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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९१ २८२ वें अध्याय में उधर राम ने माल्यवान् पर्वत पर लक्ष्मण के साथ वर्षा ऋतु बिताकर विमल आकाश तथा ग्रह, तारा और नक्षत्रों से युक्त निर्मल चन्द्र को देखा तथा कुमुद और पद्मों की सुगन्ध लेकर बहते हुए शीतल, वायु ने उनकी सीताविषयक सुधि उद्बोधित कर दी। लङ्का में रुद्ध सीता का स्मरण कर उनका मन खिन्न हो उठा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा—वत्स, जाकर देखो, ग्राम्य धर्मों में प्रमत्त होकर सुग्रीव कृतघ्न तो नहीं हो गया ? वह क्या कर रहा है ? प्रतीत होता है कि वह अपनी प्रतिज्ञा भूल गया है। यदि मेरे लिए उचित प्रयास नहीं कर रहा हो तो उसे साथ लेकर तुरन्त लौट आओ । अनुशासनपरायण लक्ष्मण किष्किन्धा के द्वार पर जा पहुँचे। सक्रोध हो बिना किसी रोकटोक के भीतर चले गये । राजा सुग्रीव ने आगे आकर उनका स्वागत सम्मान किया । पूजित होकर लक्ष्मण ने राम की बातें कह सुनायीं । तारा सहित कपिराज सुग्रीव ने नम्रता से कहा--मैं अकृतज्ञ नहीं हूँ। सीता के अन्वेषणार्थ मैंने विभिन्न दिशाओं में विनीत वानरों को भेज दिया है। जिस मास के समाप्त होने पर वानरों को लौट आना है उसके समाप्त होने में पाँच रात्रियाँ शेष हैं यह सुनकर रोष त्याग कर लक्ष्मण ने वानरेन्द्र की प्रशंसा की। सुग्रीव के साथ राम के पास जाकर श्रीलक्ष्मण ने सब वृत्तान्त सुनाया । इसके बाद ही हजारों वानर तीन दिशाओं से लौट आये । लौटनेवाले बन्दरों ने बताया कि हम लोगों ने सागर के तटवर्ती वन और पर्वत सहित सारी भूमि चप्पा चप्पा खोज डाली; परन्तु सीता का पता नहीं लगा। फिर भी दक्षिण दिशा की ओर गये हुए वानरों के प्रति आशावान् होकर व्यथित होने पर भी राम ने धैर्य धारण किया । दो मास बीतने पर वानर सुग्रीव से आकर कहते हैं --वाली ने और आपने जिस महान् मधुवन की रक्षा की थी, पवनात्मज आदि वानर, राजाज्ञा के बिना ही, उसका उपभोग कर रहे हैं। अङ्गद, हनुमान् आदि दक्षिण दिशा की ओर सीता की खोज में गये थे । उनका अविनय देखकर सुग्रीव ने समझ लिया कि वे लोग अवश्य अपने कार्य में सफल हुए हैं। मेधावी सुग्रीव ने यह बात राम से कही। राम को भी वैसा ही प्रतीत हुआ । इतने में विश्रान्त होकर हनुमान् आदि सब वानर सुग्रीव के पास आ पहुँचे । उनकी गति एवं मुखवर्ण को देखकर राम को विश्वास हो गया कि इन लोगों ने सीता को देख लिया है। सबने आकर राम, लक्ष्मण और सुग्रीव को प्रणाम किया । राम के प्रश्न करने पर हनुमान् ने कहा— मैं आपको प्रिय समाचार सुनाता हूँ। मैंने जानकी का दर्शन किया है। दक्षिण दिशा के पहाड़ों, कन्दराओं और वनों को ढूँढ़कर हम लोग थक गये थे । यहाँ लौटने का समय भी बीत चुका था। हम लोगों ने एक महती गुफा देखी । बहुयोजन विस्तारवाली गहन वन और अन्धकारवाली गुफा में प्रवेशकर बहुत दूर जाने पर आदित्य के समान प्रकाश हम लोगों को दिखायी दिया और वहाँ हमने मय का एक दिव्य भवन देखा । प्रभावती नामकी तपस्विनी वहाँ तप कर रही थी । उसके द्वारा दिये गये विविध भोज्य और पान से सन्तुष्ट एवं सबल होकर हम लोगों ने उसके बताये मार्ग से जाकर समुद्र के साथ सह्य तथा दर्दुर पर्वत देखे । मलय पर आरूढ़ होकर वरुणालय देखकर हम सब खिन्न हो गये । वहाँ अनशन का सङ्कल्प कर हम सब बैठ गये तथा जटायु की चर्चा करने लगे । इतने में हम लोगों ने पर्वत-शिखर के तुल्य दूसरा गरुड़ जैसा घोररूप भयावह पक्षी देखा। उसने कहा—तुम लोग कौन हो ? मेरे प्रिय भ्राता जटायु की चर्चा कर रहे हो । मैं उसका बड़ा भाई सम्पाति हूँ। हम दोनों अन्योन्य स्पर्धा से आकाश में सूर्यमण्डल तक उड़ने की होड़ कर रहे थे। सूर्य की गरमी से मेरे पङ्ख जल गये; किन्तु जटायु के पङ्ख मेरी छाया से बच गये । हम लोगों ने उसको जटायुवध और श्रीसीता के हरण का वृत्तान्त बताया । सम्पाति उस अप्रिय

