ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते. स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्.. (७) तुझ होम निष्पादक एवं सर्वज्ञ अग्नि को प्रजाएं भली-भांति प्रज्वलित करती हैं. हे बहुतों द्वारा आहूत अग्नि! तुम उत्तम ज्ञान संपन्न देवों को इस यज्ञ में शीघ्र लाओ. (७) सवितारमुषसमश्विना भगमग्निं व्युष्टिषु क्षप:. कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर.. (८) हे शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! निशा समाप्ति के पश्चात् प्रभात होने पर सविता, उषा, अश्विनीकुमार, भग आदि को यज्ञ में ले आओ. सोमरस निचोड़ने वाले मेधावी ऋत्विज् तुम्हें प्रचंड करते हैं. (८) पतिर्ह्यध्वराणामग्ने दूतो विशामसि. उषर्बुध आ वह सोमपीतये देवाँ अद्य स्वर्दृश:.. (९) हे अग्नि! तुम प्रजाओं के यज्ञपालक एवं देवताओं के दूत हो. प्रातःकाल जागकर सूर्य के दर्शन करने वाले देवों को सोमरस पीने के लिए यहां लाओ. (९) अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शत:. असि ग्रामेष्वविता पुरोहितो ऽसि यज्ञेषु मानुष:.. (१०) हे विशिष्ट प्रकाशवान् एवं धन के स्वामी अग्नि! तुम सबके दर्शनीय हो. तुम अतीतकाल में उषा के पश्चात् प्रकाशित होते रहे हो. तुम गायों के रक्षक, यज्ञ की वेदी के पूर्व दिशा वाले भाग में अब भी स्थित एवं यज्ञकर्त्ताओं के हितसाधक हो. (१०) नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम्. मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम्.. (११) हे अग्नि! तुम यज्ञ के साधन, देवताओं का आह्वान करने वाले, ऋत्विज्, उत्तम ज्ञानसंपन्न, शत्रुओं की आयु नष्ट करने वाले, देवदूत तथा मरणरहित हो. हम मनु के समान तुम्हें यज्ञ में स्थापित करते हैं. (११) यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम्. सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः.. (१२) हे मित्रपूजक अग्नि! जब तुम यज्ञवेदी के पूर्व भाग में स्थापित होकर देवयज्ञ में वर्तमान रहते हुए उनका दूतकर्म करते हो, तब तुम्हारी लपटें उसी प्रकार चमकती हैं, जिस प्रकार गरजते हुए सागर की लहरें चमकती हैं. (१२)
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः. आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्.. (१३) हे सुनने में समर्थ कानों वाले अग्नि! हमारी स्तुति सुनो. मित्र, अर्यमा तथा जो अन्य देवता प्रातःकाल देवयज्ञ में जाते हैं, अपने साथ आने वाले अन्य हव्यवाही देवों सहित तुम यज्ञ के निमित्त बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१३) शृण्वन्तु स्तोमं मरुतः सुदानवोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः. पिबतु सोमं वरुणो धृतव्रतोऽश्विभ्यामुषसा सजूः.. (१४) शोभन फलदाता, अग्नि रूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले मरुद्गण हमारा स्तोत्र सुनें. वे व्रत धारण करने वाले वरुण, अश्विनीकुमार एवं उषा के साथ सोमपान करें. (१४) सूक्त—४५ देवता—अग्नि त्वमग्ने वसूँरिह रुद्राँ आदित्याँ उत. यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्.. (१) हे अग्नि! तुम इस अनुष्ठान में वसुओं, रुद्रों और आदित्यों का यजन करो. तुम शोभन यज्ञ करने वाले, प्रजापति मनु द्वारा उत्पादित एवं जल सींचने वालों की भी अर्चना करो. (१) श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः. तान् रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह.. (२) हे अग्नि! विशेष बुद्धि वाले देवता हव्य देने वाले यजमान को फल देते हैं. हे रोहित अश्व के स्वामी एवं स्तुतिपात्र अग्नि! तुम तैंतीस देवों को यहां ले आओ. (२) प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत्. अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम्.. (३) हे अनेक कर्म करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि! प्रियमेधा, अत्रि, विरूप और अंगिरा नामक ऋषियों के समान प्रस्कण्व की पुकार भी सुनो. (३) महिकेरव ऊतये प्रियमेधा अहूषत. राजन्तमध्वराणामग्निं शुक्रेण शोचिषा.. (४) प्रौढ़कर्मा एवं प्रिय यज्ञों से सुशोभित ऋषियों ने अपनी रक्षा के लिए यज्ञ के मध्य शुद्ध प्रकाश द्वारा चमकने वाले अग्नि का आह्वान किया था. (४) घृताहवन सन्त्येमा उ षु श्रुधी गिरः. ebook converter DEMO Watermarks*
याभिः कण्वस्य सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा.. (५) हे घृत द्वारा बुलाए गए एवं फलप्रद अग्नि! कण्व के पुत्र तुम्हें जिन वचनों से अपनी रक्षा के लिए बुलाते थे, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान उन्हीं वचनों को सुनो. (५) त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः. शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (६) हे विविध हविरूप अन्नयुक्त एवं यजमानों के प्रियकारक अग्नि! तुम्हारी चमकीली लपटें तुम्हारे केश हैं. यजमान तुम्हें हव्य-वहन करने के लिए बुलाते हैं. (६) नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम्. श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु.. (७) हे