राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
१० राजतरंगिणी नीलमत पुराण में मुख्य नागों किंवा जलस्रोतों अथवा चश्मों का वर्णन मिलता है। कश्मीर मण्डल के चतुदिशाओं में स्थित दिक्पाल नागो तथा सहस्रो नागों के होने का उल्लेख किया गया है (जो० ९००- ९०५) लगभग ६० नदियो का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है वे कश्मीर तथा मद्रदेश दोनों क्षेत्रों की है : ज्ञात · अपगा (अयुक्त) चन्द्रभागा (चिनाव) गोदावरी (गोदर पर्वत के समीप) गोतमी (गोमती ? वाराह पर्वत के समीप) हर्यपथा (आरपथ) अनन्त नाग के समीप वितस्ता में मिलती है। हिरण्या (कनकवाहिनी) इरावती (रावी) कालोदक (नुन्द कोल गंगा सर से उद्गमित स्रोतस्विनी) कनक वाहिनी (कनकनी) कया (अमया-गंगोद्भेद समीपस्य) कौण्डिन्य-कौलिन्य (नोवन्धन समीपस्य कौण्डिन्य सर से उद्गमित स्रोत) कृष्ण (कृष्ण गंगा) क्षीर नदी (वत्सकुल) दूसरी मधुवती बन्दपोर का नाला है कुलेस गांव के समीप उत्तर मे ऊलर लेक में मिलता है। श्वेत गंगा (एकमत में चित्ती नदी) मधुमती (पदुमती अल्बेरूनी कथित) माहुरी (मवुर) श्याला (हमल) सन्ध्या (सुन्दवदार) सरस्वती (कनक्तोरी) सिन्धु, तोषी (तोही ?) निलप्रस्था (माहुरी) उहृ (उह्न पाणिनि तथा ऊर्ध्वः दि० धर्मोत्तर पुराण) वशोका (विसाऊ) वितस्ता (झेलम)। अज्ञातः अधदुधान, भूर्जला, चन्द्रावती, चतुर्वेदी, चित्रपथा, देवहूत, देवकुल्या, देविका (देघ ?) धन्याधरणी, गगा, (कश्मीर की अनेक नदियों को गंगा कहते है) गोशृन्दी, कुलार्णा, कुमुनारी, भृङ्गी, मालिनी, मन्दाकिनी, मृग-मृगनन्दा, पालासा, परोष्णि, राहुला, रामहृद, ऋषिकुल्या, समूला, सरसा, शाण्डिली, शतशिला, शिलामा, सुधा, सुगन्धा, सुखा (सुर्कग ?, तेलाला, त्रिकोटि, वैतरनी (एकमत है। सुपियान के अधोभागीय रामग्यार नदी है।) विश्वमित्र। महापद्म सर अर्थात् ऊलर लेक का वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है। ऊलर लेक के स्थान पर पूर्व काल में चन्द्रपुर नगर था। उसके जल में लोप अर्थात् जल में डूब जाने के पश्चात् उस स्थान पर ऊलर लेक बन गया। सम्भव है कि पुरातन चन्द्रपुर का समस्त नगर भूचालादि के कारण भूमिस्य हो गया हो। भूमि नीचे दब गयी हो। इस प्रकार उस स्थान पर पानी भर कर सर का रूप ले लिया होगा। कश्मीर में भूचाल आना साधारण बात है। दो हजार वर्षों में भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत कुछ परिवर्तन हो जाना सम्भव है। पुराण में शिव, शंकर किंवा महादेव से सम्बन्धित तीर्थों का वर्णन बहुत मिलता है। अन्य देवताओ से सम्बन्धित तीर्थों का पर्याप्त उल्लेख है। किन्तु कश्मीर में शैव धर्म, शैव तन्त्र एवं दर्शन का अत्यधिक प्रभाव होने के कारण अत्यधिक तीर्थ तथा देवस्थानो का सम्बन्ध शिव, उनके गण तथा शक्तियों से है। भूतेश्वर माहात्म्य का उल्लेख नीलमत में आता है। इस माहात्म्य की गाथा में हरमुकुट पर्वत के अनेक सरोवरों, तीर्थों तथा पवित्र स्थानों का वर्णन है। यह पर्वत शिव तथा पार्वती के तीर्थों से सम्बन्धित होने के कारण अत्यन्त पवित्र माना गया है। कश्मीर के धार्मिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व इस पर्वत को दिया गया है। नीलमत पुराण में कश्मीर के पर्वतों का वर्णन है। हिमालय के अतिरिक्त बहिर्गिरि, (चुल्ल हिमवन्त), अन्तर्गिरि (महा हिमवन्त) उपगिरि (शेवालिक तराई) उशीरूक (द्वार देश समीपस्य दक्षिण कश्मीर)। यह पर्वत विनय वर्णित उशीरध्वज, दिव्यावदान का उशीर गिरि, पाली साहित्य का उशीनर, कथासरित-
परिशिष्ट क ११ सागर का उशीनर गिरि, तथा नीलमत का उसीरका है। कनसैल के उत्तर एक पहाड़ को उशीरगिरि कहते हैं। पंजाब के उत्तर पीरपंचास पर्वत श्रेणी है। वह दक्षिणी तथा दक्षिणो पश्चिमी कश्मीर की सीमा है। क्षेमेन्द्र उसे पंचाल धारा कहता है। नीलमत मे यह शब्द नहीं है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश शिखर का उल्लेख है। तीनों बनिहाल पास के पश्चिम है। उनमें नौ बन्धन सबसे ऊँचा शिखर है। यहीं मत्स्यावतार में विष्णु ने नाव बाँधा था। हरमुकुट किंवा हरमुण्डपर्वत हरमुख शिखर उत्तरी कश्मीर का है। वह सत्तरह हजार फिट ऊँचा है। उत्तर मानस कश्मीरी गंगा का स्रोत है। इस पर्वत के उत्तर पूर्व पाद में हिमानी के समीपस्थ है। नन्दि क्षेत्र तथा भूतेश्वर के तीर्थ यही है। मन्दि पर्वत मुन्द लोक (कालोदक) को हिमानी से भरता है। भरत गिरि हरमुकुट के दक्षिण पूर्व है। अमरेश्वर हिमाच्छादित अमरनाथ है। महादेव गिर धुर पश्चिमी अत्यन्त उच्च शिखर है। वह सिन्धु उपत्यका तथा पूर्वीय पर्वत माला के मध्य है। इन्द्र कील तथा गौरी शिखर का नीलमत में वर्णन है। एक मत है। कश्मीर के पश्चिम किसी पर्वत का वह नाम है शारदी के समीप । नीलमत पुराण तीर्थों तथा पवित्र स्थानों का वर्णन करता है। मुख्य उनमें निम्नलिखित हैं : ज्ञात : एल पत्र नाग (विचार नाग ग्राम समीपस्थ) अक्षपाल नाग (अचबल), अनन्त नाग, बहुरूप (योरू ग्राम—पीरपंचाल पर्वत को दिशा में) भद्र काली (बदरकल ग्राम क्रमसर से चार मील दूरस्थ) भेड़ा देवी (बुदवार श्रीनगर से पश्चिम, गंगोद्भेद तीर्थ) भीमा देवी (फाक परगना में, डलतट पर खान ग्राम) भूतेश्वर (हरमुकुट पर्वत श्रुतसर) चक्रधर तीर्थ (तस्कदर उद्भ), चोर मोचन=चीर प्रमोचन (ग्रंग ग्राम) देवसर (छोटा सर, दक्षिण पूर्व उत्तर परगना) गणेश (गणेश बल लिदर नदी दक्षिण तटस्थ) गौतम नाग (अनन्त नाग के उत्तर) हंसद्वार (मुन्द प्रस्थ गिर केसमीप । एक मत इसे हुंजा मानता है) हस्तिकर्ण नाग (गांव बाग होम अर्थात् मरहोम के दक्षिण पूर्व दो मील पर) इष्टिका पथ (लार परगना में राम रादन गांव) ज्येष्ठेश (हरमुकुट पर्वत मूल भूतेश्वर वशिष्ठाश्रम वांगय समीपस्थ) कपटेश्वर, (कोथर ग्राम) कपिल तीर्थ (कपटेश्वर समीपस्थ ?) कालोदक (मुन्दकोल) कोटि तीर्थ (बारहमूला समीपस्थ कोटिसर) खण्ड पुच्छ नाग (अनन्त नाग समीपस्थ झनबल) लोकपुण्य, (द्रिंग परगना में लरिकपुर समीपस्थ नाग) लोवार (लिवर ग्राम—विजब्रोर से १० मिल उत्तर-पूर्व स्थित) महापद्म (उलर लेक) मानस (मनसा बल) नन्दन नाग। (नन्दन सर—दरहल पास समीपस्थ) नन्दिकुण्ड, नन्दि पर्वत, नन्दोश्वर (नन्दिक्षेत्र—हरमुकुट पर्वत पाद में) नारायण स्थान (भरस्तान ट्राल घाटी में) पंचहस्त (पंजय ग्राम—दिवसर परगना में) पाण्डव तीर्थ (पाण्ड चक—श्रीनगर से दक्षिण-पूर्व पाच मील स्थित) पुष्कर (पोस्कर-फिरोकपुर तथा कंग मध्य, पहाड़ी मूल की पूर्व दिशा में) राम तीर्थ (रामुह ग्राम) स्वयम्भू (मच्छीपुर परगना में सुयम ग्राम) सोदर नाग (सुदर बल) तक्षक नाग (जयवन स्रोत समीपस्थ जेवन स्थान) तारा सर (तर सर सिन्ध उपत्यका ?) त्रिपुरेश (त्रिफर गांव ढल से तीन मील दूरस्थ) वराहमूला (वारह मूला) वशिष्ठाश्रम (वंगथ) वासुकी नाग (एक नाग पंचहस्त उपत्यका के दक्षिण या भद्रव ?) (विजयेश्वर विजद्रार) अज्ञात : चन्द्रसर (सम्भवतः सिन्ध नदी तथा कश्मीर के मध्य ऊँचे पर्वत पर है)
