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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

अग्निं सूनुं सनश्रुतं सहसो जातवेदसम्. वह्निं देवा अकृण्वत.. (४)
बल के पुत्र, सनातन रूप से प्रसिद्ध तथा जातवेद अग्नि को देवों ने हव्य ढोने वाला
बनाया है. (४)
अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्. तूर्णी रथः सदा नवः.. (५)
मानवी प्रजाओं के अग्रगामी, शीघ्रता करने वाले, रथ के समान द्रव्य ढोने वाले एवं
नित्य नवीन अग्नि का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता. (५)
साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानामामृक्तः. अग्निस्तुविश्रवस्तमः.. (६)
समस्त शत्रुसेना को पराजित करने वाले, शत्रुओं द्वारा अवध्य एवं देवों के पोषक अग्नि
अनेक प्रकार के अन्नों से युक्त हैं. (६)
अभि प्रयांसि वाहसा दाश्वां अश्नोति मर्त्यः. क्षयं पावकशोचिषः.. (७)
हव्य देने वाला मनुष्य हव्यवहन करने वाले अग्नि की कृपा से समस्त अन्नों को प्राप्त
करता है एवं पवित्र प्रकाश वाले अग्नि से घर पाता है. (७)
परि विश्वानि सुधिताग्नेरश्याम मन्मभिः. विप्रासो जातवेदसः.. (८)
हम प्रजासंपन्न एवं ज्ञानवान् होता आदि तुझ अग्नि के स्तोत्रों द्वारा समस्त हितकारक
धन प्राप्त करें. (८)
अग्ने विश्वानि वार्या वाजेषु सनिषामहे. त्वे देवास एरिरै.. (९)
हे अग्नि! समस्त देव तुम्हीं में प्रविष्ट हैं, इसलिए हम यज्ञों में तुमसे समस्त उत्तम धन
प्राप्त करें. (९)
सूक्त—१२ देवता—इंद्र एवं अग्नि
इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्यं पातं धियेषिता.. (१)
हे इंद्र एवं अग्नि! हमारी स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम शुद्ध किए हुए एवं उत्तम
सोमरस को लक्ष्य करके स्वर्ग से यहां आओ एवं हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्म में इसे
पिओ. (१)
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमिमं सुतम्.. (२)
हे इंद्र एवं अग्नि! स्तोता का सहायक, यज्ञ का साधन एवं इंद्रियों को आनंदित करने
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वाला सोमरस तुम्हारे समीप जाता है. इस निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. (२)
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे. ता सोमस्येह तृम्पताम्.. (३)
इस यज्ञ के साधनभूत सोमरस की प्रेरणा से मैं स्तोताओं के लिए सुखदाता इंद्र और
अग्नि का वरण करता हूं. वे इस यज्ञ में सोम पीकर तृप्त हों. (३)
तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता. इन्द्राग्नी वाजसातमा.. (४)
मैं शत्रुबाधक, वृत्रनाशक, विजयी, अपराजित एवं अधिक मात्रा में अन्न देने वाले इंद्र
तथा अग्नि को बुलाता हूं. (४)
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (५)
हे इंद्र एवं अग्नि! मंत्र जानने वाले होता आदि तथा स्तोत्रों के ज्ञाता स्तोता तुम्हारी
अर्चना करते हैं. मैं भी अन्न प्राप्त करने के लिए सभी प्रकार से तुम्हारा वरण करता हूं. (५)
इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (६)
हे इंद्र और अग्नि! तुमने एक ही प्रयास में दासों के नब्बे नगरों को कंपित कर दिया था.
(६)
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या३ अनु.. (७)
हे इंद्र और अग्नि! सोमरस के पाने वाले होता आदि यज्ञ के मार्ग को देखकर हमारे इस
कर्म के चारों ओर उपस्थित रहते हैं. (७)
इन्द्राग्नी तविषाणि वां सधस्थानि प्रयांसि च. युवोरप्तूर्यं हितम्.. (८)
हे इंद्र और अग्नि! तुम दोनों के बल और अन्न एक-दूसरे से अभिन्न हैं. जल वर्षा की
प्रेरणा का काम आप ही के बीच सीमित है. (८)
इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः. तद्वां चेति प्र वीर्यम्.. (९)
हे स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले इंद्र और अग्नि! तुम युद्धों में सर्वत्र विभूषित बनो. तुम
दोनों की शक्ति युद्ध की विजय का ज्ञान कराती है. (९)
सूक्त—१३ देवता—अग्नि
प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चामै. गमद्देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत्.. (१)
हे होताओ! अग्नि देव को लक्ष्य करके यथेष्ट मात्रा में स्तुति करो. यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ
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अग्नि देवों के साथ हमारे समीप आवें एवं कुश पर बैठें. (१)
ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः. हविष्मन्तस्तमीळते तं सनिष्यन्तोऽवसे..
(२)
द्यावापृथिवी जिस अग्नि के वश में हैं, देव उसके बल की सेवा करते हैं. वह सत्यकर्म
वाला है. (२)
स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः.
अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मघम्.. (३)
हे ऋत्विजो! मेधावी अग्नि यजमानों, यज्ञों एवं सोम के नियामक, कर्मफल एवं महान्
धन के दाता हैं. तुम उन्हीं अग्नि की सेवा करो. (३)
स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा.
यतो नः प्रष्णवद्वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्सुवा.. (४)
वे अग्नि हम हव्यदाताओं के लिए सुखकारक घर प्रदान करें. अग्नि के पास से धरती,
आकाश और स्वर्ग का उत्तम धन हमारे पास आवे. (४)
दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः.
ऋक्वाणो अग्निमन्धते होतारं विश्वपतिं विशाम्.. (५)
स्तुति करते हुए होता आदि दीप्तिमान्, प्रतिक्षण नवीन, देवों को बुलाने वाले तथा
प्रजाओं के परम पालक अग्नि को उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रज्वलित करते हैं. (५)
उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः. शं नः शोचा मरुद्वृधोऽग्ने सहस्रसातमः.. (६)
हे अग्नि! स्तुति करते समय हम यज्ञकर्त्ताओं की रक्षा करो. हे देवों को बुलाने वालों में
श्रेष्ठ! मंत्र बोलते समय हमारी रक्षा करो. हे मरुतों द्वारा बधित एवं हजारों धनों के दाता
अग्नि! हमारा सुख बढ़ाओ. (६)
नू नो रास्व सहस्रवत्तोकवत्पुष्टिमद्द्वसु. द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम्.. (७)
हे अग्नि! हमें पुत्र-पौत्र युक्त, पोषण करने वाला, दीप्तिमान् एवं शोभनशक्ति युक्त
हजारों प्रकार का क्षयरहित धन दो. (७)
सूक्त—१४ देवता—अग्नि
आ होता मन्द्रो विदथान्यस्थात्सत्यो यज्वा कवितमः स वेधाः.