अग्नि देव! बुद्धिमान् लोग आह्वान करने वाले, ऋतुओं में यज्ञ संपन्न करने वाले, विविध धन प्राप्त कराने वाले, श्रवण समर्थ कानों से युक्त एवं अत्यंत प्रसिद्ध तुमको यज्ञों में धारण करते हैं. (७) आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुतसोमा अभि प्रयः. बृहद्भा बिभ्रतो हविरग्ने मर्ताय दाशुषे.. (८) हे अग्नि! सोमरस निचोड़ने वाले बुद्धिमान् ऋत्विज् हव्यदाता यजमान के लिए तुम्हें अन्न के समीप बुलाते हैं. तुम महान् एवं तेजस्वी हो. (८) प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य. इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो.. (९) हे काष्ठबल द्वारा मथित, फलदाता एवं निवास हेतु अग्नि! इस देवयज्ञ में आज प्रातःकाल आने वाले देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों को सोमपान के लिए कुशों पर बुलाओ. (९) अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः. अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरो अह्न्यम्.. (१०) हे अग्नि! अपने सामने उपस्थित देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों के समान आह्वानाें के द्वारा यजन करो. हे शोभन दान करने वाले देवो! जो सोमरस तुम्हारे निमित्त पिछले दिन निचोड़ा गया है, सामने उपस्थित उस सोमरस का पान करो. (१०) सूक्त—४६ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः. स्तुषे वामश्विना बृहत्.. (१) यह प्रिय उषा मध्य रात्रि आदि पूर्व कालों में वर्तमान नहीं थी. यह इसी समय आकाश से आकर अंधकार मिटाती है. हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी बहुत स्तुति करता हूं. (१) या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम्. धिया देवा वसुविदा.. (२) मैं दर्शनीय एवं समुद्रपुत्र अश्विनीकुमारों की स्तुति करता हूं. वे शोभन संपत्ति देते हैं और यज्ञ करने पर हमें निवासस्थान प्रदान करते हैं. (२) वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि. यद्वां रथो विभिष्पतात्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम्हारा रथ विविध शास्त्रों द्वारा प्रशंसित स्वर्ग में घोड़ों द्वारा खींचा जाता है, उसी समय हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा. पिता कुटस्य चर्षणिः.. (४) हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! दयापूर्ण स्वभाव, पालक, यज्ञकर्म के दर्शक एवं अपने ताप से जल को सुखाने वाले सविता हमारे द्वारा हव्य से देवों को प्रसन्न करें. (४) आदारो वां मतीनां नासत्या मतवचसा. पातं सोमस्य धृष्णुया.. (५) हे स्तुति ग्रहण करने वाले नासत्यो! बुद्धिप्रेरक एवं तीव्र मदकारक सोमरस को पिओ. (५) या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासाथामिषम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हमें इस वीर्य आदि ज्योति से युक्त अन्न दो. वह अन्न दरिद्रता रूपी अंधकार को मिटाकर तृप्ति प्रदान करता है. (६) आ नो नावा मतीनां यातं पाराय गन्तवे. युञ्जाथामश्विना रथम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों रूपी सागर के पार जाने के लिए तुम नौका बनकर आओ एवं धरती पर आने के लिए अपने रथ में घोड़े जोड़ो. (७) अरित्रं वां दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूनां रथः. धिया युयुज्र इन्दवः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! सागर तट पर स्थित तुम्हारी नौका आकाश से भी विशाल है. धरती पर गमन करने के लिए तुम्हारे पास रथ है. तुम्हारे यज्ञकर्म में सोमरस भी सम्मिलित रहता है. (८) दिवस्कण्वास इन्दवो वसु सिन्धूनां पदे. स्वं वव्रिं कुह धित्सथः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे कण्वपुत्रो! अश्विनीकुमारों से यह पूछो कि आकाश से सूर्यकिरणें उत्पन्न होती हैं एवं वृष्टि के उत्पत्ति स्थल उसी आकाश से हमारे विकास का कारण उषाकालीन प्रकाश भी प्रकट होता है. हे अश्विनीकुमारो! इन दोनों स्थानों में से तुम अपना रूप कहां स्थापित करना चाहते हो? (९) अभूदु भा उ अंशवे हिरण्यं प्रति सूर्यः. व्यख्यज्जिह्वयासितः.. (१०) सूर्य के प्रकाश से उषाकाल में रश्मियां उत्पन्न हुई हैं. उदित हुआ सूर्य सोने के समान बन जाता है. आकाश में सूर्य के आ जाने के कारण अग्नि काले रंग की होकर अपनी लपटों से प्रकाशित है. (१०) अभूद् पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया. अदर्शि वि सुतिर्दिवः.. (११) रात्रि के पार उदयाचल तक जाने के लिए सूर्य का मार्ग सुंदर बना हुआ है. आकाश को प्रकाशित करने वाले सूर्य की दीप्ति दिखाई देती है. (११) तत्तदिदश्विनोरवो जरिता प्रति भूषति. मदे सोमस्य पिप्रतोः.. (१२) स्तोतागण प्रसन्नता के लिए सोमपान करने वाले अश्विनीकुमारों द्वारा की गई अपनी रक्षा की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१२) वावसाना विवस्वति सोमस्य पीत्या गिरा. मनुष्वच्छंभू आ गतम्.. (१३) हे सुखदाता अश्विनीकुमारो! तुम सोमपान और स्तुति श्रवण करने के लिए मनु के समान परिचारक यजमान के घर में निवास करो. (१३) युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत्. ऋता वनथो अक्तुभिः.. (१४) हे चारों ओर गमनशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे आगमन की शोभा का अनुसरण करती हुई उषा आवे. तुम दोनों निशा में संपादित यज्ञ का हवि ग्रहण करो. (१४) उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्. अविद्रियाभिरूतिभिः.