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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

११४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

साय-साय वृष लग्न भी प्रातःकाल उदय होगी तब उस समय कहेंगे कि वृष लग्न का उदय हुआ है। यदि ठीक उसी समय किसी का जन्म हुआ हो तो लग्न स्थान में हम वृष राशि का सूचक २ अंक लिख देंगे और आगे की राशियाँ क्रमशः एक-एक कोठे में रखकर आगे की पूरी १२ राशियाँ क्रमानुसार भर देने पर जन्म समय की ग्रह रहित लग्न कुंडली बन जायगी। इस कुंडली में वृष लग्न है।

जब सूर्य ठीक सिर पर आता है तो हम कहेंगे कि सूर्य दशम स्थान पर आया है, क्योंकि सिर के ऊपर का ही नाम दशम स्थान है और मध्याह्न काल में सूर्य सिर पर आता है। मान लो किसी का जन्म ठीक दोपहर को हुआ है तो हम दशम स्थान में, सिर पर जो राशि हो उस राशि को रख देंगे, क्योंकि उस समय दशम स्थान में सूर्य होने से, सूर्य की वृष राशि भी दशम स्थान में रहेगी। यहाँ सूर्य वृष राशि का है तो दशम स्थान में वृष का अंक २ लिखकर वहाँ सूर्य की लिख देंगे और आगे की राशियाँ

क्रम पूर्वक आगे के कोठों में भर देंगे जैसा यहाँ बताया है। इस कुण्डली में लग्न के स्थान में ५ अंक आया है यही पाचवीं सिंह लग्न यहाँ पर जन्म लग्न हुई, और यही उस समय के जन्म की ग्रह रहित कुण्डली बन गई।

जब सूर्य अस्त होने लगता है तो कहेंगे कि सूर्य अस्त स्थान अर्थात् सप्तम स्थान पर आया है। यदि उस समय किसी का जन्म हो तो सप्तम स्थान पर सूर्य जिस राशि पर हो वह राशि लिख दो और आगे सब राशियाँ क्रमशः भर दो तो ग्रह रहित लग्न कुण्डली बन जायगी। यहाँ पर वृष राशि का सूर्य है इस कारण सप्तम स्थान (अस्त) पर वृष का २ अंक लिखा और आगे की राशियाँ भर देने से लग्न स्थान में वृषिक राशि आई। इससे प्रगट हुआ कि उस समय वृषिक लग्न थी।

कुण्डली बनाने के लिए ज्ञान निकालना : ११५

जब ठीक अर्द्ध राशि हो तो कहेंगे कि सूर्य पाताल ( चतुर्थ स्थान ) में हैं। यदि ठीक उस समय किसी का जन्म हो तो जिस राशि पर सूर्य हो उसे चतुर्थ स्थान में लिखकर आगे की शेष राशियाँ क्रमानुसार भर देंगे तो उस समय की ग्रह रहित कुण्डली बन जायगी। यहाँ वृष का सूर्य है तो २ को चतुर्थ स्थान ( पाताल ) में रखा और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर देने पर लगन में ११ कुंभ राशि आई तो कहेंगे कि जन्म समय कुंभ लगन थी और यही ग्रह रहित जन्मकुंडली होगी।

ऊपर के उदाहरण में सूर्य की स्थिति के अनुसार ठीक ठीक जन्म समय मिल जाने पर कुंडली बना लेना सरल हो गया था।

यदि इनके अतिरिक्त और कोई समय में किसी का जन्म हो तो कैसे लगन जानना, यहाँ बतलाते हैं।

पहिले बता चुके हैं कि एक चक्र में ३६०° और ४ समकोण होते हैं। सूर्य उदय से अस्त तक १८०° ( ६ राशियाँ ) पार करता है। ३०-३० अंश की १ राशि होती है। उदय से मध्याह्न तक ९०° का कोण बनता है और सूर्य ३ राशियाँ पार करता है। इस प्रकार उदय से अस्त तक १८०°=६ राशि पार करता है। देखो चित्र संख्या ७०।

जब सूर्य उदय होता है तो लगन पर होता है। मध्याह्न में दशम पर, संध्या को सप्तम पर होता है। इसी के अनुसार बीच के भाव कोण जान लेना। जैसे उदय से ३० अंश ऊपर सूर्य जाने पर द्वादश भाव में सूर्य पहुँचेगा। ३० अंश और ऊपर चढ़ने पर एकादश भाव में आवेगा। इसी प्रकार अस्त स्थान से ३० अंश ऊपर सूर्य है तो अष्टम स्थान में सूर्य है ऐसा कहेंगे। यदि सूर्य और ऊपर अस्त से ६०° पर मध्याह्न की ओर है या मध्याह्न से ३०° आगे बढ़ा है तो कहेंगे सूर्य नवम स्थान या नवम भाव में है।

आकाश के अर्द्ध गोलार्द्ध को जो क्षितिज के ऊपर है ६ भागों में अनुमान से विभक्त कर लो और वे ६ भाव ( स्थान ) आकाश में कहाँ कहाँ हैं बताए हुए चित्र संख्या ७० के अनुसार अनुमान करो।

११६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चित्र संख्या ७०

आकाश में लग्न से अस्त तक भाव

यदि दिन है तो सूर्य को देखो और अनुमान करो कि किस भाव में है, जैसे सूर्य को देखकर कितना बजा होगा इसका अनुमान हो जाता है इसी प्रकार इसके भी अनुमान करने का अभ्यास कर लो। जिस भाव में सूर्य हो उस भाव में सूर्य लिख कर सूर्य की राशि भी लिख दो और आगे की राशियाँ सब क्रमानुसार भर दो तो उस समय की लग्न कुण्डली बन जायगी और लग्न के स्थान में जो राशि आवे उसे लग्न समझो।

अब यह बात विचारने की है कि ६ राशियों में सूर्य उदय से अस्त तक प्रायः १२ घंटे में घूमता है, इससे एक राशि में लगभग २ घण्टे का औसत पड़ा। जैसे सूर्य ६ बजे उदय हुआ तो १२ बं भाव में न बजे, ११ बं में १० बजे, दशम में १२ बजे, (सोपहर) नवम भाव में २ बजे, अष्टम में ४ बजे और सप्तम में ६ बजे संख्या को सूर्य पहुँचैगा।

उदय काल के अनुसार समय बदलता रहता है। इस कारण सूर्य को देखकर भाव का अनुमान करना और जिस भाव में सूर्य दिखे उसी भाव में सूर्य रखकर सूर्य की राशि भी उसी भाव में लिख दो और क्रमशः आगे की राशियाँ भर दो तो ग्रह रहित लग्न कुण्डली बन जायगी।

