सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
(४) नक्षत्र-इसके उपरान्त नक्षत्र दिये रहते हैं। नक्षत्रों के नाम संकेताक्षरों में दिये रहते हैं। जैसे अ=अश्विनी, भ=भरणी, क=कृतिका इत्यादि। इन नक्षत्रों के नाम अच्छे प्रकार स्मरण रखना चाहिए। सब के नाम क्रम पूर्वक दिये रहते हैं। इसमें अभिजित नहीं रहता, २७ ही नक्षत्र दिये रहते हैं।
कभी-कभी एक ही संकेताक्षर के २ नक्षत्र होते हैं, परन्तु किसके बाद कौन नक्षत्र आता है स्मरण रखोगे तो भूल नहीं होगी। जैसे आ=आर्द्रा के बाद पु=पुनर्वसु, इसके बाद पु=पुष्य। इसी प्रकार पूर्वा और उत्तरा ३ बाद आता है। कहीं-कहीं पूर्वा को पू० और उत्तरा को उ० ही दिया रहता है। यदि क्रम स्मरण रहे तो कभी भूल नहीं होगी। जैसे माघ के बाद फाल्गुन आता है उसी प्रकार म=मघा के उपरान्त पू=पूर्वा फाल्गुनी, उ=उत्तरा फाल्गुनी आते हैं। जिस प्रकार जेठ के बाद असाढ़ आता है उसी प्रकार ज्येष्ठा और मूल के बाद पूर्वाषाढ़ा आता है। ज्ये=ज्येष्ठा, मू=मूल के बाद, पू=पूर्वाषाढ़ा, उ=उत्तराषाढ़ा होगा। श्रावण के बाद भाद्रपद मास आता है उसी प्रकार श्रवण धनिष्ठा शतभिषा के उपरान्त पूर्वा भाद्रपद आयगा। श्र=श्रवण, ध=धनिष्ठा श=शतभिषा, पू=पूर्वाभाद्रपद, उ=उत्तरा भाद्रपद है। अन्त में रे=रेवती आती है, अश्विनी और अनुराधा दोनों के लिए म० लिखते हैं। रेवती के बाद अ=अश्विनी, विशाखा के बाद अ=अनुराधा होता है। कभी-कभी अनुराधा को अनु भी लिख देते हैं।
पंचाङ्ग में कभी-कभी एक नक्षत्र ६० घड़ी से अधिक रहने के कारण दूसरे दिन भी दिया रहता है। नक्षत्र के आगे घड़ी पल दिए हैं जिससे प्रगट होता है कि सूर्योदय उपरान्त वह नक्षत्र उस दिन उतने घड़ी पल तक रहेगा उसके बाद आगे के नक्षत्र का भोग समझना। जैसे सोमवार को मघा ६-५७ है तो सूर्योदय से ६ घ० ५७ प० बाद तक मघा नक्षत्र रहेगा, उसके बाद आगे का नक्षत्र पूर्वा फाल्गुनी उसी दिन लग जायगा। दिन रात के ६० घड़ी में से ६-५७ घटा दो तो शेष ५३ घ० ३ पल तक उस दिन पूर्वा फाल्गुनी रहेगा। अब देखना है कि पूर्वा फाल्गुनी कब तक और है। उसके आगे दिन मंगलवार को देखा तो पूर्वा फा० १३।२४ लिखा है अर्थात् मंगलवार को पू० फा० इतना और है। पू० फा० सोमवार को (५३-३) + मंगलवार को (१३-२४) = योग ६६ घ० २७ प० यह पूर्वा फाल्गुनी के पूरे भाग का मान हुआ। इसे भभोग अर्थात् पूर्ण नक्षत्र का भोग कहते हैं। पूर्ण नक्षत्र की जितने घड़ी पल भोग हो उसे भभोग या सर्वर्ध भी कहते हैं। जितना नक्षत्र व्यतीत हो चुका अर्थात् भूक्त हो चुका उसे भयात (भभूक्त) या भूक्तर्ध या गतर्ध कहते हैं। भोगने को जो घड़ी पल शेष रहे उसे भोग्य या भोग्यर्ध कहते हैं। श्रद्धा=नक्षत्र। भूक्त + भोग्य=भगंभग्य=सर्वर्ध=पूरा नक्षत्र। भूक्त=भयात भूक्तर्ध=गतर्ध=जितनी घड़ी व्यतीत हो गई। भोग्य=भोग्यर्ध=जितनी घड़ी व्यतीत होने को शेष रही।
(५) योग—इसके आगे योगों के नाम दिये रहते हैं। योगों के नाम पहिले दे
पंचांग कैसे देखना और उपयोग : ९५
चुके हैं। पंचांग में योग के नाम का संकेताक्षर दिया रहता है। उनका क्रम स्मरण रखने से जाना जा सकता है कि संकेताक्षर किस नाम का सूचक है। इसमें कई जगह भूल हो जाना संभव है—जैसे हर्षण के बाद वन्वच्च, ध्यतीपात के बाद व वरीयान। साध्य के बाद शु=गुभ, फिर शु=शुक्ल। वच्च के बाद सि=सिद्धि, शिव के बाद सि=सिद्ध। ८३ अतिगंड। ऐसी अवस्था में आगे पीछे के संकेताक्षर देखकर बीच में कौन योग है जान सकते हैं।
पंचांग में क्रम देखते समय इसका भी ध्यान रहे कि बीच के कोई योग तो नहीं छूट गये। क्योंकि जो योग सूर्योदय पर होगा वही पंचांग में बताया जाता है। उसके आगे का और कोई योग भुक्त हुआ हो तो नहीं दिया रहता। परन्तु कोई कोई पंचांग वाले उसकी घड़ी पल भी दे देते हैं। जैसे शनिवार को वं० २-३९। इतवार को वि० १-९ सोमवार को आ० ४८-५७। अर्थात् शनिवार को वैधृति योग २-३९ है। इतवार को विष्कंभ १-९ है। इसके बाद प्रीति योग लगा, परन्तु पंचांग में प्रीति योग नहीं दिया केवल ५३-१५ दिया है। इससे प्रगट होता है कि प्रीति योग ५३-१५ तक है, उपरान्त आयुष्मान् योग लगा और सोमवार को वही आयुष्मान् ४८-५७ तक है। इन घड़ियों के पिछली बताई रीति से घण्टा मिनट बनाकर घड़ी का समय बना लो।
(६) करण—किसी-किसी पंचांग में दोनों करण दिए रहते हैं। पूर्व में जो करण है उसका नाम फिर उसकी घड़ी पल उपरान्त दूसरा करण (जो उत्तरार्द्ध में आता है) वह भी दिया रहता है और उसके घड़ी पल दिये रहते हैं। परन्तु अधिकतर पञ्चांगों में एक ही करण दिया रहता है। सूर्योदय पर जो तिथि होती है उसी तिथि का करण चाहे वह परार्द्ध या पूर्वार्द्ध का हो दिया रहता है। जैसे पञ्चांग में शुक्ल ७ (सप्तमी) ०—९ दिया है तां सप्तमी के अन्त का (उत्तरार्द्ध) करण वणिज होता है वह व. १०—९ दिया रहेगा। क्योंकि ०-९ पर तो तिथि का ही अन्त होने से करण का भी अन्त हो जायगा। मान लो कृष्ण ३ मंगलवार ४४-३७ तिथि दी है तो तीज को पूर्वार्द्ध में वणिज है वह दिया है व० १२-३५= वणिज करण का भोग्यपूर्ण तिथि का आधा दिया है वह इस प्रकार है। द्वितीया ४०-३९ सोमवार को थी ६०-(४०-३९)=१९-२१ तीज सोमवार को+४४-३७ तीज मंगल को=६३-५८ पूरी तीज=आधा ३१-५९ हुआ। मंगलवार को शेष तीज पञ्चांग में (४४-३७)-(३१-५९) आधा १ करण=शेष १२-३८। यह १२-३८ पहिले करण का और शेषने को रहा। इस कारण पञ्चांगमें व. १२-३८ दिया है —४४-३७
१२-३८ भुक्त करण
शेष ३१-५९=आगे का विष्टि करण परार्द्ध में होगा।
(७) दिनमान—इसके आगे पञ्चांग में दिनमान दिया रहता है। किसी-किसी पञ्चांग के अन्त में और किसी में पहिले इसे दे देते हैं। सूर्योदय से सूर्य अस्त तक
