रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
अष्टमस्तरङ्गः १८३ ज्योतिष्काबीजतैलं खलु विधिविहितं श्लक्ष्णचूर्णं वचायाः गव्यञ्चाज्यं नवीनं दधिभवममलं तुल्यमेतत्त्रयं स्यात् । पामारिनष्टगन्धद्वितयपरिमितः सेवितो मासमात्रं यक्ष्माणञ्चान्त्रशोषं हरति हि चपलं गण्डमालाञ्चभीष्माम् ॥ ४७ ॥ दिव्या दृष्टिः सन्ततं वार्यवृद्धिश्चिरो तुष्टिर्निर्भरं देहपुष्टिः । शौर्योत्कर्षो जायते वज्रमुष्टिर्नष्टातङ्को मासमात्रप्रयोगात् ॥ ४८ ॥ कोलैकप्रमितं गन्धमूर्ध्वपातनशोधितम् । नवकोलप्रमितया स्वच्छया सितया सह ॥ ४९ ॥ श्लक्ष्णं पिष्ट्वा निर्मलायां काचकुप्यां भिषग्वरः । न्यस्य काचपिधानेन मुखं त्वस्याः प्ररोधयेत् ॥ ५० ॥ गुञ्जैकप्रमिता मात्रा शीतलेन जलेन वै । काले संसेविता तूर्णं शुक्रदोषं विनाशयेत् ॥ ५१ ॥ जलवत्तद्रवं शुक्रं नष्टगन्धं तथैव च । विशुद्धं फलवत्सान्द्रं मधुगन्धि करोति हि ॥ ५२ ॥ मृदारशृङ्गं सौभाग्यं कर्पूरं गन्धकन्तथा । सर्व मेतत्समं ग्राह्यं चूर्णमेषां प्रकल्पयेत् ५३ ॥ नारिकेलस्य तैलेन परिलिप्ता ह्यनारतम् । पामा नश्यति सप्ताहाच्चिरजापि सुदारुणा ॥ ५४ ॥ सौभाग्यं शालनिर्यासः स्फुटिका च सुगन्धिकः । सर्वं समं समादाय चूर्णयेद् भिषजाग्रणीः ॥ ५५ ॥ निम्बूकस्वरसेनाथ सततं परिलेपनात् । विद्रावयति दद्रूणि द्रुतं नास्तीह संशयः ॥ ५६ ॥ शाल्मलीलघुमूलस्य चूर्णेन विमलं बलिम् । भक्षयेन्मासमेकन्तु शौर्यं वीर्यं विवर्धयेत् ॥ ५७ ॥ विशोधितं गन्धकं तु मधुना परिशीलितम् । धात्रीरसानुपानेन गलत्कुष्ठं निहन्त्यलम् ॥ ५८ ॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—एवं शुद्धो गन्धः लेपनाद् आमवातगृध्रसीना- शकः । ऊर्ध्वगान् ऊर्ध्वजत्रूत्थान् । सिंहपर्णी आटरूषकः । वह्निश्चित्रकः । कौशिकः गुग्गुलुः । ज्योतिष्का ज्योतिष्मती, दधिभवं नवीनमाज्यं हैयङ्गवीनं, पामारिः गन्धकः । वज्रमुष्टिः दृढमुष्टिः । मृद्दारशृङ्गादिचतुर्द्रव्याणां मुशलक्ष-
१८४ रसतरङ्गिणी
चूर्णमुष्णनारिकेलतैलेन सह लेपात् पामां नाशयति । शालनिर्यासः रालः । सौभाग्यादीनां निम्बूकरसैः सह लेपाद् दद्रुनाशः । अथाय प्रसङ्गात् प्राचीनतम- रसतन्त्रनिर्दिष्टान् गन्धयोगान् उदाहरामः सतां लाभाय—"वरातोये भृंगरसे घृते दुग्धे त्रिधा त्रिधा । एरंडतैलेनैकेन सप्तधा शोधयेद्भिषक् ॥ मुक्तदोषं विदित्वाथ सेव्येच्च निरन्तरम् । तस्यानुपानं वक्ष्यामि रहस्यं महदादरात् ॥ त्रिफलाशर्करायुक्तो हन्ति रक्तसमुद्भवन् । तथा च कुरुते दीप्तिमनलस्य तु केवलम् ॥ भृंगचूर्णेन संयुक्तः क्षेमायुर्बलवर्द्धनः । विजयाधूर्तसंयुक्तः स्तम्भकृद्रतिवर्द्धनः ॥ सितया नवनीतेन वयःस्थापन उच्यते । विश्वाग्निसहितं खादेद् ग्रहणीप्लीहनाशनः ॥ शोथं वृक्षीरया कुष्ठं सोमराज्या च संयुतः । मोचाफलेन संयुक्तः सोमरोगहरः परः ॥ खर्जूरफलसंयुक्तो वातक्षयनिवारणः । हरिद्रात्रिफलायुक्तो मेहमूलनिवारणः ॥ मुण्डीचूर्णेन संयुक्तो वृष्ययोगकरः परः । शुंठीगर्भशाकाभ्यां कासश्वासहरः परः ॥ सदेवपुष्पं मरिचं गन्धकं त्वग्निवर्द्धनम् । निम्बूतोयेन संपिष्टो विषूची- शूलनाशः ॥ गन्धकवटी—गन्धकं रसराजश्च मृताभ्रं स्वर्णमाक्षिकम् । अहिफेनश्च दरदं कस्तूरी विजया मधु ॥ नागवल्लीरसेनैव भृंगराजरसे तथा । मर्दयित्वा दिनं सर्वे घर्मे संशोष्य यत्नतः ॥ कर्कन्धुमात्रां वटिकां भक्षयेत्पयसा सह । शुक्रक्षयं न लभते नारी चेद्दश वेश्मनि ॥ अशीतिं वातजान् रोगान् सर्वान् हन्ति न संशयः । यो भुंक्ते सर्वरोगेभ्यो मुक्तो भूयान्न संशयः ॥ अतीव गुणकृज्ज्ञेयः सदा सेव्यो विजानतां । इह जन्मन्यरोगत्वं परं ब्रह्मपदं व्रजेत् ॥ तिलतैलं राजिकाञ्च काञ्जी- माषञ्च मूलकम् । सर्षपं कारवेल्लञ्च त्यजेद् गन्धकसेवकः ॥ गन्धकरसायनम्—धत्तूरं केतकी भृंगं कुमारी च पुनर्नवा । मेघनादश्च गोक्षीरं घृतञ्च श्रीफलं मधु ॥ एवं दशविधं प्रोक्तं गन्धकस्य तु शोधनम् । षट्पलं गन्धकं शुद्धं त्रिफला चापि तत्समा ॥ त्रिकटु त्रिसुगन्धञ्च कणा भल्लातबीजकम् । एकैकं निष्कमात्रन्तु चूर्णितं वस्त्रगालितम् ॥ दिवादौ मधुना पेष्यं नवनीतेन लेहयेत् । कदलीफलसारेण सितया शर्करेण वा ॥ तैलाम्लं लवणाञ्चैव वर्जयेत्सर्षपं तथा । सर्वरोगहरञ्चैतद् गन्धकाख्यं रसायनम् ॥" इति ॥ ४०-५८ ॥ भा. टी.—शुद्ध गन्धक को आमवात के शोथयुक्त स्थान तथा गृध्रसी के पीडायुक्त स्थान पर लेप करने से इन रोगों में आराम आता है । गन्धक को त्रिफला कषाय से सेवन कराने से नाक, कान, मुख के रोगों में तथा अग्निमांद्य रोग में आराम आता है । अडूसे के कषाय के साथ गन्धक-प्रयोग करने पर यह नूतन क्षय रोग को नष्ट करता है । श्वास तथा कास में गन्धक को कण्टकारी-