ऊपर लग्न प्रकार २-२ घंटे का दिया है, परन्तु वास्तव में किसी लग्न का अधिक किसी का कम प्रमाण है परन्तु (१) मेष-मीन (२) वृष-कुम्भ (३) मिथुन-मकर (४) कर्क-धन, (५) सिंह-वृश्चिक (६) और कन्या-तुला इतका सदैव एक समान लग्न प्रमाण रहता है अर्थात् मेष और मीन का एक ही लग्न प्रमाण है। इसी प्रकार शेष २-२ राशियों की जोड़ी दी है उन दोनों का एक ही लग्न प्रमाण होता है।

परन्तु यहाँ पर अधिक खट-पट में न पड़कर स्पष्ट रूप से २-२ घण्टे का प्रत्येक राशि का उदय प्रमाण सिद्धान्त समझाने के लिए ही मान लिया है। सूक्ष्म रूप से इसका विचार गणित खण्ड में मिलेगा।

कुण्डली बनाने के लिए लगन निकालना : ११७

मान लो किसी का जन्म २ बजे रात का है। यदि ६ बजे सूर्योदय हुआ है तो सूर्योदय से ( १२-६ )=६ घण्टा दोपहर तक+१२ घण्टा आधी रात तक + २ घण्टा और=२० घण्टा हुआ था=२४ घण्टा अर्द्ध रात्रि तक + २ घंटा= २६ घंटा-६ घंटा सूर्योदय के=२० घंटा-२=१० राशि। १ राशि २ घंटा में हुई तो २० घंटा में १० राशि हुई। सूर्य वृष राशि का है तो वृष राशि से १ गिना तो १० की राशि कुंभ हुई। यही कुंभ लगन उस समय होगी।

यदि जन्म २-२५ बजे मध्याह्न का है=१२+( २-२५ )=१४ घंटा २५ मि० इसमें से ६ बजे सूर्योदय का घटाया तो ६-२५ रहे। इसमें २ का भाग दिया तो ४ बार पूरा भाग लग गया और शेष बचा उसकी पाँचवीं राशि हुई। वृष से पाँचवीं राशि कन्या हुई। इस कारण उस समय कन्या लगन होगी।

इसी प्रकार सूर्योदय से जन्म समय तक घंटा मिनट गिन कर २ का भाग देने से और सूर्योदय की राशि से उतनी संख्या गिनने पर इसका अनुमान हो जाता है कि उस समय लगन में कौन राशि होगी।

मान लो रात्रि का समय है और चन्द्र विखता है तो पंचांग से देखलो कि चन्द्र किस राशि पर है। पञ्चांग विषय में दैनिक चन्द्र देखना बतला दिया गया है। सूर्य देख कर जिस प्रकार कुण्डली बनाई थी यही उसी प्रकार चन्द्र देखकर कुण्डली बना लेना। जिस स्थान पर चन्द्र आकाश में दिखेगा उसी स्थान पर चन्द्र लिखकर चन्द्र की राशि भी लिख देंगे और क्रमानुसार आगे की राशियाँ भर देंगे तो लगन कुण्डली बन जायगी।

जैसे कन्या राशि का चन्द्र जन्म समय सिर पर है अर्थात् दशम स्थान में है तो दशम भाव में चन्द्र और चन्द्र की राशि का अंक ६ लिख कर आगे की राशियाँ क्रम पूर्वक भर देने से घन लगन आ जाती है। यह लगन कुण्डली बन गई। यहाँ सूर्य भी लिख दो। अपने को पहले से मालूम है कि इस समय वृष राशि का सूर्य है। जहाँ वृष राशि हो सूर्य लिख दो। यहाँ षष्ठ भाव में वृष राशि है इस कारण षष्ठ भाव में सूर्य लिख दिया।

चन्द्र यदि और कोई स्थान में हो तो आकाश में चन्द्र जिस भाव में दिख रहा हो उस भाव में चन्द्र और उसकी राशि लिख कर उपर्युक्त रीति से कुण्डली बना लो तो लगन निकल आवेगी।

यदि चन्द्र भी नहीं है और अंधेरी रात है तो तारागणों को देखो कौन नक्षत्र

११८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारंभिक ज्ञान खण्ड

कहाँ पर है और वह नक्षत्र किस राशि का है। किसी एक नक्षत्र पर से राशि जान कर देखो वह किस भाव में है, जिस भाव में वह राशि हो लिख कर क्रम पूर्वक भेष राशियाँ भर दो तो लग्न स्थान में जो राशि आवे वही लग्न होगी। यदि सब नक्षत्रों की अच्छी तरह पहचान हो गई हो तो कौन नक्षत्र उदय हो रहा है, कौन उदय हो चुका है उन नक्षत्रों की राशि पर से उनके ठीक-ठीक स्थान का अनुमान कर उपर्युक्त रीति से कुंडली बना कर जान लो।

परन्तु स्मरण रहे कि यह सब स्थूल मान से है। जैसे कोई पुखे कि इस समय क्या वजा होगा तो सूर्य की ओर देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इस समय ३ बजा होगा। यदि उस समय घड़ी देखते हैं तो विधित होता है कि ३ बज कर ३० मिनट ४० सेकेण्ड हुआ है या ३ बजने को १४ मिनट बाकी हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त रीति भी स्थूल है। इससे कुछ सूक्ष्म और शुद्ध लग्न पञ्चाङ्ग में दिये हुए दैनिक लग्न पत्र से जानी जा सकती है।

दैनिक लग्न होरा सारिणी

यह प्रत्येक पञ्चाङ्ग में नहीं दिया रहता, परन्तु काशी, जवलपुर आदि कई स्थानों के पञ्चाङ्ग में अवश्य दिया रहता है। यद्यपि इसके विषय में पहिले बता चुके हैं परन्तु यहाँ और भी उदाहरण देकर समझाते हैं। उदाहरण के लिए जवलपुर का लोक विजय पञ्चाङ्ग सम्बत् २००० का लेते हैं।

पञ्चाङ्ग के तिथिपत्र के नीचे उस पक्ष भर की तिथियाँ और बार ऊपर लिखा है। बाईं ओर खड़ी पंक्ति में लग्न के नाम दिये हैं और आगे वह लग्न कब तक रहेगी उसका घंटा मिनट दिया है।

जन्म समय ठीक क्या वजा है देखो, यदि लड़ाई के समय का नया समय* (१ घंटा बढ़ा हुआ) है तो १ घंटा घटाकर पुराना समय बनालो और लग्नपत्र में उस तिथि और बार के नीचे अपना इष्ट समय खोजो। इष्ट समय सारिणी में दिये हुए जिस समय के भीतर मिले उसके बाईं ओर जो लग्न लिखी हो वही लग्न उस समय होगी।

मान लो किसी का जन्म वैशाख शुक्ल ३ शुक्रवार के रात्रि के ९-४० बजे का है। लग्न पत्र के नीचे शुक्ल पक्ष की ३ तिथि शुक्रवार के नीचे ७-७ तक तुला और ९-२४ तक वृश्चिक लग्न है। अपना समय बढ़ा हुआ समय होने से एक घंटा घटा कर लिया तो (९-४०)-(१०)=८-४० यह पुराना समय हुआ। ९-२४ के भीतर यह ८-४० है। इस कारण उस समय वृश्चिक लग्न हुई। यही जन्म लग्न हुई। वृश्चिक लग्न को लग्न स्थान में रखकर कुण्डली बना लो।

