ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
गंधर्वों, पितरों, देवों, असुरों और राक्षसों को लांघकर हमारे पास आओ. (२२) सूर्यो रश्मिं यथा सृजा ऽऽत्वा यच्छन्तु मे गिरः. निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२३) हे इंद्र! जिस प्रकार सूर्य किरणें देते हैं, उसी प्रकार तुम मुझे धन दो. जैसे जल नीचे स्थान में पहुंच जाता है उसी प्रकार मेरी स्तुतियां तुम्हारे पास पहुंचें. (२३) अध्वर्यवा तु हि षिञ्च सोमं वीराय शिप्रिणे. भरा सुतस्य पीतये.. (२४) हे अध्वर्युगण! शोभन जबड़ों वाले एवं वीर इंद्र के लिए सोमरस दो एवं उन्हें सोमरस पीने के लिए बुलाओ. (२४) य उदन्: फलिगं भिनन्य१क्सिन्धूँरवासृजत्. यो गोषु पक्वं धारयत्.. (२५) इंद्र ने जल के लिए मेघ को विदीर्ण किया, जलधाराओं को नीचे गिराया एवं गायों में दूध धारण किया. (२५) अहन्वृत्रमृचीषम और्णवाभमहीशुवम्. हिमेनाविध्यदर्बुदम्.. (२६) दीप्तिशाली इंद्र ने वृत्र, और्णनाभ एवं अहीशुव को मारा एवं तुषार जल से बादल का भेदन किया. (२६) प्र व उग्राय निष्ठुरेऽषाळहाय प्रसक्षिणे. देवत्तं ब्रह्म गायत.. (२७) हे उद्गाताओ! तुम उग्र, शत्रुनाशक, शत्रुपराभवकारी और शत्रुओं का धन बलपूर्वक हरण करने वाले इंद्र के लिए देवों की कृपा से स्तुतियां गाओ. (२७) यो विश्वान्यभि व्रता सोमस्य मदे अन्धसः. इन्द्रो देवेषु चेतति.. (२८) इंद्र पिए हुए सोमरस का नशा चढ़ने पर समस्त यज्ञकर्म देवों को बताते हैं. (२८) इह त्या सधमाद्या हरी हिरयण्केश्या. वोळहामभि प्रयो हितम्.. (२९) सुनहरे बालों वाले एवं हरि नामक घोड़े एक साथ इंद्र को इस यज्ञ में सोमरस रूपी हव्य के सामने ले आवें. (२९) अर्वाञ्चं त्वा पुरुष्टुत प्रियमधस्तुता हरी. सोमपेयाय वक्षतः.. (३०) हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! प्रियमेध ऋषि द्वारा प्रशंसित हरि नामक घोड़े तुम्हें सोमरस पीने के लिए हमारे सामने लावें. (३०) सूक्त—३३ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः. पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम लोग इस प्रकार तुम्हारे पास आते हैं, जैसे जल नीचे की ओर जाता है. पवित्र सोमरस निचुड़ जाने पर कुश बिछाने वाले स्तोता तुम्हारी सेवा करते हैं. (१) स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः. कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (२) हे निवासदाता एवं नेता इंद्र! उक्थ बोलने वाले लोग सोमरस निचुड़ जाने पर तुम्हारी स्तुति करते हैं. सोमरस पीने के लिए प्यारे इंद्र बैल के समान शब्द करते हुए यहां कब आएंगे. (२) कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्व्राजं दर्षि सहस्रिणम्. पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (३) हे शत्रुओं को दबाने वाले इंद्र! कण्ववंशीय ऋषियों को हजारों की संख्या में अन्न दो. हे धनयुक्त एवं विशेषदृष्टि वाले इंद्र! हम लोग शक्तिशाली, पीले रंग के एवं गायों वाले अन्न को मांगते हैं. (३) पाहि गायान्धसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे. यः संमिश्लो हर्योर्यः सुते सचा वज्री रथो हिरण्ययः.. (४) हे मेधातिथि ऋषि! सोमरस पिओ एवं उसका नशा होने पर हरि नामक घोड़ों को रथ में जोड़ने वाले सोमरस निचोड़ने में सहायक, वज्रधारी एवं सोने के रथ वाले इंद्र के स्तोत्र पढ़ो. (४) यः सुषव्यः सुदक्षिण इनो यः सुक्रतुर्गृणे. य आकरः सहस्रा यः शतामघ इन्द्रो यः पूर्विदारितः.. (५) जिनका दायां एवं बायां दोनों हाथ सुंदर हैं, जो स्वामी, शोभन कर्म करने वाले एवं हजारों कर्म करने वाले हैं तथा जो सैकड़ों संपत्तियों वाले, शत्रुनगरियों को तोड़ने वाले एवं यज्ञ में स्थिर हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (५) यो धृषितो योऽवृतो यो अस्ति श्मश्रुषु श्रितः. विभूतद्युम्नश्च्यवनः पुरुष्टुतः क्रत्वा गौरिव शाकिनः.. (६) जो शत्रुओं को दबाने वाले शत्रुओं के घेरे से रहित, युद्धों में आश्रय देने वाले, अधिक धन वाले, बहुतों द्वारा स्तुत एवं यज्ञकर्म में लगे यजमान के लिए दूध देने वाली गाय के समान ebook converter DEMO Watermarks*
अभिलाषापूरक हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (६) क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्धयो दधे. अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्रयन्धसः.. (७) सुंदर जबड़े वाले, सोमरस पीकर मतवाले, शत्रुनगरियों को तोड़ने वाले व सोमरस के निचोड़ जाने पर ऋत्विजों के साथ सोम पीने वाले इंद्र को कौन जानता है और कौन उनके लिए अन्न देता है? (७) दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा चरथं दधे. नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाँश्चरस्योजसा.. (८) जैसे शत्रुहाथियों की खोज करने वाला हाथी मदजल धारण करता है, उसी प्रकार इंद्र बहुत से यज्ञों में जाने के लिए मद धारण करते हैं. हे इंद्र! तुम्हें कोई वश में नहीं कर सकता. तुम निचोड़े हुए सोमरस की ओर आओ. हे महान् इंद्र! तुम अपने बल से सभी जगह घूमते हो. (८) य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय संस्कृतः. यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (९) जब उग्र, शत्रुओं के घेरे से रहित, स्थिर, युद्ध के लिए शस्त्रों से सुशोभित एवं धनवान् इंद्र स्तोता की पुकार सुन लेते हैं तो अन्यत्र न जाकर वहीं जाते हैं. (९) सत्यमित्था वृषेदसि वृषजूतिर्नोऽवृत्ः. वृषा ह्युग्र शृण्विषे परावति वृषो अर्वावति श्रुतः.. (१०) हे उग्र इंद्र! यह सत्य है कि तुम अभिलाषापूरक, अभिलाषापूरकों द्वारा आकृष्ट व शत्रु से बिना घिरे हुए हो. हे उग्र इंद्र! तुम अभिलाषापूरक सुने जाते हो. तुम दूर एवं समीप के स्थानों में अभिलाषापूरक के रूप में प्रसिद्ध हो. (१०) वृषणस्ते अभीशवो वृषा कशा हिरण्ययी. वृषा रथो मघवन्वृषणा हरी वृषा त्वं शतक्रतो.. (११) हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे घोड़ों की लगामें अभिलाषापूरक हैं. तुम्हारा सोने का हंटर अभिलाषापूरक है. हे शतक्रतु! तुम्हारा रथ, तुम्हारे घोड़े एवं तुम स्वयं अभिलाषापूरक हो. (११) वृषा सोता सुनोतु ते वृषन्नृजीपिन्ना भर. वृषा दधन्वे वृषणं नदीष्वा तुभ्यं स्थातर्हरीणाम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ने वाला अभिलाषापूरक होकर सोमरस निचोड़े. हे सरल गति वाले इंद्र! हमें धन दो. हे हरि नामक अश्वों के सामने स्थित होने वाले एवं अभिलाषापूरक इंद्र! जल में सोम निचोड़ने वाले ने उसे तुम्हारे लिए धारण किया है. (१२) एन्द्र याहि पीतये मधु शविष्ठ सोम्यम्. नायमच्छा मधवा शृणवद् गिरो ब्रह्मोक्था च सुक्रतुः.. (१३) हे अतिशय बलवान् इंद्र! मधुर सोमरस पीने के लिए यहां आओ. धनवान् एवं शोभन यज्ञकर्म वाले इंद्र बिना आए हुए स्तुतियां स्तोत्र एवं मंत्र नहीं सुनते. (१३) वहन्तु त्वा रथेष्ठामा हरयो रथयुजः. तिरश्चिदर्यं सवनानि वृत्रहन्नन्येषां या शतक्रतो.. (१४) हे वृत्रहंता एवं सैकड़ों बुद्धियों वाले इंद्र! रथ में जुते हुए घोड़े अन्य लोगों के यज्ञों का तिरस्कार करके तुझ रथ में स्थिर स्वामी को हमारे यज्ञ में लावें. (१४) अस्माकमद्यान्तं स्तोमं धिष्व महामह. अस्माकं ते सवना सन्तु शन्तमा मदाय द्युक्ष सोमपाः.. (१५) हे परमपूज्य इंद्र! आज अत्यंत समीपवर्ती हमारे स्तोम नामक यज्ञ को धारण करो. हे दीप्तिशाली एवं सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम्हारे मद के लिए होने वाले हमारे यज्ञ कल्याणकारक हों. (१५) नहि षस्तव नो मम शास्त्रे अन्यस्य रण्यति. यो अस्मान्वीर आनयत्.. (१६) जो शूर इंद्र हमारा नेतृत्व करते हैं. वे मेरे, तुम्हारे अथवा किसी अन्य के शासन में प्रसन्न नहीं होते. (१६) इन्द्रश्चिद्घा तदब्रवीत्स्त्रिया अशास्यं मनः. उतो अह क्रतुं रघुम्.. (१७) इंद्र ने ही कहा था—"स्त्री के मन पर शासन संभव नहीं है स्त्री की बुद्धि छोटी होती है." (१७) सप्ती चिद्घा मदच्युता मिथुना वहतो रथम्. एवेदधूर्वृष्ण उत्तरा.. (१८) सोमरस की ओर जाने वाले इंद्र के दोनों घोड़े रथ को वहन करते हैं. इस प्रकार कामवर्षक इंद्र का रथ सबसे श्रेष्ठ है. (१८) अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर. मा ते कशप्लकौ दृशन्त्स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र ने कहा—"हे प्रायोगि! तुम नीचे देखो, ऊपर मत देखो. तुम पैरों को आपस में मिलाओ. तुम्हारे होंठों एवं कमर को कोई न देखे. तुम स्तोता होते हुए भी स्त्री हो.” (१९) सूक्त—३४ देवता—इंद्र एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१) हे इंद्र! तुम अपने हरि नामक घोड़ों के द्वारा कण्वगोत्रीय ऋषियों की सुंदर स्तुति के सामने आओ. हे दीप्तहवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१) आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण यच्छतु. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (२) हे इंद्र! इस यज्ञ में सोमलता कुचलने के पत्थर तुम्हें सोम वाला कहते हुए तुम्हारे लिए सोम दें. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (२) अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (३) इस यज्ञ में सोमलता कुचलने वाले पत्थर सोमलता को इस प्रकार कंपित करते हैं, जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को कंपाता है. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (३) आ त्वा कण्वा इहावसे हवन्ते वाजसातये. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (४) हे इंद्र! कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हें रक्षा एवं अन्न पाने के लिए इस यज्ञ में बुलाते हैं. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (४) दधामि ते सुतानां वृष्णे न पूर्वपाय्यम्. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (५) हे इंद्र! यज्ञ के प्रारंभ में जिस प्रकार अभिलाषापूरक वायु को सोमरस दिया जाता है, उसी प्रकार तुम्हें निचोड़ा हुआ सोमरस मैं दूंगा. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (५) स्मत्पुरन्धिर्न आ गहि विश्वतोधीर्न ऊतये. ebook converter DEMO Watermarks*
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (६) हे स्वर्ग कुटुंबी इंद्र! तुम हमारे पास आओ. हे विश्वरक्षक इंद्र! हमारी रक्षा के लिए आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो इसलिए द्युलोक में जाओ. (६) आ नो याहि महेमते सहस्रोते शतामघ. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (७) हे महाबुद्धिशाली, हजार रक्षासाधनों वाले तथा अधिक धनयुक्त इंद्र! तुम हमारे समीप आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (७) आ त्वा होता मनुर्हितो देवत्रा वक्षदीड्यः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (८) हे इंद्र! देवताओं में स्तुति योग्य देवों को बुलाने वाला एवं मनुष्यों द्वारा गृह में स्थापित अन्न तुम्हें अन्न वहन करे. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (८) आ त्वा मदच्युता हरी श्येनं पक्षेव वक्षतः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (९) हे इंद्र! जिस प्रकार बाज अपने दोनों पंखों को ढोता है, उसी प्रकार मतवाले हरि नामक घोड़े तुम्हें वहन करें. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (९) आ याह्यर्य आ परि स्वाहा सोमस्य पीतये. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१०) हे स्वामी इंद्र! तुम चारों ओर से आओ. तुम्हारे पीने के लिए मैं स्वाहा बोलकर सोमरस देता हूं. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१०) आ नो याह्युपश्रुत्युक्थेषु रणया इह. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (११) हे इंद्र! उक्थ मंत्रों के पाठ के समय तुम इस यज्ञ के समीप आओ एवं हमें प्रसन्न करो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः.