अष्टमस्तरङ्गः १८५ कषाय के साथ प्रयोग करने पर आराम आता है। पक्व कदलीफल के साथ गन्धक सेवन करने से त्वचा के रोग नष्ट होते हैं। चित्रमूलकचूर्ण के साथ गन्धक-सेवन से दुर्बलता नष्ट होती है। अर्शोरोगजन्य गुदविकार में गन्धक को तिलचूर्ण के साथ सेवन किया जाता है। अथवा मुलैठी, खांड, सनायपत्ती, तथा सौंफ इनके समभाग चूर्ण मिला सेवन करने से गुदविकार शान्त होता है। कफ के रोगों को नष्ट करने के लिये गन्धक को शुद्ध गूगल और त्रिफला- चूर्ण के साथ गोली बनाकर एक मासा मात्रा में गरम जल के साथ दो मास तक सेवन किया जाता है। मालकंगुनीबीज-तैल, वचाचूर्ण तथा ताजे दही का मक्खन; इन तीनों को समभाग में लें और इन तीनों के बराबर भाग नष्ट गन्ध किया हुआ शुद्ध गन्धकचूर्ण मिलाकर एक मास तक सेवन करने से तीव्र यक्ष्मा, आँत्र शोष, भयंकर कण्ठमाला रोग नष्ट होते हैं। स्वस्थ शरीर में एक मास तक उक्त योग का सेवन करने से नेत्रों की ज्योति में वृद्धि, वीर्यवृद्धि, मन में सन्तुष्टि, शरीर में पर्याप्त मात्रा में पुष्टि होती है। इससे मनुष्य बड़ा साहसी, बलवान् तथा सर्वरोग रहित हो जाता है। एक कोल ( आठ आना भर ) प्रमाण ऊर्ध्वपातित शुद्ध गन्धक और नौ कोल ( ४॥ भर ) स्वच्छ खांड लेकर दोनों को एकत्र खूब अच्छी तरह पीसकर एक साफ काँच की शीशी में रख लें और उसका डाट बन्द कर दें। इसकी एक रत्ती मात्रा लेकर शीतल जल के साथ सेवन करने से वीर्य की खराबी, जल समान शुक्र का पतलापन, तथा शुक्र में गन्ध का अभाव आदि विकार दूर होकर शुक्र शुद्ध, गाढ़ा, मधु- गन्धि होकर सन्तानोत्पत्ति करने के योग्य हो जाता है। मुरदासँग, सुहागा, कपूर, तथा शुद्ध गन्धक; इन सबको समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण बना ले। अब इस चूर्ण को नारियल के तैल में मिलाकर शरीर में कुछ दिन निरन्तर मलें तो सात दिन में पुरानी तथा भयंकर पामा (खुजली) नष्ट हो जाती है। सुहागा, सालकी राल, फिटकरी और शुद्ध गन्धक; इन सबको समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण करके इसको नींबू के रस के साथ शरीर में कुछ दिन निरंतर मलें तो शीघ्र ही दाद नष्ट हो जाता है। शरीर में बल और वीर्यवृद्धि के लिए शुद्ध गन्धक का सेमल की कोमल छोटी-छोटी मूसलीचूर्ण के साथ मिला दुग्धानुपान से एक मास तक सेवन करना चाहिये। गलित कुष्ठ ( महाकुष्ठ ) को नष्ट करने के लिये शुद्ध गन्धक को मधु से चाटकर आँवले का स्वरस अनुपान के रूप में सेवन करना चाहिये ॥ ४०-५८ ॥ वक्तव्य—मन्दाग्नि तथा अजीर्ण के उपद्रवों को शान्त करने के लिए
१८६ रसतरङ्गिणी प्रतिदिन एक बार शुद्ध गन्धक को हरीतकी अथवा त्रिफला कषाय के साथ सेवन कराने से उत्तम लाभ होता है। नेत्रों की निर्बलता तथा स्थायी नेत्र रोगों के लिये तीन मासा त्रिफलाचूर्ण, दो रत्ती शुद्धगन्धक को मधु और घृत में मिला- कर कुछ काल तक निरन्तर सेवन करने से लाभ होता है। यदि इसमें भाँगरे का स्वरस अनुपान के रूप में पिया जाय तो विशेष गुणकारी हो जाता है। दद्रुविद्रावणमलहरः सिक्थतैलं तु विमलं भानुतोलकसंमितम् । विशोधितं गन्धकं च तोलकैकमितं शुभम् ॥ ५६ ॥ सुपुष्पितं तु सौभाग्यं चक्रमर्दस्य बीजकम् । वृक्षामयरजः स्वच्छं तोलकार्द्धमितं पृथक् ॥ ६० ॥ अतिमन्दाग्निना पक्वं शीतं कुप्यां तु विन्यसेत् । मतो मलहरोऽयं तु दद्रुविद्रावणाव्हयः ॥ ६१ ॥ प्रलिप्तोऽयं मलहरो दिनसप्तकमात्रतः । उन्मूलयति दद्रूणि समूलं नेह संशयः ॥ ६२ ॥ भानुतोलकसंमितमिति द्वादशतोलकपरिमितम् । वृक्षामयः लाक्षा, तस्य रजश्चूर्णम् ॥ ५६–६२ ॥ भा.टी.—सिक्थतैल बारह तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला, सुहागे की खील, चकवड़ के बीज, लाक्षाचूर्ण, प्रत्येक आधा-आधा तोला लेकर सबको एक कलई किये हुये पात्र में डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकाकर ठंडा होने पर शीशी में भर लें। इसको दद्रुनाशक मलहर कहते हैं। यह दाद के ऊपर सात दिन मलने से उसको जड़ से नष्ट कर देता है ॥ ५६–६२ ॥ गन्धकाद्यमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं रसतोलकसंमितम् । गन्धकं गिरिसिन्दूरं तोलकार्द्धमितं पृथक् ॥ ६३ ॥ टङ्कणं घनसारं च पृथक माषद्वयोन्मितम् । दत्वा संमेल्य यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् ॥ ६४ ॥ मतो मलहरोऽयं तु गन्धकाद्यसमाह्वयः । विनाशयत्याशु भृशं पामामत्यर्थदारुणाम् ॥ ६५ ॥ रसतोलकसंमितमिति षट्तोलकाः सिक्थतैलस्य। घनसारं कर्पूरम् ॥६३–६५॥ भा.टी.—स्वच्छ सिक्थतैल ६ तोला, गन्धक तथा सिन्दूर प्रत्येक आधा-
अष्टमस्तरङ्गः १८७ आधा तोला, सुहागा, कपूर प्रत्येक दो मासे लेकर पीसकर सिकथतैल में मिला चौड़े मुख की काँच की शीशी में रख लें। इसे गन्धक मलहर कहते हैं। इसके लेप करने से अत्यन्त भयङ्कर पामा नष्ट हो जाती है ॥ ६३-६५ ॥ प्रथमो गन्धककल्पः विशोधितः सुगन्धिको वराऽज्यभृङ्गसंयुतः । समाक्षिको विधानतस्त्रिमासमात्रसेवितः ॥६६॥ निहन्ति दारुणान् गदान् चिरोत्थितानपि द्रुतम् । करोति लोचनद्वयं विकाशि गृध्रनेत्रवत् ॥६७॥ दुग्धं सशर्करं कोष्णं त्वोदनं षष्टिकोद्भवम् । शीतवीर्यं भवेद्यच्च पथ्यमेतत्समासतः ॥६८॥ गन्धककल्प इति रसायनप्रायः प्रयोगः कल्प इत्युच्यते ॥ ६६-६८ ॥ भा.टी.-शुद्ध गन्धक को उचित मात्रा में लेकर उसमें त्रिफलाचूर्ण, गोघृत और भृंगराज का स्वरस मिलाकर मधु के साथ विधिपूर्वक तीन मास तक सेवन करने से भयंकर और पुराने रोग भी शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। इसके सेवन से दृष्टि गीध के समान तीव्र हो जाती है। इसके सेवनकाल में साठी चावलों के भात में दूध और खाँड मिला गुनगुना भोजन करना चाहिये। इसके अति- रिक्त अन्य शीतवीर्य द्रव्य भी इसमें पथ्य होते हैं ॥ ६६-६८ ॥ द्वितीयो गन्धककल्पः नवनीताह्वयः शुद्धश्चूर्णमामलकोद्भवम् । तुल्यमेतद् द्वयं ग्राह्यं सप्तवारं विधानतः ॥६९॥ रसेन भावयेद् धात्र्याः शाल्मल्याश्च द्रवैस्तथा । शर्करामधुसंयुक्तं लिहेदनु पयः पिबेत् ॥७०॥ गगनाननमासनिषेवणातः स्थविरोऽपि मनोजशराभिहतः । सुरतेऽविरतं खलु विह्वलयन् रमयेद्रमणीशतकं सरसः ॥७१॥ गगनाननमासाः त्रिंशन् ( ३० ) मासाः ॥ ६६-७१ ॥ भा.टी.-शुद्धगन्धक एक भाग, आमलकीचूर्ण एक भाग लेकर दोनों को एकत्र करके आँवलास्वरस तथा शाल्मलीस्वरस की पृथक्-पृथक् सात भावना देकर सुखा लें। इसमें से प्रतिदिन एक मासा मात्रा में लेकर खाँड और शहद में मिलाकर खायें और इसके पीछे दूध पीवें। इस विधि से ३० तीस मास तक इस योग का सेवन करने से बूढ़ा मनुष्य भी अत्यन्त कामी हो जाता है ॥६६ ७१॥
१८८ | रसतरङ्गिणी
तृतीयो गन्धककल्पः माषार्द्धं विमलं गन्धं कोषोष्णेन पयसा पुमान्। भक्षयेत्प्रत्यहं मासं वीर्यवृद्धिः प्रजायते ॥७२॥ षण्माससेवनाच्चास्य दिव्यां दृष्टिश्च विन्दति । सुवर्णवर्णसंकाशां दीप्तिं स तनुते तनौ ॥७३॥ भा.टी.—आधा मासा शुद्ध गन्धक को प्रतिदिन प्रातःकाल गुनगुने दूध के साथ एक मास तक सेवन करने से शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है । छः मास तक सेवन करने से उसकी दिव्य दृष्टि हो जाती है अर्थात् नेत्रों की ज्योति तीव्र हो जाती है । शरीर का रंग स्वर्ण के समान निखर आता है ॥७२-७३॥ चतुर्थो गन्धककल्पः माषार्द्धं गन्धकं शुद्धं तिलतैलेन भक्षयेत् । नित्यं चोष्णजलेनेह पामादीनवसेचयेत् ॥७४॥ सप्ताहत्रितयादेव पामाद्याः सकला रुजः । हरेत्सुवर्णवर्णाभः कायः संजायते नृणाम् ॥७५॥ गन्धकस्य तैलेन सेवनं त्वग्दोषनाशाय ॥ भा. टी.—शरीर में पामा, कण्डू, विचर्चिका आदि त्वक् रोगों में आधा मासा शुद्ध गन्धक, को तिलतैल के साथ खिलायें और प्रतिदिन पामा आदि रोगयुक्त स्थानों को गरम जल से धोते रहें । इस प्रकार २१ दिन तक गन्धक सेवन और प्रक्षालन क्रिया को करते रहने से उक्त सब रोग नष्ट हो जाते हैं । शरीर स्वर्ण समान कान्तियुक्त हो जाता है ॥ ७४, ७५ ॥ पञ्चमो गन्धककल्पः गन्धकं निर्मलं मागधीगर्भितं पथ्यया संयुतं तुल्यमेतत् त्रयम् । सर्पिषा माक्षिकेणेह माषद्वयं भक्षयेद्यत्नतस्तत्र मासत्रयम् ॥७६॥ भोजनादौ सदा यन्त्रणावर्जितः शीलयेत्प्रत्यहं ब्रह्मचारी नरः । तप्तचामीकरोद्भासिरम्य़ाननः शौर्यवीर्यान्वितो दिव्यदृष्टिर्भवेत् ॥७७॥ तप्तचामीकरोद्भासिरम्य़ानन इतितप्तसुवर्णवच्छोभमान सुन्दरमुखः ॥७६, ७७॥ भा.टी.—शुद्धगन्धक, पिप्पलीचूर्ण और हरीतकीचूर्ण तीनों को समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। इसमें से प्रतिदिन दो मासे लेकर चार मासे घी और शहद के साथ तीन महीने तक सेवन करायें । साथ ही सेवन करनेवाला मनुष्य इस काल में ब्रह्मचारी रहे तो उसका शरीर तप्त सुवर्ण के समान कान्तिवाला
अष्टमस्तरङ्गः १८६ हो जाता है। उसके शरीर में बल, पराक्रम के साथ दृष्टि-शक्ति बढ़ जाती है । इसके सेवनकाल में खाने-पीने में कोई विशेष परहेज की आवश्यकता नहीं है ॥ ७६-७७ ॥ षष्ठो गन्धककल्पः तैलसंशोधितं गन्धकं चूर्णितं माषकार्द्धं लिहेत्क्षौद्रमध्यस्थितम् । नाशयेत्सत्वरं क्षुद्रकुष्ठोत्थितां वेदनां दारुणां दीर्घकालोत्थिताम् ॥७८॥ मरिचं गन्धकं पश्चात्तैलेनेह सुपेषयेत् । अपामार्गजलेनापि ततो देहं प्रलेपयेत् ॥ ७९ ॥ घर्मे सम्यक् शोषयित्वा स्नानं कुर्यात् सुभेषजैः । सप्ताहद्वितयेनैव क्षुद्रकुष्ठं व्यपोहति ॥ ८० ॥ मरिचगन्धतैलानां पिष्टं विधाय अपामार्गजलेन सम्मेल्य शरीरे लेपो विधेयः क्षुद्रकुष्ठनाशाय । अयमत्र क्रमः—प्राक् तैलेन गन्धकः पेष्यः, पश्चादपामार्गतोयेन तैलमरिचेन सह गन्धकं पेषयित्वा सकलदेहं विलिप्य घर्मे तिष्ठेत् । ततो मध्याह्ने तक्रभक्तं भुञ्जीत, रात्रौ वह्निसंवा प्रातर्महिष्याङ्गणलेपः, शीतलेन जलेन स्नानम् । एवं पामाकुष्ठनाश इति ॥ ७८–८० ॥ भा. टी.—पूर्वोक्त विधि से तेल में शुद्ध किया हुआ गन्धकचूर्ण आधा मासा मात्रा में लेकर मधु के साथ सेवन करने से शीघ्र ही क्षुद्र कुष्ठों (दद्रु, चर्मदल, पामा आदि) का भीषण कष्ट दूर हो जाता है। इस योग के साथ काली मिर्च, गन्धक तथा सर्षपतैल को एकत्र अपामार्गस्वरस से पीसकर इसका शरीर में लेप करके धूप में बैठकर लेप को सुखायें, पश्चात् खदिर, हरिद्रा आदि औषधियों के जल से स्नान करें । इस प्रकार चौदह दिन करने से क्षुद्रकुष्ठ नष्ट हो जाते हैं ॥ ७८–८० ॥ सप्तमो गन्धककल्पः सौगन्धिकं तु विमलं गृह्णीयाद् भिषजां वरः । ततो गव्येन पयसा त्रिवारं खलु भावयेत् ॥ ८१ ॥ ततः फलत्रिकेणाथ चतुर्जातद्रवैस्तथा । गुडूच्या भृङ्गनीरेण शृङ्गवेररसेन च ॥ ८२ ॥ अष्टवारं पृथग् युक्त्या भावयेद् रसकोविदः । सिद्धे रसायने तुल्यां सितां संयोज्य योजयेत् ॥ ८३ ॥