१२ राजतरंगिणी भारतवर्ष के निम्न लिखित तीर्थों का उल्लेख नीलमत में प्राप्य है : गंगा द्वार, कुशावर्त, वृद्धजाह्न, नील पर्वत (कनखल), नैमिसार, हयशिरप, प्रयाग, वाराणसी, गंगा सागर संगम, नदी वरुणा, असी, ब्राह्मणी, वैतरणी, महानदी, तमसा, शोण, सरयू, इक्षुमती, शतकुम्भा, वेद- स्मृति, केदार, बदर, भृगुतुंग, यह सब तीर्थ पूर्व, पूर्व दक्षिण, तथा उत्तर पूर्व वर्तमान कनखल के हैं । पंच- नद, कुरुक्षेत्र, पृथूदक, प्रभास, पुष्कर, रैवत, सिन्धु सागर संगम, कनकाबल के पश्चिम दिशा में स्थित हैं । क्षिप्रा, शाकम्भरी, विशाला, गोकर्ण, अगस्त्याश्रम, सुवर्ण, नर्मदा, रुद्रकोटि, सुमन्धा, गोदावरी, ताम्र- वर्णी, उत्पलावती, तथा कावेरी कनखल के दक्षिण स्थित है । शिवकी वाराणसी से हरमुकुट की यात्रा के प्रसंग में नीलमत पुराण मे, प्रयाग, अयोध्या नैमिष, गंगाद्वार, स्थानेश्वर, कुरुक्षेत्र, शतद्रु, विपाशा, तथा इरावती का उल्लेख मिलता है । कपटेश्वर माहात्म्य के सम्बन्ध में कुछ सामग्री नीलमतपुराण से प्राप्त होती है । कपटेश्वर वर्तमान कोठर ग्राम है । शिव तथा शैवमत से सम्बन्धित तीर्थों के पश्चात् विष्णु भगवान् से सम्बन्धित तीर्थों तथा देव-स्थानों का वर्णन मिलता है । काश्मीर में शिव माहात्म्य तथा शिव एवं पार्वती के संदर्भ में जितनी अधिक सामग्री, साहित्य तथा लेख मिलते हैं, उसकी अपेक्षा भगवान् विष्णु के विषय में स्वल्प साहित्य, सामग्री तथा लेख प्राप्य हैं । नीलमत पुराण के प्राप्य संस्करण के अनुसार प्रकट होता है । उसके रचना अथवा संस्करण के समय कश्मीर में शैव मत तथा शिव पूजा का विशेष प्रचार था । शिव तथा पार्वती सम्बन्धी अनेक व्रत, उपवास, उपासना तथा पूजा का प्रकार कश्मीर में प्रचलित था । विष्णु पूजा का महत्व जनता में शिव के पश्चात् था । प्रारम्भ से ही शिव भक्ति तथा उपासना कश्मीर में अधिक लोकप्रिय भी है । इससे प्रकट होता है । शिव उपासना तथा तत्सम्बन्धी गाथाओं का प्रमुख स्थान कश्मीरी जन जीवन में था । उनका जीवन शैव दर्शन तथा तन्त्र द्वारा प्रभावित था । ( ११६९-१२४८ ) कश्मीर के तीर्थों का विस्तृत वर्णन नीलमत पुराण के श्लोक संख्या १२७१-१३७२ मे किया गया है । इनका अध्ययन कश्मीर के तत्कालीन भौगोलिक ज्ञानवर्धन निमित्त विशेष महत्व रखता है । तीर्थों, उनके स्थानीय महत्वों और उनसे सम्बन्धित गाथाओं एवं जनश्रुतियों तथा उनके माहात्म्यों का विशद वर्णन सम्पूर्ण नीलमत पुराण में मिलता है । नीलमत पुराण के वर्णनों तथा भौगोलिक स्थितियों के कारण तीर्थों तथा उल्लिखित स्थानों का पता निश्चयात्मक ढंग से लगाया जा सकता है । नीलमत पुराण के भौगोलिक वर्णनों के आधार पर आधु- निक विद्वानों ने अनेक स्थानो का सफलतापूर्वक पता लगाया है । तीर्थों तथा देव-स्थानों के मूल नाम तथा उनकी भौगोलिक स्थिति के भूल जाने का कारण कश्मीर की ९० प्रतिशत जनता का हिन्दू धर्म त्याग कर मुस्लिम धर्मावलम्बी हो जाना है । उनकी दृष्टि में इन तीर्थों तथा देव-स्थानों का कोई धार्मिक महत्व नही रह गया था । इस समय शायद ही कोई प्राचीन देव-स्थान तथा तीर्थ होगा जो मुस्लिम जियारत, मस्जिद या कब्रिस्तान में परिणत न कर दिया गया हो अथवा उनके पास जियारतें आदि न बना दी गयी हों । इसमें मुसलमानों को दोष नहीं दिया जा सकता । उन तीर्थों की कोई खबर लेने वाला नही था । उनकी पूजा, उपासना, मरम्मत आदि समाप्त हो गयी । ये काल के थपेड़ों में नष्ट होने लगे । उनका इतिहास लोग भूल
परिशिष्ट क १३ गये। उनसे सम्बन्धित गाथाओं का लोप हो गया । इनके स्थान पर नए धर्म के इतिहास, गाथा तथा कथा- नकों का प्रचलन हो गया। खण्डित मूर्तियों, मन्दिरों, देवस्थानो, तीर्थों के उपेक्षित ध्वंसावशेषो, उनके पत्थरों तथा ईंटों का महत्व उनके इतिहास के इतिवृत्त के साथ खण्डहरों के ईंट पत्थरों से अधिक नहीं रह गया। इन्हें नवीन धर्म ग्रहण करने वाली जनता अपने नवीन जियारतों, मजारो, मस्जिदों तथा मकानों में लगाने लगी। सिख तथा डोंगरा काल में पुराने तीर्थों, देवस्थानों आदि को पुनः जानने की इच्छा हुई । इस दिशा में आधुनिक विद्वानों तथा अन्वेषकों ने स्तुत्य प्रयास किया है । प्राचीन पुस्तकें पढ़ी जाने लगी। उनके आधार.पर तीर्थों तथा.देवस्थानों की खोज होने लगी। ध्वंसावशेषों, खण्डित मूर्तियों, मन्दिरो के खण्डहरो को अन्वेषक विद्वान् खोजने लगे। इस विषय पर साहित्य का निर्माण होने लगा । लोकतन्त्र की स्थापना के पश्चात् तथा उसके पूर्व उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में खनन कार्य तथा वैज्ञानिक ढंग पर अध्ययन आरम्भ हुआ। इस समय केन्द्रीय तथा राज्य सरकार दोनों द्वारा संचालित पुरातत्व विभाग कार्य कर रहा है। कश्मीर के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ा है। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। नीलनाग के जल स्रोत अर्थात् (वीर नाग) के भौगोलिक चित्रण से आरम्भ होकर बारहमुला की गहरी घाटी में नीलमत पुराण का आख्यान समाप्त होता है । नीलमत पुराण पर डाक्टर वेद कुमारी द्वारा काशी विश्व विद्यालय की थीसिस नीलमत पुराण द्रष्टव्य है । उसमें आलोचना के साथ अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है । अनुवाद के अतिरिक्त थीसिस का शेष भाग पुस्तकाकार रूप में जम्मू तथा कश्मीर एकेडमी आफ आर्ट कलचर एण्ड लैग्वेज श्रीनगर जम्मूसे सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका है ।
अष्टम तरङ्ग: द्वितीय लोहर वंश, जयसिंह शासन व उपसंहार
परिशिष्ट ख हिमालय ( तरंग १ : २५ पृष्ठ २४ ) वैदिक साहित्य में हिमालय का वर्णन मिलता है । ऋग्वेद—१०:१२१:४, अथर्ववेद—३:१५:३, ४.९.९, ५.५.२-८, ५:२५.७, ६:२४:१, १२.१.१, १६:३९:१, २४:३०, २५:१२, ऐतरेय ब्राह्मण ८ १४: । तैत्तिरीय संहिता ५.५ ११.१ प्रायः सभी पुराणों में हिमालय का वर्णन प्राप्य है । मुख्यतः निम्नलिखित स्थल द्रष्टव्य हैं : भागवत पुराण १:१३:२९; १:१३.५०; मत्स्य पुराण १८० . कूर्म पुराण; पूर्वभाग अध्याय १२; कालिका पुराण १४ तथा ५१; वाल्मीकि रामायण : किष्किन्धा काण्ड · ५३ तथा ५६ श्लोक १ । नीलमत पुराण में हिमालय, हिमाचल, हिमवान, हिमवन्त तथा हिमकूट शब्दों का उल्लेख कभी कभी समानार्थक और कभी भिन्न अर्थों में किया गया है । उनको यहाँ उद्धृत कर देना उचित होगा । हिमालय : कुरुष्व लांगलेन त्वं विदार्याय हिमालयम् । इदं सरोवरं दिव्य निष्तोयं शीघ्रमेव तु ।। 165-166 = २१८ । × × × इति तथ्यं सती ज्ञात्वा हलमार्गात्तु सिन्धुगा । हिमालयान्न प्रययौ पतितात्मा परं नदी ।। 299 = ३९८ समुद्ररूपस्य हरस्य भार्या हिमालयस्याद्रिपतेस्तनूजाम् । सुस्वादुतोयां ऋषिभैर्यजुष्टां तां त्वं पवित्रां प्रणमस्व राजन् ।। 1388 = १६०६ । × × × हिमाचल : नीलाम्बरः कांचनबद्धमौलिः सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैः । विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ।। 168 = २२० × × × —कुटिलैस्तरंगैः । हिमाचलाग्रैर्गगने स्पृशद्भिः हिमालये तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । अद्य प्रभृति षण्मासान्तस्येह वसतिर्मया ।। 210 = २८३ × × ×
