राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरङ्ग १३
[बायाँ स्तम्भ] स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूलर को इस प्रकार के शिलालेख सुन मूह (शोन मुध) तथा बारहकूला (वाराह क्षेत्र) में मिले थे। उसी प्रकार के शिलालेख स्वर्गीय श्री स्तास्तीन को विजशोर (विजयेश्वर) बावन (मार्तंड) तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हुए थे । कल्हण के समय मंदिर, बिहार, मठ, देवस्थानादि अपने पूर्व रूप में मौजूद थे, उसे इस स्रोत से यथेष्ट सामग्री इतिहास रचना और विश्रृंखलित वड़ियों को जोड़ने के लिये मिली थी। मैने काश्मीर के खंडित मन्दिरों, देवालयों, विहारों आदि में खूब भ्रमण किया है । शिलालेखों की खोज की । कुछ मिल नहीं सका । संभव है । वे कहीं भूमि में गड़े पड़े होंगे । (२) पूर्व भूभृत वस्तु—राजा अपने शासन काल में व्यक्ति, मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा दान पत्रों के लिये शिलालेखों, ताम्रपत्रों पर अपना नाम, राज्य काल, दान लेने वाले का नाम-पता, दान का प्रयोजन, मंदिर किंवा सार्वजनिक निर्माण- शाला की स्थापना का समय, उद्घाटन, जीर्णोद्वार आदि खुदवाता था । नाम, समय, स्थान, दान का प्रयोजन, कभी-कभी व्यय द्रव्य की संख्या, देवस्थान, मन्दिर एवं सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनकी व्यवस्था, जागीर, भूमिदान किंवा अग्रहार दान, आदि लिखवाता था। कभी-कभी अपनी वंशावली के लेख के साथ, शिला, ताम्र किंवा किसी धातु-पत्र, लकड़ी, अलंकृत पट्ट अथवा पट्टिका, गृह-कार्य योग्य वस्तुओं, जैसे बरतन, रजत पात्रादि, पर नामादि खुदवा कर सम्मानार्थ देता था । इसी प्रकार विशिष्ट नागरिक, सामंत, अमात्य तथा अन्य नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम, ग्राम, पद के साथ लेख खुदवाते थे, कल्हण इन्हें पूर्व भूभृत वस्तु कहता है। राजतरंगिणी की लेखन-सामग्री में उसने इन लेखों का संग्रह किया था। जिनके कारण राजाओं, उनके सामंतों, तत्कालीन लोगों के काल, स्थान, राज काल, और दान की गई वस्तुओं को देखकर,
[दायाँ स्तम्भ] उस समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता था। उस समय की कलाकृतियों को देखकर, तत्कालीन कला का प्रकार तथा उसकी लोकप्रियता का अनुमान लगाकर, कल्हण ने इस ग्रन्थ की रचना की है। (३) प्रशस्तिपट्ट—मन्दिरों तथा सार्वजनिक स्थानों में प्रशस्तिपट्ट, राजाओं, विशिष्ट व्यक्तियों तथा स्थानों की स्तुति में लगाया जाता था । तीर्थ, देवस्थान, राजादि के गौरव अथवा सम्मान में काव्य- मय पद्य में स्तुति उत्कीर्ण की जाती थी । प्रशस्ति का मूल स्रोत वैदिक साहित्य है। स्तोत्रों द्वारा प्रशस्ति गीत तथा काव्य दोनों निकले हैं। स्तोत्रों में देवताओं की प्रशस्ति किंवा स्तुति की जाती है। प्रशस्ति गान से गौरव गान निकला है। पूर्व काल में केवल देवताओं तक यह सीमित था । तत्पश्चात् लौकिक पुरुष विशेष की प्रशस्ति किंवा कीर्ति लिखी और गायी जाने लगी । पहले उन लौकिक पुरुष विशेष तथा मानवों की प्रशस्ति गायी तथा लिखी जाती थी जिन्होंने देवत्व प्राप्त कर लिया था । इस श्रेणी में साधु, महात्मा, योगी एवं आध्या- त्मिक पुरुष थे। अनन्तर राजाओं आदि के प्रशस्ति गीत लिखे और गाये जाने लगे। कालान्तर में राज कवि होने लगे । वे अपने स्वामी की प्रशंसा में प्रशस्ति गीत और काव्य की रचना करने लगे । प्रशस्ति काव्य के कवि राजाश्रित होते थे । आज- कल अभिनन्दन ग्रन्थ देने की प्रथा चल निकली है । यह किसी को भी समर्पण किया जा सकता था। उसमें व्यक्ति विशेष की प्रशस्ति होती है। पट्ट का अर्थ महीन वस्त्र होता है। लिखने की पटिया, धातु पत्र, चर्म-पत्र, भोज-पत्र की होती थी । जिस पर जन्मपत्रों के समान किसी राजा अथवा किसी की वंशावली, वंश के कार्यों का उल्लेख, वंश में उत्पन्न हुए लोगों के जन्म तथा मृत्यु की तिथि आदि लिखी जाती थी । पुरोहित, चारण, भाट, बंदी,
१२ राजतरङ्गिणी दृष्टैश्च पूर्वभूपर्तृ प्रतिष्ठावस्तुशासनैः । प्रशस्तिपट्टैः शास्त्रैश्च शान्तोऽशेषभ्रमक्लमः ॥ १५ ॥ १५ पूर्व काल के भूपतियों द्वारा मंदिरों के प्रतिष्ठाकालीन एवं दान संबंधी प्रतिष्ठा¹ तथा वस्तु² प्रशस्तिपट्टों³ और शास्त्रों⁴ के अवलोकन द्वारा जो कुछ भ्रम मुझमे शेष रह गया था उसकी भी शांति हो गई है।
था । प्रथम यह कि पुरा काल में काश्मीर विशाल सरोवर अर्थात् सतीसर था । जल बह जाने के कारण रमणीय भूमिमय उपत्यका बन गयी थी । नाग जाति यहाँ की संरक्षक थी । जल बह जाने पर सरोवर काश्मीर राज्य के रूप में परिणत हो गया । उस समय भी नाग जाति वहाँ पर थी । हुएनसांग मिहिर कुल का वर्णन करता है। वह काश्मीर का राजा था । घोर अत्याचारी था । बौद्ध धर्मानुयायियो का शत्रु था । उसे लोगो के हत्या की कुप्रवृत्ति प्राप्त थी । वह बाल अवला वृद्ध सबको ताड़ित करना था । राजतरंगिणी में कल्हण ने पहली घटना का वर्णन १. २४-३१ में किया । दूसरी घटना-मिहिर कुल के शासन और उसके नृशस प्रवृत्तियो-का वर्णन ( तरग १ के २८६-३२५ ) मिलता है । मिहिर कुल के राज्यकाल के सदभं मे इस विषय पर और प्रकाश डाला गया है । काश्मीर में मुसलिम शासन हो जाने पर भी नीलमत पुराण की मान्यता थी । मुसलिम बादशाह नीलमत पुराण का आदर करते थे । नीलमत पुराण की प्राचीनता तथा उसके अस्तित्व का समर्थन श्री जोन राज द्वितीय राजतरंगिणी में करते हैं । श्री जोनराज के समय में नीलमत पुराण का पाठ होता था । काश्मीर के प्रसिद्ध बादशाह बडशाह जैनुल आ- वदीन (सन् १४२०-१४७० ई० ) पण्डितों से नीलमत पुराण सुनता था । उसके आधार पर उसने एक नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन जगत् में किया था । (दन १९ )
पाद टिप्पणियाँ : १५. ( १ : प्रतिष्ठाशासन—इस शब्द का प्रयोग कल्हण ने उन शिलालेखों के लिये किया है जो मंदिरों, मठों, विहारो, देवस्थानों, स्मारकों, प्रतिमाओ, के पीठस्थानों, सिहासनो, राजप्रासादो, भवनों पर, स्मृति तथा परिचय निमित्त उत्कीर्ण किये जाते थे । मन्दिरो तथा मूर्तियो के प्रतिष्ठा के समय 'शिला लेखादि लगाने की प्रथा आज भी प्रचलित है। राजाओ के राज्याभिषेक के समय शासन प्रसारित किये जाते थे, जैसे—बंदियो की कारागार से मुक्ति, करों की छूट, बलि के लिये पशुहत्या पर प्रतिबन्ध । राजा अपने शासन काल में किस नीति का अवलंबन करेगा, कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित किये जायेंगे, कौन से सुधार एवं संशोधन प्रचलित राज नियमो में किये जायेंगे आदि । राजाओं के राज्या- भिषेक के अवसर पर कुछ प्रतिष्ठा शासन प्रसारित किये जाते थे । कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित किये जायेंगे, कितने प्रचलित राज नियमो में संशोधन, परिवर्धन, किये जायेंगे, इसकी तालिका प्रतिष्ठा शासन में होती थी । राज्याभिषेक उत्सव के उपलक्ष में मंदिरो, व्यक्तियो, विहारो, मठो को क्या दान दिया जायेगा, इत्यादि बातें प्रतिष्ठा शासन में आती थी । यह प्रथा आज भी प्रचलित है। इस प्रकार की सामग्रियां काश्मीर में आज भी गडिन बिखरी पड़ी हैं । मुस्लिम शासन काल में सभी मंदिर, देवस्थान, आदि तोड दिये गये थे । उनके पत्थर मस्जिदो, मजारों, ज़ियाग्तों तथा मकानों में लग गये हैं। कल्हण के पूर्व हुई, रानी दिद्दा का एक शिलालेख मिला है। यह लाहोर के संग्रहालय में सुरक्षित है।
प्रथम तरङ्ग १३