सरूपैरा सु नो गहि संभृतैः सम्भृताश्वः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१२) हे पुष्ट अश्वों वाले इंद्र! तुम अपने पुष्ट एवं समानरूप वाले घोड़ों के द्वारा आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१२) आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१३) हे इंद्र! तुम पर्वत, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग से आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१३) आ नो गव्यान्यश्व्या सहस्रा शूर दर्दिहि. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१४) हे शूर इंद्र! तुम हमें हजार गाएं एवं घोड़े भली प्रकार दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१४) आ नः सहस्रशो भरायुतानि शतानि च. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१५) हे इंद्र! हमें हजार, दस हजार एवं सौ मनचाही वस्तुएं दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१५) आ यदिन्द्रश्च दद्द्हे सहस्रं वसुरोचिषः. ओजिष्ठमश्व्यं पशुम्.. (१६) धन द्वारा दीप्त हम हजारों लोग और हमारे नेता इंद्र शक्तिशाली घोड़ों को ग्रहण करते हैं. (१६) य ऋञ्ज्रा वातरंहसोऽरुषासो रघुष्यदः. भ्राजन्ते सूर्या इव.. (१७) वे सरल गति वाले, वायु के समान तीव्रगामी, तेजस्वी एवं थोड़े भीगे हुए घोड़े सूर्य के समान शोभा पाते हैं. (१७) पारावतस्य रातिषु द्रवच्चक्रेष्वाशुषु. तिष्ठं वनस्य मध्य आ.. (१८) रथ के पहियों को चलाने वाले इन घोड़ों को पारावत ने जिस समय दिया था, उस समय मैं वन में था. (१८) सूक्त—३५ देवता—अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*
अग्निनेन्द्रेण वरुणेन विष्णुनादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम अग्नि, इंद्र, वरुण, विष्णु, आदित्यों, रुद्रों, वसुओं उषा तथा सूर्य के साथ मिलकर सोमरस पिओ. (१) विश्वाभिर्धीभिर्भुवनेन वाजिना दिवा पृथिव्याद्रिभिः सचाभुवा. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (२) हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! तुम समस्त बुद्धियों, सब प्राणियों, द्युलोक, पृथ्वी, पर्वतों, उषा तथा सूर्य के साथ मिलकर सोमरस पिओ. (२) विश्वैर्देवैस्त्रिभिरेकादशैरहाद्भिर्मरुद्भिर्भृगुभिः सचाभुवा. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में हव्य भक्षण करने वाले तैंतीस देवों, मरुतों, भृगुओं, उषा एवं सूर्य के साथ सोमरस पिओ. (३) जुषेथां यज्ञं बोधतं हवस्य मे विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ का सेवन करो एवं मेरी पुकार सुनो. तुम इस यज्ञ के तीनों सवनों में आओ एवं उषा व सूर्य के साथ मिलकर अन्न स्वीकार करो. (४) स्तोमं जुषेथां युवशेव कन्यानां विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (५) हे देव अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार युवक कन्याओं की पुकार पर ध्यान देते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे यज्ञ में स्तोत्रों को स्वीकार करो. तुम इस यज्ञ के तीनों सवनों में आओ एवं उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमारा अन्न स्वीकार करो. (५) गिरो जुषेथामध्वरं जुषेथां विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (६) हे देव अश्विनीकुमारो! तुम हमारी स्तुति सुनो, यज्ञ को स्वीकार करो, इस यज्ञ के तीनों सवनों में आओ एवं उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमारा अन्न ग्रहण करो. (६) हारिद्रवेव पतथो वनेदुप सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः. सजोषसा उषसा सूर्येण च त्रिवर्तिर्यातमश्विना.. (७) हे अश्विनीकुमारो! हारिद्रव पक्षी जिस प्रकार जल पर गिरते हैं, उसी प्रकार तुम सोमरस ebook converter DEMO Watermarks*
पर गिरो. भैंसा जिस प्रकार जल की ओर आता है, उसी प्रकार तुम सोमरस की ओर आओ. तुम उषा एवं सूर्य के साथ मिलकर तीनों सवनों में आओ. (७) हंसाविव पतथो अध्वगाविव सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथ:. सजोषसा उषसा सूर्येण च त्रिवर्तिर्यातमश्विना.. (८) हे अश्विनीकुमारो! हंस एवं पथिक जिस प्रकार जल पर गिरते हैं, उसी प्रकार तुम सोमरस पर गिरो. भैंसा जिस प्रकार जल की ओर आता है, उसी प्रकार तुम सोम की ओर आओ. तुम उषा एवं सूर्य के साथ मिलकर तीनों सवनों में आओ. (८) श्येनाविव पतथो हव्यदातये सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथ:. सजोषसा उषसा सूर्येण च त्रिवर्तिर्यातमश्विना.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमान के निचोड़े हुए सोमरस की ओर बाज के समान तेजी से आओ. जिस प्रकार भैंसा पानी की ओर आता है, उसी प्रकार तुम सोम की ओर आओ. तुम उषा एवं सूर्य के साथ मिलकर तीनों सवनों में आओ. (९) पिबतं च तृप्णुतं चा च गच्छतं प्रजां च धत्तं द्रविणं च धत्तम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चोर्जं नो धत्तमश्विना.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! सोमरस पिओ, तृप्त बनो, आओ व हमें संतान एवं धन दो. तुम सूर्य एवं उषा के साथ मिलकर हमें बल दो. (१०) जयतं च प्र स्तुतं च प्र चावतं प्रजां च धत्तं द्रविणं च धत्तम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चोर्जं नो धत्तमश्विना.. (११) हे अश्विनीकुमारो! तुम शत्रुओं को जीतो, स्तोताओं की प्रशंसा एवं रक्षा करो तथा हमें संतान व धन दो. तुम उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमें बल दो. (११) हतं च शत्रून्यततं च मित्रिण: प्रजां च धत्तं द्रविणं च धत्तम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चोर्जं नो धत्तमश्विना.