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जितने घड़ी पल होते हैं यही दिनमान में दिया रहता है। ६० घटी से दिनमान घटाने से राशि मान होता है।
(८) चन्द्र—आगे चन्द्र की स्थिति दी रहती है। प्रत्येक राशि में चन्द्र कब आता है और कब तक रहता है यह दिया रहता है। पञ्चांग में चौथ शनिवार को वृ. २९-२५ ( चन्द्र ) दिया है। इसका अर्थ यह है कि वृषराशि पर चन्द्र २९ घं. २५ पं. के उपरान्त आवेगा। यहाँ जो घड़ी पल राशि के आगे दिया रहता है उससे समझना कि उस राशि पर उतने घड़ी पल के उपरान्त चन्द्र आयगा। रविवार को वृष पर दिन और रात्रि भर चन्द्र रहा, इसलिए पञ्चांग में केवल वृष दिया है। या कोई राशि का नाम भी नहीं देते, इससे समझना अभी ऊपर बताई राशि पर ही चन्द्र है। सोमवार को मि० १९-२० लिखा है अर्थात् सोमवार को १९-२० तक वृष का ही चन्द्र रहेगा, उसके उपरान्त उसी समय से मिथुन राशि पर चन्द्र आवेगा। इसमें राशि के नाम संकेताक्षर से कभी-कभी दिये रहते हैं जिनसे ही राशि का नाम जान लेना। पहिले का और आगे का संकेताक्षर पढ़ लेने से बीच का संकेताक्षर समझ में आ जाता है।
(९) सूर्यस्पष्ट—इसके उपरान्त मिथकालीन या प्रातः कालीन स्पष्ट सूर्य दिया रहता है। उस दिन प्रातः काल या मिश्र काल पर सूर्य की स्थिति दी रहती है, अर्थात् सूर्य उस समय ठीक किस स्थान पर ( किस राशि, अंश, कला, विकला पर ) है दिया रहता है। इसके आगे सूर्य की प्रतिदिन की गति दी रहती है। प्रतिदिन ६० घड़ी में कितने कला विकला चलता है यह गति दी रहती है। जैसे सूर्य ६-१२-१-५-२८ दिया है तो ६ राशि, १२ अंश, १८ कला, २८ विकला पर सूर्य उस समय है ऐसा समझना। गति ६०-७ दी है तो सूर्य की दिन रात्रि को गति ६० कला ७ विकला समझना। ग्रहों की गति प्रायः कला विकला में दी रहती है।
किसी पञ्चांग में मिश्र मान दिया रहता है और प्रातः काल का सूर्य न देकर मिश्र कालीन सूर्य दिया रहता है।
मिश्रकाल—यह पञ्चांग में दिए हुए ग्रहों का इष्ट काल है जो प्रायः अर्द्ध रात्रि समय का दिया रहता है।
अर्द्ध रात्रि का इष्ट जानना = (३० + दिनमान २) या (६० - रात्रिमान २) मान लो दिनमान ३४-४ है तो दिनार्द्ध = १७.८ हुआ + ३० = ४७ घड़ी २ पल या (६० - ३४-४ दिनमान) = २५-५६ रात्रिमान = रात्रि अर्द्ध १२-५८. ६० - (१२-५८ रात्रि अर्द्ध) = ४७ घड़ी २ पल।
इसीलिए रात्रि अर्द्ध का इष्ट = ४७-२ हुआ, यही साधारण प्रकार से मिश्रमान हुआ। पञ्चांग में उस दिन का ठीक मिश्रमान गणित से निकाल कर दिया रहता है। किसी पञ्चांग में प्रतिदिन का मिश्रमान नहीं दिया रहता।
अर्द्ध रात्रि के लक्षण (मिश्रकाल) में जो सूर्य की ठीक स्थिति होगी वह मिश्र कालीन सूर्य स्पष्ट किसी-किसी पञ्चांग में दिया रहता है। प्रातः काल या मिश्रकाल
पंचांग कैसे देखना और उपयोग : १७
के सूर्य को अपने इष्टकाल (समय) का गणित से बनाना पड़ता है तब इष्ट कालीन सूर्य स्पष्ट कहलाता है। सूर्य दिन रात में जितनी कला विकला चलता है और सूर्योदय से या मिश्र काल से इष्ट तक का अन्तर निकाल कर उस अन्तर की चाल गणित से निकाल कर पञ्चांग में दिए हुए सूर्य में जोड़ने से इष्टकालीन सूर्य स्पष्ट बनता है। इसका गणित उदाहरण सहित गणित खण्ड में मिलेगा।
(१०) इसके उपरान्त प्रतिदिन के सूर्योदय और सूर्यास्त का समय घण्टा मिनट में दिया रहना है।
दिनमान से सूर्योदय या अस्त सरलता से निकल सकते हैं। दिनमान को आधा कर घण्टा मिनट बना लो तो सूर्य अस्त का समय होगा। इसे १२ घण्टा में घटा दो तो उदय का समय घण्टा मिनट में निकल आवेगा। जैसे दिनमान २६ घं १८ प०+ २=१३ घं १५ प०=५४० १५ मि० ३६ से० | १२-०-० सूर्यास्त। १२ घण्टे में से सूर्यास्त घटाया तो ५-१५-३६ सूर्यास्त ६ घं ४४ मि० २३ से० सूर्योदय हुआ। ६-४४-२४ सूर्योदय
(११) अस्त में मुसलमानी तिथि, बंगला तिथि, अंग्रेजी तारीख दी रहती है। अं=अंग्रेजी तारीख। फा=फारसी। ब=बंगला।
(१२) किसी-किसी पंचांग में विशेष योग भी दिये रहते हैं। किसी विशेष तिथि को विशेष दिन या नक्षत्र आदि पड़ने से कोई योग बन जाता है वही आनन्द योग, मृत्यु योग, चर योग, छत्र योग आदि दिये रहते हैं। इन योगों के विषय में पहिले समझा चुके हैं कि ये कब और किस प्रकार बनते हैं।
(१३) किसी-किसी पञ्चांग में सूर्य की उत्तर या दक्षिण क्रान्ति भी दी रहती है। और किसी-किसी में मिश्रकालीन दैनिक चन्द्र स्पष्ट भी दिया रहता है।
(१४) अस्त में एक सूचनापत्र सदृश प्रत्येक दिन के सम्बन्ध में कोई विशेष बात आने पर लिख दी जाती है। जैसे परवा [परिवा] या दोज को जब चन्द्र दिखेगा तो उस दिन चन्द्रदर्शन लिखा रहता है। कोई पर्व त्योहार आदि होता है या कोई जयंती होती है तो वह भी लिख दिया जाता है। अंग्रेजी महिना का अस्त होने पर दूसरा आरम्भ होने वाला महिना या सन् बदलता है तो नया सन् इत्यादि आवश्यक बातें लिखी रहती हैं।
पर्व दिन के अतिरिक्त ग्रहों के योग आदि भी दिये रहते हैं। सूर्यादि ग्रह जब १ राशि या एक नक्षत्र से दूसरी राशि या नक्षत्र पर जाते हैं तो उस दिन उसका समय भी दिया रहता है। इसके अतिरिक्त ग्रहों के उदय अस्त, ग्रहों का वक्री मार्गी होना, ग्रहण आदि और भी ग्रहों के सम्बन्ध की पूरी सूचना रहती है और आवश्यक मुहूर्त या विवाह लग्न आदि सम्बन्ध की सूचनाएँ भी रहती हैं।
कुछ संकेताक्षरों को भी समझ लेना चाहिए जिनका यहाँ उपयोग होता है। सायन मेघाडकं ८-२४ सायन सूर्य की मेघ की संक्रान्ति ८ घं २४ पल पर होगी। मेघे चाकं: ३०-४२=निरयन सूर्य की मेघ राशि की संक्रान्ति ३० घं ४२ प० पर होगी। मिथुने रवि: ६-४८=निरयन सूर्य मिथुन पर ६-४८ पर गया। रोहिण्यां बुध: ५३-२९