परिशिष्ट ख १५ ततो वेगेन महता सीमन्तमिव कुर्वती । हिमाचलस्य प्रययौ तोयस्रैलोपमा नदी ॥ 138 = ४१९ हिमवान् तथा हेमकूट : एकार्णवं जगत्सर्वं तदा भवति भूपते । हिमवाञ्छेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः ॥ 35 = ५५-५६ × × × हिमवत् : तत्र मद्रेषु तीर्थानि सन्ति पुण्यानि मानद । तथा च पर्वतश्रेष्ठे हिमवत्यचलोत्तमे । 102 = १४५ × × × स्थावरत्वमनुप्राप्ता हिमवत्यचलोत्तमे । बहुधा सा विमन्तांगी निकुम्भे निर्गते बहिः ॥ 166 = ७९१ × × × एवमुक्त्वा स पितरं प्राप्तानुज्ञास्ततः स्वयम् । हरमुकुटमितिख्यातं शृङ्गं हिमवतः शुभम् ॥ जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 = १२३०-१२३१-१२३२ × × × रम्ये हिमवतः पृष्ठे एवमेतीति चाब्रवीत् । ऋषेर्नियोगं काञ्चाप देव्या राज्ञया प्रचोदिता ॥ वृहददेवता ४ : ७५, हिमवान : यस्मिंस्तु वासरे विप्र प्रचयं पतते हिमम् । तत्र पूज्यस्तु हिमवान् हेमन्तशिशिराशुभौ ॥ 461 = ५०९ हिमवान्-हेमकूट : हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः । श्वेतश्च शृंगवान् मेरुमलयिवान् गंधमादनः ॥ 516 = ७१७ ७१८ × × × महाभारत : सभा पर्व ( २८ : ६) मे हिमालय, हिमवान, हेमकूट आदि शब्द हिमालय के लिए व्यवहृत किये गये हैं। हिमवान शब्द का वर्णन हिमालय पर्वत के अधिष्ठातृ-देवता के रूप में किया गया है। हेमकूट उत्तर दिशा का एक पर्वत कहा गया है। इसको पार कर अर्जुन ने हरिवर्ष में प्रवेश किया था । पाण्डवों के पिता पाण्डु कालकूट तथा हिमालय पर्वत का अतिक्रमण कर गन्धमादन पर्वत पर पहुँचे थे । भगवान् परशुराम द्वारा क्षत्रियों के संहार से रक्षा निमित्त भृगुवंशीय स्त्रियों ने हिमालय पर्वत में
१६ राजतरंगिणी आश्रय ग्रहण किया था। अर्जुन ने हिमवान को जीतकर धवला गिरि पर अपना शिविर स्थापित किया था। (सभा पर्व २७:२९)। कुलिन्द राज सुबाहु का राज्य हिमालय के समीप था। (७८: १४)। कर्ण ने हिमालय पर्वत के समस्त राजाओं को पराजित किया था। (वन पर्व २५४:४-६)। हिमालय छ वर्षपर्वतों में पूर्व से पश्चिम विस्तृत एक वर्ष पर्वत है। (भीष्म पर्व ६.३-५)। हिमालय पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उपमन्यु के दिव्य आश्रम को देखा था। (अनुशासन पर्व १४:४३-४५)। महा- प्रस्थान काल में पाण्डवों को मार्ग में हिमालय मिला था। तत्पश्चात् आगे बढ़ने पर उन्हें बालुकार्णव मिला था (महाप्रस्थानिक पर्व : १-२)। बहिर्गिरि तथा अन्तर्गिरि का उल्लेख आता है। बहिर्गिरि 'लेसर' हिमालय अर्थात् जहाँ से चढ़ाई आरम्भ होती है, उसे कहते हैं। इसमें मसूरी, नैनीताल, धर्मशाला, श्रीनगर के भूखण्ड हैं। इसे चूल हिमवन्त भी कहा जाता है। बहिर्गिरि की संज्ञा एक पर्वतीय प्रदेश से भी दी गयी है। इस प्रदेश को उत्तर दिग्विजय काल में अर्जुन ने जीता था। सभा पर्व २७ : ३ इन प्रदेशों की गणना भारतीय जनपदों में की गयी है। भीष्म पर्व ९ : ५० अन्तर्गिरि मध्यवर्ती हिमालय हैं। अंग्रेजी में इसे ग्रेट सेन्ट्रल हिमालय कहते हैं। इसके अन्तर्गत किचिन- चंगा, धवलागिरी, गौरीशंकर, नन्दादेवी तथा नंगा पर्वतादि तथा उनके विभिन्न शिखर हैं। इनका सम्बोधन महा हिमवन्त नाम से भी किया गया है। उपगिरी हिमालय के तराई के क्षेत्र को कहते हैं। महाभारत तथा अष्टाध्यायी में हिमालय की पर्व- तीय शाखा का नाम उपगिरि दिया गया है। वह शैवालिक पर्वतमाला है। (अष्टाध्यायी ४ : २ : ११२) योगिनी तन्त्र (१: १, १: १२, १ : १६) में हिमालय का उल्लेख मिलता है। हिमालय तथा कैलास को मेरु पर्वत के दक्षिण कहा गया है। हिमालय तथा पारियात्र पर्वतो के मध्य के देश को 'मध्यदेश' की संज्ञा दी गयी है। वह मध्यदेश पूर्व में आसाम तथा मणिपुर तक चला गया है। मार्कण्डेय पुराण हिमालय का वर्णन करता है। हिमालय धनुषाकार एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक फैला है। पश्चिम में अरब सागर और सिन्धु तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैली भारतीय सीमा पर स्थित अडिग पर्वतमाला को हिमालय कहना होगा। हिगुल, हिन्दुकुश, कराकोरम, शैवालिक आदि सभी पर्वतमालाएँ हिमालय के अन्तर्गत आ जाती हैं। इस पुराण के अनुसार कैलास की स्थिति हिमालय के उत्तर तथा उसके पूर्व-पश्चिमीय विस्तार के मध्य स्थान पर पड़ेगा। भारत के मानचित्र द्वारा यह सत्य मालूम होता है। पुराणकारो को भारतीय भूगोल का कितना सच्चा ज्ञान था इसका पता चलता है। मत्स्य पुराण (१२० : २) में कैलास को एक प्रकार से हिमालय में सम्मिलित किया गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार हिमालय का विस्तार ७५० कोस कहा गया है। कालिदास ने हिमालय को पृथ्वी का मानदण्ड बताया है- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥
परिशिष्ट ख १७ कौटिल्य ने हिमालय को चक्रवर्ती क्षेत्र के अन्तर्गत माना है । हिमालय से समुद्र तक के देश पर शासन करने वाले को चक्रवर्ती राजा तथा उसका क्षेत्र कहा गया है (१ ९ : १) राजशेखर ने काव्य मीमासा में हिमवत से समुद्र तक के देश पर शासन करने वाले को सम्राट् कहा है । हिमालय का वर्णन प्राचीन भारतीय सीमा का निर्धारण करता है । कुमार सम्भव में कालिदास ने हिमालय को भारत की उत्तरीय सीमा पर रखा है । पूर्व तथा पश्चिम दिशाओ में उसे समुद्र तक विस्तृत होना कहा गया है । भारतवर्ष तथा हरिवर्ष के मध्य हिमालय की स्थिति मानी गयी है । हेमकूट को हिमालय के दक्षिण में भी कहा गया है । एकाध लेखको ने किंपुरुष वर्ष को हेमकूट माना है । बौद्ध ग्रन्थों मे हिमालय का वर्णन मिलता है । अंगुत्तर निकाय, संयुक्त निकाय, हिमवंत सुत्त, मक्कट सुत्त, पठम-पव्वतूपमा सुत्त में हिमालय को पर्वतराज कहा गया है । मैनाक पर्वत कैलास के समीप हिमालय में स्थित था । दद्दर, धम्मक, चण्डगिरी, कुलिन्द, विस्म पर्वत हिमालय के अन्तर्गत थे । कदम्ब, कुक्कुट, कौशिक, गोतम, पद्म, भारिक, लम्बक, वस्सभ, सयंग, शोभित, कैलास, केदार, हिमालय पर्वत के भाग कहे गये हैं । अलवेरुनी मेरु तथा निषध पर्वतों को हिमालय के अन्तर्गत मानता है । बौद्ध ग्रन्थ अपदान म कदम्ब, कुक्कुट अथवा कुकुट, भूतगण, कौशिक, गोतम, पदुम, भारक, लम्बक, वसभ, सयंग, शोभित को हिमालय में रखा गया है । हिमालय को तीन हजार योजन वर्ग मीलों में विस्तृत तथा चौरासी हजार शिखरो से मण्डित कहा गया है । हिमालय के अन्तर्गत महापद्म सर अर्थात् कश्मीर के उलर लेक का वर्णन बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय करता है । क्षुद्र हिमालय में महापद्म हृद तथा महा हिमवन्त मे भी एक सर का होना मिलता है । उलर लेक साडे बारह वर्ग मील विस्तृत है । उलर का संस्कृत मूल शब्द उल्लोल है । उल्लोल का अपभ्रंश उलर हो गया है । उल्लोल का अर्थ लहर होता है । उलर में लहरो का आरोह तथा अवरोह वायु स्पर्श द्वारा सुन्दर लगता है । विशेषतः प्रातः तथा सायंकाल जब गगन में किंचित् अरुणाई सहित नीलिमा रहती है । उस समय किसी शैल धातु पर बैठकर प्रकृति की इस अनुपम शोभा के नैसर्गिक सौन्दर्य को निरखने में विचित्र अनुभूति होती है । हिमालय का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थो मे निम्नलिखित स्थलो पर विशेष रूप से मिलेगा । पाली साहित्य मे हिमवा एवं हिमवन्त हिमालय का नाम दिया गया है । परमत्य जोतिका अध्याय १, २; समन्त पासादिका भाग १; विसुद्धि मग्ग ७; जातक भाग, ४, ६; कुनाल जातक ५:५०१, ५०२ हि०; महा विस्सन्तर जातक ६.३३६, ५३८ हि०; चेतिय जातक, धम्मपदट्ठ कथा भाग १, २, ३, ४; महावंश १:१८ तथा ५:२४ हि०; मिलिन्द प्रश्न पृष्ठ ३४७-६४८ हिन्दी, पव्वजा सुत्त दीघा निकाय पृष्ठ ३६ हि०; अट्ठ सालिनी (देवनागरी) पृष्ठ १४; घेर गाथा २:१३८; जैन ग्रन्थों में उत्तरा- ध्ययन सूत्र ११:२७ पृष्ठ ४९; मनोरथ पुराण २:७५९; द्रष्टव्य है । हिमालय की दस मुख्य नदियाँ है । वे है—गंगा, यमुना, अचिरवती, सरयू, मही, सिन्धु, सरस्वती, वेत्रवती, यीवंसा (वितस्ता), चन्द्रभागा । ३