स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर को इस प्रकार के शिलालेख खून मूह (खोन मुश) तथा बारहमूला (वाराह क्षेत्र) में मिले थे । उसी प्रकार के शिलालेख स्वर्गीय ओ स्तास्तोंन को विजभ्रोर (विजयेश्वर) यावन (मार्त्तण्ड) तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हुए थे । कल्हण के समय मंदिर, विहार, मठ, देवस्थानादि अपने पूर्व रूप में मौजूद थे, उसे इस स्रोत से यथेष्ट सामग्री इतिहास रचना और विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने के लिये मिली थी । मैने काश्मीर के खंडित मन्दिरा; देवालयों, विहारों आदि में खूब भ्रमण किया है । शिलालेखों की खोज की । कुछ मिल नही सका । संभव है । वे यहीं भूमि में गड़े पड़े होंगे । (२) पूर्व भूभूत वस्तु—राजा अपने शासन काल में व्यक्ति, मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा दान पत्रों के लिये शिलालेखों, ताम्रपत्रों पर अपना नाम, राज्य काल, दान लेने वाले का नाम-पता, दान का प्रयोजन, मंदिर किंवा सार्वजनिक निर्माण- शाला की स्थापना का समय, उद्घाटन, जीर्णोद्धार आदि खुदवाता था । नाम, समय, स्थान, दान का प्रयोजन, कभी-कभी व्यय द्रव्य की संख्या, देवस्थान, मन्दिर एवं सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनकी व्यवस्था, जागीर, भूमिदान किंवा अग्रहार दान, आदि लिखवाता था । कभी-कभी अपनी वंशावली के लेख के साथ, शिला, ताम्र किंवा किसी धातु-पत्र, लकड़ी, धनंकृत पट्ट अथवा पट्टिका, गृह-कार्य योग्य वस्तुओं, जैसे बरतन, रजत पात्रादि, पर नामादि गुदवा कर सम्मानार्थ देता था । इसी प्रकार विशिष्ट नागरिक, सामंत, अमात्य तथा अन्य नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम, ग्राम, पद के साथ लेख खुदवाते थे, कल्हण इन्हें पूर्व भूभूत वस्तु कहता है । राजतरंगिणी की लेखन-सामग्री में उसने इन लेखो का संग्रह किया था । जिनके कारण राजाओ, उनके सामंतों, तत्कालीन लोगो के काल, स्थान, राज काल, और दान की गई वस्तुओं को देखकर, उस समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता था । उस समय की कलाकृतियों को देखकर, तत्कालीन कला का प्रकार तथा उसकी लोकप्रियता का अनुमान लगाकर, कल्हण ने इस ग्रन्थ की रचना की है । (३) प्रशस्तिपट्ट—मन्दिरों तथा सार्वजनिक स्थानों में प्रशस्तिपट्ट, राजाओं, विशिष्ट व्यक्तियों तथा स्थानों की स्तुति में लगाया जाता था । तीर्थ, देवस्थान, राजादि के गौरव अथवा सम्मान में काव्य- मय पद्य में स्तुति उत्कीर्ण की जाती थी । प्रशस्ति का मूल स्रोत वैदिक साहित्य है । स्तोत्रों द्वारा प्रशस्ति गीत तथा काव्य दोनो निकले है । स्तोत्रों में देवताओ की प्रशस्ति किंवा स्तुति की जाती है । प्रशस्ति गान से गौरव गान निकला है । पूर्व काल में केवल देवताओ तक यह सीमित था । तत्पश्चात् लौकिक पुरुष विशेष की प्रशस्ति किंवा कीर्ति लिखी और गायी जाने लगी । पहले उन लौकिक पुरुष विशेष तथा मानवों की प्रशस्ति गायी तथा लिखी जाती थी जिन्होंने देवत्व प्राप्त कर लिया था । इस श्रेणी में साधु, महात्मा, योगी एवं आध्या- त्मिक पुरुष थे । अनन्तर राजाओं आदि के प्रशस्ति गीत लिखे और गाये जाने लगे । कालान्तर में राज कवि होने लगे । वे अपने स्वामी की प्रशंसा में प्रशस्ति गीत और काव्य की रचना करने लगे । प्रशस्ति काव्य के कवि राजाश्रित होते थे । आज- कल अभिनन्दन ग्रन्थ देने की प्रथा चल निकली है । यह किसी को भी समर्पण किया जा सकता था । उसमें व्यक्ति विशेष की प्रशस्ति होती है । पट्ट का अर्थ महीन वस्त्र होता है । लिखने की पटिया, धातु पत्र, चर्म-पत्र, भोज-पत्र की होती थी । जिस पर जन्मपत्री के समान किसी राजा अथवा किसी की वंशावली, वंश के कार्यों का उल्लेख, वंश में उत्पन्न हुए लोगों के जन्म तथा मृत्यु की तिथि आदि लिखी जाती थी । पुरोहित, चारण, भाट, बंदी,
१४ राजतरङ्गिणी
[बायाँ स्तम्भ]
सूत के पास पट्टा, मुट्ठे अर्थात् तालिका होती थीं। राजवंशो के पट्ट अलंकृत रखे जाते थे। विशेष पर्वो पर उन्हें निकाला जाता था। उनका पाठ होता था। मिथिला में मैथिल ब्राह्मणो के पास उनके यजमानों की पूरी वंशावली रहती है। ब्राह्मण लोग विवाहादि उसे देखकर ठीक करते हैं। पट्टो के आधार पर वे पता लगा लेते हैं। किस वंश में कितने पुत्र तथा कन्याएँ हैं। उनका गण्य बैठाकर वे विवाह निश्चय करते हैं। ग्रामों में आज भी वह प्रथा प्रचलित है। पाश्चात्य देशो जैसा प्रेम-विवाह भारत मे नगण्य था। आजकल कुछ प्रचलित हो रहा है। सूत, बंदी, भाट, चारण, उत्सव पर उन्हे गाते थे। कुटुंबों में प्रशस्तिपाठ करने की रीति थी। राज्याभिषेक, युद्ध, विजय, के समय उनके पुण्य कार्यों, उनकी वीरता और विशिष्ट कार्यों का गुणगान किया जाता था। इस प्रकार के कवि राजस्थान, गुजरात के राजवंशों से अब भी सबन्धित हैं। उन्हें राजकवि कहा जाता है। उन्हें वाच अथवा वही कहते हैं। भारत की रियासतों, तालुकेदारों तथा बड़े जमींदारों के यहाँ भी कवि रहते थे। वे कविता-पाठ करने के साथ ही साथ वंश का इतिहास कविता मे बना दिया करते थे। मंदिरों तथा कुटुम्बों में चैत्र सुदी प्रतिपदा को इनका पाठ पढ़ा जाता था। कुछ कुटुम्बों में विवाह एवं श्राद्ध के अवसर पर पढ़ा जाता था। मैं भारतीय नव परिवहन मंडल के अध्यक्ष की हैसियत से गुजरात के बंदरगाहो को देखने मई सन् १९६५ ई० में गया था। वड़ौदा संग्रहालय में शिलालेखों पर उत्कीर्ण मुझे प्रशस्ति मिली। देशी राज्यों में भिन्न भिन्न रूप से प्रशस्तियां लिखी जाती थीं। किन्तु उनका विषय वस्तु प्रायः एक ही रहा है।
[दायाँ स्तम्भ]
विजय दशमी, शस्त्रपूजा तथा यात्रा के समय सम्मेलनों अथवा जलूस के आगे आगे उच्च स्वर में चारण, भाट, बंदी, सूत गाते थे। आज भी बारात में आगे आगे ये गाते चलते हैं। बारात में वर और कन्या पक्षों के प्रशस्तिवाचक अपने अपने वंशगौरव की कथा सुनाते हैं। यह प्रथा भारत में प्रायः लोप हो रही है। (४) शास्त्र—कल्हण ने यहाँ पर शास्त्र शब्द का प्रयोग संस्कृत में लिखे ग्रन्थों के लिए किया है। स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर कल्हण के 'शास्त्र' शब्द का अर्थ धर्मशास्त्र एवं संस्कृत में लिखे गया,-विधि पुस्तको से केवल नहीं लगाते। उनका मत है। शास्त्र शब्द के अन्दर संस्कृत के उन सभी ग्रन्थों का समावेश हो जाता है, जिनमें लेखक ग्रन्थ की समाप्ति अर्थात् अन्त में अपना नाम, रचना काल, लिखकर ग्रन्थ को इति लिखता है। हुएनसांग ने अशोक और कनिष्क की बौद्ध परिषदों का उल्लेख करते समय अभिधर्म शास्त्र शब्द का प्रयोग किया है। इसमें निबन्ध तथा सिद्धान्त ग्रन्थो का समावेश हो जाता है। कल्हण ने शास्त्र शब्द का व्यापक अर्थ लगाया है। आज भी संस्कृत में लिखे ग्रन्थों को जनता शास्त्र समझती है। प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणो, जीवनियों, ऐतिहासिक चरित्रचित्रणों, निबंधों, सिद्धान्त ग्रन्थो, जिनमें कुछ भी ऐतिहासिक सामग्री कड़ी जोड़ने के लिए मिल सकती थी, कल्हण ने शास्त्र स्रोत माना है। प्राचीन समय में ग्रन्थ लिखने की एक प्रचलित शैली थी। ग्रन्थ के अन्त, प्रत्येक सर्ग के अन्त, ग्रंथ के आरम्भ में पुस्तक का नाम, अध्याय प्रसंग, लेखक का नाम, किस राजा के काल में और किस समय रचना की गयी है, इसका उल्लेख किया जाता था। कल्हण ने राजाओं का काल निर्णय करने में इस अमूल्य स्रोत का उपयोग किया था। इससे प्रकट होता है। कल्हण ने राजतरंगिणी लिखने के लिए
प्रथम तरङ्ग १५ द्वापञ्चाशतमाम्नायभ्रंशद्यान् नास्मरन् नृपान् । तेभ्यो नीलमताद् दृष्टं गोनन्दादिचतुष्टयम् ॥ १६ ॥ १६ पूर्व रचनाकारों को वावन राजाओं के इतिवृत्त का प्रमाणों के अभाव मे अज्ञान था । उनमें से गोनंदादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है। अपनी पैनी दृष्टि के साथ ही साथ, परिश्रम से सामग्री (३) यशोवती, तथा (४) गोनंद द्वितीय है। एकत्रित कर, इस ऐतिहासिक महाकाव्य की रचना नीलमत ६-९। में हाथ लगाया था। कीर्ति स्तंभ-विजय स्तंभ- कल्हण न इस तरंग की श्लोक-संख्या १६ तथा ४५ कश्मीर में कीर्ति-स्तंभ का उल्लेख नहीं किया है। में कल्हण ने स्पष्ट कहा है। पूर्ववर्ती ५२ मन्दिर, धर्मशाला, विहार, तड़ाग, वापी, चैत्य, मठादि राजाओं के इतिहास का किसी समय अस्तित्व के शिलालेखों में राजाओं तथा महान् व्यक्तियों किंवा था। काश्मीर में वे ग्रंथ थे। परन्तु उनका लोप निर्माणकर्त्ताओं की कीर्ति के पद लिखे जाते हैं। हो गया है। कल्हण ने उन्हें खोजने का यथा- शक्ति प्रयास किया । राजा लोग विजय, राज्यारोहण, यश, किसी विशेष घटना के स्मरणार्थ कीर्ति-स्तंभों का निर्माण कराते हैं। मिस्र, बेबीलोन, असीरिया तथा काश्मीर का इतिहास क्रमबद्ध तिथियों तथा वर्षों तक में वर्णित किया गया है। कल्हण से सहस्रों ईरान के प्राचीन राजाओं ने अपनी कीर्तियों को वर्ष पूर्व लुप्त राजाओ का काल आता है। सामग्री स्तंभों पर खुदवाया था। भारत के गुप्त सम्राटों अप्राप्य देखकर कल्हण ने कारण भी उपस्थित किया ने यह प्रथा चलाई थी। अशोक के स्तंभ कीर्ति स्तंभ है। उन ग्रन्थों के लोप होने का क्या कारण था ? न होकर प्रचारार्थ धर्म स्तंभ कहे जायेंगे । चन्द्रगुप्त, उनको जब कोई उपयोगिता नही रह गई तो समुद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि राजाओं ने इस प्रकार के उन्हें कौन पढ़ेगा ? अफगानिस्तान तथा भारत स्तंभ का निर्माण कराया था। मन्दसौर तथा महरौली के पश्चिम उत्तर सीमांत में वेदों तथा संस्कृत (दिल्ली) के कीर्ति स्तंभ इसके ज्वलन्त उदाहरण ग्रन्थों की रचना हुई थी। वहाँ के लोग मुसलमान हैं। कल्हण ने संभव है, इस प्रकार के अभिलेखों को, हो गए। अतएव पुरातन वैदिक साहित्य तथा प्रशस्ति-पट्ट वर्ग में रखा हो। कीर्ति और विजय स्तम्भ संस्कृत ग्रन्थों की उपयोगिता नष्ट हो गई। वे में अन्तर है। विजय स्तम्भ किसी विजय के उपलक्ष्य लुप्त हो गए, उनके स्थान पर अरबी, फारसी में लगाया जाता था। प्रत्येक विजय स्तम्भ कीर्ति तथा नवीन लिपी आई। इसका अर्थ यह नहीं स्तम्भ होता है। परन्तु प्रत्येक कीर्ति स्तम्भ का विजय है। आज से १५ सौ वर्ष पूर्व अफगानिस्तान स्तम्भ होना सम्भव नहीं है। आदि में संस्कृत तथा वैदिक साहित्य का अस्तित्व नही था। यह प्रकृति का गुण है। जिन वस्तुओं पाठभेद : की उपयोगिता नष्ट हो जाती है उन्हें त्याग दिया श्लोक संख्या १६ में 'गोनन्दादि' का पाठभेद जाता है। शरीर भी जब क्षीण, रोग-ग्रस्त ओर 'गोनर्दादि' मिलता है। जर्जर हो जाता है तो आत्मा भी इसका साथ त्याग पादटिप्पणियाँ : देती है। १६ (१) चार राजा- (१) गोनंद, (२) दामोदर,
