ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
दीप्तिशाली इंद्र! हम बहिन-भाई की मित्रता के समान तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि को जानते हैं. हमारे लिए तुम्हारी मित्रता कल्याणकारक हो. (७) सूक्त—२४ देवता—इंद्र व अश्विनीकुमार इन्द्र सोममिमं पिब मधुमन्तं चमू सुतम्. अस्मे रयिं नि धारय वि वो मदे सहस्रिणं पुरूवसो विवक्षसे.. (१) हे इंद्र! पत्थरों से कुचलकर निचोड़ा हुआ यह मधुर सोमरस पिओ. हे अधिक धन वाले तथा महान् इंद्र! सोमरस का अधिक नशा होने पर तुम हजारों धन दो. (१) त्वां यज्ञेभिरुक्थैरुप हव्यभिरीमहे. शचीपते शचीनां वि वो मदे श्रेष्ठं नो धेहि वार्यं विवक्षसे.. (२) हे इंद्र! यज्ञों, स्तुतियों तथा हव्यों के द्वारा हम तुमसे अभिलषित धन मांगते हैं. हे कर्मपालक इंद्र! तुम सभी कर्मों की रक्षा करते हो. तुम सोमरस का विशेष नशा चढ़ने पर हमें उत्तम धन देकर महान् बनो. (२) यस्पतिर्वार्याणामसि रध्रस्य चोदिता. इन्द्र स्तोतॄणामविता वि वो मदे द्विषो नः पाह्यंहसो विवक्षसे.. (३) हे इंद्र! तुम अभिलषित वस्तुओं के स्वामी एवं स्तोता को कर्म की प्रेरणा देने वाले हो. हे इंद्र! तुम स्तोताओं के रक्षक हो. तुम सोमरस का विशेष मद होने पर शत्रुओं से हमारी रक्षा करो और महान् बनो. (३) युवं शक्रा मायाविना समीची निरमन्थतम्. विमदेन यदीळिता नासत्या निरमन्थतम्.. (४) हे शत्रुवधसमर्थ, बुद्धिमान् एवं परस्पर मिले हुए अश्विनीकुमारो! तुमने अरणिमंथन करके अग्नि को उत्पन्न किया था. हे सत्य रूप अश्विनीकुमारो! विमद की स्तुति सुनकर तुमने अरणि मथकर अग्नि जलाई. (४) विश्वे देवा अकृपन्त समीच्योर्निष्पतन्त्योः. नासत्यावब्रुवन्देवाः पुनरा वहतादिति.. (५) हे अश्विनीकुमारो! मंथन के समय मिली हुई अरणियों से जब आग की चिनगारियां निकलने लगीं तब सारे देवों ने तुम्हारी प्रशंसा की एवं कहा—“ऐसा दोबारा करो.” (५) मधुमन्मे परायणं मधुमत्पुनरायनम्. ता नो देवा देवतया युवं मधुमतस्कृतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! मेरा घर से बाहर निकलना और घर वापस आना प्रसन्नताकारक हो. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—२५ देवता—सोम
हे दीप्तिशाली देवो! अपनी महत्ता से हमें उक्त दोनों कामों में संतुष्ट करो. (६) सूक्त—२५ देवता—सोम भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम्. अधा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणन्गावो न यवसे विवक्षसे.. (१) हे सोम! हमारे मन को प्रेरित करके कल्याणकारी, दक्ष एवं यज्ञकर्म करने वाला बनाओ. तुम महान् हो, इसलिए तुम्हारा होने पर स्तोता तुम्हारी मित्रता में उसी प्रकार रमण करे, जिस प्रकार गाएं घास के प्रति आनंदित होती हैं. (१) हृदिस्पृशस्त आसते विश्वेषु सोम धामसु. अधा कामा इमे मम वि वो मदे तिष्ठन्ते वसूयवो विवक्षसे.. (२) हे सोम! स्तोता लोग अपनी स्तुतियों से तुम्हारे मन को हरते हुए सब स्थानों पर बैठते हैं. तुम्हारा नशा हो जाने पर धन के इच्छुक मेरे मन में तरहतरह की अभिलाषाएं उत्पन्न होती हैं, इसलिए तुम महान् हो. (२) उत व्रतानि सोम ते प्राहं मिनामि पाक्या. अधा पितेव सूनवे वि वो मदे मृळा नो अभि चिद्दधाद्विवक्षसे.. (३) हे सोम! मैं अपनी परिपक्व बुद्धि से तुम्हारे यज्ञकर्मों का परिणाम देखता हूं. हे सोमरस! तुम अपना नशा चढ़ने पर हमारे प्रति उसी प्रकार अनुकूल बनो, जिस प्रकार पिता पुत्र के प्रति अनुकूल होता है. तुम शत्रुवध करके हमारी रक्षा करो, क्योंकि तुम महान् हो. (३) समु प्र यन्ति धीतयः सर्गासोऽवताँ इव. क्रतुं नः सोम जीवसे वि वो मदे धारया चमसाँ इव विवक्षसे.. (४) हे सोम! कलश जल निकालने के लिए जैसे कुएं में जाता है, वैसे ही हमारी स्तुतियां तुम्हारे पास जाती हैं. तुम महान् हो, इसलिए हमारे जीवन के निमित्त इस यज्ञ को इस प्रकार धारण करो, जिस प्रकार लोग चमस को धारण करते हैं. (४) तव त्ये सोम शक्तिभिर्नाकामासो वृण्विरे. गृत्सस्य धीरास्तवसो वि वो मदे व्रजं गोमन्तमश्विनं विवक्षसे.. (५) हे सोम! निश्चित अभिलाषाओं वाले धीर व्यक्तियों ने यज्ञकर्मों द्वारा तुम्हें संतुष्ट किया है. तुम महान् एवं बुद्धिमान् हो. तुम सोमरस का नशा होने पर हमें गायों से युक्त गोशाला एवं घोड़े दो, क्योंकि तुम महान् हो. (५) पशुं नः सोम रक्षसि पुरुत्रा विष्ठितं जगत्. ebook converter DEMO Watermarks*
समाकृणोषि जीवसे वि वो मदे विश्वा सम्पश्यन्भुवना विवक्षसे.. (६) हे सोम! हमारे पशुओं एवं नानारूप में स्थित इस विश्व की रक्षा करो. तुम सोमरस का मद होने पर सारे जगत् में खोजकर हमारे जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं ला देते हो, इसलिए तुम महान् हो. (६) त्वं नः सोम विश्वतो गोपा अदाभ्यो भव. सेध राजन्नप स्रिधो वि वो मदे मा नो दुःशंस ईशता विवक्षसे.. (७) हे अपराजेय सोम! तुम सभी प्रकार से हमारी रक्षा करने वाले बनो. हे राजा सोम! तुम हमारे शत्रुओं को दूर करो. सोम का नशा होने पर निंदक हमारा स्वामी न बने, इसलिए तुम महान् हो. (७) त्वं नः सोम सुक्रतुर्वयोधेयाय जागृहि. क्षेत्रवित्तरो मनुषो वि वो मदे द्रुहो नः पाह्यंहसो विवक्षसे.. (८) हे शोभन कर्म वाले सोम! तुम हमें अन्न देने के लिए सावधान रहो. तुम खेत देने वालों में उत्तम हो. सोम का नशा होने पर तुम शत्रु मनुष्य एवं पाप से हमारी रक्षा करो, क्योंकि तुम महान् हो. (८) त्वं नो वृत्रहन्तमेन्द्रस्येन्दो शिवः सखा. यत्सीं हवन्ते समिथे वि वो मदे युध्यमानास्तोकसातौ विवक्षसे.. (९) हे शत्रुहंताओं में श्रेष्ठ सोम! अत्यंत महान् संग्राम में युद्ध करते हुए शत्रु जब सब ओर से ललकारते हैं, तब तुम हमारी रक्षा करो. तुम इंद्र के कल्याणकारक मित्र हो. तुम विशेष मद के कारण महान् हो. (९) अयं घ स तुरो मद इन्द्रस्य वर्धत प्रियः. अयं कक्षीवतो महो वि वो मदे मतिं विप्रस्य वर्धयद्विवक्षसे.. (१०) सोम