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम अपनी प्रसिद्ध रक्षा द्वारा हमें सुखदान करो. (१५) सूक्त—४७ देवता—अश्विनीकुमार अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोम ऋतावृधा. तमश्विना पिबतं तिरोअह्नयं धत्तं रत्नानि दाशुषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! आपके सामने रखा हुआ सोमरस अत्यंत मधुर एवं कल ही निचोड़ा गया है. इसे पान करो एवं हव्यदाता यजमान को रमणीय धन दो. (१) त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना. कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिविध बंधन काष्ठों वाले, तीनों लोकों में गमनशील एवं शोभन वर्ण वाले रथ से यहां आओ तथा कण्वपुत्रों द्वारा तुम्हारे लिए किए जा रहे स्तुति पाठ को आदरपूर्वक सुनो. (२) अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा. अथाद्य दस्रा वसु बिभ्रता रथे दाश्वांसमुप गच्छतम्.. (३) हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! अत्यंत मधुर सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम रथ में धन लेकर हविदाता यजमान के समीप आओ. (३) त्रिषधस्थे बर्हिषि विश्ववेदसा मध्वा यज्ञं मिमिक्षतम्. कण्वासो वां सुतसोमा अभिद्यवो युवां हवन्ते अश्विना.. (४) हे सर्वज्ञ अश्विनीकुमारो! तीन परतों के रूप में बिछे हुए कुशों पर बैठकर मधुर रस से इस यज्ञ को सिद्ध करने की इच्छा करो. दीप्तिसंपन्न कण्व पुत्र सोमरस निचोड़कर तुम्हें बुला रहे हैं. (४) याभिः कण्वमभिष्टिभिः प्रावतं युवमश्विना. ताभिः ष्व१स्माँ अवतं शुभस्पती पातं सोममृतावृधा .. (५) हे शोभनकर्मपालक अश्विनीकुमारो! जिस अभीष्ट रक्षण क्रिया से तुम दोनों ने कण्व की रक्षा की थी, उसी के द्वारा हमारी भी रक्षा करो. हे यज्ञवर्धक देवो! सोमपान करो. (५) सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना. रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम्.. (६) हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुम जिस प्रकार दानशील सुदास के लिए रथ में धन एवं अन्न भरकर लाए थे, उसी प्रकार हमें आकाश से लाकर बहुतों द्वारा वांछनीय धन दो. (६) यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे. अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः.. (७) हे नासत्यो! चाहे तुम दूर देश में रहो, चाहे अत्यंत समीप, पर सूर्योदय होने पर अपने शोभन रथ पर बैठकर सूर्यकिरणों के साथ हमारे समीप आओ. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
अर्वाञ्चा वां सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप. इषं पृञ्चन्ता सुकृते सुदानव आ बर्हिः सीदतं नरा.. (८) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञसेवी सात घोड़े हमारे द्वारा अनुष्ठित तीनों सवनयज्ञों में तुम्हें ले जावें. हे नेताओ! सुंदर दान करने वाले एवं शोभन कर्म करने वाले यजमान को अन्न देते हुए तुम लोग कुशों पर बैठो. (८) तेन नासत्या गतं रथेन सूर्यत्वचा. येन शश्वदूहथुर्दाशुषे वसु मध्वः सोमस्य पीतये.. (९) हे नासत्यो! तुमने सूर्यकिरण तुल्य तेजस्वी जिस रथ पर धन लाकर यजमान को सदा दिया है, उसी रथ के द्वारा मधुर सोमरस पीने के लिए आओ. (९) उक्थेभिर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे. शश्वत्कण्वानां सदसि प्रिये हि कं सोमं पपथुरश्विना.. (१०) हम प्रभूत धन के स्वामी अश्विनीकुमारों को उक्थों एवं स्तोत्रों द्वारा अपने समीप बुलाते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुमने कण्वपुत्रों के प्रिय यज्ञ में सदा सोमपान किया है. (१०) सूक्त—४८ देवता—उषा सह वामेन न उषो व्युच्छा दुहितर्दिवः. सह द्युम्नेन बृहता विभावरि राया देवि दास्वती.. (१) हे स्वर्गपुत्री उषा! हमारे धन के साथ प्रभात करो. हे विभावरी! पर्याप्त अन्न के साथ प्रभात करो. हे देवि! तुम दानशील होकर पशुरूपी धन के साथ प्रभात करो. (१) अश्वावतीर्गोमतीर्विश्वसुविदो भूरि च्यवन्त वस्तवे. उदीरय प्रति मा सूनृता उषश्चोद राधो मघोनाम्.. (२) हे अनेक अश्व सहित, अनेक गायों से युक्त एवं समस्त संपत्ति देने वाली उषादेवी! प्रजा को सुख देने के लिए तुम्हारे पास अत्यंत धन है. तुम मुझ सत्य भाषण कर्त्ता को बल एवं धनवानों का धन दो. (२) उवासोषा उच्छाच्च नु देवी जीरा रथानाम्. ये अस्या आचरणेषु दध्रिरे समुद्रे न श्रवस्यवः.. (३) रथों को प्रेरणा देने वाली उषादेवी प्राचीन काल में प्रभात करती थी और अब भी प्रभात करती है. जिस प्रकार धन के इच्छुक लोग समुद्र में नाव चलाते हैं, उसी प्रकार उषा के आने पर रथ तैयार किए जाते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः. अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम्.. (४) हे उषा! तुम्हारा