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बुध रोहिणी नक्षत्र पर ५३-२९ में गया। धनिष्ठायाः १ चरणे बुधः ४७-११-बुध धनिष्ठा के पहले चरण में ४७-११ पर गया। शतभिषायाः २ चरणेऽर्कः=निरयन सूर्य शतभिषा नक्षत्र के दूसरे चरण में गया। धनिष्ठायास्तृतीयचरणे सं कुम्भेऽर्कः= धनिष्ठा के तीसरे चरण में कुम्भराशि पर निरयन सूर्य की संक्रान्ति हुई। वक्रो भोमः ६-५= ६-५ में मंगल वक्रो हुआ। बुधास्त पश्चिम में=बुध पश्चिम में अस्त हुआ। सकेताक्षरों को एक बार समझ लेने पर फिर बढ़चन न होगी और ध्यान से देखते-देखते सब समझ में आने लगेंगा।
उ=उपरान्त, या=यावत् [इतने समय तक] ३० १५-४० या=भद्रा १४-४० तक रहेंगी। ३० २४-३९ उ भद्रा २४-३९ के उपरान्त होगी।
(१५) पंचाङ्ग के नीचे की ओर गोचर ग्रह कुंडली और साप्ताहिक मिश्रकालीन या प्रातःकालीन ग्रह स्पष्ट और प्रत्येक ग्रहों की दैनिक गति भी दी रहती है। किसी-किसी पञ्चाङ्ग में दैनिक [ प्रतिदिन के ] ग्रह स्पष्ट भी दिये रहते हैं।
ग्रह स्पष्ट—जब किसी विशेष समय पर गणित द्वारा प्रत्येक ग्रहों की गति के विचार में गणित कर ग्रह की ठीक स्थिति निकाल कर रखते हैं तो उससे प्रगट होता है कि कौन-कौन ग्रह उस समय कहाँ कहाँ पर है। और इसे ही उस समय का ग्रह स्पष्ट कहते हैं।
इष्टकाल—कोई समय को, जिस समय के सम्बन्ध में अपने को विचारना है उसे इष्ट समय का काल [इष्टकाल] कहते हैं। जैसे सूर्योदय के बाद ४ घड़ी पर किसी ने कोई प्रश्न पूछा तो उस समय का इष्टकाल ४ घड़ी हुई।
पञ्चाङ्ग में कोई ग्रह मिश्रकाल ४४-३६ के दिये हैं तो कहा जाएगा कि इष्टकाल ४४-३६ के ग्रह स्पष्ट हैं। यदि प्रातः काल के ग्रह स्पष्ट दिये हैं तो इष्ट ०-० का ग्रह स्पष्ट समझा जायगा।
किसी पञ्चाङ्ग में इस प्रकार ग्रह स्पष्ट दिये रहते हैं।
फाल्गुन कृष्ण ८ रवौ मिश्रमान ४४-३६—
गोचर ग्रहाः
| सू | चं | मं | बु | गु | शु | श | रा | के |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | ८ | ९ | २ | ११ | १ | ४ | १० | |
| १६ | १ | २९ | २२ | २० | १४ | १३ | ५ | ५ |
| १९ | २७ | ६ | १० | ४८ | १० | ८ | ४ | ४ |
| ५९ | २४ | २४ | ४९ | २० | ४३ | ३४ | २५ | २५ |
| ६० | ८५ | १३ | ८९ | ३ | ७३ | २ | ३ | ३ |
| १६ | ११ | ५५ | ५६ | १३ | ४४ | २२ | ११ | ११ |
व मा
पंचांग कैसे देखना और उपयोग : १९
पंचाङ्ग में यहाँ फाल्गुन कृष्ण अष्टमी रविवार के इष्ट ४४-३६ का ग्रह स्पष्ट दिया है। ग्रहों की स्थिति इस प्रकार समझना—
| ग्रह | राशि | अंश | कला | वि० | कला | वि० |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | १० | १६ | १९ | ५९ पर है गति | ६० | १६ है |
| चन्द्र | ८ | १ | २७ | २४ ,, ,, | ८५१ | ११ ,, |
| मंगल | ८ | २९ | ६ | २४ ,, ,, | ४३ | ५५ ,, |
| बुध | ९ | २२ | १० | ४९ ,, ,, | ८९ | ५६ ,, |
| गुरु | २ | २० | ४८ | २० ,, ,, | ३ | १३ ,, व=वक्रौ |
| शुक्र | ११ | १४ | १० | ४३ ,, ,, | ७३ | ४४ ,, मा=मार्गी |
| शनि | १ | १३ | ८ | ३४ ,, ,, | २ | २२ |
इसी प्रकार राहु केतु का भी समझना। जहाँ व. लिखा है वहाँ ग्रह की मार्गी गति का अन्त होकर वह ग्रह वक्रौ हुआ है। मा=वक्रौ गति का अन्त होकर वह ग्रह मार्गी हुआ है ऐसा समझना।
यहाँ जो ग्रहों की गति दी है वह दिन रात्रि अर्थात् ६० घड़ी की प्रतिदिन की है। यह गति सदा बदलती रहती है। ग्रह कभी वक्रौ कभी मार्गी हो जाते हैं। ग्रह के नीचे संकेताक्षर में यह ऊपर बताये अनुसार लिखा रहता है। जिसमें वक्रौ या मार्गी कुछ भी न लिखा हो उस ग्रह को मार्गी समझो, परन्तु राहु केतु सदा वक्रौ रहते हैं। किसी पंचांग में ग्रह उदय है या अस्त है यह भी ग्रह के नीचे दिया रहता है, उ=उदय, अ=अस्त, जिनके संकेताक्षर हैं।
ग्रह स्पष्ट के एक ओर गोचर ग्रह कुंडली दी रहती है। यह कुण्डली आकाश का नक्शा है जिसके विषय में आगे समझाया जायगा। पंचांग में मिश्रकालीन या प्रातःकालीन ग्रह स्पष्ट दिये रहते हैं उन्हीं के अनुसार उसके समीप ही कुंडली में स्पूल रूप से ग्रह दिये रहते हैं।
इस कुंडली में १२ राशि के १२ कोठे हैं और उनमें १-२-३ आदि क्रमानुसार राशियों के सूचक अंक लिखे रहते हैं। जैसे १ से मेष, ८ से वृश्चिक इत्यादि। ग्रह जिस राशि पर है उसी राशि के कोठे में वह ग्रह लिख दिया जाता है। जैसे ऊपर ग्रह स्पष्ट देखो सूर्य रा० १०°—१६°—१९—५९ पर है अर्थात् १० राशि व्यतीत होकर ग्यारहवीं राशि के १६° पर सूर्य है, अर्थात् सूर्य ग्यारहवीं राशि ( कुंभ राशि ) पर है। जहाँ ११ का अंक कुंडली में होगा वहाँ सूर्य का संकेताक्षर सू० लिख देंगे। सूर्य प्रधान ग्रह है वह जिस राशि पर रहता है उसी राशि को ऊपर की ओर बीच में लगन के स्थान पर पञ्चांग में लिखने की प्रथा है। चन्द्र धन का है ९ अंक जहाँ है उस कोठे में लिखा। मंगल भी नवीं राशि धन का है ९ में लिखा। बुध मकर का है १० में लिखा। गुरु मिथुन का है ३ में, शुक्र मीन का है १२ में, शनि वृष का है २ में राहु सिंह का है ५ में, केतु कृष्ण का है ११ में सूर्य के साथ लिखा है। इसी प्रकार कुंडली में ग्रह भरने की रीति अच्छीप्रकार से समझ लें। चाहिए।
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कई पंचाङ्गों में गोचर ग्रह स्पष्ट जहाँ दिया रहता है उसमें चन्द्र नहीं दिया रहता तो पंचाङ्ग में उस तिथि को चन्द्र किस राशि पर है यह देखकर गोचर कुंडली में भर देते हैं।
इसी प्रकार प्रति सप्ताह पृथक्-पृथक् गोचर कुंडली और ग्रह स्पष्ट दिये रहते हैं जो लगभग अष्टमी और अमावस्या या पूर्णिमा के होते हैं।
(१६) दैनिक लग्न होरा सारिणी ( होरा=घण्टा )
