रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
संख्या १ रामोपासना ९०९ भूपुरप्रवेशद्वाराद् बहिः पूर्वादिक्रमेण—(१) वं वज्राय नमः वज्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) शं शक्त्यै नमः शक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ! (३) दं दण्डाय नमः दण्डश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) खं खड्गाय नमः खड्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) पां पाशाय नमः पाशश्रीपादुकां पूजयामि तर्प- यामि नमः । (६) अं अङ्कुशाय नमः अङ्कुशश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) गं गदायै नमः गदाश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) त्रिं त्रिशूलाय नमः त्रिशूलश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (९) पं पद्माय नमः पद्मश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं षष्ठाख्यावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— षष्ठावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” इत्यावरपूजां कृत्वा धूपादि नमस्कारान्तं सम्पूज्य नमस्कुर्यात् । अथ प्रार्थना— “रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥” “वर्णलक्षं जपेन्मन्त्री तद्दशांशं सरोरुहैः । जुहुयादर्चिते वह्नौ ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ॥” श्रीसुतीक्ष्ण के प्रश्न पर अगस्त्य ने कहा था— “रामं पद्मपलाशाक्षं कालाम्बुदसमप्रभम् । स्मितवक्त्रं सुखासीनं चिन्तयेत् चिन्तिताप्तये ॥” पद्मपलाश के तुल्य नेत्रवाले नीलाम्बुदश्यामल स्मितमुख सुखासीन श्रीराम का अभीष्टसिद्धि के लिए ध्यान करना चाहिये— “रागादिक्लुषं चित्तं वैराग्येण सुनिर्मलम् । कृत्वा ध्यायेत् सदा रामं भवबन्धविमुक्तये ॥” रागादिदूषित चित्त को वैराग्य से निर्मल करके भवबन्ध विमुक्ति के लिए श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । प्रातः शुद्ध होकर विविक्त देश में ध्यान, पूजादि करने चाहिये । नाभिकन्द में उद्भूत कदलीपुष्प के तुल्य स्निग्ध वर्ण- वाले अष्टदल हृदयकमल का ध्यान करना चाहिये । श्रीराम-नाम से ही उस पङ्कज को प्रफुल्लित करके उसके पत्रों पर क्रमेण सोम, सूर्य तथा अग्निमण्डल का चिन्तन करना चाहिये । उसके ऊपर दिव्य रत्नमय उज्ज्वलपीठ या सिंहा- सन स्थापित करके उसपर कोटि-कोटिसूर्यसमप्रभ श्रीराम का ध्यान करना चाहिए । “नाभिकन्दसमुद्भूतं कदलीकुसुमोपमम् । अष्टपत्रं स्निग्धवर्णं ध्यायेद्धृदयपङ्कजम् ॥ तत्पत्रं रामनाम्नैव फुल्लं कृत्वास्य मध्यमे । भावयेत् सोमसूर्याग्निमण्डलान्यत्तरोत्तरम् ॥
९१० रामायणमीमांसा परिशिष्ट तस्योपरिन्यसेद्दिव्यं पीठं रत्नमयोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत् सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥” नीलकमल के तुल्य विशाल नेत्र और विशाल वक्षःस्थलवाले उदीयमान भास्कर के तुल्य कुण्डलों से शोभित सुन्दर वस्त्र एवं सुन्दर किरीट से युक्त, शुभ्रकपोल तथा शुचिस्मित ज्ञानमुद्रायुक्त दो भुजाओं से शोभित कम्बुग्रीव सुन्दर स्निग्ध सुचिकृष्ण श्यामल अलकावलियों से युक्त श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । नाना रत्नों से युक्त दिव्यहारों से भूषित अव्यय विद्युत्पुञ्ज के समान देदीप्यमान पीतवस्त्र और उत्तरीयवस्त्र धारण किये हुए सन्तानतरूमूल में वे दिव्य सिंहासन पर स्थित हैं। दिव्य गन्ध, अङ्गविलेपन तथा वनमाला से सुशोभित श्रीराम के वामपार्श्व में तप्तस्वर्ण- वर्ण्य लीलापङ्कजधारिणी चारुहासिनी शुभानना भूषणों से अलंकृत स्निग्ध दृष्टि से श्रीराम को निहारती हुई श्रीसीता विराजमान हैं। छत्र-चामर हाथ में लेकर श्रीलक्ष्मण उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। हनुमान्, सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद आदि वानरों से सेवित, सनन्दनादि तथा अन्य योगिवृन्दों से संस्तुत, सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ तथा योगसिद्धिप्रद श्रीराम का सदैव हृदय में ध्यान करना चाहिये । १. आवाहन— “आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥” हम उन विश्व के स्वामी जानकीवल्लभ विभु कौशल्यानन्दवर्धन प्रकृति से पर विष्णुस्वरूप श्रीराम का आवाहन करते हैं । उक्त मन्त्र से आवाहनीमुद्रा में श्रीराम का आवाहन करना चाहिये । २. आसनम्— “राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥” हे राजाधिराज, हे राजेन्द्र, हे रामचन्द्र, हे महीपते, आपके लिए रत्नमय दिव्य सिंहासन अर्पित करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । ३. सन्निधापन— “श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर नृपोत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ॥ रामचन्द्र महेश्वास रावणान्तक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत् सन्निहितो भव ॥” हे श्रीराम, हे भगवन्, हे रघुवीर नृपोत्तम, हे राजेन्द्र, जानकी के साथ आइये और हे महेश्वास सुस्थिर होकर, हे रामचन्द्र, हे रावणान्तक जब तक मैं पूजा करूँ तब तक आप सन्निहित रहिये । उक्त मन्त्र से सन्निधापनी मुद्रा से सन्निधापन करना चाहिये । ४. सम्मुखीकरण— “रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुनन्दन मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ॥” हे रघुनन्दन, हे राजर्षे, हे राजीवलोचन, हे देवेश पूजा के लिए मेरे अभिमुख हों उक्त मन्त्र से सम्मुखी- करण करना चाहिये । ५. प्रार्थना— “शरणं मे जगन्नाथः शरणं भक्तवत्सलः । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम ॥” जगन्नाथ भक्तवत्सल श्रीराम ही मेरे शरण हैं, आश्रय हैं । राजन्, श्रीराम आप ही मेरे लिए वरद हैं और आप ही मेरे रक्षक हैं उक्त मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये ।