१८ राजतरंगिणी मिलिन्द प्रश्न के अनुसार ५०० नदियाँ हिमालय से और निकलती है। उनमे उक्त दस नदियाँ मुख्य है। पुराणो में कुछ और प्रसिद्ध नदियों का वर्णन है जो हिमालय से निकलती है। यथा—शतद्रु, इरावती, कुहू, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, निशचीरा, गण्डकी, कौशकी (मार्कण्डेय पुराण ५७:१६।१८)। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार हिमालय में सात बडे सरोवरों का वर्णन मिलता है—अनतत्त दह (मान- सरोवर ), कण्ण मुण्ड, रथकार छद्दन्त, कुणाल मन्दाकिनी, तथा सीहप्प पातक । कहा गया है कि उक्त सरो- वरों का जल कभी ग्रीष्म ऋतु में भी तप्त नहीं होता । बौद्ध ग्रन्थो में मानसरोवर को कैलास तथा त्रिकूट पर्वतों से सम्बन्धित किया गया है। बौद्ध ग्रन्थों में हिमालय की विभिन्न श्रेणियो का उल्लेख मिलता है—अस्सकण्ण गिरि, इसिधर, उदक, रजत, कंचन, कर- वीक, कालगिरि, चित्तकूट, मणिदस्स, युगन्धर, सुरियपस्स, सुदस्सन । सेत अर्थात् श्वेत पर्वत को हिमालय के शिखरो में श्रेष्ठ कहा गया है। अपदान में लम्बक, गोतम, वसभ, सीमित, कोसिक, कदम्ब, भरिक आदि को हिमालय का पर्वत शृंग कहा गया है। चित्तकूट पर्वत को चित्रकूट नहीं समझना चाहिए। चित्तकूट पर्वत हिमालय के अन्तर्गत है। चित्रकूट विन्ध्य पहाडी का एक क्रम है। महावंश मे हिमालय का उल्लेख भगवान् के धातु भरे पात्र के सन्दर्भ मे आया है। हैमवत बौद्धो का एक सम्प्रदाय है। हिमालय की गोद में कश्मीर शिशु की तरह स्थित है इस पर प्रकाश डाल चुका हूँ। आधुनिक अर्थात् बीसवी शती के कश्मीर तथा कल्हण काल के कश्मीर की भौगोलिक सीमा तथा स्थिति में भिन्नता है। आधुनिक कश्मीर तथा हिमालय के साथ क्या सम्बन्ध है इस पर कुछ लिखना आवश्यक है। कालक्रम के अनुसार देशों की भौगो- लिक स्थिति उनके राजनीतिक स्थितियों के साथ परिवर्तित होती रही है। हिमालय के पर्वतों में कंचन पर्वत, मणि पर्वत, हिगुल पर्वत, अंजन पर्वत, सानु पर्वत, फलिक पर्वतो का उल्लेख मिलता है। (कुणाल जातक पृष्ठ ५०१ )। हिगुल पर्वत बलूचिस्तान में समुद्र तट से २० मील दूर अघोर अथवा हिगुल नदी से आरम्भ होता है। इसे हिगुल तथा हिगुला कहते है। शिखरों में मुख्य उल्लेख नगन पर्वत, तुमकुम, नन्ददेवी, त्रिशूल, नन्दकोट, दूणा गिरि, बद्रीनाथ, केदार नाथ, नील कंठ, गंगोत्तरी, श्रीकण्ठ बन्दर पंच, गोरोशृंग, काचन विंगा, नमच पखा, मिलता है। गोरोशृंग किचिन विंगा तथा धवलागिर सबसे ऊँचे शिखर नेपाल में है।
परिशिष्ट 'ग' वितस्ता ( तरंग १:२८ पृष्ठ ५७ ) वितस्ता नदी को काश्मीरी भाषा में व्यथ कहते हैं। वितस्ता शब्द का अपभ्रंश व्यथ है। पुराकालीन पाश्चात्त्य लेखकों ने वितस्ता का नाम 'वेदस्ता' भी दिया है। चीन के इतिवृत्त में 'वितस्ता' नाम आता है। 'कश्मीर का एक नाम वितस्ता के आधार पर 'वैतस्तिका' है। कहा जा चुका है कि ऋग्वेद में वितस्ता का उल्लेख है। प्राचीन यूनानी लेखकों ने ईरानी लेखकों के आधार पर वितस्ता का नाम 'हाइडसपेस' दिया है। पोलेमी ने 'बिदसपेस' नाम से वितस्ता का उल्लेख किया है। पंजाब में वितस्ता को झेलम कहते हैं। काश्मीरी पुरासाहित्य में यह नाम अज्ञात है। इसका मूल स्रोत मुस्लिम लेखकों के लेखों में मिलता है। अल्वेरुनी ने वितस्ता का नाम 'जेलम' दिया है। श्रोवर ने सुलतान शाह हैदर के पंजाब के अभियान का वर्णन करते हुए झेलम शब्द को संस्कृत रूप देते हुए 'ज्यलमी' शब्द का प्रयोग किया है। नीलमत पुराण में श्लोक ३३५-३८१ तक वितस्ता की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण वितस्ता का अपर नाम वैतस्तिका देता है। ( १:१६४ ) विष्णु धर्मोत्तर पुराण के सम्बन्ध में धारणा है कि वह कश्मीर में लिखा गया था। महाभारत सभा पर्व में वितस्ता को कश्मीर तथा पंजाब की नदी कहा गया है। वितस्ता वरुण की सभा में स्थित रहकर उनकी उपासना करती है। वरुण का स्थान उत्तर में है। वितस्ता उत्तर की नदी है। ( ९:१९ ) महाभारत वन पर्व में उल्लेख आता है। कश्मीर मण्डल में नागराज तक्षक का वितस्ता नामक प्रसिद्ध सुन्दर भवन है। इस नदी में स्नान एवं पित्रों के हेतु तर्पण द्वारा मानव को वाजपेय यज्ञ का लाभ होता है। मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है। ( : ८२ : ८९ ) वितस्ता का जल सेवन भारत निवासी करते हैं। यहाँ संकेत है कि वितस्ता हिमालय से निकलकर भारत के प्रशस्त भूभाग में प्रवेश करती है। भारतीय उसके जल से लाभ उठाते हैं। (महा० : भीष्म पर्व : ९ : १६ ) कठिन उपवास, व्रत के पश्चात् तरंगमालिनी वितस्ता में सात दिन स्नान करने वाला मनुष्य मुनि तुल्य निर्मल हो जाता है। (महा० : अनुशासन : २५ : ७ ) देवी पार्वती ने भगवान् शंकर के प्रति स्त्री धर्म स्वीकार कर, जिनके विमर्श पर कार्य किया था, उनमें एक 'वितस्ता' भी थी। (महा० : अनुशासन : १४० : १८ )
२० राजतरंगिणी हरचरित चिन्तामणि के लेखक ने नीलमत पुराण को शशधरमौ का प्रयोग किया है। वितस्ता को भगवती देवी पार्वती का रूप माना है। कथा है। पिशाचों के सम्पर्क द्वारा काश्मीरियों में उत्पन्न पाप किंवा दोष के मोचनार्थ, भगवती पार्वती ने काश्मीर में वितस्ता का रूप धारण किया है। भगवान् शिव ने नील नाग के स्थान पर शूल द्वारा प्रहार किया। यह स्थान 'नील कुण्ड' है। उसे 'शूल घात' तथा 'वितस्तार' कहते हैं। प्रहार एक 'वितस्ति' अर्थात् एक बालिश्त लगभग १२ अंगुल मिलाकर जितना नाप होता था उतने परिमाण में था। अतएव 'वितस्ति' के आधार पर वितस्ता नामकरण किया गया। पाणिनि ने 'दिष्टि- वितस्त्योश्च' (६:४:८६) शब्द का प्रयोग किया है। वितस्ति तथा दिष्टि शब्द पर्यायवाचक हैं। वितस्ति भारत में तथा दिष्टि शब्द ईरान में प्रचलित था। मध्य एशिया में गगोश्रो देशों में दीस्ट शब्द आया है वह दिष्टि का अपभ्रंश है। वितस्ति और दिष्टि दोनों का अर्थ एक बालिश्त होना है। 'वितस्ताख्य' कश्मीर में तक्षक नाग का निवास-स्थान माना है। 'वितस्ताद्रि' एक पहाड़ी है। यह कहाँ है। कहना कठिन है। महाभारत (१११.८२.