किसी-किसी पंचाङ्ग में तिथि पत्र के नीचे दैनिक लग्न होरा सारिणी भी दी रहती है, जैसे काशी या जवलपुर आदि के पंचाङ्ग में दिया रहता है। सब के नीचे १ चक्र बना रहता है उसमें १५ तिथि और बार ऊपर लिखा रहता है। उसके वार्यों और बाजू से लग्न की राशियों के नाम और उसके आगे दिन और रात का समय घण्टा मिनट में दिया रहता है। इससे प्रगट होता है कि वह लग्न कितने बजे तक रहेगी। जैसे तिथि १ गुरुवार मीन ६ घण्टा २६ मिनट-मीन लग्न ६ बजकर २६ मिनट तक गुरुवार को रहेगी, उसके बाद मेष लग्न आरम्भ होगी। इस सारिणी से देखकर जान सकते हो कि उस समय कौन लग्न है। राशि की लग्न के ऊपर रा= ( रात्रि ) लिख दिया जाता है।
यूवों में क्षितिज पर जो राशि उदय हो रही है उसी को लग्न कहते हैं। २४ घण्टा में सब राशियाँ पृथ्वी के चारों ओर घूम लेती हैं। इस कारण प्रत्येक लग्न स्थूल मान से लगभग २ घण्टे की हुई। परन्तु इससे किसी का कम किसी का अधिक प्रमाण होता है।
किसी-किसी पंचाङ्ग में लग्न प्रारम्भ होने का समय होरा लग्न सारिणी में दिया रहता है। वहाँ लग्न के नाम के आगे “प्र०” ( प्रवेश ) लिखा रहता है। वह लग्न प्रवेश करने का समय है। किसी में दिन रात्रि न लिख कर मध्याह्न के उपरान्त ( १२ बजे के ऊपर ) रेलवे के समय के अनुसार १३, १४, १५ आदि २४ बजे तक लिखा रहता है। जरा ध्यान देने से सब समझ में आने लगेगा। लग्न के विषय में आगे समझाया जायगा।
तिथिपत्र के आगे पीछे पंचाङ्ग में कई उपयोगी चक्र मुहूर्त आदि विषय के दिये रहते हैं उन सब विषय का वर्णन क्रमशः उपयुक्त स्थान में करेंगे।
विवाह के १० महादोष होते हैं जो विवाह का मुहूर्त विचारने में काम आते हैं। जहाँ विवाह का मुहूर्त दिया रहता है उन दोषों के क्रमानुसार वह मुहूर्त जो दोष से रहित है अर्थात् शुद्ध है उसके लिए। ( खड़ी लकौर ) और जो दोष युक्त हैं ५ ( बेड़ी लकौर ) पंचाङ्ग में दी रहती है इसका वर्णन मुहूर्त खण्ड में मिलेगा।
(१७) पंचाङ्ग अब जगह-जगह से प्रकाशित होने लगे हैं। उन पंचाङ्गों में उस स्थान के अक्षांश और देशान्तर के अनुसार समय निकाल कर दिया रहता है। यही कारण है कि एक स्थान के पंचाङ्ग का समय दूसरे स्थान के पंचाङ्ग के समय से
पंचांग कैसे देखना और उपयोग : १०१
मिलान करने पर कुछ अन्तर पड़ जाता है, क्योंकि एक स्थान में जो समय दिया रहता है वह प्रत्येक स्थान में नहीं रहता, अर्थात् दूसरी जगह में अक्षांश देशान्तर के अनुसार उस समय में अन्तर पड़ जाता है। इस कारण अपने स्थान के समीप का पंचाङ्ग खरीदना चाहिये।
पंचाङ्ग परिवर्तन
किसी स्थान के पंचाङ्ग में दिये हुए समय से अपने स्थान के समय का अन्तर जान लेना चाहिए। उसके जानने की स्थूल रीति यहाँ दी है।
अपने स्थान का देशान्तर मालूम करो। मुख्य-मुख्य स्थानों की देशान्तर सारिणी किसी-किसी पंचाङ्ग में दी रहती है, उससे या किसी स्कूल के नक्शे से मालूम कर लो। जहाँ का पंचाङ्ग बना है वहाँ का देशान्तर और अपने यहाँ के देशान्तर में अन्तर निकालो और देखो पञ्चांग के स्थान से अपना देशान्तर अधिक है या कम है।
नक्शों में देशान्तर ग्रीनविच ( इंगलैंड ) से दिया रहता है। परन्तु भारतवर्ष के पञ्चाङ्गों में उज्जैन से देशान्तर दिया रहता है। इस प्रकार किसी भी एक स्थान के देशान्तर का अन्तर नाप लो, फिर दोनों देशान्तरों का अन्तर निकालो। वह अन्तर अंशों में दिया हो तो उसके चढ़ी पल बना लो। पंचाङ्ग के स्थान से अपना स्थान पूर्व में हो तो+ ( धन=जोड़ना ), पश्चिम में हो तो- ( ऋण=घटाना )। इस प्रकार पंचाङ्ग के समय में जोड़ने या घटाने से जो समय प्राप्त होगा वह स्थानिक समय होगा।
देशान्तर अंश में दिया हो उसके घटता मिनट या चढ़ी पल बनाना—
१५ अंश=१ घंटा=२॥ चढ़ी
१ अंश=४ मिनट=१० पल
१५ कला=१ मिनट=२॥ पल
१ कला=४ सेकेण्ड=१० विपल
१५ विकला=१ सेकेण्ड=२॥ विपल
१ विकला=३६ सेकेण्ड=१० अनुपल
=३ विपल
जैसे पूना के पंचाङ्ग में एकादशी ४० घं १० पल है। बम्बई में एकादशी का मान जानना है। बम्बई पूना से पश्चिम में है और दोनों के देशान्तर का अन्तर १ अंश है। १ अंश=४ मिनट १० पल। बम्बई पश्चिम में होने से यह अन्तर ऋण होगा। =-१० पल। पूना में ४० घं १० पल है, इससे १० पल घटाया तो ४० घं ० पल रहे। इस प्रकार बम्बई में एकादशी का मान ४० घं ० पल होगा। अर्थात् पूना के मान में १० पल घटा देने से बम्बई का मान होगा। काशी में २०-४० एकादशी है तो जबलपुर में क्या होगा? जबलपुर ३° पश्चिम है। ३५१०=३० पल ऋण=२०-१० का मान जबलपुर में एकादशी का होगा। अर्थात् काशी के मान में ३० पल घटा देने से जबलपुर का मान प्राप्त हुआ। इसी प्रकार नक्षत्र योग आदि का मान स्थानिक समय का निकाल लेना।
१०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
परन्तु स्मरण रहे पंचाङ्ग में तिथि आदि का मान घटी पल में मध्यम सूर्योदय से दिया रहता है। उससे स्पष्ट और स्थानिक ठीक समय बनाने के लिए देशान्तर संस्कार के अतिरिक्त विशेष संस्कार करना पड़ता है, क्योंकि समय भी कई प्रकार के होते हैं। मध्यम समय Mean Time, स्टैंडर्ड समय Standard Time ( रेलवे आदि का समय ) स्थानिक समय Local Time ( जो धूप घड़ी के अनुसार होता है और प्रत्येक स्थान का पृथक्-पृथक् समय होता है )। स्टैंडर्ड समय ( घड़ी के अनुसार घंटा मिनट ) सारे भारतवर्ष के लिए एक ही समय है जो ग्रीन विच से ५।। घंटा अधिक होता है। यह ८५.३° देशान्तर का समय है। मध्यम समय सूर्य के अनुसार निकाला जाता है।
इस प्रकार स्थानिक समय निकालकर उसके अनुसार देशान्तर संस्कार के अतिरिक्त उस समय में और भी जोड़ना घटाना पड़ता है और संस्कार भी करना पड़ता है। यह विषय कुछ कठिन होने से यहाँ नहीं दिया गणित खण्ड में मिलेगा। यहाँ तो प्रारम्भिक ज्ञान के लिये स्पष्ट रीति दी है।
अध्याय १६
अंग्रेजी पंचाङ्ग Almanac या Ephemeris
