ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे इंद्र और अग्नि! सर्वव्यापक एवं अपने गौरव से गंभीरतायुक्त जो समस्त संसार का परिमाण है, वही सोम तुम दोनों के पीने के लिए एवं मन संतोष के लिए पर्याप्त हो. (२) चक्राथे हि सध्यङ्नाम भद्रं सध्रीचीना वृत्रहणा उत स्थः. ताविन्द्राग्नी सध्र्यञ्चा निषद्या वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्.. (३) हे इंद्र और अग्नि! तुम दोनों ने अपने कल्याणकारक दोनों नामों को संयुक्त कर लिया है. हे वृत्रहंताओ! तुम वृत्रवध में एक साथ थे. हे कामवर्षियो! तुम साथ-साथ बैठकर ही सोम को अपने उदर में स्थान दो. (३) समिद्धेष्वग्निष्वानाना यतस्रुचा बर्हिरु तिस्तिराणा. तीव्रैः सोमैः परिषिकेभिरर्वागेन्द्राग्नी सौमनसाय यातम्.. (४) अग्नि के भली-भांति दीप्त होने पर दो अध्वर्युओं ने घी से भरा पात्र लेकर सींचते हुए कुश फैलाए हैं. हे इंद्र और अग्नि! तीव्र मद करने वाले एवं चारों ओर पात्रों में भरे हुए सोम के कारण हमारे सम्मुख आओ एवं हम पर कृपा करो. (४) यानीन्द्राग्नी चक्रथुर्वीर्याणि यानि रूपाण्युत वृष्ण्यानि. या वां प्रत्नानि सख्या शिवानि तेभिः सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (५) हे इंद्र और अग्नि! तुमने जो वीरता के काम किए हैं, जिन दिखाई देने वाले जीवों की सृष्टि एवं वर्षा आदि कर्म किए हैं तथा तुम दोनों की प्राचीन कल्याणकारी मित्रता है, उन सबके सहित आकर निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (५) यदब्रवं प्रथमं वां वृणानो ऽयं सोमो असुरैर्नो विहव्यः. तां सत्यां श्रद्धामभ्या हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (६) हे इंद्र और अग्नि! मैंने यज्ञकर्म के प्रारंभ में ही जो कहा था कि तुम दोनों का वरण करके तुम्हें सोम से प्रसन्न करूंगा, मेरी वही सच्ची श्रद्धा विचारकर आओ और निचोड़े हुए सोम को पिओ. यह सोम ऋत्विजों द्वारा विशेष आहुति देने योग्य है. (६) यदिन्द्राग्नी मदथः स्वे दुरोणे यद् ब्रह्मणि राजनि वा यजत्रा. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (७) हे यज्ञपात्र एवं अभीष्टदाता इंद्र और अग्नि! चाहे तुम अपने निवास में आनंद से बैठे हो, चाहे किसी ब्राह्मण या राजा के यज्ञ में पहुंचकर प्रसन्न हो रहे हो, इन समस्त स्थानों से आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (७) यदिन्द्राग्नी यदुषु तुर्वशेषु यद् द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु स्थः. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु एवं पुरु जन समूह के बीच स्थित हो, तब भी इन समस्त स्थानों से आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (८) यदिन्द्राग्नी अवमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यां परमस्यामुत स्थः. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (९) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम निचली धरती अथवा मध्यस्थ आकाश में स्थित हो, तब भी वहां से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (९) यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यामवमस्यामुत स्थः. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (१०) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम आकाश के परवर्ती, मध्यवर्ती या निम्नवर्ती धरातल में वर्तमान हो, तब भी इन स्थानों से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (१०) यदिन्द्राग्नी दिवि ष्ठो यत्पृथिव्यां यत्पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (११) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! तुम चाहे आकाश, पृथ्वी, पर्वतों, ओषधियों अथवा जल में स्थित हो, तब भी इन स्थानों से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (११) यदिन्द्राग्नी उदिता सूर्यस्य मध्ये दिवः स्वधया मादयेथे. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (१२) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम उदित सूर्य के कारण प्रकाशित आकाश में अपने ही तेज से प्रसन्न हो रहे हो, तब भी वहां से आओ और निचोड़ा हुआ सोम पिओ. (१२) एवेन्द्राग्नी पपिवांसा सुतस्य विश्वास्मभ्यं सं जयतं धनानि. तन्नो मित्रा वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः... (१३) हे इंद्र और अग्नि! निचोड़े हुए सोमरस को इस प्रकार पीकर हमारे लिए सभी संपत्तियां दो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश हमारे इस धन का आदर करें. (१३) सूक्त—१०९ देवता—इंद्र और अग्नि वि ह्यख्यं मनसा वस्य इच्छन्निन्द्राग्नी ज्ञास उत वा सजातान्. नान्या युवत्प्रमतिरस्ति मह्यं स वां धियं वाजयन्तीमतक्षम्.. (१) हे इंद्र और अग्नि! धन की कामना करता हुआ मैं तुम्हें जाति या बंधु के समान समझता हूं. मेरी उत्तम बुद्धि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य की दी हुई नहीं है. उसी बुद्धि से मैंने तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*
अन्नेच्छापूर्ण एवं ध्यानयुक्त स्तुति की है. (१) अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वां विजामातुरुत वा घा स्यालात्. अथा सोमस्य प्रयती युवभ्यामिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम्.. (२) हे इंद्र और अग्नि! गुणहीन जामाता कन्यालाभ के लिए अथवा गुणहीन कन्या का भाई उत्तम वर लाभ के लिए जितना धन देते हैं, तुम उससे भी अधिक देने वाले हो, यह मैंने सुना है. इसलिए तुमको निचोड़े हुए सोम देने के साथ ही यह अतिशय नवीन स्तुति भी निर्मित करता हूं. (२) मा च्छेद्म रश्मीँरिति नाथमाना: पितॄणां शक्तीरनुयच्छमाना:. इन्द्राग्निभ्यां कं वृषणो मदन्ति ता ह्यद्री धिषणाया उपस्थे.. (३) रस्सी के समान लंबी पुत्र-पौत्र परंपरा को हम कभी छिन्न न करें, ऐसी प्रार्थना करते हुए एवं पितरों को शक्ति देने वाले पुत्र-पौत्रादि को उत्पन्न करते हुए हम यजमान इंद्र एवं अग्नि की सुखपूर्वक स्तुति करते हैं. शत्रुओं का नाश करते हुए इंद्र और अग्नि इस स्तुति के समीप रहें. (३) युवाभ्यां देवी धिषणा मदायेन्द्राग्नी सोममुशती सुनोति. तावश्विना भद्रहस्ता सुपाणी आ धावतं मधुना पृङ्क्तमप्सु.. (४) हे इंद्र और अग्नि! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए हम तेजस्वी एवं तुम्हारी कामना से पूर्ण प्रार्थना करते हुए सोमरस निचोड़ते हैं. हे अश्वसंपन्न शोभनबाहुयुक्त एवं सुंदर हथेलियों वाले इंद्र और अग्नि! शीघ्र आओ एवं जल में वर्तमान माधुर्य से हमारे सोम को संपन्न करो. (४) युवामिन्द्राग्नी वसुनो विभागे तवस्तमा शुश्रव वृत्रहत्ये. तावासद्या बर्हिषि यज्ञे अस्मिन्प्र चर्षणी मादयेथां सुतस्य.. (५) हे इंद्र और अग्नि! हमने सुना है कि स्तोताओं को धन बांटने के अभिप्राय से तुमने वृत्रवध में अतिशय बल का प्रदर्शन किया था. हे सबको देखने वाले! तुम हमारे यज्ञ में कुशों पर बैठकर एवं निचोड़े हुए सोम को पीकर प्रसन्न बनो. (५) प्र चर्षणिभ्यः पृतनाहवेषु प्र पृथिव्या रिरीचाथे दिवश्च. प्र सिन्धुभ्यः प्र गिरिभ्यो महित्वा प्रेन्द्राग्नी विश्वा भुवनात्यन्या.. (६) हे इंद्र और अग्नि! संग्रामों में रक्षा के उद्देश्य से बुलाए जाने पर तुम सभी मनुष्यों की अपेक्षा महान् बनते हो. तुम धरती, आकाश, नदी एवं पर्वतों की अपेक्षा महान् बनते हो. तुम समस्त विश्व की अपेक्षा महान् हो. (६) आ भरतं शिक्षतं वज्रबाहू अस्माँ इन्द्राग्नी अवतं शचीभिः. ebook converter DEMO Watermarks*
इमे नु ते रश्मयः सूर्यस्य येभिः सपित्वं पितरो न आसन्.. (७) हे वज्रबाहु इंद्र एवं अग्नि! धन लाओ, हमें दो एवं अपने कार्यों के द्वारा हमारी रक्षा करो. सूर्य की जिन रश्मियों द्वारा हमारे पूर्व पुरुष ब्रह्मलोक को गए थे, वे ये ही हैं. (७) पुरंदरा शिक्षतं वज्रहस्तास्माँ इन्द्राग्नी अवतं भरेषु. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (८) हे वज्रहस्त एवं असुरनाशक इंद्र और अग्नि! हमें धन दो एवं युद्धों में हमारी रक्षा करो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना की पूजा करें. (८) सूक्त—११० देवता—ऋभुगण ततं मे अपस्तदु तायते पुनः स्वादिष्ठा धीतिरुचथाय शस्यते. अयं समुद्र इह विश्वदेव्यः स्वाहाकृतस्य समु तृप्णुत ऋभवः.. (१) हे ऋभुओ! मैंने बार-बार अग्निष्टोम आदि का पहले अनुष्ठान किया है एवं इस समय पुनः कर रहा हूं. उस में तुम्हारी प्रशंसा के लिए अतिशय प्रसन्नताकारक स्तोत्र पढ़ा जा रहा है. इस यज्ञ में सभी देवों के लिए पर्याप्त सोमरस संपादित है. तुम स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में डाले गए सोम को पीकर तृप्त बनो. (१) आभोगयं प्र यदिच्छन्त ऐतनापाकाः प्राञ्चो मम के चिदापयः. सौधन्वनासश्चरितस्य भूमनागच्छत सवितुर्दाशुषो गृहम्.. (२) हे ऋभुओ! तुम प्राचीन काल में अपरिपक्व ज्ञान वाले एवं मेरे जातीय बंधु थे. उस समय तुमने उपभोग के योग्य सोमरस की इच्छा की थी. हे सुधन्वा के पुत्रो! उस समय तुमने अपने तप से उपार्जित महत्त्व द्वारा ऐसे सविता के घर गमन किया था, जिसे सोमपान दिया जा चुका था. (२) तत्सविता वोऽमृतत्वमासुवदगोह्यं यच्छ्रवयन्त ऐतन. त्यं चिच्चमसमसुरस्य भक्षणमेकं सन्तमकृणुता चतुर्वयम्.. (३) हे ऋभुओ! उस समय सविता ने तुम्हारे अभिमुख होकर अमरता दी थी, जिस समय तुम सबके द्वारा दृश्यमान सविता को अपनी सोमपान की इच्छा बताते हुए आए थे एवं त्वष्टा के सोमपान के साधन के चार टुकड़े कर दिए थे. (३) विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाघतो मर्तासः सन्तो अमृतत्वमानशुः. सौधन्वना ऋभवः सूरचक्षसः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः.. (४) ऋत्विजों के साथ मिले हुए ऋभुओं ने शीघ्र ही यज्ञ, दान आदि कर्म करके मरणधर्मा ebook converter DEMO Watermarks*
होते हुए भी अमरता प्राप्त की थी. उस समय सुधन्वा के पुत्र एवं सूर्य के समान तेजस्वी ऋभुओं ने संवत्सर पर्यन्त चलने वाले यज्ञों में अधिकार प्राप्त किया था. (४) क्षेत्रमिव वि ममुस्तेजनेनँ एकं पात्रमृभवो जेहमानम्. उपस्तुता उपमं नाधमाना अमर्त्येषु श्रव इच्छमाना:.. (५) जिस प्रकार नापने का बांस लेकर खेत नापा जाता है, उसी प्रकार समीपस्थ ऋषियों द्वारा स्तुत ऋभुओं ने प्रशंसनीय सोम की याचना करके एवं मरणरहित देवों के बीच में हव्य की इच्छा करके तीक्ष्ण अस्त्र द्वारा चमस नाम के यज्ञपात्र को चार भागों में बांटा था. (५) आ मनीषामन्तरिक्षस्य नृभ्यः सुचेव घृतं जुहवाम विद्मना. तरणित्वा ये पितुरस्य संश्चिर ऋभवो वाजमरुहन्दिवो रजः.. (६) हम अंतरिक्ष संबंधी यज्ञ को नेता ऋभुओं को सुच नामक पात्र के समान घी से भरा हुआ हव्य देने के साथ ही ज्ञान भरी स्तुति करते हैं. उन्होंने जगत्पालक सूर्य के समान संसार को पार करने की कुशलता एवं स्वर्गलोक का अन्न प्राप्त किया था. (६) ऋभुर्न इन्द्रः शवसा नवीयान्भुर्वाजेभिर्वसुभिर्वसुर्ददिः. युष्माकं देवा अवसाहनि प्रियेऽभि तिष्ठेम पृत्युतीरसुन्वताम्.. (७) बल के कारण अतिप्रसिद्ध ऋभुगण हमारे ईश्वर हैं. हमें अन्न एवं धन के देने वाले ऋभु निवास के कारण हैं, इसलिए वे हमें वरदान दें. हे देवो! हम तुम्हारी रक्षा के कारण अनुकूल दिन में सोमाभिषवरहित शत्रुओं को हरा दें. (७) निश्शर्मण ऋभवो गामपिंशत सं वत्सेनासृजता मातरं पुनः. सौधन्वनासः स्वपस्यया नरो जिब्री युवाना पितराकृणोतन.. (८) हे ऋभुओं! तुमने चमड़े के द्वारा गाय को आच्छादित करके पुनः उसके बछड़े से मिला दिया था. हे सुधन्वा के पुत्रों एवं यज्ञ के नेताओ! तुमने शोभन कर्म की इच्छा से अपने वृद्ध माता-पिता को पुनः युवा बना दिया है. (८) वाजेभिर्नो वाजसातावनिङ्घ्यूभुमाँ इन्द्र चित्रमा दर्षि राधः. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (९) हे इंद्र! ऋभुओं का सहयोग पाकर हमें यज्ञ के निमित्त भूत अन्न एवं धन दो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश हमारे उस धन एवं अन्न की पूजा करें. (९) सूक्त—१११ देवता—ऋभुगण तक्षन्नथं सुवृतं विद्मनापसस्तक्षन्हरी इन्द्रवाहा वृषण्वसू. ebook converter DEMO Watermarks*