९२ रामायणमीमांसा चतुर्थ समाचार को सुनकर विषण्ण हो गया एवं उसने सारा वृत्तान्त विस्तार से जानना चाहा। हमने उसे सारा वृत्तान्त सुनाया। उसने कहा, मैं रावण तथा लङ्का को जानता हूँ। लङ्का समुद्र से पार त्रिकूट पर बसी है। अवश्य वहाँ जानकी मिलेगी। यह सुनकर शतयोजन समुद्र का लङ्घन कर मैंने जलराक्षसी को मारा और रावण के घर में उपवास और तप में निरत भर्तृ-दर्शनार्थ उत्सुक सीता को देखा। मैंने आर्या के समीप जाकर कहा, मैं राम का दूत मारुतात्मज हूँ। समुद्र पार कर आया हूँ। श्रीराम और लक्ष्मण कुशली हैं। राम तुम्हारे लिए बहुत बड़ी वानर-सेना के साथ आयेंगे। विश्वास करो, मैं वानर हूँ, राक्षस नहीं हूँ— "प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ।" थोड़ी देर सोचकर सीता ने कहा—अविन्ध्य के कहने से मैं जानती हूँ तुम हनुमान् हो। उसने त्रिजटा के द्वारा सब समाचार दिया है। सीता ने अभिज्ञानस्वरूप मणि दी, जिसे उन्होंने धारण कर रखा था एवं विश्वासार्थ चित्रकूट में कौए के लिए क्षिप्त ईषिका की कथा बतायी। उसके बाद मैंने सारा उपवन उजाड़ दिया। पकड़े जाने पर लङ्का पूरी तरह जला डाली। तदुपरान्त पुनः समुद्र लाँघ कर मैं यहाँ आया हूँ। बुल्के लङ्का-दाह को क्षेपक मानते हैं। पर यह रामोपाख्यान से विरुद्ध है। वहाँ स्पष्टतः यह उल्लेख है— "ततो दग्ध्वा पुरीं च ताम् ॥" २८३ वें अध्याय के अनुसार वहाँ कोटि कोटि वीर वानर एकत्रित हुए। गज, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, पनस, जाम्बवान् आदि महापराक्रमी बड़े-बड़े वानर करोड़ों वानर वीरों के साथ आये। शुभ मुहूर्त्त में सेनाव्यूह बनाकर सुग्रीवसहित श्रीराम और लक्ष्मण ने लङ्का के लिए प्रस्थान किया। सेना के मुहाने पर हनुमान् तथा पृष्ठरक्षार्थ लक्ष्मण सन्नद्ध हुए। साल, ताल एवं शिला रूप आयुधवाली नल, नील, अङ्गद, मैन्द, द्विविद आदि से पालित महती सेना ने रामकार्यार्थ चलकर सागरतट के प्रशस्त फल और जल से परिपूर्ण क्षेत्रों में पड़ाव डाल दिया। अब समुद्रलङ्घन का प्रश्न सामने आया। किसी ने लङ्घन की बात कही, किसी ने नावों का प्रबन्ध करना ठीक समझा। अन्त में राम ने समुद्र से मार्ग माँगने के लिये व्रत करने का निश्चय किया। समुद्र से सदुत्तर न मिलने पर बाण से समुद्र के शोषण की बात कही। सागर ने स्वप्न में दर्शन दिया और राम से कहा—"मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता हूँ, परन्तु यदि आपके बाण के भय से मार्ग देता हूँ तो अन्य लोग भी धनुष के बल पर मुझे ऐसी ही आज्ञा देंगे। आपकी सेना में त्वष्टा का पुत्र नल नाम का वानर है। वह जिस काष्ठ, तृण या शिला को समुद्र में डालेगा मैं उसको धारण करूँगा। इस तरह पुल बन जायेगा। राम ने नल को आज्ञा दी और नल ने सेना की सहायता से दस योजन चौड़ा एवं सौ योजन लम्बा सेतु बना दिया। उसी प्रख्यात नल द्वारा निर्मित सेतु से राम ने सेना के साथ समुद्र पार किया। उसके पहले ही विभीषण राम की शरण में आ चुका था। राम ने उसका स्वागत किया। सुग्रीव को शङ्का हुई कि यह रावण का प्रणिधि हो सकता है। परन्तु राम ने विभीषण की सत्य चेष्टाओं तथा उसके आचरणों से सन्तुष्ट होकर उसे सर्वराक्षसराज्य पर अभिषिक्त किया और उसे अपना मन्त्री बनाया। उसकी सम्मति से समुद्र पार कर लङ्का के उद्यानों में श्रीराम ने सेनासहित पड़ाव डाला। वहाँ वानररूप में शुक तथा सारण नामक रावण के चर आये। वे पकड़े गये और उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया एवं प्राज्ञ अङ्गद को दूत बनाकर लङ्का भेजा गया।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९३ २८४ वें अध्याय के अनुसार रावण की लङ्का नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों से युक्त, कपाट-यन्त्र तथा वीरों से सुरक्षित थी। अङ्गद ने निर्भय होकर लङ्काद्वार पर जाकर रावण को सूचना दी। उसकी अनुमति से वे अनेक करोड़ राक्षसों की सेना के बीच निर्भय होकर पहुँचे। वहाँ बादलों की घटा से घिरे हुए सूर्य के समान वे शोभित हुए। अङ्गद ने मन्त्रियों से परिवृत रावण से कहा—"कोसलेन्द्र ने कहा है कि अन्यायरत अकृतात्मा राजा को पाकर देश, नगर सब नष्ट हो जाते हैं। तुमने सीता का हरण किया है। बल के दर्प से ऋषियों तथा राजर्षियों को मारा है। रोती हुई स्त्रियों का हरण किया है। उस सबका फल तुम्हारे सामने है। मैं तुम्हारा वध करूँगा। साहस हो तो युद्ध करो। मेरे धनुष का बल देखो। जानकी को लौटा दो अन्यथा लोक को राक्षस-हीन बना दूँगा।" यह सुनकर राजा क्रोधमूर्च्छित हो गया। उसके इङ्गित को जाननेवाले चार राक्षस अङ्गद के चारों अङ्गों को पकड़ने लगे। उनके साथ ही अङ्गद उछलकर महल की छत पर जा चढ़े। अङ्गद के वेग से छूटकर चारों धरणीतल पर गिरे और मर गये। अङ्गद ने राम के पास आकर सब समाचार सुनाया। राम ने वायु के समान वेगवाले वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार को तुड़वा दिया। विभीषण की सम्मति से लङ्का-द्वार को घेर लिया और विविध वानरों को युद्ध करने के लिए आदेश दिया। वे सब लङ्का को नष्ट करने लगे। उधर से राक्षस भी युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गये। राम और लक्ष्मण के बाणों से राक्षसवीर नष्ट होने लगे। अन्त में राम की आज्ञा से युद्ध का प्रत्याहार हुआ। २८५ वें अध्याय के अनुसार जब वानर सैनिक शिविर में प्रवेश करने लगे तब रावणसेना के पवन, जम्भ, खर आदि ने क्रोधवश उनपर धावा बोल दिया। वे दुरात्मा अन्तर्धानविद्या से अदृश्य होकर वानरों को मारने लगे; परन्तु विभीषण ने अपनी विद्या से उनकी शक्ति नष्ट कर दी। दृश्य होते ही वे वानरों द्वारा मारे जाने लगे। तब सदलबल रावण स्वयं युद्धभूमि में आया। उसने शुक्रनीति के अनुसार व्यूह का निर्माण कर वानरों को घेर लिया। राघव ने बार्हस्पत्य नीति के अनुसार सेना का व्यूह बनाया और श्रीराम रावण का घोर युद्ध हुआ। बड़े बड़े राक्षस वानरों से भिड़ गये, जिससे चराचर जगत् व्यथित हो उठा। प्रहस्त ने विभीषण पर प्रहार किया, परन्तु शतघण्टावाली महाशक्ति को अभिमन्त्रित कर विभीषण ने प्रहस्त को मार डाला। हनुमान् एवं धूम्राक्ष का महान् युद्ध हुआ। श्रीहनुमान् ने धूम्राक्ष को मार डाला। रावण ने महान् प्रयत्न से कुम्भकर्ण को जगाया। वह भी भीषण युद्ध करते हुए रामदर्शन की लालसा से आगे बढ़ा। सामने धनुष्पाणि लक्ष्मण को देखा। वानरों ने उसपर वृक्षों, शिलाओं तथा विविध प्रहरणों से प्रहार किया। वह हँसता हुआ वानरों को खाने लगा। तब निर्भय होकर सुग्रीव ने कुम्भकर्ण पर भीषण प्रहार किया। कुम्भकर्ण महानाद कर सुग्रीव को दोनों बाहुओं से पकड़कर लङ्का की ओर चल पड़ा। लक्ष्मण ने उसका पीछा किया। अपने भीषण बाणों से उसके कवच को छिन्न-भिन्न कर उसे लहूलुहान कर दिया। वह सुग्रीव को छोड़कर लक्ष्मण की ओर दौड़ा। महेष्वास कुम्भकर्ण 'तिष्ठ, तिष्ठ' कहता हुआ महती शिला लेकर दौड़ा। लक्ष्मण ने उसके उच्छ्रित हाथों को क्षुरों से काट दिया। दोनों भुजाओं के कटते ही वह चार भुजावाला हो गया— "स बभूव चतुर्भुजः" उसने चारों भुजाओं से बड़ी चट्टानों को उठा लिया। सौमित्रि ने बड़ी फुर्ती के साथ बाणों से उसकी चारों भुजाएँ काट डाली। अन्त में वह लक्ष्मण के दिव्य अस्त्रों से वज्रदग्ध पादप के तुल्य जलकर मर गया। तदनन्तर भागती हुई राक्षसी सेना को प्रमाथी ने रोका। श्रीलक्ष्मण का उससे घोर युद्ध हुआ। श्रीहनु- मान् ने पर्वतशृङ्ग से वज्रवेग को और नील ने प्रमाथी को मार गिराया। तदनन्तर अन्य राक्षसों एवं वानरों के युद्ध हुए।

९४ रामायणमीमांसा चतुर्थ २८८ वें अध्याय के अनुसार रावण ने इन्द्रजित् को युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा, वत्स ! तुमने सहस्राक्ष इन्द्र को जीतकर मेरा यश बढ़ाया है । तुम चाहे प्रकट चाहे अन्तर्हित होकर दिव्य शरों से शत्रुओं को मार डालो । प्रहस्त, कुम्भकर्ण आदि ने खर का बदला नहीं चुकाया, तुम उसका बदला चुकाओ । इन्द्रजित् रथारूढ़ हो रणक्षेत्र में पहुँचा । उसने नाम सुनाकर लक्ष्मण का आह्वान किया । लक्ष्मण अपने तलघोष से राक्षसों को त्रस्त करते हुए सामने आये । दोनों का भयङ्कर युद्ध हुआ । रावण-पुत्र इन्द्रजित् बाणों द्वारा लक्ष्मण से आगे बढ़ न सका । तब उसने महान् यत्न से वेगशाली तोमरों की वर्षा की । लक्ष्मण ने उन्हें भी तीक्ष्ण बाणों से काट दिया । अङ्गद ने तीव्र वेग से इन्द्रजित् पर प्रहार किया । इन्द्रजित् ने सावधानी से भीषण प्रास से अङ्गद को मारना चाहा; पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही काट दिया । फिर, उसने गदा से अङ्गद पर प्रहार किया । अङ्गद ने उसपर महान् साल वृक्ष के तने से प्रहार किया । उससे इन्द्रजित् के सारथि, अश्व और रथ नष्ट हो गये । इन्द्रजित् उस समय अन्तर्हित हो गया । महामायावी इन्द्रजित् के अन्तर्हित होने पर राम ने स्वयं आकर सैन्यरक्षा का भार संभाला । इन्द्रजित् ने वरदान में प्राप्त बाणों से राम को क्षत-विक्षत करना आरम्भ कर दिया । राम और लक्ष्मण दोनों ही अदृश्य मेघनाद से लड़ते रहे । उसने सहस्रों बाणों द्वारा राम तथा लक्ष्मण को विद्ध किया । अदृश्य इन्द्रजित् को ढूंढते हुए वानर वीर आकाश में प्रविष्ट हुए । उसने उनपर भी भीषण प्रहार किये । २८९ वें अध्याय के अनुसार उसने रणाङ्गण में गिरे हुए राम और लक्ष्मण को वरदानप्राप्त बाणों द्वारा सब ओर से बाँध दिया । पिंजड़े में पक्षी के समान दोनों पुरुषव्याघ्र बँध गये । सुग्रीव, सुषेण, मैन्द, द्विविद, कुमुद, अङ्गद, हनुमान्, नल, नील आदि मिलकर दोनों की रक्षा करने लगे । इतने में विभीषण ने आकर प्रज्ञास्त्र द्वारा दोनों को प्रबुद्ध किया एवं सुग्रीव ने अभिमन्त्रित विशल्या औषधि से दोनों को क्षणभर में स्वस्थ कर दिया । राम और लक्ष्मण दोनों क्षणभर में पुनः युद्धार्थ सन्नद्ध हो गये । विभीषण ने कृताञ्जलि होकर कहा, राजाधिराज कुबेर के आज्ञानुसार एक गुह्यक जल लिये हुए श्वेत पर्वत से आया है । कुबेर के अनुसार इस जल को आँख में लगाने से अदृश्य प्राणियों को भी आप देख सकेंगे । आप यह जल जिसे देंगे वह भी अन्तर्हित प्राणियों को देख सकेगा । दोनों ने उस संस्कृत जल से नेत्र धोये और सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद, जाम्बवान्, नील आदि प्रमुख वानरों ने भी उस जल से अपने अपने नेत्र धोये । सबकी आँखें अतीन्द्रिय पदार्थों को भी देखने लगीं । उधर इन्द्रजित् अपना पराक्रम पिता को बताकर शीघ्रता से पुनः रण-भूमि में आ गया । उसको आते देख विभीषण की सम्मति से लक्ष्मण आगे आये । विजय के उल्लास से इन्द्रजित् ने आह्निक कर्म भी नहीं किया । लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर उसपर भीषण बाणों से प्रहार करना प्रारम्भ किया । दोनों में आश्चर्यजनक युद्ध हुआ । सौमित्रि के बाणों से आहत होकर इन्द्रजित् ने नागतुल्य आठ बाण चलाये । लक्ष्मण ने एक बाण से उसके धनुषयुक्त बाहु को काट दिया, दूसरे बाण से उसके बाण सहित बाहु को काट दिया एवं तृतीय बाण से उसका मुकुट-कुण्डलयुक्त सिर काट दिया । रथ के सूत को भी मार दिया । घोड़ों ने सूत के बिना उसके रथ को लङ्का में पहुँचा दिया । रावण मृत पुत्र को देखकर विक्षुब्ध मन होकर वैदेही को मारने चला । परन्तु अविन्ध्य ने समझाबुझाकर उसे स्त्री-हत्या से निवृत्त किया । २९० वें अध्याय के अनुसार रथारूढ़ होकर वह स्वयं युद्धभूमि में आया । सब वीरों ने उसपर एक साथ आक्रमण कर दिया, मायावी रावण ने माया का प्रयोग किया । उसके शरीर से सहस्रों राक्षस युद्ध के लिए निकल पड़े । राम ने सबको मार डाला । उसने सहस्रों राम तथा लक्ष्मण के रूप बनाकर राम और लक्ष्मण तथा वानरों पर आक्रमण किया । सौमित्रि की सम्मति से राम ने उस माया को भी नष्ट कर दिया । इतने में मातलि आदित्य के अश्वों के तुल्य हर्यश्वों से युक्त रथ लेकर आया । श्रीराम से उसपर चढ़कर युद्ध करने की प्रार्थना करने लगा । राम को शङ्का हुई कि यह भी कहीं रावण की माया तो नहीं है, परन्तु विभीषण ने कहा—यह माया नही है ।