*लड़ाई के समय तारीख १-९-१९४२ ई० से ता० १५-१०-१९४५ तक गर्वनेमेंट की आज़ा से भारतवर्ष में घड़ियाँ १ घंटा आगे बढ़ा दी गई थीं। जिसके कारण उस समय १ घंटा बढ़ा हुआ समय प्रचलित था।

कुण्डली बनाने के लिए लगन निकालना : ११९

ध्यान रहे लगनपत्र में घंटा मिनट में ही समय दिया रहता है, इससे अपना समय घंटा मिनट में रात या दिन का है जान कर लगन निकाल लो। इससे लगन जानना बहुत ही सरल है।

किसी दो में लगन प्रारम्भ होने का समय दिया रहता है और समय रेलवे के अनुसार २४ बजे तक दिया रहता है। जिस प्रकार लगनपत्र हो बुद्धि से विचार कर उपयोग करो। नये विचार्यों को कोई ऐसा पंचाङ्क खरीदना चाहिए जिसमें लगनपत्र आदि आवश्यक बातें दी हों।

अध्याय २२

इष्ट काल निकाल कर लगन सारिणी से लगन निकाल कर जन्म कुण्डली बनाना। इष्टकाल—

कोई भी विचारणीय इष्ट विषय के सम्बन्ध में यह जानना कि उस समय क्या बजा है, वही समय इष्टकाल कहलाता है। जैसे किसी का जन्म १० बजे दिन को हुआ तो १० बजे का समय इष्टकाल घंटा में हुआ। यदि किसी ने कोई प्रश्न पूछा तो उसका उत्तर देने१ लिए उस समय की लगन जानने के लिए समय की आवश्यकता होगी वही समय इष्ट काल है। जैसे किसी ने २ बजे रात को पूछा कि अमुक द्रव्य चोरी गया है मिलेगा कि नहीं तो २ बजे रात का समय अपना इष्ट काल हुआ।

इष्ट काल का समय घड़ी पल में होना आवश्यक है। यदि यह समय घंटा मिनट में दिया हो तो इसके घड़ी पल बना लो। यह स्मरण रहे कि घंटा मिनट का समय अब्द रात्रि से आरम्भ होता है अर्थात् १२ बजे रात के उपरान्त १-२ आदि बजता है और अपना इष्ट घड़ी पल का समय सूर्योदय के उपरान्त आरम्भ होता है अर्थात् इष्ट घड़ी पल से प्रगट होता है कि सूर्योदय से इतने घड़ी पल उपरान्त किसी का जन्म आदि हुआ है।

जन्म समय घंटा मिनट में दिया रहता है उसे घड़ी पल में परिवर्तन करने की युक्ति यह है :—

उस दिन सूर्योदय का समय ( जो घंटा मिनट में दिया रहता है ) पंखांग से देख लो और उस समय को इष्ट काल के घंटा में से घटा दो, जो शेष घंटे बचे उनके घड़ी पल बना लो तो इष्ट निकल आयगा। इसी को कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं :—

( १ ) यदि १२ बजे ( दोपहर ) के प्रथम जन्म है तो उसमें से सूर्योदय के घंटा मिनट घटा कर जो बचे उसके घड़ी पल बना लो। मान लो सूर्योदय ५ घं० ३१ मि० पर है और जन्म ११ बजकर ५० मिनट पर हुआ है तो जन्म घंटा में सूर्योदय घटाने से ६—१९ घंटा बचा। इसके घड़ी पल बना दें तो १५ घंटा ४७।। पल हुए तो अपना इष्ट काल १५ घं० ४७।। पल हुआ।

१२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

| घंटा मिनट | घड़ी पल ---|---|--- जन्म— | ११-५० | ६ घण्टा=१५-० सूर्योदय | ५-३१ | १९ मि०=०-४७॥ शेष | ६-१९ | योग=१५-४७॥

( २ ) यदि दोपहर ( १२ बजे ) के उपरान्त रात्रि के १० बजे तक जन्म है तो जन्मसमय रेलवे टाइम के अनुसार बना लो अर्थात् १२ घंटा और जोड़ देना । जैसे रात के ११ बजे हैं तो ११+१२=२३ बजे जन्म समझो । अब इसमें से सूर्योदय घंटा कर घड़ी पल बना लो जैसे जन्म १२ बजे रात का है तो १२+१२ = २४ बजे जन्म समझो । यदि उस दिन सूर्योदय ५ घंटा ४५ मिनट पर हुआ तो २४ घंटा से सूर्योदय का समय घटाने से शेष १८ घण्टा १५ मिनट बचा, इसके ४५ घड़ी ३७॥ पल हुए । इस कारण ४५ घड़ी ३७॥ पल इष्ट काल हुआ ।

| घण्टा मिनट | घड़ी पल ---|---|--- जन्म— | २४-० | १८ घंटा = ४५-० सूर्योदय | ५-४५ | १५ मि० = ०-३७॥ शेष | १८-१५ | योग = ४५-३७॥

यदि जन्म अर्द्धरात्रि के उपरान्त है तो उसमें ( १२ दोपहर-॥ १२ बजे अर्द्धरात्रि के=२४ ) २४ घंटा जोड़ दो और उसमें सूर्योदय घंटा कर घंटा मिनट के घड़ी पल बना लो तो इष्ट निकल आवेगा जैसे रात के २ बं ४५ मि० पर जन्म है तो इसमें २४ घंटा जोड़े तो २६ घंटा ४५ मिनट हुए । इसमें सूर्योदय घटाया । मान लो सूर्योदय ५ बं ३१ मि० पर था यह घटाने से २१-१४ बचे इसके ५३-५ घड़ी पल हुए । इस कारण अपना इष्ट ५३ बं ५ पल हुआ ।

| बं मि० | घं पं ---|---|--- जन्म— | २-४५ | २१ घण्टा=५२-३० | +२४-० | १४ मि०= ०-३५ जन्म = | २६-४५ | योग ५३-५ सूर्योदय | ५-३१ | इष्ट शेष | २१-१४ |

लग्नसारिणी से लग्न देखना

किरी-किरी पञ्चांग में दैनिक लग्नपत्र नहीं रहता । लग्न पत्र से केवल लग्न ही विदित होती है, परन्तु यह पता नहीं चलता वह लग्न कितने अंश युक्त हो चुकी है । इस कारण लग्न जानने की तीसरी सरल रीति यहाँ देते हैं । इससे लग्न की राशि और अंश भी जान सकते हैं । यह लग्न सारिणी द्वारा जानी जा सकती है ।