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विद्युद्रथः सहसस्पुत्रो अग्निः शोचिष्केशः पृथिव्यां पाजो अश्रेत्..(१)
देवों का आह्वान करने वाले, स्तुतिकर्त्ताओं को प्रसन्न करने वाले, सत्यकर्मा, देवों के
यज्ञकर्त्ता, अत्यंत मेधावी, जगत् के विधाता, चमकीले रथ वाले, बल के पुत्र, ज्वालारूपी केश
वाले एवं धरती पर अपनी प्रज्ञा प्रकट करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में स्थित हैं. (१)
अयामि ते नमउक्तिं जुषस्व ऋतावस्तुभ्यं चेतते सहस्वः.
विद्वाँ आ वक्षि विदुषो नि षत्सि मध्य आ बर्हिरूतये यजत्र.. (२)
हे यज्ञस्वामी अग्नि! मैं तुम्हारे प्रति नमस्कार करता हूं. हे बलवान्! तुझ यज्ञकर्मज्ञापक
के प्रति जो नमस्कार किया है, उसे स्वीकार करो. हे विद्वान् एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! विद्वानों
को हमारे यज्ञ में लाओ एवं हमारी रक्षा करने के निमित्त बिछे हुए कुशों पर बैठो. (२)
द्रवतां त उषसा वाजयन्ती अग्ने वातस्य पथ्याभिरच्छ.
यत्सीमञ्जन्ति पूर्व्यं हविर्भिर्वा वन्धुरेव तस्थतुर्दुरोणे.. (३)
हे अग्नि! अन्न का निर्माण करने वाली उषा तथा निशा तुम्हारे समीप जाती हैं. तुम भी
वायुरूपी मार्ग से उनके समीप जाओ, क्योंकि ऋत्विज् हवि द्वारा तुझ प्राचीन अग्नि को
सींचते हैं. जुए की तरह परस्पर मिली हुई उषा और निशा हमारी यज्ञशाला में बार-बार रहें.
(३)
मित्रश्च तुभ्यं वरुणः सहस्वोऽग्ने विश्वे मरुतः सुम्नमर्चन्.
यच्छोचिषा सहसस्पुत्र तिष्ठा अभि क्षितीः प्रथयन्त्सूर्यो नॄन्.. (४)
हे बलसंपन्न अग्नि! मित्र, वरुण, विश्वेदेव एवं मरुत् तुम्हें लक्ष्य करके स्तोत्र धारण करते
हैं, क्योंकि तुम्हीं बल के पुत्र तथा सूर्य हो और मनुष्यों को मार्ग दिखाने वाली किरणें सब
जगह फैलाकर प्रकाश से दीप्त हो. (४)
वयं ते अद्य ररिमा हि काममुत्तानहस्ता नमसोपसद्य.
यजिष्ठेन मनसा यक्षि देवानस्रेधता मन्मना विप्रो अग्ने.. (५)
हे अग्नि! ऊपर हाथ उठाकर हम आज पर्याप्त मात्रा में द्रव्य देते हैं. हे मेधावी! हमारी
तपस्या से प्रसन्न होकर मन में हमारे यज्ञ की रक्षा करते हुए बहुत से स्तोत्रों द्वारा देवों की
पूजा करो. (५)
त्वद्धि पुत्र सहसो वि पूर्वीर्देवस्य यन्त्यूतयो वि वाजाः.
त्वं देहि सहस्रिणं रयिं नोऽद्रोघेण वचसा सत्यमग्ने.. (६)
हे बल के पुत्र अग्नि! रक्षणकार्य एवं अन्न तुम्हारे पास से यजमान के समीप जाता है.
तुम द्रोहरहित वचनों से प्रसन्न होकर हमें हजारों प्रकार का धन एवं सत्यशील पुत्र दो. (६)
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सूक्त—१५ देवता—अग्नि

तुभ्यं दक्ष कविक्रतो यानीमा देव मर्तासो अध्वरे अकर्म.
त्वं विश्वस्य सुरथस्य बोधि सर्वं तदग्ने अमृत स्वदेह.. (७)
हे शक्तिशाली, सर्वज्ञ एवं दीप्यमान अग्नि! हम यजमान तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ में जो
द्रव्य देते हैं, तुम उस सबका भक्षण करके यजमानों की रक्षा के लिए जाग्रत बनो. तुम
मरणरहित हो. (७)
सूक्त—१५ देवता—अग्नि
वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवा:.
सुशर्मणो बृहत: शर्मणि स्यामग्नेरहं सुहवस्य प्रणीतौ.. (१)
हे अग्नि! विस्तीर्ण तेज द्वारा अत्यंत दीप्त तुम हमारे शत्रुओं तथा रोगरहित राक्षसों का
विनाश करो. मैं सुखदाता, महान् एवं उत्तम आह्वान वाले अग्नि की सुखद रक्षा में रहूंगा.
(१)
त्वं नो अस्या उषसो व्युष्टौ त्वं सूर उदिते बोधि गोपा:.
जन्मेव नित्यं तनयं जुषस्व स्तोमं मे अग्ने तन्वा सुजात.. (२)
हे अग्नि! तुम वर्तमान उषा के प्रकाशित एवं सूर्य के निकलने के बाद हमारी रक्षा के
निमित्त जागो. हे स्वयंभू! तुम हमारी स्तुतियां उसी प्रकार स्वीकार करो, जैसे पिता पुत्र को
स्वीकार करता है. (२)
त्वं नृचक्षा वृषभानु पूर्वी: कृष्णास्वग्ने अरुषो वि भाहि.
वसो नेषि च पर्षि चात्यंह: कृधी नो राय उशिजो यविष्ठ.. (३)
हे कामवर्षक एवं मानवों के शुभाशुभदर्शक अग्नि! तुम अंधेरी रातों में पहले की अपेक्षा
अधिक चमकते हुए ज्वालाओं को विस्तृत करो. हे वासदाता! हमें कर्मानुरूप फल दो तथा
पाप का नाश करो. हे अतिशय युवक! हमें धन का अभिलाषी बनाओ. (३)
अषाळ्हो अग्ने वृषभो दीदिहि पुरो विश्वा: सौभगा सञ्जिगीवान्.
यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोर्जातवेदो बृहत: सुप्रणीते.. (४)
हे शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं कामवर्षक अग्नि! तुम शत्रुओं की समस्त नगरियों एवं
उन में स्थित धन को भली प्रकार जीत कर प्रकाशित बनो. हे शोभनकर्मा एवं जातवेद अग्नि!
तुम महान् यज्ञ के नेता एवं आश्रयदाता तथा पूर्णकर्त्ता बनो. (४)
अच्छिद्रा शर्म जरित: पुरूणि देवाँ अच्छा दीद्यान: सुमेधा:.
रथो न सस्निरभि वक्षि वाजमग्ने त्वं रोदसी न: सुमेके.. (५)
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हे अंतकाल में सबको जलाने वाले, शोभन प्रज्ञा वाले तथा दीप्तिसंपन्न अग्नि! देवों के
लिए सारे अग्निहोत्रादि कर्मों को पूर्ण करो. हे अग्नि! तुम यहीं ठहर कर देवों को दिया हुआ
हमारा द्रव्य उसी प्रकार वहन करो, जिस प्रकार रथ किसी वस्तु को ढोता है. (५)
प्र पीपय वृषभ जिन्व वाजानग्ने त्वं रोदसी नः सुदोधे.