६०) में वितस्ता का मूल स्रोत तक्षक नाग का स्थान माना गया है। इस स्थान का पता अभी नहीं लगा है। देवी पार्वती किंवा उमा वितस्ता रूप से जिस स्थान पर प्रकट हुई थीं उसे नील कुण्ड तथा शूल- घात कहते हैं। नीलनाग वर्तमान बेरी या वीर नाग है। गाथा कहती है। पापी लोगों के स्पर्श द्वारा देवी अपवित्र हो जायेंगी अतएव वे लुप्त हो गयीं। काश्यप की प्रार्थना पर भगवती द्वितीय बार पुनः पंचहस्त नाग स्वरूप प्रकट हुईं। यह स्थान दिवसर परगना में पाजय ग्राम है। यहाँ एक पवित्र जलस्रोत है। समी- पस्थ निवासी इसे पवित्र मानते हैं। भगवती यहाँ भी लुप्त हो गयीं। पुनः तृतीय बार नरसिंहाश्रम में जाकर देवी 'वितस्ता' रूप में प्रकट हुईं। काश्यप ऋषि देवी पार्वती स्वरूप वितस्ता के संग के लिए लक्ष्मी को विशोका तथा सिन्धु को गंगा रूप कश्मीर में लाये। अतएव देवी उमा वितस्ता, लक्ष्मी विशोका; अदिति त्रिकोटी, शची हर्षपथा; तथा दिति चन्द्रावती; नदियों का रूप धारण कर कश्मीर की पवित्र भूमि पर निवास करने लगीं। वितस्ता के द्वितीय बार प्रकट होने के सम्बन्ध में एक और गाथा है। कुछ कम प्राचीन है। इस गाथा के अनुसार वितस्ता द्वितीय बार वर्तमान विश्ववितुर ग्राम में जलस्रोत स्वरूप प्रकट हुई। यह ग्राम वीरनाग से उत्तर-पश्चिम एक मील दूर स्थित है। यह गाथा वितस्ता माहात्म्य में कही गयी है। इससे प्रकट होता है। स्थान का नाम 'वितस्ता बातिका' था। कल्हण ने 'वितस्तारा' का वर्णन किया है। यहाँ अशोक ने स्तूप निर्माण कराया था। कल्हण ने वितस्ता का मूलस्रोत 'नीलकुण्ड' बताया है। स्पष्ट है। कल्हण के समय में वेरीनाग वितस्ता का उद्गम माना जाता था। (वितस्ता माहात्म्य २:३७ रा०तं०: १ १०२,१०३) गाथा कहती है। उमा देवी हिमालय की कन्या हैं। वितस्ता का रूप लेकर कश्मीर में प्रकट हुई हैं। प्रथम उनका वर्ण नील था। वितस्ता का एक नाम नीलजा भी है। उसने पर्वत शिखर पर तपस्या की। उनका वर्ण गौर हो गया। इसलिये पर्वत का नाम गौरी शिखर पड़ गया। वितस्ता का जन्मदिन भाद्रपद शुक्लपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। वितस्ता उत्सव नीलमत पुराण के अनुसार त्रयोदशी के तीन दिन पूर्व तथा तीन दिन पश्चात् तक मनाया जाता है। इस दिन वितस्ता में स्नान तथा विशेषतया सिन्धुवितस्ता संगम पर पूजा का विधान किया गया है। धूप, गन्ध, माला, नैवेद्य, नाटक खेलने के लिये दान, तथा नाटक पात्रों के पूजा का विधान किया गया है। वितस्ता उत्सव की द्वादशी को महाद्वादशी कहते हैं। यदि द्वादशी बुध पर पड़े तो उस दिन भगवान् का जप, स्नान, दान, श्राद्ध किया जाय। उसका फल द्वादश गुना मिलता
है । यदि बुध श्रवण पर पड़ जाय तो उसे अत्यन्त महती द्वादशो कहते हैं । सन्निहिति स्नान का फल प्राप्त होता है । यदि द्वादशी श्रवण को पड जाय तो उस दिन वितस्ता सिन्ध संगम प्राप्त मृत्तिका स्नान का फल उनके संगम स्नान फल के समान होता है । ( नीलमत ७६७-७७५ ) मार्तण्ड अधित्यका के घुर पश्चिम इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग नगर है । इसका प्राचीन नाम अनन्त नाग है । अनन्त नाग के कारण नगर का नाम अनन्त नाग पड़ा है । अनन्त नाग जलस्रोत नगर के दक्षिण दिशा में है । हरचरित चिन्तामणि तथा कुछ माहात्म्यों में इसका उल्लेख मिलता है । अनन्त नाग का सरोवर चौखूटा काफी बड़ा है । पृष्ट भाग से जल निकलता है । सरोवर सर्वदा पूर्ण रहता है । यहाँ लोग स्नान करते हैं ! तैरते हैं । यहाँ का कोलाहल तथा बच्चो की जल क्रीडा मुझे आजन्म स्मरण रहेगी । नी० '८८२, ११६०, ११८० हरचरित चिन्तामणि १०:२५१ नगर के उत्तर और बवन मार्तण्ड के मार्ग में गौतम नाग है । जिसका वर्णन मार्तण्ड माहात्म्य तथा नीलमत में दिया गया है । नी० : १०५ अनन्त नाग के समीप वितस्ता को नदी का वास्तविक रूप प्राप्त होता है । यहाँ सान्द्रन, भ्रिग, आर- पथ तथा लिदर स्रोतस्विनियों का संगम वितस्ता में होता है । खनवल के पश्चात् वितस्ता नदी नाव चलते योग्य हो जाती है । समस्त कश्मीर उपत्यका में इस स्थान के पश्चात् नावो द्वारा परिवहन बारहमूला तक होता है । मूलस्रोत अर्थात् नीलकुण्ड किंवा वेरी नाग से डल लेक के समीप तक नदी मे केवल २२० फीट का ढाल है । नदी की धारा में विशेष परिवर्तन नही हुआ है । वह अपने मूल स्थान अथवा प्रवाह को पकडे प्रवा- हित है । उसका प्रवाह कछारो अथवा जलोठ भूमि से होकर होता है । शीत ऋतु में नदी का जल स्तर नीचा हो जाता है । जल घट जाता है । तट नदी के निम्न जलस्तर से १५ फीट ऊँचा उठ जाता है । वसंत ऋतु में हिम के गलने पर नदी में बाढ आती है । कभी-कभी तट से उफनकर वितस्ता बहने लगती है । ग्रीष्म कालीन मूसलाधार वृष्टि से भी नदी मे बाढ आ जाती है । कृषि को बाढ़ से अपार क्षति उठानी पड़ती है । कल्हण ने इस प्रकार के बाढों का बहुत वर्णन किया है । रा० . ७:१११६, ७.१६१४, ८ २४४६, ८.२७८६, .:१४१७, ८:१४२३, जोन : ४०३ । जलप्लावन से कश्मीर उपत्यका को बचाने के लिए सेतुओ जिसका अपभ्रंश 'सय' है प्राचीन समय में निर्माण कराया गया था । उनमें जल प्रवेश तथा नि सृत्त करने के लिए द्वार बने रहते थे । इन द्वारो को अब कुलावा कहते हैं । उनका विशद उल्लेख कल्हण, जोन तथा श्रीवर की राजतरंगिणियो में निम्नलिखित स्थानों पर मिलेगा—रा० : १ : १५९, ३ : ४८३, ५: ९१, ५ : १०३, १२०, ८: २३८०, रा० : जोन ४०४, ८८७ रा० : श्रीवर ३ : १८९ । नीलमत के श्लोक १००-१०१ से प्रकट होता है कि कश्यप ने वितस्ता से निवेदन किया था। 'शुभगै ! वितस्ता ! तुम हल मार्ग से गमन करो अन्यथा यह देश जलसे सर स्वरूप हो जायगा ।' इसमे प्रकट होता है कि वितस्ता का मार्ग कश्मीर उपत्यका का जल बहाने के लिये बनाया गया था । हल जोतते समय जिस प्रकार भूमि में गहरी प्रणाली बन जाती है । उसी प्रकार गहरे पात्र को बनाने का संकेत वहाँ किया गया है। प्राचीन काल में सड़कें बहुत कम थीं । लगभग १०० वर्ष पूर्व सड़कों का अस्तित्व नगण्य था । व्यापार, परिवहन आदि का कार्य नदो द्वारा होता था । सन् १८९१ ई० की जनगणना के अनुसार लगभग २४०० हाजी अर्थात् नाविक जल परिवहन कार्य में लगे थे । नावें परिवहन की प्रधान साधन थीं । आज इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है । रा० ५ : ८४, ७ : १६२८ ।
२० राजतरंगिणी हरचरित चिन्तामणि के लेखक ने नीलमत पुराण की शब्दावली का प्रयोग किया है। वितस्ता को भगवती देवी पार्वती का रूप माना है। कथा है। पिशाचों के सम्पर्क द्वारा कश्मीरियों में उत्पन्न पाप किंवा दोष के मोचनार्थ, भगवती पार्वती ने कश्मीर में वितस्ता का रूप धारण किया है। भगवान् शिव ने नील नाग के स्थान पर शूल द्वारा प्रहार किया। यह स्थान 'नील कुण्ड' है। उसे 'शूल घात' तथा 'वितस्तात्र' कहते हैं। प्रहार एक 'वितस्ति' अर्थात् एक बालिस्त लगभग १२ अंगुल मिलकर जितना माप होता था उतने परिमाण में था। अतएव 'वितस्ति' के आधार पर वितस्ता नामकरण किया गया। पाणिनि ने 'दिष्टि- वितस्त्योश्च' (६.४.८६) शब्द का प्रयोग किया है। वितस्ति तथा दिष्टि शब्द पर्यायवाची हैं। वितस्ति भारत में तथा दिष्टि शब्द ईरान में प्रचलित था। मध्य एशिया के खरोष्ठी लेखों में दीठि शब्द आया है वह दिष्टि का अपभ्रंश है। वितस्ति और दिष्टि दोनों का अर्थ एक बालिस्त होता है। 'वितस्ताख्य' कश्मीर में तक्षक नाग का निवास-स्थान माना है। 