तक्षन्पितृभ्यामृभवो युवद्वयस्तक्षन्वत्साय मातरं सचाभुवम्.. (१) उत्तम ज्ञानपूर्वक कर्म करने वाले ऋभुओं ने अश्विनीकुमारों के निमित्त सुंदर पहियों वाला रथ तथा इंद्र के वाहन रूप हरि नाम के दोनों घोड़ों को बनाया. उत्तम धन से युक्त ऋभुओं ने अपने माता-पिता को यौवन एवं बछड़े को सहचरी माता प्रदान की थी. (१) आ नो यज्ञाय तक्षत ऋभुमद्वयः क्रत्वे दक्षाय सुप्रजावतीमिषम्. यथा क्षयाम सर्ववीरया विशा तन्नः शर्धाय धासथा स्विन्द्रियम्.. (२) हे ऋभुआे! हमारे यज्ञ के लिए उज्ज्वल अन्न पैदा करो. हमारे यज्ञकर्म एवं बल के निमित्त शोभन पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन दो, जिससे हम अपनी वीर संतान के साथ सुखपूर्वक निवास करें. हमें बल के लिए अन्न दो. (२) आ तक्षत सातिमस्मभ्यमृभवः सातिं रथाय सातिमर्वते नरः. सातिं नो जैत्रीं सं महेत विश्वहा जामिमजामिं पृतनासु सक्षणिम्.. (३) हे यज्ञ के नेता ऋभुआे! हमारे लिए उपभोग योग्य अन्न दो. हमारे रथ के लिए धन एवं अश्व के उपभोग के लिए अन्न दो. सारा संसार हमारे जयशील अन्न की सदा पूजा करे एवं हम युद्ध में उपस्थित या अनुपस्थित शत्रु का नाश करें. (३) ऋभुक्षणमिन्द्रमा हुव ऊतय ऋभून्वाजान्मरुतः सोमपीतये. उभा मित्रावरुणा नूनमश्विना ते नो हिन्वन्तु सातये धिये जिषे.. (४) हम अपनी रक्षा के उद्देश्य से महान् इंद्र, ऋभुओं एवं मरुतों को सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं. वे हमें धन, यज्ञकर्म और विजय के लिए प्रेरित करें. (४) ऋभुर्भराय सं शिशांतु सातिं समर्यह्विद्वाजो अस्माँ अविष्ठु. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५) ऋभु हमें संग्राम के निमित्त धन दें. संग्राम में विजयी बाज हमारी रक्षा करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश हमारी प्रार्थना का आदर करें. (५) सूक्त—११२ देवता—अश्विनीकुमार ईळे द्यावापृथिवी पूर्वचित्तयेऽग्निं घर्मं सुरुचं यामन्निष्टये. याभिर्भरै कारमंशाय जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१) मैं अश्विनीकुमारों को विज्ञापित करने के लिए पहले द्यावा और पृथ्वी की स्तुति करता हूं. अश्विनीकुमारों के यज्ञ में आ जाने पर स्थापित, दीप्त एवं शोभनकांतियुक्त अग्नि की स्तुति करता हूं. हे अश्विनीकुमारो! संग्राम में अपना विजय भाग पाने के निमित्त जिन रक्षा ebook converter DEMO Watermarks*
संबंधी उपायों के साथ आकर शंख बजाते हो, उन्हीं उपायों के साथ हमारे समीप भी आओ. (१) युवोर्दानाय सुभरा असश्चतो रथमा तस्थुर्वचसं न मन्तवे. याभिर्धियोऽवथः कर्मन्निष्टये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! अन्य देवों में आसक्तिरहित, शोभन स्तोत्र धारण करने वाले स्तोता धनलाभ के लिए तुम्हारे रथ के समीप उसी प्रकार पहुंचते हैं, जिस प्रकार न्यायपूर्ण वचन जानने वाले पंडित के पास लोग अपना फैसला कराने जाते हैं. तुम जिन उपायों से यज्ञ में लगे विशिष्ट ज्ञानियों की रक्षा करते हो, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२) युवं तासां दिव्यस्य प्रशासने विशां क्षयथो अमृतस्य मज्मना. याभिर्धेनुमस्वं१ पिन्वथो नरा ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (३) हे नेता रूपी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों स्वर्ग में उत्पन्न सोम रूपी अमृतपान से प्राप्त बल के कारण तीनों लोकों में वर्तमान प्रजाओं का शासन करने में समर्थ हो. रक्षा के जिन उपायों से तुमने प्रसव में असमर्थ गायों को शंयु नामक ऋषि के लिए दुधारू बना दिया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (३) याभिः परिज्मा तनयस्य मज्मना द्विमाता तूर्षु तरणिर्विभूषति. याभिस्त्रिमन्तुरभवद्विचक्षणस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! चारों ओर गमनशील वायु अपने पुत्र एवं माताओं से उत्पन्न अग्नि के बल से युक्त होकर तथा पालनोपायों द्वारा धावनशीलों में अति शीघ्रगामी बनकर सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. जिन उपायों द्वारा कक्षीवान् ऋषि विशिष्ट ज्ञानयुक्त हुए थे, उन्हीं उपायों द्वारा आओ. (४) याभी रेभं निवृतं सितमद्भ्य उद्वन्दनमैरयतं स्वर्दृशे. याभिः कण्वं प्र सिषासन्तमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षोपायों से असुरों द्वारा कुएं में फेंके गए एवं पाशबद्ध किए गए रेभ ऋषि को जल से बाहर निकाला था, इसी प्रकार वंदन नामक ऋषि को सूर्य दर्शन के लिए जल से निकाला था, असुरों द्वारा अंधकार में डाले गए एवं प्रकाश की इच्छा वाले कण्व ऋषि को जिन उपायों से बचाया था, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (५) याभिरन्तकं जसमानमारणे भुज्युं याभिर्व्यथिभिर्जिविन्विशुः. याभिः कर्कन्धुं वय्यं च जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षा संबंधी उपायों से असुरों द्वारा कुएं में गिराकर मारे जाते हुए राजर्षि अंतक की रक्षा की, समुद्र में डूबते हुए भुज्यु की रक्षा जिन व्यथारहित ebook converter DEMO Watermarks*