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९५ राम ने रथारूढ़ होकर बड़े रोष से रावण पर आक्रमण किया। समस्त प्राणी हाहाकार करने लगे। देवलोक में नगाड़े बजने लगे। उन दोनों के युद्ध की और कोई उपमा नहीं थी। उनका युद्ध उनके युद्ध के ही तुल्य था-- "अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् ॥" राम पर रावण ने ब्रह्मदण्ड तुल्य शूल छोड़ा। राम ने उसे काट दिया। उस दुष्कर कर्म को देखकर रावण को भय हुआ। फिर उसने बहुत शस्त्रास्त्र चलाये। रावण की माया देख डरकर सब वानर भागने लगे। तब राम ने तूणीर से हेमपुङ्ख सुपत्न सुमुख बाण निकाला। उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रयुक्त किया। यह देखकर देव, गन्धर्व आदि प्रसन्न हुए। उसके छूटते ही रथ और सारथि से युक्त रावण महाज्वालामाली अग्नि से परिप्लुत होकर प्रज्वलित हो उठा। सबने हर्ष से देखा कि ब्रह्मास्त्र के तेज से वह दग्ध हो उठा। रावण को मारने पर महर्षियों सहित देवताओं ने महाबाहु राम को विविध आशीर्वाद दिये तथा उनपर पुष्प वृष्टि की। विभीषण और अविन्ध्य ने सीता को लाकर राम से कहा, 'महाबाहो ! आप अपनी सद्वृत्ता पत्नी को ग्रहण करें।' राम ने शोककर्षित, मलोपचितसर्वाङ्गी, जटिला, कृष्णवस्त्रा, सीता को देखकर कहा--वैदेही ! जाओ, तुमसे मेरा कोई कार्य नहीं है। मुझ जैसे पति को प्राप्त कर वृद्धावस्था तक तुम्हें राक्षस के गृह में न रहना पड़े, इसी लिये मैंने रावण को मारा है। बुल्के कहते हैं--"राम का सीता में उत्कृष्ट प्रेम था और वह अन्त तक नहीं बदला। वे सीता के प्रति शङ्कायुक्त कटुवचन कैसे कहते, इसी लिये महाभारत रामोपाख्यान में अग्निपरीक्षा का संकेत तक नहीं मिलता।" परन्तु उनका यह कथन सरासर धोखा देना है, क्योंकि रामोपाख्यान में स्पष्ट ही राम की सीता के प्रति शङ्का और वायु, अग्नि आदि देवों तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की शुद्धि का वर्णन है-- "कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् । परहस्तगतां नारीं मुहूर्त्तमपि धारयेत् ॥१२॥ सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि । नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ॥"१३॥ चाहे तुम सुवृत्त हो या असुवृत्त हो, श्वान के द्वारा स्पृष्ट हवि के समान मैं तुम्हें ग्रहण नहीं कर सकता। "ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः । पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ॥"१४॥ वैसा दारुण वचन सुनकर सीता सहसा मूर्च्छित होकर वैसे ही गिर पड़ीं जैसे कटी हुई कदली गिर पड़ती है। "योऽप्यस्या हर्षसंभूतो मुखरागस्तदाऽभवत् । क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ॥"१५॥ जो क्षण भर के लिये उसके मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ रही थी वह भी निःश्वास से उपहत (मलिन) दर्पण की तरह नष्ट हो गई। "ततस्ते हरयः सर्वे तच्छ्रुत्वा रामभाषितम् । गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ॥"१६॥

९६ रामायणमीमांसा चतुर्थ राम का वह भाषण सुनकर लक्ष्मण सहित सब वानर मृतकल्प होकर निश्चेष्ट हो गये। "ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः। पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ॥"१७॥ उसी समय राघव के सामने तेजस्वी विमान द्वारा विशुद्धात्मा चतुर्मुख जगत्स्रष्टा पद्मयोनि (ब्रह्मा) आये । 'शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च। यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥१८॥ राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् । विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥"१९॥ इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, कुबेर, सप्तर्षिगण तथा राजा दशरथ बहुमूल्य विमान से राम के समीप आये। "ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसङ्कुलम् । शुशुभे तारकैश्चित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥"२०॥ उस समय देवता और गन्धर्वों से संकुल अन्तरिक्ष वैसा ही शोभित हुआ जैसे शरद् ऋतु में तारों से युक्त आकाश शोभित होता है । "तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी । उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥"२१॥ देवों के बीच उठकर यशस्विनी सीता ने विशालवक्षःस्थल राम से कहा— "राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते । गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥"२२॥ मैं आपको दोष नहीं देती हूँ। आप सभी स्त्रियों एवं पुरुषों की गति को जानते हैं। मेरे इस वचन को सुनिये । "अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः । स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं करोम्यहम् ॥"२३॥ सदा गमनशील मातरिश्वा (वायु) सब भूतों के भीतर विचरण करते हैं। वे मेरे प्राणों को देह से पृथक् कर दें; यदि मैंने कुछ भी पाप किया हो । "अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वायुरेव च। विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥"२४॥ इसी प्रकार अग्नि, जल, आकाश, पृथिवी और वायु सब मुझे प्राणों से विमुक्त कर दें; यदि मुझमें पाप हो । "यद्यहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् । तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥"२५॥ वीर, यदि आपको छोड़कर मैंने स्वप्न में भी अन्य का चिन्तन नहीं किया है तो आप ही मेरे देवनिर्दिष्ट पति हों। "ततोन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी । पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥"२६॥

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९७ उस समय अन्तरिक्ष में सब महान् आत्माओं तथा वानरों को हर्षित करनेवाली सुभगा लोकसाक्षिणी दिव्य वाणी हुई। वायुरुवाच— ‘भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः । अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥’’२७॥ वायु ने कहा—मैं सदागति वायु हूँ। राघव ! मैथिली सर्वथा निष्पाप है। राजन् ! आप इन्हें स्वीकार करें। अग्निरुवाच— ‘‘अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन । सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥’’२८॥ अग्नि ने कहा—हे रघुनन्दन, मैं सब प्राणियों के शरीर में रहता हूँ। हे काकुत्स्थ, मैथिली का, सुसूक्ष्म भी कोई अपराध नहीं है। वरुण उवाच— “रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव । अहं वै त्वा प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥’’२९॥ वरुण ने कहा—हे राघव, सब भूतों में रस मुझ से उत्पन्न होते हैं। तुमसे मैं कहता हूँ—मैथिली को ग्रहण करो। ब्रह्मोवाच— “पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मिणि । साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ श्रृणु चेदं वचो मम ॥’’३०॥ ब्रह्मा ने कहा—पुत्र ! राजर्षि धर्मयुक्त तुममें ऐसी निष्ठा हो तो आश्चर्य नहीं है। हे सुवृत्त ! हे साधो ! मेरी बात सुनो। ‘शङ्कुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् । यक्षाणां दानवानाञ्च महर्षीणां च पातितः ॥’’३१॥ हे वीर ! तुमने देवताओं, नागों, यक्षों, दानवों तथा महर्षियों के इस कंटक ( रावण ) को मार गिराया । “वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना । नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥’’३२॥ अपने वध के लिए ही उस दुरात्मा ने सीता का हरण किया था। नलकूबर के शाप के द्वारा मैंने पहले ही से सीता की रक्षा की व्यवस्था कर रखी थी। “यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ॥ शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥’’३४॥ यदि रावण अकामा किसी भी अन्य स्त्री का सेवन करेगा तो उसके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे— इस प्रकार उसको नलकूबर का शाप था । १३ .