१६ राजतरंगिणी बद्धा द्वादशभिर्ग्रन्थसहस्रैः पार्थिवावलिः । प्राङ्महाव्रतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ॥ १७ ॥ १७ पाशुपतव्रती ब्राह्मण हेलाराज' ने पूर्वकाल में बारह हजार श्लोको की पुस्तक 'पार्थिवावलि' की रचना की थी । तन्मतं पद्ममिहिरे दृष्ट्वाऽशोकादिपूर्वगान् । अष्टौ लवादीन् नृपतीन् स्वस्मिन् ग्रन्थे न्यदर्शयत् ॥ १८ ॥ १८ पद्ममिहिर ने हेलाराज की कृति का अध्ययन कर अपनी रचना में अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओं का और वर्णन अंकित किया है। वे लव तथा उसके क्रमशः उत्तराधिकारी थे । पाठभेद : श्लोक संख्या १७ मे 'पार्थिवाद' का पाठभेद 'या नृपाव' मिलता है । श्लोक संख्या १८ 'पद्ममि' का 'पूर्वमि', पूर्वगा' का 'पूर्वजा तथा 'युगलकम्' का 'युग्मम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७ (१) हेलाराज काश्मीरी ब्राह्मण थे। उनका काल ९वी तथा १०वी शताब्दी के मध्य माना जाता है। उन्होंने 'वाक्यपदीय' पर एक भाष्य लिखा है। राजा लव से शचीनर तक के राजाओं का उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिणी के प्रथम तरंग की श्लोक संख्या ८४ से १०० तक में किया है। हेलाराज पाशुपत पंथ के अनुयायी थे । शैव सिद्धान्त के आधार आधारित एक पंथ था। यह शिव रूप में ईश्वर की कल्पना करता है। शिव को जगत् का सर्जक तथा चलाने वाला मानते हैं। परन्तु जगत् उत्पत्ति का उन्हे भौतिक कारण नही बताते । सांख्य दर्शन के 'प्रधान' सिद्धान्त को मानते हुए वे इस सिद्धान्त में विश्वास करते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है। पशुपति किंवा पशुपतिनाथ का मंदिर बागमती नदी के तट पर काठमाण्डू नेपाल मे स्थित है। में यहाँ का दर्शन तथा भ्रमण कर चुका हूँ। पशुपति मूर्ति के विषय में अपनी पुस्तक 'जापान् नेपाल' में प्रकाश डाल चुका हूँ। (२) द्विजन्मना :-कल्हण ने हेलाराज को द्विज कहा है। हेला शब्द नाम के लिये सुसंस्कृत और परिष्कृत नहीं कहा जा सकता। वह शब्द स्त्रीलिंग है। राज शब्द अन्त में लगा देने से हेलाराज होकर इसे पुंलिंग रूप प्राप्त हो गया है। हेला का अर्थ होता है, तिरस्कार, अपमान, आसानी, सौलभ्य, सरवरी एवं उत्कट मैथुनेच्छा । हिन्दी भाषा में हेला शब्द मल उठाने वाले भंगियों के लिये आता है। यह निसन्देह शूद्र जाति मानी जाती थी । द्विजन्मना विशेषण हेला शब्द में लगाकर हेला शब्द को उच्चस्तरीय बनाने का सुन्दर प्रयास कल्हण ने किया है। कश्मीर मे डोम गायक होते थे। कुछ तो राज परिवार की शोभा तक बढा चुके है। काशी में प्रसिद्ध शहनाई- वादकों का कुटुम्ब हेला था । इस पीढ़ी में कुछ मुसलमान हो गये हैं। हेला शब्द का काश्मीर की लौकिक भाषा में उस समय क्या अर्थ था। गवेषणा का विषय है। हेलाराज शुद्ध ब्राह्मण थे इसमें किसी प्रकार का सन्देह नही है। इसी बात को पाठको के मन पर जमाने के लिये कल्हण ने द्विज शब्द का प्रयोग हेलाराज के नाम के साथ बलवती भाषा में किया है। द्विज के लिये कहा गया है-'द्वाभ्यां जन्मसंस्का- राभ्या जायते' दो बार उत्पन्न किंवा जन्म धारण करने वाले को द्विज कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रो और वैश्य द्विज कहे गये हैं। संस्कार के कारण उनका द्वितीय जन्म माना जाता है। धारणा है। यज्ञोपवीत
प्रथम तरङ्ग १७ येऽप्यशोकादयः पञ्च श्रोच्छविल्लाकरोऽब्रवीत् । तान् द्वापञ्चाशतो मध्याच्छ्लोकस्तस्य तथा ह्ययम् ॥ १९ ॥ १९ श्रीच्छविल्लाकर¹ ने अशोक के पश्चात् के जिन पाँच राजाओं का वर्णन किया है। वे लुप्त बावन राजाओं में से हैं, क्योंकि उसका निम्नलिखित श्लोक वह बात स्वतः स्पष्ट कर देता है। “आऽशोकादभिमन्योर्ये प्रोक्ताः पञ्च महीभुजः । ते द्वापञ्चाशतो मध्यादेव लब्धाः पुरातनैः ॥” २० ॥ २० प्राचीन रचनाकारों ने अशोक से आरम्भ कर अभिमन्यु तक जिन पांच महीभुजों का वर्णन किया है, उसे उन्होंने बावन राजाओं की तालिका मे से ही लिया है। के पश्चात् ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य द्विज कहे जाते हैं। प्रथम जन्म माता देती है। दूसरा जन्म उन्हें संस्कार देता है। अंडज प्राणी द्विज कहे जाते हैं। पहला जन्म अंड रूप में माता देती है। दूसरा जन्म अंडा फूटने पर होता है। पक्षी, सर्प, मछली आदि अंडज द्विजन्मा होने के कारण द्विज कहे जाते हैं। दांत को भी द्विज कहते हैं। मनुष्य का दांत दोबार मुख में पैदा होता है। पहला दाँत बाल्यावस्था के पश्चात् टूट जाता है। तत्पश्चात् दूसरा दाँत मुख में पुनः उत्पन्न होता है। आज कल भारतवर्ष में द्विज शब्द केवल ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त होता है। राजतरंगिणी के सभी अनुवादकर्ताओं ने द्विज का अर्थ यहाँ पर ब्राह्मण दिया है। श्री स्टीन तथा श्री आर एस. पण्डित दोनों ने यहाँपर द्विज का अनुवाद ब्राह्मण किया है। मैंने द्विज शब्द को ही रख दिया है। द्विज शब्द प्रचलित है। साधारण है। उसका अर्थ सभी समझते हैं। द्विजन्म प्रथा इसाइयों में भी प्रचलित है। बपतिस्मा के पश्चात् दूसरा जन्म होना माना जाता है। यहूदी और मुसलमान जबतक खतना नहीं हो हो जाता, वे यहूदी तथा मुसलमान नहीं माने जा सकते। प्राचीन यूनान में डस्टनाइ डिमो नेमम पन्थ में द्विज प्रथा प्रचलित थी। पाठभेद : श्लोक संख्या १९ में 'तान्द्राप' का पाठभेद 'तान् स्वाप' मिलता है। श्लोक संख्या २० में 'आशोका' का 'अशोका' और 'शतो' का 'शतौ' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियां : १९ (१) श्रीच्छविल्लाकर के विषय में अभी तक कुछ भी साधिकार बातें नही जाना जा सकी है। कल्हण ने अशोक के पश्चात् के ५ राजाओ का उल्लेख राजतरंगिणी में छविल्लाकार के आधार पर किया है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टि से कालगणना में अंतर पड जाता है। इसके लिये कल्हण की अपेक्षा पूर्वलेखक अधिक उत्तरदायी हैं, जिनके आधार पर कल्हण ने लिखा है। इस प्रकार ५२ राजाओं में कल्हण ने १७ राजाओं का पता तत्कालीन ग्रन्थों के आधार पर लगाया है। उनका उल्लेख और वर्णन इन्हीं के आधार पर किया है। इससे यह भी प्रकट होता है। कल्हण ने उन्ही सामग्रियों का उपयोग किया है, जो काश्मीर में उपलब्ध थी। कल्हण का लेखन काल सन् ११४८-११५० ई० है। सन् ७१२ में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था। सिंधराज दाहिर पराजित हो चुका था। उन दिनों सिंध के ब्राह्मणों तथा बौद्धों के मतभेद के कारण अरबों को सफलता मिली थी।
[Page Header] १८ राजतरङ्गिणी
[Shloka 21] इयं नृपाणामुल्लासे ह्रासे वा देशकालयोः । भेषज्यभूतसंवादिकथा युक्तोपयुज्यते ॥ २१ ॥
[Hindi Translation 21] २१ राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा¹ देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह किंवा शांतिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी ।
[Shloka 22] संक्रान्तप्राक्तनानन्त्यव्यवहारः सुचेतसः । कस्येदृशो न संदर्भों यदि वा हृदयङ्गमः ॥ २२ ॥
[Hindi Translation 22] २२ कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारों से परिपूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को हृदयंगम नहीं कर सकेगा ?