पिछली बताई हुई बातें समझ लेने पर पंचाङ्ग देखना अच्छी तरह आ जायगा। परन्तु अंग्रेजी पंचांग देखने के लिए कई नवीन बातों की आवश्यकता पड़ेगी, उनको भी संक्षेप से बता देना आवश्यक है।
इंग्लैंड में ग्रीन विच की वेधशाला के आधार पर अंग्रेजी पंचांग ( ऐफेमेरीज ) Raphel's Astronomical Ephemeris अंग्रेजी में प्रतिवर्ष प्रकाशित होती है जिसमें ग्रहों के सम्बन्ध में अनेक सूचनाएँ और दैनिक ग्रह स्पष्ट दिया रहता है। उसमें हूबल और नेफ्यून की स्थिति भी दी रहती है। ग्रहों के स्थान पर केबल उनके चिह्नों का उपयोग होता है। यहाँ के पंचांग सरीखी कई उपयोगी बातें उस पंचांग में दी रहती हैं। अंग्रेजी पंचांग को 'अलमनक' कहते हैं।
उज्ज्वल की वेधशाला से भी एक ऐफेमेरीज प्रतिवर्ष प्रकाशित होती है। उसमें भारतवर्ष के स्टैंडर्ड टाइम के दैनिक ग्रह स्पष्ट और विविध ग्रह योग दिये रहते हैं। ग्रहों की ठीक स्थिति जानने के लिए अच्छे ज्योतिषी उनका उपयोग करते हैं।
सावन दिन apparent day
जब सूर्य मध्याह्न ( दोपहर ) आता है और घूमकर फिर दूसरे दिन उदय होकर
अंग्रेजी पंचांग : १०३
मध्याह्न पर आने में जो समय लगता है वह सावन कहलाता है। कोई सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को सावन दिन कहते हैं। सावन दिन का मान कम ज्यादा होता रहता है। इस पर से सावन दिन का मध्यम मान निकाला जाता है।
मध्यम काल Mean Time
अपने इस सावन दिन के मध्यम काल को २४ घंटा या ६० घड़ी का मानते हैं।
सूर्य की मध्यम गति २९'-८" प्रतिदिन रात में जानकर एक मध्यम रवि विषुववृत्त में घूमता है ऐसा मान लेते हैं। यह मध्यम रवि मध्याह्न में आकर फिर अस्त होता है और दूसरे दिन उदय होकर फिर मध्याह्न में आता है। इस प्रकार एक बार मध्याह्न से दूसरे दिन के मध्याह्न में फिर आने तक मध्यम मान से २४ घंटा लगते हैं। इसी समय को मध्यम काल कहते हैं।
स्पष्ट काल Apparent Time
सूर्य को देखकर जो स्पष्ट समय पड़ता है वही स्पष्ट काल कहलाता है।
नाक्षत्र दिन = ( नाक्षत्र काल ) Side real day
तारों की दैनिक गति पृथ्वी की गति के कारण जान पड़ती है कि तारे उगते हैं और फिर सिर पर आते हैं फिर झूठ कर उदय होते हैं। इसी प्रकार तारा या कोई नक्षत्र उदय होने या मध्याह्न पर आने से दूसरे दिन फिर उदय होने या मध्याह्न पर आने तक जो समय लगता है उसे नाक्षत्र दिन और नाक्षत्र दिन के समय को नाक्षत्र काल Side real time कहते हैं।
इस नाक्षत्र काल को साधारण प्रकार से २४ घंटा या ६० घड़ी का मान लो तो काम चल जायगा।
वेधशाला Observatory में नाक्षत्रकाल देखने की एक घड़ियाल रहती है। पहिले बता चुके हैं कि नक्षत्र का उदय होना या अस्त होना पृथ्वी की दैनिक गति के कारण है। यह काल सावन मान से २३३. ५६ मि. ४.०१०६ से. का होता है। इस प्रकार नाक्षत्र दिन का मान वराबर एक समान रहता है। सावन दिन सरीखा कम ज्यादा नहीं होता। इस प्रकार नक्षत्र से सावन का भी ज्ञान सूक्ष्म प्रकार से हो सकता है।
मध्यम रवि Mean Sun
सूर्य की गति प्रतिदिन बदलती है परन्तु अपनी घड़ियों की गति प्रतिदिन एक समान रहती है गति कम ज्यादा नहीं होती। इस कारण घड़ी से जिस प्रकार मध्यम समय दीखता है उसी प्रकार मध्यम रवि या मध्यम काल समझना चाहिए।
जैसा मध्यम रवि मध्यम काल बतलाता है उसी प्रकार घड़ी भी मध्यम काल बतलाती है। मध्यम काल से इच्छित काल निकाला जा सकता है।
मध्यम रवि आकाश में नहीं दीखता, परन्तु गणित से उसकी गतियों का मध्यम मान के प्रमाण से मान निकालते हैं। मध्यम रवि का उदय ठीक ६ बजे प्रातः, १२
१०४ : सचित्र ज्योषि शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
बजे भग्याङ्क और संध्या ६ बजे सदैव मानते हैं। इस मान में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मध्यम रवि का होरात्मक काल या नाक्षत्र काल Side real Time
अंग्रेजी पंचाङ्ग में यह काल महत्व का दिया रहता है। यह काल किसी विशेष तारिख को क्या होता है, आगे दिया है। इस काल को अंशों में परिवर्तन कर देने पर उसे मध्यम रवि का होरात्मक विषुवांश कहेंगे।
विषुववृत्त के पूरे वृत्त के ३६० अंशों को २४ घण्टों में बाँटो तो १ घण्टा=१५° या ४ मिनट=१ पड़ा। विषुवांश (विषुव रेखा के अंशों को) अंश कालादि में न बना कर उसे घण्टा मिनट में बना लेते हैं और पंचांग में यही प्रतिदिन का नाक्षत्र काल घण्टा मिनट में दिया रहता है। यह होरात्मक नाक्षत्र काल प्रतिदिन प्रायः ४ मिनट के हिसाब से बढ़ता है। इस प्रकार १५ दिन में १ घण्टा बढ़ जाता है। अंग्रेजी पंचांग में प्रतिदिन का नाक्षत्र काल दिया रहता है। यह भावसाधन आदि के काम आता है। यहाँ यह नाक्षत्र काल किस तारीख को लगभग कितने घण्टे का रहता है, आगे दिया है उस पर से किसी भी दिन का नाक्षत्र काल निकाल सकते हो। नाक्षत्र काल और तारों का विषुवांश जानने से और तारों को पहिचान लेने से रात को देख कर लगभग ठीक समय भी जान सकते हैं। २२ मार्च को नाक्षत्र काल शून्य होता है।
दोपहर ( १२ बजे ) का नाक्षत्र काल नीचे दिया है।
| तारीख | महीना | घंटा | ता० | महीना | घंटा | ता० | महीना | घंटा | ता० | महीना | घंटा | ता० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५ जनवरी | १९ | ६ | अप्रैल | १ | ७ | जुलाई | ७ | ६ | अक्तूबर | १३ | ||
| २० " | २० | २१ | " | २ | २२ | " | ८ | २१ | " | १४ | ||
| ४ फरवरी | २१ | ७ | मई | ३ | ६ | अगस्त | ९ | ५ | नवम्बर | १५ | ||
| २० " | २२ | २२ | " | ४ | २१ | " | १० | २० | " | १६ | ||
| ७ मार्च | २३ | ६ | जून | ५ | ५ | सितम्बर | ११ | ६ | दिसम्बर | १७ | ||
| २२ " | २४=० | २१ | " | ६ | २० | " | १२ | २१ | " | १८ |
यदि अंग्रेजी पंचांग न हो और नाक्षत्र काल निकालना हो तो इस चक्र से निकाल सकते हो।