'वितस्ताद्रि' एक पहाड़ी है। यह कहाँ है। कहना कठिन है। महाभारत (१११ : ८२ : ६०) में वितस्ता का मूल स्रोत तक्षक नाग का स्थान माना गया है। इस स्थान का पता अभी नहीं लगा है। देवी पार्वती किंवा उमा वितस्ता रूप से जिस स्थान पर प्रकट हुई थीं उसे नील कुण्ड तथा शूल- घात कहते हैं। नीलनाग वर्तमान वैरी या वीर नाग है। गाथा कहती है। पापी लोगों के स्पर्श द्वारा देवी अपवित्र हो जायेंगी अतएव वे लुप्त हो गयीं। काश्यप की प्रार्थना पर भगवती द्वितीय बार पुनः पंचहस्त नाग स्वरूप प्रकट हुईं। यह स्थान दिवसर परगना में पाजय ग्राम है; यहाँ एक पवित्र जलस्रोत है। समी- पस्थ निवासी इसे पवित्र मानते हैं। भगवती यहाँ भी लुप्त हो गयी। पुनः तृतीय बार नरसिंहाश्रम में जाकर देवी 'वितस्ता' रूप में प्रकट हुईं। काश्यप ऋषि देवी पार्वती स्वरूप वितस्ता के संग के लिए लक्ष्मी को विशोका तथा सिन्धु को गंगा रूप कश्मीर में लाये। अतएव देवी उमा वितस्ता; लक्ष्मी विशोका; अदिति त्रिकोटी; शची हर्पपथा; तथा दिति चन्द्रावती, नदियों का रूप धारण कर कश्मीर को पवित्र भूमि पर निवास करने लगीं। वितस्ता के द्वितीय बार प्रकट होने के सम्बन्ध में एक और गाथा है। कुछ कम प्राचीन है। इस गाथा के अनुसार वितस्ता द्वितीय बार वर्तमान विषयितुर ग्राम में जलस्रोत स्वरूप प्रकट हुईं। यह ग्राम वीरनाग से उत्तर-पश्चिम एक मील दूर स्थित है। यह गाथा वितस्ता माहात्म्य में कही गयी है। इससे प्रकट होता है। स्थान का नाम 'वितस्ता वार्तिका' था। कल्हण ने 'वितस्तारा' का वर्णन किया है। यहाँ अशोक ने स्तूप निर्माण कराया था। कल्हण ने वितस्ता का मूलस्रोत 'नीलकुण्ड' बताया है। स्पष्ट है। कल्हण के समय में वैरीनाग वितस्ता का उद्गम माना जाता था। (वितस्ता माहात्म्य २:३७ रा०त०:१:१०२,१०३) गाथा कहती है। उमा देवी हिमालय की कन्या हैं। वितस्ता का रूप लेकर कश्मीर में प्रकट हुई हैं। प्रथम उनका वर्ण नील था। वितस्ता का एक नाम नीलजा भी है। उसने पर्वत शिखर पर तपस्या की। उनका वर्ण गौर हो गया। इसलिये पर्वत का नाम गौरी शिखर पड़ गया। वितस्ता का जन्मदिन भाद्रपद शुक्लपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। वितस्ता उत्सव नीलमत पुराण के अनुसार त्रयोदशी के तीन दिन पूर्व तथा तीन दिन पश्चात् तक मनाया जाता है। इस दिन वितस्ता में स्नान तथा विशेषतया सिन्धुवितस्ता संगम पर पूजा का विधान किया गया है। धूप, गन्ध, माला, नैवेद्य, नाटक खेलने के लिये दान, तथा नाटक 'पात्रों के पूजा का विधान किया गया है। वितस्ता उत्सव की द्वादशी को महाद्वादशी कहते हैं। यदि द्वादशी बुध पर पड़े तो उस दिन भगवान् का जप, स्नान, दान, श्राद्ध किया जाय। उसका फल द्वादश गुना मिलता
परिशिष्ट ग २१ है। यदि बुध श्रवण पर पड़ जाय तो उसे अत्यन्त महती द्वादशी कहते हैं। संनिहिति स्नान का फल प्राप्त होता है। यदि द्वादशी श्रवण को पड़ जाय तो उस दिन वितस्ता सिन्धु संगम प्राप्त मृतिका स्नान का फल 'उनके संगम स्नान फल के समान होता है। (नीलमत ७६७-७७५) मार्तण्ड अधित्यका के धुर पश्चिम इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग नगर है। इसका प्राचीन नाम अनन्त नाग है। अनन्त नाग के कारण नगर का नाम अनन्त नाग पड़ा है। अनन्त नाग जलस्रोत नगर के दक्षिण दिशा में है। हरचरित चिन्तामणि तथा कुछ माहात्म्यों में इसका उल्लेख मिलता है। अनन्त नाग का सरोवर चौखूटा काफी बड़ा है। पृष्ठ भाग से जल निकलता है। सरोवर सर्वदा पूर्ण रहता है। यहाँ लोग स्नान करते हैं। तैरते हैं। यहाँ का कोलाहल तथा बच्चों की जल क्रीडा मुझे आजन्म स्मरण रहेगी। नी० ˙८८२, ११६०, ११८० हरचरित चिन्तामणि १०:२५१ नगर के उत्तर और भवन मार्तण्ड के मार्ग में गौतम नाग है। जिसका वर्णन मार्तण्ड माहात्म्य तथा नीलमत में दिया गया है। नी० : १०५ अनन्त नाग के समीप वितस्ता को नदी का वास्तविक रूप प्राप्त होता है। यहाँ सान्द्रन, भृंग, आर- पथ तथा लिद्दर स्रोतस्विनियों का संगम वितस्ता में होता है। रानबल के पश्चात् वितस्ता नदी नाव चलते योग्य हो जाती है। समस्त कश्मीर उपत्यका में इस स्थान के पश्चात् नावों द्वारा परिवहन बारहमूला तक होता है। मूलस्रोत अर्थात् नीलकुण्ड किंवा वैरी नाग से डल लेक के समीप तक नदी में केवल २२० फीट का ढाल है। नदी की धारा में विशेष परिवर्तन नही हुआ है। वह अपने मूल स्थान अथवा प्रवाह को पकड़े प्रवा- हित है। उसका प्रवाह कछारी अथवा जलोढ भूमि से होकर होता है। शीत ऋतु में नदी का जल स्तर नीचा हो जाता है। जल घट जाता है। तट नदी के निम्न जलस्तर से १५ फीट ऊँचा उठ जाता है। वसंत ऋतु में हिम के गलने पर नदी में बाढ़ आती है। कभी-कभी तट से उफनकर वितस्ता बहने लगती है। ग्रीष्म कालीन मूसलाधार वृष्टि से भी नदी में बाढ आ जाती है। कृषि को बाढ़ से अपार क्षति उठानी पड़ती है। कल्हण ने इस प्रकार के बाढों का बहुत वर्णन किया है। रा० . ७:१११६, ७:१६१४, ८:२४४६, ८:२७८६, ०:१४१७, ८:१४२३, जोन : ४०३ । जलप्लावन से कश्मीर उपत्यका को बचाने के लिए सेतुओ जिसका अपभ्रंश 'सम' है प्राचीन समय में निर्माण कराया गया था। उनमें जल प्रवेश तथा नि स्रुत करने के लिए द्वार बने रहते थे। इन द्वारों को अब कुलावा कहते हैं। उनका विशद उल्लेख कल्हण, जोन तथा श्रीवर की राजतरंगिणियों में निम्नलिखित स्थानों पर मिलेगा—रा० : १ : १५९, ३ : ४८३, ५ : ९१, ५ : १०३, १२०, ८ : २३८०, रा० : जोन ४०४, . ८८७ रा० : श्रीवर ३ : १८९ । नीलमत के श्लोक ३००-३०१ से प्रकट होता है कि कश्यप ने वितस्ता से निवेदन किया था। 'सुभगे ! वितस्ता ! तुम हल मार्ग से गमन करो अन्यथा यह देश जलसे सर स्वरूप हो जायगा।' इससे प्रकट होता है कि वितस्ता का मार्ग कश्मीर उपत्यका का जल बहाने के लिये बनाया गया था। हल जोतते समय जिस प्रकार भूमि में गहरी प्रणाली बन जाती है। उसी प्रकार गहरे पात्र को बनाने का संकेत वहाँ किया गया है। प्राचीन काल में सड़कें बहुत कम थी। लगभग १०० वर्ष पूर्व सड़कों का अस्तित्व नगण्य था। व्यापार, परिवहन आदि का कार्य नदी द्वारा होता था। सन् १८९१ ई० की जनगणना के अनुसार लगभग ३४०० हाजी अर्थात् नाविक जल परिवहन कार्य में लगे थे। नावें परिवहन की प्रधान साधन थीं। आज इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है। रा० ५ : ८४, ७ : १६२८।
२२ राजतरंगिणी वितस्ता के तट पर कश्मीर की राजधानियों को होने का गौरव प्राप्त है । श्रीनगर, हुष्कपुरस्थान, परिहासपुर आदि इसके तट पर हैं । प्राय प्राचीन तीर्थ स्थान तथा नगर इसके तट पर बसे थे । गाँवों की आबादी नदी के कछार में थी । और आज भी है । नावों द्वारा दालों तथा गल्ले का सामान और उद्योग- धन्धो की वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जाती हैं । कल्हण के माण्डूर के वर्णन द्वारा स्पष्ट प्रतीत होता है कि काश्मीरी जनता में नौपरिवहन का कितना महत्त्व था । (रा० . १ : २०१) गनवल स्थान अनन्तनाग नगर का बन्दरगाह या पत्तन था । नीलमत पुराण में गनवल को 'गण्ड पुच्छ नाम' कहते हैं । ना० (नी० ११०, हरचरित चिन्तामणि १५१) गनवल के पश्चात् वितस्ता विजयेश्वर तीर्थ अर्थात् विजय येहरा में प्रवेश करती है । यह वर्तमान नगर बिजत्रोर है । नदी के लगभग एक मील अधोभाग में ऊँची कछार अनिग्नदरा अर्थात् करेवा पड़ता है । बाम तट पर कश्मीर उपत्यका का अत्यन्त प्राचीन स्थान पद्मपुर पड़ता है । उसे आजकल 'पाम्पर उर' कहते हैं । चक्रधर