देवेभिर्देव सुरुचा रुचानो मा नो मर्तस्य दुर्मतिः परि छात्.. (६)
हे कामवर्षक अग्नि! तुम हमारे अभिलषित फल बढ़ाओ तथा अन्न प्रदान करो. हे देव!
शोभन किरणों द्वारा प्रकाशित तुम देवों के साथ मिलकर धरती-आकाश को हमारे लिए
फलप्रद बनाओ. शत्रुओं संबंधी पराभव हमारे समीप न आवे. (६)
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (७)
हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधनरूप गौ प्रदान
करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो.
(७)
सूक्त—१६ देवता—अग्नि
अयमग्निः सुवीर्यस्येशे महः सौभाग्यस्य.
राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्.. (१)
यह अग्नि शोभन सामर्थ्य युक्त, महान् सौभाग्य के स्वामी, गाय एवं उत्तम संतानयुक्त
धन के स्वामी एवं शत्रुरूपी पापों के नष्ट करने में समर्थ हैं. (१)
इमं नरो मरुतः सश्चता वृधं यस्मिन्प्रायः शेवृधासः.
अभि ये सन्ति पृतनासु दूढ्यो विश्वाहा शत्रुमादभुः.. (२)
हे यज्ञकर्म के वेत्ता मरुतो! सौभाग्य बढ़ाने वाले अग्नि की सेवा करो. इसमें सुख बढ़ाने
वाले धन हैं. मरुद्गण सेनाओं वाले बड़े युद्धों में शत्रुओं को हराते हैं एवं सदा शत्रुओं का नाश
करते हैं. (२)
स त्वं नो रायः शिशीहि मीढ्वो अग्ने सुवीर्यस्य.
तुविद्युम्न वर्षिष्ठस्य प्रजावतोऽनमीवस्य शुष्मिणः.. (३)
हे प्रभूत धन से युक्त एवं अभिलाषापूरक अग्नि! हमें अधिक मात्रा वाला, संतानयुक्त,
आरोग्य, शक्ति एवं सामर्थ्यसंपन्न तथा धन का स्वामी बनाओ. (३)
चक्रियों विश्वा भुवनाभि सासहिश्शुक्रिर्देवेष्वा दुवः.
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आ देवेषु यतत आ सुवीर्य आ शंस उत नृणाम्.. (४)
समस्त विश्व के कर्त्ता अग्नि विश्व में निवास करते हैं, द्रव्य को ढोते हुए देवों के समीप ले
जाते हैं. स्तोताओं के सामने आते हैं, यज्ञकर्त्ताओं के स्तोत्र सुनने आते हैं तथा युद्ध में मानवों
की रक्षा करते हैं. (४)
मा नो अग्नेऽमतये मावीरतायै रीरधः.
मागोतायै सहसस्पुत्र मा निदेऽप द्वेषांस्या कृधि.. (५)
हे बल के पुत्र अग्नि! हमें शत्रुरूप दरिद्रता, कायरता, पशुहीनता एवं निंदा के योग्य मत
करना. हमारे प्रति द्वेष की भावना समाप्त करो. (५)
शग्धि वाजस्य सुभग प्रजावतोऽग्ने बृहतो अध्वरे.
सं राया भूयसा सृज मयोभुना तुविद्युम्न यशस्वता.. (६)
हे शोभन धन के स्वामी अग्नि! तुम यज्ञ में महान् एवं संतानयुक्त धन के स्वामी हो. हे
बहुधनसंपन्न अग्नि! हमें अधिक मात्रा वाला, सुखकारक एवं कीर्तिदाता धन प्रदान करो. (६)
सूक्त—१७ देवता—अग्नि
समिध्यमानः प्रथमानु धर्मा समक्तुभिरज्यते विश्ववारः.
शोचिष्केशो घृतनिर्णिक्पावकः सुयज्ञो अग्निर्यजथाय देवान्.. (१)
यज्ञ संबंधी कर्मों के धारक, ज्वालाारूपी केश वाले, सबके स्वीकार्य, पवित्र करने वाले
एवं शोभन यज्ञों से युक्त अग्नि यज्ञ के प्रारंभ में क्रमशः जलते हैं एवं देवयज्ञ करने के लिए घी
से सींचे जाते हैं. (१)
यथायजो होत्रमग्ने पृथिव्या यथा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्.
एवानेन हविषा यक्षि देवान् मनुष्वद्यज्ञं प्र तिरेममद्य.. (२)
हे जातवेद एवं सर्वज्ञ अग्नि! तुमने जिस प्रकार यजमानरूप पृथ्वी का हवि स्वीकार
किया, जिस प्रकार आकाश देवता का द्रव्य स्वीकार किया, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में होता
बनकर देवों को उनका भाग प्रदान करो. तुम मनु के यज्ञ के समान हमारा यज्ञ आज पूरा
करो. (२)
त्रीण्यायूंषि तवं जातवेदस्तिस्र आजानीरुषसस्ते अग्ने.
ताभिर्देवानांमवो यक्षि विद्वानथा भव यजमानाय शं योः.. (३)
हे जातवेद अग्नि! तुम्हारा अन्न तीन प्रकार का है तथा तीन प्रकार की उषाएं तुम्हारी
माता हैं. तुम उनके साथ मिलकर देवों को हव्य दो. हे विद्वान् अग्नि! तुम यजमान के सुख
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और कल्याण के कारण बनो. (३)
अग्निं सुदीतिं सुदृशं गृणन्तो नमस्यामस्त्वेज्यं जातवेदः.
त्वां दूतमरतिं हव्यवाहं देवा अकृण्वन्नमृतस्य नाभिम्.. (४)
हे जातवेद अग्नि! हम शोभन दीप्ति वाले, सुंदर एवं स्तुति के योग्य तुम्हें नमस्कार करते
हैं. देवों ने तुम्हें विषयों से आसक्ति रहित, हव्य वहन करने वाला दूत तथा अमृत की नाभि
बनाया है. (४)
यस्त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्द्विता च सत्ता स्वधया च शम्भुः.
तस्यानु धर्म प्र यजा चिकित्वोऽथा नो धा अध्वरं देववीतौ.. (५)
हे सर्वज्ञ अग्नि! तुमसे पहले जो विशेष यज्ञ करने वाले हुए थे एवं स्वधा के साथ उत्तम
तथा मध्यम स्थानों पर बैठे कर जिन्होंने सुख पाया था, उनके धारक गुणों का विचार करके
पहले उनका यज्ञ पूरा करो. इसके बाद देवों को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ पूरा करो. (५)
सूक्त—१८ देवता—अग्नि
भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः.
पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः.. (१)
हे अग्नि! तुम हमारे सामने आकर अनुकूल एवं कर्मसाधक बनो, जिस प्रकार मित्र के
प्रति मित्र एवं संतान के प्रति माता-पिता होते हैं. मनुष्य मनुष्यों के द्रोही बने हैं. तुम हमारे
विरोधी शत्रुओं को भस्म करो. (१)
तपो ष्वग्ने अन्तराँ अमित्रान् तपा शंसमरुषः परस्य.