[Column 1] मुल्तान विजय करता मुहम्मद बिन कासिम उत्तरी पंजाब तक पहुँच गया था। सन् ९३३ ई० में समानी बादशाह अलप्तगीन ने हिन्दुओं के राज गजनी पर अधिकार कर लिया था। सन् ९७७ ई० में अलप्तगीन के पिता के गुलाम ने गजनी पर अधिकार कर लिया। सन् ९९७ ई० में महमूद गजनवी राज्य सिंहासन पर बैठा । भारत पर सन् १००१ ई० में आक्रमण किया। उसका आक्रमण होता रहा । उत्तरी भारत में अव्यवस्था फैल गई। यद्यपि कल्हण के रचना-काल में मुसलमानों का अधिकार भारत पर नहीं स्थापित हुआ था, तथापि उनका आक्रमण होता रहता था। अतएव कल्हण ने काश्मीर से बाहर जाकर इतिहास सामग्री एकत्र करने का सम्भवतः प्रयास नहीं किया। पाठभेद : श्लोक संख्या २२ में 'प्राक्तना' का 'प्रार्थना' और 'सुचेतसः' का 'सचेतसः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २१ (१) कथा—कथा का शाब्दिक अर्थ होता है कहानी, किस्सा, कल्पित कहानी, वृत्तान्त, वर्णन, वार्तालाप-कथोपकथन, आख्यायिका शैली का गद्यमय निबन्ध । कथा पद्य और गद्य दोनों प्रकार का काव्य होता है। कथा साहित्य का मूल स्रोत ऋग्वेद है। ऋग्वेद में ३५ कथाएँ हैं। उन्हें कथा का रूप बृहद्देवता में देने का प्रयास किया गया है। वेद की कथाएँ अत्यन्त
[Column 2] संक्षिप्त हैं। पुराणों तथा रामायण, महाभारत में उन्हें विस्तृत कर, लिखा गया है। व्यक्ति विशेष अथवा किसी घटना के आदि और अंत से युक्त वर्णन को कथा कहा गया है। कथाएँ ऐतिहासिक तथा कल्पित होती हैं। भारत में कथा साहित्य विकसित था। रामायण और महाभारत में वर्णित कथाओं की शैली पर कथा साहित्य भारत में प्रचलित हुआ । 'बृहत्कथा', 'जातक कथा', 'पंचतंत्र' आदि उनके उदाहरण हैं। 'कुमार'- सम्भव', 'कादम्बरी', 'दश कुमार चरित', 'प्रबन्ध चिन्तामणि' 'भविष्यत कहा' 'लोतावई कहा' आदि कथा काव्य हैं। 'हितोपदेश', 'कुवलयमाला', 'मलय सुन्दरी कथा', 'भोज प्रबन्ध' कथा साहित्य के अन्तर्गत आते हैं। मैंने भी 'रामायण कथा', 'योग वासिष्ठ कथा' और 'वेद कथा' लिखा है। मैं कथा साहित्य का प्राचीन चाहे जो रूप रहा हो, आज कथा शब्द से प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में निहित जीवन चरित्रों, घटना विशेषों के वर्णनों से लिया जाता है। उन्हें पढ़ना तथा सुनना पुण्य कार्य माना जाता है। कालान्तर में कथा का सम्बन्ध पौराणिक महाभारत तथा रामायण कथाओं से हो गया। उन्हें धार्मिक रूप दे दिया गया। एकादशी, पूर्णिमाओं तथा अनेक पर्वों पर मन्दिरों, जलाशयों, नदी तटों, अथवा घरों में कथा कहने की परिपाटी चल निकली । सत्यनारायण की कथा का आयोजन प्रायः पूर्णिमासी को सम्पन्न घरों में होता है। मन्दिरों में प्रातः
प्रथम तरङ्ग १९
तथा सायं प्रति दिन नियमित रूप से कथा कहने की रीति है। कथावाचक पण्डित या तो नौकर रख लिए जाते हैं, अथवा कथा-सुनने वाले श्रोतागण उन्हें कुछ दे दिया करते हैं। कथा शब्द से सम्बोधन होता है—कहना अथवा वह जो कहा जाय। कल्हण ने राजतरंगिणी इस लिए लिखी थी कि लोग उससे लाभ उठायें। उसे सुना जाय। उसके पात्रों तथा उसमें वर्णित चरित्रों को लोग सुनें। उन्हें स्मरण रख कर लाभ उठायें ! यह धार्मिक नहीं राजनीतिक किंवा ऐतिहासिक कथा है। कल्हण सम्भवतः इसे श्रव्य ग्रन्थ बनाने की कल्पना कर रहा था। किन्तु वह अपने इस उद्देश्य में सफल नहीं हुआ। राजतरंगिणी धार्मिक ग्रन्थ नहीं बन सकी। उसका श्रवण पुराण, रामायण तथा महाभारत के समान धार्मिक रूप नहीं ले सका। उसे वह पवित्रता तथा आध्यात्मिक महत्त्व नहीं प्राप्त हो सका, जो धार्मिक ग्रन्थों की श्रेणी में रख दिये गया काव्यों को मिला था। निःसन्देह धार्मिक कथाओं में चरित्र, उससे सम्बन्धी घटनाओं, उनका उतार चढ़ाव, आदि, अन्त सब कुछ देकर उसे पूर्ण बनाया जाता है। राजतरं- गिणी में राजाओं आदि के चरित्र का सुन्दर वर्णन दिया गया है। परन्तु राजा देवत्व भाव नहीं प्राप्त कर सके। इसलिए राजतरंगिणी की कथा धार्मिक कथाओं के समान महत्त्व नहीं प्राप्त कर सकी। वह जनसाधारण में घर नहीं कर पायी। यद्यपि राजाओं ने अपने नाम पर विष्णु तथा शिव की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं। मन्दिर बनवाये। नगर बनवाये। अपने नाम जीवित रखने के लिए उनपर दान चढ़ाये। अग्रहार दिये। तथापि यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कल्हण की भावना उदात्त थी। धार्मिक कथा के कारण जैसे चरित्र सुधरता है, उसी प्रकार इस राजनीतिक कथा के कारण राजाओं तथा देश का चरित्र सुधार होगा, यही कल्हण की उदात्त कल्पना थी। इसी लिए यहाँ पर कथा शब्द का उसने प्रयोग किया है। किन्तु उसकी यह आशा सफल न हो सकी कि राजतरंगिणी को कथा रूप में स्वीकार कर उसका पाठ किया जाय। (२) भेषज—कल्हण यहाँ अपने इतिहास लिखने का उद्देश्य उपस्थित करता है। उसका एकमात्र लक्ष्य काश्मीर के राजाओं तथा काश्मीर राज्य की राजनैतिक व्याधियों के लिये देशकाल- पात्र के अनुसार औषध प्रस्तुत करना था। उसका उद्देश्य अर्वाचीन ऐतिहासिकों के समान वैज्ञानिक इतिहास नहीं लिखना था। उसने इतिहास को 'काव्य की क्रांति' के अंग्रेजी लेखक तुल्य इतिहास को गप्पों का परिणाम नहीं माना है। रोम साम्राज्य के ह्रास और पतन के प्रसिद्ध लेखक श्री गिबन की तरह इतिहास को मूर्खताओं, दुर्दशाओं के कथानक के रूप में नहीं देखा है। महान् सेनानी नेपोलियन कहा करता था—'इतिहास कथानकों के अतिरिक्त और है क्या?' कल्हण कथानक को इतिहास का एकमात्र हेतु नहीं मानता। उसने इतिहास को दार्शनिक श्री इमरसन के शब्दों में प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवनचरित्रों का संग्रह नहीं माना है। जर्मन दार्शनिक श्री हेगल ने इतिहास रचनाकारों की तुलना उन मनीषियों से की है, जो भूतकाल की ओर आँखें फेरकर देखते हैं। कल्हण ने राजाओं का इतिहास लिखा है। उसने पीछे फिरकर झाँका है। उसमें फँस नहीं गया है। श्री एच. जी. वेल्स ने इतिहास को मानव के विचारों का इतिहास माना है। आधुनिक इतिहास लेखक श्री टायनबो ने इतिहास से तात्पर्य माना है कि सभ्यताओं के अन्दर एक प्रक्रिया चलती रहती है। यह उसकी उत्पत्ति, विकास, ह्रास और विघटन को उपस्थित करता है। उसके अनुसार 'इण्डिक' सभ्यता काल ईसापूर्व १७०० से ईसा पश्चात् ५०० वर्ष रही है। विकास का समय वह वेद से बुद्ध काल तक मानता है। उसका मत जहाँ तक काश्मीर के इतिहास का सम्बन्ध है, काश्मीर 'इण्डिक' तथा 'हिन्दू' दोनों सभ्यता काल में
२० राजतरङ्गिणी क्षणभङ्गिनि जन्तूनां स्फुरिते परिनिन्दिते । मूर्धाभिषेकः शान्तस्य रसस्याऽत्र विचार्यताम् ॥ २३ ॥ २३ क्षणभंगुर प्राणियों के स्फुरण के विषय में जब परिनिन्दा करता हूँ तब यही परिणाम निकलता है कि रसों में शांत रस१ श्रेष्ठ है । अतएव ग्रंथ में शांत रस की प्रमुखता है। आ जाता है। यहाँ पर घोर अहिंसा लिखना अप्रासं- गिक होगा। यह विषय विवादास्पद है। कल्हण इतिहास को निष्प्राण नहीं मानता। उसका उद्देश्य उन पाश्चात्य लेखकों की अपेक्षा अधिक व्यापक है, जिनके विचारों से जगत् प्रायः प्रभावित होता है। वह इतिहास की श्रृंखला जोड़कर उन्हें तरङ्गिणी रूप में प्रस्तुत करता है। नदियाँ ऋतु परिवर्तन के अनुसार विभिन्न रूप धारण करती हैं। उनसे मनुष्य तृप्त होता है। प्यास बुझाता है। उसमें डूबकर मर भी सकता है। नदी बाढ़ लाकर विप्लव उपस्थित कर सकती है, परन्तु उसके बँधे जल से सिंचकर हरी भरी भूमि और लहलहाते खेत प्राणियों को जीवन-दान देते हैं। कल्हण की दृष्टि में इतिहास विषम परिस्थितियों में राजाओं के लिये ओषधि प्रस्तुत करता है। उसने राजाओं के प्रशस्तिवाचन के लिये लेखनी नहीं उठाई थी। इसमें रोचक कथाओं का वर्णन है। विचारों का वर्णन है। राजाओं तथा उनके अधिकारियों की मूर्खताओं, दुष्टताओं तथा उनमें उत्पन्न होने वाली दुर्दशाओं का वर्णन है। उत्तम चरित्रांकन है। जीवन के अंधकारमय पहलू के साथ प्रकाश का उल्लेख है। आशा के साथ निराशा की झलक मिलती है। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यं' साहित्य दर्पण कहता है। शांत रस आन्तरिक शांति प्रदान करता है। यद्यपि राजतरंगिणी में सभी रसों का रसास्वादन पाठक कर सकते हैं, परंतु कल्हण ने शांत रस को प्रधान माना है। संस्कृत साहित्य का किंचित् मात्र ज्ञान होगा, उसे कल्हण के काव्य में शांत रस की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलेगी। ऐतिहासिक लेखक के लिए शांत रस ही उत्तम माध्यम है। राज्यों के उत्थान-पतन, राजनीतिक प्रवाह, घटनाओं का वर्णन में यदि कवि शांत रस का आश्रय न ले तो भावावेश में भटक सकता है। भावाविष्ट होने पर निर्णय उचित नहीं हो सकेगा। अतः घटनावलियों, गुण-दोष, पुण्य-पाप, उत्थान-पतन, गौरव-निंदा आदि का यथास्थिति सच्चाई से वर्णन करने के लिये मन को संतुलित रखना आवश्यक है। शांत होने पर मन संतुलित होता है। अतएव शांत रस काव्य का प्रधान रस रखकर कल्हण ने इतिहास रचना की शैली के साथ न्याय किया है। काव्य की अनेक परिभाषाएँ की गयी हैं। अलंकारशास्त्र के पंडित किसी एक परिभाषा पर सहमत नहीं होते। तथापि स्वीकार करते हैं कि रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहते हैं। सामान्य, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतम लक्षणों की दृष्टि से काव्य देखा जा सकता है। काव्य कवि की प्रतिभा का द्योतक है। वह प्रतिभा कहीं वरदान, आशीर्वाद अथवा जन्मजात गुण और कहीं व्युत्पत्ति तथा अभ्यास द्वारा परिलक्षित होती है। कल्हण का यह काव्य सूक्ष्म है। उसके पिता कुलीन तथा सुगठित थे। उसमें काव्य-कारण जन्म- पाठभेद : श्लोक संख्या २३ में 'चिन्तिते' का पाठभेद 'चिन्तिनि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २३ (१) शांत रस—अलंकार ग्रंथों के नव रसों में शांत एक रस है। काश्मीरी विद्वान् द्वारा लिखित काव्यप्रकाश के अनुसार आठ रस होते हैं।
प्रथम तरङ्ग २१ जात तथा अभ्यास दोनों से कहा जायगा । उसका यह काव्य लक्षण तथा कारण की दृष्टि से किस वर्ग में आता है। उसने स्वयं कहीं नहीं लिखा है। चार वर्गों में काव्यों का भेद विभाजित किया गया है, उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तथा अधम । कल्हण की राजतरंगिणी प्रथम वर्ग में रखी जायगी । उत्तमोत्तम काव्य ध्वनि के पाँच भेद होते हैं। ध्वनि दो प्रकार की होती है—अभिधामूलक तथा लक्षणा- मूलक । अभिधामूलक ध्वनि के तीन प्रकार होते हैं— रस ध्वनि, वस्तु ध्वनि और अलंकार ध्वनि । कल्हण स्वयं कहता है कि उसके काव्य में शांत रस प्रधान है। कुछ विद्वान् शांत रस को नाटक के लिए ठीक नहीं मानते ।; नव रस शृंगार, करुण, ... शान्त, रौद्र, वीर, अद्भुत, हास्य, भयानक तथा वीभत्स हैं । शांत रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' है । 'निर्वेद' का लक्षण दिया गया है—'नित्यानित्यवस्तु-विचार- जन्मा विषयविरागाख्यो निर्वेदः ।' शांत रस का विरोधी 'शृंगार' रस है । राजंतरंगिणी इतिहास है। वह काव्य ग्रंथ, नाटक, उपाख्यान, उपन्यास, कथा, गीत आदि के तुल्य नहीं है। घटनानुसार सभी रसों का समावेश इसमें मिलेगा । कल्हण का आशय इतिहास लिखकर राजाओं तथा राज्य की बीमारी के लिये उपयुक्त औषध का निदान करना था। सभी राजाओं, जिनका काल लम्बे चार हजार वर्षों का है, उनके चरित्र का चित्रण कर, उनके गुण-अवगुण, उनके उत्थान-पतन, राज्य की समृद्धि तथा ह्रास आदि पर निष्पक्ष वैद्य की तरह, रोगी की भावनाओं से अलग रहकर, निःस्पृह, निष्काम, निर्वेद तुल्य औषध चुनना था । अपना मत प्रकट करना था । इसके लिये शान्त मन, स्थिर बुद्धि और स्वस्थ शरीर का होना आव- श्यक था । यह केवल शांत द्वारा ही हो सकता था । राजतरंगिणी को कल्हण ने शांतरसप्रधान रखा है। यदि राजा तथा राज्य की बात छोड़ दी जाय, तो भी समकालीन तथा पूर्वकालीन समाज, लोक, रीति, कुरीति, अधोगति, उन्नति, आचार-विचार और सभी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक प्रश्नों पर स्वानुभव तथा अर्जित और प्राक्तन ज्ञान के आधार पर निर्णय देना था। यह शांत, प्रबुद्ध, स्थिरचित्त द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सबसे अलग रहकर, ऊपर उठकर, न्यायाधीश की तरह निर्णय दे सके । काव्य की आत्मा रस है। रसों में शान्त रस को कल्हण ने श्रेष्ठ माना है। संकल्प सूर्योदय नाटक ने इसे स्वीकार करते हुए तथ्य पूर्ण तर्क उपस्थित किया है। अभ्यर्पपाटिकामधिकरोति शृंगारिता परस्परं तिरस्कृतिं परिचिनोति वीरायितम् । विरुद्धगतिशृङ्गनस्तदलमल्यमारैः परैः शमस्तु परिशिष्यते शमितचित्तखेदो रसः ॥ ( सं० सू० १ अंकः १९ ) शृंगार रस असभ्यों के व्यवहार का प्रतीक है। वीर रस परस्पर तिरस्कार का परिचायक है । अद्भु- भूत रस विरोधी बातों का आश्रय लेता है। अन्य रस वाले को अन्य रसों से क्या लाभ हो सकता है । चित्त के खेद को शान्त करने में केवल शान्त रस ही शेष रह जाता है । मम्मट ने काव्य प्रकाश में—निर्वेदः स्थायि- भावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः' कहा है । (४।३५) भरत ने 'नाट्य शास्त्र' में केवल आठ रसों को मान्यता दी है। शान्त रस को मान्यता नहीं देता । अध्यात्म भावना की इस रस द्वारा उत्पत्ति होती है । स्यात् इसीलिए भरत ने अन्य रसों की श्रेणी में शान्त रस को नहीं रखा है। नाट्यशास्त्र में उल्लेख मिलता है। शान्त रस द्वारा रति आदि आठ स्थायी भावों की उत्पत्ति होती है। स्वयं निमित्तमासाद्य, शान्ताद्भावो प्रवर्तते । पुनर्निवित्तापाये च शान्त एवोपलीयते । (६।१०८) काश्मीरी पण्डित अभिनवगुप्त ने शान्त रस को जिन विद्वानों ने रस नही माना है, उनका तर्क सम्मत
२२ रामनरहरियाँ उत्तर दिया है। शान्त रस की तुलना सभी रसों से करते हुए, मम्मट ने उसे पूर्ण रस माना है। तत्त्व ज्ञान को शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करता है। अग्निपुराण ने शान्त रस को उत्पत्ति 'रति' का अभाव माना है। रुद्रट ने 'सम्यक् ज्ञान', आनन्द वर्धन ने 'तृष्णा क्षय सुख' को शान्त रस का स्थायी भाव माना है। विद्वानों ने अन्य रसों के समान शान्त रस का भेद-प्रभेद करने का प्रयास नहीं किया है। 'रसकलिका' ने (१) वैराग्य, (२) दोष निग्रह (३) सन्तोष, (४) तत्त्व साक्षात्कार—चार भेद शान्त रस का किया है। हिन्दी के काव्याचार्यों ने शान्त रस की परिभाषा की है। कुलपति मिश्र कहते हैं : तत्त्व ज्ञान ते कविता में जहँ प्रगटै निर्वेद । कहैं सान्त रस जासु को सो है, मौमो भेद । ( रसरहस्य : २८ ) यहाँ पर मम्मट के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। पद्माकर कहते हैं : सुरस शान्त निर्वेद है जाको थाई भाव । ( जगद्विनोद : ७२० ) कवि केशव दास जी कहते हैं : सबते होय उदास मन बसै एक हीं ठौर । ताहो सो समरस कहत केशव कपि सिरमौर । ( रसिक प्रिया १४:३७ ) हास्य रस द्वारा मनुष्य में हास्य रस की अधिकता होती है। हँसी आती है। करुण कविता का पाठ करते समय करुणा उत्पन्न होतो है। हृदय भर आता है। वीर रस काव्य सुनने पर उत्साह उत्पन्न होता है। अंग फडकने लगते हैं। शान्त रस की कविता पाठ के समय मन शान्त रहता है। कल्हण के शब्दो में 'स्थेय' भाव अर्थात् न्याय दृष्टि उत्पन्न होतो है। वह इतिहास को तोलने लगता है। भावातिरेक में स्वयं बह नहीं जाता। काश्मीरी आचार्य काश्मीरी पण्डित अलंकार शास्त्र के आलोचक