उपायों द्वारा की तथा जिन उपायों से कर्कन्धु एवं वय्य को बचाया था, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (६) याभिः शुचन्तिं धनसां सुषंसदं तप्तं घर्मोम्यावन्तमत्रये. याभिः पृश्निगुं पूरुकुत्समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शुचंति को धनसंपन्न एवं शोभनगृह का स्वामी बनाया, अत्रि को जलाने वाली तप्त अग्नि को सुखदायक बनाया एवं पृश्निगु तथा पुरुकुत्स की रक्षा की, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (७) याभिः शचीभिर्वृषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः. याभिर्वर्तिकां ग्रसितामुञ्चतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (८) हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने जिन कर्मों द्वारा पंगु परावृज को चलने में समर्थ, अंधे ऋजाश्व को देखने में कुशल, जानुरहित श्रोण को गतिशील एवं वृक द्वारा गृहीत पक्षिणी वर्तिका को मुक्त किया था, उन्हीं उपायों से आओ. (८) याभिः सिन्धु मधुमन्तमसश्चतं वसिष्ठं याभिरजरावजिन्वतम्. याभिः कुत्सं श्रुतर्यं नर्यमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (९) हे जरारहित अश्विनीकुमारो! जिन उपायों से सिंधु नदी को मधुर प्रवाह वाली, वशिष्ठ को प्रसन्न एवं कुत्स, श्रुतर्य तथा नर्य ऋषियों को सुरक्षित किया था, उन्ही उपायों सहित हमारे पास आओ. (९) याभिर्विश्पलां धनसामथर्व्यं सहस्रमीळह आजावजिन्वतम्. याभिर्वशमश्व्यं प्रेणिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! जिन उपायों से तुमने धन की स्वामिनी एवं चलने में असमर्थ विप्रश्चला को हजारों संपत्तियों से पूर्ण एवं संग्राम में जाने योग्य बनाया तथा अश्व ऋषि के स्तुतिकर्त्ता पुत्र वश ऋषि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (१०) याभिः सुदानू औशिजाय वणिजे दीर्घश्रवसे मधु कोशो अक्षरत्. कक्षीवन्तं स्तोतारं याभिरावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (११) हे सुंदर दान वाले अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से उशिजा के पुत्र एवं वाणिज्य कर्म करने वाले दीर्घश्रवा के निमित्त मेघ से जल बरसाया एवं स्तुतिकर्त्ता कक्षीवान् की रक्षा की, उन्हीं उपायों को लेकर यहां आओ. (११) याभि रसां क्षोदसोदनः पिपिन्वथुरनश्वं याभी रथमावतं जिषे. याभिस्त्रिशोक उस्रिया उदाजत ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्... (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा सरिताओं के तटों को जलपूर्ण किया था, अश्वविरहित रथ को विजय के लिए चलाया था तथा त्रिशोक को अपनी चुराई हुई गायों को पाने में समर्थ किया था, उन्हीं उपायों को साथ लेकर आओ. (१२) याभिः सूर्य परियाथः परावति मन्धातारं क्षेत्रपत्येष्यावतम्. याभिर्विप्रं प्र भरद्वाजमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा सूर्य को ग्रहण के अंधकार से मुक्त करने जाते हो, तुमने जिन उपायों द्वारा मांधाता की क्षेत्रपति कर्म में रक्षा की एवं मेधावी भरद्वाज को अन्न देकर बचाया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१३) याभिर्महामतिथिग्वं कशोजुवं दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्. याभिः पूर्भिद्ये त्रसदस्युमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा महान् अतिथि सत्कार करने वाले एवं राक्षसों के भय से जल में घुसने को प्रस्तुत दिवोदास को शंबर असुर द्वारा मारे जाते समय बचाया था तथा संग्राम में त्रसदस्यु ऋषि की रक्षा की, उन्हीं उपायों को लेकर आओ. (१४) याभिर्वम्रं विपिपानमुपस्तुतं कलिं याभिर्वित्तजानिं दुवस्यथः. याभिर्व्यश्वमुत पृथिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा पीने में संलग्न एवं स्तुति किए गए वम्र की, पत्नी प्राप्त करने वाले कलि की एवं अश्वहीन पृथि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (१५) याभिर्नरा शयवे याभिरत्रये याभिः पुरा मनवे गातुमीषथुः. याभिः शारीराजतं स्यूमरश्मये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१६) हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शंयु, अत्रि एवं प्रथम मनु को दुःख से निकलने का मार्ग बताया था एवं स्यूमरश्मि की रक्षा के उद्देश्य से उनके शत्रुओं पर बाण चलाया था, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१६) याभिः पठर्वा जठरस्य मज्मनाग्निर्नादीदेच्चित इद्धो अज्मन्ना. याभिः शर्यातमवथो महाधने ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! जिन उपायों द्वारा पठर्वा ऋषि शरीर बल पाकर संग्राम में उसी प्रकार दीप्त हुए, जिस प्रकार काष्ठों द्वारा जलाई गई अग्नि चमकती है. जिन उपायों से युद्ध में शर्यात की रक्षा की गई, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (१७) याभिरङ्गिरो मनसा निरण्यथोऽग्रं गच्छथो विवरे गोअर्णसः. ebook converter DEMO Watermarks*
याभिर्मनं शूरमिषा समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से मननीय स्तोत्र द्वारा प्रसन्न होकर अंगिराओं की रक्षा की थी, पणियों द्वारा गुफा में छिपाई गई गायों के स्थान पर सबसे पहले पहुंचे थे एवं अन्न देकर वीर्यवान मनु की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१८) याभिः पत्नीर्विमदाय न्यूहथुरा घ वा याभिररुणीरशिक्षतम्. याभिः सुदास ऊहथुः सुदेव्यं१ ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा विमद ऋषि के लिए पत्नी एवं लाल रंग की गाएं दीं एवं सुदास को प्रसिद्ध धन दिया, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१९) याभिः शंताती भवथो ददाशुषे भुज्युं याभिरवथो याभिरधिगुम्. ओम्यावतीं सुभरामृतस्तुभं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२०) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जिन उपायों द्वारा हविदाता यजमान के लिए सुखकर्त्ता बनते हो, भुज्यु एवं अधिगु की रक्षा की तथा ऋतुस्तुभ ऋषि को सुखकर और भरण योग्य अन्न प्रदान किया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२०) याभिः कृशानुमसने दुवस्यथो जवे याभिर्युनो अर्वन्तमावतम्. मधु प्रियं भरथो यत्सरङ्ग्भ्यस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२१) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ने जिन उपायों से युद्ध में कृशानु की रक्षा की, युवा पुरुकुत्स के दौड़ते हुए घोड़े को बचाया तथा मधुमक्खियों को सर्वप्रिय मधु प्रदान किया, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२१) याभिर्नरं गोषुयुधं नृषाह्ये क्षेत्रस्य साता तनयस्य जिन्वथः. याभी रथाँ अवथो याभिर्वतस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२२) हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा गौ प्राप्ति के निमित्त युद्ध करने वाले मनुष्यों की संग्राम में रक्षा करते हो, क्षेत्र एवं धन प्राप्ति में यजमान के सहायक होते हो एवं उसके रथों तथा घोड़ों की रक्षा करते हो, उन्हीं के साथ आओ. (२२) याभिः कुत्समार्जुनेयं शतक्रतू प्र तुर्वीतिं प्र च दभीतिमावतम्. याभिर्ध्वसन्तिं पुरुषन्तिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२३) हे शतक्रतु अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से अर्जुन के पुत्र कुत्स, तुर्वीति एवं दधीति की रक्षा की थी तथा ध्वसंति और पुरुषंति नामक ऋषियों को सुरक्षित किया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*