९८ रामायणमीमांसा चतुर्थ “नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते । कृतं त्वया महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ।।’’ ३५ ।। तुम सीता के सम्बन्ध में किञ्चिन्मात्र भी शङ्का मत करो। हे महाद्युते ! सीता को ग्रहण करो। हे अमरप्रभ ! तुमने देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न किया है। दशरथ उवाच— “प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते । अनुजानामि राज्यञ्च प्रशाधि पुरुषोत्तम ।।’’३६।।१ महाराज दशरथ ने कहा—वत्स, मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ। मैं आज्ञा देता हूँ, सीता को ग्रहण करो और राज्य का प्रशासन भी करो। राम ने पिता एवं देवताओं का अभिवादन किया। अविन्ध्य एवं त्रिजटा को वरदान दिया। ब्रह्मा ने राम से वरदान माँगने को कहा। राम ने सदा धर्म में स्थिति और रण में अपराजय एवं रण में मारे गये वानरों का पुनर्जीवन माँगा। सीता ने भी हनुमान् को वर प्रदान किया। पुत्र ! राम की कीर्ति के साथ तुम्हारा अनन्त जीवन होगा और मेरे

पञ्चम अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित दशरथ जातक दशरथ जातक के अनुसार बुद्धदेव राजा दशरथ श्रीवाराणसी में धर्मपूर्वक राज्य करते थे । उनकी ज्येष्ठा महिषी की तीन सन्तानें थीं । दो पुत्र रामपण्डित और लक्ष्मण एवं एक पुत्री सीता ( सीतादेवी ) । इस महिषी के पश्चात् राजा ने एक दूसरी को ज्येष्ठा के पद पर नियुक्त किया । उसके भी एक पुत्र ( भरत कुमार ) उत्पन्न हुआ । राजा ने उसी अवसर पर उसको वर दिया । तब भरत की अवस्था सात वर्ष की थी । रानी ने वरस्वरूप अपने पुत्र के लिए राज्य माँगा; पर राजा ने स्पष्ट इनकार कर दिया । लेकिन जब रानी पुनः पुनः इसके लिए अनुरोध करने लगी तब राजा ने उसके षड्यन्त्रों के भय से अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा—'यहाँ तुम्हारे रहने से अनर्थ होने की सम्भावना है, किसी अन्य राज्य या वन में जाकर रहो । मेरे मरने के बाद लौटकर राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।' राजा ने ज्योतिषियों से अपने मरने की अवधि जानकर कहा—पुत्रो, बारह वर्ष बाद आकर छत्र को उठाना । पिता की वन्दना कर दोनों भाई जानेवाले ही थे कि सीतादेवी भी पिता से बिदा लेकर उनके साथ हो ली, तीनों चले । तीनों के साथ और भी बहुत से लोग चल पड़े थे; उन सबको लौटाकर तीनों हिमालय पहुँच गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे । नौ वर्षों के बाद दशरथ पुत्र-शोक से मर गये । रानी भरत को राजा बनाने में असफल रही, क्योंकि अमात्य और भरत भी इसका विरोध करते रहे । तब भरत चतुरङ्गिणी सेना लेकर राम को लाने के उद्देश्य से वन गये । उस समय राम अकेले ही थे । भरत उनसे पिता के देहान्त का सारा समाचार कहकर रोने लगे । रामपण्डित न तो शोक करते हैं, न रोते हैं— “रामपण्डितो नैव शोचति न रोदिति” सन्ध्यासमय लक्ष्मण और सीता लौटते हैं । पिता का मरण सुनकर दोनों रोने लगे । इसपर रामपण्डित ने उनको धैर्य देने के लिए अनित्यता का धर्मोपदेश किया । उसे सुनकर सबों का शोक मिट जाता है । बाद में भरत के बहुत अनुरोध करने पर भी रामपण्डित ने यह कहकर वन में रहने का निश्चय प्रकट किया कि मेरे पिता ने मुझे बारह वर्ष पर्यन्त वन में रहने का आदेश दिया था । अभी मैं लौटकर उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकूँगा, अतः तीन वर्ष के बाद लौट आऊँगा । जब भरत भी शासनाधिकार अस्वीकार कर देते हैं, तब रामपण्डित ने अपनी पादुकाएँ देकर कहा कि मेरे आने तक ये शासन करेंगी । पादुकाओं को लेकर भरत, लक्ष्मण और सीता अन्य लोगों के साथ वाराणसी लौट आये । अमात्य इन पादुकाओं के आदेश से राज्यकार्य करते थे । अन्याय होते ही 'पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती थीं 'परिहणन्ति' और ठीक निर्णय होने पर शान्त रहती थीं । तीन वर्ष व्यतीत होने पर रामपण्डित लौटकर अपनी बहन सीता से विवाह करते हैं एवं १६ हजार वर्ष तक राज्य करने के बाद स्वर्ग चले जाते हैं ।

बुद्धदेव ने कहा कि पूर्वकाल में 'शुद्धोदन ही दशरथ थे, महामाया (बुद्धमाता) राम की माता थी, यशोधरा (राहुल की माता) सीता थी, आनन्द भरत थे और मैं राम था। अनामक जातक ऐसा ही एक अनामक जातक है। तीसरी शती ई० में अनामक जातक का चीनी अनुवाद हुआ है। इस जातक में किसी भी पात्र के नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन राम और सीता का वनवास, सीताहरण, जटायु का वृत्तान्त, वाली और सुग्रीव का युद्ध, सेतुबन्ध, सीता की अग्निपरीक्षा आदि के संकेत मिलने हैं। इसके अनुसार राम की विमाता कैकेयी के कारण पिता द्वारा वनवास नहीं दिया जाता, किन्तु वे अपने मामा के आक्रमण की तैयारियां सुनकर स्वेच्छा से राज्य छोड़ देते हैं। वाली के वध का वृत्तान्त भी इसमें बदल गया है। राम के धनुषबाण को देखते ही वाली भयभीत होकर भाग जाता है। शायद बोधिसत्त्व राम के द्वारा वाली का वध उचित नहीं समझा गया हो। उसका सारांश निम्नरोक्त है-- एक समय बोधिसत्त्व एक महान् राजा हुआ। वह सदा ही दान, प्रियवचन, न्याय तथा समदर्शिता से सभी जीवों की रक्षा करता था। उसका मामा भी राजा था। वह लोभी, निर्लज्ज, निर्दय तथा दुष्ट था। उसने बोधिसत्त्व का राज्य छीन लेने के लिए सेना तैयार की। बोधिसत्त्व के अमात्यों ने भी सेना तैयार की। सेना का निरीक्षण करके बोधिसत्त्व अपने स्वार्थ के लिए असङ्ख्य मनुष्यों का जीवन नष्ट करना ठीक नहीं यह सोचकर, राज्य छोड़कर वन चला गया। मामा ने राज्य पर अधिकार कर लिया। बोधिसत्त्व ने वही वन में अपनी रानी के साथ निवास किया। एक दुष्ट नाग ने छद्म से उस समय रानी का हरण कर लिया जिस समय बोधिसत्त्व जङ्गल में फल लेने के लिए गया था। एक पक्षी ने उस दुष्ट नाग का मुकाबला किया। नाग ने पक्षी को मारा और उसका दाहिना पङ्ख तोड़ डाला और स्वयं समुद्र में स्थित अपने द्वीप में चला गया। राजा फल लेकर लौटा, रानी को न पाकर वाण लेकर रानी की खोज में इधर उधर घूमने लगा। एक नदी के स्रोत पर पहुँच कर राजा ने एक बन्दर को देखा, जो बड़ा उदास था। पूछने पर उस बन्दर ने कहा—मैं एक राजा था, मेरे चाचा ने मेरा राज्य छीन लिया है। अब मेरा कोई साथी नहीं रहा। राजा ने भी अपना वृत्तान्त सुनाया। दोनों ने परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध होकर मैत्री कर ली। दूसरे दिन बन्दर ने अपने चाचा से युद्ध किया। राजा ने धनुष में बाण का सन्धान किया। जिसे देखते ही बन्दर का चाचा डरकर भाग निकला। बन्दर ने अपने साथियों को रानी खोजने के लिए भेजा। बन्दरों ने एक पक्षी देखा। उसने बताया कि नाग ने रानी को चुराया है। कपिराज ने अपनी सेना को समुद्रपार जाने में असमर्थ पाया। इन्द्र ने छोटे बन्दर का रूप धारण कर कहा—"प्रत्येक बन्दर को पर्वत का एक टुकड़ा लाने की आज्ञा दो। इस प्रकार समुद्र एक मार्ग बन जायेगा और आप द्वीप में पहुँच जायेंगे।" बन्दरों ने ऐसा ही करके समुद्र पार किया और नागद्वीप को घेर लिया। नाग ने एक विषैला घना कुहरा उत्पन्न किया जिससे सभी पृथ्वी पर गिर पड़े। छोटे बन्दर ने एक दैव ओषधि सबकी नाकों में लगायी जिससे सब स्वस्थ हो गये। नाग ने आँधी और बादलों से सूर्य को छिपा लिया। बिजली चमकने लगी। छोटे बन्दर ने बताया कि बिजली ही नाग है। राजा ने एक बाण से नाग को मार डाला। छोटे बन्दर ने रानी को मुक्त किया एवं राजा अपने मामा का देहान्त सुनकर अपने देश चला गया। राजा ने रानी से कहा—"पति से अलग दूसरे के घर में निवास करने पर लोग स्त्री के आचरण पर सन्देह करते हैं। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है?"