गमन आरंभ होते ही विद्वान् लोग धन आदि के दान में दत्तचित्त हो जाते हैं. परम मेधावी कण्व ऋषि इन दानेच्छु लोगों के नाम उषाकाल में उच्चारण करते हैं. (४) आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती. जरयन्ती वृजनं पद्बदीयत उत्पातयति पक्षिणः.. (५) उषा घर का काम करने वाली योग्य गृहिणी के समान सबका पालन करती हुई, गमनशाली प्राणियों को बूढ़ा बनाती हुई, पैरों वाले प्राणियों को चलाती हुई और उड़ाती हुई आती है. (५) वि या सृजति समनं व्य१र्थिनः पदं न वेत्योदती. वयो नकिष्टे पत्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति.. (६) तुम कर्मठ पुरुष को काम में लगाती हो और भिक्षुकों को घर छोड़ने पर विवश कर देती हो. तुम ओस बरसाने वाली हो एवं अधिक देर नहीं ठहरती हो. हे अन्नसंपन्ना उषा! तुम्हारे प्रभातकाल में पक्षीगण अपने घोंसलों में नहीं रह पाते. (६) एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि. शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान्.. (७) यह सौभाग्यशालिनी एवं रथ में घोड़े जोड़ने वाली उषा दूर सूर्य के उदय स्थान से सौ रथों द्वारा मनुष्यों के समीप आती है. (७) विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी. अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्चदप सिधः.. (८) समस्त प्राणी इस उषा के प्रकाश को नमस्कार करते हैं, क्योंकि यह सुंदर नेत्री उषा प्रकाश देती है और यही धनवती स्वर्गपुत्री द्वेषियों एवं शोषकों को दूर भगाती है. (८) उष आ भाहि भानुना चन्द्रेण दुहितर्दिवः. आवहन्ती भूर्यस्मभ्यं सौभगं व्युच्छन्ती दिविष्टिषु.. (९) हे स्वर्गपुत्री उषा! तुम सबको प्रसन्न करने वाली ज्योति के साथ प्रकाशित होती हुई हमें प्रतिदिन सौभाग्य दो एवं अंधकार को मिटाओ. (९) विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनरि. eBook converter DEMO Watermarks*
सा नो रथेन बृहता विभावरि श्रुधि चित्रामघे हवम्.. (१०) हे सुनेत्री उषा! समस्त प्राणियों की चेष्टाएं एवं जीवन तुम्हीं में वर्तमान है, क्योंकि तुम्हीं अंधकार को मिटाती हो. हे विभावरी! विशाल रथ पर चढ़कर हमारे पास आओ. हे विचित्र धनसंपन्न! हमारा आह्वान सुनो. (१०) उषो वाजं हि वंस्व यश्चित्रो मानुषे जने. तेना वह सुकृतो अध्वराँ उप ये त्वा गृणन्ति वह्नयः.. (११) हे उषा! यजमान के पास जो विचित्र अन्न है, उसे तुम स्वीकार करो. जो यज्ञकर्त्ता तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन यजमानों को हिंसारहित यज्ञ में ले आओ. (११) विश्वान्देवाँ आ वह सोमपीतयेऽन्तरिक्षादुषस्त्वम्. सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्य१मुषो वाजं सुवीर्यम्.. (१२) हे उषा! तुम सोमपान के लिए अंतरिक्ष से सभी देवों को हमारे यज्ञस्थान में ले आओ. हे उषा! तुम हमें अश्व एवं गायों से युक्त प्रशंसनीय एवं शक्तिसंपन्न अन्न दो. (१२) यस्या रुशन्तो अर्चयः प्रति भद्रा अदृक्षत. सा नो रयिं विश्ववारं सुपेशसमुषा ददातु सुग्म्यम्.. (१३) जिस उषा का प्रकाश शत्रुओं का नाश करता हुआ कल्याण रूप में दिखाई देता है, वह हमें सबके द्वारा वरण करने योग्य, सुंदर एवं सुखदायक अन्न प्रदान करे. (१३) ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेऽवसे महि. सा नः स्तोमाँ अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषा.. (१४) हे पूजनीय उषा! तुम्हें चिरंतन प्रसिद्ध ऋषियों ने रक्षण एवं अन्न के लिए बुलाया था. तुम धन एवं तेज से संपन्न होकर हमारी स्तुति को स्वीकार करो. (१४) उषो यदद्य भानुना वि द्वारावृणवो दिवः. प्र नो यच्छतादवृकं पृथुच्छर्दिः प्र देवि गोमतीरिषः.. (१५) हे उषा! तुमने आज प्रभात के समय आकाश के दोनों द्वारों को खोल दिया है, इसलिए हमें हिंसकरहित एवं विस्तृत घर के साथ-साथ गायों से युक्त धन प्रदान करो. (१५) सं नो राया बृहता विश्वपेशसा मिमिक्ष्व समिळाभिरा. सं द्युम्नेन विश्वतुरोषो महि सं वाजैर्वाजिनीवति.. (१६) हे उषा! हमें प्रभूत एवं अनेक रूप धन एवं गाएं दान करो. हे पूज्य उषा! हमें सब शत्रुओं का नाश करने वाला यश दो. हे अन्न साधन की क्रिया से संपन्न उषा! हमें धन दो. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४९ देवता—उषा
(१६) सूक्त—४९ देवता—उषा उषो भद्रेभिरा गहि दिवश्चिद्रोचनादधि. वहन्त्वरुणप्सव उप त्वा सोमिनो गृहम्.. (१) हे उषा! प्रकाशमान आकाश से सुंदर मार्ग द्वारा आओ. लाल रंग की गाय तुम्हें सोमयुक्त यजमान के यज्ञ में ले जाए. (१) सुपेशसं सुखं रथं यमध्यस्था उषस्त्वम्. तेना सुश्रवसं जनं प्रावाद्य दुहितर्दिव:.. (२) हे उषा! तुम जिस सुंदर एवं विस्तृत रथ पर बैठती हो, हे स्वर्गपुत्री! उसी रथ से आज हव्यदाता यजमान के पास आओ. (२) वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपच्चतुष्पदार्जुन. उष: प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि.. (३) हे शुभ्र वर्ण वाली उषा! तुम्हारा आगमन देखकर दो पैरों वाले मनुष्य, चार पैरों वाले पशु एवं पंखों वाले पक्षी अपने-अपने व्यापार में लग जाते हैं. (३) व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्. तां