२६० रसतरङ्गिणी प्रत्यहं सेवितो गन्धो माषमात्रप्रमाणतः । मासमात्रप्रयोगेण निहन्ति विविधान् गदान् ॥ ८४ ॥ धातुक्षयोत्थितान् रोगान् तथा कोष्ठसमाश्रितान् । प्रमेहान् शीर्षजान् रोगान् शूलं कुष्ठादिकानपि ॥ ८५ ॥ क्षाराम्ललवणादीनि कोपादीन् वनितासुखम् । द्विदलानि च शाकानि गन्धसेवी विवर्जयेत् ॥ ८६ ॥ त्रिफलादिशृङ्गवेरान्तैः पृथक् अष्टवारं भावना देया । तुल्यां भावितगन्धक- तुल्याम् । वनितासुखं स्त्रीसंसर्गमित्यर्थः ॥ ८१-८६ ॥ भा.टी.—शुद्धगन्धकचूर्ण लेकर उसे गोदुग्ध की तीन भावना दें । इसके बाद त्रिफलाक्वाथ, चतुर्जात (दालचीनी, तेजपत्र, इलायची, नागकेसर) क्वाथ, गुडूचीस्वरस, भाँगरारवरस और अदरखरस की पृथक्-पृथक् अच्छी तरह आठ भावना दें । अब इस भावित गन्धक में गन्धक-समभाग खाँड मिलाकर पीस लें । इसमें से प्रतिदिन प्रातःकाल एक मासा मात्रा में सेवन करायें तो एक मास तक इसके सेवन से धातुक्षयजन्य कोष्ठ रोग, प्रमेह, शिरोरोग, शूल, कुष्ठ आदि त्वग्-रोग तथा अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं । गन्धक सेवन करनेवाले मनुष्य को इसके सेवनकाल में क्षार, अम्ल, लव- णयुक्त पदार्थ, क्रोध, चिन्ता आदि स्त्री संभोग दाल और शाकों का परिहार करना चाहिये ॥ ८१-८६ ॥ अष्टमों गन्धककल्पः विशुद्धसौगन्धिकचूर्णमादौ विभावयेद् भृङ्गरसैस्त्रिवारम् । ततो घृतक्षौद्रहरीतकीभिः सेवेत नित्यं खलु माषमात्रम् ॥ ८७ ॥ विधिना मितपथ्याशी मासद्वयनिषेवणात् । स्थविरोऽपि स्मराक्रान्तो निर्भरं तरुणायते ॥ ८८ ॥ स्थविरो वृद्धः, स्मराक्रान्तः कामाक्रान्तः, निर्भरं अत्यर्थम् ॥ ८७-८८ ॥ भा.टी.—शुद्धगंधक के चूर्ण को भृंगराजरस की तीन भावना देकर सुखा लें । अब इसमें से एक मासा मात्रा लेकर हरीतकी-चूर्ण घृत तथा शहद के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करायें । दो मास तक सेवन करते हुए अल्प और पथ्य भोजन करायें । इसके सेवन से बूढ़ा मनुष्य भी अत्यन्त कामी तरुण पुरुष की भाँति शक्तिशाली हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥
अष्टमस्तरङ्गः १६१ नवमो गन्धककल्पः रुबूकतैलसंयुक्तः सकौशिको वरान्वितः । विशुद्धपारदान्वितः सुगन्धिको निषेवितः ॥ ८६ ॥ निहन्ति मासमात्रतो भृशं कफोत्थितान् गदान् । समीरजांश्च पैत्तिकान् चिरोत्थितानपि द्रुतम् ॥ ९० ॥ दृशा खगेश्वरोपमो बलेन भीमसंनिभः । रविप्रभस्तु तेजसा भवेत् स वज्रविग्रहः ॥ ९१ ॥ रुबूकतैलमेरण्डतैलम् । खगेश्वरो गरुडः । वज्रविग्रह इति कठिनदेहः ॥ ८६–६१ ॥ भा.टी.—शुद्धगन्धक में समभाग शुद्धपारद, शुद्धगूगल, त्रिफलाचूर्ण मिलाकर इसको एरण्डतैल में अच्छी तरह मर्दन करके गोली अवलेह-सा बना लें, अब इसको उचित मात्रा में एक मास तक सेवन कराने से पुराने से पुराने कफजन्य, वातप्रकोपजन्य तथा पित्तप्रकोपजन्य रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । इस योग के सेवन से मनुष्य दृष्टि में गरुड़ के समान, बल में भीम के समान, तेज में सूर्य के समान और दृढ़ देहवाला हो जाता है ॥ ८६–६१ ॥ वक्तव्य—पहिले पारद गन्धक की कजली बनाकर उसमें गूगल आदि द्रव्य मिला लें, फिर मर्दन करने के लिये त्रिफलाक्वाथ ( गरम ) डालकर मर्दन करें जब गूगल के चिपकने से मर्दन करना कठिन हो जाय तो उसमें एरण्डतैल डालकर कूटना चाहिये । दशमो गन्धककल्पः फलत्रिकं भृङ्गराजो विमलश्च सुगन्धिकः । त्रयमेतत्समं ग्राह्यं श्लक्ष्णचूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ९२ ॥ दिव्यदृष्टिर्वज्रकायो मासेनेकेन जायते । षण्मासमात्रयोगाच्च वलीपलितनाशनः ॥ ९३ ॥ भा. टी.—त्रिफलाचूर्ण, भृंगराजचूर्ण और शुद्ध गन्धक; इन तीनों को समभाग लेकर एकत्र अच्छी तरह बारीक चूर्ण कर लें । इस चूर्ण को दो मासे मात्रा में एक मास तक प्रतिदिन प्रयोग करने से शरीर की वलि ( झुर्री ) तथा पलित ( बालों की सफेदी ) दूर हो जाता है ॥ ९२, ९३ ॥ अथ गन्धकतैलम् आवर्तमाने पयसि क्षिपेद्वै विशुद्धसौगन्धिकजं हि चूर्णम् । तदुद्भवक्षीरसमुत्थमाज्यं गन्धस्य तैलं वितरेत्प्रतप्तम् ॥ ९४ ॥
१६२ रसतरङ्गिणी सुगन्धतैलं विनिहन्ति शीघ्रं क्षुद्राणि कुष्ठानि विशेषतो वै । हरेद्विसर्पादिकरोगसङ्घं विलेपनाद्वाऽशनतः प्रकामम् ॥ ९५ ॥ आवर्त्तमाने उत्कथ्यमाने। विलेपनाद् अशनतो वा इति सम्बन्धः ॥९४, ९५॥ उबलते हुए दूध में बारीक पीसा हुआ गन्धक का चूर्ण डाल दें और दूध को ठंडा करके मथकर मक्खन निकाल लें । अब इस मक्खन को खूब गरम करें तो घी के ऊपर गन्धकतैल आ जाता है । इसे हाथ से या रुई से अच्छी तरह निकाल लें । यह गन्धक तैल खाने और शरीर में लगाने से कुष्ठ विशेषतः क्षुद्रकुष्ठों और वीसर्प आदि त्वक् तथा रक्तदुष्टिजन्य रोगों को नष्ट करता है ॥ ९४-९५ ॥ गन्धकतैलस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः सप्तधा लेपयेदर्कदुग्धेन वै वस्त्रमच्छं पुनर्वज्रिदुग्धेन च । पेषयेद् गन्धकं मन्थजेन त्वथो वस्त्रमालेपयेत्तेन युक्त्या भिषक् ॥९६॥ गन्धलिप्तं पुनर्वस्त्रमापीडयन् वर्तिकाकारतामानयेत्कोविदः । दंशयन्त्रस्थितां निम्नपात्रोन्मुखीं ज्वालयेत् वर्तिकां युक्तितो वैद्यराट् ॥९७॥ हरेत्सुगन्धतैलन्तु पतितं काचभाजने । क्षुद्रकुष्ठादिरोगेषु मतिमान् सम्प्रयोजयेत् ॥ ९८ ॥ वज्रिदुग्धेन स्नुहीक्षीरेण मन्थजेन = नवनीतेन एतत्तैलस्य प्रयोग इति प्राञ्चः ॥ ९६-९८ ॥ भा. टी.—पहिले एक साफ कपड़े को सात बार आक के दूध और सात बार थोहर के दूध से लिप्त करके सुखा लें, अब इसके ऊपर मक्खन में पिसे हुए गन्धक का लेप कर दें । लेप करने के बाद इस कपड़े को एक तरफ से मोड़कर बत्ती बना लें । अब इस बत्ती को चिमटे से पकड़कर कुछ आगे से नीचे को झुकाते हुए पकड़े रहें और बत्ती के मुख के नीचे एक कटोरा रख बत्ती को जलायें । बत्ती के जलाने पर मक्खन के साथ गन्धक पिघलकर कटोरे में बिन्दु रूप से गिरेगा । यही गन्धक तैल है । इस तैल को क्षुद्र कुष्ठ आदि त्वक् रोगों में शरीर के ऊपर मलना चाहिये ॥ ९६-९८ ॥ गन्धकतैलस्य तृतीयो निर्माणप्रकारः कलांशत्र्यूषणोपेतं विमलं चूर्णितं बलिम् । विप्रकीर्योचितं वस्त्रे ततः सूत्रेण वेष्टयेद् ॥ ९९ ॥ यामं निमज्जयेत्तैले ततः संदंशयन्त्रगाम् । वर्तिं निम्नमुखीं कृत्वा काचपात्रमधो न्यसेत् ॥ १०० ॥