संख्या १ रामोपासना १११ ६. पाद्य— "त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक। पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन ॥" हे त्रैलोक्यपावन, हे अनन्त, हे रघुनायक, हे राजीवलोचन राजर्षे, आप पाद्य ( पाद प्रक्षालनार्थ जल ) ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से दूर्वा, कमल, विष्णुक्रान्ता तथा विविध पुष्पों से युक्त जल श्रीराम के चरण में अर्पित करना चाहिये । ७, अर्घ्य— "परिपूर्णपरानन्द नमो रामाय वेधसे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥" हे परिपूर्णपरानन्द, सर्वोत्पादक श्रीरामरूप में आपको नमस्कार है । हे कृष्ण, हे विष्णो, आप मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से गन्ध, पुष्प, यव, सर्षप, दूर्वा, तिल, कुश, अक्षत के साथ रत्नमय स्वर्णपात्र में गङ्गादि का जल डालकर भगवान् के हस्तारविन्द में अर्घ्य प्रदान करना चाहिये । ८. आचमन— "राजराजेन्द्र देवेश शरणागतवत्सल । गृहाणाचमनं देव नित्यशुद्ध परात्पर ॥" हे देवेश, हे शरणागतवत्सल, हे नित्यशुद्ध आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से जातीफल, कङ्कोल, लवङ्ग और गन्ध से युक्त अमृततुल्यजल जाचमन के लिए प्रदान करना चाहिये । ९. मधुपर्क "ॐ (श्री) नमो वासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । मधुपर्कं गृहाणेमं राजराजाय ते नमः ॥" सत्यज्ञानस्वरूप हे राजन्, आप मधुपर्क ग्रहण करें, इस मन्त्र से रत्नपात्र में दधि, मधु और घृत रखकर रत्नमय पात्रान्तर से ढँककर मधुपर्क समर्पण करना चाहिये । फिर भगवान् से निम्नलिखित मन्त्र से प्रसन्न होने की प्रार्थना करनी चाहिये— "प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसीद सुरेश्वर । प्रसन्नो भव मे राजन् प्रसन्नो मधुसूदन ॥" १०. मधुपर्काङ्ग आचमन— "नमः सत्याय शुद्धाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । गृहाणाचमनं नाथ सर्वलोकैकनायक ॥" सत्य, शुद्ध और तत्त्वज्ञान स्वरूप भगवान् श्रीराम को नमस्कार है, हे त्रैलोक्यनायक आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से शुद्ध जल आचमन के लिए प्रदान करे । ११. स्नान— "ब्रह्माण्डोदरमध्यस्थैस्तीर्थैश्च रघुनन्दन । स्नपयिष्याम्यहं भक्त्या सङ्गृह्णाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से विविध तीर्थोदकों तथा गङ्गोदक से भगवान् श्रीराम को स्नान कराना चाहिये । १२. पञ्चामृतस्नान— "पञ्चामृतं समानीतं पयो दधि घृतं मधु । सशर्करं मया दत्तं श्रीराम प्रतिगृह्यताम् ॥" इस मन्त्र से भगवान् श्रीराम का दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पृथक् स्नान कराकर इन पाँचों को सम्मिलित कर पञ्चामृत स्नान कराना चाहिये । उसके पश्चात् उष्णोदक से स्नान कराना चाहिये ।
९१२ रामायणमीमांसा परिशिष्ट १३. वस्त्र— "सन्तप्तकाञ्चनप्रख्यं पीताम्बरमिदं हरे। सङ्गृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से तपाये हुए स्वर्ण के तुल्य दिव्य पीताम्बर आदि विविध वस्त्र सीतासहित राम को अर्पित करने चाहिये। १४. यज्ञोपवीत— "श्रीरामाच्युत यज्ञेश श्रीधरानन्त राघव । ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण रघुनायक ॥" इस मन्त्र से उत्तरीय (दुपट्टा) सहित यज्ञोपवीत अर्पित करना चाहिये । १५. नाना प्रकार के आभूषण—"किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमेखलाः । ग्रैवेयकौस्तुभोदाररत्नकङ्कणनूपुराः ॥ एवमादीनि सर्वाणि भूषणानि नृपोत्तम । अहं दास्यामि सद्भक्त्या सङ्गृहाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से दिव्यदम्पती श्रीसीताराम को किरीट, हार, केयूर, रत्नकुण्डल, मेखला, ग्रैवेयक, कौस्तुभ, सुन्दर रत्नकङ्कण, नूपुर आदि विविध आभूषण अर्पित करने चाहिये । १६. गन्ध— "प्रधानदेवनीयञ्च सर्वमाङ्गल्यकर्मणि । प्रगृह्यतां दीनबन्धो गन्धोऽयं मङ्गलप्रदः ॥" इस मन्त्र से कुङ्कुम-कर्पूरयुक्त दिव्यगन्ध (यक्षकर्दम आदि) अर्पित करना चाहिये । "कुङ्कुमागुरुकस्तूरीकर्पूरोन्मिश्रचन्दनम् । तुभ्यं दास्यामि विश्वेश श्रीराम स्वीकुरु प्रभो ॥" इस मन्त्र से दिव्य चन्दन अर्पण करना चाहिये । १७. पुष्पमाला तथा तुलसी—"तुलसीकुन्दमन्दारजातीपुन्नागचम्पकैः । कदम्बकरवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥ नीलाम्बुजैर्बिल्वदलैः पुष्पमाल्यैश्च राघव । पूजयिष्याम्यहं भक्त्या सङ्गृहाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से तुलसी, कुन्द, मन्दार
संख्या १ रामोपासना ११३ ७. श्रीविश्वामित्रप्रियाय नमः नाभिं पूजयामि ८. श्रीपरमात्मने नमः हृदयं पूजयामि ९. श्रीश्रीकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि १०. श्रीसर्वास्त्रधारिणे नमः बाहू पूजयामि ११. श्रीरघूद्वहाय नमः मुखं पूजयामि १२. श्रीपद्मनाभाय नमः जिह्वां पूजयामि १३. श्रीदामोदराय नमः दन्तान् पूजयामि १४. श्रीजलदवर्णाय नमः नासिकां पूजयामि १५. श्रीश्रुतिगोचराय नमः कर्णौ पूजयामि १६. श्रीपुण्डरीकाक्षाय नमः नेत्रे पूजयामि १७. श्रीसीतापतये नमः ललाटं पूजयामि १८. श्रीज्ञानगम्याय नमः शिरः पूजयामि १९. श्रीसर्वात्मने नमः सर्वाङ्गं पूजयामि १९. धूप— “वनस्पतिरसैर्दिव्यैर्गन्धाढ्यैः सुमनोहरैः । रामचन्द्र महीपाल धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥” इस मन्त्र से भगवान् को दिव्य धूप अर्पण करना चाहिये । २०. दीप— “ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय वेधसे । गृहाण दीपकं राजन् त्रैलोक्यतिमिरापह ॥ इस मन्त्र से दीपक निवेदन करना चाहिये । २१. नैवेद्य—हाथ धोकर नैवेद्य समर्पण करना चाहिये । “इदं दिव्यान्रममृतं रसैः षड्भिः समन्वितम् । श्रीराम राम राजेन्द्र नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ कर्पूरवासितं तोयं सुवर्णकलशे स्थितम् । गृहाणाचमनं नाथ जानक्या सह राघव ॥” कर्पूरवासित जल सुवर्णकलश में रखकर जानकी के साथ श्रीराम को अर्पण करते हैं, इस मन्त्र से आचमन कराकर शालि का भात, दाल, हजारों प्रकार के शाक, दही, बड़ी, पकौड़ी, पूड़ी, मालपूआ, खीर, रबड़ी, हलुआ, जिलेबी, गुलाबजामुन, रसगुल्ला, पञ्चामृत, मक्खन, मिश्री आदि विविध प्रकार का नैवेद्य भगवान् श्रीराम को भोग लगाना चाहिये । २२. फल— “इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥” इस मन्त्र से भगवान् श्रीराम के सम्मुख आम, जामुन, नारङ्ग, एरण्ड, कपित्थ, पनस, दाडिम, गान्धार- दाडिम, सेव, कदली आदि फल समर्पण कर सभी परिवार के सहित भगवान् श्रीराम भोजन कर रहे हैं ऐसी भावना करनी चाहिये । अन्त में 'अमृतापिधानमसि स्वाहा' से आपोशान कराकर हस्तप्रक्षालन, मुखप्रक्षालन आदि कराना चाहिये । हाथ की चिकनाई दूर करने के लिए चन्दन देना चाहिये । ११५