मान लो ५ अप्रैल दोपहर का ना० का० जानना है।
अपर २१ अप्रैल का नाक्षत्र काल २ घंटा दिया है=२ घं=० मि०
२१ तारीख से ५ अप्रैल तक अन्तर ( २१.५ )=१६ दिन
\left. \begin{array}{l} १ \text{ दिन में } ४ \text{ मिनट तो } १६ \text{ दिन में: } (१६ \times ४) \\ ६४ \text{ मिनट=} \end{array} \right\} \begin{array}{l} \text{मि०=१-४ घटाया} \\ \text{मि०शेष ०-५६} \end{array}
यह पिछले समय का है, इससे २१ अप्रैल के समय में अन्तर का समय घटाना पड़ेगा। इसलिए ५ अप्रैल के दोपहर को ना० का०=० घंटा ५६ मिनट हुआ। यह समय घंटा मिनट सेकेण्ड में निकलता है।
कुण्डली विचार : १०५
यह स्थूल रीति है। सूक्ष्म रीति से नाक्षत्र काल अंग्रेजी पंचांग में दिया रहता है। किसी पुराने अंग्रेजी पंचांग में जिस तारीख महीने का नाक्षत्र काल चाहिए उसी तारीख और महीने में जो नाक्षत्र काल मिले उससे काम चल जायगा, क्योंकि नाक्षत्र काल में अधिक अन्तर नहीं पड़ता, प्रायः मिलता-बुलता समय रहता है।
अध्याय २०
कुण्डली विचार
आकाश में जो राशियाँ और ग्रहों की स्थिति है उसका ही नक्शा कुंडली है। अर्थात् कुंडली आकाश का नक्शा है और उससे प्राप्त होता है कि कौन ग्रह उस समय कहाँ ये।
केवल कुंडली चक्र देखने से ही समय, तिथि, पक्ष, मास, वर्ष आदि जन्म समय का या इष्ट समय का (जिस समय की वह कुंडली बनी हो,) जाना जा सकता है। इसी कारण जन्म की तिथि आदि एवम् स्थान भी निश्चित कर उसके अनुसार ठीक गणित करके शुद्ध कुण्डली चक्र बनाया जाता है। इस कुंडली चक्र पर से जीवन की घटनाएँ और जीवन सम्बन्ध से विविध ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस कारण कुंडली क्या है और कैसे बनती है, अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
जैसे पृथ्वी का नक्शा बनाने में उत्तर सदैव ऊपर की ओर रहता है वैसे कुंडली में नहीं होता। आकाश के नक्शे (कुंडली) में पूर्व दिशा ऊपर को रखते हैं, क्योंकि पूर्व दिशा बहुत महत्व की है। यही लग्न का स्थान है जो कुंडली में मुख्य बस्तु है।
जब पूर्व दिशा ऊपर रहती है तो पश्चिम दिशा नीचे की ओर रहेगी। सूर्य जहाँ उदय होता है वह पूर्व और जहाँ अस्त होता है वह पश्चिम दिशा होती है।
आकाश के नक्शे में ठीक १२ विभाग किये गये हैं। इस प्रकार पूरे ३६०° के चक्र के १२ विभाग करने से प्रत्येक विभाग ३० का होता है। इस प्रकार पूर्व दिशा (लग्न) से आरम्भ होकर जो स्थान सिर पर आता है वह दशम स्थान या दशम भाव कहलाता है, जैसे चित्र संख्या ६३ में बताया है। दशम स्थान को दक्षिण दिशा समझो। पाताल अर्थात् पैर के नीचे का स्थान चतुर्थ स्थान कहलाता है उसे उत्तर दिशा समझो।
साधारण प्रकार से पूर्व दिशा ऊपर को रखो तो चित्र संख्या ६४ के अनुसार बनता है। इस चित्र में दिशाओं के विभाग करने से जिस प्रकार दिखाएँ होती हैं वह
१०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
भी बताया है। इस चक्र में घड़ी के अनुसार १२ राशियों के अंक लिख दिये गये हैं। इनमें १२ राशियों के नाम न लिखकर उसके क्रम की संख्या लिख दी गई है, जैसे मेष के लिए १, वृष २, मिथुन ३ इत्यादि। ये अंक पूर्व से लिखना आरम्भ कर बाईं ओर से क्रमानुसार लिखे जाते हैं जैसा चित्र ६४ में बताया है। यही आकाश का नक्शा है। इसमें केवल जो ग्रह जहां पर हैं लिखने को रह गये हैं, उनके लिखने की रीति आगे समझाई जायेगी।
चित्र संख्या ६३ आकाश में भाव स्थान
चित्र संख्या ६४ आकाश की दिशाएं और कुण्डली चक्र
कुण्डली विचार : १०७
इस नक्शा को देखने से प्रगट होगा कि इनमें जो १ ( मेघ राशि ) बताई गई है वह सूर्य का उदय स्थान है। ठीक उसके सामने पश्चिम में अस्त स्थान पर ७ ( तुला राशि ) है। दक्षिण में 'ख' स्वस्तिक अर्थात् सिर के ऊपर का आकाश का भाग या गध्याम्ह में १० ( मकर राशि ) है। उत्तर में पैर के नीचे ( पाताल में ) या अर्द्ध राशि स्थान में ४ ( कर्क राशि ) दी है। इस प्रकार ४ स्थान निश्चित हो जाने पर इनकी विदियाओं के कोण स्थान में भी राशियाँ हैं। जैसे २ ( वृष राशि ) के सामने ८ ( वृश्चिक राशि ) ३ ( मिथुन राशि ) के सामने ९ ( धन राशि ), ५ ( सिंह राशि ) के सामने ११ ( कृष्ण राशि ) और ६ ( कन्या राशि ) के सामने १२ ( मीन राशि ) आती है। इस प्रकार ये राशियाँ एक दूसरे से ६-६ राशियों के अन्तर पर—(१८०° के अन्तर पर ) हैं। एक दूसरे के सामने हैं अर्थात् सामने की राशि १८०° के अन्तर पर होती है। ये राशियाँ सदा चलायमान हैं। ( पृथ्वी की गति के कारण चलायमान दिखती हैं ) अर्थात् जो सिर पर के ऊपर राशि है उसके आगे की राशि पूर्व की ओर मिलेगी। पूर्व में जो राशि है उसके आगे की राशि क्षितिज के नीचे अर्थात् उत्तर की ओर मिलेगी। जैसे पूर्व में मेघ राशि है तो उसके आगे उत्तर की ओर जाने से ( क्षितिज के नीचे ), २ ( वृष राशि ), ३ ( मिथुन ) आदि मिलेगी। और ठीक उत्तर में ४ ( कर्क ) रहेगी। इससे यह समझ लेना चाहिये कि जो राशि पश्चिम ( अस्त ) में है उसके आगे क्रमानुसार राशियाँ दक्षिण ( सिर ) पर से होते हुए, पूर्व ( उदय स्थान ) की ओर घूमते हुए उत्तर ( पाताल ) की ओर जाती है। अर्थात् राशियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमानुसार स्थित हैं। परन्तु घूमते समय राशियाँ पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हैं जैसा चित्र संख्या ५ में बताया है, जैसे मेघ उदय होकर पश्चिम की ओर बढ़ेगा तब उस उदय स्थान पर वृष आयगा।
इसी को दूसरे प्रकार से आकाश का नक्शा बनकर समझाते हैं। पहिले जो गोल चक्र में आकाश का नक्शा बनाया था उसमें एक दूसरे को काटने वाली दिशा सूचक जो लकीरों पर ४ स्थान बनाये गये हैं १-४-७-१० वहाँ ये राशियाँ बनाई गई हैं। इन्हीं स्थानों का नाम केन्द्र स्थान (बीच के स्थान ) हैं।