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तुम शत्रुओं को मारो एवं मित्रों के साथ चलो. हमें संतान व धन दो. तुम उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमें बल दो. (१२) मित्रावरुणवन्ता उत धर्मवन्ता मरुत्वन्ता जरितुर्गच्छथो हवम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चादित्यैर्यातमश्विना.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम मित्र, वरुण, धर्म व मरुतों के साथ स्तोता की पुकार सुनने आओ. तुम उषा, सूर्य एवं आदित्यों के साथ आओ. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
अङ्गिरस्वन्ता उत विष्णुवन्ता मरुत्वन्ता जरितुर्गच्छथो हवम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चादित्यैर्यातमश्विना.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! तुम अंगिरा, विष्णु एवं मरुतों के साथ स्तोता की पुकार सुनने जाओ. तुम उषा, सूर्य एवं आदित्यों के साथ आओ. (१४) ऋभुमन्ता वृषणा वाजवन्ता मरुत्वन्ता जरितुर्गच्छथो हवम्. सजोषसा उषसा सूर्येण चादित्यैर्यातमश्विना.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुम ऋभुओं, अभिलाषापूरक बाज एवं मरुतों के साथ स्तोता की पुकार सुनने जाओ. तुम उषा, सूर्य एवं आदित्यों के साथ आओ. (१५) ब्रह्म जिन्वतमुत जिन्वतं धियो हतं रक्षांसि सेधतममीवाः. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं सुन्वतो अश्विना.. (१६) हे अश्विनीकुमारो! तुम स्तोत्रों तथा यज्ञों को जीतो, राक्षसों को मारो एवं रोगों को वश में करो. तुम उषा तथा सूर्य के साथ मिलकर यजमान का सोमरस पिओ. (१६) क्षत्रं जिन्वतमुत जिन्वतं नृन्हतं रक्षांसि सेधतममीवाः. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं सुन्वतो अश्विना.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! तुम क्षत्रियों एवं योद्धाओं को जीतो, राक्षसों को मारो तथा रोगों को वश में करो. तुम उषा और सूर्य के साथ मिलकर यजमान का सोमरस पिओ. (१७) धेनूर्जिन्वतमुत जिन्वतं विशो हतं रक्षांसि सेधतममीवाः. सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं सुन्वतो अश्विना.. (१८) हे अश्विनीकुमारो! तुम गायों एवं अश्वों को जीतो. तुम राक्षसों को मारो तथा रोगों को वश में करो. तुम सूर्य तथा उषा के साथ मिलकर यजमान का सोम पिओ. (१८) अत्रेरिव शृणुतं पूर्व्यस्तुतिं श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता. सजोषसा उषसा सूर्येण चाश्विना तिरोअह्नयम्.. (१९) हे शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार तुमने अत्रि मुनि की स्तुति सुनी, उसी प्रकार मुझ श्यावाश्व की भी सुनो. तुम उषा और सूर्य के साथ मिलकर प्रातःकाल सोमरस पिओ. (१९) सर्गाँ इव सृजतं सुष्टुतीरुप श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता. सजोषसा उषसा सूर्येण चाश्विना तिरोअह्नयम्.. (२०) हे शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले अश्विनीकुमारो! मुझ सोमरस निचोड़ने वाले श्यावाश्व ebook converter DEMO Watermarks*
की शोभन स्तुति को तुम आभरणों के समान समझो. तुम उषा और सूर्य के साथ मिलकर प्रातःकाल सोमरस पिओ. (२०) रश्मीँरिव यच्छतमध्वराँ उप श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता. सजोषसा उषसा सूर्येण चाश्विना तिरोअह्नयम्.. (२१) हे शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार घोड़ा लगाम के सहारे चलता है, उसी प्रकार मुझ सोमरस निचोड़ने वाले श्यावाश्व की स्तुति सुनकर तुम चले आओ. तुम सूर्य एवं उषा के साथ मिलकर प्रातःकाल सोमरस पिओ. (२१) अर्वाग्रथं नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२२) हे अश्विनीकुमारो! अपना रथ हमारे सामने लाओ, मधुर सोमरस पिओ, यज्ञ में आओ व सोमरस के सामने पहुंचो. मैं रक्षा की अभिलाषा से तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दो. (२२) नमोवाके प्रस्थिते अध्वरे नरा विवक्षणस्य पीतये. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२३) हे नेता अश्विनीकुमारो! मुझ हवनशील के द्वारा होने वाले इस नमोवाक्य वाले यज्ञ में तुम सोमरस पीने आओ. मैं रक्षा की अभिलाषा से तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दान करो. (२३) स्वाहाकृतस्य तृम्पतं सुतस्य देवावन्धसः. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२४) हे देव अश्विनीकुमारो! तुम स्वाहा शब्द के द्वारा किए हुए सोमरस से तृप्त बनो. तुम सोमरस के सामने आओ. मैं रक्षाभिलाषी बनकर तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दो. (२४) सूक्त—३६ देवता—इंद्र अवितासि सुन्वतो वृक्तबर्हिषः पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन्विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (१) हे बहुकर्म वाले इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले एवं कुश बिछाने वाले यजमान के रक्षक हो. हे सज्जनपालक इंद्र! देवों ने तुम्हारे लिए सोमरस का जो भाग निश्चित किया है उसे समस्त शत्रुसेनाओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच में विजयी बनकर ebook converter DEMO Watermarks*