९१४ रामायणमीमांसा परिशिष्ट २३. ताम्बूल— "नागवल्लीदलैर्युक्तं पूगीफलसमन्वितम् । ताम्बूलं गृह्यतां राम कर्पूरादिसमन्वितम् ॥" इस मन्त्र से ताम्बूल समर्पण करना चाहिये । २४. राजोपचार— "नृत्यगीतादिवाद्यानि (?) पुराणपठनादिभिः । राजोपचारैरखिलैः सन्तुष्टो भव राघव ॥" इस मन्त्र से छत्र, चामर, व्यजन, नृत्य, गीत, वाद्य, पुराणपठनादि राजोपचार समर्पण करने चाहिये । २५. उत्तरार्घ्य— "नमस्ते जानकीनाथ रामचन्द्र महीपते । पूर्णानन्दैकरूपस्त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से उत्तरार्घ्य समर्पण करना चाहिये । २६. नीराजन— "मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे । सङ्गहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से आरात्रिक्य समर्पण करना चाहिये । २७. प्रार्थना— "नमो भगवते श्रीरामायाथ परमात्मने । सर्वभूतान्तरस्थाय ससीताय नमो नमः ॥ नमो भगवते श्रीमद्रामचन्द्राय व्यापिने । सर्ववेदान्तवेद्याय ससीताय नमो नमः ॥ नमो भगवते श्रीमद्विष्णवे परमात्मने । परात्पराय रामाय ससीताय नमो नमः ॥" इस मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये । २८. दक्षिणा— "कार्तिकीपूर्णिमायांन्तु रासे राधामहोत्सवे । आविर्भूता दक्षिणांशात्तेन कृष्णस्य दक्षिणा ॥ यज्ञो दक्षिणया सार्धं पुत्रेण च फलेन च । कर्मिणां फलदाता चेत्येवं वेदविदो विदुः ॥" इस मन्त्र से दक्षिणा समर्पण करना चाहिये । २९. अपराधक्षमापन— "अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ॥" इस मन्त्र से अपराधक्षमापन करना चाहिये । ३०. समर्पण— "साधु वासाधु वा कर्म यद्यदा चरितं मया । तत्सर्वं कृपया देध गृहाणाराधनं मम ॥" इस मन्त्र से यह पूजारूप शुभ कर्म भगवान् को समर्पण करना चाहिये । ३१. पूर्णता की प्रार्थना— "प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद् विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
संख्या १ रामोपासना ११५ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥ इस मन्त्र से कर्मसम्पूर्णता की प्रार्थना भगवान् से करनी चाहिए । ३२. शान्तिपाठ— "स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः । गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥ काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी । देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः ॥ अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः । अधनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ॥ सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥" इस मन्त्र को पढ़कर सबके कल्याण के लिए भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए । अथाग्निमुखम्— "सूर्यग्रहणकाले तु नान्यदन्वेषितं भवेत् । सूर्यग्रहणकालेन समानो नास्ति कश्चन ॥ तत्र यद्यत्कृतं सर्वमनन्तफलदं भवेत् ।" अन्यथा गुरुशुक्रशुद्धौ शुभनक्षत्रयोगवारादिषु शुद्धाहात् प्रथमेऽहनि सङ्कल्पपूर्वकमुपोष्य अङ्कुरारोपणस्वस्ति- पुण्याहवाचननान्दीमुखश्राद्धादिपञ्चाङ्गं कर्म स्वगृह्यानुसारं विदधीत । मण्डपं निर्माय तत्र वेद्यां नीलपीतसीतासि- तैस्तण्डुलैः सर्वतोभद्रमुल्लिख्य धान्याञ्जलिद्वयं निधाय तीर्थोदपूरितं वस्त्रयुग्मवेष्टितं पञ्चरत्नसमन्वितं आम्राश्वत्थप्रसूनाढ्यं शाखाभिरुपेतं नारिकेलफलोपेतं कलशं मङ्गलैः स्थापयित्वा तत्र हरिमर्चयेत् । ऋग्यजुःसामसूक्तैः स्मातैः पौराणिकै- स्तान्त्रिकैर्वा मन्त्रैर्देवमर्चयित्वा वासःकुण्डलादिभूषणैर्ब्राह्मणान् वरयेत् । गुरुः भूतशुद्धयादिकं न्यासजातं च विधिवत् कुर्यात् । गन्धपुष्प-ताम्बूल-सद्वासो-भूषणादिकमन्नपानीयादिकं पुण्यस्त्रीभ्यो गृहस्थेभ्यो दद्यात् । रात्रौ जागरणं दिवा रात्रौ च त्रिकालं पूजयेत् । तथैव परेऽहनि विधिवद्रामं पूजयित्वाग्निकार्यं कुर्यात् । तत्रादौ मण्डप-कुण्ड-वेद्यादिकं विधिवन्निर्माय कुण्डस्थलं सम्यग्गोमयेनोपलिप्य सूपविष्टः प्राणानायम्य अनन्यधीर्मनसा मन्त्रं जपेत् । सङ्कल्प्य कुण्डे मध्यतस्तिस्रः पूर्वाग्रा उत्तराग्राश्चापरास्तिस्रो रेखाः कृत्वा षट्कोणे त्रिकोणे वा वह्निमादधीत । "प्रोक्ष्योपसार्य तत्पश्चाद् दत्त्वा विष्टरमादरात् । लक्ष्मोमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च ॥ ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।" विधिनाग्निं प्रमथ्य आहिताग्निगृहाद् वानीयाधाय कुशैः प्रज्वाल्य सम्प्रोक्ष्य क्रव्यादग्निं बहिष्कृत्य निरस्य यज्ञियैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेत् । प्राणानायम्य कुशाङ्कुरैः परिस्तीर्य स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिनामभिः पात्राण्या- साद्य इध्ममन्त्रेण तान्यपोक्ष्य पवित्रेण चोत्तानानि विधाय पुनः प्रोक्ष्य पात्रामानीय शुभाम्बुनाऽऽपूर्य तत्राक्षतान् पवित्रं च दत्वा उत्पूय उत्तरस्यां निधाय तत्र प्रणीतापात्रे विष्णुं ब्राह्मणंयुतं ब्रह्माणं च पूजयेत् । आज्यं संस्कृत्य विधिवत्स्रूक्स्रुवा- वोमिति ब्रुवन् । गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत् ।। एकैकस्य संस्कारस्य कृते तारेणाष्टावष्टौ जुहुयात् । अर्चितेऽग्नौ वौषडन्तं कर्म समाप्य कर्मान्तरं समारभ्य तदपि समापयेत् । इध्माधानादि आज्यभागौ पुनर्जुहुयात् । तत्राग्नौ वैष्णवं
९१६ रामायणमीमांसा परिशिष्ट चरुं श्रपयेत् । अत्राग्नौ साङ्गावरणं रामं पूजयेत् । समिदाज्यचरूणां प्रत्येकं षोडशाहुतीः मूलमन्त्रेण जुहुयात् । परिवारेभ्यो विनायकादिभ्यस्तिस्र आहुतीः, द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यः पुनस्तिस्र आहुतीराज्येन तत्तद्द्रव्यैश्च मनोहरै- द्वारपीठसुरेभ्यो जुहुयात् । अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः पृथक् पृथक् तिस्र आज्याहुतीर्दत्वा घृतेन स्विष्टकृतं हुत्वा जलेन विधिवत् समन्ततः परिषिञ्चेत् । प्रणीतामार्जनं कृत्वा स्ववित्तानुसारेण ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान् भोजयेत् । अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत् । एकीभूतं विचिन्त्य स्वस्तिवाचनं कारयेत् । विदुषामाशीर्वचो- भिरेधमानः हुतशेषं प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकं रामगायत्र्याभिमन्त्रितं तस्मै बलि हरेत् । इति अग्निमुखविधानम् । अथाभिषेकः—कलशस्थाय रामाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा शिष्यमुपानीय प्राणानायम्य भूतशुद्ध्यादिकं विधाय बहुभिः ब्राह्मणैः सह तं मूर्ध्नि अभिषिञ्चेत् । तत्र मन्त्राः— “सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । वासुदेवो जगन्नाथस्तथा सङ्कर्षणो विभुः ॥ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते । आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो वै निर्ऋतिस्तथा ॥ वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथाश्विनौ । ब्रह्मणा सहिता होते दिक्पालाः पान्तु ते सदा ॥ कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः । बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिर्माया निद्रा च भावना ॥ एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु तुष्टिः कान्तिः क्षमा तथा । आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधजीवसितार्कजाः ॥ ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः । देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च । देवपत्न्यो ध्रुवा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः ॥ अस्त्राणि चैव शस्त्राणि राजानो वाहनानि च । औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये ॥ सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदा नदाः । एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥” इति वशिष्ठसंहितोक्ता मन्त्रा रामार्चनचन्द्रिकायाम् । “नारायणः स्वयं रामः शिष्ये सन्निदधातु वै । सर्वंगः सर्वतोऽप्यस्ति प्रसीदतु दयानिधिः ॥ इति संस्मृत्य संस्मृत्य तज्जलैरभिषेचयेत् ।” इत्यभिषेकः । अथ मन्त्रदीक्षा— सुवासः परिधाय चन्दनाद्यवलिप्य कुण्डले अङ्गुलीयकञ्च धारयित्वा न्यसेत् । शिष्यशिरसि स्वस्य हस्तं दत्त्वा मनुमष्टोत्तरशतं जपित्वा उदकपूर्वकं मन्त्रं दद्यात् । आवयोस्तुल्यफलदो भवत्वैवमुदीरयेत् । प्रसन्नवदनो गुरुर्ज्योतिर्मयीं विद्यां शिष्ये गच्छन्तीं भावयेत् । शिष्यश्च तादृशीमागतां विद्यां भावयेत् ।
संख्या १ रामोपासना ११७ “कृतकृत्यस्तदा शिष्यः सर्वं तस्मै निवेदयेत् । यच्च यावच्च तद् भक्त्या गुरवे हृष्टचेतनः ॥ गोभूहिरण्यविपिनगृहक्षेत्रादिकं बहुः न चेदधं तदर्धं वा तद्दशांशमथापि वा ॥ अक्लेशादन्नवस्त्रादि दद्याद् वित्तानुसारतः । ब्राह्मणाशीर्वचोभिर्गुर्वाशीर्वचोभिः समेधितः कृतार्थः स्यात् ।। अथ संक्षेपतो दीक्षाप्रकारः— “मुहूर्ते सर्वतोभद्रे नवं कुम्भं निधाय च । सोदकं गन्धपुष्पाभ्यामचितं वस्त्रसंवृतम् ॥ सर्वौषधीपञ्चरत्नपञ्चपल्लवसंयुक्तम् । ततो देवार्चनं कृत्वा हुनेदष्टोत्तरं शतम् ॥ शिष्यं स्वलङ्कृतं वेद्यामुपाग्निमुपवेशयेत् । मन्त्रितं प्रोक्षणीतोयैः शान्तिकुम्भजलैस्तथा ।। मूलमन्त्रेणाष्टशतं मन्त्रितैरभिषेचयेत् । अथ सम्पादयन्मन्त्रं हस्तं शिरसि धारयन् ॥ समोऽस्त्वित्यक्षतान् दद्यादथ शिष्योऽर्चयेद् गुरुम् ।” अथ स्वधर्मनिष्ठा—“विना स्वधर्मं यत्किञ्चिद्देवताराधनादिकम् । सद्यो नश्येत् कृतं यस्मात् क्षणात्सैकतहर्म्यवत् ॥” स्वधर्म का पालन करते हुए ही देवता की आराधना करनी चाहिए । अन्यथा सैकतहर्म्य (बालू के महल) के तुल्य सब शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अथ प्रातःस्मरणम्—“ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय चिन्तयेद् रघुनन्दनम् । राम रामेति रामेति तारकाख्यं शुभं परम् ॥ श्रीपूर्वं जयमध्यस्थं द्विर्जयान्तं विचक्षणः ।” “प्रातः स्मरामि दिननायकवंशभूषणं वेदान्तवेद्यमभयं कृतराजवेषम् । वैदेहिलक्ष्मणयुतं स्वजनाभिरामं संसारसर्पगरलोपशमाय रामम् ॥ १ ॥ प्रातर्गृणामि चरितं दुरितं निहन्तुं रामस्य तस्य पलभक्षककृतान्तकस्य । यः सिन्धुबन्धकथया भवबन्धहन्ता राज्यं तनोति च विभीषणराज्यरत्या ॥ २ ॥ प्रातः करोमि कलिकल्मषनाशकर्म तच्छर्मदं भवतु भक्तिकरं परं मे । अन्तःस्थितेन सुखभानुचिदात्मकेन रामेण बाह्यगुरुदेहवता नियुक्तः ॥ ३ ॥” प्रातः सूर्यवंशभूषण, वेदान्तवेद्य, अभय, राजवेष धारण किये हुए, वैदेही और लक्ष्मण से युक्त, स्वजनाभि- राम, संसारसर्प के विष का शमन करनेवाले राम का मैं स्मरण करता हूँ । समुद्रबन्धन की कथा से भवबन्ध दूर करने वाले, राक्षसों का अन्त करनेवाले, विभीषण के राज्य की रति के कारण उसको राज्य प्रदान करनेवाले भगवान् राम के चरित्र का मैं प्रातः स्मरण करता हूँ । कलिकल्मष का नाश करनेवाला श्रीराम का कर्म मेरे लिए शान्ति तथा भक्ति देनेवाला हो । सब प्राणियों के अन्तःस्थित सुखरूप, सूर्यरूप और चिद्रूप से तथा बाहर श्रीगुरुदेहधारी राम से
९१८ रामायणमीमांसा परिशिष्ट नियुक्त होकर प्रातःकाल कलिकल्मष नाश करनेवाला कर्म करता हूँ जो श्रीराम को सुख देनेवाला तथा मुझे भक्ति देनेवाला हो । “अहं रामो न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् । सच्चिदानन्दरूपोऽहं नित्यमुक्तस्वभाववान् ॥” मैं स्वयंप्रकाश राम ही हूँ, ब्रह्म ही हूँ, शोकभाजन जीव नहीं हूँ । नित्यमुक्तस्वभाव सच्चिदानन्द ही मेरा स्वरूप है । “त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये ॥” हे त्रिलोकी को चेतना युक्त करनेवाले आदिदेव, हे लक्ष्मीकान्त, हे विष्णो, आपकी आज्ञा से ही मैं संसार यात्रा सम्पन्न कर रहा हूँ । धौताङ्घ्रिपाणिराचान्तः रामार्चनाङ्गतया स्नायात् । “स्वस्थितं पुण्डरीकाक्षं मन्त्रमूर्ति प्रभुं स्मरेत् । अनन्तादित्यसंकाशं वासुदेवं चतुर्भुजम् ॥ शङ्खचक्रगदापद्ममुकुटं वनमालिनम् । श्यामलं शान्तवदनं प्रसन्नं विश्वरूपिणम् ॥ तत्पादोदकजां धारां निपतन्तीं स्वमूर्धनि । चिन्तयेद् ब्रह्मरन्ध्रेण प्राविशन्तीं स्वकां तनुम् ॥ तया संक्षालयेत् सर्वमन्तर्देहगतं मलम् । तत्क्षणाद् विरजा मन्त्री जायते स्फटिकोपमः ॥ श्रीसूर्यमण्डलात् तीर्थमाकृष्याङ्कुशमुद्रया । वह्निमन्त्रेन चाप्लाव्य कवचेनावगुण्ठयेत् ॥ संरक्ष्यास्त्रेण मूलेन मन्त्रयेद् रुद्रसंख्यया । वारिक्षेपं ततः कुर्यादस्त्रेणार्कसंख्यया ॥ निमज्ज्य तस्मिन् ध्यायेच्छ्रीरामं भक्त्या जपन् मनुम् । सिसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः ॥ मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनन्तु माम् । शालग्रामशिलातोयं तुलसीगन्धमिश्रितम् ॥ कृत्वा शङ्खे भ्रामयंस्त्रिः प्रक्षिपेन्निजमूर्धनि ।” अथ आचमनविधिः— केशवाद्यैस्त्रिभिराचमनम् । द्वाभ्यां करक्षालनम् । द्वाभ्यामोष्ठसंमार्जनम् । एकेन हस्तक्षालनम् । एकेन पादप्रक्षालनम् । एकेन मूर्धसम्प्रोक्षणम् । ततः सङ्कर्षणादिभिः— “आस्यनासाक्षिकर्णांश्च नाभ्युरः कं भुजौ स्पृशेत् । एवमाचमनं कृत्वा साक्षान्नारायणो भवेत् ॥”