जिस प्रकार गोल चक्र में १-४-७-१० राशियाँ केन्द्र में हैं ( चित्र संख्या ६५ देखो ) उसी प्रकार चौकोर नक्शे में भी चारों केन्द्र स्थान आ जाते हैं और यहाँ भी चारों स्थानों के नाम केन्द्र स्थान हैं। चारों केन्द्र स्थान के अतिरिक्त उन दिशाओं के कोण स्थान भी यहाँ कोण में आ गये हैं, जिससे समझ में अब आ जायगा कि चित्र ६४ में बताया हुआ गोल नक्शा और इस चित्र ६५ के चौकोर नक्शा में कोई अन्तर नहीं है। यही कुण्डली आकाश का नक्शा है।
इसमें भी १ के सामने ७ ( ६ राशि=१८०° का अन्तर पर ) ४ के सामने १०, २ के सामने ८, ३ के सामने ९, ५ के सामने ११, ६ के सामने १२ है। इस प्रकार १ राशि के सामने जो राशि होगी वह ६ राशि के अन्तर पर होती है। यहाँ भी मेघ
१०० : सचित्र ज्योतिषशिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
में सकर राशि पूर्व में है वह उदय स्थान है, तुला पश्चिम में है वह अस्त का स्थान है ॥ मक
राशि दक्षिण में है वह सिर के ऊपर का ( आकाश ) और कर्क राशि उत्तर में है वह
पैर के नीचे का स्थान ( पाताल ) है ।
वें में जो उदय स्थान है इसी स्थान को लग्न कहते हैं । जो राशि उस समय
पुर्व हो उसे ही लग्न या उदय लग्न कहते हैं और उस स्थान को लग्न स्थान कहते
हैं । कुण्डली-चक्र चित्र ६५ में जहाँ मेष राशि का सूचक अंक १ लिखा है वही लग्न
स्थान है ।
चित्र संख्या ६५
आकाश का चोकोर चित्र और कुण्डली
लग्न ( राशियाँ ) सदेव पृथ्वी की गति के अनुसार घूमती रहती हैं । कभी लग्न ` में वृष कभी मिथुनं, कभी कोई राशि रहती है। इस कारण जो राशि जन्म समय उदय हो रही हो उसे ही लग्न कहते हैं और उस राशि को कुण्डली चक्र में पूर्व के
स्थान में रख देते हैं,
मान लो किसी का जन्म कुंभ लग्न में हुआ है अर्थात् पूवं में उस समथ कुम्भ राशि उदय हो रही थी । कुंभ लग्न की ११ वीं राशि है तो लगन स्थान ( पुर्व ) में इस ११ के अंक को रख देते हैं और उसके आगे के अंक क्रमशः बाई ओर से रखते जायेंगे जैसे ११ के आगे १२ फिर १ कोने में रखा, फिर पाताळ में २, फिर कोण में ३ और ४, अस्त में ५ फिर कोण में ६०७ और दशम स्थान ( सिर स्थान ) में ८ फिर कोण में ९-१० लिख देंगे देखो चित्र संख्या ६६। इसे ही लग्न कुंडली कहेंगे । इसमें केवल ग्रहों का भरना रह गया है । यह ग्रह रहित लग्न कुंडली हुई । अब ध्यान में आ गया होगा कि जो राशि उदय स्थान में हो अर्थात् उदय हो रही हो उसे छग्त स्थान में रखकर बाई ओर से लग्न के आगे की राशि क्रमशः एक
कुण्डली विचार : १०६
चित्र संख्या ६६
लग्न कुण्डली
पूर्व उदय
अस्त
एक कोठे में एक-एक राशि लिखते जाओ तो पूरी लग्न कुंडली बन जायगी। इससे यह भी प्रगट हुआ कि लग्न में राशियाँ सदैव बदलती रहती हैं।
भाव स्थान
पहिले बता चुके हैं कि पूर्व में जो राशि हो उसे उदय लग्न या लग्न कहते हैं। इसी प्रकार लग्न के आगे के प्रत्येक स्थानों के भिन्न-भिन्न नाम हैं जिनके स्थान और नाम जानना आवश्यक है। (१) जहाँ सूर्य उदय होता है वह उदय लग्न या लग्न (२) जहाँ सूर्य अस्त होता है वह अस्त लग्न या सप्तम लग्न=सप्तम स्थान या सप्तम भाव है। (३) जहाँ पाताल है वह चतुर्थ लग्न=चतुर्थ भाव या चतुर्थ स्थान है। (४) आकाश (सिर के ऊपर) दशम लग्न=दशम भाव या दशम स्थान है। ये चारों केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
(५) लग्न के आगे कोण में दूसरे स्थान को=द्वितीय स्थान या द्वितीय भाव (६) तीसरे घर को तृतीय या तृतीय भाव (७) पाताल के आगे कोण में पाँचवाँ घर=पंचम स्थान या पंचम भाव (८) छठे को षष्ठ स्थान या षष्ठ भाव (९) अस्त के आगे कोण में षष्ठम स्थान या षष्ठम भाव (१०) नवम को नवम स्थान या नवम भाव (११) दशम के आगे कोण में एकादश को एकादश स्थान या एकादश भाव (१२) बारहवें को द्वादश स्थान या द्वादश भाव कहते हैं। देखो चित्र संख्या ६७। ये भाव के स्थान स्थिर हैं अर्थात् इन स्थानों में कभी परिवर्तन नहीं होता। ये ही स्थान भाव स्थान कहलाते हैं। भाव स्थिर हैं परन्तु इन भावों में आने वाली राशियाँ सदा बदलती रहती हैं।
११०: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चित्र संख्या ६७
आकाश में द्वादश भाव
उदय
अब इन्हीं स्थानों को फिर से क्रम पूर्वक समझाते हैं। देखो चित्र संख्या ६८ (१) जहाँ सूर्य उदय होता है वह उदय स्थान है इसी को लग्न कहते हैं। यहाँ कुण्डली में कुंभ राशि लग्न में है। (२) आगे द्वितीय स्थान है, इसमें मीन राशि है, (३) तृतीय स्थान में मेष राशि है, (४) चतुर्थ में वृष राशि, (५) पंचम में मियुन राशि, (६) षष्ठ में कर्क राशि (७) सप्तम भाव में सिंह राशि, (८) अष्टम भाव में कन्या राशि, (९) नवम भाव में तुला राशि, (१०) दशम भाव में वृश्चिक राशि (११) एकादश भाव में धन राशि और (१२) द्वादश भाव में अकर राशि है।
चित्र संख्या ६८
लग्न कुंडली
कुण्डली बिचार : १११
एक और उदाहरण देकर समझाते हैं देखो चित्र संख्या ६९ की भाव सूचक कुंडली । यहाँ इस समय कन्याराणि उदय स्थान में है अर्थात् कन्यालग्न उदय हो रही है । इससे ठग्न, मै कन्या राशि का अंक ६ रखा, (२) दूसरे में तुला, ( ३ ) तीसरे
चित्र संख्या ६९
भाव नाम सुचक कुण्डली
उदय
Rs ७ ./ A LTS
ह Me कोक ॥ (बन) पमु माय
पाताल अरद्धरानि सुद्दद ९
) कर्म १ आकाश घ्याल
सुत' १०); जाया १२
D2 ११ ““पर्ष २
rg १
अस्त क
में वृश्चिक, (४) चौथे भाव में धन, (५) पंचम स्थान में पकर) (६) सच्छ में कुंभ, (७) सप्तम में मीन, (८) अष्टम में मेप, (९) नवम में बुष, (१०) दशम में मिथुन, (११) एकादश में ककं, (१२) द्वादश भाव में मिट राशि है । इसी प्रकार राशियों में परिबर्तन तो होता रहदा है परन्तु भाव ( स्थान ) में कोई परिवर्तन नहीं होता है ।