पिओ. (१) प्राव स्तोतारं मघवन्नव त्वां पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन् विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (२) हे इंद्र! तुम स्तोता की रक्षा करो तथा सोमरस पीकर अपनी रक्षा करो. हे सज्जनपालक एवं बहुकर्म वाले इंद्र! देवों ने तुम्हारे लिए सोमरस का जो भाग निश्चित किया है, उसे समस्त शत्रुसेनाओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच में विजयी बनकर पिओ. (२) ऊर्जा देवाँ अवस्योजसा त्वां पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन् विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (३) हे इंद्र! तुम हव्य अन्न द्वारा देवों की तथा बल द्वारा अपनी रक्षा करते हो. हे सज्जनपालक तथा बहुकर्म वाले इंद्र! देवों द्वारा सोमरस के अपने निश्चित भागों को तुम समस्त शत्रुओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच विजयी बनकर पिओ. (३) जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन् विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (४) हे इंद्र! तुम द्युलोक एवं धरती के जनक हो. हे सज्जनपालक तथा बहुकर्म वाले इंद्र! देवों द्वारा सोमरस के अपने निश्चित भाग को तुम समस्त शत्रुओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच विजयी बनकर पिओ. (४) जनिताश्वानां जनिता गवामसि पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन् विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (५) हे इंद्र! तुम घोड़ों तथा गायों के जनक हो. हे सज्जनपालक तथा बहुकर्म वाले इंद्र! देवों द्वारा सोमरस के अपने निश्चित भाग को तुम समस्त शत्रुओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच विजयी बनकर पिओ. (५) अत्रीणां स्तोममद्रिवो महस्कृधि पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन् विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (६) हे पर्वतों के स्वामी इंद्र! अत्रिगोत्रीय ऋषियों के स्तोत्र का आदर करो. हे सज्जनपालक एवं बहुकर्म वाले इंद्र! देवों द्वारा सोमरस के अपने निश्चित भाग को तुम समस्त शत्रुओं एवं ebook converter DEMO Watermarks*
वेगों को पराजित करके तथा जल के विजयी बनकर पिओ. (६) श्यावाश्वस्य सुन्वतस्था शृणु यथाशृणोरत्रेः कर्माणि कृण्वतः. प्र त्रसदस्युमाविथ त्वमेक इन्नृषाह्य इन्द्र ब्रह्माणि वर्धयन्.. (७) हे इंद्र! तुमने जिस प्रकार अत्रि की स्तुतियां सुनी थीं, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले तथा यज्ञकर्म करने वाले मुझ श्यावाश्व ऋषि की स्तुतियों को भी सुनो. हे इंद्र! तुमने अकेले ही स्तुतियों को बढ़ाते हुए युद्ध में त्रसदस्यु की रक्षा की थी. (७) सूक्त—३७ देवता—इंद्र प्रेदं ब्रह्म वृत्रतूर्येष्वाविथ प्र सुन्वतः शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (१) हे शक्तिशाली इंद्र! युद्ध में तुम समस्त रक्षासाधनों द्वारा ब्राह्मणों एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों की रक्षा करो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन का सोमरस पिओ. (१) सेहान उग्र पृतना अभि द्रुहः शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिता सोमस्य वज्रिवः.. (२) हे यज्ञकर्मों के स्वामी एवं उग्र इंद्र! तुम शत्रुओं की सभी सेनाओं को पराजित करके सभी रक्षासाधनों द्वारा ब्राह्मणों की रक्षा करो. हे निंदारहित वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन करके सोमरस पिओ. (२) एकराळस्य भुवनस्य राजसि शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (३) हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम इस भवन के एकमात्र राजा के रूप में सुशोभित हो. तुम अपने समस्त रक्षासाधनों द्वारा ब्राह्मणों की रक्षा करो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (३) सस्थावाना यवयसि त्वमेक इच्छचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (४) हे यज्ञस्वामी इंद्र! एकमात्र तुम ही एक-दूसरे से मिले हुए द्युलोक एवं धरती को अलग करते हो. तुम अपने समस्त रक्षासाधनों द्वारा ब्राह्मणों की रक्षा करो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (४) क्षेमस्य च प्रयुजश्च त्वमीशिषे शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. ebook converter DEMO Watermarks*
माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (५) हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम समस्त रक्षासाधनों के द्वारा सारे संसार एवं योगक्षेम के स्वामी हो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (५) क्षत्राय त्वमवसि न त्वमाविथ शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (६) हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम समस्त रक्षासाधनों से विश्व को बल देने का कारण बनते हो एवं आश्रितों की रक्षा करते हो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (६) श्यावाश्वस्य रेभतस्तथा शृणु यथाशृणोरेत्रेः कर्माणि कृण्वतः. प्र त्रसदस्युमाविथ त्वमेक इन्नृषाह्या इन्द्र क्षत्राणि वर्धयन्.. (७) हे इंद्र! तुमने जिस प्रकार अत्रि की स्तुतियां सुनी थीं, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले एवं यज्ञकर्म करने वाले श्यावाश्व ऋषि की स्तुतियों को भी सुनो. हे इंद्र! तुमने अकेले ही स्तुतियों को बढ़ाते हुए युद्ध में त्रसदस्यु की रक्षा की थी. (७) सूक्त—३८ देवता—इंद्र व अग्नि यज्ञस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेषु कर्मसु. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (१) हे इंद्र व अग्नि! तुम शुद्ध एवं यज्ञ के ऋत्विज् हो. तुम युद्धों एवं यज्ञकर्मों में मेरी स्तुति समझो. (१) तोशासा रथयावाना वृत्रहणापराजिता. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (२) हे शत्रुनाशक, रथ द्वारा चलने वाले, वृत्रहंता एवं अपराजित इंद्र व अग्नि! मेरी स्तुतियों को जानो. (२) इदं वां मदिरं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (३) हे इंद्र व अग्नि! यज्ञ के नेताओं ने तुम्हारे लिए पाषाणों की सहायता से मधुर सोमरस तैयार किया है. तुम मेरी स्तुति समझो. (३) जुषेथां यज्ञमिष्टये सुतं सोमं सधस्तुती. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (४) हे यज्ञ के नेता एवं समानरूप से स्तुत इंद्र व अग्नि! यज्ञ में सम्मिलित होओ एवं यज्ञ के निमित्त निचोड़े हुए सोमरस की ओर आओ. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
इमा जुषेथां सवना येभिर्हव्यान्यूहथुः. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (५) हे यज्ञ के नेता इंद्र व अग्नि! तुम जिन सवनों के द्वारा हव्य वहन करते हो, उन्हीं में सम्मिलित बनो. तुम यहां आओ. (५) इमां गायत्रवर्तनिं जुषेथां सुष्टुतिं मम. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (६) हे यज्ञ के नेता इंद्र व अग्नि! तुम गायत्री छंद में निर्मित इस स्तुति को स्वीकार करो एवं यहां आओ. (६) प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जन्यावसू. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (७) हे शत्रुधन जीतने वाले इंद्र व अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले देवों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ. (७) श्यावाश्वस्य सुन्वतोऽत्रीणां शृणुतं हवम्. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (८) हे इंद्र और अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान मुझ श्यावाश्व एवं मेरे ऋत्विज् अत्रि की पुकार सोमरस पीने के लिए सुनो. (८) एवा वामह्व ऊतये यथाहुवन्त मेधिराः. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (९) हे इंद्र व अग्नि! तुम्हें पूर्वकाल में विद्वानों ने जिस प्रकार बुलाया था, उसी प्रकार मैं रक्षा एवं सोमपान के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (९) आहं सरस्वतीवतोरिन्द्राग्न्योरवो वृणे. याभ्यां गायत्रमृच्यते.. (१०) मैं उन्हीं स्तुतिशाली इंद्र व अग्नि से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता हूं, जिनके लिए गायत्री छंद वाले साममंत्र बोले जाते हैं. (१०) सूक्त—३९ देवता—अग्नि अग्निमस्तोष्युग्मियमग्निमीळा यजध्यै. अग्निर्दैवाँ अनक्तु न उभे हि विदथे कविरन्तश्चरति दूत्यं१ नभन्तामन्यके समे.. (१) ऋक् मंत्रों के योग्य अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. मैं यज्ञ के योग्य अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि हमारे यज्ञ में हव्यों द्वारा देवों का यजन करें. विद्वान् अग्नि धरती-आकाश के बीच दूतकार्य करते हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (१) न्यग्ने नव्यसा वचस्तनूषु शंसमेषाम्. न्यराती रराव्णां विश्वा अर्यो अरातीरितो युच्छन्त्वामुरो नभन्तामन्यके समे.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! हमारे शरीरों पर जो शत्रुओं की भविष्य में हिंसा होने वाली है, उसे समाप्त करो. तुम हव्य देने वालों के शत्रुओं को जलाओ. आक्रमण करने वाले सभी बुद्धिहीन शत्रु यहां से चले जावें. अग्नि सभी शत्रुओं की हिंसा करें. (२) अग्ने मन्मानि तुभ्यं कं घृतं न जुह्व आसनि. स देवेषु प्र चिकिद्धि त्वं ह्यसि पूर्व्यः शिवो दूतो विवस्वतो नभन्तामन्यके समे.. (३) हे अग्नि! मैं तुम्हारे मुख में सुखकर घी के समान सुंदर स्तोत्रों का हवन करता हूं. तुम देवों के प्रति की गई हमारी स्तुति को जानो. तुम प्राचीन, सुखकर एवं देवदूत हो. अग्नि सभी शत्रुओं की हिंसा करें. (३) तत्तदग्निर्वयो दधे यथायथा कृपण्यति. ऊर्जाहुतिर्वसूनां शं च योश्च मयो दधे विश्वस्यै देवहूतयै नभन्तामन्यके समे.. (४) स्तोता जो-जो अन्न मांगते हैं, अग्नि वही-वही अन्न प्रदान करते हैं. हव्य अन्न के द्वारा बुलाए गए अग्नि यजमानों को शांतिकारक एवं विषयों के उपभोग से उत्पन्न सुख देते हैं. अग्नि सभी देवों के आह्वान में रहते हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (४) स चिकेत सहीयसाग्निश्चित्रेण कर्मणा. स होता शश्वतीनां दक्षिणाभिरभीवृत इनोति च प्रतीव्यं१ नभन्तामन्यके समे.. (५) अग्नि शत्रुपराजय संबंधी विविध कर्मों द्वारा जाने जाते हैं एवं सभी देवों के होता हैं. पशुओं से घिरे हुए एवं शत्रुओं के विरोध में जाने वाले अग्नि सभी शत्रुओं का नाश करें. (५) अग्निर्जाता