१३ अष्टमस्तरङ्गः १६३ ततः प्रज्वालयेदू युक्त्या गन्धो द्रवति बिन्दुशः । इदं सौगन्धिकं तैलं बुधैः श्रेष्ठतरं मतम् ॥ १०१ ॥ बिन्दुत्रयमितं तैलं ताम्बूलीदलसंस्थितम् । तत्समं विमलं सूतं संमद्यौथ प्रयोजयेत् ॥ १०२ ॥ दिनत्रयप्रयोगेण दीपयत्युदरानलम् । आमं निवारयत्येव दिनैकमपि योजितम् ॥ १०३ ॥ कासश्वासहरः कामं ग्रहणीगजकेशरी । आमवातादिरोगघ्नः स्नेहोऽयं गन्धसम्भवः ॥ १०४ ॥ कलाः षोडश । कलांशं षोडशांशम् । सूतसंमर्दनात्कज्जली भवति, ततः प्रयोज्यम् ॥ ९६-१०४ ॥ भा.टी.—गन्धकचूर्ण में सोलहवाँ भाग त्रिकटुचूर्ण मिला एक स्वच्छ कपड़े पर फैला दें और इसकी बत्ती बनाकर बत्ती को तागे से अच्छी तरह बांध दें। अब इस बत्ती को तीन घण्टे तक सरसों के तेल में भिगो दें, तीन घंटे के बाद निकाल चिमटे से एक तरफ पकड़ कर आगे को कुछ नीचे को झुकाकर इसके नीचे कांच का प्याला रख दें और बत्ती को जलाकर पकड़े रहें । इस प्रकार बत्ती जलाने से गन्धक पिघलकर बिन्दु-बिन्दु रूप से प्याले में गिरेगा। उसे गन्धकतैल कहते हैं । इस तैल में से तीन बूँद लेकर इसके बराबर भाग शुद्ध पारद को एकत्र खरल में पान के पत्तों के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन कर कज्जली-सी बना लें । इसके तीन दिन अन्तः प्रयोग करने से पाचकाग्नि तीव्र हो जाती है और पेट में सञ्चित आमदोष एक दिन में ही दूर होजाता है। यह तैल कासश्वासहर,ग्रहणीरोगनिवारक और आमवात आदि रोगनाशक है । ६६ गन्धकतैलस्य चतुर्थो निर्माणप्रकारः ब्रह्मबीजोद्भवं श्लक्ष्णचूर्णं क्षिपेच्छागदुग्धे ततः शोषयेद्युक्तितः । षोडशांशं बलिं तत्र सम्मेलयेत् काचकूप्यां ततो विन्यसेत्कोविदः ॥१०५॥ ततः पातालतन्त्रेण तैलं ग्राह्यं भिषग्वरैः । सत्त्वभूतं गन्धकस्य गन्धतैलं महोत्तमम् ॥ १०६ ॥ रक्तिद्वयं गन्धतैलं ताम्बूलोदलमध्यगम् । तैलाईं रसराजन्तु शुद्धं तत्र विमिश्रयेत् ॥ १०७ ॥ अङ्गुल्यग्रेण संमर्द्य कृत्वा कज्जलिकां चरेत् । ताम्बूल शीलयेत्पश्चाद् गन्धतैलस्य सेवकः ॥ १०८ ॥
१६४ रस्तरङ्गिणी ब्रह्मबीजं पलाशबीजम् । स्पष्टमन्यत् । योगोऽयमेव योगरत्नाकरे महाराज- वटीरसनाम्ना व्यवहृतः । सद्यः फलदश्चेति ॥ १०५–१०८ ॥ भा.टी.—ढाक के बीजों का बारीक चूर्ण करके इसको बकरी के दूध में मिलाकर तेज धूप में रखकर सुखा लें । अब इस दूध युक्त पलासबीज चूर्ण में सोलहवां भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर एक बोतल या कांच की शीशी में भर दें और इस शीशी को पूर्वोक्त विधि से पाताल यन्त्र में रखकर तेल निकाल लें । यह गन्धक तैल बहुत उत्तम गन्धक के सत्त्व सदृश होता है । दो रत्ती इस गन्धक तैल को पान के पत्ते में रख इसमें एक रत्ती रससिन्दूर मिला अंगुली से खूब रगड़ कर कज्जली बना लें और पान के साथ इस कज्जली का सेवन करें॥१०५-१०८॥ अत्रापथ्यम् अम्लं शाकादिकञ्चैव ककाराष्टकभेषजम् । उष्णवीर्यं यदन्यच्च तदपथ्यमिह संस्मृतम् ॥ १०६ ॥ योगेनानेन पुरुषो वृद्धोऽपि तरुणायते । अपूर्ववत् प्रतिदिनं रमयेद् रमणीशतम् ॥ ११० कासश्वासहरो बल्यो वलीपलितानाशनः । शोषसंशोषकः कामं क्षयकुञ्जरकेशरी ॥ १११ ॥ शूलकालानलः सत्यं मेहवर्गनिषूदनः । एतत्तैलसमं लोके नान्यदस्ति रसायनम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.—गन्धक सेवन करनेवाले मनुष्य को अम्ल द्रव्यों के शाक आदि तथा ककाराष्टक द्रव्य तथा और भी जो उष्णवीर्य द्रव्य हैं उनका त्याग करना चाहिये । इस गन्धकतैल योग का सेवन करने से वृद्ध मनुष्य भी तरुण की भाँति हो जाता है, प्रतिदिन सौ स्त्रियों के साथ नवीन रूप में मैथुन करने की शक्तिवाला हो जाता है । इसके अतिरिक्त इस योग के सेवन से कास-श्वास दूर होते हैं, शरीर में बल बढ़ता है और शरीर वली-पलित रहित हो जाता है । यह योग शोष को सुखानेवाला और क्षयरूप हाथी को सिंह की भांति नष्ट करता है । वातिक शूल, तथा सब प्रकार के प्रमेहों को नष्ट करता है । इस तैल के समान संसार में अन्य कोई रसायन नहीं कहा जाता है ॥ १०६–११२ ॥ अथ गन्धकद्रावकस्य निर्माणप्रकारः एकस्मिंल्लोहपात्रे तु बलिं शतपलोन्मितम् । निक्षिप्य चुल्लिकायाञ्च निधायाग्निं प्रदीपयेत्॥ ११३ ॥