भाव स्थान के स्थान ( १ ) ळान=हदु स्वान ( शरीर) (२) दवितीय घन स्थान, ( ३ ) तृतीय-सहज-भातू या पराक्रम, ( ४) चढुवनमुद्दद या सु, (५) पंचम-सुत, ( ६) पष्ठ-रिपु, (७) सप्दम=्जावा, (८) अष्टमन्मृत्य, (९ ) चवमन्धमं, (१०) दशम ८ कर्म, (११ ) एकादश = आय, ( १२ ) द्वाबश= व्यय (खर्च) । इन्हीं द्वादश स्थानों को द्वादश भाव कहते हुँ। ये भाव आगे समझाये जायेंगे।
द्वादश भावों के नाम पढ्ने का कारग |
( १ ) तनु -जिस लग्म का जन्म समय उदय होता है उसका शरीर के साथ
ने शरीर या तनुभाव नाम पड़ा ।
ला रे Mind की रक्षा के लिए अन्न वस्न आदि >>! आदि प्राप्त
करने का विचार मन में उत्पन्न होता है इस कारण तनुभाव से दूसरे भाव का नाम
घन पडा ।
११२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
(३) सहज—धन प्राप्त कर उसकी रक्षा के लिए पराक्रम करना पड़ता है और इस पराक्रम में सहायता देने व ले धन का बटवारा करने वाले सहोदर होते हैं। इससे इसका नाम पराक्रम और सहज पड़ा।
(४) सुख—पराक्रम होने पर घर और भाई आदि बंधुओं के सुख की भावना मन में उत्पन्न होती है। इससे इस नाम का गृह बंधु और सुख पड़ा।
(५) सुत—यह बन्धु और सुख मिलने पर पुत्र विद्या आदि प्राप्त करने की भावना हृदय में उत्पन्न होती है। विषय सुख की अपेक्षा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना श्रेष्ठ है। ब्रह्मज्ञान विद्या से होता है इससे इसका नाम पुत्र और विद्या पड़ा।
(६) रिपु—सुत प्राप्ति का विचार होने पर इसका साधन विवाह है, इससे सन्तान के लिए विवाह करने का विचार होता है। रोगी होने से विवाह नहीं हो सकेगा। इससे शरीर को रोगहीन बनाने का विचार उत्पन्न होता है। इससे इस भाव का नाम रोगभाव पड़ा। रिपु भी रोगरूप है और कार्य में वाधक होता है। इससे इसका नाम रिपुभाव भी पड़ा।
(७) जाया भाव—रोग से निवृत्ति होने पर विवाह के लिए स्त्री प्राप्ति का विचार उत्पन्न होता है। इससे इसका नाम जाया (स्त्री) पड़ा।
(८) मृत्यु भाव—स्त्री मिलने के उपरान्त मृत्यु से रक्षा के लिए आयु बढ़ाने का विचार उत्पन्न होता है। इस कारण इसका नाम मृत्यु पड़ा।
(९) धर्म भाव—धर्म करने से ही आयु बढ़ती है और मृत्यु दूर होती है। इससे इसका नाम धर्म पड़ा।
(१०) कर्म भाव—धर्म की बढ़ती के लिए यज्ञ भजन पूजन आदि कर्म और कर्म की रक्षा के लिए पिता या राज्य का सहाय लेना पड़ता है। इससे यह कर्म-भाव हुआ।
(११) आय—कर्म करने के लिए धन आदि के लाभ की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण इसे लाभ या आय भाव कहते हैं।
(१२) व्यय—लाभ होने पर उस धन को किस प्रकार व्यय करना ऐसा विचार उत्पन्न होता है। इससे इसका नाम व्यय भाव पड़ा।
अध्याय २१
कुण्डली बनाने के लिए लग्न निकालना
कुंडली बनाने के प्रयास में यह जानने की आवश्यकता है कि कौन लग्न है। और इस समय जो लग्न है वह किस प्रकार जान सकते हैं? क्योंकि बिना जन्म-समय की लग्न जाने कुंडली नहीं बन सकती। इस कारण जन्म-तिथि, महिना, सन-ईस्वी ( या
कुण्डली विचार : ११३
तिथि बार मास सम्बत) और जन्मसमय और जन्मस्थान अवश्य मालूम होना चाहिए। बिना समय और तिथि आदि के जाने, लगन नहीं मालूम हो सकती। कुण्डली में लगन बहुत महत्व की है, क्योंकि यदि लगन में अन्तर पड़ जायगा तो कुण्डली के फल कहने में बहुत अन्तर पड़ेगा। जितना ही अधिक सूक्ष्म समय होगा उतनी ही सूक्ष्म लगन निकाली जा सकती है।
गणित द्वारा सूक्ष्म लगन निकालने में नवीन विद्या थीं को आरम्भ में कठिनाई जान पड़ेगी। इस कारण पहिले उसका सिद्धांत बता देते हैं। सूक्ष्म रूप से लगन निकालने की विधि गणित खण्ड में मिलेगी। यहाँ प्रारम्भिक ज्ञान के लिए लगन निकालने की स्थूल रीति बतायेंगे, क्योंकि स्थूल रीति से लगन निकालना सरल है, इसी कारण पहिले उसे उदाहरण देकर समझायेंगे।
लगन जानने के पहिले यह जान लेना आवश्यक है कि सूर्य कहाँ पर अर्थात् किस राशि पर है। यह पञ्चांग में दिया रहता है। किसी-किसी पञ्चांग में प्रातः काल का, किसी में मिश्र कालीन सूर्य स्पष्ट दिया रहता है। मिश्र काल की जो घड़ी पल दी है उस समय पर सूर्य किस राशि के कितने अंश कला विकला पर है यह देखो। जिस राशि पर सूर्य होगा, पञ्चांग देखने से प्रगट हो जायगा। यदि दैनिक सूर्य स्पष्ट पञ्चांग में नहीं दिया है तो सूर्य की संक्रांति कौन है और कब हुई पञ्चांग में देखो। जहाँ मेघेऽर्कः वृषेऽर्कः इत्यादि लिखा होगा वहाँ घड़ी पल भी लिखी होगी, उससे प्रगट होगा कि अमुक तिथि को अमुक समय पर अमुक संक्रान्ति हुई है। जिस राशि पर सूर्य आता है उसी राशि की संक्रांति भी कहलाती है, इसी कारण राशि के आगे अर्कः लिखा रहता है।
सूर्य एक राशि पर लगभग एक मास रहता है और प्रतिदिन लगभग एक अंश अनुमान से चलता है। ज्योतिषी को सर्वत्र ध्यान में रखना चाहिए कि आजकल कौन राशि पर सूर्य है, और उस राशि पर कब सूर्य आया था (कब संक्रान्ति हुई थी)।
मान लो श्रावण कृष्ण २ को पञ्चांग में कर्क चाकः ३४।२ लिखा है। इस समय से कर्क राशि में सूर्य आया। अपने को श्रावण की अमावस्या को सूर्य की स्थिति जाननी है। अमावस्या तक १४ तिथियाँ होती हैं। गत २ तिथि घटाई तो शेष १३ दिन में १३° सूर्य चला। इससे प्रगट हुआ कि सूर्य अभी कर्क का ही है, केवल १३° लगभग कर्क के अभी व्यतीत हुए हैं।
जिस राशि पर सूर्य होता है वही राशि सूर्योदय पर होती है। ज्यों-ज्यों सूर्य मध्याह्न की ओर बढ़ता है उसी के अनुसार उसके आगे की लगनों का क्रमानुसार उदय होता रहता है। इस प्रकार लगन में परिवर्तन होता रहता है।
मान लो वृष राशि पर सूर्य है और समय प्रातः काल का है तो सूर्य उदय के
८