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०१ रानी ने कहा—"मैं एक नीच की गुफा में रही थी तब भी मैं उसमें पङ्कज-पत्र की तरह निर्लेप रहो हूँ । यदि मुझमें सतीत्व है, तो पृथ्वी फट जाय ।" पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा, "मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ ।" राजा और रानी के प्रभाव से सब वर्ण अपने-अपने धर्म का पालन करने लगे । बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा—"तब मैं राजा था, गोपा रानी थी, देवदत्त मामा था और मैत्रेय इन्द्र था । बोधिसत्त्व के आचरण में क्षान्ति की पारमिता असीम है ।" दशरथ-कथानक चीनी भाषा में अनूदित दशरथ-कथानक में कहा गया है कि प्राचीनकाल में, जब कि मनुष्य की आयु चार हजार वर्ष की होती थी, जम्बूद्वीप में एक दशरथ नाम के राजा राज्य करते थे । उनकी महिषी के राम नाम से एक पुत्र हुआ, दूसरी से लक्ष्मण पुत्र हुआ । राम में नारायणीय शक्ति थी । तीसरी रानी से भरत और चौथी रानी से शत्रुघ्न उत्पन्न हुए । तीसरी रानी पर राजा का अत्यधिक प्रेम था । एक दिन राजा ने कहा—"तुम्हारी किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए मैं अपना सम्पूर्ण धन और कोष देने में संकोच नहीं करूँगा ।" रानी ने कहा—"इस समय मुझे कोई आवश्यकता नहीं है ।" राजा बीमार पड़े और उन्होंने राम का अभिषेक कराया । छोटी रानी ने ईर्ष्या वश कहा—"मैं आपके दिये हुए वर की पूर्ति चाहती हूँ । मैंने दो वर पाये हैं । १ से राम गद्दी से उतार दिये जाएँ और रसरे से मेरे पुत्र का राज्याभिषेक किया जाए ।" यह सुनकर राजा दुःखित हुए । राजधर्म के अनुसार वे अपने वचन को तोड़ना नहीं चाहते थे । इस समय लक्ष्मण ने राम से अपनी शक्ति और साहस दिखाने की प्रार्थना की । राम ने कहा—"अपने पिता की आज्ञा भङ्ग कर पुत्र पितृभक्त नहीं कहला सकता ।" दशरथ ने दोनों पुत्रों को बनवास दिया । बारह वर्ष बाद लौटने की आज्ञा दी । भरत उस समय विदेश में थे । दशरथ की मृत्यु के बाद लौटे । उन्हें अपनी माता के कार्यों से घृणा हो गयी । वे सेना के साथ उस पर्वत पर गये, जहाँ राम निवास करते थे । भरत ने राम से कहा—"मैं आपसे लौटने और राज्य-भार ग्रहण करने की प्रार्थना करता हूँ ।" राम ने कहा, "वनवास के लिए पिता की आज्ञा हो चुकी है । उसे तोड़ने पर मैं आज्ञाकारी पुत्र नही कहलाऊँगा" तब भरत ने राम की खड़ाऊँ माँगीं और अयोध्या लौट गये । खड़ाऊओं को राज्य-सिंहासन पर रखकर भरत शासन की देखभाल करने लगे । प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पादुकाओं की पूजा करते थे और उनसे आज्ञा लेते थे । अवधि पूरी होने पर राम अपने देश को लौट आये । भरत के बहुत आग्रह करने पर उन्होंने राज्यसिंहासनाधिकार स्वीकार किया''''इत्यादि इत्यादि । वस्तुतः बौद्ध निरीश्वरवादी होते हैं । उनके यहाँ ईश्वर एवं वेद तथा वेदोक्त धर्म दोनों ही अमान्य हैं; परन्तु लोकप्रिय होने के कारण उनके अनुयायी भी रामचरित्र की ओर आकृष्ट होते थे । वाल्मीकिरामायण आदि में प्रवृत्ति होने से ईश्वर और वेद में उनकी प्रवृत्ति हो सकती थी । अतएव उन्होंने रामायण को ही विकृत करके किसी न किसी रूप में रामचरित्र अपने क्षेत्र में प्रचारित किया । साथ ही उसके माध्यम से सनातनियों और वैदिकों में राम के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करके अपने धर्म की ओर आकृष्ट करना भी उनका लक्ष्य था । अतः वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध अंश अनादरणीय ही हैं । बौद्धों में वेदादि शास्त्र के प्रामाण्य की मान्यता नहीं थी । इसी लिए सीता को राम की भगिनी कहा गया है और भाई बहन के विवाह का समर्थन किया गया है ।

१०२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की कहानी राम की जबानी राम की कहानी राम की जबानी नाम की पुस्तक में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने एक आधुनिक नास्तिक विचारवाले युवक के रूप में राम को प्रस्तुत कर वाल्मीकि के वचनाभासों द्वारा अनेक प्रकार की दुःशङ्काएँ पैदा करने का प्रयत्न किया है। पूर्वोक्त दशरथजातक में श्रीसीता को राम की बहन बनाने का प्रयास किया गया है। वैसे संसार में अनेक व्यक्ति एवं अनेक घटनाएँ होती हैं। उनमें किसी का नाम राम हो जाय, या किसी की कुछ घटनाएँ भी वैसी हो जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं है। परन्तु अनादि अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों, उनके अङ्गों और उपाङ्गों एवं तदनुसारी रामायण, पुराणों, उपपुराणों, धर्मशास्त्रों, तन्त्रों एवं आगमों के अनुसार श्रीराम अनन्तब्रह्माण्डनायक परात्पर ब्रह्मस्वरूप ही हैं। वही कृष्ण, विष्णु आदि शब्दों से भी व्यवहृत होते हैं। उनके मर्यादापुरुषोत्तम-स्वरूप के सभी चरित्र आदर्श चरित्र हैं। वेदादि शास्त्रों के अनुसार ही उनके सब चरित्र हैं। सीता सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। अवतार-लीला में वे जनकनन्दिनी, श्रीदशरथ की पुत्रवधू एवं श्रीरामचन्द्रजी की पट्टमहिषी हैं। जनता जनार्दन के लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों महापुरुष न देव हैं, न मानव, बल्कि भगवान् और विष्णु के अवतार हैं। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि वे केवल जनता की भावनामात्र नहीं, किन्तु प्रबल प्रमाण वेदादि शास्त्रों से सिद्ध हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी जीवनी स्वयं नहीं लिखी। यह लेखक के अनुसार भी लेखक की अपनी कल्पना ही है। कल्पना में वास्तविकता नहीं होती, यह स्पष्ट ही है। आपका यह कथन सही नहीं है कि तुलसीदास के लिखे 'रामचरितमानस' से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपने बारे में महाकवि वाल्मीकि द्वारा उपस्थित की गयी सामग्री को प्रमाण मानकर अपनी कहानी स्वयं लिखने का निश्चय किया है। आपकी उक्त कल्पना निराधार एवं निष्प्रमाण है। तुलसीदासजी ने जो कुछ भी लिखा है वह वेद, रामायण, पुराणादि से सम्मत ही है। उक्त पुस्तक में लेखक के काल्पनिक राम ने तो वाल्मीकिरामायण को भी प्रामाणिक नहीं माना है। वाल्मीकिरामायण में विशेषतः लङ्काकाण्ड में ब्रह्मादि देवताओं ने श्रीराम को परब्रह्मस्वरूप कहा है, पर वह लेखक के काल्पनिक राम को कहाँ मान्य है? असल में वेद-शास्त्र विरोधियों को तुलसीदासजी के रामचरितमानस से भयङ्कर उद्वेग होता है, क्योंकि उसके द्वारा वेद और ईश्वर का विश्वास सुदृढ़ होता है। इसलिए लेखक रामचरितमानस के प्रभाव को न्यून करने के लिए उसे धुन्ध की संज्ञा देकर अपने हृदय के कालुष्य को प्रकट करते हैं, पर आपकी मनोवाञ्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। रामचरितमानस का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही जायगा। कौसल्यायन आगे कुछ खुलकर स्पष्ट ही कहते हैं—"लेखक के राम, तुलसी के भगवान् राम तो नहीं हैं। वे बहुत कुछ वाल्मीकि के श्रीराम ही हैं।" आगे अपना हृदय व्यक्त करते हुए लिखते हैं—‘‘वाल्मीकि के राम की अपेक्षा भी वे कुछ भिन्न हैं, कुछ विशिष्ट हैं।" पर यदि लेखक के काल्पनिक राम वाल्मीकिरामायण के राम से भिन्न हैं, तो उनकी जीवनी का आधार वाल्मीकिरामायण हो भी कैसे सकता है? आगे लेखक अपनी छद्ममयी नीति के अनुसार कहता है कि—'वाल्मीकिजी सत्य के उपासक थे। उन्होंने अधिक से अधिक यथार्थ का चित्रण किया है।' इसका आन्तर अभिप्राय यह है कि उसमें अयथार्थता है। श्री- कौसल्यायन कहते हैं—‘‘ब्राह्मण उस याज्ञिक युग में क्या-क्या कुछ नहीं करते थे।" ये ही बौद्धवाद के संस्कार हैं।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०३ ब्राह्मण याज्ञिक वेदप्रमाण के अनुसार यज्ञ, यागादि करते थे । मनमानी कुछ भी नहीं करते थे । यहाँ कौसल्यायन का वैदिक यज्ञ के हिंसामय प्रतीत होने वाले विधानों पर व्यङ्ग्य है । 'श्रीराम के भोजन में माँस और सुरापान अंग रहा था। आज के वैष्णव पाठक को यह समझना चाहिए कि उसके विष्णु के अवतार भगवान् राम भले ही वैष्णवयुग की उपज हों; किन्तु स्वयं श्रीराम वैष्णव युग की उपज नहीं। वे जिस युग की विभूति थे, उसका प्रतिनिधित्व करना स्वाभाविक था।' यह विचार भी अविवेकमूलक है। श्रीराम विष्णु या विष्णु के अवतार थे—यह शाश्वत सिद्धान्त है, वे किसी युग की उपज नहीं थे । वेदवेद्य श्रीराम के अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद ही रामायण के रूप में प्रकट हुए थे । श्रीराम सर्वान्तरात्मा हैं, अतः विभिन्न युगों के अनुरूप उनके भोजन में भेद हो सकता है। पर सर्वदा ही मर्यादापुरुषोत्तम के व्यवहार में भी वेद का नियन्त्रण तो रहता ही है। बुद्ध की अहिंसा का बिल्ला बाँधनेवाले बौद्धों के बुद्ध तो किसी धोबिन के द्वारा दत्त शूकरमांस भक्षण करके मृत्यु को प्राप्त होते हैं। क्या कौसल्यायन बतायेंगे कि उन्होंने किस युग का प्रतिनिधित्व किया था। प्रियावियोग में राम के व्याकुल होने आदि की नरलीला भी ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य होकर मुक्तिका हेतु बनती है । गीता कहती हैं कि भगवान् के दिव्य जन्म और कर्म को जो जानता है वह जन्म और कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाता है— “जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥” (गी० ४।९ ) अपने समर्थन में कौसल्यायन ने एक जैन श्लोक उद्धृत किया है— “पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥” अर्थात्—मेरा महावीर में पक्षपात नहीं एवं कपिलादि में द्वेष नहीं है । जिसका भी वचन प्रकृतिसम्मत, युक्तियुक्त हो उसका ही परिग्रह करना चाहिये । पर यदि कौसल्यायन सचमुच उक्त वचन का आदर करते हैं, तो नैरात्म्यवाद तथा अनेकान्तवाद को त्याग कर उन्हें अनादि अपौरुषेय स्वतःसिद्ध वेदों के अनुसार ही धर्म, ब्रह्म की शरण ग्रहण करनी चाहिये । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"जैसे कोई नहीं जानता कि उसका जन्म कब और कहाँ हुआ वैसे ही मैं भी नहीं जानता कि मेरा जन्म कैसे, कब और कहाँ हुआ ?” परन्तु यह गीता के विरुद्ध है । गीता के भगवान् कहते हैं—"हमारे और तुम्हारे कई जन्म हुए, पर उन सबको मैं जानता हूँ । हे परन्तप ! तुम नहीं जानते हो"— “बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥” (गी० ४।५ ) कौसल्यायन अपने जन्म के बारे में कहते हैं—"मैंने सुना है कि जब मेरे पिता सन्तानोत्पत्ति की ओर से निराश हो गये, तब उन्होंने वसिष्ठ के सहयोग से 'अश्वमेध यज्ञ' किया । राजा रोमपाद के जामाता ऋष्यशृङ्ग बालब्रह्मचारी थे । वे वेश्याओं के द्वारा लुभाकर अपनी कन्या शान्ता के लिए वररूप में प्राप्त किये गये थे । यज्ञ में ३०० पशु यज्ञस्तम्भों में बाँधे गये थे । उनमें अश्वमेध का यज्ञीय अश्व भी था । मेरी माता कौशल्या ने धर्म की इच्छा से एक रात उस अश्व के निकट गुजारी थी । इससे पहले भली प्रकार अश्व की परिचर्या करके तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया था । इनके बाद याज्ञिकों ने मेरे पिता की अन्य दो भार्याओं को भी घोड़े के साथ नियोजन