तानि चतुर्विंशतिनामानि यथा—(१) केशवाय नमः (२) नारायणाय नमः (३) माधवाय नमः (४) गोविन्दाय।नमः (५) विष्णवे नमः (६) मधुसूदनाय नमः (७) त्रिविक्रमाय नमः (८) वामनाय नमः (९) श्रीधराय नमः (१०) हृषीकेशाय नमः (११) पद्मनाभाय नमः (१२) दामोदराय नमः (१३) सङ्कर्षणाय नमः (१४) वासुदेवाय नमः (१५) प्रद्युम्नाय नमः (१६) अनिरुद्धाय नमः (१७) पुरुषोत्तमाय नमः (१८) अधोक्षजाय नमः (१९) नारसिंहाय नमः (२०) अच्युताय नमः (२१) जनार्दनाय नमः (२२) उपेन्द्राय नमः (२३) हरये नमः (२४) श्रीकृष्णाय नमः । अथ तिलकधारणम्— "ललाटे केशवं विद्यान्नारायणमथोदरे । माधवं हृदये ध्यायेद् गोविन्दं कण्ठकूपके ॥ उदरे दक्षिणे पार्श्वे विष्णुं व्यामं विचिन्तयेत् । तत्पार्श्वे बाहुमूले तु चिन्तयेन्मधुसूदनम् ॥ त्रिविक्रमं च तत्स्कन्धे वामपार्श्वे तु वामनम् । श्रीधरं बाहुके वामे हृषीकेशं तु कन्धरे ॥ अधरे पद्मनाभं च ककुद्दामोदरं न्यसेत् । तत्प्रक्षालनतोयेन वासुदेवेति मूर्धनि ॥" अथ सन्ध्याप्रकारः— रामात्मानं गुरुं ध्यात्वा जलमस्त्रेण संशोध्य कवचेनावगुण्ठ्य चक्रीकृत्य मूलेनाभिमन्त्र्य तत्र आवाहनादि- भिमुद्राभिस्तीर्थमावाह्य पूजयेत् । तद्यथा— "ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखे । तेन सत्येन मे देव तीर्थं देहि दिवाकर ॥ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥" इत्यावाह्य दक्षिणहस्ते जलमादाय मालामन्नुं सकृज्जपन् तज्जलं सव्यहस्ते विनिक्षिपेत् । तन्निःसृताम्बुना मूर्ध्नि सिञ्चेत् । तच्छेषं जलं दशाक्षरेणाभिमन्त्र्य पिबेत् । पुनरञ्जलिना जलमादाय मूर्ध्नि त्रिरुत्क्षिपेत् । सूर्यमण्डलस्थाय रामाय अर्घ्यं कल्पयेत् । रामोऽहमस्मीति गायत्रीं नियतो जपेत् । दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् । अस्याः श्रीरामगायत्र्या अगस्त्य ऋषिर्गायत्री च्छन्दः श्रीरामचन्द्रो देवता अर्ध्यार्थं विनियोगः । "सूर्यमण्डलमध्यस्थं रामं सीतासमन्वितम् । नमामि पुण्डरीकाक्षमाञ्जनेयगुरुं परम् ॥" इति ध्यात्वार्घ्यत्रयं कल्पयेत्— "नमस्ते रामदेवाय ज्योतिषां पतये नमः । साक्षिणे सर्वभूतानामत्यन्तानन्दमूर्तये ॥ रघुनाथाय दीनाय महाकारुणिकाय च । नमोस्तु कौशिकानन्ददायिने ब्रह्मरूपिणे ॥ स्तुवंश्च प्रणमेद् रामं यथाशक्त्या मुनीश्वर । कृत्वैतत् प्रत्यहं सम्यक् त्रिसन्ध्यञ्च यथाविधि ॥ कृतकृत्यो भवेन्मन्त्री सत्यं सत्यं न चान्यथा ।" ॥ इति सन्ध्या सम्पूर्णा ॥
१२० रामायणमीमांसा परिशिष्ट अथ दिनद्वितीयभागकृत्यम् —"दिवसस्य द्वितीयेऽंशे वेदस्याभ्यसनं चरेत् । मीमांसातर्कधर्मार्थशास्त्रादीनामपि द्विजः ॥ सालङ्कारः ससुमनाः सम्पश्येन्मङ्गलाष्टकम् । गोभृविप्राम्बुहेमद्युमणिस्नेहनृपानिह ॥” यो देवः पूजकश्चाथ पूजाद्रव्याणि तत्फलम् । प्राणबुद्ध्यादिकं सर्वं तस्मै रामात्मने नमः ॥" इति विभाव्य अगस्त्यसंहिताक्रमेण पूजयेत् । तद्यथा—“ॐ नमो रामभद्राय गं गणेशाय ते नमः । सं सवित्रे हौं शिवाय ऐं ह्रीं श्रीं परशक्तये ॥ ॐ दिं दीं दीपनाथाय क्षं क्षेत्रपतये नमः ॥ पुष्पाक्षतादिभिः पूज्याः श्रीरामद्वारदेवताः । षडङ्गाःपुरतः स्वस्मिन् प्रथमामर्चयेत् सुधीः ॥ द्वारश्रियै नमश्चोर्ध्वं देहल्यै तदधस्ततः । द्वारस्य शोभनस्याथ शाखयोर्दक्षवामयोः ॥ धात्रे विधात्रे गङ्गायै यमुनायै च पूर्वतः । ॐ भद्राय सुभद्राय गोदां कृष्णां च दक्षिणे ॥ ॐ चण्डाय प्रचण्डाय रेवां तापीं च पश्चिमे । शङ्खाय पद्मनिधये वेणीं वेणां तथोत्तरे ॥ चतुर्द्वारं सुसम्पूज्य गृहोपरि ततोऽर्चयेत् । गृहेशाय गृहायाथ कुलदेव्यै नमोऽस्त्विति ॥ नमः सशरशाङ्गय विनायकाय फण्नमः । आभ्यामन्तर्गतं पुष्पं शरयोगेन वामतः ॥ निःसार्य विघ्नसङ्घं त्रिः पार्ष्णिघातं समभ्ययेत् । देहलीमस्पृशन् दक्षपादपूर्वं प्रविश्य च ॥ शेषाय विद्यापीठाय वास्तुपुंसे नमोऽर्चयेत् ।” इति द्वारपूजा । अथासनविचारः— कृष्णाजिनव्याघ्रचर्मकौशेयकम्बलाद्यन्यतमं मृदु आसनमास्तीर्य पात्रासादनं कुर्यात् । विविधैः पुष्पैः पूर्णां पुष्पडालिकां दक्षिणे, तीर्थादिशुद्धवारिपूर्णं कलशं वामे, पुरतश्च शङ्खं करक्षालनाद्यर्थं पात्रं दर्पणच्छत्रचामरादीनि वामभागे तैलदीपं दक्षिणे घृतदीपं च स्थापयेत् । रुद्राक्ष-शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-पादुकाद्याकारेण परिणततुलसीकाष्ठरचितां मालिकां कण्ठे विधायार्चनमारभेत । "मौक्तिकं च प्रवालं च रुद्राक्षं तुलसीमणिम् । जपपूजनवेलायां धारयेद् यः स वैदिकः ॥ धारयेदक्षमालां च पद्माक्षं वाथ धारयेत् । कुर्यादाराधनं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः ॥”
संख्या १ रामोपासना १२१ अथ शुद्धिचतुष्टयम्— पुष्पाक्षतादिद्रव्याणां क्षालनादिना जन्त्वादिशुद्धिम्, अनुलेपाद्यैर्मू'तिशुद्धिम्, अव्यग्रत्वेन आत्मशुद्धिम्, मृद्गोम- यादिना मण्डलादिनिर्माणैर्भूमि'शुद्धिं च कुर्यात् । वेदिकां विलिप्य रक्तंनीलपीतैः सितासितैश्च तण्डुलैर्मण्डलं विधाय मध्ये षट्कोणं कोणाग्रै रुपशोभितं वृत्तत्रयम्, ततः परं चतुरस्रं तद्वहिराष्टदलं भूपुरत्रयं च निर्माय तत्र सिंहासनं न्यसेत् । “चन्द्रातपपताकैश्च तोरणैरपि सर्वतः । चित्रितं तत्र तत्रापि भित्तिस्तम्भस्थलादिषु ।। अणुमात्रं तु यः कुर्यान्मण्डलं राघवाग्रतः । मृद्गोमयैर्धातुभिर्वा सोऽनन्तफलमश्नुते ॥” पूजादिस्थानं त्रिः प्रोक्ष्य, पृथिवीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसनस्थापने विनियोगः । [L
१२२ रामायणमीमांसा परिशिष्ट भूतशुद्धौ विशेषो यथा अथ भूतोपसंहारः— "पादाद्याजान्वम्बुजान्तां पीतां द्रुहिणदेवताम् । चतुरस्रां पञ्चगुणां ह्नां ह्रः फट् भुवं जले ॥” जान्वाद्या नाभिपद्मान्ताश्चेतदर्धेन्दुवैष्णवम् । रसरूपस्पर्शशब्दं वं ह्रीं ह्रः फट् जलं शुचौ ॥ नाभ्या हृदन्तं प्राद्युम्नं त्रिकोणं स्वस्तिकारुणम् । वह्नि रूपरसस्पर्शं रं ह्रूं ह्रः फट् समीरणे ॥ भ्रूपर्यन्तं हृदो वायोः षड्बिन्दु स्पर्शशब्दवत् । वृत्तं सांकर्षणं धूम्रं यं ह्रैं ह्रः फट् विहायसि ॥ भ्रूमध्याद् ब्रह्मरन्ध्रान्तं वासुदेवं सशब्दकम् । हं ह्लौं ह्रः फदहङ्कारे हं महत्सत्त्वके च तत् ॥ प्रकृतौ तां च रामाख्ये परे ब्रह्मणि संहरेत् ।” ॥ इति भूतोपसंहारः ॥ अथ भूतशुद्धिः— "शरीररूपभूतानां भूतानां यद्विशोधनम् । अव्यक्तब्रह्मसम्पर्काद् भूतशुद्धिरियं मता ॥” शरीररूप में परिणत भूतों का लयक्रम से अव्यक्त ब्रह्मरूपता सम्पादन द्वारा संशोधन ही भूतशुद्धि है । नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म की भावना करके मूलाज्ञान और उसके कारण उत्पन्न जन्मादि दुःखप्रद पापपुरुष को वामकुक्षि में भावना करनी चाहिये । पापपुरुष के सिर ब्रह्महत्या, भुजाएँ स्वर्णस्तेय, सुरापान हृदय, गुरुतल्पगमन कटि, तत्संसर्ग पाद एवं उपपातक रोम हैं । वह अत्यन्त क्रूर अतिभीषण काले वर्ण का है । उसकी आँखें और दाढ़ी लाल हैं । वह अचेतन है । उसका सिर नीचे की ओर है । उसने खड्ग और चर्म धारण कर रखे हैं । उसका चिन्तन करके— “महापातकपञ्चाङ्गं पातकोपाङ्गसंश्रयम् । उपपातकरोमाणं कृष्णं क्रूरातिभीषणम् ॥” वाम नासिका से पूरक करते हुए ‘यं’ वायुबीज से पापपुरुष का शोषण, ‘रं’ कुम्भक में उसका दहन और रेचक में ‘वं’ अमृतबीज से पीयूषप्रवाह में उस भस्म को प्लावित कर उसे बहिष्कृत कर देना चाहिये । वाग्बीज से या पञ्चमहाभूतबीज से पञ्चमहाभूतों का कारण में विलयन ही पापपुरुष के भस्म का प्लावन है । अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्मरन्ध्रसहस्राब्ज में स्थित श्रीराम की प्रेरणा से वं बीज द्वारा महदादिक्रमेण पञ्चभूतों का उत्पादन कर दिव्यदेह निर्माण कर परमात्मस्वरूप के साथ एकीभूत जीवकला को हंसः सोहं मन्त्र से हृदय में स्थापित करना चाहिये । अथ प्राणप्रतिष्ठा—अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि अतिच्छन्दो वा छन्दः प्राणो देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रों कीलकम् प्राणप्रतिष्ठायां विनियोगः । ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि । ऋग्यजुःसामच्छन्दोभ्यो नमो मुखे । प्राणदेवतायै नमो हृदये । आं बीजाय नमो गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । क्रों कीलकाय नमो लिङ्गे ।
आं ह्रीं क्रों ॐ अं कं खं गं घं ङं आं पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशात्मने अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । आं ह्रीं क्रों ॐ इं चं छं जं झं ञं ईं शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मने तर्जनीभ्यां नमः । आं ह्रीं क्रों ॐ उं टं ठं डं ढं णं ऊं श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणात्मने मध्यमाभ्यां नमः । आं ह्रीं क्रों ॐ एं तं थं दं धं नं ऐं वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मने अनामिकाभ्यां नमः । आं ह्रीं क्रों ॐ ओं पं फं बं भं मं औं वक्तव्यादानगमनविसर्गानन्दात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः । आं ह्रीं क्रों ॐ अं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः मनोबुद्धयहङ्कारचित्तात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिषडङ्गन्यासान् विधाय— आं नाभेराधः । ह्रीं हृदयादिनाभिपर्यन्तम् । क्रों मस्तकादिहृदयपर्यन्तम् । यं त्वगात्मने नमो हृदि । रं असृगात्मने नमो दक्षदोर्मूले । लं मांसात्मने नमः ककुदि । वं मेदआत्मने नमो वामांसे । शं अस्थ्यात्मने नमो हृदयादि- पाणियुगले । षं मज्जात्मने नमो हृदयादिपाद्युगले । सं शुक्रात्मने नमो जठरे । हं प्राणात्मने नम आनने । लं जीवात्मने नमो व्यापकम् । हृदि अङ्गुष्ठं दत्त्वा आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः सोहं मम प्राणा इह प्राणाः । पुनरेतान्येव बीजाक्युच्चार्य मम जीव इह स्थितः । पुनरेतान्येव बीजान्युच्चार्य मम सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि । पुनरेतान्येव बीजान्यु- च्चार्य मम वाङ्मनस्त्वक्चक्षुर्जिह्वाश्रोत्रघ्राणप्राणाः सर्वे इहागत्य स्वस्तये चिरं सुखेन तिष्ठन्तु स्वाहा । अथ प्राणशक्तेर्ध्यानम्— "रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुणसरोजाधिरूढा कराब्जैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवमथ गुणमप्यङ्कुशं पञ्चबाणान् । बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः ॥" ततो जन्मादिषोडशसंस्कारसिद्ध्यर्थं षोडशवारं प्रणवं जपित्वा परां शक्तिं स्मरेत् भगवन्नामोच्चारणं च कुर्यात् । "यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥" ( इति प्राणप्रतिष्ठा ) अथ निवृत्त्यादिन्यासः—अं निवृत्त्यै नमो मौलौ । आं प्रतिष्ठायै नमो मुखवृत्ते । इं विद्यायै नमो दक्षिणनेत्रे । ईं ईशानायै नमो वामनेत्रे । उं इन्धिकायै नमो दक्षिणकर्णे । ऊं दीपिकायै नमो वामकर्णे । ऋं रेचिकायै नमो दक्षिण- नासापुटे । ॠं मोचिकायै नमो वामनासापुटे । लूं परायै नमो दक्षिणकपोले । लॄं सूक्ष्मायै नमो वामकपोले । एं मृडायै नमो ऊर्ध्वोष्ठे । ऐं ज्ञानायै नमः अधरोष्ठे । ओं आप्यायिन्यै नमः ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ । औं व्यापिन्यै नमः अधोदन्त- पङ्क्तौ । अं व्योमरूपायै नमो मूर्ध्नि । अः अनन्तायै नमः मुखमध्ये जिह्वायां च । कं सृष्ट्यै नमः दक्षबाहुमूले । खं ऋद्ध्यै नमः कूर्परे । गं स्मृत्यै नमो मणिबन्धे । घं मेधायै नमः अङ्गुलिमूले । ङं कान्त्यै नमः अङ्गुल्यग्रे । चं लक्ष्म्यै नमो वामबाहुमूले । छं द्युत्यै नमः कूर्परे । जं स्थिरायै नमो मणिबन्धे । झं स्थित्यै नमः अङ्गुलिमूले । ञं सिद्ध्यै नमः अङ्गुल्यग्रे । टं जरायै नमो दक्षपादमूले । ठं पालिन्यै नमो जानुनि । डं क्षान्त्यै नमो गुल्फे । ढं ऐश्वर्यै नमः अङ्गुलि- मूले । णं रत्यै नमः अङ्गुल्यग्रे । तं कामिकायै नमो वामपादमूले । थं वरदायै नमो जानुनि । दं आह्लादिन्यै नमः गुल्फे । धं प्रीत्यै नमः अङ्गुलिमूले । नं दीर्घायै नमः अङ्गुल्यग्रे । पं तीक्ष्णायै नमः दक्षपार्श्वे । बं अभयायै नमः पृष्ठे । भं निद्रायै नमः नाभौ । मं तन्द्रायै नमः उदरे । यं क्षुधायै नमः हृदि । रं क्रोधिन्यै नमो दक्षदोर्मूले । लं क्रियायै नमः