लग्नसारिणी प्रत्येक पंचांग में दी रहती है । बहुधा ज्योतिषी जो गणित द्वारा लग्न निकालने की खट-पट से बचना चाहते हैं, इसी सारिणी द्वारा लग्न निकाल लेते

अध्याय २२ : १२१

है। गणित द्वारा इससे भी सूक्ष्म रूप से मुद्रा लग्न कला विकला तक निकाली जा सकती है। प्रत्येक स्थान के अनुसार लग्न प्रमाण में कुछ अन्तर पड़ जाता है, परन्तु काम चलाने की यह सारिणी बहुत उपयोगी है, इससे लग्न तो अवश्य ठीक निकल आती है। आरम्भ में इसका उपयोग जान लेने से नया विद्यार्थी काम चला सकता है। अपने स्थान की लग्नसारिणी बनाना और लग्न निकालने का पूरा गणित, गणित खण्ड में मिलेगा।

जिस दिन की लग्न निकालनी हो उस दिन के सूर्य की राशि और अंश पञ्चांग से देख लो। जैसे वैशाख शुक्ल ३ सम्बत् २००० शुक्रवार को पंचांग में प्रातः रवि स्पष्ट ० २२-१५-१ दिया है। अर्थात् मीनराशि गत होकर मेघराशि के २२°-१५-'१" पर प्रातः काल सूर्य था।

अब लग्नसारिणी देखो। वार्ड और खड़ी पंक्ति में राशि दी है और ऊपर आड़ी पंक्ति में अंश दिये हैं। अपनी सूर्य की राशि ० रा २२° है ( मेघ के २२ अंश ) यहाँ कला विकला छोड़ दिया। अब खड़ी पंक्ति में देखो जहाँ मेघ वृष आदि राशियाँ लिखी हैं वहाँ ० मेघ, वृष १, मिथुन २ इत्यादि दिया है अर्थात् दिये हुए अंक की राशि गत हो गई और अक्षरों में बताई राशि वर्तमान है। जैसे मेघ ० दिया है इसका अर्थ यह है कि ० ( मीन ) राशि तो गत राशि है और मेघराशि वर्तमान राशि है। सूर्य मेघ ० का है इससे मेघ ० के सीध में दाहिनी ओर, और सूर्य मेघ के २२° पर है, इससे २२° के नीचे देखा ( ऊपर की पंक्ति में २२° खोजो )। २२° के नीचे मेघ की सीध मे ५-५६-० लिखा हुआ मिला। इसमें अपना इष्ट काल जोड़ो। मान लो अपना इष्ट काल ८-४० बजे रात का है। उस, दिन सूर्योदय ५-३१ पर था तो ८-४० में १२ घंटा जोड़ के सूर्योदय घटाया और उसके घड़ी पल बनाये तो इष्ट ३७-५२-३० हुआ। इसमें ऊपर का प्राप्त सारिणी अंक ५-५६-० जोड़ो तो ४३-४८-३० घड़ी हुई। अब

चं० मि०च० प०
८-४०१५ घण्टा = ३७-३०
+ १२ - ०९ मिनट = ०-२२-३०
जन्म=२०-४०= इष्ट = ३७-५२-३०
सूर्योदय ५-३१+ सारिणी अंक ५-५६-०
मेघ=१५-१९= ४३-४८-३०

सारिणी के भीतर खोजो इस अंक के समीप का अंक कहाँ है, सारिणी में इसके समीप का ४३-५२-० मिला। अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक ४३-४८-३० है। इनके समीप का यही ४३-५२-० मिलता है। इसके आगे / ४४-१०-२० अंक है वह बहुत अधिक है, इस कारण ४३-५२-० को ही लिया। अब इस अंक के वार्ड और देखा दृषिचक राशि है और ऊपर अंश देखा तो २२° मिला। इससे प्रगट हुआ कि दृषिचक लग्न २२° भुक्त हुए हैं। या लग्न ७ रा० २२° है।

१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अब लग्न कुण्डली में लग्न के स्थान पर वृश्चिक के ८ अंक रख कर पूर्व बताई रीति से पूरी कुण्डली बना लो।

लग्न सारिणी से लग्न देखने की रीति यह है कि उस दिन का सूर्य जिस राशि अंश पर है पंचांग से देख लो। समझो किस राशि के कितने अंश भुक्त हुए हैं। जैसे सूर्य रा० १०-२५° दिया है तो मकर राशि भुक्त होकर कुम्भ के २५° भुक्त हुए हैं, यहाँ सूर्य की राशि कुम्भ लेगे। खड़ी बाईं ओर की पंक्ति में सूर्य की राशि मिलेगी और ऊपर आड़ी पंक्ति में अंश मिलेंगे। खड़ी पंक्ति में वर्तमान राशियों के नाम और भुक्त राशियों के अंक दिये हैं जैसे ६ तुला, यहाँ ६ कन्या राशि भुक्त हो गई है और तुला राशि वर्तमान है ऐसा समझना। सूर्य की जो राशि वर्तमान हो उसको खड़ी पंक्ति में खोज कर उसके आगे दाहिनी ओर सीध में और सूर्य के इष्ट अंकों के नीचे जो अंक में मिले उसमें इष्ट काल जोड़ लो। यदि इष्ट काल जोड़ने से ६० घड़ी से अधिक इष्ट काल हो जाता है तो उसमें से ६० घड़ी निकाल दो ( घटा दो ) और शेष ( बचे हुए ) अंक लो। फिर इष्ट भुक्त प्राप्त सारिणी अंक को सारिणी में खोजो। इससे मिलता जुलता और इससे कम अंक जहाँ मिले उसके बाईं ओर, लग्न की राशि और सबसे ऊपर सीध में अंश लिखा मिलेगा, वही लग्न होगी। जैसे ३ कर्क लिखा हो और ऊपर १४ अंश लिखा हो तो लग्न राशि ३-१४° समझना अर्थात् कर्क के १४° भुक्त हो गये हैं। कुण्डली में यही कर्क लग्न लिखना जैसा ऊपर उदाहरण देकर समझा दिया गया है।

जन्मसमय बहुधा चंटा मिनट में दिया रहता है, यह बहुत साधारण समय है। वास्तव में समय कई प्रकार के हैं। जन्मन की दूसरी लड़ाई के समय यहाँ का प्रचलित स्टेण्डर्ड टाइम १ घण्टा बढ़ा दिया गया था अर्थात् वरमा का स्टेण्डर्ड टाइम भारतवर्ष भर में प्रचलित कर दिया गया था। इस टाइम से स्टेण्डर्ड टाइम पृथक् है। घूघ घड़ी के अनुसार ( लोकल टाइम ) स्थानिक समय पृथक् है। यहाँ तो केवल प्रारम्भिक बातें बताई जा रही हैं जिसके समझने में नवीन विचार्यों को सरलता हो। समय का सूक्ष्म ज्ञान गणित खंड में मिलेगा।