से ३ मील और उतराय की ओर जाने के पश्चात् 'माधवाश्रम' अर्थात् 'मरहोम' पड़ता है । वितस्ता में यहाँ विशोका अर्थात् 'विशौ' तथा 'रमण्यावती' अर्थात् 'रामब्यार' नदियाँ मिलती हैं । माहात्म्य में इस संगम का नाम गम्भीरा संगम दिया गया है । यहाँ की तीर्थ-यात्रा अभी तक लोग करते हैं । रामब्यार अर्थात् रमण्यावती तथा वेशो नदी का जहाँ संगम है उसे 'गम्भीरा' कहते हैं । कल्हण ने गम्भीरा का वर्णन अनेक स्थानो पर किया है । एक मत है कि विशोका की धारा जो ध्वनोपरा के समीप बहती थी पूर्व काल में ध्वान धारिणी कही जाती थी कालान्तर में इसका नाम गम्भीरा पड़ गया । (नील० १२१४-१२१५ तथा १३०५-१३०८) गम्भीरा का ऐतिहासिक महत्त्व है । विजयेश्वर से श्रीनगर के मार्ग में पड़ने के कारण सैनिक महत्त्व का स्थान है । राजा सुस्सल की सेना सन् ११२२ ई० में यहाँ पीछे हटती हुई पूर्णतया पराजित हो गयी थी । लगभग ६ वर्ष के पश्चात् उसके पुत्र के सेनापति ने विद्रोही सेना पर विजय प्राप्त किया था । (रा० : ८ : १०६३ ८ . १४६७) गम्भीरा संगम के पश्चात् वितस्ता में दक्षिण तट से प्राचीन 'होलदा' तथा वर्तमान 'उलर' जिला का जल लेकर एक स्रोतस्विनी मिलती है । तत्पश्चात् नदी 'वैश्ववन' अर्थात् 'वस्तर' वन के शिराबाहु अवन्तिपुर के प्राचीन नगर से होती हुई प्रवाहित होती है । यहाँ से श्रीनगर तक इसमें कोई नदी नहीं मिलती । एक 'रामुस' नदी मिलती है परन्तु वह नाममात्र की स्रोतस्वनी है । श्रीनगर के पूर्वीय भाग का जल डल (डल लेक) में गिरता है । यहाँ डल का पानी एक छोटी कुल्या अर्थात् नहर से वितस्ता में गिरता है । इस कुल्या को 'सुग्य कुल' कहते हैं । प्राचीन काल में इसको 'महासरित्' कहते थे । इस सरित पर सेतु अर्थात् बाँध बँधा है । उसके कारण डल लेक तथा श्रीनगर दोनों की रक्षा होती है । नदी का जल बाँध के कारण डल लेक में नहीं जा सकता । महासरित में 'दुर्गगलिका' पर जल द्वार लगाया गया था । डल लेक का जल महासरित में जाता है । डल लेक अपनी अनुपमेय शोभा के लिए प्रसिद्ध है । यह सर ४ मील लम्बा तथा ढाई मील चौड़ा है । इसका जल करीब ३० फिट से अधिक गहरा नहीं है । इसमें उपह्रद तथा तैरते खेत हैं । जल स्वच्छ तथा ताजा रहता है ।
परिशिष्ट ग २३ डल अर्थात् ढल का वर्णन इस नाम से कल्हण ने कही नहीं किया है । श्रीवर ने इसे 'डल' नाम से सम्बोधित किया है । वितस्ता माहात्म्य में डल का वर्णन मिलता है ( २१ : १९ ) श्रीवर ने डल के दो द्वीपो का वर्णन किया है । एक का नाम 'रूप लांक' ( चान्दी की लंका ) और दूसरे का नाम 'सूनलांक' ( स्वर्ण लंका ) है । डल के तटवर्तीय तथा जल के अनेक स्थानों का नाम दिया गया है । 'हस्तवालिक' अर्थात् हस्तबोल का पता चलता है । गोपाद्रि, ज्येष्ठेश्वर, थेदा, सूरेश्वरी आदि स्थान अपने अनेक नामों के साथ डल के पूर्वीय तट पर स्थित हैं । शालीमार, निशात तथा नसीम बाग मुगलों ने निर्माण कराया था । त्रिप्रस्था नदी धुर उत्तर में डल में मिलती है । वितस्ता श्रीनगर में तीन मिल बहती है । उसके तट पर मकान बने हैं । उनमे लगे शिलाखण्ड प्राचीन काल के ध्वन्सावशेषों से प्राप्त किये गये हैं । वे पूर्व काल में अधिकतर मन्दिरो तथा अन्य देवस्थानों में लगे थे । उनके देखने तथा उन पर हुए नक्काशी के कामो से पता चलता है कि प्राचीन काल में कितनी सुन्दर भवनों की रचना वितस्ता तट पर रही होगी । वह काशी से कम सुन्दर काशी उसके लघुरूप में नही रही होगी । नगर में प्रथमतः नदी उत्तर वाहिनी है । चौथे पुल के समीप मोड लेकर दक्षिण-पश्चिम की तरफ घूमती है । यहाँ पर कुतकुल अर्थात् प्राचीन 'क्षितिका कुल्या' है । क्षितिका का वर्णन कल्हण ने किया है । (रा० : ८ : ७३२) कुछ आगे चलकर वितस्ता में 'दुग्ध गगा' अर्थात् वत्सकुल मिलती है । श्रीनगर के अधोभाग में वितस्ता के दोनो तरफ कच्छ भूमि अर्थात् दलदलीय भूखण्ड मिलता है । वह कुछ दूर तक चला गया है । वाम तट पर सुखसर तथा पंचनोर नम्बल को पर्वतीय लघु स्रोतस्विनियां जल पूरित करती है । नदी के उत्तर में दलदल अधिक फैला है । वितस्ता की सहायक नदी सिन्ध का डेल्टा है । दुदरहोम प्राचीन 'दुग्धाधम' के समीप नदी की शाखाएँ हो जाती हैं । उनका डेल्टा बन जाता है । वे उथले दलदल हो जाते हैं । उन्हें अंचार कहते है । इसका उत्तरीय भाग ऊँची भूमि के साथ सिन्ध उपत्यका के साथ श्रीनगर को सम्बन्धित करता है । पश्चिमी दिशा का डेल्टा एक कछार अधित्यका है । यह सिन्ध उपत्यका के पश्चिमीय अधोभाग को सम्बन्धित करता हुआ वितस्ता-सिन्धु संगम तक पहुँच जाता है । शादी- पुर के ठीक दूसरी तरफ सिन्धु वितस्ता से मिलती है । वितस्ता सिन्धु संगम प्रयाग तुल्य कश्मीर का पवित्र तीर्थ स्थान है । सुदूर पूर्व काल में वह संगम त्रिगाम के समीप था । कश्मीर के हिन्दू जीवन मे महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इसकी पवित्रता प्रयाग संगम समान मानी गयी है । माहात्म्य में इस तीर्थ की पवित्रता का अत्यधिक गुणगान किया गया है । जहां दो नदियो का संगम है वहाँ ईंटों का निर्मित किया एक द्वीप है । उस पर एक चिनार का वृक्ष लगा है । यह चिनार का वृक्ष प्रयाग के वट वृक्ष तुल्य पवित्र माना जाता है । मैं यहाँ वितस्ता के बाढ़ के समय सितम्बर सन् १९६२ में आया था । वितस्ता-सिन्धु-संगम प्रयाग कहा गया है । त्रिकोटि संगम से रोपेश्वर हर, पावना के संगम और राजो बिन्दु विनर्मला से क्षीर मोचन तक का क्षेत्र वाराणसी के समान पवित्र माना गया है । (नील० १३०१, १३२७) गाँव सम्बल में श्रीनगर से उलर लेक को उत्तर जाने वाला मार्ग आता है । नदी को पार करता त्रागबल दर्रा तक जाता है । इस मार्ग के वाम दिशा में प्राचीन जयपुर है । मध्य आठवी शताब्दी में जया- पीड ने यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की थी । यह सम्बल के दलदल तथा नोर नाला के मध्य एक द्वीप पर स्थित है । इसे अन्दर कोट कहते है । (रा० : ४ : ५०६-५११)
२४ राजतरंगिणी सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हजार फिट ऊँची होगी। इस पर्वत के छाया में मनसाबल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलो से अधिक गहरा है। भूगोल के वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसाबल से एक छोटे नहर द्वारा होता है। ( रा० : जोन ८६४, नील० 890, 1244, 1247, 1334 ) वितस्ता के वाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम है। प्राचीन प्रमाणो से प्रतीत होता है कि कभी उलर लेक इन ग्रामो के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिवलेम कर बनाए गए थे। जोनराज उन्हें ऊलर लेक के तट पर रखता है। श्रीवर ने इन ग्रामो का उल्लेख करते हुए उन्हें समुद्रकोट ( सुग्दर कोट ) से द्वारिका के समीप अन्दर कोट तक उलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'शुय्य कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। ( रा० ५ : १२० रा० जोन १२१० ) सोपोर के पास वितस्ता की बड़ी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर मे मिलती है। इसका नाम 'पोहुर' है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी मे पोहुर अथवा और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनों पाठ मिलते है। ( रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322 ) ह्मल स्रोतस्विनी ह्मल परगना में बहती आती है। ह्मल ही 'समाला' नदी ( रा० : ७ : १५९ ) महापद्मसर अर्थात् उलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो जाता है। जल धारा की भयकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है। वितस्ता : वायु का ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणों के अनुसार - 'हिमवत्पादामि सृता' रूप से वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात् वितस्ता का उल्लेख किया है। भागवत पुराण ( ५ : १० . १७ ) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है। शतद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्विनी, विश्वेति महानद्यः । निम्नलिखित मुख्य नदियों का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा : इरावती : रावो वितस्ता : झेलम विश्रामा : व्याम
परिशिष्ट ग २५ देविका : रावी की एक सहायक नदी है। उमा का रूप है। रावी और चेनाव के मध्य बहती है कुभु : कुभा अर्थात् काबुल नदी गोमती : गोमेल ( ऋग्वेदीय गोमती ) नीलमत मे गौतमी है। कही कही गोमती छप गया है। शतद्रू : शत्तलज चन्द्रभागा : चिनाव सरस्वती : सरस्वती सिन्धु : महानद तथा दूसरी इसी नाम की छोटी नदी कश्मीर मे है जो बान्दीपुर के पास बितस्ता में मिलती है। दोनों नदियाँ कश्मीर मण्डल में बहती है। सिन्धु नदी लद्दाख, लेह, गिलगिट, चिलास होती पाकिस्तान मे निकल जाती है। छोटी सिन्धु सोनमर्ग के पर्वत के किनारे-किनारे बहती वितस्ता मे मिलती है। कश्मीर मण्डल की जो नदियाँ सिन्धु में मिलती है उनमे तथा सिन्धु में स्नान करने पर मनुष्य मरणोपरान्त स्वर्गगामी होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। उत्तरकुरु को ऐतरेय ब्राह्मण ( ९ : १४ ) मे परेण हिमवन्तं कहा गया है। एक अन्य स्थान पर ( ८ : २३ ) में वसिष्ठ सातहव्य ने उत्तरकुरु को देवक्षेत्र कहा है। सातवी शताब्दी में चीनी लेखकों के अनुसार कश्मीर सिन्धु नदी से चेनाव नदी और दक्षिण माल्दरेज तक था। हुएनसांग के अनुसार उरसा कश्या । पश्शित तक्षशिला तथा सिंहपुर दक्षिण-पश्चिम पूंछ और राजौरी दक्षिण था। उरसा भूखण्ड कश्मीर तथा तक्षशिला के मध्य में था, (कनिंघम) पूर्व तथा पूर्व-दक्षिण की सीमा कहाँ तक विस्तृत थी पता नहीं चलता। परन्तु रावी नदी तक यह सीमा विस्तृत थी यह बात मानी जाने लगी है। उत्तर में सिन्धु नदी की उपत्यका में हिमालय पर्वतमाला में स्थित भूखण्ड था। उस समय जालन्धर हर्षवर्धन के राज्य में था। आठवी शताब्दी का नक्शा ठीक नहीं मिलता परन्तु शंकर वर्मा ने कांगड़ा उपत्यका विजय किया था। इस प्रकार कश्मीर सिन्धु नदी से श्त तलज तक पर्वतीय प्रदेश मे था। हुएनसांग के मत से ११६६ मील है।
२४ राजतरंगिणी सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हज़ार फ़िट ऊँची होगी। इस पर्वत के छाया में मनसावल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलों से अधिक गहरा है। भूगोल के वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसावल से एक छोटे नहर द्वारा होता है। (रा० : जोन ८१४, नील० ४90, 1244, 1247, 1334) वितस्ता के बाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम हैं। प्राचीन प्रमाणों से प्रतीत होता है कि कभी वूलर लेक इन ग्रामों के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिक्लेम कर बनाए गए थे। जोनराज उन्हें वूलर लेक के तट पर रखता है। थीवर ने इन ग्रामों का उल्लेख करते हुए उन्हें समुद्रकोट (सुन्दर कोट) से द्वारिका के समीप वग्दर कोट तक वूलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'सुष्ट्य कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। (रा० ५ : १२० रा० जोन १२:०) सोपोर के पास वितस्ता की बडी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर में मिलती है। इसका नाम 'पोहूर' है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी में पोहूर अथवा और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहूर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनो पाठ मिलते हैं। (रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322) हमल स्रोतस्विनी हमल परगना में बहती आती है। हमल ही 'समाला' नदी (रा० : ७ : १५९) महापद्मसर अर्थात् वूलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो जाता है। जल धारा की भयंकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है। वितस्ता : वायु या ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणो के अनुसार :- 'हिमवत्पादानिःसृता' रूप से वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात् वितस्ता का उल्लेख किया है। भागवत पुराण (५ : १० . १७) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है। शतेद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्किनी, विश्वेति महानद्यः। निम्नलिखित मुख्य नदियो का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा . इरावती : रावी वितस्ता : झेलम विशोका : वेशव
परिशिष्ट ग २५ देविका : रावी की एक सहायक नदी है। उमा का रूप है। रावी और चेनाव के मध्य बहती है कुहू : कुभा अर्थात् काबुल नदी गोमती : गोमेल (ऋग्वेदीय गोमती) नीलमत मे गौतमी है। कही कही गोमती छप गया है। शतद्रु : सतलज चन्द्रभागा : चिनाव सरस्वती : सरस्वती सिन्धु : महानद तथा दूसरी इसी नाम की छोटी नदी कश्मीर मे है जो बान्दीपुर के पास वितस्ता में मिलती है। दोनों नदियाँ कश्मीर मण्डल में बहती है। सिन्धु नदी लद्दाख, लेह, गिलगिट, चिलास होती पाकिस्तान में निकल जाती है। छोटी सिन्धु सोनमर्ग के पर्वत के किनारे-किनारे बहती वितस्ता में मिलती है। कश्मीर मण्डल की जो नदियाँ सिन्धु में मिलती है उनमें तथा सिन्धु में स्नान करने पर मनुष्य मरणोपरान्त स्वर्गगामी होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। उत्तरकुरु को ऐतरेय ब्राह्मण (९:१४) में परेण हिमवन्तं कहा गया है। एक अन्य स्थान पर (८:२३) में वसिष्ठ सातहव्य ने उत्तरकुरु को देवक्षेत्र कहा है। सातवीं शताब्दी में चीनी लेखकों के अनुसार सिन्धु नदी से चेनाव नदी और दक्षिण माल्दरेज तक था। हुएनसांग के अनुसार उरसा कश्या पश्चिम तक्षशिला तथा सिंहपुर दक्षिण-पश्चिम पूंछ और राजौरी दक्षिण था। उरसा भूखण्ड कश्मीर तथा तक्षशिला के मध्य में था, (कनिंघम) पूर्व तथा पूर्व-दक्षिण की सीमा कहाँ तक विस्तृत थी पता नहीं चलता। परन्तु रावी नदी तक यह सीमा विस्तृत थी यह बात मानी जाने लगी है। उत्तर में सिन्धु नदी की उपत्यका में हिमालय पर्वतमाला में स्थित भूखण्ड था। उस समय जालन्धर हर्षवर्द्धन के राज्य में था। आठवीं शताब्दी का नक्शा ठीक नहीं मिलता परन्तु शंकर वर्मा ने कांगड़ा उपत्यका विजय किया था। इस प्रकार कश्मीर सिन्धु नदी से शतद्रु सतलज तक पर्वतीय प्रदेश में था। हुएनसांग के मत से ११६६ मील है।