ककुदि । वं उल्कायै नमः वामबाहुमूले । शं मृत्यवे नमः हृदादिदक्षकरे । षं पीतायै नमः हृदादिवामकरे । सं श्वेतायै नमः हृदादिदक्षिणचरणे । हं अरुणायै नमः हृदादिवामचरणे । लं असितायै नमः जठरे । क्षं अनन्तायै नमः मुखे । अथ अष्टात्रिंशत्कलान्यासः— (१) अं अमृतायै नमो दक्षबाहुमूले । (२) आं आनन्दायै नमः कूर्परे (३) इं पूषायै नमः मणिबन्धे (४) ईं तुष्ट्यै नमः अङ्गुलिमूले (५) उं पुष्ट्यै नमः अङ्गुल्यग्रे (६) ऊं रत्यै नमः वामबाहुमूले (७) ऋं धृत्यै नमः कूर्परे (८) ॠं शशिन्यै नमः मणिबन्धे (९) ऌं चन्द्रिकायै नमः अङ्गुलिमूले (१०) ॡं कान्त्यै नमः अङ्गुल्यग्रे (११) एं ज्योत्स्नायै नमः दक्षपादमूले (१२) ऐं श्रियै नमः दक्षजानुनि (१३) ओं प्रीत्यै नमः दक्षगुल्फे (१४) औं अङ्गदायै नमः दक्षपादाङ्गुलिमूले (१५) अं पूर्णायै नमः दक्षपादाङ्गुल्यग्रे (१६) अः पूर्णामृतायै नमः सर्वाङ्गे (१७) क भं तपिन्यै नमः दक्षबाहुमूले (१८) ख बं तापिन्यै नमः कूर्परे (१९) गं फं धूम्रायै नमः मणिबन्धे (२०) घं पं मरीच्यै नमः अङ्गुलिमूले । (२१) ङं नं ज्वालिन्यै नमः अङ्गुल्यग्रे । (२२) चं धं रुच्यै नमः वामबाहुमूले (२३) छं दं सुषुम्णायै नमः कूर्परे (२४) जं थं भोगदायै नमः मणिबन्धे (२५) झं तं विश्वायै नमः अङ्गुलिमूले (२६) ञं णं बोधिन्यै नमः अङ्गुल्यग्रे (२७) टं ढं धारिण्यै नमः दक्षपादमूले (२८) ठं डं क्षमायै नमः दक्षजानुनि (२९) यं धूम्रार्चिषे नमः दक्षगुल्फे (३०) रं ऊष्मायै नमः दक्षाङ्गुलिमूले (३१) लं ज्वालिन्यै नमः दक्षाङ्गुल्यग्रे (३२) वं ज्वालामालिन्यै नमः वामपादमूले (३३) शं विस्फुलिङ्गिन्यै नमः वामजानुनि (३४) षं सुश्रियै नमः वामगुल्फे (३५) सं सुरूपायै नमः वामाङ्गुलिमूले (३६) हं कमलायै नमः वामाङ्गुल्यग्रे (३७) ळं हव्यवाहनायै नमः मस्तके (३८) क्षं कव्यवाहनायै नमः इति व्यापकम् । अथ केशवादिमातृकान्यासः—अस्य श्रीकेशवादिमातृकान्यासस्य साध्यनारायण ऋषिः देवीगायत्री च्छन्दः श्रीमहालक्ष्मीनारायणो देवता हलो बीजं स्वराः शक्तिः दृष्टार्थे न्यासे विनियोगः । ॐ श्रीं ॐ नमो नारायणाय हंसः सोहं अं कं खं गं घं ङं आं ह्रीं सोहं हंसः ॐ नमो नारायणाय बुद्धोल्काय स्वाहा श्रीं देव्यै हृदयाय नमः, हृदये । ॐ श्रीं ॐ नमो नारायणाय हंसः सोहं इं चं छं जं झं ञं ईं ह्रीं सोहं हंसः ॐ नमो नारायणाय महोल्काय स्वाहा श्रीं पद्मिन्यै नमः शिरसे स्वाहा, शिरसि । ॐ श्रीं ॐ नमो नारायणाय हंसः सोहं उं टं ठं डं ढं णं ऊं ह्रीं सोहं हंसः ओं नमो नारायणाय वीरोल्काय स्वाहा श्रृं विष्णुपत्न्यै नमः शिखायै वषट् । ॐ श्रीं ॐ नमो नारायणाय हंसः सोहं एं तं थं दं धं नं ऐं ह्रीं सोहं हंसः ॐ नमो नारायणाय विद्युदुल्काय स्वाहा श्रों वरदायै नमः कवचाय हुम् । ॐ श्रीं ॐ नमो नारायणाय हंसः सोहं ओं पं फं बं भं मं औं ह्रां सोहं हंसः अं नारायणाय सहस्रोल्काय स्वाहा श्रौं कमलरूपायै नमः नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ श्रीं ओं नमः नारायणाय हंसः सोहं अं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः ह्रीं सोहं हंसः ॐ नमो नारायणाय अनन्तोल्काय स्वाहा श्रः शूलिन्यै नमः अस्त्राय फट् । इति षडङ्गन्यासः । अथ केशवादिमातृकाध्यानम्— “विद्युदरविन्दमुकुरामृतकुम्भपद्मकोमोदकीदरसुदर्शनशोभिहस्तम् । सौदामिनीमुकुरकान्तिविकामिलक्ष्मीनारायणात्मकमखण्डितमादिमूर्तिम् ॥” (१) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं क्लीं श्रीं ह्रीं केशवाय कीर्त्यै नमो मौलौ । (२) ,, ,, आं ,, नारायणाय कान्त्यै नमो मुखवृत्ते । (३) ,, ,, इं ,, माधवाय तुष्ट्यै नमो दक्षिणनेत्रे । (४) ,, ,, ईं ,, गोविन्दाय पुष्ट्यै नमो वामनेत्रे । (५) ,, ,, उं ,, विष्णवे धृत्यै नमो दक्षिणकर्णे ।
संख्या १ रामोपासना १२५ ( ६ ) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऊं क्लीं श्रीं ह्रीं मधुसूदनाय क्षान्त्यै नमो वामकर्णे । ( ७ ) ,, ,, ऋं ,, त्रिविक्रमाय क्रियायै नमो दक्षिणनासापुटे ( ८ ) ,, ,, ॠं ,, वामनाय दयायै नमो वामनासापुटे । ( ९ ) ,, ,, लृं ,, श्रीधराय मेघायै नमो दक्षकपोले । ( १० ) ,, ,, ॡं ,, हृषीकेशाय हर्षायै नमो वामकपोले । ( ११ ) ,, ,, एं ,, पद्मनाभाय श्रद्धायै नमो ऊर्ध्वोष्ठे । ( १२ ) ,, ,, ऐं ,, दामोदराय लज्जायै नमोऽधरोष्ठे । ( १३ ) ,, ,, ओं ,, सङ्कर्षणाय सरस्वत्यै नमो ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ । ( १४ ) ,, ,, औं ,, वासुदेवाय लक्ष्म्यै नमोऽधोदन्तपङ्क्तौ । ( १५ ) ,, ,, अं ,, प्रद्युम्नाय प्रीत्यै नमो मूर्ध्नि । ( १६ ) ,, ,, अः ,, अनिरुद्धाय रत्यै नमो मुखमध्ये जिह्वायाम् । ( १७ ) ,, ,, कं ,, चक्रिणे जयायै नमो दक्षबाहुमूले । ( १८ ) ,, ,, खं ,, गदिने दुर्गायै नमो दक्षकूर्परे । ( १९ ) ,, ,, गं ,, शार्ङ्गिणे प्रभायै नमो दक्षमणिबन्धे । ( २० ) ,, ,, घं ,, खड्गिने सत्यायै नमो दक्षाङ्गुलिमूले । ( २१ ) ,, ,, ङं ,, शङ्खिने चण्डायै नमो दक्षाङ्गुल्यग्रे । ( २२ ) ,, ,, चं ,, हलिने वाण्यै नमो वामबाहुमूले । ( २३ ) ,, ,, छं ,, मुसलिने विलासिन्यै नमो वामकूर्परे । ( २४ ) ,, ,, जं ,, शूलिने विजयायै नमो वाममणिबन्धे । ( २५ ) ,, ,, झं ,, पाशिने विरजायै नमो वामाङ्गुलिमूले । ( २६ ) ,, ,, ञं ,, अङ्कुशिने विश्वायै नमो वामाङ्गुल्यग्रे । ( २७ ) ,, ,, टं ,, मुकुन्दाय विमदायै नमो दक्षपादमूले । ( २८ ) ,, ,, ठं ,, नन्दजाय सुनन्दायै नमो दक्षजानुनि । ( २९ ) ,, ,, डं ,, नन्दाय स्मृत्यै नमो दक्षगुल्फे । ( ३० ) ,, ,, ढं ,, नादाय ऋद्धधै नमो दक्षपादाङ्गुलिमूले । ( ३१ ) ,, ,, णं ,, नरकजिते समृद्धधै नमो दक्षपादाङ्गुल्यग्रे । ( ३२ ) ,, ,, तं ,, हरये शुद्धधै नमो वामपादमूले । ( ३३ ) ,, ,, थं ,, कृष्णाय भुक्त्यै नमो वामजानुनि । ( ३४ ) ,, ,, दं ,, सत्याय मुक्त्यै नमो वामगुल्फे । ( ३५ ) ,, ,, धं ,, सात्वताय मत्यै नमो पादाङ्गुलिमूले । ( ३६ ) ,, ,, नं ,, शौरिणे क्षमायै नमो वामपादाङ्गुल्यग्रे । ( ३७ ) ,, ,, पं ,, शूराय परमायै नमो दक्षपार्श्वे । ( ३८ ) ,, ,, फं ,, जनार्दनाय उमायै नमो वामपार्श्वे । ( ३९ ) ,, ,, बं ,, भूधराय क्लेदिन्यै नमः पृष्ठे । ( ४० ) ,, ,, भं ,, विश्वमूर्तये क्लिन्नायै नमो नाभौ । ( ४१ ) ,, ,, मं ,, वैकुण्ठाय वसुदेवायै नमो जठरे ।
९२६ रामायणमीमांसा परिशिष्ट ( ४२ ) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यं क्लीं श्रीं ह्रीं त्वगात्मने पुरुषोत्तमाय वसुधायै नमो हृदि । ( ४३ ) ,, ,, रं ,, असृगात्मने बलिने परायै नमो दक्षदोर्मूले । ( ४४ ) ,, ,, लं ,, मांसात्मने बलानुजाय परायणायै नमः ककुदि । ( ४५ ) ,, ,, वं ,, मेदआत्मने बलाय सूक्ष्मायै नमो वामबाहुमूले । ( ४६ ) ,, ,, शं ,, अस्थ्यात्मने वृषघ्नाय सन्ध्यायै नमो हृदादिदक्ष- करान्तम् । ( ४७ ) ,, ,, षं ,, मज्जात्मने वृषाय प्रज्ञायै नमो हृदादिवामकरान्तम् । ( ४८ ) ,, ,, सं ,, शुक्रात्मने हंसाय प्रभायै नमो हृदादिदक्षिण- चरणान्तम् । ( ४९ ) ,, ,, हं ,, प्राणात्मने वराहाय निशायै नमो हृदादिवाम- चरणान्तम् । ( ५० ) ,, ,, लं ,, क्रियाशक्त्यात्मने विमलाय अमोघायै नमो जठरे । ( ५१ ) ,, ,, क्षं ,, परमात्मने नृसिंहाय विद्युतायै नमो मुखे । “केशवादिरयं न्यासो न्यासमात्रेण देहिनाम् । अच्युतत्वं ददात्येव सत्यं सत्यं न चान्यथा ॥” इति केशवादिमातृकान्यासः । अथ श्रीकण्ठादिमातृकान्यासः— “वाङ्मायाद्यादिकान् वर्णान् मातृकायाः सबिन्दुकान् । श्रीकण्ठादीनथादित्यान् न्यसेत् स्थानेषु तेषु हि ॥” अस्य श्रीकण्ठादिमातृकान्यासस्याम्बरीष ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः अर्धनारीश्वरो देवता । हलो बीजानि स्वराः शक्तयः ज्ञानविज्ञानार्थे न्यासे विनियोगः । ( १ ) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अं कं खं गं घं ङं आं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । (हृदयाय नमः) ( २ ) ,, ,, इं चं छं जं झं ञं ईं तर्जनीभ्यां नमः । (शिरसे स्वाहा) ( ३ ) ,, ,, उं टं ठं डं ढं णं ऊं मध्यमाभ्यां नमः । (शिखायै वषट् ) ( ४ ) ,, ,, एं तं थं दं धं नं ऐं अनामिकाभ्यां नमः । (कवचाय हुम् ) ( ५ ) ,, ,, ओं पं फं बं भं मं औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । (नेत्रत्रयाय वौषट् ) ( ६ ) ,, ,, अं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । (अस्त्राय फट् ) एवं करादिन्यासान् हृदयादिषडङ्गन्यासांश्च विधाय ध्यायेत् । तद्यथा— “सिन्दूरकाञ्चनसमोभयभागमर्धनारीश्वरं गिरिसुताहरभूषचिह्नम् । पाशाभयाक्षवलयेष्टदहस्तमीशं स्मृत्वा न्यसेत् सकलवाञ्छितवस्तुसिद्धयै ॥” (१) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अं श्रीकण्ठेशपूर्णोदरीभ्यां नमः । मौलौ—इत्यादि केशवादिमातृकान्यासवत्स्थानेषु न्यसेत् । (२) ,, ,, आं अनन्तेशविरजाभ्यां नमः । (३) ,, ,, इं सूक्ष्मेशशाल्मलिभ्यां नमः ।
संख्या १ रामोपासना १२७ (४) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ईं त्रिमूर्तीशलोलाक्षीभ्यां नमः । (५) ,, ,, उं अमरेश्वरवर्तुलाक्षीभ्यां नमः । (६) ,, ,, ऊं अधीशदीर्घघोणाभ्यां नमः । (७) ,, ,, ऋं भारभूतेशदीर्घघोणाभ्यां नमः । (८) ,, ,, ॠं अतिथिशदीर्घमुखीभ्यां नमः । (९) ,, ,, ऌं स्थाण्वीशदीर्घजिह्वाभ्यां नमः । (१०) ,, ,, ॡं हरेशकुण्डोदरीभ्यां नमः । (११) ,, ,, एं झिण्टीशोध्वंकेशिनीभ्यां नमः । (१२) ,, ,, ऐं भौतिकेशविकृतमुखीभ्यां नमः । (१३) ,, ,, ओं सद्योजातेशज्वालामुखीभ्यां नमः । (१४) ,, ,, औं अनुग्रहेशोल्कामुखीभ्यां नमः । (१५) ,, ,, अं क्रूरेशश्रीमुखीभ्यां नमः । (१६) ,, ,, अः महासेनेशविद्यामुखीभ्यां नमः । (१७) ,, ,, कं क्रोधीशमहाकालीभ्यां नमः । (१८) ,, ,, खं चण्डेशसरस्वतीभ्यां नमः । (१९) ,, ,, गं पञ्चान्तकेशगौरीभ्यां नमः । (२०) ,, ,, घं शिवोत्तमेशत्रैलोक्यविद्याभ्यां नमः । (२१) ,, ,, ङं एकरूद्रेशमन्त्रशक्तिभ्यां नमः । (२२) ,, ,, चं कूर्मेशात्मशक्तिभ्यां नमः । (२३) ,, ,, छं एकनेत्रेशभूतमातृभ्यां नमः । (२४) ,, ,, जं चतुराननेशलम्बोदरीभ्यां नमः । (२५) ,, ,, झं अजेशद्राविणीभ्यां नमः । (२६) ,, ,, ञं सर्वेशनागरीभ्यां नमः । (२७) ,, ,, टं सोमेश्वरखेचरीभ्यां नमः । (२८) ,, ,, ठं लाङ्गलीशमञ्जरीभ्यां नमः । (२९) ,, ,, डं दारुकेशरूपिणीभ्यां नमः । (३०) ,, ,, ढं अर्धनारीश्वरेशवीरिणीभ्यां नमः । (३१) ,, - ,, णं उमाकान्तेशवृकोदरीभ्यां नमः । (३२) ,, ,, तं आषाढीशपूतनाभ्यां नमः । (३३) ,, ,, थं दण्डीशभद्रकालीभ्यां नमः । (३४) ,, ,, दं अत्रीशयोगिनीभ्यां नमः । (३५) ,, ,, धं मीनेशशङ्खिनीभ्यां नमः । (३६) ,, ,, नं मेषेशगर्जनीभ्यां नमः । (३७) ,, ,, पं लोहितेशकालरात्रिभ्या नमः । (३८) ,, ,, फं शिखीशकुण्डिनीभ्यां नमः । (३९) .. ,, बं बगलेशकपर्दिनीभ्यां नमः ।
९२८ रामायणमीमांसा परिशिष्ट (४०) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भं द्विरदेशजायाभ्यां नमः । (४१) ,, ,, मं महाकालेशाजयाभ्यां नमः । (४२) ,, ,, यं त्वगात्मने वालीशसुमुखेश्वरीभ्यां नमः । (४३) ,, ,, रं असृगात्मने भुजङ्गेशरेवतीभ्यां नमः । (४४) ,, ,, लं मांसात्मने पिनाकीशमाधवीभ्यां नमः । (४५) ,, ,, वं मेदआत्मने खड्गीशवारुणीभ्यां नमः । (४६) ,, ,, शं अस्थ्यात्मने बकेशवायवीयाभ्यां नमः । (४७) ,, ,, षं मज्जात्मने श्वेतेशरक्षोधरिणीभ्यां नमः । (४८) ,, ,, सं शुक्रात्मने भृग्वीशसहजाभ्यां नमः । (४९) ,, ,, हं प्राणात्मने नकुलीशलक्ष्मीभ्यां नमः । (५०) ,, ,, ळं शक्त्यात्मने संवर्तकेशमहामायाभ्यां नमः । (५१) ,, ,, क्षं क्रोधात्मने शिवेशव्यापिनीभ्यां नमः । “शुद्धा सबिन्दुकायुक्ता कलादिः केशवादिभिः । श्रीकण्ठमातृका चात्र न्यासेऽङ्गे पञ्चमी स्मृता ॥ रुद्रैर्युक्तां केवलां वा मतूनां कर्मारम्भे मातृकां विन्यसेद् यः । मन्त्राः सर्वे कुर्वते तस्य सिद्धिं दोषैः सार्धं याति नाशं जरा च ॥” इति श्रीकण्ठादिमातृकान्यासः । अथ बृहत्तत्त्वन्यासः— “अथ तत्त्वं प्रवक्ष्यामि तत्त्वन्यासं तदर्थिनाम् । यत्तुनत्त्वन्यासमात्रेण तत्त्वमेव प्रजायते ॥” ॐ मं नमः पराय जीवात्मने नमः, ॐ भं नमः पराय प्राणात्मने नमः, एतद्द्वयं सर्वाङ्गे । ॐ बं नमः पराय बुद्ध्यात्मने नमः, ॐ फं नमः पराय अहङ्कारात्मने नमः, ॐ पं नमः पराय मनआत्मने नमः, एतत्त्रयं हृदये । ॐ नं नमः पराय शब्दात्मने नमो मूर्ध्नि । ॐ धं नमः पराय स्पर्शात्मने नमो मुखे । ॐ दं नमः पराय रूपात्मने नमो हृदये । ॐ थं नमः पराय रसात्मने नम उपस्थे । ॐ तं नमः पराय गन्धात्मने नमः पादयोः । ॐ णं नमः पराय श्रोत्रात्मने नमः श्रोत्रयोः । ॐ ढं नमः पराय वागात्मने नमस्त्वचि । ॐ डं नमः पराय चक्षुरात्मने नमश्चक्षुषोः । ॐ ठं नमः पराय जिह्वात्मने नमो जिह्वायाम् । ॐ टं नमः पराय घ्राणात्मने नमो घ्राणे । ॐ ञं नमः पराय वागात्मने नमो वाचि । ॐ झं नमः पराय पाण्यात्मने नमः पाण्योः । ॐ जं नमः पराय पाद्वात्मने नमः पायौ । ॐ छं नमः पराय पादात्मने नमः पादयोः । ॐ चं नमः पराय उपस्थात्मने नमः उपस्थे । ॐ ङं नमः पराय आकाशात्मने नमो मूर्ध्नि । ॐ घं नमः पराय वाय्वात्मने नमो मुखे । ॐ गं नमः पराय तेजात्मने नमो हृदये । ॐ खं नमः पराय सलिलात्मने नमो गुह्ये । ॐ कं नमः पराय पृथिव्यात्मने नमः पादयोः । ॐ शं नमः पराय हृत्पुण्डरीकात्मने नमो गुह्ये । ॐ हं नमः पराय सोममण्डलात्मने षोडशकलात्मने । ॐ सं नमः पराय सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने, ॐ रं नमः पराय वह्निमण्डलाय दशकलात्मने, एतत्रितयं हृदि । ॐ षं नमः पराय परमेष्ठ्यात्मने वासुदेवाय नमो मूर्ध्नि । ॐ यं नमः पराय पुरुषात्मने सङ्कर्षणाय नमो मुखे । ॐ वं नमः पराय विश्वात्मने प्रद्युम्नाय नमो हृदये । ॐ लं नमः पराय निवृत्त्यात्मने अनिरुद्धाय नमो गुह्ये । ॐ क्षं नमः पराय सर्वात्मने नारायणाय नमः पादयोः । ॐ क्षौं नमः पराय कोपात्मने नृसिंहाय नमः इति व्यापकम् ।