संग्रह कुंडली बनाना

अभी तक लग्न निकाल कर कुंडली चक्र में राशियों स्थापित करना ही बताया है, उसमें यहाँ की स्थिति विचार कर ग्रह स्थापित करने को रह गया है। कुंडली में ग्रह कैसे रखना यहाँ बतलाते हैं।

मान लो बौधाख भुक्त ३ संभवत २०००, जन्मसमय ८ घं० ४० बजे रात्रि की कुंडली बनाना है। लग्न सारिणी देखने से ८-४० बजे वृश्चिक लग्न आई थी वृश्चिक लग्न होने से लग्न कुंडली में, लग्न स्थान में ८ रखकर शेष राशियाँ शेष स्थानों में भर दीं। अब ग्रह भरने के लिये पंचांग देखो। उस दिन प्रातः काल रवि स्पष्ट में

अध्याय २२ : १२३

लग्न कुंडली

सूर्य रा०-२२°-३५'-१" दिया है अर्थात् मीन गत होकर मेष राशि पर सूर्य है। इससे जहाँ मेष का अंक १ लिखा है वहाँ सूर्य लिख दिया। अब चंद्र को देखा तो उस दिन ३१ घं० ४५ प० उपरांत मिथुन राशि में आया है। अपना इष्ट काल ३७ घं० ५२ प० ३०

वि० है यह ३१-४५ से अधिक है। इस कारण चंद्र मिथुन राशि पर आ गया है, इससे मिथुन के अंक ३ के कोठे में चन्द्र रखा।

शेष ग्रह साप्ताहिक ग्रह चक्र देखकर भरना पड़ता है। पंचांग में वैशाख शुक्ल ८ बुधवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है और इसके पहिले चैत्र कृष्ण ३० (अमावस) मंगलवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है। अपना जन्मसमय इन दोनों के बीच का है। दोनों चक्रों को देखो उनमें क्या अंतर है। चन्द्र और सूर्य ग्रह तो पहिले लिख चुके हैं, शेष ५ ग्रह और लिखना है।

वैशाख कृष्ण ३०

वैशाख शुक्ल ८

इन दोनों चक्रों में वे ग्रह जिनमें कोई अंतर नहीं है ये हैं—२ बु० ११ मं० ३ गु० २ श० ४ रा० १० के०। इस कारण ये ग्रह अपनी कुंडली में भी इन्हीं स्थानों में लिख देंगे। अब केवल शुक्र ग्रह लिखने को रह गया है, क्योंकि पहिली कुंडली में शुक्र बुधराशि में है और दूसरी कुंडली में शुक्र मिथुनराशि में आ गया है। यह कब बदला है पंचांग देखो। अब देखना है कि यह अपने इष्ट काल के पहिले बदला है या उसके उपरांत। पंचांग के तिथिपत्र के अंत में ये सब सूचनाएँ मिलती हैं।

पंचांग में वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को मिथुने शुक्र: २७-१७ लिखा है अर्थात् वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के २७-१७ इष्ट पर मिथुनराशि पर शुक्र आया है। इससे प्रगट हुआ कि इष्ट काल के प्रथम ही मिथुनराशि पर शुक्र आ गया है। इससे शुक्र को मिथुन

१२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

राशि पर ही लिखना पड़ेगा। इस प्रकार सब ग्रह लिख देने पर अपनी लग्नकुंडली तैयार हो गई।

लग्न कुंडली

चन्द्र कुंडली

अब चन्द्रकुंडली तैयार करना है। चन्द्र मिथुनराशि का है। इस कारण चन्द्र की राशि मिथुन, लग्न स्थान में लिखो और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर कर, लग्नकुंडली के अनुसार ही ग्रह भर दो तो चन्द्रकुंडली बन जायगी। अर्थात् लग्न ८ की जगह चन्द्र की राशि ३ लिख कर शेष सब राशियाँ ग्रह सहित लग्नकुंडली के अनुसार ही लिख देना पड़ता है। चन्द्र कुंडली में केवल राशियों के स्थान में परिवर्तन हुआ है और कोई अंतर नहीं पड़ता जैसा ऊपर बताया है।

चन्द्रकुंडली को राशिकुंडली भी कहते हैं। मनुष्य के शरीर से जैसा लग्न का सम्बन्ध है उसी प्रकार चन्द्र का भी सम्बन्ध है। विशेष कर चन्द्रग्रह मन का चोतक है। जन्म के चन्द्र से गर्भाधान काल का लग्न से विशेष सम्बन्ध रहता है। इस कारण लग्नकुंडली के साथ-साथ चन्द्रकुंडली भी स्थापित की जाती है।

ऊपर जो कुंडली बनाने की रीति समझाई गई है यह कुंडली, जन्म (जन्म पत्र बनाना), वर्ष (वर्ष फल बनाना), प्रश्न (किसी प्रश्न के निर्णय करने के समय) इत्यादि के सम्बन्ध से जहाँ जैसी आवश्यकता हो बनाई जाती है और उस पर से फल कथन किया जाता है। इस कारण यह कुंडली बहुत महत्व की होती है, यह जितनी शुद्धता पूर्वक बनाई जा सके उतना ही शुद्ध फल होगा।

अध्याय २३

राशियाँ और कालाङ्क

कालाङ्क (काल पुरुष का अंग)

प्रत्येक राशियाँ का प्रभाव अंग के विशेष भाग में पड़ता है। काल पुरुष के किस अंग के विभाग में कौन राशि विशेष प्रभाव डालती है यह जानना चाहिये। कालपुरुष

राशियों और कालांग : १२५

के अंग और राशियों से सम्बन्ध है, इस कारण कालांग यहाँ बतलाते हैं। लग्न के विभाग के अनुसार लग्न से या मेष से क्रमानुसार गिनने पर शरीर में इन राशियों का स्थान कहाँ पड़ता है, नीचे बताया है।

लग्न मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुष मीन या राशि

मुख्य अंगसिरमुखकंधाहृदयपेटकमरवस्तिगुह्योन्मिषजांघघुटनाटांगपैर
गलाबाहुछातीकलेजामूत्रपिंड
FaceArmsBreastStomackHeartPelvisReinsPrivate partsThighKnees
neckanusectLegs
Feet

ऊपर चक्र में इन राशियों या भाव का प्रभाव अंग विशेष में बताया है, परन्तु इसके अतिरिक्त ये और भी अंगों पर प्रभाव डालते हैं इस कारण इनको और भी समझाते हैं।

१ मेष—इसका प्रभाव विशेष कर मस्तक पर पड़ता है। भौंह के ऊपर के भाग पर इसका प्रभाव जानाना। सिर और भेजा, मेधाशक्ति आदि इसके अंतर्गत हैं।

२ वृष—भींह के नीचे मुख, नेत्र, चेहरा, गला इसमें शामिल हैं। इसका प्रभाव ग्रीवा ( गर्दन ) तक है।