शीघ्र काम करने वाले, नशीले एवं इंद्र को तृप्ति देने वाले हैं. वे हमारी बुद्धि को बढ़ावें. सोम ने महान् मेधावी कक्षीवान् ऋषि की बुद्धि को बढ़ाया था. वे विशेष मद के कारण महान् हैं. (१०) अयं विप्राय दाशुषे वाजाँ इयर्ति गोमतः. अयं सप्तभ्य आ वरं वि वो मदे प्रान्धं श्रोणं च तारिषद्विवक्षसे.. (११) सोम बुद्धिमान् यजमान को पशुयुक्त अन्न देते हैं. एवं सात होताओं को उत्तम धन प्रदान करते हैं. सोम ने अंधे दीर्घतमा ऋषि को आंखें देकर और लंगड़े परावृज ऋषि को पैर देकर विशेष रूप से बढ़ाया था. सोम विशेष मद के कारण महान् हैं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—२६ देवता—पूषा प्र ह्यच्छा मनीषाः स्पार्हा यन्ति नियतः. प्र दस्रा नियुद्रथः पूषा अविष्टु माहिनः.. (१) हमारे अभिलाषा योग्य एवं नियमित स्तुतिवचन पूषादेव को प्राप्त करने के लिए भली प्रकार जाते हैं. दर्शनीय, जाने के लिए सदा रथ जोड़ने वाले एवं महान् पूषादेव आकर हमारी रक्षा करें. (१) यस्य तन्महित्वं वाताप्यमयं जनः. विप्र आ वंसद्धीतिभिश्निकेत सुष्टुतीनाम्.. (२) यह मेधावी यजमान सूर्यमंडल में स्थित महान् जलसमूह को यज्ञक्रिया द्वारा धरती पर लावें. पूषादेव यजमान की शोभन स्तुतियां जानें. (२) स वेद सुष्टुतीनामिन्दुर्न पूषा वृषा. अभि प्सुरः प्रुषायति व्रजं न आ प्रुषायति.. (३) सोम के समान रस बरसाने वाले पूषादेव शोभन स्तुतियों को जानते हैं. सुंदर पूषा हम पर जल बरसाते हैं एवं हमारी गोशाला को सींचते हैं. (३) मंसीमहि त्वा वयमस्माकं देव पूषन्. मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम्.. (४) हे अभिलाषाओं को पूरा करने वाले एवं बुद्धिमानों को भी कंपित करने वाले पूषादेव! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (४) प्रत्यर्धिर्यज्ञानामश्वहयो रथानाम्. ऋषिः स यो मनुर्हितो विप्रस्य यावयत्सखः.. (५) यज्ञों के आधे भाग के भागी, रथों में घोड़ों के द्वारा चलने वाले, सबको देखने वाले एवं मानवों के हितैषी पूषादेव शत्रुओं को दूर भगाने वाले मित्र हैं. (५) आधीषमाणायाः पतिः शुचायाश्च शुचस्य च. वासोवायोऽवीनामा वासांसि मर्मृजत्.. (६) संतान उत्पन्न करने में समर्थ बकरी और बकरे के स्वामी पूषा भेड़ के बालों के दशापवित्र नामक वस्त्र बुनते हैं एवं शुद्ध करते हैं. (६) इनो वाजानां पतिरिनः पुष्टीनां सखा. प्र श्मश्रु हर्यतो दूधोद्वि वृथा यो अदाभ्यः.. (७) ईश्वर पूषा अन्नों के स्वामी एवं पुष्टिकारक वस्तुओं के मित्र हैं. शत्रुओं द्वारा अपराजेय पूषा अपने अभिलषित यजमान का सोमरस पीकर अनायास ही अपनी दाढ़ी को हिलाते हैं. (७) आ ते रथस्य पूषन्नजा धुरं ववृत्युः. विश्वस्यार्थिनः सखा सनोजा अनपच्युतः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—२७ देवता—इंद्र
हे पूषा! बकरे तुम्हारे रथ की धुरी आगे खींचते हैं. तुम सभी याचकों के मित्र, बहुत जन्म लेने वाले एवं अपने अधिकार से च्युत न होने वाले हो. (८) अस्माकमूर्जा रथं पूषा अविष्टु माहिनः. भुवद्वाजानां वृध इमं न शृणवद्द्ववम्.. (९) महान् पूषादेव अपने बल के द्वारा हमारे रथ की रक्षा करें, हमारे अन्नों को बढ़ावें और हमारी इस पुकार को सुनें. (९) सूक्त—२७ देवता—इंद्र असत्सु मे जरितः साभिवेगो यत्सुन्वते यजमानाय शिक्षम्. अनाशीर्दामहमस्मि प्रहन्ता सत्यधृतं वृजिनायन्तमाभुम्.. (१) इंद्र ने कहा—“हे स्तोता! मेरी ऐसी शोभन मनोवृत्ति है कि मैं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को मनचाहा फल देता हूं. जो मुझे हव्य नहीं देता, असत्य भाषण करता है एवं पापकर्म करना चाहता है, उसे मैं पूरी तरह नष्ट कर देता हूं.” (१) यदीदहं युधये संनयान्यदेवयून्तन्वा३ शूशुजानान्. अमा ते तुम्रं वृषभं पचानि तीव्रं सुतं पञ्चदशं नि षिञ्चम्.. (२) ऋषि ने कहा—“हे इंद्र! जिस समय मैं देवयज्ञ न करने वाले एवं केवल अपने शरीर को पालने में लगे हुए लोगों से युद्ध करने जाता हूं. उस समय ऋत्विजों के साथ मिलकर बैल का मांस पकाता हूं एवं पंद्रह दिनों में अर्थात् प्रतिदिन तेज नशे वाले सोमरस को तुम्हारे लिए देता हूं.” (२) नाहं तं वेद य इति ब्रवीत्यदेवयून्त्समरणे जघन्वान्. यदावाख्यत्समरणमृघावदादिद्ध मे वृषभा प्र ब्रुवन्ति.. (३) इंद्र ने कहा—“मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जो यह कहता हो कि मैंने देवयज्ञ करने वालों को युद्ध में मारा है. मैं भयानक युद्ध में जाकर जब देवयज्ञ रहित लोगों का नाश करता हूं, तब विद्वान् लोग मेरे उस वीरकर्म का विस्तार से वर्णन करते हैं.” (३) यदज्ञातेषु वृजनेष्वासं विश्वे सतो मघवानो म आसन्. जिनामि वेत्क्षेम आ सन्तमाभुं प्र तं क्षिणां पर्वते पादगृह्य.. (४) “जिस समय मैं सहसा सामने आए युद्ध में सम्मिलित होता हूं, उस समय सारे ऋषि मेरे आसपास बैठते हैं. मैं प्रजा के कल्याण के लिए उस चारों ओर घूमने वाले शत्रु को जीतता हूं तथा उसके पैर पकड़कर उसे पर्वत के ऊपर फेंक देता हूं.” (४) न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये. ebook converter DEMO Watermarks*