त्वामुषर्वसूयवो गीर्भि: कण्वा अहूषत.. (४) हे उषा! तुम अंधकार का नाश करती हुई अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करो. धन चाहने वाले कण्वपुत्रों ने स्तुति वचनों से तुम्हारी प्रशंसा की है. (४) सूक्त—५० देवता—सूर्य उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१) सूर्य के घोड़े सब प्राणियों को जानने वाले हैं, वे प्रकाशयुक्त सूर्य को इसलिए ऊपर ले जाते हैं कि सारा संसार उन्हें देख सके. (१) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (२) सबको प्रकाशित करने वाले सूर्य का आगमन देखकर नक्षत्र रात्रिसहित इस प्रकार भाग जाते हैं, जिस प्रकार चोर भागते हैं. (२) eBook converter DEMO Watermarks*
अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (३) सूर्य की सूचना देने वाली किरणें चमकती हुई आग के समान हैं. वे एक-एक करके संपूर्ण जगत् को देखती हैं. (३) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचनम्.. (४) हे सूर्य! तुम विशाल मार्ग पर चलने वाले समस्त प्राणियों के दर्शनीय एवं प्रकाश के कर्त्ता हो. यह संपूर्ण दृश्य जगत् तुम्हारे द्वारा प्रकाशित होकर चमकने लगता है. (४) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (५) हे सूर्य! तुम मरुद्देवों एवं मनुष्यों के सामने उदय होते हो. तुम स्वर्गलोक को देखने के लिए उदय होओ. (५) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (६) हे सूर्य! तुम सबके शोधक एवं अनिष्टनिवारक हो. तुम जिस प्रकार प्रकाश के द्वारा प्राणियों का भरणपोषण करते हुए इस जगत् को देखते हो, हम उसी प्रकाश की स्तुति करते हैं. (६) वि द्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (७) हे सूर्य! तुम उसी प्रकाश के द्वारा रात्रि के साथ-साथ दिन का भी उत्पादन करते हुए समस्त प्राणियों को देखते हुए विस्तृत रजौलोक एवं अंतरिक्ष में गमन करते हो. (७) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (८) हे सूर्य! तुम दीप्तिमान् एवं सर्वप्रकाशक हो. किरणें ही तुम्हारे केश हैं. हरित नाम के सात घोड़े तुम्हें रथ में बिठाकर ले चलते हैं. (८) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (९) सबके प्रेरक सूर्य ने रथ को खींचने वाली सात घोड़ियों को अपने रथ में जोड़ा है. रथ में जुड़ी हुई उन घोड़ियों के द्वारा ही सूर्य चलते हैं. (९) उद्वयं तमस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (१०) रात्रि के अंधकार के ऊपर उठी ज्योति को देखकर हम समस्त देवों में अधिक प्रकाशयुक्त सूर्य के समीप जाते हैं. सूर्य ही सबसे उत्तम ज्योति वाले हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम्. हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय.. (११) हे सूर्य! तुम सबके अनुकूल प्रकाश से युक्त हो. तुम आज उदय होकर एवं ऊंचे आकाश में चढ़कर मेरा हृदय-रोग एवं हरिमाण नामक शरीर रोग नष्ट करो. (११) शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि. अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि.. (१२) मैं अपने हरिमाण नामक शारीरिक रोग को तोता और मैना नामक पक्षियों पर स्थापित करता हूं. मैं अपना हरिमाण रोग को हल्दी पर स्थापित करता हूं. (१२) उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह. द्विषन्तं मह्यं रन्धयन्मो अहं द्विषते रधम्.. (१३) ये सम्मुख वर्तमान सूर्य मेरे अनिष्टकारक रोग का विनाश करने के लिए संपूर्ण तेज के साथ उदय हुए हैं. मैं अपने अनिष्टकारी रोग का विनाशकर्त्ता नहीं हूं. (१३) सूक्त—५१ देवता—इंद्र अभि त्वं मेषं पुरुहूतमूग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम्. यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषा भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत.. (१) हे स्तोताओ! यजमानों द्वारा बुलाए गए, ऋत्विजों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, धन के आवास एवं बलवान् इंद्र को अपने वचनों द्वारा प्रसन्न करो. जो इंद्र सूर्यकिरणों के समान सबका हित करते हैं, उन्हीं अतिशय प्रबुद्ध एवं मेधावी इंद्र की भोग प्राप्ति के लिए अर्चना करो. (१) अभीमवन्वन्त्स्वभिष्टिमूतयोऽन्तरिक्षप्रां तविषीभिरावृतम्. इन्द्रं दक्षाय ऋभवो मदच्युतं शतक्रतुं जवनी सूनृतारुहत्.. (२) सबका रक्षण एवं प्रवर्धन करने वाले ऋभुगण नामक मरुतों ने शोभन, आगमनशील, अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अति बली, शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले एवं शतक्रतु इंद्र के सम्मुख आकर उनकी सहायता की. (२) त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित्. ससेन चिच्छिद्रमादायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन्.. (३) हे इंद्र! तुमने अव्यक्त शब्द करने वाले एवं वर्षा के निरोधक मेघ को अपने वज्र से हटाकर अंगिरा ऋषियों के लिए जल बरसाया था. जब असुरों ने अत्रि को पीड़ा पहुंचाने के ebook converter DEMO Watermarks*
त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु.