३ मिथुन—दोनों हाथ, कंधे, भुजा, और छाती की ओर के भाग तक इसका प्रभाव है। इसका प्रभाव फेफड़े गला वाणी पर भी पड़ता है। दोनों छातियों में भी प्रभाव करता है। ग्रीवा और छाती के बीच के भाग पर इसका प्रभाव पड़ता है।

४ कर्क—हृदय, वित्त, दोनों छाती और जठर (पेट की अग्नि) पर प्रभाव पड़ता है।

५ सिंह—कुक्षि ( कूख-कोखा ), पीठ, पेट, हृदय, रक्त स्थान, कलेजा पर प्रभाव करता है।

६ कन्या—कमर, पेट की अंतर्द्वियाँ और जठर पर भी प्रभाव करता है।

७ तुला—मूत्राशय, गुदा, वस्ति, पेट; नाभि, कटि आदि पर इसका प्रभाव पड़ता है। नाभि के नीचे लिंग स्थान के ऊपर के भाग में इसका प्रभाव है। यह हाथ के पंजे पर भी प्रभाव डालता है। त्वचा पर भी प्रभाव करता है।

८ वृश्चिक—गुह्योन्मिष, मल मूत्राशय ( गुदा लिंग ) आदि पर इसका प्रभाव है।

९ धन—दोनों जंघाओं पर इसका प्रभाव है। शरीर का नाड़ी चक्र ( Artrial system ) धमनी चक्र आदि पर भी प्रभाव डालता है।

१० मकर—दोनों घुटने, हड्डी, हृद्वियों की संधि, पर प्रभाव डालता है।

१२६ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

११ कुम्भ—टाँग, घूटने के नीचे का भाग पिङ्गली आदि पर और रक्त के बहाव पर प्रभाव डालता है। मञ्जा तंतु और नेत्र पर भी प्रभाव डालता है।

१२ मीन—दोनों पैर के पंजें, पैर की अँगुली आदि पर प्रभाव करता है। यह आँत और पेट में भी प्रभाव करता है।

यह प्रभाव लग्न से या गत राशियों के अनुसार पड़ता है।

इनका उपयोग

मान लो किसी के जन्मसमय भेद का सूर्य हो, भेद का सूर्य उच्च का होता है (जैसा आगे बताया है) तो वह मनुष्य बड़े मस्तक वाला होगा। अपने मस्तक-बल से धनोपार्जन करेगा। यह मन्त्री आदि बड़े ओहदे पर भी हो सकता है।

किसी राशि में कोई पापग्रह (यह आगे समझाया है) हो तो उन राशियों से जिस अंग का बोध होता है, उस अंग में व्रण (फोड़े) आदि होंगे या उस अंग में कोई ग्रह जनित बाधा उपस्थित होगी, जैसे भेद का मंगल पड़ा है तो, भेद से सिर पीड़ित होगा। यदि जन्मकाल में, लग्न में भेद राशि हो और उसमें मंगल हो तो उसके सिर में चोट आदि का भय हो। जन्म समय जिस राशि में पाप ग्रह हों उस राशि का बतलाने वाले अंश में मसादि चिह्न होंगे। उसी प्रमाण से जिस राशि में पाप ग्रह हो या रवि-चन्द्र * पीड़ित हो उस राशि के अंग विभाग में रोग होगा।

भाव के अनुसार कालांग

ऊपर राशि के सम्बन्ध से कालपुरुष के अंग बताये हैं वे अंग लग्नादि भाव से भी सम्बन्ध रखते हैं और समस्त भाव के सम्बन्ध से भी शरीर के अंगों पर प्रभाव पड़ने का विचार किया जाता है।

जैसे मिथुन लग्न है यह जातक (जिसकी जन्मकुण्डली है) का सिर हुआ। उस स्थान पर कोई ग्रह नहीं हो तो सिर में कोई चिह्न होगा। मान लो लग्न में युध्द है, युध्द शुभ ग्रह होने से उसका कपाल या सिर सुन्दर होगा। दूसरे स्थान में कर्क राशि है और कोई ग्रह नहीं है वह मुख का स्थान है, इस कारण मुख स्वच्छ होगा। तीसरा स्थान कंघा या बाहु पर प्रभाव करता है, तीसरे में सिंह है और कोई ग्रह नहीं है तो बाहु स्वस्थ होंगे। छठा स्थान का प्रभाव कमर पर होता है। मान लो छठे भाव में वृश्चिक राशि है और इसमें चन्द्र है तो उसे खाज गजकर्ण आदि रोग कमर में होंगे, परन्तु चन्द्र शुभ ग्रह होने से अपनी दशा में उस रोग को अच्छा करेगा, इत्यदि, प्रकार से भाव के सम्बन्ध में भी विचार होता है।

  • दिप्पणी—सूर्य चन्द्र पाप ग्रह से युक्त हों या ग्रहण से युक्त हों या कोई ग्रह युद्ध में पराजित, केतु से धूम्रित ग्रह और उल्कापात वाला ग्रह पीड़ित कहलाते हैं। इसका स्पष्टीकरण पृथक् खण्ड में होगा।

राशियाँ और कालांग : १२७

राशि के सम्बन्ध से विचार करने में उस राशि पर कोई पाप या शुभ ग्रह प्रभाव करता है तो उस राशि के सम्बन्ध से वैसा अच्छा या बुरा फल होता है, जैसे वृष राशि पर कोई पाप ग्रह हो, पाप ग्रह होने से कंठ-विकार उत्पन्न करेगा क्योंकि वृषराशि कंठ आदि पर प्रभाव डालती है। पाप ग्रह उन राशियों के सम्बन्धी अंग में अपनी दशा में अपने पदार्थ द्रव्य आदि से रोग उत्पन्न करते हैं। ग्रहों के पदार्थ द्रव्य आदि आगे दिये हैं।