तपो वसो चिकितानो अचित्तान्वि ते तिष्ठन्तामजरा अयासः.. (२)
हे अग्नि! हमें हराने के इच्छुक शत्रुओं के बाधक बनो. हमारे शत्रु तुम्हें द्रव्य नहीं देते,
उनकी इच्छा नष्ट करो. हे निवास देने वाले एवं कर्मज्ञाता अग्नि! यज्ञकर्म में मन न लगाने
वालों को दुःखी करो, क्योंकि तुम्हारी किरणें जरारहित एवं निर्बाध हैं. (२)
इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय.
यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्.. (३)
हे अग्नि! मैं धन की अभिलाषा करता हुआ तुम्हें वेग और सामर्थ्य देने के लिए समिधा
एवं घी के साथ हव्य देता हूं. मैं जब तक स्तुतियों से तुम्हारी वंदना कर सकूं, तब तक मुझे
धन दो एवं मेरी इस स्तुति को अपरिमित धन के हेतु अद्वितीय बनाओ. (३)
उच्छोचिषा सहसस्पुत्र स्तुतो बृहद्वयः शशमानेषु धेहि.
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रेवदग्ने विश्वामित्रेषु शं योर्मर्मृज्मा ते तन्वं१ भूरि कृत्वः.. (४)
हे बल के पुत्र अग्नि! अपनी ज्योति से प्रकाशमान बनो एवं स्तुति सुनकर प्रशंसा करने
वाले विश्वासपात्र पुत्रों को बहुत धन से युक्त अन्न, आरोग्य तथा निर्भयता प्रदान करो. हे
यज्ञकर्त्ता अग्नि! हम बार-बार तुम्हारे शरीर को सींखें. (४)
कृधि रत्नं सुसनितर्धनानां स घेदग्ने भवसि यत्समिद्धः.
स्तोतुर्दुरोणे सुभगस्य रेवत्स्पृश्रा करस्ना दधिषे वपूंषि.. (५)
हे इष्टदाता अग्नि! हमें धनों में उत्तम धन दो. जिस समय तुम प्रज्वलित बनो, उस समय
उत्तम धन दो. शोभन धनयुक्त स्तोता के घर की ओर अपनी दोनों सुंदर भुजाओं को धन देने
के लिए फैलाओ. (५)
सूक्त—१९ देवता—अग्नि
अग्निं होतारं प्र वृणे मियेधे गृत्सं कविं विश्वविदममूरम्.
स नो यक्षद्देवताता यजीयान्नाये वाजाय वनते मघानि.. (१)
हम देवस्तुतिकारक, सर्वज्ञ एवं अमूढ़ अग्नि को इस यज्ञ में होता वरण करते हैं. वह
अतिशय यज्ञपात्र होकर हमारे कल्याण के लिए देव संबंधी यज्ञ करें तथा धन व अन्न देने के
लिए हमारा हव्य स्वीकार करें. (१)
प्र ते अग्ने हविष्मतीमियर्म्यच्छा सुद्युम्नां रातिनीं घृताचीम्.
प्रदक्षिणिद्देवतातिमुराणः सं रातिभिर्वसुभिर्यज्ञमश्रेत्.. (२)
हे अग्नि! मैं तेजयुक्त, हव्य से पूर्ण, हव्य देने वाला एवं घी से भरा हुआ जुहू नामक पात्र
तुम्हारे सामने करता हूं. देवों का मान बढ़ाने वाले अग्नि हमें देने के लिए धन लेकर प्रदक्षिणा
करते हुए यज्ञ में आवें. (२)
स तेजीसया मनसा त्वोत उत शिक्ष स्वपत्यस्य शिक्षोः.
अग्ने रायो नृतमस्य प्रभूतौ भूयाम ते सुष्टुतयश्च वस्वः.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित व्यक्ति का मन तेजस्वी हो जाता है. उसे उत्तम संतानयुक्त
धन दो. हे अभीष्ट फल दान के इच्छुक अग्नि! तुम उत्तम धन देने वाले हो. तुम्हारी महिमा से
हम तुम्हारी स्तुति करते हुए धन के पात्र बनें. (३)
भूराणि हि त्वे दधिरे अनीकाग्ने देवस्य यज्यवो जनासः.
स आ वह देवतातिं यविष्ठ शर्धो यदद्य दिव्यं यजासि.. (४)
हे प्रकाशयुक्त अग्नि! तुम्हारा यज्ञ करने वालों ने बहुत तेज प्रदान किया है. तुम यज्ञ के

योग्य देवों को यहां बुलाओ, क्योंकि तुम देवों का तेज धारण करते हो. (४)
यत्त्वा होतारमनजन्मिषेधे निषादयन्तो यजथाय देवाः.
स त्वं नो अग्नेऽवितेह बोध्यधि श्रवांसि धेहि नस्तनूषु.. (५)
हे अग्नि! यज्ञकर्म करने के लिए बैठे हुए तेजस्वी ऋत्विज् यज्ञ में तुम्हें होता नाम देकर
घी की आहुति से सींचते हैं. अतः तुम हमारी रक्षा के निमित्त आओ एवं हमारी संतान को
अन्न दो. (५)
सूक्त—२० देवता—अग्नि
अग्निमुषमश्विना दधिक्रां व्युष्टिषु हवते वह्निरुक्थैः.
सुज्योतिषो नः शृण्वन्तु देवाः सजोषसो अध्वरं वावशनाः.. (१)
हव्य वहन करने वाले अग्नि उषा को अधिकाररहित करते समय उषा, अश्विनीकुमार
एवं दधिक्रा को सूक्तों के द्वारा बुलाते हैं. शोभन बुद्धि वाले एवं परस्पर संगत देवगण हमारे
यज्ञ की कामना करते हुए उस आह्वान को सुनें. (१)
अग्ने त्री ते वाजिना त्री षधस्था तिस्रस्ते जिह्वा ऋतजात पूर्वीः.
तिस्र उ ते तन्वो देववातास्ताभिर्नः पाहि गिरो अप्रयुच्छन्.. (२)
हे यज्ञों में उत्पन्न अग्नि! तुम्हारे अन्नस्थान एवं देवों का उदर पूर्ण करने वाली जिह्वाएं
तीन हैं. तुम सावधान होकर देवों द्वारा अभिलषित तीन शरीरों के द्वारा हमारे स्तोत्रों की रक्षा
करो. (२)
अग्ने भूरीणि तव जातवेदो देव स्वधावोऽमृतस्य नाम.
याश्च माया मायिनां विश्वमिन्व त्वे पूर्वीः सन्दधुः पृष्टबन्धो.. (३)
हे द्योतमान, जातवेद, अन्न स्वामी एवं मरणरहित अग्नि! देवों ने तुम्हें बहुत से नाम दिए
हैं. हे विश्वतृप्तिकारक एवं वांछित फल देने वाले अग्नि! देवों ने मायावियों की जो बहुत सी
मायाएं तुम में धारण की थीं, वे तुममें हैं. (३)
अग्निर्नेता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा.