अष्टमस्तरङ्गः १८५ अपरस्मिन् सोरकञ्च सार्द्धद्वितोलकोन्मितम् । निधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं सन्धुक्षयेत्ततः ॥ ११४॥ पिधानेनानयोर्युक्त्वा भृशं संरोधयेन्मुखम् । नालिकाद्वितयं दीर्घं पात्रयोर्योजयेत् पृथक् ॥ ११५ ॥ कोष्ठागारेऽहिपात्रे च मुखं नलिकयोर्न्यसेत् । बलिसोरकयोरेवं धूमं सम्मिश्रयेद् बुधः ॥ ११६ ॥ दशाधिकद्विशतकपलं सलिलमाहरेत् । पात्रेऽन्यस्मिंश्च संस्थाप्य वह्नौ सन्तापयेत् भृशम् ॥ ११७॥ नालिकामुखतो बाष्पं नागपात्रेऽथ मेलयेत् । बाष्पसंयोगतश्चैव शतत्रयपलोन्मितः ॥ ११८ ॥ जायते गन्धकद्रावः पीताभोऽतिमनोहरः । अथ नव्यपरिभाषासम्मतो बलिद्रावः—एकस्मिन्निति । पात्रयोः वलिपात्रे सोरकपात्रे च । कोष्ठागारे इति कद्व्यागारे । अहिपात्रे सीसकनिर्मिते पात्रे । स्पष्टमन्यत् ॥११३-११८॥ भा.टी.—एक लोहे के पात्र में सौ पल शुद्ध गन्धक डालकर इसको चूल्हे पर रखकर अग्नि दें, इसी तरह एक दूसरे लोहपत्र में साढ़े छः पल सोरा डाल कर चूल्हे पर रख अग्नि दें । अग्नि पर रखने के पूर्व इन दोनों के मुखों को पृथक्-पृथक् अच्छी तरह बन्द कर दें और दोनों पात्रों के मुख पर छिद्र करके एक एक लम्बी नली फिट करके इन दोनों नलियों के मुखों को एक कुप्पी के आकार के सीसे के पात्र में जोड़ दें जिससे सोरक और गन्धकवाले पात्र से बाष्प उड़कर सीसे के पात्र में इकट्ठा हो जाय । अब एक अर्क निकालने वाले साफ भभके में दो सौ दस पल जल भरकर इसके मुख को भी बन्द कर एक नली लगाकर इस नली को भी उक्त सीसे के पात्र के मुख में जोड़ दें, इस तरह तीन नलियों का मुख एक पात्र में जोड़ने से बाष्प जमकर जल के रूप में पात्र के अन्दर तीन सौ पल परिमाण में इकट्ठा हो जायगा । यही सुन्दर पीताभ वर्ण का गन्धकद्राव कहा जाता है ॥११३-११८॥ गन्धकद्रावस्य नामानि गन्धद्रावो बलिद्रावो गन्धाम्लश्च स कीर्तितः ॥ ११९ ॥ भा.टी.—गन्धकद्राव को गन्धद्राव, बलिद्राव तथा गन्धकाम्ल (Sulphu- ric acid) कहा जाता है ॥११९॥
१६६ रसतरङ्गिणी विशुद्धो गन्धकद्रावः सुधाधिकफलप्रदः । अविशुद्धो दोषकारी तस्मात्तं शोधयेद् बुधः ॥ १२० ॥ भा. टी—शुद्ध गन्धकद्राव प्रयोग करने में अमृत के समान गुणकारी होता है, किन्तु अशुद्ध का प्रयोग अनेक हानिकारक होता है । अतः इसको शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ १२० ॥ अथ गन्धकद्रावस्य शोधनप्रकारः गन्धकद्रावकं प्राज्ञः काचकुप्यां निधापयेत् । अस्यां संयोज्य नलिकां मुखमस्या नियोजयेत् ॥ १२१ ॥ अन्यस्यां काचकुप्यान्तु पचेन्मृद्वग्निना भिषक् । तस्य तृतीयमंशन्तु जलांशमधिकं भवेत् ॥ १२२ ॥ तस्मात्तं प्रथमं यत्नादस्मादपनयेद् भिषक् । विशुद्धं गन्धकद्रावं ततः कुप्यां निपातयेत् ॥ १२३ ॥ पात्रगं नागदोषं यज्जलांशमधिकञ्च यत् । गन्धद्रावो जहात्येवं निर्मलञ्च परं भवेत् ॥ १२४ ॥ अथास्यापि शोधनावश्यकतेति तच्छोधनप्रकारमाह । गन्धकद्रावमिति-अत्र बलिद्रावेऽधिकांशजलशोषः नागसंपर्कजन्यदोषलयश्च भवतीति । स्पष्टमन्यत् ॥ १२१-१२४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त प्रकार से बनाये हुये गन्धकद्राव को एक कांच की बन्द मुखवाली शीशी में डालकर इसमें एक कांच की नली लगा दें और इस नली के दूसरे मुख को एक दूसरी रिक्त कांच की शीशी में जोड़कर नीचे मन्द-मन्द अग्नि (सुरादीप की अग्नि) जलायें । जब गन्धकद्राव वाली शीशी में से दो भाग जल स्रवित होकर दूसरी रिक्त शीशी में आ जाय तो अग्नि देना बन्द करके तृतीयांश जल भाग शीशी में ही छोड़ दें । इस प्रकार गन्धकद्राव में जो अधिक जल तथा सीसकदोष का अंश होता है वह सब दुबारा गन्धकद्राव को उड़ा लेने से नहीं रहने पाता है और गन्धकद्राव निर्मल हो जाता है ॥१२१-१२४॥ पानार्थे सजलगन्धकद्रावस्य निर्माणप्रकारः शीतांशभागकं शुद्धं गन्धकद्रावकं शुभम् । परिस्रुते तु सलिले रविभागमिते क्षिपेत् ॥ १२५ ॥ निधाय काचकुप्याञ्च विमलायां भिषग्वरः । दृढेनाथ पिधानेन रोधयेत् कूपिकामुखम् ॥ १२६ ॥
अष्टमस्तरङ्गः १६७ ततो निर्दिष्टरोगेषु मात्रयाऽप्रियत्नतः । गन्धद्रावं प्रयुञ्जीत रसतंत्रविशारदः ॥१२७॥ शीतांशुश्चन्द्रः स चैकस्तस्मादेकभागिकमित्यर्थः । रवयो द्वादशाख्याताः, ततश्च द्वादशभागमितम् । पिधानेनेति काचपिधानेन ॥ १२५-१२७ ॥ आ.टी.—एक भाग शुद्ध गन्धकद्राव को बारहभाग परिस्रुत (Distilled water ) जल में मिला एक स्वच्छ काँच की शीशी में भरकर अच्छी तरह डाट लगाकर रख लें। अब इसमें से भिन्न-भिन्न रोगों में मात्रा का विचार करते हुये सावधानी से प्रयोग करें ॥ १२५-१२७ ॥ सजलगन्धकद्रावस्य मात्रा आरभ्य शरबिंदुभ्यः खाक्षिविंदुमितं परम् । सजलं गन्धकद्रावं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१२८॥ शरबिन्दवः पञ्चबिन्दवः । खाक्षिविन्दुः विंशतिबिन्दव इत्यर्थः ॥ १२८ ॥ भा.टी.—सजल गन्धक द्राव को पाँच बिन्दु से लेकर बीस बूँद तक निः- शंक प्रयोग कर सकते हैं ॥१२८ ॥ सजलगन्धकद्रावस्य सहपानम् पलं सार्द्धपलं वापि पलद्वयमितं जलम् । सनीरगन्धद्रावस्य सहपाने प्रयोजयेत् ॥१२६॥ यवान्याः शतपुष्पायास्त्वचो देवसुमस्य च । पृथक् परिस्रुतं तोयं सहपाने प्रदीयते ॥१३०॥ तोलकैकतः तोलकद्वयपर्य्यन्तं यवान्याद्यर्कस्य सहपानेन बलिद्रावस्य प्रयोगः कर्त्तव्यः । अर्केष्वपि पलार्द्धसम्मितं जलं मिश्रणीयम् । त्वक् गुडत्वक्, देवसुमस्य लवङ्गस्य ॥ १२६-१३० ॥ भा.टी.—सजलगन्धकद्राव में एक पल, डेढ़ पल, अथवा दो पल शुद्ध जल मिलाकर पीना चाहिये । इसके अतिरिक्त अजवाइन, सौंफ, दालचीनी अथवा लौंग इसमें से किसी एक अर्क के साथ सजलगन्धकद्राव पीना चाहिये ॥ १२६, १३० ॥ अथ गन्धकद्रावस्य गुणाः गुल्मप्लीहगजांकुशः कृमिहरः सर्वोदरातङ्कहृत् वीर्य्योष्णास्तु विसूचिकामयहरः सङ्कोचको निर्भरम् । आध्मानज्वरवेगरोधनपटू रक्तातिसारान्तकः रक्तस्रावहरोऽग्निदीप्तिजननो गन्धोद्भवो द्रावकः ॥१३१॥