श्री आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक (सन् ८५५— ८८४ ई०) तृतीय उद्योत में (२५-२७) में शान्त रस पर प्रकाश डाला है। तृष्णा का प्रध्वंसा- भाव शान्तरस कहा गया है। एक अच्छा उदाहरण उक्त पुस्तक की तारावती टीका में उपस्थित किया गया है। मनुष्य को पूर्ण तृप्ति हो जाती है तो उसे एक प्रकार का आनन्द होता है—जैसे स्वादिष्ट भोजन के पश्चात् एक प्रकार के आनन्द का अनुभव होता है। ठीक इसी प्रकार तृष्णा क्षय के सुख में भी एक प्रकार के आनन्द का बोध होता है। यही आनन्द शान्त रस का स्थायी भाव है। शान्त एक प्रकार की प्राकृतिक चित्त वृत्ति होती है। रति आदि मैथुन चित्तवृत्तियाँ हैं। सभी रसों की शान्त अवस्था को शान्त रस कह सकते हैं। तृष्णा सुख का जहाँ परितोष होता है, वहीं शान्त रस का उदय होता है। विषयों की अभिलाषा से निवृत्ति प्राप्त करना निर्वेद है। उसे वैराग्य भी कहते हैं। यही निर्वेद शान्त रस का स्थायी भाव है। 'शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव । ( ध्वन्यालोक : ३:२६ ) कल्हण ने सभी रसो का समावेश राजतरंगिणी काव्य में किया है। शान्त को उसने प्रधान माना है। शृंगार से शान्त रस तक पहुँचने के लिए बीच में वीर रस का माध्यम लेना पड़ता है। शृंगार का विरोधी रस शान्त रस है। अतएव सीधे शृंगार से शान्त रस पर नहीं जाया जा सकता। इसी प्रकार शान्त रस से शृंगार रस पर आने के लिए बीच में अद्भुत रस का माध्यम लेना पड़ता है। कल्हण ने इस प्राचीन परम्परागत काव्य पद्धति का अनुसरण किया है। एक मत शान्त रस का अन्तर्भाव बीभत्स रस में मानता है। कारण दिया जाता है। शान्त रस के लिए विषयों से घृणा होती है। यह तर्क सम्मत
प्रथम तरङ्ग २३ तदमन्दरसस्यन्दसुन्दरेयं निपीयताम् । श्रोत्रशुक्तिपुटैः स्पष्टमङ्ग राजतरङ्गिणी ॥ २४ ॥ २४ सुहृद्वर ! शांत सुंदर रसधार युक्त इस राजतरंगिणी का अपने कर्णशुक्तिपुटों (सुतुहियों) द्वारा आनंदपूर्ण उन्मुक्त भाव से परिपूर्ण रसास्वादन कीजिए । नहीं है। शान्त रस का स्थायी भाव घृणा नहीं हो सकती। वह शान्त रस का व्यभिचारी भाव हो सकता है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भारतीय विचारधारा- नुसार मोक्ष प्राप्ति है। सभी विद्या, धर्म, मत- मतान्तर एवं सिद्धान्त मनुष्य को इसी दिशा की ओर ले जाते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है। राजनीति और मोक्ष से क्या सम्बन्ध है। राजतरंगिणी इतिहास ग्रन्थ है। उसका सम्बन्ध तत्कालीन काश्मीर की राजनीति से है। भारत में राजनीति साध्य नही साधन मात्र समझा गया है। देश में शान्ति रखकर अराज- कता को दूर हटाना है। शान्तिमय वातावरण तथा समाज से ही मानव अपने चरम उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। चाणक्य ने उसे सूत्रवत् योग-क्षेम शब्द में रखा है। इस योग-क्षेम का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। राज्य इसमें सहायक होता है। मोक्ष प्राप्ति सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। इस पुरुषार्थ की तरफ शान्त रस बढ़ाता है। अतएव शान्त रस काश्मीरी साहित्यशास्त्री अभिनवगुप्त (सन् ९५०-८६० ई०) के शब्दो में अन्य रसों की अपेक्षा श्रेष्ठ रस है। कल्हण ने अपने पूर्व के अलंकार शास्त्री तथा काव्याचार्यों के मत के अनुसार शान्त रस को श्रेष्ठ रस मानकर काश्मीर के पूर्व विद्वानों के मतों का अनुकरण किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या २४ में 'स्यंद' का 'स्पंद', 'मंग' का 'संग' 'सांग' और 'राज' का 'राजा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४ (१) शुक्ति पुट-इस शब्द का साधारण अर्थ होता है, सीप का खोल या सुतुही। शुक्ति पुट तरल पदार्थ पीने के काम में आता है। श्री आर. एस. पण्डित इस श्लोक पर टिप्पणी लिखते हैं। 'कल्हण प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक हिराक्लीत्तस की तरह जीवन को शाश्वत माना है। तरंगिणी के जल के समान जीवन का क्रम टूटता नहीं है। वह सतत चलता रहा है। भारतीय और यूनानी दोनों जीवन की अविच्छिन्नता में विश्वास करते थे। सुरा पीने के लिए शुक्ति पुट के गिलास कल्हण के समय प्रचलित रहे होंगे। वह तरंग ६:३६६ के सन्दर्भ में इसकी पुष्टि करता है। कुलीनों में इस प्रकार के पानपात्र प्रचलित थे। वरनियर का उदाहरण उन्होंने दिया है-"औरंगजेब काश्मीर में आया था तो उसे तिब्बती हरित मणि भेंट किया गया था। जिसका मुगलों के दरबार में बड़ा मूल्याकंन था। उसका रंग हरापन लिये था। उसपर उज्ज्वल शिराएँ थीं। वह इतना सख्त था कि हीरे के चूर्ण से ही उसे बनाया जा सकता था। इस प्रकार के पत्थरों से प्याले और अलंकृत पात्र बनाये जाते थे।" श्रोत्रशुक्तिपुटैः-यह शब्द काश्मीर में बहुत प्रचलित था। कल्हण के पश्चात् महाकवि जगद्धर भट्ट ने स्तुति कुसुमाञ्जलि में इस शब्द का प्रयोग किया है। उस समय काश्मीर में मुस्लिम राज स्थापित हो चुका था। उनका अनुमानित काल सन् १३५० ईस्वी है। कल्हण से २०२ वर्ष पश्चात् हुए थे।' पीता सुधा श्रवण शुक्ति पुटैः समक्ष- मास्वादिता पुनरियं शिवभक्तिरेव ॥ (नवम स्तोत्र : ३५)
२४ राजतरङ्गिणी पुरा सतीसरः कल्पारम्भात् प्रभृति भूरभूत् । कुक्षौ हिमाद्रेर्णोभिः पूर्णे मन्वन्तराणि षट् ॥ २५ ॥ काश्मीर वर्णन २५ कल्प का प्रारंभ था। छः मन्वन्तर बीत चुके थे। उस पुरा काल में हिमाद्रि कुक्षि¹ में अर्णवपूर्ण सतीसर² था।
जीवन और तरंगिणी की उपमा भारतीय दार्शनिक विचार की ओर लक्ष्य करती है। भारतीय आत्मा को अमर मानते हैं। जीवन कभी नष्ट नहीं होता। वह चलता रहता है। चलता रहेगा। जीवन की यह धारा कभी विच्छिन्न होने वाली नहीं है। पाठभेद · श्लोक संख्या २५ में 'पुरा' शब्द का पाठभेद 'पुरः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५. (१) हिमाद्रि कुक्षि—हिमाद्रि शब्द का उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है। 'हिमाद्रि कुक्षि' शब्द काश्मीर के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनों में मिलता है। कुक्षि का अर्थ कोख होता है। माता की कोख में जिस प्रकार शिशु सुरक्षित तथा आराम से रहता है, उसी प्रकार काश्मीर हिमालय की गोद में सब प्रकार से रक्षित सुखपूर्वक है। माता शिशु को अपने बाहु से घेर कर कोख में रखती है। हिमालय काश्मीर को शिशु तुल्य अपने शैल बाहु से घेरकर माता की तरह गोद में रखे हुए हैं। शिशु माँ के पीन पयोधर से चिपका रहता है। बिना प्रयास दुग्ध पान करता रहता है। ठीक इसी प्रकार काश्मीर में जलधारा चारो ओर शैल श्रृंग से स्रवित होकर बिना प्रयास काश्मीर की प्यास बुझाती रहती है। कुक्षि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में अनेक काव्यो में महान् भारतीय साहित्यकारों ने किया है। अश्वघोष ने कपिलवस्तु नगर को—'कुक्षिः हिमद्रि- रिरिव' कहा है (१ ३५२:३५५)। ऋग्वेद में— 'कुक्षि सोम पातमा.'—कोख के लिये कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है ( १:८.७)। अथर्ववेद
१:८:७ तथा ७ ९:१२, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:३८) में कुक्षिका का अर्थ भरा पूरा, रक्षित होना, किया गया है। ऋग्वेद (२:११:११) तथा १०:८६:१४, अथर्व वेद २:५:४,२:३३:४, ४:१६:३, ९:५:६० या ६०१, १०:९:१७ एवं ऋग्वेद में एक स्थान पर और कुक्षि का प्रयोग मिलता है। 'इय कुक्षयः सोम धानाः' अर्थात् दूध के समान कुक्षियाँ सोम गाधन हैं (३.३६:८)। रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने कुक्षि शब्द का प्रयोग दरी अर्थ में किया है—'पुंनाग गहनं कुक्षि बहुलोदालकाकुलम्।' वाल्मीकि रामायण, किष्किन्ध्या काण्ड ४२:७। हिमाद्रि कुक्षि शब्द का प्रयोग बड़े अच्छे ढंग से नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी में किया गया है। इसमें हिम बर्फ के लिये और अद्रि शैल के लिये व्यवहृत किया गया है। हिमाद्रि का अर्थ होता है बर्फ का पहाड़। कुक्षि का अर्थ कोख है। महाभारत में सागर तट के देशों के लिये भी कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—'ततः सागरकुक्षिस्थान···' सभापर्व ३२:१६। अतः हिमालय शैल की कोख में स्थित प्रदेश काश्मीर है। इसका संकेत हिमाद्रि कुक्षि शब्द करता है। हिमालय के अंक में स्थित काश्मीर माता की कोख में शिशु की तरह रक्षित है। हिमाद्रि शब्द का प्रयोग विशाल किंवा विग्रहराज (सन् १०५६-१०६४ ई०) 'चमन वंश' अजमेर तथा शाकम्भरी के सम्बन्ध में किया गया है। (इण्डियन एण्टीक्वेरी १९:२१५ अप्रकाशित) हिमाद्रि शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनो ने किया है।