स वृत्रहा सनयो विश्ववेदाः पर्षद्विश्वाति दुरिता गृणन्तम्.. (४)
ऋतुओं के पालक सूर्य के समान जो अग्नि मानवों और देवों के नियामक, सत्यकर्मा,
वृत्रनाशक, सनातन, सर्वज्ञाता एवं तेजस्वी हैं, वे स्तुतिकर्त्ता के सारे पापों का अतिक्रमण
करके पार लगावें. (४)
दधिक्रामग्निमुषसं च देवीं बृहस्पतिं सवितारं च देवम्.
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सूक्त—२१ देवता—अग्नि

अश्विना मित्रावरुणा भगं च वसून्द्रदाँ आदित्याँ इह हुवे.. (५)
मैं दधिक्रा, अग्नि, उषादेवी, बृहस्पति, सविता देव, अश्विनीकुमार, मित्र, वरुण, भग,
वसूओं, रुद्रों एवं आदित्यों को इस यज्ञ में बुलाता हूं. (५)
सूक्त—२१ देवता—अग्नि
इमं नो यज्ञममृतेषु धेहीमा हव्या जातवेदो जुषस्व.
स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य होतः प्राशान प्रथमो निषद्य.. (१)
हे जातवेद! हमारा यह यज्ञ देवों के पास ले जाओ एवं इन हव्यों का सेवन करो. हे
होता! यज्ञ में बैठकर तुम सबसे पहले चर्बी और घी की बूंदों को भली-भांति भक्षण करो. (१)
घृतवन्तः पावक ते स्तोकाः श्चोतन्ति मेदसः.
स्वधर्मन्देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्.. (२)
हे पापशोधक अग्नि! इस सांगोपांग यज्ञ में तुम्हारे एवं देवों के भक्षण के लिए घी की
बूंदें टपक रही हैं. इस कारण हमें श्रेष्ठ एवं वरण योग्य धन दीजिए. (२)
तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने विप्राय सन्त्य.
ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे यज्ञस्य प्राविता भव.. (३)
हे यज्ञकर्त्ताओं को फलप्रद एवं मेधावी अग्नि! घी की टपकने वाली बूंदें तुम्हारे लिए हैं.
हे ऋषि एवं श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हें प्रज्वलित किया जाता है. तुम यज्ञपालक बनो. (३)
तुभ्यं श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य.
कविशस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर.. (४)
हे नित्य गतिशील एवं शक्तिसंपन्न अग्नि! चर्बीरूपी घी की सभी बूंदें तुम्हारे लिए
टपकती हैं. हे कवियों द्वारा स्तुत अग्नि! तुम महान् तेज के साथ यज्ञ में आओ. हे मेधावी!
हमारे हव्यों का सेवन करो. (४)
ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्धृतं प्र ते वयं ददामहे.
श्चोतन्ति ते वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान्देवशो विहि.. (५)
हे अग्नि! हम पशु के मध्य भाग से अत्यंत ओजपूर्ण चर्बी तुम्हें देते हैं. हे निवास प्रदान
करने वाले अग्नि! त्वचा के ऊपर तुम्हारे उद्देश्य से जो बूंदें गिरती हैं, उन्हें प्रत्येक देव को
प्रदान करो. (५)
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सूक्त—२२ देवता—अग्नि

सूक्त—२२ देवता—अग्नि
अयं सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः.
सहस्रिणं वाजमत्यं न सप्तिं ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (१)
यह वही अग्नि है, जिस में अभिषुत सोमरस को कामना करने वाले इंद्र ने अपने उदर में
रखा था. हे जातवेद अग्नि! हजार रूपों वाले अश्व के समान वेगशाली एवं हव्य का सेवन
करने वाले तुम्हारी स्तुति सारा संसार करता है. (१)
अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र.
येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (२)
हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम्हारा जो तेज आकाश, धरती, ओषधियों एवं जल में है, जिस
तेज के द्वारा तुमने अंतरिक्ष को विस्तृत किया है, वह तेज आसमान, दीप्तिमान् सागर के
समान विस्तृत एवं मनुष्यों के लिए दर्शनीय है. (२)
अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ ऊचिषे धिष्ण्या ये.
या रोचने परस्तात्सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः.. (३)
हे अग्नि! तुम आकाश में व्याप्त जल को लक्ष्य करके जाते हो एवं प्राण संयुक्त देवों को
एकत्र करते हो. सूर्य के ऊपर रोचन नामक लोक में तथा सूर्य के नीचे जो जल वर्तमान हैं,
उन्हें तुम्हीं प्रेरणा देते हो. (३)
पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः.
जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवा इषो महीः.. (४)
बालू मिली हुई अग्नियां खुदाई के काम आने वाले औजारों से मिलकर इस यज्ञ का
सेवन करें तथा हमारे प्रति द्रोहरहित होकर हमें रोगरहित महान् अन्न दें. (४)
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५)
हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधन रूप गौ प्रदान
करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो.
(५)
सूक्त—२३ देवता—अग्नि
निर्मथितः सुधित आ सधस्थे युवा कविरध्वरस्य प्रणेता.
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जूर्यत्स्वग्निरजरो वनेष्वत्रा दधे अमृतं जातवेदाः.. (१)
अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न, यजमान के घर में यज्ञकुंड में स्थापित, युवा, क्रांतदर्शी, यज्ञ
पूर्ण करने वाले, जातवेद, महान् एवं अरण्यों के नष्ट होने पर भी जरारहित अग्नि इस यज्ञ में
अमृत धारण करते हैं. (१)
अमन्थिष्टां भारता रेवदग्निं देवश्रवा देववातः सुदक्षम्.
अग्ने वि पश्य बृहताभि रायेषां नो नेता भवतादनु द्यूनू.. (२)
हे अग्नि! भरत के पुत्रों—देवाश्रय एवं देववात ने शोभन सामर्थ्य तथा धनयुक्त तुम्हें
अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न किया था. हे अग्नि! पर्याप्त धन लेकर हमारी ओर देखो एवं प्रतिदिन
हमारे अन्नों के लाने वाले बनो. (२)
दश क्षिपः पूर्व्यं सीमजीजनन्त्सुजातं मातृषु प्रियम्.
अग्निं स्तुहि दैववातं देवश्रवो यो जनानामसद्वशी.. (३)
हे अग्नि! दस उंगलियों ने तुझ पुरातन को उत्पन्न किया है. हे देवश्रव! माता के समान
अरणियों के बीच में भली प्रकार उत्पन्न, प्रिय एवं देववात द्वारा मथित अग्नि की स्तुति करो.
वे अग्नि यजमानों के वश में रहते हैं. (३)
नि त्वा दधे वर आ पृथिव्या इळायास्पदे सुदिनत्वे अह्नाम्.