अप्रस्वतीमश्विना वाचमस्मे कृतं नो दस्रा वृषणा मनीषाम्. अद्यूत्येऽवसे नि ह्वये वां वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (२४) हे कामवर्षी अश्विनीकुमारो! हमारी वाणी को विहित कर्मों से युक्त एवं बुद्धि को वेद ज्ञान में समर्थ बनाओ. प्रकाशरहित रात्रि के अंतिम प्रहर में हम तुम्हें अपनी रक्षा के निमित्त बुलाते हैं. हमारे अन्नलाभ में सहायक बनो. (२४) द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगोभिः. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (२५) हे अश्विनीकुमारो! हमें दिवसों, निशाओं एवं विनाशरहित सौभाग्यों द्वारा सुरक्षित बनाओ, मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश इस स्तुति का आदर करें. (२५) सूक्त—११३ देवता—उषा और रात्रि इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा. यथा प्रसूता सवितुः सवायँ एवा रात्र्युषसे योनिमारैक्.. (१) द्योतमान ग्रहनक्षत्रादि में श्रेष्ठ ज्योति उषा आई. इसकी बहुरंगी एवं विश्व को प्रकाशित करने वाली रश्मियां सभी जगह फैल गईं. जिस प्रकार रात्रि सूर्य से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार उषा का उत्पत्ति स्थान रात्रि है. (१) रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः. समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने.. (२) सूर्य की माता, तेजस्विनी एवं श्वेतवर्ण वाली उषा आई है. कृष्णवर्णा रात्रि ने उसे अपना स्थान दे दिया है. यद्यपि ये दोनों एक ही सूर्य से संबंधित एवं मरणरहिता हैं, तथापि एक- दूसरी के पीछे आती हैं एवं एक-दूसरे का रूप नष्ट करती हुई आकाश में विचरण करती हैं. (२) समानो अध्वा स्वसोरनन्तस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे. न मेथते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे.. (३) इन दोनों बहिनों का अनंत गमनमार्ग एक ही है, जिस पर सूर्य द्वारा निर्देश पाकर ये एक-एक करके चलती हैं. वे सुंदर जन्मदात्री एवं परस्पर भिन्न रूप वाली होकर एकमत को प्राप्त करके आपस में किसी की हिंसा नहीं करतीं तथा कभी स्थिर नहीं रहतीं. (३) भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आवः. प्राप्र्या जगद्व्यु नो रायो अख्यदुषा अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हम प्रकाशसंपन्न एवं वाणियों की नेत्री उषा को जानते हैं. विचित्र उषा ने हमारे लिए अंधकार के बंद द्वार खोल दिए हैं, सारे संसार को प्रकाशित करके हमें धन दिए हैं एवं समस्त लोक को प्रकाशित किया है. (४) जिह्मश्ये३चरितवे मघोन्याभोगय इष्टये राय उ त्वं. दभ्रं पश्यद्भ्य उर्विया विचक्ष उषां अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (५) उषा टेढ़े सोए हुए लोगों में कुछ को अपने अपेक्षित स्थान को जाने के लिए, कुछ को भोग के लिए, कुछ को यज्ञ के लिए एवं कुछ को धन के लिए जगाती है. यह अंधकार के कारण थोड़ा देखने वालों के विशिष्ट प्रकाश के लिए सारे भुवनों को प्रकाशित करती है. (५) क्षत्राय त्वं श्रवसे त्वं महीया इष्टये त्वमर्थमिव त्वमित्यै. विसदृशा जीविताभिप्रचक्ष उषा अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (६) उषा किसी को धन के लिए, किसी को अन्न के लिए, किसी को महायज्ञ के लिए एवं किसी को अभीष्ट वस्तु प्राप्ति के लिए जगाती है. वह नानारूप जीविकाओं के निमित्त समस्त विश्व को प्रकाशित करती है. (६) एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि व्युच्छन्ती युवतिः शुक्रवासाः. विश्वस्येशाना पार्थिवस्य वस्व उषो अद्येह सुभगे व्युच्छ.. (७) आकाश की पुत्री यह उषा मनुष्यों द्वारा नित्य यौवना, श्वेतवसना, तमोविनाशिनी एवं समस्त संपत्तियों की अधीश्वरी के रूप में देखी गई है. हे शोभनधनसंपन्न उषा! तुम आज यहां अंधकार नष्ट करो. (७) परायतीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्. व्युच्छन्ती जीवमुदीरयन्त्युषा मृतं कं चन बोधयन्ती.. (८) अतीत उषाओं के मार्ग का अनुवर्तन वर्तमान उषा करती है. यह आने वाली अगणित उषाओं की आदि है. यह अंधकार को मिटाती, प्राणियों को जागृत करती एवं निद्रा में मृतवत् बने लोगों को चेतन बनाती है. (८) उषो यदग्निं समिधे चकर्थ वि यदावश्चक्षसा सूर्यस्य. यन्मानुषान्यक्ष्यमाणाँ अजीगस्तद्देवेषु चकृषे भद्रमप्रः.. (९) हे उषा! तुमने जो अग्नि को प्रज्वलित किया है, अंधकारावृत विश्व को सूर्य के प्रकाश से स्पष्ट किया है एवं यज्ञ करते हुए मनुष्यों को अंधकार से छुटकारा दिलाया है, ये काम तुमने देवों के कल्याण के लिए किए हैं. (९) कियात्या यत्समया भवाति या व्युषुर्याश्च नूनं व्युच्छान्. ebook converter DEMO Watermarks*