१६८ रसतरङ्गिणी तृषां विसूचिकोद्भूवां हरत्ययं विशेषतः । तथातिघर्मरोधकः सदातिसारनाशनः ॥१३२॥ विकारान् दारुणान् नित्यं दुष्टनागाशनोत्थितान् । नाशयत्यचिरादेव तिमिरन्तु यथा रविः ॥१३३॥ निर्भरं अत्यर्थम् । सङ्कोचः मलस्तम्भक इत्यर्थः । अतिघर्मरोधकः प्रभू- तस्वेदहन्ता । सदा इति नियमेनेत्यर्थः । सङ्कोचकत्वादिति यावत् । दुष्टनागा- शनम् अशुद्धामृतसीसकभक्षणं तदुत्थान् पक्षवधादीन् ॥ १३१-१३३ ॥ इति गन्धकविज्ञानीयो नाम अष्टमस्तरङ्गः भा.टी.—गन्धकद्राव गुल्म और प्लीहारूपी हाथी के लिये अंकुश है । क्रिमिनाशक, सब उदर रोगों को नष्ट करनेवाला, उष्णवीर्य, विसूचिकारोग- नाशक, स्थानीयसंकोचक, मलस्तम्भक है । आध्मान युक्त ज्वरवेग को रोकने- वाला, रक्तातिसार में लाभदायक, तथा शरीर में से होनेवाले रक्तस्राव को बन्द करनेवाला है । इसके प्रयोग से अग्नि बढ़ती है । हैजे की प्यास को रोकने में यह विशेष रूप से लाभदायक है । इसके देने से रोग की अवस्था में अधिक निलकनेवाला पसीना रुक जाता है । अतीसार के लिये सदा उपयोगी है । इसके अतिरिक्त अशुद्ध नाग ( सीसा ) के सेवन से होनेवाले भयंकर विकारों को यह शीघ्र मिटाता है ॥ १३१-१३३ ॥ यह गन्धकविज्ञानीय नाम अष्टमतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ हिङ्गुलविज्ञानीयो नवमस्तरङ्गः हिङ्गुलस्य नामानि हिङ्गलो हिङ्गुलश्चैव हिङ्गुलं चेङ्गुलाह्वयम् । म्लेच्छं रक्तं सुरङ्गञ्च चित्राङ्गं चूर्णपारदम् ॥१॥ रसोद्भवो रसस्थानं रञ्जनं कपिशीर्षकम् । रक्तकायो हंसपादो दरदञ्च प्रकीर्तितम् ॥२॥ पर्यायभेदविवरणं शास्त्रे व्यवहारार्थम् ॥१-२॥ भा.टी.—हिंगल, हिंगुल, हिंगूल, इंगुल, म्लेच्छ, रक्त, सुरंग, चित्रांग, चूर्णपारद, रसोद्भव, रसस्थान, रञ्जन, कपिशीर्षक, रक्तकाय, हंसपाद और दरद, ये सब सिंगरफ के नाम या पर्यायवाचक शब्द हैं ॥ १-२ ॥
नवमस्तरङ्गः १६६ हिंगुलस्य स्वरूपम् जपाकुसुमवर्णाभः पेषणे सुमनोहरः । महोज्ज्वलो भारपूर्णो हिंगुलः श्रेष्ठ इष्यते ॥३॥ भा.टी.—उत्तम हिंगुल गुड़हल के पुष्प सदृश वर्ण का, पीसने में कोमल देखने में चमकीला लाल और भारयुक्त होता है ॥ ३ ॥ हिंगुलस्य द्वौ भेदौ प्रथमः खनिजोऽन्यस्तु कृत्रिमो हिंगुलो मतः । खनिजः खनितो जातः कृत्रिमो रसगन्धजः ॥४॥ खनिजःकृत्रिमश्चेति हिंगुलस्य द्वौ भेदौ। प्राञ्चस्तु—"दरदस्त्रिविधः प्रोक्त- श्चर्मारः शुकतुण्डकः । हंसपादस्तृतीयः स्याद् गुणवानुत्तरोत्तरः ॥” इत्याहुः । आचार्यैस्तु यथोपलब्धिव्यवस्थानमाचरितमिति विशेषः । वस्तुतस्तु—"चर्मारः शुकवर्णः स्यात् सपीतः शुकतुण्डकः। जपाकुसुमसंकाशो हंसपादो महोत्तमः ॥” इत्यनुविधानात् खनिजस्यैव विधात्रयमित्याहुः । कृत्रिमस्तु कठिनमसृणभेदा- द्विद्यते इति निर्माणप्रकारे वक्ष्यते ॥ ४ ॥ भा.टी.—हिंगुल के दो भेद होते हैं १—खनिज हिंगुल, २—कृत्रिम (बनावटी) हिंगुल । इसमें से खनिज हिंगुल खानों से प्राप्त होता है, किन्तु कृत्रिम पारदगन्धक से मृदंगयन्त्र द्वारा बनाया जाता है ॥ ४ ॥ वक्तव्य—प्राचीन रसशास्त्र मे हिंगुल के चर्मार, शुकतुण्डक तथा हंसपाद ये तीन भेद पाये जाते हैं । ये तीन भेद खनिज के समझने चाहिये । परन्तु यहाँ पर साधारणरूप से प्राप्त होनेवाले जपाकुसुमवर्ण हिंगुल का ही वर्णन किया गया है ॥ कृत्रिमहिंगुलस्य निर्माणप्रकारः वसुभागमितं गन्धं सूतं नेत्रयुगोन्मितम् । मृदङ्गयन्त्रे संस्थाप्य वारंगं भ्रामयेत्ततः ॥५॥ तस्य सम्भ्रमणादेव श्लक्ष्णचूर्णं प्रजायते । व्यावर्त्तनपिधानञ्च सम्भ्राम्य ह्यवतारयेत् ॥६॥ चूर्णं धूसरवर्णाभं यन्त्रान्निष्कासयेत्ततः । सुदृढायां ततः स्थाल्यां चूर्णमेतन्निधापयेत् ॥७॥ रेखान्वितमुखी स्थाली बुधैरत्र प्रशस्यते । व्यावर्तनमुखीमन्यां स्थालीं तस्यां निधापयेत् ॥८॥
२०० रसतरङ्गिणी स्थालीं सम्भ्राम्य परितो यत्नेन रोधयेन्मुखम् । ततः संस्थापयेच्चुल्यां वह्निं दद्याच्छनैः शनैः ॥६॥ अधःस्थालीकण्ठसंस्थं हिंगुलं तु समाहरेत् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थञ्च पुनः पक्त्वा समाहरेत् ॥१०॥ कृत्रिमहिंगुलनिर्माणप्रकारः—गन्धकस्याष्टौ भागाः, पारदस्य द्विचत्वारिंशद् भागाः, मृदङ्गयन्त्रं प्रागुक्तम् । वारङ्गं हस्तकम् । अधःस्थालीकण्ठलग्नं गन्धक- स्याल्पत्वात् मृदुतरम् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थं तु गन्धकस्य प्राचुर्य्यात्कठिनतरम् । तस्मात्तस्य पुनः पाकावश्यकता अवशिष्टगन्धकजारणद्वारा मार्दवसम्पादनाय । सोऽयं हिंगुलनिर्माणप्रकारः साम्प्रतं प्रचलितः । प्राञ्चस्तु वालुयन्त्रद्वारा हिंगुलनिर्माणमाहुः तत्तु बहुलायाससाध्यत्वात् दुष्करमिति स प्रकार उपेक्षित आचार्यैः ॥ ५–१० ॥ आ.टी.