दृषद्वत्यां मानुष आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि.. (४)
हे अग्नि! उत्तम दिनों की प्राप्ति के लिए मैं तुम्हें गौ-रूप-धारिणी धरती के उत्तम स्थान
में स्थापित करता हूं. हे धनसंपन्न अग्नि! तुम दृषद्वती, आपया एवं सरस्वती नदियों के
मानव-सहित तटों पर जलो. (४)
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५)
हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेकानेक यज्ञकर्मों की साधन रूप गौ
प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे
अनुकूल हो. (५)
सूक्त—२४ देवता—अग्नि
अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य. दुष्टरस्तरन्नरातीर्वर्र्चो धा यज्ञवाहसे.. (१)
हे अग्नि! शत्रुओं की सेना को हराओ तथा यज्ञ में विघ्न डालने वालों को दूर भगाओ.
तुम अजित हो, इसलिए शत्रुओं को अपने तेज से तिरस्कृत करके यजमान को अन्न दो. (१)

अग्न इळा समिध्यसे वीतिहोत्रा अमर्त्यः. जुषस्व सू नो अध्वरम्.. (२)
हे यज्ञ को प्रेम करने वाले तथा मरणरहित अग्नि! तुम्हें उत्तर वेदी पर जलाया जाता है.
तुम हमारे यज्ञ की भली प्रकार सेवा करो. (२)
अग्ने द्युम्नेन जागृवे सहसः सूनवाहुत. इदं बर्हिः सदो मम.. (३)
हे स्वतेज से जागृत एवं बल के पुत्र अग्नि! मेरे द्वारा बुलाए हुए तुम मेरे द्वारा बिछाए
हुए कुशों पर बैठो. (३)
अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्देवेभिर्महया गिरः. यज्ञेषु य उ चायवः.. (४)
हे अग्नि! अपने पूजकों के यज्ञों में समस्त तेजस्वी अग्नियों के साथ स्तुति वचनों का
आदर करो. (४)
अग्ने दा दाशुषे रयिं वीरवन्तं परीणसम्. शिशीहि न सूनुमतः.. (५)
हे अग्नि! हव्यदाता यजमान को संतानयुक्त पर्याप्त धन दो तथा हम संतान वालों की
उन्नति करो. (५)
सूक्त—२५ देवता—अग्नि
अग्ने दिवः सूनुरसि प्रचेतास्तना पृथिव्या उत विश्ववेदाः.
ऋधग्देवाँ इह यजा चिकित्वः.. (१)
हे सर्वविषयज्ञाता तथा यज्ञकर्म के ज्ञान से युक्त अग्नि! तुम आकाश तथा धरती के पुत्र
हो. हे चेतनाशील अग्नि! तुम इस यज्ञ में अलग-अलग हवि देकर देवों का आदर करो. (१)
अग्निः सनोति वीर्याणि विद्वानत्सनोति वाजममृताय भूषण्.
स नो देवाँ एह वहा पुरुक्षो.. (२)
अग्नि स्वयं को विभूषित करके यजमान को सामर्थ्य तथा देवों को अन्न देते हैं. हे
बहुविध अन्नयुक्त अग्नि! हमारे कल्याण के निमित्त देवों को इस यज्ञ में लाओ. (२)
अग्निद्यावापृथिवी विश्वजन्ये आ भाति देवी अमृते अमूरः.
क्षयन्वाजैः पुरुश्चन्द्रो नमोभिः.. (३)
सर्वज्ञ, समस्त विश्व के स्वामी, अमित प्रकाशयुक्त, बल एवं अन्नसहित अग्नि संसार को
जन्म देने वाले, द्योतमान और मरणरहित धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (३)
अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुतावते यज्ञमिहोप यातम्.
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अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा.. (४)
हे अग्नि! इंद्र के साथ यहां आकर यज्ञ की हिंसा न करते हुए सोम निचोड़ने वाले
यजमान के घर में सोम पीने के लिए आओ. (४)
अग्ने अपां समिध्यसे दुरोणे नित्यः सूनो सहसो जातवेदः.
सधस्थानि महयमान ऊती.. (५)
हे बल के पुत्र, अविनाशी एवं जातवेद अग्नि! रक्षा के द्वारा लोकों को महान् बनाते हुए
तुम जल के स्थान आकाश में भली प्रकार प्रकाशित होते हो. (५)
सूक्त—२६ देवता—अग्नि
वैश्वानरं मनसाग्निं निचाय्या हविष्मन्तो अनुषत्यं स्वर्विदम्.
सुदानुं देवं रथिरं वसूयवो गीर्भी रण्वं कुशिकासो हवामहे.. (१)
हे अग्नि! हव्य धारण करने वाले, धन के इच्छुक एवं कुशिक गोत्र में उत्पन्न हम लोग
तुझ वैश्वानर, सत्यप्रतिज्ञ, स्वर्गादि फल देने वाले, यज्ञ के ज्ञाता, फल देने वाले, रथ के स्वामी,
यज्ञों में जाने वाले एवं तेजस्वी अग्नि को अतःकरण से जानते हुए स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं.
(१)
तं शुभ्रमग्निमवसे हवामहे वैश्वानरं मातरिश्वानमुक्थ्यम्.
बृहस्पतिं मनुषो देवतातये विप्रं श्रोतारमतिथिं रघुष्यदम्.. (२)
हम द्योतमान, वैश्वानर, मातरिश्वा, ऋचाओं द्वारा आह्वानयोग्य, यज्ञ के स्वामी, मेधावी,
श्रोता, अतिथि, शीघ्रगामी अग्नि को अपनी रक्षा तथा यजमान के यज्ञ के निमित्त बुलाते हैं.
(२)
अश्वो न क्रन्दञ्जनिभिः समिध्यते वैश्वानरः कुशिकेभिर्युगेयुगे.
स नो अग्निः सुवीर्यं स्वश्व्यं दधातु रत्नममृतेषु जागृविः.. (३)
हिनहिनाता हुआ घोड़े का बच्चा जैसे घोड़ी के द्वारा बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार
कुशिक गोत्र वाले लोग अग्नि को प्रतिदिन बढ़ाते हैं. मरणरहित देवों में जागने वाले अग्नि हमें
उत्तम संतान एवं श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त धन दें. (३)
प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः शुभे सम्मिश्लाः पृषतीरयुक्षत.
बृहदुक्षो मरुतो विश्ववेदसः प्र वेपयन्ति पर्वतां अदाभ्याः.. (४)
वेग वाली अग्नियां जल की ओर जावें. बलशाली मरुतों के साथ जल में मिलकर बूंदों
को बनावें. सब कुछ जानने वाले एवं अपराजेय मरुद्गण अधिक जल से भरे हुए तथा
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पर्वताकार मेघों को कंपित करते हैं. (४)

पर्वताकार मेघों को कंपित करते हैं. (४)
अग्निश्रियो मरुतो विश्वकृष्टय आ त्वेषमुग्रमव ईमहे वयम्.