लिए शतद्वार नामक यंत्र का प्रयोग किया था, तब तुमने उन्हें मार्ग बताया था. तुमने विमद ऋषि के लिए अन्नयुक्त धन प्रदान किया था, इसी प्रकार तुमने संग्राम में विजय प्राप्ति के लिए स्तुति करने वाले अनेक स्तोताओं को वज्र चलाकर बचाया था. (३) त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु. वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित्सूर्य दिव्यारोहयो दृशे.. (४) हे इंद्र! तुमने जल के अवरोधक मेघों को हटा दिया है एवं वृत्र आदि असुरों को पराजित करके उनका धन पर्वत पर छिपा दिया है. तुमने तीनों लोकों की हिंसा करने वाले वृत्र का वध किया एवं उसके तुरंत पश्चात् संसार को देखने के लिए सूर्य को आकाश में चढ़ा दिया था. (४) त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत. त्वं पिप्रोनृमणः प्रारुजः पुरः प्र ऋजिश्वानं दस्युहत्येष्वाविथ.. (५) हे इंद्र! जो असुर हविष्य अन्नों से सुशोभित अपने मुखों में ही यज्ञीय सामग्री डाल लेते थे, तुमने उन मायावियों को माया द्वारा पराजित किया था. हे यजमानों पर अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! तुमने पिप्रु असुर के निवासस्थान ध्वस्त कर दिए थे. तुमने हत्या करने के लिए उद्यत दस्युओं के हाथों में पड़े ऋजिश्वान् की पूर्णतया रक्षा की थी. (५) त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम्. महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे.. (६) हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर के साथ भयानक संग्राम में कुत्स ऋषि की रक्षा की थी तथा अतिथियों का स्वागत करने वाले दिवोदास को बचाने के लिए शंबर असुर का वध किया था. तुमने अर्बुद नामक महान् असुर को पैरों से कुचल डाला था. इस प्रकार तुम्हारा जन्म दस्युनाश के लिए हुआ जान पड़ता है. (६) त्वे विश्वा ताविषी सध्म्यग्घिता तव राधः सोमपीथाय हर्षते. तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या.. (७) हे इंद्र! तुम में संपूर्ण बल निहित है एवं सोमरस पीने के बाद तुम्हारा मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है. हम यह जानते हैं कि तुम्हारे दोनों हाथों में वज्र रहता है. इसलिए तुम शत्रुओं का समस्त बल छिन्न करो. (७) वि जानीह्यार्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्. शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन.. (८) हे इंद्र! पहले तुम यह बात जानो कि कौन आर्य है और कौन दस्यु? इसके पश्चात् तुम कुशयुक्त यज्ञों का विरोध करने वालों को नष्ट करके उन्हें यजमानों के वश में लाओ. तुम ebook converter DEMO Watermarks*
शक्तिशाली हो, इसलिए यज्ञ करने वालों के सहायक बनो. मैं स्तोता भी तुम्हें प्रसन्नता देने वाले यज्ञों के तुम्हारे उन समस्त कर्मों की प्रशंसा करना चाहता हूं. (८) अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूरिन्द्रः श्रथयन्नाभुवः. वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः.. (९) जो इंद्र यज्ञविरोधियों को यज्ञप्रिय यजमानों के वश में ला देते हैं तथा अपने अभिमुख स्तोताओं द्वारा स्तुतिपरांगमुखों का नाश करा देते हैं, बभ्रु ऋषि ने ऐसे बुद्धिशील एवं स्वर्गव्यापी इंद्र की स्तुति करते हुए यज्ञ में एकत्रित धन समूह ले लिया था. (९) तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः. आ त्वा वातस्य नृमणो मनोजुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः.. (१०) हे इंद्र! जब शुक्र ने अपने बल के सहयोग से तुम्हारी शक्ति को तीक्ष्ण कर दिया था, तब तुम्हारे उस विशुद्ध बल ने अपनी तीक्ष्णता द्वारा धरती और आकाश को भयभीत बना दिया था. हे यजमानों के प्रति अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! बल से पूर्ण तुम्हारी इच्छा से रथ में जोड़े गए एवं वायु के समान वेगशाली घोड़े तुम्हें यज्ञअन्न के सम्मुख ले आवें. (१०) मन्दिष्ट यदुशने काव्ये सचाँ इन्द्रो वङ्कू वङ्कुतराधि तिष्ठति. उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्धि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः.. (११) हे इंद्र! जब सुंदर शुक्राचार्य ने तुम्हारी स्तुति की थी, तब तुम वक्रगति वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोड़कर उस पर सवार थे. उग्र इंद्र ने चलने वाले बादलों से धारारूप में जल बरसाया था एवं सबको सताने वाले शुष्ण असुर के विस्तृत नगर को नष्ट कर दिया था. (११) आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे. इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि.. (१२) हे इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए रथ पर बैठकर गमन करते हो. जिस सोम से तुम प्रसन्न होते हो, वही सोम शार्यात राजर्षि ने तैयार किया है. तुम जिस प्रकार अन्य यज्ञों में निचोड़े हुए सोमरस को पीते हो, उसी प्रकार इस शार्यात के सोम की भी कामना करो. ऐसा करने से तुम स्वर्ग में स्थिर यश प्राप्त करोगे. (१२) अददा अर्भा महते वचस्यवे कक्षीवते वृचयामिन्द्र सुन्वते. मेनाभवो वृषणश्वस्य सुक्रतो विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या.. (१३) हे इंद्र! तुमने यज्ञों में सोम निचोड़ने वाले एवं तुम्हारी स्तुति करने के इच्छुक वृद्ध कक्षीवान् ऋषि को वृचया नामक युवती प्रदान की थी. हे शोभन कर्म करने वाले इंद्र! तुम वृषणाश्व राजा के घर मेना नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुए थे. सोमरस निचोड़ते समय तुम्हारी इन सब कथाओं का वर्णन होना चाहिए. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः. अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वस्यूरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता.. (१४) शोभन कर्म वाले यजमान निर्धनता से सुरक्षित होने के लिए इंद्र की सेवा करते हैं. अंगिरावंशी यज्ञों के स्तोत्र यज्ञद्वार पर गड़े लकड़ी के खंभों के समान निश्चल हैं. धन देने वाले इंद्र यजमानों के लिए अश्व, रथ एवं विविध संपत्तियों को देने की इच्छा करते हैं तथा सब प्रकार के धन देने के लिए स्थित हैं. (१४) इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि. अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम.. (१५) हे इंद्र! तुम वर्णनशील, अपने तेज के द्वारा प्रकाशित, वास्तविक बलसंपन्न एवं अत्यंत महान् हो. हमने यह स्तुति वचन तुम्हारे लिए ही प्रयोग किया है. हम इस युद्ध में समस्त वीरों सहित विजय प्राप्त करके तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुंदर घर में विद्वान् ऋत्विजों के साथ निवास करें. (१५) सूक्त—५२ देवता—इंद्र त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभ्वः साकमीरते. अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथेमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१) हे अध्वर्युगणो! उन बली इंद्र की पूजा करो, जिनकी स्तुति सौ स्तोता एक साथ मिलकर करते हैं और जो स्वर्ग प्राप्त करा देते हैं. इंद्र का रथ तेज दौड़ते हुए घोड़े के समान अत्यंत वेगपूर्वक यज्ञ की ओर चलता है. मैं अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र से अनुरोध करता हूं कि वे उसी रथ पर चढ़कर मेरी रक्षा करें. (१) स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे. इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णोसि जर्हृषाणो अन्धसा.. (२) जिस समय यज्ञीय अन्न से प्रसन्न इंद्र ने जल की वर्षा करते हुए नदी के प्रवाह को रोकने वाले वृत्र का वध किया, उस समय वह धारा रूप में बहने वाले जल के बीच पर्वत के समान अचल रहा एवं उसने मनुष्यों की हजारों प्रकार से रक्षा करके पर्याप्त शक्ति प्राप्त की. (२) स हि द्वरो द्वरिषु व्व्र ऊधनि चन्द्रबुध्नो मदवृद्धो मनीषिभिः. इन्द्रं तमहे स्वपस्यया धिया मंहिष्ठरातिं स हि पप्रिरन्धसः.. (३) मैं विद्वान् ऋत्विजों के साथ आक्रमणकारी शत्रुओं को जीतने वाले, जल के समान आकाश में व्याप्त, सबकी प्रसन्नता के कारण, सोमपान से बुद्धिप्राप्त, महान् एवं धनसंपन्न इंद्र को अपनी शोभन कार्य योग्य बुद्धि से बुलाता हूं, क्योंकि वे इंद्र अन्न को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. (३) आ यं पृणन्ति दिवि सद्मबर्हिषः समुद्रं न सुभव१ स्वा अभिष्टयः. तं वृत्रहत्ये अनु तस्थुरूूतयः शुष्मा इन्द्रमवाता अहुतप्सवः.. (४) जिस प्रकार समुद्र की ओर दौड़ती हुई इसकी आत्मीय सरिताएं उसे पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार कुशों पर रखा हुआ सोमरस स्वर्गलोक में अवस्थित इंद्र को पूर्णता प्रदान करता है. शत्रुओं का शोषण करने वाले, शत्रुरहित एवं शोभन शरीर मरुद्गण वृत्रवध के समय उन्हीं के सहायक के रूप में उनके पास खड़े थे. (४) अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रूरतयः. इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधींरिव त्रितः.. (५) जिस प्रकार स्वभाव के अनुसार जल नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र के सहायक मरुद्गण सोमपान द्वारा प्रसन्न होकर इंद्र के साथ युद्ध करते हुए वृष्टि के स्वामी वृत्र के सामने गए. जिस प्रकार त्रित नामक पुरुष ने परिधियों का भेदन किया था, उसी प्रकार इंद्र ने सोमरस से शक्तिशाली बनकर बल नामक असुर को विदीर्ण कर दिया था. (५) परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत्. वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गुभिष्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम्.. (६) हे इंद्र! वृत्र नामक असुर जल को रोककर आकाश में सोया था. आकाश में वृत्र के विस्तार की कोई सीमा नहीं थी. तुमने अपने शब्द करते हुए वज्र के द्वारा उसी वृत्र की ठोड़ी को जिस समय घायल किया था, उसी समय तुम्हारा शत्रुविजयी तेज विस्तृत हो गया एवं तुम्हारा बल सर्वत्र प्रकाशित हो गया. (६) हृदं न हि त्वा न्यृषन्त्युर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना. त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम्.. (७) हे इंद्र! जिस प्रकार जल के प्रवाह जलाशय में पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी वृद्धि करने वाले स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हो जाते हैं. त्वष्टा देव ने ही तुम्हारे योग्य तुम्हारा बल बढ़ाया है. उसी ने शत्रुओं को अभिभूत करने वाले तेज से संपन्न तुम्हारे वज्र को तीक्ष्ण बनाया है. (७) जघन्वां उ हरिभिः संभृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयन्नपः. अयच्छथा बाह्वोर्वज्रमायसमधारयो दिव्या सूर्यं दृशे.. (८) हे यज्ञकर्म संपादक इंद्र! तुमने अपने भक्तजनों के समीप आने के लिए रथ में अश्व जोड़कर वृत्र असुर का नाश किया, रुके हुए जल की वर्षा की, अपने दोनों बाहुओं में वज्र धारण किया एवं हम सबके दर्शन के निमित्त सूर्य को आकाश में स्थापित किया. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहत्स्वश्चन्द्रमवद्यदुक्थ्य१मकृण्वत भियसा रोहणं दिवः. यन्मानुषप्रधना इन्द्रमूतयः स्वर्णृषाचो मरुतोऽमदन्ननु.. (९) वृत्र असुर के भय से स्तोताओं ने बृहत्, प्रसन्नताकारक तेज से युक्त, बलसंपन्न एवं स्वर्ग के सोपानभूत स्तोत्रों का गान किया था. उस समय स्वर्गलोक की रक्षा करने वाले मरुद्गणों ने मनुष्यों की रक्षा के लिए वृत्र से युद्ध करके एवं स्तोताओं का पालन करके इंद्र को वृत्र वध के लिए उत्साहित किया. (९) द्यौश्चिदस्यामवाँ अहेः स्वनादयोयवीद्भियसा वज्र इन्द्र ते. वृत्रस्य यद्बद्धधानस्य रोदसी मदे सुतस्य शवसाभिनच्छिरः.. (१०) हे इंद्र! जब निचोड़े हुए सोमरस को पीकर तुम अत्यंत हर्षित हो रहे थे, तब तुम्हारे वज्र ने धरती और आकाश में बाधक बनने वाले वृत्र का सिर वेग से काट दिया था. उस समय बलवान् आकाश भी वृत्र के शब्द भय से कांपने लगा था. (१०) यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः. अत्राह ते मघवन्विश्रुतं सहो द्यामनु शवसा बर्हणा भुवत्.. (११) हे इंद्र! यदि पृथ्वी अपने वर्तमान आकार से दस गुनी बड़ी होती और उस पर रहने वाले मनुष्य सदा जीवित रहते, तब भी तुम्हारी वृत्रवधकारिणी शक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध होती. तुम्हारे द्वारा वृत्र का वध आकाश के समान विशाल कार्य है. (११) त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः स्वभूत्योजा अवसे धृषन्मनः. चकृषे भूमिं प्रतिमानमोजसोऽपः स्वः परिभूरेष्या दिवम्.. (१२) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुमने इस व्यापक