राम राज । पढि पच मंच द्विज बोल्लि साज ॥ ग्रह नव सुदान विधि विद्ध दीन । वेदंत विप्र अभिषेक कीन ॥ छं० ॥ ८० ॥ चव सहस हेम दिय विप्र दान । अस्सेष वेद चय साम गान ॥ दिय दान भूरि पंषी सु चंड । दीनौ सु अध्य जिन हध्य मंडि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ जै जया जोच जंपी सु आन । मंगल सुचार चव पढि गान ॥ आसिय दयन चहुआन रान । गुरु राम जज्जि आहुत्त प्रान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ ४८ पाठान्तर-प्रथीराज । चरनि । कैमास । भुक्कू । एह । पीचि । गजि । सब । मिल्लि ॥ ४९ पाठान्तर-सुनै । मंत । कैमास । करहु । निसांन ॥ ५० पाठान्तर-पतं । गेह । सामंता । चहुआनं ॥ ५

४०२ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १८ दिय तिखक पच पढि वेद संच । आरोपि कंठ छन संच जंच ॥ कज दरस वाम चकोर आनि । कब्बूत जानि जंपै सु बानि ॥ छं० ॥ ८३ ॥ षंजन सुषिंड किय दरसि दिस्स । आदरस दिषि किय असिपरस्स ॥ चिंत्यौ सु चित्त जपि उभय कांत । संग्यौ सु हंस हय तेजवंत ॥ छं० ॥ ८४ ॥ बिची सु जाति जोवंन पूर । बंच्यौ कि मनौं नृप रथ्य सूर ॥ भगवान का स्मरण कर यात्रा करना ॥ साकत्ति सब्ब सञ्जी सु बानि । धरि और हेम नृप अग्ग आनि ॥ छं० ॥ ८५ ॥ चंपै सु चढ्यौ नृप वाम पास । जै जया सह आयास आस ॥ चढि चल्यौ बंधि आवड् राज । सामंत सब्ब चढि सूख साज ॥ छं० ॥ ८६ ॥ नीसान ताम बज्जे सु घाव । आकास धरा फुद्दे निघाव ॥ संबत्त तीस अरु पंच माघ । तेरस्स स्वेत सुभ जोग साध ॥ छं० ॥८७॥ * हुसैन का भी अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज से आ मिलना ॥ सजि सथ्य चढयौ हुस्सेन सेन । बंधे स तोन भर मीर ऐन ॥ हुस्सेन सथ्यमिलि सक्स एक । उर सामि भ्रम बंधें सुतेक ॥ छं० ८८ ॥ प्रथुिराज आइ किन्हौ सलाम । आदर अदब दिय राज ताम ॥ मिलि चल्यौ सेन अर तेजवंत । बज्जे सुबज्ज जय हेमवंत ॥ छं० ॥ ८९ ॥ दस कोस पर डेरा देना ॥ दस कोस जाइ दिन्नौ मेलान । डेरा सुदीन जनु सुथ्य थान ॥ छं०॥९०॥दू॥३१॥

  • इस ५१ रूपक के छंद ८७ के दूसरे पद में इस हुसेन और चित्ररेखा विषयिक शहाबुद्दीन की चढाई का मुकाबिला करने को जाने का सनन्द अर्थात् पृथ्वीराज का तीसरा शाक ११३५ माघशुक्ला १३ शुभ योग कहा है। वह जैसे कि अबतक इस महा काव्य में आए हुए सब सनन्द अर्थात् प्रचलित विक्रमी संवत् से आदिपर्व्व के रूपक ३५५ । में कहे अंतर बर्ष ९० । ९१ के जोड़ने से मिल जाते हैं वैसे मिल जाता है-११३५+९० । ९१-१२२५ । २६ ॥ ५१ पाठान्तर-रांम । दांन ॥ ८० ॥ दांन । असेस । सांग गांन । दांन । स चंड । अथ । हथ । जंपय । आंन । पठि । गांन । आशिष । वैन । चहुवांन । रांम । जजि । प्रांत ॥ ८२ ॥ हुन- मंत । घास । चकोर । आंनि । जांनि । बांनि । दरस्स । दरस । दिस । दिषि । परस । चिंत ॥ ८४ ॥ बंच्यौ सुचि । मनौ । रथ । हाकत । सब । सजी । वांनी । ओर । आंनि ॥ ८५ ॥ स चढ्यौ । सबद । आउहु । सब । सुख ॥ ८६ ॥ नीसांन । तांम । बजै । स्वेत ॥ ८७ ॥ सजि सथ संपत्त हुसेन । सेन । सतीन । एन हुसेन । सथ सांमि । बधै ॥ ८८ ॥ प्रथीराज । आय । कीनौ । सलांम । अदब । तांम । बजे । बज्जय ॥ ८९ ॥ कीनो मिलांन । शुभ । धांन । यांनं ॥ ९० ॥

नवां समय १६ ] पृथ्वीराज रासो । ४०३ दूतों का सुलतान को पृथ्वीराज के चढ़ आने का समाचार देना ॥ दूहा ॥ देखि चरित नृप साह चर । गए पास सुरतान ॥ कहै सेन संमुष रजै । चदि आयौ चहुआन ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु ॥ ५२ ॥ सुलतान का चढ़ाई के लिये धूम धाम से चलना ॥ दूहा ॥ सुनि चलि साहाय चर । दिय निरघोष निसान ॥ चयौ सेन सज्जे सिलह । करिव फौज सुरतान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु ५३ सुलतान की चढ़ाई का वर्णन ॥ छंद मोतीदाम ॥ चल्यौ सुरतान सुसज्जिय फौज । बजे बर वज्जन बीर असोज ॥ भयौ गज घुंमर घंट निघोर । मनौ झुकिक्रंच भयौ सुर रोर ॥ छं० ॥ ८३ ॥ गजें गज मद् मनौ घन भद्द । चिकार फिकार भए सुर रुद्द ॥ तुरंग मचीस कडक्क लगाम । खरक्किय पप्पर तोन लुतांन ॥ छं० ॥८४॥ * चमंकत तेज सनाह सनाह । करें धर पहर राह बिराह ॥ झनक्कत टोप झुटोप उतंग । मनौ रज जोति उद्योत विहंग ॥ छं० ॥ ८५ ॥ दमंकत तेज कमान कमान । चितं चित मीर रची महमान ॥ भले भर सांइय अंस सगत्ति । खपै धर जीवन जत्तिन गत्ति ॥ छं० ॥ ८६ ॥ नमैं निज सांइय पंच वषत्त । सिपारच तीस पढै दिन रत्त ॥ नमैं निज सेष धरम सरम । फमै रच रीति कुरान करम ॥ छं० ॥ ८७ ॥ दिढंबर बाचरु काकूह मीर । तर्फेनीय एक रत धर बीर ॥ सवध्य वेध करें तम तांह । भ्रमंतिय पंषि इनै छित छांह ॥ छं० ॥ ८८ ॥ धरै इक एक अनेक सुमान । झणक्कत मुंड तवल्लह मान ॥ धरै धर नाहिय स्याहिय सीस । सिरक्कचि चंबर घुमर दीस ॥ छं० ॥८९॥* ५२ पठान्तर-सुरतान । कहै । चहुवांन ॥ ५३ पठान्तर-चरित्र । चरित । सहाब । निसांन । सजे । सज्जेह । सुरतांन ॥ *यह पद Caufield Mss. में नहीं है।