ते स्वानिनो रुद्रिया वर्षनिर्णिजः सिंहा न हेषक्रतवः सुदानवः.. (५)
अग्नि के आश्रित एवं वृक्षों को आकर्षित करने वाले मरुतों का उज्ज्वल एवं सशक्त
आश्रय पाने के लिए हम याचना करते हैं. वे रुद्रपुत्र मरुद्गण वर्षा का रूप धारण करने वाले,
हिनहिनाते हुए, सिंह के समान गर्जनकारी तथा शोभन जल देने वाले हैं. (५)
व्रातं‌व्रातं गणंगणं सुशस्तिभिरग्नेर्भमं मरुतामोज ईमहे.
पृषदश्वासो अनवभ्रराधसो गन्तारो यज्ञं विदथेषु धीराः.. (६)
हम बहुत से स्तुति मंत्रों द्वारा अग्नि के तेज और मरुतों के ओज की याचना करते हैं.
बुंदकियों से युक्त घोड़ों वाले, संपूर्ण धनयुक्त एवं धीर मरुद्गण यज्ञ में हवि को लक्ष्य करके
जाते हैं. (६)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्.
अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम.. (७)
हे कुशिकगोत्रीय ब्राह्मणो! मैं जन्म से ही सर्वज्ञ अग्नि हूं. घृत मेरा नेत्र है तथा अमृत मेरे
मुख में रहता है. मेरे प्राण तीन प्रकार के हैं. मैं आकाश को नापने वाला, नित्यप्रकाशयुक्त एवं
हव्यरूप हूं. (७)
त्रिभिः पवित्रैरपुपोद्ध्यार्कं हृदा मतिं ज्योतिरनु प्रजानन्.
वर्षिष्ठं रत्नमकृत स्वधाभिरादिद् द्यावापृथिवी पर्यपश्यत्.. (८)
अग्नि ने मन से सुंदर ज्योति को अच्छी तरह जानकर स्वयं को तीन पवित्र रूपों में शुद्ध
किया. उन रूपों द्वारा स्वयं को परम रमणीय बनाया तथा इसके पश्चात् धरती और आकाश
को देखा. (८)
शतधारमुत्समक्षीयमाणं विपश्चितं पितर वक्त्यानाम्.
मेळिं मदन्तं पित्रोरुपस्थे तं रोदसी पिपृतं सत्यवाचम्.. (९)
हे धरती और आकाश! सौ धाराओं वाले सोते के समान कभी क्षीण न होने वाले,
मेधावी, पालनकर्त्ता, वेदवाक्यों का एकत्र संग्रह करने वाले, माता-पिता के समीप प्रसन्नचित्त
एवं सत्यवादी उस उपाध्याय को संपूर्ण करो. (९)
सूक्त—२७ देवता—अग्नि
प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या. देवाञ्जिगाति सुम्नयुः.. (१)
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हे ऋतुओ! मास, अर्धमास, देव, एवं गौ सब तुम्हारे यज्ञ के लिए समर्थ हैं. सुख की
इच्छा करता हुआ यजमान देवों को प्राप्त करता है. (१)
ईळे अग्निं विपश्चितं गिरा यज्ञस्य साधनम्. श्रुष्टीवानं धितावानम्.. (२)
मैं स्तुतियों द्वारा मेधावी, यज्ञ संपन्न करने वाले एवं सुख तथा धन के स्वामी अग्नि की
स्तुति करता हूं. (२)
अग्ने शकेम ते वयं यमं देवस्य वाजिनः. अति द्वेषांसि तरेम.. (३)
हे द्योतमान अग्नि! हवि लिए हुए हम लोग यज्ञ की समाप्ति तक तुम्हें यहीं रखने में
समर्थ हैं. इस प्रकार हम पापों से छुटकारा पा लेंगे. (३)
समिध्यमानो अध्वरेऽग्निः पावक ईड्यः. शोचिष्केशस्तमीमहे.. (४)
यज्ञ में प्रज्वलित, ज्वाला रूपी केशों से युक्त, शुद्धिकर्त्ता तथा स्तोताओं द्वारा पूजनीय
अग्नि से हम मनचाहे फल की याचना करते हैं. (४)
पृथुपाजा अमर्त्यो घृतनिर्णिक्स्वाहुतः. अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट्.. (५)
परम तेजस्वी, मरणरहित, घृतशोधक एवं हव्य द्वारा पूजित अग्नि इस यज्ञ का हवि
वहन करें. (५)
तं सबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञवन्तः. आ चक्रुरग्निमूतये.. (६)
यज्ञ का विघ्न नष्ट करने में समर्थ एवं हव्य धारण करने वाले ऋत्विजों ने स्रुच हाथ में
लेकर इस प्रकार की स्तुतियों द्वारा अग्नि को रक्षा के लिए अभिमुख किया था. (६)
होता देवो अमर्त्यः पुरस्तादेति मायया. विदथानि प्रचोदयन्.. (७)
होम निष्पादक, मरणरहित एवं द्योतमान अग्नि लोगों को यज्ञकर्म करने के लिए प्रेरित
करके अपनी माया से अग्रगामी बनते हैं. (७)
वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वरेषु प्र णीयते. विप्रो यज्ञस्य साधनः.. (८)
बलवान् अग्नि युद्धों में आगे किए जाते हैं एवं यज्ञ में स्थापित होते हैं. अग्नि मेधावी व
यज्ञ के साधक हैं. (८)
धिया चक्रे वरेण्यो भूतानां गर्भमा दधे. दक्षस्य पितरं तना.. (९)
यजमानों द्वारा यज्ञकर्म का अंग होने से वरणीय, भूतों में गर्भरूप से स्थित एवं
पितारूप अग्नि को यज्ञवेदिका पर धारण करती है. (९)
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नि त्वा दधे वरेण्यं दक्षस्येळा सहस्कृत. अग्ने सुदीतिमुशिजम्.. (१०)
हे बल द्वारा उत्पन्न, शोभनदीप्तियुक्त, हव्य के अभिलाषी एवं वरणीय अग्नि! दक्ष की
पुत्री इडा अर्थात् यज्ञभूमि तुम्हें धारण करती है. (१०)
अग्निं यन्तुरमप्तुरमृतस्य योगे वनुषः. विप्रा वाजैः समिन्धते.. (११)
भक्त यजमान एवं मेधावी अध्वर्यु सबके नियंता एवं जल के प्रेरक अग्नि को यज्ञ के
प्रयोग के लिए हविरूप अन्नों के द्वारा भली-भांति प्रदीप्त करते हैं. (११)
ऊर्जा नपातमध्वरे दीदिवांसमुप द्यवि. अग्निमीळे कविक्रतुम्.. (१२)
अन्न के नाती, अंतरिक्ष के समीप प्रकाशित होने वाले एवं मेधावियों द्वारा उत्पादित
अग्नि की मैं यज्ञ में स्तुति करता हूं. (१२)
ईळेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (१३)
पूजा तथा नमस्कार के योग्य, अंधकार का नाश करने के कारण सबके दर्शनीय एवं
कामवर्षी अग्नि प्रज्वलित किए जाते हैं. (१३)
वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः. तं हविष्मन्त ईळते.. (१४)
घोड़े के समान देवों का हव्य ढोने वाले एवं कामवर्षक अग्नि प्रज्वलित किए जाते हैं.