अनु पूर्वाः कृपते वावशाना प्रदीध्याना जोषमन्याभिरेति.. (१०) पता नहीं कितने समय से उषा उत्पन्न हो रही है और कितने समय तक उत्पन्न होती रहेगी? वर्तमान उषा पूर्ववर्तिनी उषाओं का अनुकरण करती है तथा आगामिनी उषाएं इसके प्रकाश का अनुवर्तन करेंगी. (१०) ईयुष्टे ये पूर्वतरामपश्यन्व्युच्छन्तीमुषसं मर्त्यासः. अस्माभिरू नु प्रतिचक्ष्याभूदो ते यन्ति ये अपरीषु पश्यान्.. (११) जिन मनुष्यों ने अतिशय पूर्ववर्तिनी उषाओं को प्रकाश करते देखा था, वे समाप्त हो गईं. उषा हमारे द्वारा इस समय देखी जाती है. होने वाली उषाओं को जो लोग देखेंगे, वे आ रहे हैं. (११) यावयद्द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती. सुमङ्गलीर्बिभ्रती देववीतिमिहाद्योषः श्रेष्ठतमा व्युच्छ.. (१२) हे उषा! तुम हमसे द्वेष करने वालों को दूर हटाने वाली, सत्य की पालनकर्त्री, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न सुखयुक्त वचनों की प्रेरक, कल्याणसहिता एवं देवों के अभिलषित यज्ञ को धारण करने वाली हो, तुम उत्तम प्रकार से आज इस स्थान को प्रकाशित करो. (१२) शश्वत्पुरोषा व्युवास देव्यथो अद्येदं व्यावो मघोनी. अथो व्युच्छादुत्तराँ अनु द्यूनजरामृता चरति स्वधाभिः.. (१३) देवी उषा पूर्वकाल में प्रतिदिन प्रकाश देती थी, धन की स्वामिनी उषा आज भी इस विश्व को अंधकार से छुटकारा दिलाती है एवं इसी प्रकार भविष्य के दिनों में प्रकाश प्रदान करेगी. वह जरा एवं मरण से रहित होकर अपने तेज से विचरण करती है. (१३) व्य१ञ्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्यावः. प्रबोधयन्त्यरुणेभिरश्वैरोषा याति सुयुजा रथेन.. (१४) आकाश की विस्तृत दिशाओं में उषा प्रकाशक तेजों से उदित होती है एवं उसने रात्रि द्वारा निर्मित काला रूप समाप्त कर दिया है. वह सोते हुए प्राणियों को जगाती हुई लाल रंग के घोड़ों वाले अपने रथ से आ रही है. (१४) आवहन्ती पोष्या वार्याणि चित्रं केतुं कृणुते चेकिताना. ईयुषीणामुपमा शश्वतीनां विभातीनां प्रथमोषा व्यश्वैत्.. (१५) उषा पोषण समर्थ, वरणीय धनों को लाती हुई एवं समस्त मनुष्यों को चेतनायुक्त करती हुई विचित्र किरणें प्रकाशित करती है. पूर्ववर्तिनी उषाओं की उपमान एवं आगामिनी विशेष प्रकाशयुक्त उषाओं की प्रथमा यह उषा अपने तेज से बढ़ती है. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
उदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति. आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (१६) हे मनुष्यो! उठो, हमारे शरीर का प्रेरक जीव आ गया है. अंधकार चला गया एवं प्रकाश आ रहा है. उषा सूर्य के गमन के लिए रास्ता साफ करती है. हे उषा! हम उस देश में जाते हैं, जिसमें तुम अन्न की वृद्धि करती हो. (१६) स्यूमना वाच उदियर्ति वह्निः स्तवानो रेभ उषसो विभातीः. अद्या तदुच्छ गृणते मघोन्यस्मे आयुर्नि दीदिहि प्रजावत्.. (१७) स्तुतियों को वहन करने वाला स्तोता प्रकाशमान उषा की स्तुति करता हुआ सुव्यवस्थित वेद वचन बोलता है. हे धनस्वामिनी उषा! इसलिए आज इस स्तोता का रात्रि संबंधी अंधकार मिटाओ तथा हमें प्रजायुक्त धन दो. (१७) या गोमतीरुषसः सर्ववीरा व्युच्छन्ति दाशुषे मर्त्याय. वायोरिव सूनृतानामुदर्के ता अश्वदा अश्ववत्सोमसुत्वा.. (१८) गोसंपन्न एवं समस्त शूरों से युक्त जो उषाएं स्तुति वचन समाप्त होते ही हव्य देने वाले यजमान का वायु के समान शीघ्र अंधकार नष्ट करती हैं, वे ही अश्व देने वाली उषाएं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को व्याप्त करें. (१८) माता देवानामतितेरनीकं यज्ञस्य केतुर्बृहती विभाहि. प्रशस्तिकृद् ब्रह्मणे नो व्युच्छा नो जने जनय विश्ववारे.. (१९) हे देवों की माता एवं अदिति से प्रतिस्पर्धा करने वाली उषा! तुम यज्ञ का ज्ञापन करती हुई एवं महत्त्व प्राप्त करती हुई प्रकाशित एवं हमारे स्तोत्र की प्रशंसा करती हुई उदित बनो. हे वरणीय उषा! हमें संसार में प्रसिद्ध बनाओ. (१९) यच्चित्रमप्र उषसो वहन्तीजानाय शशमानाय भद्रम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (२०) उषाएं जो विचित्र एवं प्राप्त करने योग्य धन लाती हैं, वह हवि देने वाले एवं स्तुति करने वाले पुरुष के लिए कल्याणकारी है. मित्र, वरुण, सिंधु धरती एवं आकाश इस प्रार्थना की पूजा करें. (२०) सूक्त—११४ देवता—रुद्र इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः. यथा शमसद्द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हम प्रवृद्ध जटाधारी एवं वीरनाशक रुद्र के लिए ये मननीय स्तुतियां इसलिए अर्पित कर रहे हैं, जिससे द्विपद एवं चतुष्पद की रोगशांति हो. गांव में सब लोग पुष्ट तथा अनातुर रहें. (१) मृळा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते. यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु.. (२) हे रुद्र! हमारे निमित्त तुम सुखकारक बनी एवं हमें सुख प्रदान करो. हम नमस्कारपूर्वक वीरनाशक रुद्र की सेवा करते हैं. पिता मनु ने जो रोगशांति और निर्भयता प्राप्त की थी, हे रुद्र! तुम्हें नमस्कार करने पर हम भी उन्हें प्राप्त करें. (२) अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्वः. सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हविः.. (३) हे कामवर्षक रुद्र! हम वीरनाशक एवं मरुत् सहयोगी तुम्हारी कृपा देवयज्ञ के द्वारा पावें. हमारी प्रजाओं के सुख की इच्छा करते हुए तुम उनके समीप आओ. प्रजा को हानिरहित देखकर हम तुम्हारे लिए हव्य देंगे. (३) त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञसाधं वङ्ककविमवसे नि ह्वयामहे. आरे अस्मद्दैव्यं हेळो अस्यतु सुमतिमिद्वयमस्या वृणीमहे.. (४) हम रक्षा के निमित्त दीप्त, यज्ञसाधक, कुटिलगति एवं क्रांतदर्शी रुद्र को बुलाते हैं. रुद्र अपना दीप्त क्रोध दूर करें एवं हम उनकी शोभन कृपादृष्टि प्राप्त करें. (४) दिवो वराहमरुषं कपर्दिनं त्वेषं रूपं नमसा नि ह्वयामहे. हस्ते बिभ्रद्भेषजा वार्याणि शर्म वर्म च्छर्दिरस्मभ्यं यंसत्.. (५) हम वराह के समान दृढ़ांग, प्रकाशशील, जटाधारी, तेजोदीप्त एवं निरूपणजीव रुद्र को नमस्कार द्वारा बुलाते हैं. वे अपने हाथों में वरणीय ओषधियां धारण करते हुए हमें सुख, कवच एवं गृह प्रदान करें. (५) इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादोः स्वादीयो रुदाय वर्धनम्. रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ.. (६) मरुतों के पिता रुद्र को लक्ष्य करके हम स्वादिष्ट पदार्थों से भी मधुर एवं वृद्धिकारक स्तुति वचन बोल रहे हैं. हे मरणरहित रुद्र! हमें मानवों का भोजन प्रदान करो एवं अपने पुत्ररूप मेरी तथा मेरे पुत्र की रक्षा