मम स्वनात्कृधुकर्णो भयात एवेदनु धूनिक्रणः समेजात्.. (५) “मुझे युद्ध में कोई रोक नहीं पाता. यदि मैं मन में कोई निश्चय करूं तो पर्वत भी उसका विरोध नहीं कर सकते. मेरे गर्जन से बहरा भी डर जाता है. सूर्य भी प्रतिदिन मेरे भय से कांपते हैं.” (५) दर्शन्वत्र शृतपाँ अनिन्द्रान्बाहुक्षदः शरवे पत्यमानान्. घृषुं वा ये निनिदुः सखायमध्यू न्वेषु पवयो ववृत्युः.. (६) “मैं इस संसार में सोमरस आदि हवि को स्वयं पीने वालों, मुझ इंद्र को न मानने वालों, भुजाओं से मेरे यजमानों को टुकड़े-टुकड़े करने वालों एवं उन्हें मारने के लिए आने वालों को शीघ्र देखता हूं. मुझ महान् एवं सबके मित्र इंद्र की जो निंदा करते हैं, उनके ऊपर मेरा आयुध वज्र शीघ्र प्रहार करता है.” (६) अभूवाँक्षीर्व्यु१ आयु॑रानङ् दर्शन्नु पूर्वो अपरो नु दर्षत्. द्वे पवस्ते परि तं न भूतो यो अस्य पारे रजसो विवेष.. (७) ऋषि ने कहा—“हे इंद्र! तुम हमारे सामने आते हो और धरती को जल से सींचते हो. तुमने अधिक आयु पाई है. तुमने पूर्वकाल में शत्रुओं को नष्ट किया और उसके बाद भी शत्रु नष्ट किए. तुम इस विस्तृत विश्व में व्याप्त हो. द्यावा-पृथिवी दोनों तुमको नहीं नाप सकते.” (७) गावो यवं प्रयुता अर्यो अक्षन्ता अपश्यं सहगोपाश्चरन्तीः. हवा इदयों अभितः समायन्कियदासु स्वपतिश्छन्दयाते.. (८) इंद्र ने कहा—“बहुत सी गाएं एकत्र होकर जौ खा रही हैं. मैं स्वामी के समान ग्वालों के साथ इधर-उधर घूमती हुई उन गायों को देखता हूं. वे गाएं बुलाने पर स्वामी के पास आ जाती हैं. गायों का स्वामी गायों से बहुत सा दूध दुहता है.” (८) सं यद्वयं यवसादो जनानामहं यवाद उर्वञ्जे अन्तः. अत्रा युक्तोऽवसातारमिच्छादथो अयुक्तं युनजद्व्रन्वान्.. (९) ऋषि ने अपने मन में कहा—“संसार में जौ के तिनके खाने वाले पशु मेरे ही रूप हैं. अन्न खाने वाले मनुष्य भी मुझसे भिन्न नहीं हैं. धरती के आंगन और विस्तृत आकाश में जो अंतर्यामी ब्रह्म है, वह मैं ही हूं. हृदय रूपी आकाश में रहने वाले इंद्र अपने भक्त को चाहते हैं. इंद्र योगरहित एवं संसार की विषयवासनाओं में अधिक फंसे व्यक्ति को भी ठीक रास्ते पर लाते हैं. (९) अत्रेदु मे मंससे सत्यमुक्तं द्विपाच्च यच्चतुष्पात्संसृजानि. स्त्रीभिर्यो अत्र वृषणं पृतन्याद्युद्धो अस्य वि भजानि वेदः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र ने कहा— “इस स्तोत्र में मैंने जो कहा है, वह सत्य है. इसे तुम जान लो. मैं दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं को बनाता हूं. जो व्यक्ति अपने पुरुषों को स्त्रियों के विरुद्ध लड़ने भेजता है, उसका धन मैं युद्ध के बिना ही छीनकर अपने भक्तों को देता हूं.” (१०) यस्यानक्षा दुहिता जात्वास कस्तां विद्वाँ अभि मन्याते अन्धाम्. कतरो मेनिं प्रति तं मुचाते य ईं वहाते य ईं वा वरेयात्.. (११) “मुझ इंद्र से उत्पन्न दर्शनहीना कन्या प्रकृति को मुझ में लीन जानते हुए कौन आश्रय देगा? वृत्र आदि शत्रुओं पर वज्र कौन सा देव फेंकता है? इस शत्रु को मेरे अतिरिक्त न कोई वहन कर सकता है और न वरण कर सकता है.” (११) कियती योषा मर्यतो वधूयोः परिप्रीता पन्यसा वार्येण. भद्रा वधूर्भवति यत्सुपेशाः स्वयं सा मित्रं वनुते जने चित्.. (१२) “ऐसी कितनी स्त्रियां हैं जो मानव जीवन के भोग प्रदान करने वाले एवं स्त्री के अभिलाषी पुरुष के प्रति धन अथवा प्रशंसा के कारण आसक्त हो जाती हैं. जो सुगठित शरीर वाली भली नारी होती है, वह बहुत से पुरुषों में से अपने मन के अनुकूल पति चुन लेती है.” (१२) पत्तो जगार प्रत्यञ्चमत्ति शीर्ष्णा शिरः प्रति दधौ वरूथम्. आसीन ऊर्ध्वमुपसि क्षिणाति न्युङ्ङुत्तानामन्वेति भूमिम्.. (१३) सूर्य अपनी किरणों द्वारा जल सोख लेते हैं, अपने समीप गए हुए जल का उपभोग करते हैं तथा वर्षा का जल अपनी किरणों द्वारा सबके सिरों पर बरसाते हैं. सूर्य अपने मंडल में स्थित होकर अपनी ऊर्ध्वगामिनी किरणों को फेंकते हैं एवं किरणसमूह के साथ धरती पर विस्तृत प्रकाश का अनुगमन करते हैं. (१३) बृहन्नच्छायो अपलाशो अर्वा तस्थौ माता विषितो अत्ति गर्भः. अन्यस्या वत्सं रिहती मिमाय कया भुवा नि दधे धेनूरूधः.. (१४) नित्य गतिशील व महान् आदित्य बिना पत्तों के पेड़ के समान छायारहित हैं. वर्षा द्वारा लोक निर्माण करने वाले, आलंबनरहित एवं तीनों लोकों के गर्भ के समान आदित्य हव्य भक्षण करते हैं. द्युलोक रूपधारी गाय अदिति के पुत्र को प्रेम के साथ चाटती हुई पोषित करती है. द्यौरूपिणी गाय आदित्य को अपने थनों के समान धारण करती है. (१४) सप्त वीरासो अधरादुदायन्नष्टोत्तरात्तात् समजग्मिरन्ते. नव पश्चातात्स्थिविमन्त आयन्दश प्राक्सानु वि तिरन्त्यश्वः.. (१५) इंद्ररूपी प्रजापति के शरीर से विश्वामित्र आदि सात ऋषियों ने जन्म लिया. प्रजापति के ebook converter DEMO Watermarks*
शरीर के ऊपर वाले भाग से बालखिल्य आदि आठ ऋषि उत्पन्न हुए. भृगु आदि नौ ऋषि प्रजापति के पिछले भाग से जन्मे. अंगिरा आदि ऋषियों की उत्पत्ति अग्रभाग से हुई. ये सब ऋषि यज्ञांश का भाग करने वाले द्युलोक के ऊंचे भागों को बढ़ाते हैं. (१५) दशानामेकं कपिलं समानं तं हिन्वन्ति क्रतवे पार्याय. गर्भं माता सुधितं वक्षणास्ववेनन्तं तुषयन्ती बिभर्ति.. (१६) अंगिरा आदि दस ऋषियों में प्रजापति के समान कपिल को यज्ञ पूर्ण करने की प्रेरणा दी गई. संतुष्ट होकर प्रकृति माता ने प्रजापति द्वारा स्थापित गर्भ धारण किया. (१६) पीवानं मेषमपचन्त वीरा न्युप्ता अक्षा अनु दीव आसन्. द्वा धनुं बृहतीमप्स्र्वन्त: पवित्रवन्ता चरतः पुनन्ता.. (१७) प्रजापति के पुत्र अंगिरा आदि ऋषियों ने मोटे बकरे को पकाया. जुआ खेलने के स्थान में देवों के पासे फेंके गए. इन अंगिराओं में से दो धन के समान प्रसन्नता देने वाले कपिल को लेकर मंत्र उच्चारण के साथ अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए जल में घूमने लगे. (१७) वि क्रोशनासो विष्वञ्च आयन्पचाति नेमो नहि पक्षदर्धः. अयं मे देवः सविता तदाह द्रवन्न इद्धनवत्सर्पिरन्नः.. (१८) अनेक प्रकार से प्रजापति को पुकारते हुए नाना गतियों वाले अंगिरा आए. उन में से आधे ऋषि प्रजापति के लिए हव्य पकाते हैं, आधे नहीं पकाते. सूर्य देव ने यह बात मुझसे कही है. काष्ठ एवं घी का भोजन करने वाले अग्नि प्रजापति को धारण करते हैं. (१८) अपश्यं ग्रामं वहमानमारादचक्रया स्वधया वर्तमानम्. सिषक्त्यर्थः प्र युगा जनानां सद्यः शिश्ना प्रमिनानो नवीयान्.. (१९) मैंने देखा है कि प्रजापति दूर से प्राणियों का निर्माण करते हैं. वे चक्ररहित स्वधा के द्वारा अपने आपको धारण करते हैं. स्वामी इंद्र यजमानों के यज्ञकालों का निर्माण करते हैं. वे नवीन शरीर धारण करके शीघ्र ही शत्रुनाश करते हैं. (१९) एतौ मे गावौ प्रमरस्य युक्तौ मो षु प्र सेधीर्मुहुरिन्ममन्धि. आपश्चिद्दस्य वि नशन्त्यर्थं सूरश्च मर्क उपरो बभूवान्.. (२०) मुझ शत्रुमारक इंद्र के रथ में जुड़े हुए दो सुपूजित एवं शत्रुओं के पास पहुंचने वाले हरि नामक घोड़ों को मत रोको. बार-बार उनकी स्तुति करो. वर्षा का जल भी इंद्र की गति को व्याप्त करता है. मेघ बिना किसी श्रम के उन स्थानों को पार कर जाते हैं. (२०) अयं यो वज्रः पुरुधा विवृत्तोऽवः सूर्यस्य बृहतः पुरीषात्. श्रव इदेना परो अन्यदस्ति तदव्यथी जरिमाणस्तरन्ति.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*