प्रथम तरङ्ग २५
प्राचीन काल में हिमालय का नाम, हिमवान् हिमाचल, हिमवंत, हैमवत, हिम शैल, पर्वतराज, नगाधिराज आदि था और आज भी है। भारतवर्ष का एक नाम हैमवत वर्ष है। वह हिमालय के नाम पर रखा गया है। हिमालय पर्वत इस प्रकार वर्ष पर्वत है। हैमवत क्षेत्र को किन्नर खण्ड भी कहीं-कहीं कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण २:१५:३१, वायु पुराण ३४:२८)। काश्मीर के साहित्य में हिमवंत शब्द का प्रयोग हिमालय पर्वत के लिये किया गया है। काश्मीर के उत्तर में उत्तरकुरुओं तथा मद्रो को इसके मूल अर्थात् दक्षिण निवास करने का उल्लेख है। हिमवंत शब्द में हिमालय की पर्वतमालाओं के अतिरिक्त आधुनिक नामधारी कराकोरम (कृष्ण गिरि), सुलेमान पहाड़ (धंजन पर्वत), हिंदू कुश (निषध), अल्ताई (चंडीरण) या माल्यवान् पर्वतमालाएँ आ जाती है। कराकुरम पर्वत के पूर्वीय शैलबाहु को 'विद्युत्' पर्वत कहा जाता है। सुलेमान पर्वत अर्थात् धंजन पर्वत के दक्षिणी भाग को 'कीर्तहर' पर्वत कहते हैं। (हरिवंश पुराण: १:१८ मत्स्य पुराण अ० १३, महाभारत वनपर्व २५३:१३५, १०, ६९४, ६९५; सभापर्व ३:५८-६०)। क्षुद्र हिमवंत पश्चिमी तथा महा हिमवंत हिमालय की पूर्वीय पर्वतमालाओ के लिये व्यवहृत किया गया है। विशेष द्रष्टव्य परिशिष्ट 'हिमालय' है। २. सती सर—नीलमत पुराण में सतीसर का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है। इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमे । ६२ । नौबन्धनम् इति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥41॥ कृतयुगे सदा काले व्यतीते तु मनुप्रदा । ६३ । विदधाति प्रजासर्गं यथापूर्वम् अरिन्दम ॥42॥ नौदेहन् सती देवी भूमिर् भवति पार्थिव । ६४ । यांस्त सु भूमीं भवति सरस् तु विमलोदकम् ॥43॥ षड्योजनायतम् रम्यं तदर्धेन च विस्तृतम् । ६५ । सतीदेशम् इति ख्यातं देवाक्रीडं मनोहरम् ॥44॥ आकाशम् इव गम्भीरं जलजैश् च विवर्जितम् ॥६६। शीतलामलपानीयम् सर्वभूमिमनोहरम् ॥45॥ अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल । ६७ । मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥46॥
अबुल फजल सतीसर को उमासर कहता है— काश्मीर पेश अज अग्रत सती सर नाम अस्त सती- नाम ईजा अस्त व सर नाम ए होज कता। फारस के लोग प्रायः हिंदू गाथा को मानते हैं। इतिहासकार बयैउद्दीन बेयल अपवाद है। वह कहता है 'आदम शरन दीप अर्थात् लंका से काश्मीर में आये। सेथ के वंश में काश्मीर का राज्य ११०० वर्ष रहा। हजरत सुलेमान ने काश्मीर को आबाद किया। उसने अपने भतीजा इसोन को काश्मीर का राजा बनाया। 'हिंदुओं ने राजा हरीमंद के नेतृत्व में काश्मीर पर विजय प्राप्त की। उसका वंश जलप्लावन तक राज्य करता रहा। जलप्लावन के पश्चात् तुर्किस्तान की एक जाति काश्मीर में आकर आबाद हो गयी। 'काश्मीर निवासियो को एकेश्वरवाद का उपदेश हजरत मूसा ने दिया। वे काश्मीर की भूमि पर दिवंगत हुए। उनकी मजार अथवा कब्र काश्मीर में है। उसका अभी पता लगाना बाकी है। कालांतर में काश्मीरियों ने हिंदुओं की बुतपरस्ती स्वीकार कर ली। काश्मीरियो के इस दोष के कारण काश्मीर में जलप्लावन हुआ था।' वाकयाते काश्मीर में उल्लेख है—'काश्मीर प्रदेश जल से भरा था। दैत्य जलदेव वहाँ रहता था। वह मनुष्यों को खाता था। आसपास जो कुछ मिलता था, खा जाता था।' विस्तृत वर्णन जलोद्भव के प्रसंग में किया गया है।
२६ राजतरङ्गिणी
सम्राट् अकबर के समय में प्रथम बार कश्मीर पर कश्मीर के अतिरिक्त अन्य कश्मीर वंशीय मुसलमान का राज्य स्थापित हुआ। सम्राट् अकबर जिस समय कश्मीर पहुँचे, तो अबुलफजल को कश्मीरियों ने एक पुस्तक, जिसका नाम 'राज- तरंगिणी' था, समर्पित की। उसमें चार हजार वर्ष पूर्व से कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखा था। यह पुस्तक संस्कृत में थी। सम्राट् अकबर ने आदेश दिया कि पुस्तक का फारसी में अनुवाद किया जाय। अबुल फजल अकबर का प्रियपात्र था। उसके नवरत्नों में एक था। आइने अकबरी में एक अध्याय सूबा कश्मीर पर लिखा गया है। वह राजतरंगिणी तथा तत्कालीन स्थिति पर आधारित है। मंत्री होने के कारण अबुल फजल साधनसंपन्न था। उसका वर्णन साधिकारिक माना जायेगा। वह लिखता है— 'इस इतिहास में कहा गया है कि कश्मीर का अधिकांश भाग प्रारंभिक काल मे केवल उसके पर्वतों को छोड़कर जलमग्न था। उसे सतीसर कहते थे। सती महादेव की पत्नी है। सर का अर्थ सरोवर अर्थात् जहाँ जल एकत्र रहता है, किया जाता है। 'ब्रह्मा का एक दिन १४ मन्वन्तरों का होता है। प्रत्येक मन्वन्तर में ७० कल्प होते हैं। सत्तर चतुर्युग मिलकर एक कल्प होता है। यह वर्ष सम्राट् अकबर के राज्य काल का चौदहवाँ वर्ष है। कश्मीर में जिस समय आबादी हुई उसे बीते सातवें मन्वन्तर का २७वां कल्प हैं। तीन युग २८वें मन्वन्तर का बीत चुका है। चौथे युग का ४७०१वाँ सौर वर्ष व्यतीत हो चुका है।' वरनियर अपने नवें पत्र में लिखता है : 'प्राचीन काल में कश्मीर जल से भरा था। कश्यप ने बारहमूला के पास जल बहने के लिये मार्ग बनाया था। यह जहाँगीर काल के ऐतिहासिक श्री हैदर मलिक वल्द हसन मल्लिक बिन मल्लिक मुहम्मद नजी छदवराह [ १६१७-१६१९] के इतिहास में मिलता है। छदवराह श्रीनगर के पास एक गाँव है। वह कश्मीर का एक कुलीन था। यह इतिहास प्राचीन काल से अकबर के कश्मीर विजय तक का संक्षिप्त इतिहास है। उसका आधार राजतरंगिणी है। बड़शाह जैनुलआवदीन की आज्ञा पर इसका फारसी में अनुवाद किया गया था। इसका नाम 'बहसुल असम्र' रखा गया था। सन् १५९४ में बदायूंनी को अकबर ने आज्ञा दी थी कि वह उसका अनुवाद करे।' वरनियर लिखता है : 'निस्संदेह यह क्षेत्र कभी जल से भरा था। थेसलो की भी पूर्व काल में यही अवस्था थी। वह भी कभी जल से भरा था। किंतु मैं यह नहीं विश्वास करता कि जहाँ काटकर जल बहना (बारहमूला) बताया जाता है वहाँ पत्थर काटा गया है। वह आदमी का काम नहीं हो सकता। वह पर्वत बहुत ऊँचा है। मैं समझता हूँ कि यहाँ पर्वत बैठ गया है। यह भूकंप के कारण हुआ होगा। क्योंकि कश्मीर में भूकंप बहुत आते हैं।' सतीसर और काश्मीर—शुक ने चौथी राज- तरंगिणी में काश्मीर को सतीसर कहा है। सतीसर देश शब्द कश्मीर के लिए व्यवहृत होता रहा है। शुक लिखता है—मिरजा हैदर मुहम्मद वाक्पटु नौशेरवां के समान हैं। इस जगत् में पूर्वकालीन राजाओं के उन कार्यों को कहने के लिए पैदा हुआ है जो सतीसर में बहुत दिनों से बुरी हालत में थे। (दत्त ३५१) कश्मीर पर मुगलों के आक्रमणों की चर्चा करते हुए पुनः लिखता है—इस प्रकार सतीसर देश के पापियों पर वज्रपात हुआ। आकाश में धूमकेतु निरन्तर पूर्व और पश्चिम दिखाई देने रहे। (दत्त २७३)