देवानामग्निर्वेद मर्तानामपीच्यम्. अग्निः स द्रविणोदा अग्निर्द्वीरा व्यूर्णते स्वाहुतो नवीयसा नभन्तामन्यके समे.. (६) अग्नि देवों का जन्म एवं मानवों का रहस्य जानते हैं. धन देने वाले अग्नि शोभन एवं नवीन आहुति पाकर धन का द्वार खोल देते हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (६) अग्निर्दवेषु संवसुः स विक्षु यज्ञियास्वा. स मुदा काव्या पुरु विश्वं भूमेव पुष्यति देवो देवेषु यज्ञियो नभन्तामन्यके समे.. (७) अग्नि देवों एवं यज्ञ योग्य प्रजाओं में निवास करते हैं. वे धरती के समान प्रसन्नतापूर्वक सारे कार्यों का पोषण करते हैं. देवों में यज्ञ के सर्वाधिक पात्र अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (७) यो अग्निः सप्तमानुषः श्रितो विश्वेषु सिन्धुषु. तमागन्म त्रिपस्त्यं मन्धातुर्र्दस्युहन्तममग्निं यज्ञेषु पूर्व्यं नभन्तामन्यके समे.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सात मनुष्यों वाले, सभी नदियों में आश्रित एवं तीन स्थानों वाले अग्नि ने मांधाता के लिए शत्रुओं का अधिक हनन किया था. यज्ञों में प्रमुख अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (८) अग्निखीणि त्रिधातून्या क्षेति विदथा कविः. स त्रीँरैकादशाँ इह यक्षच्च पिप्रयच्च नो विप्रो दूतः परिष्कृतो नभन्तामन्यके समे.. (९) क्रांतदर्शी एवं धरती आदि तीन स्थानों में रहने वाले अग्नि देवों के दूत, प्राज्ञ एवं अलंकृत होकर इस यज्ञ में तैंतीस देवों का यजन करें एवं हमारी अभिलाषा पूरी करें. अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (९) त्वं नो अग्न आयुषु त्वं देवेषु पूर्व्यं वस्व एक इरज्यसि. त्वामापः परिस्रुतः परि यन्ति स्वसेतवो नभन्तामन्यके समे.. (१०) हे अग्नि! तुम अकेले होते हुए भी मानो देवों के स्वामी हो. हे सेतुरूप अग्नि! तुम्हारे चारों तरफ जल रहता है. तुम सभी शत्रुओं को मारो. (१०) सूक्त—४० देवता—इंद्र व अग्नि इन्द्राग्नी युवं सु नः सहन्ता दासथो रयिम्. येन दृळहा समत्स्वा वीळु चित्साहिषीमह्यग्निर्वनेव वात इन्नभन्तामन्यके समे.. (१) हे इंद्र व अग्नि! तुम शत्रुओं को हराते हुए हमें धन दो. अग्नि वायु की सहायता से जिस प्रकार वन को जलाते हैं, उसी प्रकार लोग अग्नि द्वारा दिए धन की सहायता से शत्रुओं को हराते हैं. अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (१) नहि वां वव्रयामहेऽथेन्द्रमिद्याजामहे शविष्ठं नृणां नरम्. स नः कदा चिदर्वता गमदा वाजसातये गमदा मेधसातये नभन्तामन्यके समे.. (२) हे इंद्र व अग्नि! हम तुमसे धन की याचना नहीं करते. हम तो सबके नेता एवं सबसे अधिक शक्तिशाली इंद्र का यज्ञ करते हैं. इंद्र कभी अन्न देने के लिए और कभी यज्ञ प्राप्त करने के लिए घोड़े पर चढ़कर आते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (२) ता हि मध्यं भराणामिन्द्राग्नी अधिक्षितः. ता उ कवित्वना कवी. पृच्छ्यमाना सखीयते सं धीतमश्रुतं नरा नभन्तामन्यके समे.. (३) प्रसिद्ध इंद्र एवं अग्नि संग्रामों के बीच में निवास करते हैं. हे क्रांतदर्शी नेताओ! कविजनों द्वारा पूछने पर तुम्हीं मित्रता के इच्छुक यजमान द्वारा किए हुए यज्ञकर्म की व्याख्या करते हो. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं का नाश करें. (३) अभ्यर्च नभाकवदिन्द्राग्नी यजसा गिरा. ebook converter DEMO Watermarks*
ययोर्विश्वमिदं जगदियं द्यौः पृथिवी महु१पस्थे बिभृतो वसु नभन्तामन्यके समे.. (४) हे नाभाक! यज्ञ और स्तुति के द्वारा इंद्र और अग्नि की पूजा करो. इन्हीं में सारा संसार स्थित है और इन्हीं की गोद में द्युलोक एवं विशाल धरती धन धारण करते हैं. ये दोनों सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (४) प्र ब्रह्माणि नभाकवदिन्द्राग्निभ्यामिरज्यत. या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत इन्द्र ईशान ओजसा नभन्तामन्यके समे.. (५) नाभाक जैसे ऋषि इंद्र एवं अग्नि की स्तुति करते हैं. वे दोनों सात जड़ों एवं बंद द्वारों वाले सागर को अपने तेज द्वारा ढक लेते हैं. इंद्र अपने तेज के कारण सबके स्वामी हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (५) अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितमोजो दासस्य दम्भय. वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजेमहि नभन्तामन्यके समे.. (६) हे इंद्र! पुराना मनुष्य जैसे लता की बाहर निकली हुई शाखा को काटता है, उसी प्रकार तुम हमारे शत्रुओं को काटो एवं दास नामक राक्षस का विनाश करो. हम इंद्र की कृपा से दास द्वारा एकत्रित धन का भोग करेंगे. इंद्र और अग्नि हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (६) यदिन्द्राग्नी जना इमे विह्वयन्ते तना गिरा. अस्माकेभिर्नृभिर्वयं सासह्वाम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतो नभन्तामन्यके समे.. (७) जो लोग धन और स्तुतियों द्वारा इंद्र तथा अग्नि को बुलाते हैं, उनके मध्य हम नाभाकगोत्रीय लोग सेवा की इच्छा करते हुए अपने लोगों को साथ लेकर शत्रुओं को पराजित करेंगे एवं स्तुति करने वालों को अपनाएंगे. इंद्र और अग्नि सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (७) या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उप द्युभिः. इन्द्राग्न्योरनु व्रतमुहाना यन्ति सिन्धवो यान्त्सीं बन्धादमुञ्चतां नभन्तामन्यके समे.. (८) जो श्वेत वर्ण के इंद्र एवं अग्नि अपनी दीप्ति द्वारा नीचे से द्युलोक से ऊपर जाते हैं, उन्हीं के यज्ञकर्म को अनुष्ठान करते हुए यजमान हव्य धारण करते हैं. उन्होंने नदियों को बंधन से छुड़ाया था. वे सभी शत्रुओं को मारें. (८) पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः सूनो हिन्वस्य हरिवः. वस्वो वीरस्यापृचो या नु साधन्त नो धियो नभन्तामन्यके समे.. (९) हे हरि नामक घोड़ों वाले, प्रेरणाकर्त्ता, प्रसन्न करने वाले, वीर एवं धनी इंद्र! तुम्हारी समानता करने वाली बहुत सी वस्तुएं हैं. तुम्हारी प्राचीन स्तुतियां हमारी बुद्धि को पूर्ण करें. ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (९) तं शिशीता सुवृक्तिभिस्त्वेषं सत्वानमृग्मियम्. उतो नु चिद्य ओजसा शुष्णस्याण्डानि भेदति जेषत्स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे.. (१०) हे स्तोताओ! दीप्त, धन देने वाले व ऋक् मंत्रों के योग्य इंद्र का संस्कार शोभन-स्तुतियों द्वारा करो. अपनी शक्ति द्वारा शुष्ण असुर की संतान का नाश करने वाले इंद्र स्वर्ग का जल जीतते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (१०) तं शिशीता स्वध्वरं सत्यं सत्वानमृत्वियम्. उतो नु चिद्य ओहत आण्डा शुष्णस्य भेदत्यजैः स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे.. (११) हे स्तोताओ! शोभन-यज्ञ वाले विनाशरहित, धनसंपन्न एवं ऋतुओं के अनुकूल यज्ञ का संस्कार स्तुतियों द्वारा करो. यज्ञ के अभिमुख जाने वाले इंद्र शुष्ण असुर की संतान को मारते हैं एवं स्वर्ग का जल जीतते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (११) एवेन्द्राग्निभ्यां पितृवन्नवीयो मन्धातृवदङ्गिरस्वदवाचि. त्रिधातुना शर्मणा पातमस्मान् वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१२) मैंने अपने पिता मांधाता एवं अंगिरा ऋषि के समान नवीन स्तुतियों को बोला है. वे तीन कमरों वाले मकान को देकर हमारी रक्षा करें. हम धनों के स्वामी हों. (१२) सूक्त—४१ देवता—वरुण अस्मा ऊ षु प्रभूतये वरुणाय मरुद्भ्योऽर्चा विदुष्टरेभ्यः. यो धीता मानुषाणां पश्वो गा इव रक्षति नभन्तामन्यके समे.. (१) हे स्तोता! अधिक धन पाने के लिए वरुण एवं अधिक विद्वान् मरुतों की स्तुति करो. वे गायों के समान ही मानवों के पशुओं की रक्षा करते हैं. वरुण हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (१) तमू षु समना गिरा पितॄणां च मन्मभिः. नाभाकस्य प्रशस्तिभिर्यः सिन्धूनामुपोदये सप्तस्वसा स मध्यमो नभन्तामन्यके समे.. (२) मैं शोभन-स्तुति द्वारा वरुण तथा स्तोत्रों द्वारा पितरों की प्रशंसा करता हूं. मैं नाभाक ऋषि द्वारा निर्मित प्रशंसाओं से वरुण की स्तुति करता हूं. वरुण नदियों के समीप उदित होते हैं. उनकी सात बहिनें हैं, जिन में वे बीच के हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
स क्षपः परि षस्वजे न्यू१सो मायया दधे स विश्वं परि दर्शतः. तस्य वेनीरनु व्रतमूषस्तिस्रो अवर्धयन्नभन्तामन्यके समे.. (३) वरुण रात्रियों का आलिंगन करते हैं. दर्शनीय वरुण उन्नति करते हुए अपनी माया द्वारा संसार को धारण करते हैं. वरुण के व्रत की कामना करने वाले प्रातः, दोपहर एवं संध्या तीनों कालों के यज्ञ को बढ़ाते हैं. वे सभी शत्रुओं को समाप्त करें. (३) यः ककुभो निधारयः पृथिव्यामधि दर्शतः. स माता पूर्व्यं पदं तद्वरुणस्य सप्त्यं स हि गोपा इवेर्यो नभन्तामन्यके समे.. (४) जो वरुण पृथ्वि के ऊपर दर्शनीय बनकर दिशाओं को धारण करते हैं, वे प्राचीन स्वर्ग एवं हमारे विचरणस्थान धरती के निर्माता हैं. वे स्वामी बनकर गायों की रक्षा करते हैं. वे हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (४) यो धर्ता भुवनानां य उस्राणामपीच्या३ वेद नामानि गुह्या. स कविः काव्या पुरु रूपं द्यौरिव पुष्यति नभन्तामन्यके समे.. (५) जो वरुण भुवनों को धारण करने वाले एवं रश्मियों तथा गुहा में छिपे नामों को जानते हैं, वे ही बुद्धिमान् वरुण द्युलोक के समान कविकृत काव्यों का पोषण करते हैं. वे सभी शत्रुओं को समाप्त करें. (५) यस्मिन् विश्वानि काव्या चक्रे नाभिरिव श्रिता. त्रितं जूती सपर्यत व्रजे गावो न संयुजे युजे अश्वाँ अयुक्त नभन्तामन्यके समे.. (६) हे मेरे सेवको! तीन स्थानों में रहने वाले वरुण की शीघ्र सेवा करो. जिस प्रकार नाभि में पहिया स्थित रहता है उसी प्रकार सब काव्य वरुण में स्थित रहते हैं. जिस प्रकार गाय को गोशाला में ले जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रु घोड़ों को रथ में जोड़ते हैं. वरुण सब शत्रुओं को मारें. (६) य आस्वत्क आशये विश्वा जातान्येषाम्. परि धामानि मर्मृशद्वरुणस्य पुरो गये विश्वे देवा अनु व्रतं नभन्तामन्यके समे.. (७) सारी दिशाओं को व्याप्त करने वाले वरुण चारों ओर फैले हुए शत्रुनगरों को नष्ट करते हैं. सब देवता वरुण के रथ के आगे यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करते हैं. वरुण सब शत्रुओं को मारें. (७) स समुद्रो अपीच्यस्तुरो द्यामिव रोहति नि यदासु यजुर्दधे. स माया अर्चिना पदास्तृणान्नाकमरुहन्नभन्तामन्यके समे.. (८) समुद्र का रूप धारण करने वाले वरुण छिपकर शीघ्र ही सूर्य के समान स्वर्ग में पहुंचते ebook converter DEMO Watermarks*