हवि धारण करने वाले यजमान उनकी प्रार्थना करते हैं. (१४)
वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (१५)
हे कामवर्षक अग्नि! जल बरसाने वाले दीप्तिमान् एवं महान् तुमको घी की आहुति से
सींचने वाले हम प्रज्वलित करते हैं. (१५)
सूक्त—२८ देवता—अग्नि
अग्ने जुषस्व नो हविः पुरोळाशं जातवेदः. प्रातः सावे धियावसो.. (१)
हे जातवेद एवं स्तुति द्वारा धन देने वाले अग्नि! प्रातःकालिक यज्ञ में तुम हमारे हवि
और पुरोडाश का सेवन करो. (१)
पुरोळा अग्ने पचतस्तुभ्यं वा घा परिष्कृतः. तं जुषस्व यविष्ठ्य.. (२)
हे अतिशययुवा अग्नि! पुरोडाश तुम्हारे लिए पकाया एवं संस्कृत किया गया है. तुम
उसका सेवन करो. (२)
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अग्ने वीहि पुरोळाशमाहुतं तिरोअह्न्यम्. सहसः सूनुरस्यध्वरे हितः.. (३)
हे अग्नि! दिन छिपने पर भली प्रकार दिए गए पुराडोश को खाओ. हे बल के पुत्र
अग्नि! तुम यज्ञ में निहित हो. (३)
माध्यन्दिने सवने जातवेदः पुरोळाशमिह कवे जुषस्व.
अग्ने यह्वस्य तव भागधेयं न प्र मिनन्ति विदथेषु धीराः.. (४)
हे जातवेद एवं मेधावी अग्नि! दोपहर के यज्ञ के समय पुरोडाश का सेवन करो. हे
महान् अग्नि! कर्मकुशल अध्वर्यु यज्ञ में तुम्हारा भाग अवश्य देते हैं. (४)
अग्ने तृतीये सवने हि कानिषः पुरोळाशं सहसः सूनवाहुतम्.
अथा देवेष्वध्वरं विपन्यया धा रत्नवन्तममृतेषु जागृविम्.. (५)
हे बल के पुत्र अग्नि! तीसरे सवन में दिए गए पुरोडाश की तुम अभिलाषा करते हो.
स्तुति से प्रसन्न तुम अविनाशी, स्वर्गादि फल देने वाले एवं जागरणकारी सोमरस को
मरणरहित देवों के समीप ले जाओ. (५)
अग्ने वृधान आहुतिं पुरोळाशं जातवेदः. जुषस्व तिरोअह्न्यम्.. (६)
हे जातवेद एवं आहुतियों के कारण वृद्धि को प्राप्त अग्नि! दिन छिपने के समय तुम
पुरोडाश नामक हवि का सेवन करो. (६)
सूक्त—२९ देवता—अग्नि
अस्तीदमधिमन्थनम्अस्ति प्रजननं कृतम्. एतां विशपत्नीमा भराग्निं मन्थाम पूर्वथा..
(१)
यह अग्नि-मंथन का साधन तथा उसे उत्पन्न करने वाला पदार्थ है. इस विश्वपालिका
अरणि को लाओ. हम पहले की तरह ही अग्नि का मंथन करेंगे. (१)
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुधितो गर्भिणीषु.
दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः.. (२)
जिस प्रकार गर्भवती नारियों में गर्भ रहता है, उसी प्रकार जातवेद अग्नि अरणियों में
छिपे हैं. वे अग्नि हवि धारण करने वाले एवं यज्ञकर्म में जागरूक मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन पूजा
करने योग्य हैं. (२)
उत्तानायामव भरा चिकित्वात्सद्यः प्रवीता वृषणं जजान.
अरुषस्तूपो रुशदस्य पाज इळायास्पुत्रो वयुनेऽजनिष्ट.. (३)
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हे ज्ञानवान् अध्वर्यु! ऊपर मुखवाली निचली अरणि पर नीचे मुखवाली उत्तर अरणि
रखो. उसी समय गर्भवती अरणि कामवर्षक अग्नि को उत्पन्न करे. उस में अग्नि का
अंधकार-नाशक तेज था. प्रकाशित तेज वाले एवं इडा के पुत्र अर्थात् उत्तर वेदी में उत्पन्न
अग्नि अरणि में प्रकट हुए. (३)
इळायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि.
जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (४)
हे जातवेद अग्नि! हम हव्य वहन करने के निमित्त तुम्हें धरती के ऊपर एवं उत्तर वेदी के
मध्य भाग में स्थापित करते हैं. (४)
मन्थता नरः कविमद्वयन्तं प्रचेतसममृतं सुप्रतीकम्.
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरस्तादग्निं नरो जनयता सुशेवम्.. (५)
हे यज्ञ के नेता अध्वर्युगण! क्रांतदर्शी, मन एवं वाणी से एक ही कर्म करने वाले, प्रकृष्ट
ज्ञानयुक्त, मरणरहित व शोभन अंगों समेत अग्नि को मंथन द्वारा पैदा करो. हे नेताओ! यज्ञ
का संकेत करने वाले, मुख्य एवं सुख से युक्त अग्नि को यज्ञकर्म के पहले ही उत्पन्न करो. (५)
यदि मन्थन्ति बाहुभिर्वि रोचतेऽश्वो न वाज्यरुषो वनेष्वा.
चित्रो न यामन्नश्विनोरनिवृतः परि वृणक्त्यश्मनस्तृणा दहन्.. (६)
जब हाथों से अरणि का मंथन किया जाता है, तब लकड़ियों में अग्नि इस प्रकार तीव्र
गति से सुशोभित होते हैं, जिस प्रकार शीघ्रगामी अश्व अथवा अश्विनीकुमारों का अनेक रंग
का रथ शोभा पाता है. अवरोधरहित अग्नि पत्थरों और तिनकों को जलाते हुए आगे बढ़ते हैं.
(६)
जातो अग्नी रोतने चेकितानो वाजी विप्रः कविशस्तः सुदानुः.
यं देवास ईड्यं विश्वविदं हव्यवाहमदधुरध्र्वेषु.. (७)
मंथन से उत्पन्न अग्नि सर्वज्ञ! नित्यगतिशील, यज्ञकर्म के ज्ञाता, मेधावी, होताओं द्वारा
स्तुत एवं शोभन फलदाता के रूप में शोभा पाते हैं. इन्हीं स्तुत्य एवं सर्वज्ञ अग्नि को देवों ने
यज्ञों में हव्यवाहक बनाया था. (७)
सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान्सादया यज्ञं सुकृतस्य योनौ.
देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः.. (८)
हे होमनिष्पादक एवं ज्ञानवान् अग्नि! तुम अपने स्थान अर्थात् उत्तर वेदी पर बैठो तथा
यज्ञकर्त्ता यजमान को उत्तम लोक में ले जाओ. हे देवरक्षक अग्नि! हव्य द्वारा देवों की पूजा
करो एवं मुझ यज्ञ करने वाले यजमान को पर्याप्त अन्न दो. (८)
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