—आठ भाग गन्धक और बयालीस (४२) भाग पारद लेकर इसको पूर्वोक्त मृदंगयंत्र डालकर इसके वारंग (Handle) को घुमा दें । इसके घूमने से दबाव पड़ने के कारण पारद गन्धक का चमकीला बारीक चूर्ण हो जायगा । तब ढक्कन को घुमाकर अलग करके यन्त्र में से धूसरवर्णभ चूर्ण को निकाल करके उसे एक ऐसी स्थाली (पात्र) में रखें जिसके मुख पर बाहर की तरफ से गोल रेखायें (ढक्कन फिट करने के लिये चूड़ियाँ) बनी हों । अब इस स्थाली के मुख में एक दूसरी स्थाली, जिसके मुख पर भी रेखायें बनी हों, औंधी मुख जोड़कर (घुमाकर फिट करके सन्धिस्थल को अच्छी तरह) बन्द कर दें । अब इस यन्त्रको चूल्हे पर रखकर धीरे-धीरे अग्नि जलायें । अग्नि शान्त होने पर स्वांगशीत यन्त्र को खोलकर नीचे की स्थाली के कण्ठप्रदेश में लगे हुये कोमल हिंगुल को निकालें । और ऊपर की स्थाली के तल में जमे हुये कठोर हिंगुल को कोमल करने के लिये पुनः उसी प्रकार से पकाकर कोमल बना निकाल लें ॥ ५–१० ॥ अशुद्धहिंगुलस्य दोषाः अशुद्धो हिंगुलो मोहं प्रमेहं चित्तविभ्रमम् । आन्ध्यं क्लमं तथा क्लैब्यं कुर्य्यात्तस्माद्विशोधयेत् ॥११॥ अथाशुद्धहिंगुलदोषाः—मोहं धीविभ्रमम् । चित्तविभ्रमं तमस उद्रेकात् भ्रान्तिम् । क्लमः अनायासजातः श्रमो देहेन्द्रियम्लानताहेतुः । क्लैब्यं दुर्बल- तामिति यावत् । तस्मात् उक्तव्याधिहेतुत्वादित्यर्थः ॥ ११ ॥
नवमस्तरङ्गः २०१ भा.टी.-अशुद्धहिंगुल सेवन करने से बुद्धिभ्रम, प्रमेह रोग, चित्तविभ्रम, आँखों के सामने अँधेरा आना, बिना श्रम के थकावट अनुभव होना और शरीर में दुर्बलता रूप विकार हो जाते हैं, अतः हिंगुल को शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ११ ॥ अथ हिंगुलशोधनस्य प्रथमः प्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे शृंगवेराम्भसा ततः । सप्तधा भावयेत्प्राज्ञो निर्मलो हिंगुलो भवेत् ॥१२॥ शृङ्गवेरं आर्द्रकम् तत्तद्रसभावनाय च संयोगजविजातीयगुणान्तरोत्पत्त्या पूर्वदोषप्रध्वंसः । स चानुभवसाध्य इति प्राञ्चः । औषधबलाबलापेक्षया च एकधाऽनेकधा वा भावना ॥ १२ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में डालकर पीसें और इसको अदरक के रस की सात भावना देकर सुखा लें तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ वक्तव्य-अदरखरस या नीबूरस आदि से हिंगुल को भावना देकर अंत में उसमें जल भर दें, जब जल मात्र ऊपर आ जाय तो उस जल को अलग कर दें, नीचे के हिंगुल को सुखाकर काम लावें । जल से बिना धोये ही काम में लाने से दोषों का निर्हरण अच्छी तरह नहीं होता । द्वितीयः शोधनप्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे लकुचस्याम्भसा ततः । विभाव्य शोषयेद् वैद्यो हिंगुलः शुद्धिमाप्नुयात् ॥१३॥ लकुचस्याम्भसाऽपि सप्तधा भावना विधेया ॥ १३ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में चूर्ण करके बड़हड़ के जल से सात भावना देकर सुखा लेने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सुचूर्णितं हिंगुलन्तु मेषीदुग्धेन भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धमायात्यनुत्तमाम् ॥१४॥ अम्लवर्गोक्तभैषज्यैर्भावितः सप्तधा पुनः । हिंगुलः परमां शुद्धिमाप्नोतीति किमद्भुतम् ॥१५॥ मेषीदुग्धभावितस्य पुनरम्लवर्गभावनया गुणवृद्धिश्च भवतीति । तदेतदाहुः- “मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चि- तम् ॥” इति ॥ १४-१५ ॥
२०२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—हिंगुल को चूर्ण करके भेड़ के दूध की सात भावना देने से वह शुद्ध हो जाता है। फिर इस मेषीदुग्धभावित हिंगुल को अम्लवर्गोक्त औषधियों के रस से सात भावना देकर सुखा लिया जाय तो यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १४-१५ ॥ वक्तव्य—भेड़ के दूध में मर्दन करने से हिंगुल में घी का स्नेहांश रह जाता है। इसी को मिटाने के लिये पुनः हिंगुल को अम्लवर्ग से भावना दी जाती है। चतुर्थः शोधनप्रकारः निम्बूकरससेनेह हिङ्गुलं श्लक्ष्णचूर्णितम् । विभावयेत्सप्तवारं क्षालयेद्बहुशोऽम्भसा ॥ १६ ॥ ततः संशोषयेद् घर्मे रसतन्त्रविधानवित् । एवं विशोधितं रक्तं वीतशङ्क प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ चतुर्थे शोधनप्रकारे निम्बूकरससेन पेषणाद् दरदस्थः स्वतन्त्रः पारदो विश्लिष्टो भवत्यातपे शोषणाच्चोड्डीयत इति सोऽयं प्रकारः साधीयान् सिद्धः । स्पष्टमन्यत् ॥ १६-१७ ॥ भा.टी.—हिंगुलचूर्ण को खरल में डालकर नीबूरस के साथ मर्दन करते हुए सात भावना दें। फिर अन्त में इसको जल से अच्छी तरह अम्ल अंश निकलने तक धोकर धूप में सुखा लें। इस प्रकार शुद्ध हिंगुल को निःसंकोच योगों में काम में ला सकते हैं ॥ १६-१७॥ शोधितहिंगुलस्य गुणाः लोचनामयहरः कफापहः पित्तजामयनिषूदनः परम् । प्लीहकुष्ठगरकामलाहरो जाठराग्निजननोऽथ पाचनः ॥ १८ ॥ मेहवर्गपरितापनाशनो देहकान्तिबलवुद्धिवर्द्धनः । आमवातगजदर्पखण्डनो हिंगुलो विजयते ज्वरापहः ॥ १९ ॥ शोधितहिङ्गुलस्य गुणाः—लोचनामयाः नेत्ररोगाः। पित्तजामयाः दाहा- दयः। गरं कृत्रिमविषम् । मेहवर्गपरितापनाशन इति प्रमेहसमूहजनितदुःखवि- नाशी ॥ १८-१९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हिंगुल नेत्ररोगहर, कफप्रकोपनाशक, पित्तप्रकोपजन्य-रोग- हर है। यह विभिन्न औषधियोग से प्लीहा, कुष्ठ, गरविष तथा कामला रोगों को नष्ट करता है। यह पाचक, अग्निवर्धक तथा आमपाचन करता है। सम्पूर्ण प्रमेहों को नष्ट करता है। शरीर में कान्ति, बल-बुद्धि को बढ़ाता है। आमवात के प्रकोप को दूर करता है और ज्वरनाशक है ॥ १८-१९ ॥