मान लो मिथुन राशि पर जन्मसमय चन्द्र या सूर्य है, उस पर शनि या मंगल की दृष्टि हो या वहाँ पर ये ग्रह हों तो छाती फेफड़ा सम्बन्धी रोग बमा आदि उत्पन्न करेंगे। कर्क का प्रभाव दोनों छाती पेट पाचन-इन्द्रिय पर भी होता है और स्त्रियों के शरीर में दुग्ध उत्पन्न करने के स्थान पर भी प्रभाव करता है। कर्क स्त्री राशि है, तो यह स्त्रियों के उस अंग सम्बन्ध से सब प्रकार की नैसर्गिक दुर्बलता उत्पन्न करता है। वहाँ कोई पाप ग्रह होने से रोग उत्पन्न कर देता है। सिंह का प्रभाव पेट में आहार-विहार पर भी होता है, पाप ग्रह के प्रभाव से पेट में रोग उत्पन्न करेगा। इस राशि वाले को गरम पदार्थ चाय शराब आदि त्यागना चाहिए और आहार-विहार नियमित रखना चाहिए। इसी प्रकार कन्या राशि के सम्बन्ध से संग्रहणी अंब, बड़कोष्ठ और पेट मूला उत्पन्न होता है। तुला मूत्राशय का विकार मधु मेह सब प्रकार के प्रमेह आदि उत्पन्न करती है। इस राशि से त्वचा सम्बन्धी रोग भी उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक के सम्बन्ध से साथी का रोग इसे जल्दी लगता है। बुरे ग्रह का प्रभाव इस पर होने से गुणोद्भिन्न सम्बन्धी रोग होते हैं। धन में पाप ग्रह का प्रभाव होने से जाँघों में खून के विकार होते हैं। मकर राशि पर बुरा प्रभाव होने से सर्दी का विकार रक्ताभिषरण सम्बन्धी दोष संधि बात, बड़कोष्ठ का त्वचा रोग उत्पन्न होते हैं। कुम्भ में पाप ग्रह हो तो घुटना पैर मज्जा तंतु आदि पर प्रभाव डालता है। यह नेत्र विकार और रक्त दोष भी उत्पन्न करता है। मीन राशि पर पाप ग्रह का प्रभाव हो तो आंत के रोग, संधिवात ठंड के विकार, पेट या दबे भी उत्पन्न होते हैं।

ऊपर जो एक राशि के या भाव के अंग बतलाये हैं उसमें १ से १५° तक दाहिना भाग अंग का समझना और उपरान्त ३०° तक बायां भाग समझना। जब इन अंगों में दाहिने या बायें से किसी भाग पर ग्रह प्रभाव डालेगा, यह जानना है तो उस राशि के अंशों के २ भाग कर दो, आधा भाग पूर्वदिर्घ को दाहिना और उत्तरार्द्ध को बायं भाग समझना।

१२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय २४

राशि गुण-धर्म

प्रत्येक राशियों के पृथक्-पृथक् गुण और धर्म हैं। ये राशियाँ सम हैं या विषम, स्त्री हैं या पुरुष हैं, इनमें कौन तत्व की प्रधानता है, अल्प सन्तान या अधिक सन्तान देती है या बन्ध्या राशि है। स्वभाव क्रूर है या सौम्य है। इसका प्रभाव किस दिशा में होता है और बात पित्त कफ सम्बन्ध से इनकी प्रकृति कैसी है, ब्राह्मण आदि कौन जाति की यह सूचक है। इसका रंग क्या है, जाति कैसी है, किस समय वह राशि बलवान रहती है और जल थल वन आदि में कहीं विचरने वालों पर प्रभाव रखती है या उनमें से किस प्रकार के लोगों से इसका सम्बन्ध है यह सब राशियों के गुण धर्म जानने से प्रगट होता है।

इसका उपयोग आगे बहुत पड़ेगा, जैसे अनि और वायु वाली राशियों की आपस में मित्रता होती है। भूमि और जल वाली राशियों की मित्रता होती है, परन्तु औरों की आपस में मित्रता नहीं रहेगी। पुरुष राशियों की पुरुष से, स्त्री राशियों की स्त्री राशि वालों से मित्रता होगी। पंचम स्थान सन्तान सूचक है, उसमें मीन राशि हो तो यह मीन राशि बहुप्रसव होने से अधिक सन्तान होगी। यदि उस पर शुभ ग्रह की या इसके भाव स्वामी की इस पर दृष्टि हो (दृष्टि सम्बन्धी विचार आगे मिलेगा) तो अवश्य बहुत सन्तान होगी। इसी प्रकार प्रत्येक राशियों के सम्बन्ध से जब विचार करने की आवश्यकता होती है तो उन राशियों के गुण-धर्म पर अवश्य विचार करना चाहिये, इसी कारण इनका जानना आवश्यक है।

कोई प्रश्न, वर्ष या जन्म के समय विचारने में इनकी आवश्यकता होती है जैसे क्रूर राशि है तो क्रूर स्वभाव होगा, सौम्यराशि से सौम्य स्वभाव होगा। प्रश्नसमय चरराशि हो तो जिस सम्बन्ध से विचार कर रहे हो वह चलता-फिरता होगा, स्थिर राशि होने से वह स्थिर होगा। यदि उस समय राशि द्विस्वभाव राशि का लग्न हो तो दोनों मिला हुआ फल अर्थात् कभी चलता कभी स्थिर होगा। कौन चोर है, चोर की जाति आदि निर्णय में, राशि की जाति स्त्री है या पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि व घन कहाँ होगा, कर्क राशि है तो जल समीप होगा इत्यादि बातों के विचारने में यह सहायक होता है। इस कारण राशियों का गुण-धर्म चक्र आगे दिया है।

राशि गुण-धम : १२९

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८४

१३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान वण्ड

राशियों के भिन्न-भिन्न नाम

कभी-कभी राशियों के चालू नाम के अतिरिक्त और भी नाम ज्योतिष ग्रन्थों में उपयोग में आते हैं, उन्हें भी जान लेना चाहिए।

  1. १ मेघ—अज, वस्त, प्रथम, क्रिय।
  2. २ वृष—उत्सा, गौ, तानुरि, मुक्कम।
  3. ३ मिथुन—बोध, न्युगम, जिलुम, तृतीय।
  4. ४ कर्क—बांद्र, कुलीर, चतुर्थ।
  5. ५ सिंह—कंठीरव, लेप।
  6. ६ कन्या—पाथोन, षष्ठी, अबला, तन्वी।
  7. ७ तुला—जूक, वणिक, सप्तम, तौलि।
  8. ८ वृश्चिक—कौप्य, अष्टम, कोज, अलि।
  9. ९ धन—जैव, धनु, तौक्षिक, चाप।
  10. १० मकर—आकेकर, दशम, चक्र।
  11. ११ कुंभ—हृद्दरोग, घट।
  12. १२ मीन—रिक्त, क्षय, अन्तिम।

अध्याय २५

ग्रह विचार

भाव फल विचार करने के लिए आवश्यक बातें।

किसी भाव का फल जानने के लिए इन बातों के विचार करने की पहिले बड़ी आवश्यकता होती है।

  1. १—ग्रह शुभ है या पाप ग्रह।
  2. २—उस भाव का स्वामी कौन है।
  3. ३—भाव-स्वामी पाप ग्रह है या शुभ ग्रह है।
  4. ४—उस भाव पर कौन-कौन शुभ या पाप ग्रह की दृष्टि है।
  5. ५—उस भाव का स्वामी और उस भाव में स्थित ग्रह इन दोनों की मैत्री।
  6. ६—उस भाव में स्थित ग्रह उच्चबल ( ऊँचाबल ) या न्चबल ( नीचाबल ) का है।
  7. ७—वह अपने घर में है ( स्वगृही ) या मूल त्रिकोण में है।