१०४ रामायणमीमांसा पञ्चम किया था। मेरी दूसरी माता सुमित्रा वैश्य जाति की थी और मेरी तीसरी माता ( कैकेयी ) शूद्र जाति की थी । तीनों को महिषी, वावाता और परिवृत्ति कहा जाता था ।” पाठकों को मालूम होना चाहिये कि यह कथन वाल्मीकिवर्णित मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सम्बन्ध का नहीं है । यह तो मिथ्या वासुदेव के समान मिथ्या काल्पनिक, नास्तिक बौद्ध राम का या आनन्द कौसल्यायन का ही कथन है । वास्तविक राम ने कभी अपनी कहानी नहीं लिखी है। जैसे मिथ्या वासुदेव पौण्ड्रक नकली दो भुजाएँ तथा नकली गरुड़ बनाकर वासुदेव बन गया था, वैसे ही कौसल्यायन नकली मनगढ़न्त कहानी बनाकर नकली बौद्ध नास्तिक राम बन गये हैं। अश्वमेध की इष्टि के याजक महर्षि वसिष्ठ कोई अन्य नहीं । पुत्रेष्टि के याजक ऋष्यशृङ्ग नहीं ऋष्यशृङ्ग थे । वे महात्मा बालब्रह्मचारी थे । वेश्याएँ नहीं, दिव्य अप्सराएँ उन्हें तपोवन से लायी थीं । वे अपने को ऋषि बताकर उनको रोमपाद के राज्य में अनावृष्टि दूर करने के लिए लाने में समर्थ हो गयीं । राजा ने उनके पिता की

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०५ फिर अयोध्याकाण्ड में भी भरत मातुलकुल गये और अयोध्या आते समय बहुत से राजकीय उपहार उनके साथ भेजे गये । उन महाराज कैकेय की पुत्री कैकेयी को शूद्रा एवं परिवृत्ति कहना साहस ही है । अन्य रामायणों के अनुसार सुमित्रा का वैश्यपुत्री होना भी अप्रामाणिक है । रघुवंश ९।१७ के अनुसार सुमित्रा मगधनरेश की पुत्री थीं । यहाँ वावाता और परिवृत्ति दोनों शब्द कृताभिषेका महिषी से भिन्न क्रमेण द्वितीय तथा तृतीय भार्याओं के ही बोधक हैं। इसी दृष्टि से सुमित्रा को वावाता और कैकेयी को परिवृत्ति कहा गया है । “राज्ञां हि विविधाः स्त्रिय उत्तममध्यमाधमजातियाः ।” इत्यादि ऐतरेयब्राह्मण तृतीय पञ्चिका के वावाता शब्द के भाष्य के अनुसार यदि वैश्य और शूद्र जाति की राजवल्लभा पत्नियाँ हों तो उनका भी नियोजन होता है; परन्तु अनिवार्यरूप में वैसा अपेक्षित नहीं है। अतएव श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में कृताभिषेका महिषी सीता की काञ्चनी प्रतिमा का ही उपयोग हुआ था। वहाँ अन्य जातीया भार्याओं का प्रसङ्ग ही नहीं आया। काञ्चनी प्रतिमा से भी यज्ञ सम्पन्न होना वैध है, यह इसी ग्रन्थ में अन्यत्र देखिये । इसी तरह अन्यत्र भी कौसल्यायन ने वाल्मीकि का नाम लेकर उनका अभिप्राय न समझकर या जान- बूझकर श्लोकों का भ्रामक अर्थ करके जनता को भ्रान्त करने का प्रयत्न किया है । 'हे मिथ्याप्रतिज्ञ ! तू शूर वीर हो ।' (रामकहानी पृ० ४) यह अर्थ भी इसी प्रकार का है। मूल में संबोधन रूप में 'मिथ्याप्रतिज्ञ' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है— "यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम् । मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृतः ॥” ( वा० रा० १।२१।३ ) अर्थात् यदि प्रतिज्ञाहानिरूप दोष आपको सह्य है तो मैं जाता हूँ । आप मिथ्याप्रतिज्ञ होकर अपने सुहृदों के साथ सुखी हों । 'विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का का वध कर डाला । आखिर हम क्या करते, हमसे चलते समय पिताजी ने कहा था कि विश्वामित्र की हर आज्ञा का पालन करना । हम अपनी बुद्धि से विचार करने में स्वतन्त्र न थे।' (रामकहानी पृ० ५१ ) यह भी मिथ्यावादी बौद्धों के मिथ्या भाषण का ही नमूना है, क्योंकि वाल्मीकीयरामायण में ऐसा उल्लेख नहीं है। श्रीराम ने मारीच को मारा नहीं, किन्तु 'मानव परमास्त्र' से सौ योजन दूर डाल दिया था । सुबाहु तथा अन्य बहुत से राक्षसों का वध कर वे ऋषियों द्वारा पूजित एवं प्रशंसित हुए थे । हाँ, अयोध्याकाण्ड में जब जाबालि ने राम को लौटाने के लिए धर्मविरुद्ध नास्तिकों जैसी बाते करते हुए कहा—"कौन किसका बन्धु है । किसको किससे क्या लेना है । प्राणी अकेला ही उत्पन्न होता है। जो उसमें माता- पिता की बुद्धि करता है वह उन्मत्त ही है । आप अपने पित्र्य राज्य को त्यागकर बहुकण्टक कुत्सित पथ का आश्रयण कर रहे हैं । जो लोग धर्मपरायण होते हैं, उनके लिए ही हम सोचते हैं । वे यहाँ भी दुःख पाते हैं। अन्त में विनाश को प्राप्त हो जाते हैं आदि । ब्राह्मण आदि अन्य के भोजन करने से यदि देवताओं तथा पितरों को कुछ मिल सकता हो, तब तो प्रवासी सम्बन्धियों को घर में ही दिया हुआ अन्न आदि मार्ग में मिल जाना चाहिए, फिर मार्गार्थ सामग्री-सङ्कलन व्यर्थ होगा। अतः देवताओं तथा पितरों सम्बन्धी अष्टका श्राद्ध केवल अन्न का अपव्ययमात्र है। यज्ञादि में देवपूजा १४