यह इंद्र का वज्र महान् सूर्य मंडल के नीचे वाले भाग से वर्षा के लिए गिरता है. इसके अतिरिक्त अन्य भी स्थान हैं. स्तोता बिना किसी श्रम के उन स्थानों को पार कर जाते हैं. (२१) वृक्षेवृक्षे नियता मीमयद्गौस्ततो वयः प्र पतान् पूरुषादः. अथेदं विश्वं भुवनं भयात इन्द्राय सुन्वदृषये च शिक्षत्.. (२२) वृक्ष से बने हुए प्रत्येक धनुष पर चढ़ी हुई गाय की तांत की डोरी शब्द करती है. उससे शत्रुओं का नाश करने वाले बाण निकलते हैं. उस समय इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ता हुआ एवं ऋषि के लिए यज्ञ की दक्षिण देता हुआ भी यह सारा संसार भय से कांपता है. (२२) देवानां माने प्रथमा अतिष्ठन्कृन्तत्रादेषामुपरा उदायन्. त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपा द्वा बूबूकं वहतः पुरीषम्.. (२३) देवों के निर्माण के समय ये बादल सबसे पहले देखे गए. इंद्र द्वारा इन मेघों के छेदन के बाद जल ऊपर आया. पर्जन्य, वायु और सूर्य ये तीन धरती पर खड़े वृक्षों को पकाते हैं. सबको प्रभावित करने वाले वायु और सूर्य सबको प्रसन्न करने वाला जल बरसाते हैं. (२३) सा ते जीवातुस्त तस्य विद्धि मा स्मैतादृगप गूहः समर्ये. आविः स्वः कृणुते गृहते बुसं स पादुरस्य निर्णिजो न मुच्यते.. (२४) हे ऋषि! सूर्य ही तुम्हारे प्राणाधार हैं. तुम यज्ञ में सूर्य का यह स्वरूप जानो. उसे छिपाना मत. सूर्य का वह गमन किरणों के रूप में जाकर लोक को प्रकाशित करता है. सूर्य स्वर्ग का आविष्कार करते हैं एवं जल को सोखते हैं. सूर्य अपनी गति कभी नहीं छोड़ते. (२४) सूक्त—२८ देवता—इंद्र विश्वो ह्य१न्यो अरिराजगाम ममेदह श्वशुरो ना जगाम. जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात्स्वाशितः पुनरस्तं जगायात्.. (१) इंद्र के पुत्र वसुक की स्त्री कहती है—“इंद्र के अतिरिक्त सभी देव हमारे यज्ञ में आए हैं. मेरे ससुर इंद्र नहीं आए, यह आश्चर्य है. वे आते तो भुना हुआ जौ का सत्तू खाते और सोमरस पीते. वे शोभन आदर करके फिर अपने घर चले जाते.” (१) स रोरुवद्वृषभस्तिग्मशृङ्गो वर्षन्न्तस्थौ वरिमन्ना पृथिव्याः. विश्वेष्वेवं वृजनेषु पामि यो मे कुक्षी सुतसोमः पृणाति.. (२) इंद्र ने कहा—“मैं तीखे सींगों वाले बैल के समान गर्जन करता हुआ पृथ्वी के ऊंचे और ebook converter DEMO Watermarks*
विस्तृत स्थान में रहता हूं. मैं सभी युद्धों में उस यजमान की रक्षा करता हूं जो सोमरस निचोड़कर मेरा पेट भर देता है.” (२) अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तुयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्. पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन्हूयमानः.. (३) इंद्र की पुत्रवधू ने कहा— “हे इंद्र! यजमान पत्थरों की सहायता से तुम्हारे लिए सोमरस तैयार करते हैं. तुम सोमरस पीते हो. यजमान बैल का मांस पकाते हैं और तुम उसे खाते हो. उस समय तुम यजमानों द्वारा बुलाए जाते हो.” (३) इदं सु मे जरितरा चिकिद्धि प्रतीपं शापं नद्यो वहन्ति. लोपाशः सिंहं प्रत्यञ्चमत्साः क्रोष्टा वराहं निरतक्त कक्षात्.. (४) “हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम मुझ में इतनी सामर्थ्य दे दो कि मेरी इच्छामात्र से नदियों का जल उलटा बहने लगे. मेरे द्वारा भेजा हुआ सिंह अपने पर झपटने वाले सिंह को भगा दे एवं गीदड़ वन से सूअर को भगा दे.” (४) कथा त एतदहमा चिकेतं गृत्सस्य पाकस्तवसो मनीषाम्. त्वं नो विद्वाँ ऋतुथा वि वोचो यमर्धं ते मघवन्क्षेम्या धूः.. (५) “हे इंद्र! मुझ अल्पबुद्धि में इतनी शक्ति कहां है कि तुझ प्राचीन एवं बुद्धिमान् देव की स्तुति कर सकूं. हे सर्वज्ञ एवं धनस्वामी इंद्र! तुम समयसमय पर हमें बताते हो, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति का कुछ भाग सरलता से वहन कर लेते हैं.” (५) एवा हि मां तवसं वर्धयन्ति दिवश्चिन्मे बृहत उत्तरा धूः. पुरू सहस्रा नि शिशामि साकमशत्रुं हि मा जनिता जजान.. (६) इंद्र ने कहा— “स्तोता मुझ प्राचीन इंद्र की स्तुति इन शब्दों में करते हैं कि मुझ महान् इंद्र का विस्तार द्युलोक से भी अधिक विस्तृत है. मैं एक साथ ही हजारों शत्रुओं को नष्ट कर सकता हूं. उत्पन्न करने वाले ने मुझे शत्रुरहित बनाया है.” (६) एवा हि मां तवसं जज्ञुरग्रं कर्मन्कर्मन्वृषणमिन्द्र देवाः. वधीं वृत्रं वज्रेण मन्दसानोऽप व्रजं महिना दाशुषे वम्.. (७) इंद्रपुत्र वसुक ने कहा— “हे इंद्र! देवगण मुझे तुम्हारे ही समान महान्, प्रत्येक कार्य में शूर एवं अभिलाषापूरक समझते हैं. मैंने प्रसन्नतापूर्वक वज्र के द्वारा वृत्र का वध किया था. मैंने अपनी महिमा से ही यजमान को गाय का समूह दिया था.” (७) देवास आयन्परशूँरबिभ्रन्वना वृश्चन्तो अभि विड्भिरायन्. नि सुद्र्वं१ दधतो वक्षणासु यत्रा कृपीटमनु तद्दहन्ति.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