करो. (६) मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्. मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे रुद्र! हम लोगों में से वयोवृद्ध, बालक, गर्भाधान समर्थ युवक एवं गर्भस्थ शिशु की हिंसा मत करना, हमारी माता अथवा पिता की हिंसा एवं हमारे प्रिय शरीर का नाश भी मत करना. (७) मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः. वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे.. (८) हे रुद्र! हमारे पुत्र, पौत्र, दास, गाय एवं घोड़ों की हिंसा एवं क्रोधित होकर हमारे वीरों का वध मत करना. हम सदैव हवि लेकर तुम्हें बुलाते हैं. (८) उप ते स्तोमान्पशुपा इवाकरं रास्वा पितर्मरुतां सुम्नमस्मे. भद्रा हि ते सुमतिर्मूळयत्तमाथा वयमव इत्ते वृणीमहे.. (९) हे मरुत्पिता! जिस प्रकार गोप दिन भर चराने के बाद पशु मालिक को लौटा देता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा स्तोत्र तुम्हें लौटा रहा हूं. हमें सुख दो. तुम्हारी कल्याणी बुद्धि परम रक्षक एवं सुखकारिणी है, इसी कारण हम तुमसे रक्षा की याचना करते हैं. (९) आरे ते गोघ्नमुत पूरुषघ्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु. मृळा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च नः शर्म यच्छ द्विबर्हाः.. (१०) हे वीरनाशक रुद्र! गोहनन एवं मनुष्य हनन का साधन तुम्हारा आयुध हमसे दूर रहे. हमारे पास तुम्हारा दिया सुख रहे. हमें सुखी करो एवं हमारे प्रति पक्षपात रखने वाले वचन बोलो. तुम धरती और आकाश के स्वामी बनकर हमें सुख दो. (१०) अवोचाम नमो अस्मा अवस्यवः शृणोतु नो हवं रुद्रो मरुत्वान्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११) रक्षा के इच्छुक हम लोग यह सूक्त बोलते हैं. इस रुद्र को नमस्कार हो. रुद्र मरुतों के साथ हमारी यह पुकार सुनें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना का आदर करें. (११) सूक्त—११५ देवता—सूर्य चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (१) मित्र, वरुण एवं अग्नि के चक्षु, किरणों के समूह एवं आश्चर्यकारी सूर्य उदय हुए हैं. उन्होंने धरती, आकाश एवं दोनों के मध्य भाग को तेज से पूर्ण किया है. वे जंगम एवं स्थावर के स्वरूप हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्. यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्.. (२) सूर्य दीप्यमान उषा का अनुगमन उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार पुरुष नारी के पीछे- पीछे चलता है. इसी समय लोग सूर्य संबंधी यज्ञ करने की इच्छा से कार्य विस्तार करते हैं. कल्याण पाने के लिए हम सूर्य की स्तुति करते हैं. (२) भद्रा अश्वा हरितः सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः. नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थुः परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः.. (३) सूर्य के कल्याणकारक, विचित्र लोगों द्वारा क्रमशः स्तुत एवं हमारे द्वारा नमस्कृत हरित नाम के घोड़े आकाश के ऊपर उपस्थित होकर शीघ्र ही धरती और आकाश का परिभ्रमण कर लेते हैं. (३) तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं सं जभार. यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै.. (४) यही सूर्य का ईश्वरत्व और महत्त्व है कि वह संसार के कर्म समाप्त होने से पहले ही विश्व में फैली अपनी किरणें समेट लेते हैं. वे जब अपने रथ से हरित नामक घोड़ों को अलग करते हैं, तभी रात्रि इस प्रकार अंधकार फैलाती है, जैसे जगत् पर परदा डाल रही हो. (४) तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे. अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. (५) सूर्य धरती और आकाश के बीच अपना सर्वप्रकाशक तेज इसलिए फैलाते हैं, जिससे मित्र और वरुण उन्हें सम्मुख देख सकें. सूर्य के घोड़े एक ओर अवसानरहित, जगत्प्रकाशक बल एवं दूसरी ओर काले रंग का अंधेरा धारण करते हैं. (५) अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिपृता निरवद्यात्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (६) हे सूर्यकिरणो! इस सूर्योदय के समय हमें पापों से बचाओ. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना को स्वीकार करें. (६) सूक्त—११६ देवता—अश्विनीकुमार नासत्याभ्यां बर्हिरिव प्र वृञ्जे स्तोमाँ इयर्म्यभ्रियेव वातः. यावर्भगाय विमदाय जायां सेनाजुवा न्यूहतू रथेन.. (१) जिस प्रकार कोई यजमान यज्ञ के निमित्त कुश छेदन करता है अथवा वायु बादलों के ebook converter DEMO Watermarks*
जल को प्रेरित करता है, उसी प्रकार मैं अश्विनीकुमारों की पर्याप्त स्तुति करता हूं. उन्होंने किशोर विमद को अपने रथ द्वारा शत्रुओं से पहले ही स्वयंवर में पहुंचाकर पत्नी प्राप्त कराई थी. उनके रथ को शत्रु सेना नहीं पा सकी. (१) वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां वा जूतिभिः शाशदाना. तद्रासभो नासत्या सहस्रमाजा यमस्य प्रधने जिगाय.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने बलपूर्वक उछलने वाले एवं शीघ्रगामी अश्वों तथा इंद्रादि देवों की प्रेरणाओं से प्रेरित हो. तुम्हारा वाहन रासभ इंद्र को प्रसन्न करने वाले बहुधनशाली संग्रामों में हजारों बार विजयी हुआ था. (२) तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवाँ अवाहाः. तमूहथुर्नौभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः.. (३) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार कोई मरता हुआ व्यक्ति धन का त्याग करता है, उसी प्रकार शत्रुपीड़ित तुग्र ने अपने पुत्र थुज्यु को शत्रु विजय के लिए नाव से गमन करने के निमित्त सागर में भेजा. तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को अंतरिक्ष में चलने वाली एवं जलप्रवेशरहित अपनी नाव द्वारा तुग्र के पास पहुंचाया था. (३) तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतङ्गैः. समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथैः शतपद्भिः षळश्वैः.