१०६ रामायणमीमांसा पञ्चम करो, अन्नादि-दान करो, चान्द्रायणादि व्रत करो, संन्यास करो इत्यादि वैदिकाचार का प्रतिपादन करनेवाले वेदादि ग्रन्थों का निर्माण मेधावियों ने दानादि प्राप्त करने के लिए तथा देवताओं को वश में करने के लिए ही किया है। पामरों की प्रतारणा कर धनग्रहण करने का यह सब धन्धामात्र है। परलोक आदि कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्ष को अपनाओ परोक्ष का त्याग करो।" तब ऐसी बातों को सुनकर राम ने कहा था—'आपका यह सब उपदेश कर्तव्य के तुल्य प्रतीत होनेवाला अकार्य ही है। पथ्य के तुल्य प्रतीत होने पर भी यह अपथ्य ही है। पापाचारसमन्वित निर्मर्याद पुरुष लोकायत उच्छृङ्खल आचार एवं उच्छृङ्खल दर्शन का अनुगामी होने के कारण सत्पुरुषों में संमान प्राप्त नहीं कर सकता है। वेदानुमत आचाररूप चरित्र ही प्राणी की कुलीनता या अकुलीनता, पवित्रता या अपवित्रता का प्रख्यापन करता है। जिसमें आचार होता है, वही कुलीन एवं पवित्र समझा जाता है। तद्विपरीत अकुलीन एवं अशुचि समझा जाता है। जो आपके उपदेश का अनुसरण करेगा वह आर्य के समान प्रतीत होनेपर भी अनार्य, पवित्रताहीन एवं दुःशील होने पर भी शुचि और शीलवान् जैसा प्रतीत होगा एवं अलक्षण होकर लक्षणवान् सा प्रतीत होगा। यदि मैं आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करूँगा एवं धर्मवेश से युक्त होकर शास्त्रोक्त शुभ कर्म को छोड़कर विधिवर्जित क्रिया करूँगा तो अशुभ स्थिति को ही प्राप्त होऊँगा। कार्य-अकार्य का विवेक रखनेवाला कौन समझदार लोकदूषण दुर्वृत्त का आदर करेगा। प्रतिज्ञाहीन वृत्ति का अनुसरण करने पर किस साधन से स्वर्गादि प्राप्त हो सकेगा। आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से मैं दुर्वृत्त बन जाऊँगा। राजा के दुर्वृत्त होने से प्रजा भी दुर्वृत्त हो ही जाती है। अतः सत्य और आनृशंस्य ही सनातन राजवृत्त है। सत्यात्मक राज्य सत्य में ही प्रतिष्ठित होता है। ऋषि एवं देवता सत्य का ही आदर करते हैं। सत्यवादी ही इस लोक और परलोक में अक्षय फल का भागी होता है। सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है। सत्य से श्रेष्ठ कोई उत्कृष्ट पद नहीं है। सर्पतुल्य अनृतवादी से सबको उद्वेग होता है। दान, यज्ञ, तप, वेद सब सत्य में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सत्यपरायण होना चाहिये— “दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च। वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” (वा० रा० २।१०९।१४) इस कर्मभूमि को प्राप्त कर शास्त्रोक्त कर्म ही करना चाहिये। सैकड़ों क्रतुओं, यज्ञों का अनुष्ठान करके ही शतक्रतु देवराज होकर त्रिदिव के आधिपत्य को प्राप्त हुए हैं। उग्र तप के द्वारा ही ऋषि लोग स्वर्ग गये हैं। सत्य, धर्म, भूतानुकम्पा एवं ब्राह्मण, देवता तथा अतिथियों की पूजा त्रिदिवप्राप्ति के मार्ग है।' अन्त में राम ने कहा—'मैं पिताजी के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने धर्मविमुख विषम- बुद्धिवाले आप जैसे नास्तिक को अपना 'याजक' ऋत्विक् बनाया था। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्ध आदि नास्तिक भी दण्ड्य हैं। आस्तिक ब्राह्मण को चाहिए कि ऐसे नास्तिकों के सम्मुख न हो, उनसे भाषणादि न करे। तथागत को नास्तिक ही समझना चाहिये। दण्ड देना शक्य हो तो नास्तिक को चोर के तुल्य दण्डित किया जाय, यदि ऐसा सम्भव न हो तो उससे भाषण आदि न किये जायें— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्लाद् विषमस्थबुद्धिम। बुद्धथानयेवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०७ । यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि । तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३,३४) श्रीराम की इन बातों को सुनकर जाबालि ने कहा—"मैं नास्तिक नहीं हूँ। आप को वन से लौटाने के लिये इस प्रकार की बातें मैंने की हैं।" वसिष्ठ ने भी श्रीराम से कहा—'जाबालि लोक की गति, अगति को जानते हैं। नास्तिक नहीं हैं। आप को वन से निवृत्त करने के लिये ही इन्होंने वैसा कहा है।' बुद्धादि नास्तिक भी प्राचीन हैं। कई लोग बुद्ध और तथागत का नाम देखकर वाल्मीकिरामायण का निर्माण गौतम बुद्ध के पश्चात्कालीन मानते हैं, पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि अवतार बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न ही हैं। जैसे मुख्यलक्ष्मी गृहलक्ष्मी से भिन्न होती हैं वैसे ही बुद्ध भी गौतम बुद्ध से भिन्न हैं। बौद्धों के जातकों का भी यही मत है। लङ्कावतारसूत्र में लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले भी एक बुद्ध थे। उसी ग्रन्थ में बुद्ध ने अपने पूर्व के अनेक बुद्धों की चर्चा की है। अतएव “द्वे सत्त्वे समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।” के अनुसार परमार्थ एवं संवृत सत्त्व स्वीकार करके ही बुद्धों की धर्मदेशना सिद्ध होती है। यहाँ ‘बुद्धानाम्’ यह बहुवचन निर्देश भी सिद्ध करता है कि बुद्ध अनेक हुए हैं। उन्हीं बौद्ध सिद्धान्तों का पुराणों में भी खण्डन है। भगवान् व्यास के सूत्रों में भी बौद्धमत और जैनमत का खण्डन है। एतावता भी व्यास और गौतम बुद्ध तथा महावीर से प्राचीन हैं। पाणिनि के सूत्र ‘पाराशर्यशिलालिभ्याम्’ (पा० सू० ४।३।११०) में व्यास की चर्चा है। महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि के रचयिता व्यास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, यह कहा गया है। इसी तरह कौसल्यायन ने गङ्गा के गर्भ से धातुओं की उत्पत्ति पर भी अपना कुतर्क श्रीराम के ब्याज से उपस्थित किया है। वे कहते हैं—"यह धातुओं का वर्णन यों ही लालबुझक्कड़ों का वर्णन होगा। क्या कभी किसी के गर्भमल से धातुओं की उत्पत्ति हो सकती है ?” “उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ । यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजाम्बूनदप्रभम् ।। काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् । ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च। तदेतद् धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ।। निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् । सर्वपर्वतसन्नद्धं सौवर्णमभवद् वनम् ।। जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव ॥” (वा० रा० १।३७।१८-२२) प्रसङ्गानुसार शैव तेज को अग्नि ने धारण किया था। अग्नि से गंगा ने उसी तेज को धारण किया था। असह्य होने के कारण गङ्गा के द्वारा त्यक्त वही तेज पारद आदि धातुओं के रूप में परिणत हुआ था। नागेशभट्ट के अनुसार 'ईश्वर का तेज ही पारद है। उत्तम स्त्री के दर्शन से रसेश्वर पारद दो योजन पर्यन्त उच्छलित होकर

१०८ रामायणमीमांसा पञ्चम उसका अनुसरण करता है। आनन्दकन्दतन्त्र में भी ऐसा उल्लेख है। वही पारद विभिन्न योगों से त्रपु, सीसक, सुवर्ण आदि रूप में परिणत होता है।' यद्यपि सामान्य स्त्री-पुरुषों के शुक्र, शोणित से धातुओं का निर्माण सम्भव नहीं है; तथापि शिव-पार्वती का चमत्कार पृथक् ही है। शिव-शक्ति या प्रकृति-पुरुष सम्पूर्ण विश्व के हेतु हैं, चेतन और अचेतन सम्पूर्ण विश्व के कारण वे ही हैं। विद्युत्-प्रकाश की भी ठण्डे और गरम तार के योग से ही अभिव्यक्ति होती है। प्रकाशस्वरूप शिव हैं और विमर्शस्वरूप शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक है। पारद, सुवर्ण आदि भी सब उसी के परिणाम हैं। इसी वैज्ञानिक दृष्टि- कोण की अभिव्यक्ति के लिये परम कारण शिव और शक्ति के संयोग के अनन्तर ही अग्नि और सोम का संसर्ग हुआ है। गङ्गा सोम का ही प्रतीक हैं। देवताओं की प्रार्थना से भगवान् शिव ने अपना तेज पृथिवी में निक्षिप्त किया । उससे गिरि-काननपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी तप्त हो उठी । तदनन्तर देवताओं ने अग्नि से प्रार्थना की कि तुम वायुसमन्वित होकर रौद्र तेज में प्रवेश करो । वही अग्नि से व्याप्त होकर श्वेत पर्वत हो गया। अग्नि पृथिवी का अभिमानी देवता है, अतः तेज के धारणार्थ पृथिवी में अग्नि का प्रवेश उचित ही था । वायुयुक्त अग्नि के द्वारा चालनपूर्वक प्रवेश से बद्ध होकर शिवधातु का श्वेत पर्वत रूप होना सङ्गत ही है। तेजःप्रवेश से उसी की महिमा से पावक एवं आदित्य के समान बनकर वह सुवर्णमय हो गया। ‘मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।' (गी० १४।३ ) इस गीता वचन में भगवान् ने कहा है कि महत् ब्रह्म मेरी प्रकृति ( योनि ) है। उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ और उसी से सम्पूर्ण प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है । ईश्वर का प्रकृति में गर्भाधान सामान्य स्त्री-पुरुषों जैसा नहीं होता; किन्तु प्रकृति में पुरुष का प्रतिबिम्बित होना ही गर्भाधान है। उसी के प्रभाव से जड़ प्रकृति भी चेतनान्वित होकर महदादि प्रपञ्च के निर्माण में सक्षम होती हैं। इस तरह जब प्रकृति पुरुष या शिव शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि होती है तब पारद, स्वर्ण, रजत आदि की उत्पत्ति भी उन्हीं से होती है, इसमें सन्देह का अवसर ही नहीं है । "ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम् । आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः ।।" ( वा० रा० १।३६।१७ ) राजा सगर की पत्नी सुमति के उदर से एक तुम्बा निकला। उससे साठ हजार पुत्र निकले । धात्रियों ने पुत्रों को घृतकुम्भ में रखकर सबका पोषण किया था। फिर जब आजकल टेस्ट ट्यूब से बच्चे होने लगे हैं तब इन बातों पर क्यों अविश्वास करें । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- "हम सोचने लगे कि क्या स्वयं विश्वामित्र भी ऐसी बातों में विश्वास कर सकते हैं। अथवा हमारा ही मनोरञ्जन करने के लिए, रास्ता कटने के लिए ऐसी चण्डूखाने की गप्पें हाँक रहे हैं।" परन्तु यह भी उनका प्रमाद ही है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि महाराज सगर ने अपनी दो पत्नियों के साथ भृगुप्रस्रवण गिरि पर सौ वर्ष तक तपस्या की । तप से आराधित होकर महर्षि भृगु ने वर प्रदान किया । पहली पत्नी ने एक वंशकर पुत्र माँगा। दूसरी ने ६० हजार पुत्र माँगे । इस तरह महर्षि के वर के प्रभाव के कारण होनेवाली उक्त घटना सत्य ही है । असम्भव जैसी कोई वस्तु नहीं है । योगसिद्ध महर्षियों के सङ्कल्प के अनुसार प्रकृति नियन्त्रित होती है । जैसे शुक्र के सूक्ष्मकण गर्भस्थ होकर मनुष्यादि रूप में व्यक्त होते हैं । अनेक बार एक साथ ही चार चार, पाँच पाँच सन्तानें भी पैदा हो जाती हैं । शूकरादि प्राणियों की दर्जनों सन्तानें एक समय में ही