“देवगण आते हैं और मेघ के वध के लिए वज्र को धारण करते हैं. वे मरुतों के साथ मेघों का भेदन करके वर्षा का जल बरसाते हैं. वे शोभन जल नदियों में धारण करते हैं. वे जहां भी जल देखते हैं, उसे वर्षा करने के लिए सोख लेते हैं.” (८) शशः क्षुरं प्रत्यञ्चं जगाराद्रिं लोगेन व्यभेदमारत्. बृहन्तं चिद्दहते रन्धयानि वयद्वत्सो वृषभं शूशुवानः.. (९) “मेरे द्वारा प्रेरित खरगोश अपने पर झपटने वाले सिंह आदि को पकड़ लेता है. मैं दूर से मिट्टी का ढेला फेंककर पर्वत को फोड़ देता हूं. मैं बड़े को छोटे के वश में कर देता हूं. मेरे कारण छोटा बछड़ा शक्तिशाली होकर सांड़ से लड़ने जाता है.” (९) सुपर्ण इत्था नखमा सिषायावरुद्धः परिपदं न सिंहः. निरुद्धश्चिन्महिषस्तर्ष्यावान्गोधा तस्मा अयथं कर्षदेतत्.. (१०) “पिंजरे में बंद सिंह जिस प्रकार चारों ओर पंजा मारता है, उसी प्रकार बाज का रूप धारण करके सोमलता लेने को गई गायत्री स्वर्गलोक में अपने नाखून रगड़ती है.” इंद्र बंधे हुए पैरों वाले भैंसे के समान प्यासे थे. गायत्री उनके लिए सोमलता ले आई. (१०) तेभ्यो गोधा अयथं कर्षदेतद्ये ब्रह्मणः प्रतिपीयन्त्यन्नैः. सिम उक्ष्णोऽवसृष्टाँ अदन्ति स्वयं बलानि तन्वः शृणानाः.. (११) जो मरुत् आदि देव इंद्र के सोमरस से तृप्त होते हैं, उनके लिए गायत्री बिना परिश्रम के ही सोमलता ले आती है. वे यज्ञों में इंद्र से बचे हुए सब सोमरस का भोग करते हैं एवं अपने आप शत्रुसेना का नाश करते हैं. (११) एते शमीभिः सुशमी अभूवन्ये हिन्विरे तन्व१: सोम उक्थैः. नृवद्वदन्नुप नो माहि वाजान्दिवि श्रवो दधिषे नाम वीरः.. (१२) जो लोग सोमयाग में स्तुतियों से अपने शरीर को बढ़ाते हैं. वे इंद्र की आज्ञा से सोम के आ जाने पर शोभन कर्म वाले बनें. हे इंद्र! तुम मनुष्यों के समान शब्दों को बोलते हुए हमारे लिए अन्न लाते हो. हे शूर इंद्र! तुम स्वर्ग में ‘दान स्वामी’ नाम धारण करते हो. (१२) सूक्त—२९ देवता—इंद्र वने न वा यो न्यधायि चाकञ्छुचिर्वां स्तोमो भुरणावजीगः. यस्येदिन्द्रः पुरुदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! पक्षी जिस प्रकार डर से चारों ओर देखता हुआ पेड़ पर बने घोंसले में अपने बच्चे रखता है, उसी प्रकार मैंने प्रयत्न करके यह स्तोत्र बनाया है. अनेक दिनों में इन ebook converter DEMO Watermarks*
स्तोत्रों द्वारा बुलाने पर मानवहितैषी, नेता के होता एवं श्रेष्ठ याज्ञिक इंद्र यज्ञ पूरा करते हैं एवं रात में भी सोमरस ग्रहण करते हैं. (१) प्र ते अस्या उषसः प्रापरस्या नृतौ स्याम नृतमस्य नृणाम्. अनु त्रिशोकः शतमावहन्नृन्कुत्सेन रथो यो असत्ससवान्.. (२) हे नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र! हम इस एवं अन्य प्रातःकालों में तुम्हारी स्तुति करके उत्तम बनें. तुम्हारी स्तुति करके त्रिशोक ऋषि ने सौ मनुष्यों को अनुयायी के रूप में पाया था और स्तुति के कारण ही कुत्स ऋषि तुम्हारे साथ रथ पर बैठे थे. (२) कस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद्भूरो गिरो अभ्यु१ग्रो वि धाव. कद्वाहो अर्वागुप मा मनीषा आ त्वा शक्यामुपमं राधो अन्नैः.. (३) हे इंद्र! कौन सा नशा तुम्हें सबसे अधिक प्रसन्न करता है? हे शक्तिशाली इंद्र! हमारे स्तुतिवचन सुनकर तुम यज्ञशाला के द्वार की ओर दौड़ो. तुम्हारी स्तुति के द्वारा मैं कब उत्तम वाहन प्राप्त करूंगा एवं कब अन्नों के साथ धन अपनी ओर खींच सकूंगा. (३) कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नून्कया धिया करसे कन्न आगन्. मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः.. (४) हे इंद्र! तुम कब हमारा हवि भक्षण करके एवं हमारी स्तुति सुनकर यज्ञकर्म द्वारा हमें अपने समान बनाओगे? तुम कब आओगे? हे विशाल कीर्ति वाले इंद्र! तुम सच्चे मित्र के समान अन्न द्वारा सबका भरण करते हो. तुम स्तुति करने पर सबका भरणपोषण करते हो. (४) प्रेरय सूरो अर्थं न पारं ये अस्य कामं जनिधा इव ग्मन्. गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः.. (५) हे इंद्र! पुरुष जिस प्रकार अपनी पत्नी की अभिलाषा पूर्ण करता है, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ताओं की इच्छा पूरी करो, क्योंकि तुम सूर्य के समान दाता हो. हे अनेक रूपधारी इंद्र! जो यजमान हव्य के साथ प्राचीन स्तुतियां तुम्हारे लिए बोलते हैं, उन्हें संपन्न बनाओ. (५) मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन. वराय ते घृतवन्तः सुतासः स्वाद्मन्भवन्तु पीतये मधूनि.. (६) हे इंद्र! तुम्हारे शत्रुनाशक कर्म से शीघ्र निर्मित एवं विस्तृत द्यावा-पृथिवी तुम्हारी माता के समान है. घृतयुक्त सोमरस पीकर एवं स्वादिष्ट हव्य खाकर तुम प्रसन्न बनो. (६) आ मध्वो अस्मा असिचन्नमत्रमिन्द्राय पूर्णं स हि सत्यराधाः. स वावृधे वरिमन्ना पृथिव्या अभि क्रत्वा नर्यः पौंस्यैश्च.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र सच्चे धनदाता हैं, इसलिए पात्रों को पूरा भरकर मधुर सोमरस दो. इंद्र धरती से भी अधिक विस्तृत हैं. मानव हितकारी इंद्र अपने कार्यों और पुरुषार्थ से बढ़ते हैं. (७) व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः. आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया सुमत्या चोदयासे.. (८) शोभन शक्ति वाले इंद्र ने शत्रुसेना को घेर लिया. शत्रुओं के श्रेष्ठ सैनिक इंद्र से मित्रता करने का यत्न करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस प्रकार पूर्वकाल में बुद्धिमान् आदमी के समान युद्ध के लिए रथ पर चढ़ते रहे हो, उसी प्रकार आज भी इस यज्ञ में आने के लिए आदर के साथ अपने रथ पर बैठो. (८) सूक्त—३० देवता—जल प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति. महीं मित्रस्य वरुणस्य धासिं पृथुञ्जयसे रीरधा सुवृक्तिम्.. (१) यज्ञ के समय सोमरस देवों के निमित्त उस प्रकार शीघ्र जल की ओर जावें, जिस प्रकार मन तेज चलता है. हे अध्वर्युजनो! मित्र एवं विस्तृत गति इंद्र के लिए महान् सोम को शुद्ध करो. (१) अध्वर्यवो हविष्मन्तो हि भूताच्छाप इतोषतीरुशन्तः. अव याश्चष्टे अरुणः सुपर्णस्तमास्यध्वमूर्मिमद्य सुहस्ताः.. (२) हे हव्य धारण करने वाले अध्वर्युजनो! तुम सोम से युक्त हो