प्रथम तरङ्ग २७ मुगलों के आक्रमण के पूर्व काश्मीर को सतीसर कहा जाता था । मैं समझता हूँ । सतीसर शब्द काश्मीर उपत्यका के लिए प्रयुक्त होता रहा है। इसमें वह भूखण्ड आता है जो कभी जल मग्न था । बारहमूला से वीर नाग तक का भूखण्ड वास्तव, में सतीसर था । अतएव काश्मीर मण्डल, काश्मीर राज्य तथा सतीसर शब्दों के अर्थ में भिन्नता है । काश्मीर मण्डल और काश्मीर राज्य के अन्दर सतीसर देश किंवा भूखण्ड का समावेश हो जाता है । सतीसर में काश्मीर मण्डल अथवा काश्मीर राज्य का समावेश नही होता । सतीसर काश्मीर मण्डल अथवा राज्य का एक भूखण्ड था । क्षेमेन्द्र ने लोक प्रकाश में तीन स्थानों पर सती सर का उल्लेख किया है । उससे मेरे मत की पुष्टि होती है : श्रीमत्सतीसरासा शारिकाशैलभूषितम् । श्रीजैननगरादस्मान्नानोपवनविभूषितम् ॥ २ ॥ अस्ति त्रिभुवनाख्या मुत्तमं भूषणं भुवः । श्रीकश्मीरपुरं रम्यं नानोपवनशोभितम् ॥३॥ ( पृष्ठ ३४ ) सतीसर में शारिका शैल, जैन नगर, तथा काश्मीर पुरं का उल्लेख किया गया है । शारिका पर्वत सूखे सतीसर में है । जिस समय सतीसर में जल भरा था उस समय द्वीप की तरह इसका शिखर दिखाई पड़ता था । सतीसर के जल की गहराई ३०० से ४०० फीट तक थी । इस पर अकबर द्वारा निर्मित दुर्ग आज वर्तमान है । जैन नगरो का उल्लेख जोनराज श्रीवर तथा शुक की राजतरंगिणियों में है । ( दत्त ४७, १३१, १३८, २०६, ३७१ ) कश्मीर पुर शब्द यहाँ श्रीनगर किंवा प्रवरसेनपुर के लिये आया है । श्रीनगर शब्द लोग भूल गये थे । कश्मीर पुर शब्द श्रीनगर के लिए व्यवहृत होने लगा था । प्रवरसेनपुर का भी उल्लेख लोक प्रकाश (पृष्ठ ३५) मे किया गया है । श्रीनगर शब्द का उल्लेख जोनराज, श्रीवर और शुक की राज तरंगिणियों में प्रायः, नही मिलता है । प्रवर पुर ( द० २८, २०१, ४२६ ) तथा प्रवरेश पुर का ( द० २३२ ) उल्लेख मिलता है । लोक प्रकाश में पृष्ठ ६० पर पुनः सतीसर का उल्लेख किया गया है : त्रिविष्टपस्य सारं तत्पार्थिवं क्षेत्रमीश्वरम् । तत्रापि सारं हिमवांस्तत्र सारं सतीसरः ॥२॥ सतीसर और काश्मीर मण्डल में स्पष्ट भेद किया गया है : मनुवारजभित्यूचुः पूतनात्मकध्यते किल । सतीसरसि ग्रामाणां यत्प्रमाणमुदीरितम् । षष्टियामसहस्राणि षष्टिग्रामशतानि च । षष्टियामस्त्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥३॥ शुक की चौथी और अन्तिम राजतरंगिणी है । जिसे शुक काश्मीरी पंडित ने प्राचीन शैली पर लिखा है । तत्पश्चात् काश्मीर में पुरानी शैली पर संस्कृत में इतिहास लिखने की परम्परा लोप हो गयी । मुगल शासन के साथ मुसलमान लेखको का काल आता है । उन्होने परसियन अर्थात् फारसी मे अधिकतर लिखा है । काश्मीरी पण्डित भी फारसी में विद्वत्ता प्राप्त कर, प्रथम फारसी में लिखे तत्पश्चात् उर्दू में और अब अग्रेजो में लिखने लगे है । जनरल ए. कनिंघम भूगर्भीय चिन्हो के अध्ययन से इसो परिणाम पर पहुँचे है कि काश्मीर उपत्यका जल से भरी थी । वे लिखते हैं : 'एक पर्वतीय चट्टान ( बिलफ़ ) तन्तमूल तथा बारहमूला के १६ मील अधोभाग में समकोण बनाती झेलम नदी से ऊपर उठी है । उसको ऊँचाई करीब ३ या ४ सो फीट होगी । कुछ स्थानो पर मैने देखा
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प्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से निकली हैं। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय बारहमूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे जल के अवरोध अलोड़ मिट्टी (एल्लूवियन) के जमा होने में सहायक हुए जोकि बाड़ों के कारण पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ जल रोकने वाले बारहमूला के पास वाले व्यवधानों को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण कुछ भागों में मिलता है जहाँ कि चूने के पत्थरों पर क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और इस प्रकार वहाँ बारहमूला पास के बचे हुये पानी रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए देखते हैं। चारो तरफ के पर्वतों से आता हुआ बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप बनने नहीं देता।" ट्रॅवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं सन् १९६४ में जाकर देखा। बामजू की गुफा के अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग २१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खों के छाता की तरह जल टपकने से छत बन गयी हैं। एण्डरू विलगन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों की हड्डियाँ पड़ी थीं। मालूम होता है मन्दिर के दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है। यहा पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपुर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति खड़ा हो जाय तो उसे चारो ओर ऊँचा पर्वत मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यहाँ केसर होती है। बनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में यह बात थी। मैने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया। श्री खजाची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय वहाँ टेस्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैने ध्यान आकर्षित कराया। मैने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर- मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान पर प्रकट होता है।
३८ राजतरङ्गिणी १
है कि पर्वतीय चट्टानें ८ सो फीट ऊँचाई से कम नहीं हैं । तन्तमूल के समीप झेलम समुद्र की सतह से ५ हजार फीट ऊंचाई पर है । समस्त काश्मीर उपत्यका जलमय रही होगी । जब तक वह चट्टान घिसकर पतली नहीं हो गई होगी । काश्मीर की झील का जल स्तर समुद्र की सतह से ५८०० फीट ऊँचा है । उपत्यका में इस समय तक के बचे करेवा और बिखरी एलूवियल (कछारी) समतल भूमि से ५० या १०० फीट ऊंचाई पर जल रहा होगा । भारतण्ड की ऊँची भूमि जल के नीचे नहीं रही होगी । वामजू की गुफा के चूने के पत्थरो के चट्टान के ऊपर समयर तटवर्ती पानी की सतह का चिह्न स्पष्ट दिखाई देता है । इसी प्रकार वामन के पवित्र जलस्रोत के ऊपर इस प्रकार के चिह्न दिखाई देते हैं । शुपियान नदी पर स्थित रामू के सराय के ऊपर करेवा एक किनारा बनाता है । उसको ऊंचाई १०० फीट है । उसके क्षैतिज परतो में विभिन्नता है । सबसे ऊँचाई पर २० फीट की जमीन एलूवियल है । उसके पश्चात् २० फिट का परत गोले-गोले पत्थरो और भुरभुरी मिट्टी का बना है । सबसे नीचे का परत कड़ी नीली मिट्टी का है । यह परत निश्चय ही झील के जल की निश्चल स्थिति के कारण बन गया होगा । किन्तु मध्यवर्ती मिट्टी की परत उस समय बनी होगी जब उपत्यका का जड़ बड़े वेग के साथ तन्तमूल के नीचे वाली चट्टान के अवरोध के हट जाने के कारण निकला होगा । यह जणावरोध चट्टान के अकस्मात् टूट जाने के कारण हुआ होगा । सबसे ऊपर की मिट्टी उस समय जमी होगी जबकि पानी घटता-घटता अपनी वर्तमान स्थिति पर आ गया होगा । तत्पश्चात् चट्टान का अवरोध अथवा पानी रोकने वाली पथरीली नदी का नदीगर्त क्रमशः जल प्रवाह के कारण घिसता-घिसता क्षीण हो गया होगा तो विभिन्न नदियों ने झील के पुराने गर्त में नवीन धाराओं में अपने को परिणत कर लिया होगा । जब तक कि मोनार, पामपुर तथा खानपुर के करवा घटते पानी के कारण द्वीप तुल्य लगते होंगे । और कालान्तर में लम्बे चोपटे शिखरीय पहाड़ियों के रूप में खुले मैदान में रह गये जैसे आज दिखाई पड़ते है ।' (लद्दार) डब्लू वेकफील्ड लिखते हैं : कोई प्रामाणिक प्रमाण इस बात का नहीं मिलता कि काश्मीर उपत्यका झील से अकस्मात् अपनी वर्तमान दशा में किस समय परिवर्तित हो गयी है जैसा कि आज दिखाई देती है । न तो हमे यह प्रमाण मिलता है कि यह झील कब सूख गयी । अथवा यह प्रक्रिया बारहमूला दर्रा के समीप हठात् एक मार्ग बन जाने के कारण हो गया अथवा इसका पानी कालान्तर में निकलता गया ।' (हैप्पी वैली ६९, ६०) वाइन के इस सिद्धान्त पर कि वह कभी समुद्री जल की झील थी और समुद्र का पानी निकल जाने पर प्राकृतिक मीठे पानी के झरनों के कारण नमकीन जल समाप्त होकर काश्मीर उपत्यका ने वर्तमान रूप प्राप्त किया है, वेकफील्ड लिखता है- इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि उपत्यका का जल हठात् बाहर निकल गया और उसने वह रूप प्राप्त कर लिया है जिसे हम आज देखते हैं । बातो की जाँच करने और जैसा कि एक योग्य भूगर्भ-शास्त्रीय करता है । बात उल्टी साबित होती है । वाइन ने उन्हें स्वय सम्मुख रखा है । वह योग्य तथा निपुण पर्यवेक्षक था । वह यहाँ के निवासियो की परम्परा में विश्वास करता है कि उपत्यका अपने मूल रूप में ३०० या ४०० फीट गहरी झील थी । किन्तु वह कहता है कि समय प्रभाव के कारण पानी बहकर बाहर निकल गया । अपने पर्यवेक्षण में वह इस नतीजे पर आगया है कि यहाँ गहरी हरी अथवा बादामी चट्टानो की पहाड़ियों को जो काश्मीर के चारो तरफ है वे विशाल