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०९ उत्पन्न होती हैं । पक्षियों से अण्डों के रूप में बच्चे उत्पन्न होकर गर्भ से बाहर ही पालित पोषित होते हैं । फिर अगर ६० हजार सन्तानें भृगु जैसे महर्षि के सङ्कल्प से सुरक्षित हो जायें तो आश्चर्य की बात ही क्या है ? पुनश्च जब वैदिक सिद्धान्त में प्रत्यक्ष और अनुमान के समान ही शब्द भी स्वतन्त्ररूप से प्रमाण है तब शब्द प्रमाण से सिद्ध पदार्थ में किसी आस्तिक की विप्रतिपत्ति ही क्यों होगी ? आज के वैज्ञानिक युग में तो ऐसी शङ्का ही उपहासास्पद है । कृत्रिम गर्भाधान और पोषण भी असम्भव नहीं है । आगे कौसल्यायन के काल्पनिक मिथ्या वासुदेव राम कहते हैं—"हमें यह भी बताया गया कि पृथ्वी को खोदने पर सगर-पुत्रों की चार ऐसे गजराजों से भेंट हुई जो पृथ्वी को अपने सिर पर उठाये हुए थे । हमें समझाया गया कि जब गजराज सिर हिलाते हैं तभी भूकम्प होता है । हम सोचने लगे कि पृथिवी तो हाथियों के सिर पर स्थित है, किन्तु स्वयं हाथी किस पर स्थित हैं ? हमें अपनी किसी शङ्का का सन्तोषजनक समाधान मुनि विश्वामित्र से सुनने को नहीं मिला ।” "यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजाः । खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत् ॥” ( वा० रा० १।४०।१५ ) परन्तु यह शङ्का अविवेकमूलक ही है; क्योंकि वहाँ पर आकर्षिणी, विकर्षिणी, धारिणी, पोषणी शक्ति- विशिष्ट चेतन ही गजेन्द्र के रूप में पृथिवी को धारण करते हैं और वे स्वयं स्वप्रकाश स्वप्रतिष्ठ भगवान् में ही प्रतिष्ठित होते हैं । परस्पर आकर्षण से स्थिति आधुनिक लोगों को भी मान्य है । गणपति भगवान् का भी गजानन प्रतीक गणपति अथर्वशीर्ष आदि में वर्णित है । भूमि के भी भीतर होनेवाली रासायनिक प्रक्रिया एवं तन्मूलक विस्फोट आदि भी उन्हीं शक्तियों के परिणाम हैं । प्रतिक्रिया के अनन्तर होनेवाली शान्ति ही उनका उद्देश्य है । इसी तरह कौसल्यायन के राम ने इन्द्र और अहल्या की चर्चा की है । उन्होंने कहा—"गौतम के शाप से अहल्या पत्थर की हो गयी थी । मेरे चरणस्पर्श से वह पूर्ववत् पुनः जीवित हो गयी । ऐसा कहनेवाले के मन में स्त्रीजाति के लिए तनिक भी आदर भाव नहीं रहा होगा । ऐसा कहनेवाले ने स्त्रीजाति के साथ मेरा भी निरादर किया है ।” परन्तु यह मिथ्या ही है । वाल्मीकिरामायण में राम ने वैसा कुछ भी नहीं कहा है । हाँ, वाल्मीकि के राम ने लक्ष्मण के साथ मुनि-पत्नी का चरणस्पर्श किया, यह ठीक है— "राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ।” ( वा० रा० १।४९।१७ ) पर साथ ही राम के स्पर्श से वह शापमुक्त हुई और अनेक सहस्रवर्ष तक वायुभक्षण करती हुई निराहार और भस्मशायिनी होकर तप करती रही । यह सब साधारण लोक से विलक्षण बातें तो थीं ही— "इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि । वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी ॥” ( वा० रा० १।४८।२९,३० ) अहल्या ने समाहित होकर अर्घ्य, पाद्य आदि से श्रीराम का पूजन किया । महातेजा गौतम ने भी आकर राम की विधिवत् पूजा की— "गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी । रामं सम्पूज्य विधिवत्तपस्तेपे महातपाः ॥” ( वा० रा० १।४९।२१,२२ )

११० रामायणमीमांसा पञ्चम इससे राम की पूज्यता आदि विशेषताएँ स्पष्टतया विदित होती हैं। अतः किसी कल्प की कथा में अहल्या पाषाण भी हो गयी होगी। जब कि राम ईश्वरावतार हैं ही तब उनके चरणस्पर्श से पापयुक्त गौतमपत्नी का शाप- मुक्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतएव श्रीव्यासदेव के रामाश्रमेध आदि ग्रन्थों में अनेक ऋषियों ने राम को प्रणाम आदि किया ही है। आगे कौसल्यायन के राम वसिष्ठ और विश्वामित्र के सङ्घर्ष की चर्चा करते हुए कहते हैं—"जब विश्वामित्र द्वारा बलात् कामधेनु ले जाने के लिए सेना का प्रयोग किया गया तब वसिष्ठ ने कामधेनु से कहा कि ऐसी सेना उत्पन्न करो जो विश्वामित्र को परास्त कर सके । कामधेनु ने दिव्य शक्ति से पहले शक, काम्बोज तथा यवन आदि जातियों के सैनिकों को उत्पन्न किया। उनकी सहायता से पराजित होकर विश्वामित्र ने कहा कि ब्रह्मबल ही श्रेष्ठ बल है। उसके मुकाबले में क्षत्रियबल तुच्छ है। यदि आपस के कलह में विदेशियों की सहायता लेकर विजय प्राप्त करना ही ब्रह्मबल है, तो क्या ऐसे ब्रह्मबल को भी धिक्कार नहीं है ?" परन्तु यह भी कुचोद्य ही है, क्योंकि प्रकृत में विदेशी सहायता का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। वहाँ तो स्पष्ट है कि कामधेनु ने ही कहा था—"मुझे राजकर्मचारी दण्डित कर रहे हैं, मैंने क्या अपराध किया जो आपने मुझे त्याग दिया ।” ब्रह्मर्षि ने कहा—"मैं नही त्याग रहा हूँ। वह राजा है, उसके समान मेरे पास बल नहीं है।" कामधेनु ने कहा—"आपके बल के सामने उस राजा का कुछ भी बल नहीं है। ब्रह्मतेजसम्पन्न आप मुझे आज्ञा दें तो मैं विश्वामित्र के बल और दर्प को नष्ट कर सकती हूँ।" इस प्रकार कामधेनु की प्रार्थना पर ही वसिष्ठ ने उसे सेनानिर्माण का आदेश दिया था। सुरभि ने वसिष्ठ के ब्रह्मबल के सहारे अपनी शक्ति से पल्लव, शक आदि का निर्माण किया था। किसी विदेशी से सहायता प्राप्त नहीं की थी। विश्वामित्र के बल से उस बल के नष्ट हो जाने पर पुनः वसिष्ठ ने आज्ञा दी। तब पुनः सुरभि ने हुङ्कार से सूर्यतुल्य काम्बोजों का निर्माण किया, अपने ऊधस् से शस्त्रपाणि बर्बरों का निर्माण किया, योनिदेश से यवनों का निर्माण किया, गोमय के स्थान से शकों की उत्पत्ति की एवं रोमकूपों से म्लेच्छ आदि की उत्पत्ति कर विश्वामित्र के बल को नष्ट कर दिया— “तस्या हुङ्कारतो जाताः काम्बोजाः रविसन्निभाः । ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः । रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥” (वा० रा० १।५५।२,३.) वस्तुतः कौसल्यायन वेदों, शास्त्रों तथा महर्षियों के यौगिक चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते । अतएव- उन्हें विदेशी सहायता की बात ही सूझी। फिर, जब स्वयं विश्वामित्र ने ही अपने महान् बल को वसिष्ठ के ब्रह्मबल से तुच्छ समझा है, तब दूसरे की विपरीत कल्पना का मूल्य ही क्या है ? जनकसुता जानकी के सम्बन्ध में वे अपनी अटकल लगाते हैं—"वह राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिल गयी थी। पृथ्वीपुत्र तो हम सभी हैं, किन्तु क्या बिना माता-पिता के संयोग से मात्र पृथिवी से किसी की उत्पत्ति हुई है ? अतः उसके यथार्थ माता-पिता अज्ञात रहे होंगे।" यह भी कथन मिथ्या ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में राम ने ऐसा कोई विचार प्रकट नहीं किया है। श्रीराम परम आस्तिक थे। उन्हें शास्त्रों में विश्वास था। देवताधिकरण के अनुसार स्थूल पृथ्वी से अतिरिक्त उसकी एक दिव्य अधिष्ठात्री शक्ति देवता भी शास्त्रप्रमाण बल से सिद्ध है। सीता उसी की पुत्री थी।