जाओ. सोमरस निचोड़ने की अभिलाषा करने वाले तुम सोमरस की कामना करने वाले जलों की ओर जाओ. हे सुंदर हाथों वाले अध्वर्युजनो! यह सोम लाल रंग के पक्षी की तरह नीचे गिरता है, उसे तरंग के रूप में दशापवित्र पर डालो. (२) अध्वर्यवोऽप इता समुद्रमपां नपातं हविषा यजध्वम्. स वो दददूर्मिमद्य सुपूर्तं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत.. (३) हे अध्वर्युजनो! यहां से जलपूर्ण सागर में जाओ तथा जलों के नाती अर्थात् अग्नि देव का होम करो. वे अग्नि आज तुम्हें अत्यंत शुद्ध जल की लहरें प्रदान करें तुम उनके लिए मधुर सोमरस निचोड़ो. (३) यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईळते अध्वरेषु. अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय.. (४) जो जल के नाती अग्नि देव जलों के भीतर काष्ठों के बिना भी जलते हैं एवं ब्राह्मण ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञों में जिनकी स्तुति करते हैं, वे हमें ऐसा मधुर जल दें, जिसे पीकर इंद्र वीरता के कर्म करने के लिए बढ़ें. (४) याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः. ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिश्चा ओषधीभिः पुनीतात्.. (५) हे अध्वर्युजनो! जिस प्रकार सुंदरी युवतियों से मिलकर पुरुष हर्षित और प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जिन जलों से मिलकर सोम मुदित होते हैं, उन्हीं जलों को लाने के लिए जाओ. लाए हुए जलों से सोम को धोओ और सोम के साथ-साथ दशापवित्र को शुद्ध करो. (५) एवेद्शूने युवतयो नमन्त यदीमुशनूशतीरेत्यच्छ. सं जानते मनसा सं चिकित्रेऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः.. (६) जिस प्रकार अभिलाषापूर्ण युवक, पुरुष की कामना करने वाली युवती को पाकर नम्र हो जाता है, उसी प्रकार जल सोम की ओर अनुकूल बनकर बहते हैं. अध्वर्युजनों एवं उनकी स्तुतियों से जलदेव का विशेष परिचय है. दोनों एक-दूसरे के उपकार को देखते हैं. (६) यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत्. तस्मा इन्द्राय मधुमन्तमूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः.. (७) हे जलो! जिस इंद्र ने तुम्हारे मेघ द्वारा घिरे होने पर निकलने के लिए मार्ग बनाया एवं जिसने तुम्हें मेघ की कठिन पकड़ से छुड़ाया, उसी इंद्र के लिए मधुरतापूर्ण तथा देवों को प्रमुदित करने वाली अपनी लहर भेजो. (७) प्रास्मै हिनोत मधुमन्तमूर्मिं गर्भो यो वः सिन्धवो मध्व उत्सः. घृतपृष्ठमीड्यमध्वरेष्वापो रेवतीः शृणुता हवं मे.. (८) हे बहने वाले जलो! तुम्हारे गर्भ के समान मधुर रस वाला जो झरना है, उसकी मधुर तरंग को इंद्र के लिए भेजो. हे धनयुक्त जलो! मेरी पुकार सुनो. तुम्हारी तरंग यज्ञों में घृतयुक्त एवं प्रशंसनीय है. (८) तं सिन्धवो मत्सरमिन्द्रपानमूर्मिं प्र हेत य उभे इयर्ति. मदच्युतमौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमूत्सम्.. (९) हे बहने वाले जलो! तुम्हारी जो तरंग इस लोक और परलोक—दोनों के लिए लाभ करती है, उसी मदकारिणी तरंग को इंद्र के पान के लिए भेजो. तुम्हारी तरंग नशा करने वाली, सोम के साथ मिलने की इच्छुक, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं तीनों लोकों में घूमने के लिए ऊपर जाती है. (९) आवर्वततीरध नु द्विधारा गोषुयुधो न नियवं चरन्तीः. ebook converter DEMO Watermarks*
ऋषे जनित्रीर्भुवनस्य पत्नीरपो वन्दस्व सवृधः सयोनीः.. (१०) हे अध्वर्यु! ऐसे जलों की वंदना करो, जो जल के लिए युद्ध करने वाले इंद्र की आज्ञा से अनेक धाराओं में गिरकर सोमरस में मिलना चाहते हैं, जो संसार को उत्पन्न करने वाले एवं रक्षक हैं तथा जो सोम के साथ एक ही स्थान में बढ़ते हैं. (१०) हिनोता नो अध्वरं देवयज्जा हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम्. ऋतस्य योगे वि ष्यध्वमूधः शृष्टीवरीर्भूतनास्मभ्यमापः.. (११) हे ऋत्विजो! देवपूजा के लिए हमारे यज्ञ को प्रेरित करो, धनप्राप्ति के लिए हमारे पास स्तुतियां भेजो एवं यज्ञ के अवसर पर हमारे लिए सोमरस से भरा हुआ चर्मपात्र खोलो. हे ऋत्विजों द्वारा छोड़े जाते हुए जल! तुम हमारे लिए सुखकर बनो. (११) आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च. रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद्गृणते वयो धात्.. (१२) हे धनयुक्त जल! तुम धन के निवास हो. हमारे इस कल्याणकारी यज्ञ को पूरा करके हमारे लिए अमृत लाओ. तुम हमारे धन एवं शोभन संतान के पालक बनो. सरस्वती स्तोता को धन दें. (१२) प्रति यदापो अदृशमायतीर्घृतं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि. अध्वर्युभिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः.. (१३) हे जल! मैं देखता हूं कि तुम मेरे यज्ञ की ओर आते हुए घृत, दूध एवं शहद लाते हो. अध्वर्यु हमारे साथ सच्चे मन से बात करते हैं तथा तुम भली प्रकार निचोड़ा हुआ सोम इंद्र के लिए धारण करते हो. (१३) एमा अग्मन्नेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः. नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः.. (१४) हे अध्वर्यु मित्रो! धन से युक्त व जीवों के लिए लाभकारी जल हमारे यज्ञ की ओर आ रहे हैं. तुम जल को स्थापित करो. इन जलों का वर्षा के देव अर्थात् अपांनपात् से परिचय है. सोमरस से मिलाने योग्य इस जल को कुशों पर स्थापित करो. (१४) आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरिदं न्यध्वरे असदन्देवयन्तीः. अध्वर्यवः सुनुतेन्द्राय सोममभूदु वः सुशका देवयज्या.. (१५) कामना करता हुआ जल हमारे यज्ञ की वेदी पर बिछे कुशों पर आता है एवं देवों को प्रसन्न करने की अभिलाषा से स्थित होता है. हे अध्वर्युजनो! ऐसा जानकर तुम इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. जल के आने के कारण ही इस समय तुम्हारा देवयज्ञ सरल हो सका है.
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
(१५) सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव आ नो देवानामुप वेतु शंसो विश्वेभिस्तुरैरवसे यजत्रः. तेभिर्वयं सुसखायो भवेम तरन्तो विश्वा दुरिता स्याम.. (१) हम स्तोताओं के स्तुतियोग्य एवं यज्ञपात्र इंद्र शीघ्रगामी मरुतों के साथ हमारी रक्षा के लिए आवें. हम उन देवों के शोभन सखा बनें एवं सभी पापों से पार हो जावें. (१) परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत्. उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्.. (२) मनुष्य सभी प्रकार से देवयज्ञ के लिए धन की अभिलाषा करें एवं धन पाकर हव्य द्वारा यज्ञ के मार्ग से देवों की सेवा करें. वे अपने ज्ञान से देवों का ध्यान करें एवं अति प्रशंसनीय तथा सर्वव्यापक अंतरात्मा को मन से ग्रहण करें. (२) अधायि धीतिरसमृग्रमंशास्तीर्थे न दस्ममुप यन्त्यूमाः. अभ्यानशम सुवितस्य शूंषं नवेदसो अमृतानामभूम.. (३) देवयज्ञ की क्रिया आरंभ हो गई है. जिस प्रकार तीर्थ में तर्पण वाले जल के अंश देवों के पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारे दिए हुए तृप्तिकारक हव्य दर्शनीय एवं छोटे-बड़े देवों के पास जाते हैं. हमने विस्तृत स्वर्ग का सुख पाया है और हम देवों का स्वरूप जानने वाले बनें. (३) नित्यश्चाकन्यात् स्वपतिर्दमूना यस्मा उ देवः सविता जजान. भगो वा गोभिर्यमेमनज्यात्सो अस्मै चारुश्छदयदुत स्यात्.. (४) अपनी प्रजाओं के स्वामी प्रजापति दानोत्सुक होकर फल देने की अभिलाषा करें. यज्ञकर्त्ता को सविता देव ने फल दिया है. स्तुति द्वारा प्रसन्न इंद्र एवं अर्यमा मुझे फल दें. सुंदर रूप वाले सभी देव मुझे फल दें. (४) इयं सा भूया उषासामिव क्षा यद्ध क्षुमन्तः शवसा समायन्. अस्य स्तुतिं जरितुर्भिक्षमाणा आ नः शग्मास उपयन्तु वाजाः.. (५) जिस समय स्तुति अभिलाषी देवगण शब्द करते हुए तेज चाल से मेरे पास आए, उस समय यह धरती प्रातःकाल के प्रकाश से भर गई. सुखकारक अन्न हमारे पास आवे. (५) अस्येदेषा सुमतिः पप्रथानाभवत्पूर्व्या भूमना गौः. अस्य सनीळा असुरस्य योनौ समान आ भरणे बिभ्रमाणाः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
इस समय हमारी देवस्तुति देवों के पास जाने के लिए पहले के समान विस्तृत हो रही है. मुझ शक्ति के यज्ञ में सब देव अपने अनुकूल स्थान ग्रहण करें एवं मेरे लिए उत्तम फल दें. मेरा यज्ञ सब देवों का पोषक है. (६) किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः. संतस्थाने अजरे इतऊती अहानि पूर्वीरुषसो जरन्त.. (७) वह कौन सा वन अथवा कौन सा वृक्ष है, जिससे सामग्री लेकर देवों ने द्यावा-पृथिवी को बनाया है? देवों द्वारा सुरक्षित द्यावा-पृथिवी ठीक से स्थित एवं जरारहित हैं, जबकि प्राचीन दिन एवं उषाएं जीर्ण हो गई हैं. (७) नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति. त्वचं पवित्रं कृणुत स्वधावान्यदीं सूर्य न हरितो वहन्ति.. (८) द्यावा-पृथिवी ही सबसे बढ़कर नहीं हैं. उनसे बढ़कर भी कोई है. वह प्रजाओं को बनाने वाला और द्यावा-पृथिवी का रक्षक है. उस अन्न के स्वामी ने उस समय अपने शरीर का निर्माण किया था, जिस समय सूर्य के घोड़ों ने उनका रथ खींचना भी आरंभ नहीं किया था. (८) स्तेगो न क्षामत्येति पृथ्वीं मिहं न वातो वि ह वाति भूम. मित्रो यत्र वरुणो अज्यमानोऽग्निर्वने न व्यसृष्ट शो कम्.. (९) रश्मिसमूह वाले सूर्य विस्तृत धरती का अतिक्रमण करके नहीं जाते और वायु भी समर्थ होते हुए वर्षा को छिन्न-भिन्न नहीं करते. मित्र एवं वरुण प्रकट होकर इस प्रकार प्रकाश करते हैं, जिस प्रकार अग्नि वन को प्रकाशित कर सकते हैं. (९) स्तरीर्यत्सूत सद्यो अज्यमाना व्यथिरव्यथीः कृणुत स्वगोपा. पुत्रो यत्पूर्वः पित्रोर्जनिष्ट शम्यां गौर्जगार यद्ध पृच्छान्.. (१०) बूढ़ी गाय जिस प्रकार वीर्य से सिंचित होकर शीघ्र ही बच्चा पैदा करती है, उसी प्रकार दुःख नष्ट करने वाली एवं अपनी रक्षा करने वाली अरणियां अग्नि को उत्पन्न करती हैं. अग्नि माता-पिता के समान दोनों अरणियों से प्राचीनकाल में उत्पन्न हुए थे, इसलिए उनके पुत्र हैं. शमी वृक्ष पर जन्म लेने वाली अरणिरूप गाय की खोज की जाती है. (१०) उत कण्वं नृषदः पुत्रमाहुरुत श्यावो धनमादत्त वाजी. प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधर्ऋतम्त्र नकिरस्मा अपीपेत्.. (११) वेदवाही लोग कण्व को नृषद का पुत्र कहते हैं. काले रंग वाले एवं हव्यान्न धारक कण्व ने धन प्राप्त किया. अग्नि ने कण्व के लिए अपना शोभनरूप प्रकट किया. कण्व के अतिरिक्त अग्नि के लिए वैसा यज्ञ कोई नहीं कर सकता. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—३२ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—३२ देवता—विश्वेदेव प्र सु ग्मन्ता धियसानस्य सक्षणि वरेभिर्वरॉ अभि षु प्रसीदतः. अस्माकमिन्द्र उभयं जुजोषति यत्सोम्यस्यान्धसो बुबोधति.. (१) इंद्र अपने घोड़े इंद्रागमन की चिंता करने वाले मुझ यजमान के यज्ञ में आने के लिए हांकते हैं. उत्तम मार्गों से हवि देने वाले यजमान के हव्य और स्तुतियों को लक्ष्य करके इंद्र आवें. इंद्र आकर हमारा हव्य भक्षण करें एवं स्तुतियां सुनें. इंद्र मेरे सोमरस और हव्य का स्वाद लेते हैं. (१) वीन्द्र यासि दिव्यानि रोचना वि पार्थिवानि रजसा पुरुष्टुत. ये त्वा वहन्ति मुहुरध्वराँ उप ते सु वन्वन्तु वग्वनाँ अराधसः.. (२) हे बहुतों द्वारा प्रशंसित इंद्र! तुम दिव्य प्रकाश को धरती पर फैलाते हुए जाते हो. तुम्हारे घोड़े तुम्हें बार-बार ढोकर हमारे यज्ञ की ओर लावें. वे घोड़े हम धनहीन