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को सौ पहियों वाले, छह घोड़ों से खींचे जाते हुए, तीन दिन एवं तीन रात से अधिक चलने वाले तीन शीघ्रगामी रथों द्वारा जलपूर्ण सागर के जलहीन किनारे पर पहुंचाया था. (४) अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणे समुद्रे. यदश्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को सौ डांडों से चलने वाली नौका में बैठाकर अपने घर पहुंचाया था. वह सागर आलंबनरहित, भू प्रदेश से भिन्न, हाथ से पकड़ने योग्य शाखा आदि से हीन था, जिसमें तुमने यह पराक्रम किया. (५) यमश्विना ददथुः श्वेतमश्वमघाश्वाय शश्वदित्स्वस्ति. तद्वां दात्रं महि कीर्तेन्यं भूत्पैद्वो वाजी सदिमद्धिद्वयो अर्यः.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अघाश्व पेदु को नित्यविजय दिलाने वाला श्वेत अश्व दिया था. तुम्हारा वह दान महान् एवं प्रशंसनीय है एवं पेदु का उत्तम अश्व सदा हमारा आदरणीय रहेगा. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
युवं नरा स्तुवते पज्रियाय कक्षीवते अरदतं पुरन्धिम्. कारोतराच्छफादश्वस्य वृष्णः शतं कुंभाँ असिञ्चतं सुरायाः.. (७) हे नेताओ! तुमने स्तुति करने वाले अंगिरागोत्रीय कक्षीवान् को पर्याप्त बुद्धि दी थी. जिस प्रकार शराब बनाने वाले कारोतर नामक पात्र से सुरा का आसवन करते हैं, उसी प्रकार तुमने अपने सवन-समर्थ अश्व के खुर से सौ घड़े शराब निकाली. (७) हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्तं. ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतमून्निन्थ्युः सर्वगणं स्वस्ति.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने ठंडे जल से उस अग्नि को बुझाया था, जो असुरों द्वारा उन्हें पीड़ा पहुंचाने के लिए जलाई गई थी. तुमने उन्हें अन्नसहित बलप्रद क्षीर दिया था. अत्रि यंत्रपीड़ार्गह में नीचे को मुंह करके लटकाए गए थे, तुमने उन्हें उनके साथियों सहित छुड़ाया. (८) परावतं नासत्यानुदेथामुच्चाबुधं चक्रथुर्जिह्मबारम्. क्षरन्नापो न पायनाय राये सहस्राय तृष्यते गोतमस्य.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम गौतम ऋषि के समीप कुएं को ले गए थे. उसका मूल ऊपर एवं द्वार नीचे कर दिया था. उस में से हव्य देने वाले एवं सहनशील गौतम के पीने के निमित्त जल निकलने लगा था. (९) जुजुरुषो नासत्योत वव्रिं प्रामुञ्चतं द्रापिमिव च्यवानात्. प्रातिरतं जहितस्यायुर्देसादित्पतिमकृणुतं कनीनाम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जीर्ण च्यवन ऋषि को व्याप्त करने वाले बुढ़ापे को कवच के समान दूर कर दिया था. हे दर्शनीयो! तुमने पुत्रों द्वारा परित्यक्त च्यवन का जीवन बढ़ाया एवं उन्हें कन्याओं का पति बनाया. (१०) तद्वां नरा शंस्यं राध्यं चाभिष्टिमन्नासत्या वरूथम्. यदिद्धांसा निधिमिवापगूळ्हमुद्दर्शतादूपथुर्वन्दनाय.. (११) हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने गुप्त धन के समान कुएं में छिपे वंदन ऋषि को जानकर वहां से निकाला. तुम्हारा यह कर्म चाहने योग्य, वरणीय एवं प्रशंसनीय है. (११) तद्वां नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम्. दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाच.. (१२) हे नेताओ! अथर्वा के पुत्र दध्यंग ऋषि ने तुम्हारे सामर्थ्य से अश्व की ग्रीवा धारण करके मधुर वचन बोले थे. यह तुम्हारे उग्र कर्म को उसी प्रकार प्रकट करता है, जिस प्रकार बादल ebook converter DEMO Watermarks*
का गर्जन बादल के भीतर जल को बताता है. (१२) अजोहवीन्नासत्या करा वां महे यामन्पुरुभुजा पुरन्धिः. श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम्.. (१३) हे लंबे हाथों वाले अश्विनीकुमारो! परम बुद्धिमती ऋषिपत्नी वध्रिमती ने अपने पूजनीय स्तोत्र में तुम अभिमत फलदाताओं को बार-बार बुलाया था. तुमने शिष्य के समान उसकी पुकार सुनी एवं उसे हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया. (१३) आस्नो वृकस्य वर्तिकामभीके युवं नरा नासत्यामुक्तम्. उतो कविं पुरुभुजा युवं ह कृपमाणमकृणुतं विचक्षे.. (१४) हे नेताओ! तुमने वृक और वर्तिका के संग्राम में वृक के मुख से वर्तिका को छुड़ाया था. तुमने स्तुतिकर्त्ता विद्वान् को देखने की शक्ति दी थी. (१४) चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्. सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम्.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार पक्षी का पंख अलग हो जाता है, उसी प्रकार खेल राजा की पत्नी विश्पला का पैर युद्ध में कट गया था. तुमने शत्रुओं द्वारा छिपाया हुआ धन प्राप्त करने के निमित्त चलने के लिए विश्पला के लिए रात भर में लोहे का पैर बनाकर दिया था. (१५) शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्धं चकार. तस्मा अक्षी नासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा भिषजावनर्वन्.. (१६) हे अश्विनीकुमारो! ऋज्राश्व ऋषि ने अपनी वृकी के भोजन के लिए सौ भेड़ों को काट दिया था. इससे उनके पिता ने उन्हें अंधा कर दिया था. हे देवों के वैद्यो! तुमने ऋज्राश्व की देखने में असमर्थ दोनों आंखों को देखने में समर्थ बना दिया था. (१६) आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य कार्ष्मेवातिष्ठदर्वता जयन्ती. विश्वे देवा अन्वमन्यन्त हृद्भिः समु श्रिया नासत्या सचेथे.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दौड़ने वाले घोड़ों में सबसे आगे वाला निश्चित स्थान पर गड़ी लकड़ी तक पहले पहुंचता है, उसी प्रकार अवधि पर शीघ्र पहुंचने वाले घोड़ों के कारण सूर्यपुत्री सूर्या तुम्हारे रथ पर बैठ गई. सारे देवों ने सहर्ष यह बात मान ली और तुमने कांति प्राप्त की. (१७) यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायश्विना हयन्ता. रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारश्च युक्ता.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*