आकाश के ऊपर रहते हुए अपनी शक्ति से हमारी रक्षा करने के निमित्त भूलोक का निर्माण किया है. तुम बल की अंतिम सीमा हो. तुमने सुखपूर्वक गमन करने योग्य आकाश एवं स्वर्ग को व्याप्त कर लिया है. (१२) त्वं भुवः प्रतिमानं पृथिव्या ऋष्ववीरस्य बृहतः पतिर्भूः. विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान्.. (१३) हे इंद्र! जिस प्रकार भूलोक का विस्तार अचिंत्य है, उसी प्रकार तुम्हारी भी महत्ता जानी नहीं जा सकती. तुम दर्शनीय देवों वाले स्वर्ग के पालनकर्ता हो. यह सत्य है कि तुमने अपनी महत्ता से धरती और आकाश के मध्यभाग को पूरित कर दिया है, इसलिए तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है. (१३) न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः. नोत स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानुषक्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस इंद्र के विस्तार को आकाश और पृथ्वी नहीं पा सके हैं, आकाश के ऊपर होने वाला जलप्रवाह जिस इंद्र के तेज का अंत नहीं जान सका, हे इंद्र! समस्त प्राणी समुदाय उसी तरह तुम्हारे अपने वश में है. (१४) आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा. वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ.. (१५) हे इंद्र! इस युद्ध में मरुद्गणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५) सूक्त—५३ देवता—इंद्र न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः. नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१) हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती. (१) दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः. शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिद्रं गृणीमसि.. (२) हे इंद्र! तुम अश्व, गो एवं जौ आदि धान्य के देने वाले हो. तुम निवास हेतु धन के स्वामी एवं सबके पालक हो. तुम दान के नेता एवं प्राचीन देव हो. तुम हवि देने वाले यजमानों की इच्छाओं को अभिमत फल देकर पूरा करते हो तथा उनके लिए मित्र के समान अत्यंत प्रिय हो. हम इस प्रकार के इंद्र के लिए स्तुति वचनों का प्रयोग करते हैं. (२) शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु. अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३) हे इंद्र! तुम प्रज्ञावान् वृत्रवधादि अनेक कर्मों के कर्त्ता एवं अतिशय तेजस्वी हो. हम यह जानते हैं कि सर्वत्र वर्तमान धन तुम्हारा है. हे शत्रुनाशक इंद्र! इसलिए हमें धन दो. जो स्तोता तुम्हें चाहते हैं, उनकी अभिलाषा को अपूर्ण मत रहने दो. (३) एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना. इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए पुरोडाशादि हव्य एवं सोमरस से प्रसन्न होकर हमें गायों और घोड़ों के साथ-साथ धन भी दो. इस प्रकार हमारी दरिद्रता मिटाकर तुम शोभन मन बन जाओ. इंद्र इस सोमरस के कारण संतुष्ट होकर हमारी सहायता करेंगे तो हम दस्युओं का नाश करके एवं शत्रुओं से छुटकारा पाकर इंद्र के द्वारा दिए हुए अन्न का उपभोग करेंगे. (४) समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः. सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि.. (५) हे इंद्र! हम धन और अन्न के साथ-साथ ऐसा बल भी प्राप्त करें, जो बहुतों का आह्लादक एवं दीप्तिमान् हो. शत्रुविनाश में समर्थ तुम्हारी उत्तम बुद्धि हमारी सहायता करे. तुम्हारी बुद्धि स्तोताओं को गाय आदि प्रमुख पशु एवं अश्व प्रदान करे. (५) ते त्वा मदा अमदन्तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते. यत्कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६) हे सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर का वध किया, उस समय तुम्हारे मादक मरुद्गण ने तुम्हें प्रमुदित किया था. तुम वर्षा करने में समर्थ हो. जब तुमने शत्रुओं की बाधा को पार करके स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता यजमान के दस हजार उपद्रवों को समाप्त किया था, उस समय चरुपुरोडाशादि हव्य एवं प्रसिद्ध सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. (६) युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा. नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७) हे शत्रुध्वंसक इंद्र! तुम सदा युद्धशील रहते हो एवं अपने बल से शत्रुओं के एक नगर के बाद दूसरे का विनाश करते हो. हे इंद्र! तुमने वज्र की सहायता से दूर देश में वर्तमान, प्रसिद्ध, मायावी नमुचि नामक असुर का वध किया था. (७) त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठ यातिथिग्वस्य वर्तनी. त्वं शता वङ्गदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८) हे इंद्र! तुमने अतिथिग्व नामक राजा की सहायता करने के लिए तेज एवं शत्रुनाशक आयुध से करंज एवं पर्णय नामक असुरों का वध किया था. ऋजिश्वान् नामक राजा ने वंगृद असुर के सौ नगरों को चारों ओर से घेर लिया था. तुमने अकेले ही उन नगरों का विनाश कर दिया था. (८) त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः. षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९) असहाय सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए साठ हजार निन्यानवे ebook converter DEMO Watermarks*
सहायकों के सहित बीस जनपद शासक आए थे. हे प्रसिद्ध इंद्र! तुमने शत्रुओं द्वारा अलंघ्य चक्र से उन अनेक को पराजित किया था. (९) त्वमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्. त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०) हे इंद्र! तुमने पालकशक्ति द्वारा सुश्रवा एवं सूर्यवान् नामक राजाओं की रक्षा की थी. तुमने कुत्स, अतिथिग्व एवं आयु नामक राजाओं को महान् एवं तरुण राजा सुश्रवा के अधीन किया था. (१०) य उद्दीचन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम. त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११) हे इंद्र! यज्ञ की समाप्ति पर उपस्थित देवों द्वारा पालित तुम्हारे मित्र तुल्य प्रिय एवं अतिशय कल्याणपात्र हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हम तुम्हारी दया से शोभन पुत्रों एवं उत्तम दीर्घ जीवन को प्राप्त करें. (११) सूक्त—५४ देवता—इंद्र