स्तोताओं को धनसंपन्न करें. (२) तदिन्मे छन्त्सद्वपुषो वपुष्टरं पुत्रो यज्जानं पित्रोरधीयति. जाया पतिं वहति वग्नुना सुमत्पुंस इद्भद्रो वहतुः परिष्कृतः.. (३) इंद्र मुझे वही चमत्कारपूर्ण एवं धन के समान जन्म देने की कृपा करें, जिसे पाकर पुत्र पिता का धन प्राप्त करता है. यजमान की पत्नी यजमान को भले शब्दों द्वारा अपने पास बुलाती है. सोमरस उस उत्तम पुरुष के पास भली प्रकार जावे. (३) तदित्सधस्थमभि चारु दीधय गावो यच्छासन्वहतुं न धेनवः. माता यन्मन्तुर्यूथस्य पूर्व्याभि वाणस्य सप्तधातुरीज्जनः.. (४) हे इंद्र! उस स्थान को अपने तेज से प्रकाशित करो, जहां स्तुतिरूप धारिणी गाएं मिलती हैं. स्तुतियों की प्राचीन एवं पूजा योग्य माता गायत्री के सातों छंद उसी स्थान पर हैं. (४) प्र वोऽच्छा रिरिचे देवयुष्पदमेको रुद्रेभिर्याति तुर्वणिः. जरा वा येष्वमृतेषु दावने परि व ऊमेभ्यः सिञ्चता मधु.. (५) हे यजमानो! देवों की अभिलाषा करते हुए अग्नि तुम्हारे स्थान पर जाते हैं. अकेले इंद्र रुद्रों के साथ होताओं के पास से तुम्हारे यज्ञ में शीघ्र आते हैं. स्तुति भी इन मरणरहित देवों से धन दिलाने में समर्थ होती है. तुम अपने रक्षक देवों के लिए सोमरस पिलाओ. (५) निधीयमानमपगूहह्मप्सु प्र मे देवानां व्रतपा उवाच. इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
देवों में उत्तम एवं यज्ञों की रक्षा करने वाले इंद्र ने अध्वर्यु द्वारा जल में निहित अग्नि के विषय में बताया है. हे अग्नि! विद्वान् इंद्र ने तुम्हें बाद में देखा था, मैं उसी इंद्र के उपदेश के अनुसार तुम्हारे पास आया हूं. (६) अक्षेत्रवित्क्षेत्रविदं ह्यप्राट् स प्रैति क्षेत्रविदानुशिष्टः. एतद्वै भद्रमनुशासनस्योत स्रुतिं विन्दत्यञ्जसीनाम्.. (७) मार्ग न जानने वाले लोग जानने वालों से पूछते हैं. मार्ग जानने वाले के निर्देश के अनुसार वह इच्छित स्थान पर पहुंच जाता है. इसी अनुशासन के द्वारा खोजने पर जल का मार्ग प्राप्त हो सकता है. (७) अद्येदु प्राणीदममन्निमाहापीवृतो अध्यन्मातुरूथः. एमेनमाप जरिमा युवानमहेळन्वसुः सुमना बभूव.. (८) ये अग्नि आज ही अरणिमंथन से उत्पन्न हुए हैं. सोमरस निचोड़ने वाले इन्हें अन्यत्र ले जाना चाहते हैं. तेज से ढके हुए अग्नि, धरतीमाता के दूध के समान सोमरस पीते हैं. नित्य युवा अग्नि को हव्यों से मिली हुई स्तुति प्राप्त होती है. इस हेतु अग्नि क्रोधरहित, धन देने वाले एवं शोभन मनयुक्त हुए हैं. (८) एतानि भद्रा कलश क्रियाम कुरुश्रवण ददतो मघानि. दान इद्धो मघवानः सो अस्त्वयं च सोमो हृदि यं बिभर्मि.. (९) हे कलावान् एवं स्तोताओं की स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! तुम स्तोताओं को धन देते हो. हे स्तोत्ररूपी धन वाले स्तोताओ! यह इंद्र तुम्हारे प्रति दाता ही रहें. जिस सोम को मैं पेट में रखता हूं, वे भी तुम्हारे लिए दाता रहें. (९) सूक्त—३३ देवता—कुरुश्रवण प्र मा युयुज्रे प्रयुजो जनानां वहामि स्म पूषणमन्तरेण. विश्वे देवासो अध मामरक्षन्दुःशासुरागादिति घोष आसीत्.. (१) यजमानों को यज्ञकर्मों में नियुक्त करने वाले देवों ने मुझ कषव ऋषि को कुरुश्रवण के प्रति नियुक्त किया है. मैंने पूषा को मार्ग से वहन किया है. सभी देवों ने मेरी रक्षा की. चारों ओर यह हल्ला मचा हुआ था कि कठिनता से वश में आने वाला ऋषि आ गया है. (१) सं मा तपन्त्यभितः सपत्निरिव पर्शवः. नि बाधते अमतिर्नग्नता जसुर्वेर्न वेवीयते मतिः.. (२) मेरी पसलियां मुझे सौत स्त्रियों के समान बहुत दुःख दे रही हैं. बुद्धिहीनता, नग्नता और ebook converter DEMO Watermarks*
दुर्बलता मुझे पीड़ित कर रही हैं. मेरी बुद्धि उसी प्रकार कांपती है, जिस प्रकार शिकारी को देखकर पक्षी कांपते हैं. (२) मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्यः स्तोतारं ते शतक्रतो. सकृत्सु नो मघवन्निन्द्र मृळयाधा पितेव नो भव.. (३) हे इंद्र! चूहे जिस प्रकार तांत को खाते हैं, उसी प्रकार मेरी मानसिक चिंताएं मुझे खाए जा रही हैं. हे शतक्रतु इंद्र! मैं तुम्हारा स्तोता हूं. हे धनस्वामी इंद्र! एक बार मेरी रक्षा करो एवं मेरे पिता के समान बनो. (३) कुरुश्रवणमावृणि राजानं त्रासदस्यवम्. मंहिष्ठं वाघतामृषिः.. (४) मैं कवष ऋषि यजमानों को देने के लिए श्रेष्ठ धनदाता एवं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण के पास धन मांगने गया था. (४) यस्य मा हरितो रथे तिस्रो वहन्ति साधुया. स्तवै सहस्रदक्षिणे.. (५) जब मैं रथ में बैठता था, तब हरे रंग के तीन घोड़े मुझे भली प्रकार ढोते थे. यज्ञ में हजारों स्वर्ण मुद्राएं पाने वाला मैं लोगों द्वारा प्रशंसित होता था. (५) यस्य प्रस्वादसो गिर उपमश्रवसः पितुः. क्षेत्रं न रण्वमूचुषे.. (६) हे राजन्! यश की चर्चा चलने पर लोग तुम्हारे पिता का दृष्टांत देते थे. उनकी बातें मुझे इस प्रकार रुचिकर लगती थीं, जिस प्रकार सेवकों को इनाम में दिया हुआ खेत लगता है. (६) अधि पुत्रोपमश्रवो नपान्मित्रातिथेरिहि. पितुष्टे अस्मि वन्दिता.. (७) हे दृष्टांतयोग्य कीर्ति वाले मित्रातिथि के पुत्र! तुम मेरे पास आओ. मैं तुम्हारे पिता का स्तोता हूं. (७) यदीशीयामृतानामुत वा मर्त्यानाम्. जीवेदिन्मघवा मम.. (८) यदि मैं मरणरहित देवों और मरणशील मानवों का स्वामी होता तो मुझे धन देने वाले अर्थात् तुम्हारे पिता जीवित रहते. (८) न देवानामति व्रतं शतात्मा चन जीवति. तथा युजा वि वावृते.. (९) सौ आत्माओं वाला व्यक्ति भी देवों की मर्यादा लांघकर जीवित नहीं रह सकता. इसी कारण साथियों से हमारा वियोग होता है. (९) ebook converter DEMO Watermarks*