ग्रह विचार : १३१

८—उस ग्रह के गुण धर्म क्या हैं ।

इत्यादि बातें विचार कर ग्रह फल कहना पड़ता है, इस कारण इन सबको आगे समझायेंगे ।

ग्रहों का शुभस्त पापत्व, स्वगृह ( अपना घर ) या भाव स्वामी विचार ग्रहों की उच्च नीच मूल त्रिकोण राशियाँ, ग्रहों की मंजी, ग्रहों की दृष्टि, ग्रहों के गुण-धर्म आदि आवश्यक बातें प्रत्येक ज्योतिषी को स्मरण रखनी चाहिए, बिना इसके जाने काम नहीं चलता ।

(१) ग्रह का शुभाशुभत्व विचार

ग्रह ३ प्रकार के हैं (१) शुभग्रह (२) पाप ग्रह या क्रूर ग्रह ( अशुभ ग्रह ) और (३) मिश्रग्रह ।

१ शुभ ग्रह benefic—गुह और शुक्र सर्वत्र शुभ ग्रह समझे जाते हैं ।

२ पाप ग्रह malefic—रवि, मंगल, शनि, राहु, केतु, हर्षल और नेपच्युन । ये अशुभ ग्रह हैं इस कारण इनको पाप या क्रूर ( दुष्ट ) ग्रह कहते हैं । ये सर्वत्र पाप ग्रह ही समझे जाते हैं ।

३ मिश्र ग्रह mixed—बुध और चन्द्र ये संयोगवश कभी पाप ग्रह कभी शुभ ग्रह समझे जाते हैं, इस कारण इनको मिश्र ग्रह कहते हैं । वास्तव में ये दोनों शुभ ग्रह ही हैं, परन्तु जब ये पाप ग्रह के साथ होते हैं तो पाप ग्रह और अकेले या शुभ ग्रह के साथ रहते हैं तो शुभ ग्रह कहलाते हैं । इनके सम्बन्ध में विशेष विचार नीचे दिया है ।

(१) बुध—यह शुभ ग्रह से युक्त ( साथ ) या दुष्ट ( शुभ ग्रह की दृष्टि उस पर हो ) या शुभग्रह से किसी प्रकार सम्बन्ध हो तो शुभ फल देता है । पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो अशुभ फल देता है । बुध अकेला हो और अस्तंगत ( सूर्य के साथ ) न हो तो शुभ फल देता है ।

(२) चन्द्र—शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक शुभ है, इसके उपरान्त पाप ग्रह समझा जाता है । किसी के मत से चन्द्र शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक मध्यम बलवान होता है, परन्तु उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होने से बलिष्ठ होता है । शुक्ल दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण बलवान होता है । कृष्ण पक्ष की पञ्चमी के आगे १० दिन तक बलहीन होता है ।

(२) ग्रहों का स्थान या स्वगृह Planetary ownership or Lord of houses स्वगृह—अपना घर । स्वक्षेत्र अपना स्थान । गृह—घर ।

यद्यपि ग्रह सूर्य के आस पास घूमते हैं, परन्तु सुविधा के लिए पृथ्वी के आसपास आकाश में चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि क्रमानुसार घूमते हुए मान लिए गए हैं । देखो चित्र संख्या ५ ।

इन ग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा का एक-एक अपना (निजी) घर है, और ग्रहों के

१३२ : सचिन्द्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

२-२ घर राशि चक्र में हैं। इन घरों को स्वगृह कहते हैं। कौन कौन राशि किस प्रकार किस ग्रह के वांटे में आईं आगे समझाते हैं।

पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह चन्द्र है; इसका प्रभाव सीधे मन पर अर्थात् हृदय पर पड़ता है। राशि चक्र में कालांग विषय में बता चुके हैं कि हृदय का छोटका राशि कर्क है, इस कारण चन्द्र का स्वस्थान कर्क राशि मानी गयी है।

चन्द्र के आगे सबसे शक्तिशाली ग्रह सूर्य है। सूर्य का प्रभाव आत्मा पर पड़ता है और सिंह राशि आत्मा का सूचक है, इस कारण सिंह राशि सूर्य का स्वस्थान माना गया है। कर्क के उपरान्त सूर्य की सिंह राशि आती है। सूर्य के पास बुध है इस कारण उनके दोनों बाजुओं की राशि मिथुन और कन्या इन दोनों का स्वामी बुध हुआ अर्थात् बुध को ये २ घर मिले। यह सूर्य के पास होने से बुध को युवराज कहते हैं।

बुध के उपरान्त शुक्र ग्रह है, इसे दोनों ओर की २ राशियाँ वृष और तुला मिलीं, इस कारण शुक्र इन २ राशियों का स्वामी हुआ। शुक्र के आगे मंगल है, इसे आगे की २ राशियाँ मेष और वृश्चिक मिलीं इस प्रकार इन २ राशियों का स्वामी मंगल हुआ।

इसके आगे गुरु है उसे आगे की २ राशियाँ मीन और धन मिलीं, इस प्रकार गुरु इन २ राशियों का स्वामी हुआ।

चित्र-७१ ग्रहों के घूमने का क्रम और स्वराशि

गुरु के आगे आकाश में छोर पर शनि है, इसे आजू-बाजू की शेष २ राशियाँ कृष और मकर मिलीं। चित्र संख्या ७१ और ७२ देखने से ये सब समझ में आ जायगा कि किस क्रम से कौन २ राशियों का स्वामी कौन ग्रह हुआ। चित्र संख्या ७१ में बताया है कि यह किस प्रकार घूम रहे हैं और इनको २-२ राशियों किस

ग्रह विचार : १३३

प्रकार से मिली हैं। चित्र ७२ में स्पष्ट रूप से समझ में आ जायगा कि ग्रहों को किस प्रकार राशियाँ मिली हैं।

चित्र-७२ ग्रहों की स्व राशि

इस प्रकार ये राशियाँ, इन ग्रहों के स्वस्थान हुए और इन्हीं स्थानों के स्वामी ये ग्रह हुए। स्वगृह को स्वक्षेत्र भी कहते हैं। जो ग्रह अपने स्थान में होता है वह स्वगृही या स्वक्षेत्री कहलाता है।

ग्रहों के स्वस्थान या स्वक्षेत्र

गृह स्वामीसूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतुहर्षिलनेपच्यून
स्वस्थान१०१२१११२
की राशियाँ१२११

भावस्वामी या गृहस्वामी Sign ruled by the planet

जिस भाव अर्थात् जिस स्थान में ये राशियाँ रहती हैं उस भाव या स्थान के जो ग्रह स्वामी होते हैं वे ऊपर चक्र में बताये हैं। ये ग्रह स्वामी कहलाते हैं, इनको गृह स्वामी भी कहते हैं। गृहस्वामी का उदाहरण देकर समझाते हैं।

यहाँ लग्न वृषिचक्र है तो वृषिचक्र राशि का स्वामी मंगल होता है, मंगल वृषराशि में बैठता है, वृष राशि शुक्र का स्व-गृह (घर) है, इसलिए कहेंगे कि लगनेश मंगल शुक्र के