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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उसे अश्विनी से गिन कर इष्ट नक्षत्र कहना। पक्ष के दिन जोड़ने के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को गिनो और आगे गिनना आरम्भ कर इष्ट तिथि तक गिनना चाहिए।

जैसे ऊपर के उदाहरण में गत मास कुंभार है। इसे कार्तिक से गिना तो यह कुंभार १२ वां महिना हुआ। १२ x २ = २४ + गततिथि (कुंभार पूर्णिमा से कार्तिक अमावस्या तक १५ + चौथे के ४ दिन) + १ = २४ + १५ + ४ + १ = ४४ ÷ २७ = शेष १७ = १७ वां नक्षत्र अनुराधा होता है। इस कारण इष्ट तिथि को अनुराधा नक्षत्र आया। पंचांग में उस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र है। इसमें भी कभी २ एक नक्षत्र का अन्तर पड़ जाता है।

दूसरा उदाहरण—माघकृष्ण १० को सम्बत् २००० में नक्षत्र जानना है। गत मास पूस हुआ। कार्तिक से पूस तक = ३ मास x २ = ६ + गत दिन माघ कृष्ण के १५ + माघ शुक्ल के १० दिन + १ = ६ + १५ + १० + १ = ३२ ÷ २७ = शेष ५ = मृगशिर। पंचांग में कुछ देर उपरान्त रोहिणी था, १ का अन्तर पड़ गया। तिथि के घट बढ़ जाने से प्रायः १ दिन का कभी २ अन्तर पड़ जाता है।

(३) तीसरी रीति अमावस्या को सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं। यदि सूर्य नक्षत्र ज्ञात हो तो अमावस्या से आगे जितने दिन (इष्ट दिन तक) हों गिनो, उतने दिन सूर्य नक्षत्र से गिनने पर अपना दिन नक्षत्र (चंद्र नक्षत्र) आयगा।

आकाश में भी यदि चंद्र दिखता है तो चंद्र के समीप जो नक्षत्र होगा आकाश में देखकर भता दो। उस दिन वही नक्षत्र होगा।

(४) बिना पंचाङ्ग के योग जानना

सूर्य का जो नक्षत्र हो मालूम करो। सूर्य नक्षत्र से पुष्य नक्षत्र तक दोनों नक्षत्रों को मिलाते हुए गिनो, फिर जिस दिन का योग जानना है उस दिन के चन्द्र नक्षत्र तक अवन से गिनो। दोनों संख्या जोड़ कर २७ का भाग दो, जो शेष बचे वह संख्या योग की होगी।

जैसे सं० २००० में श्रावण शुक्ल १० को जानना है। उस दिन सूर्य आश्लेषा नक्षत्र पर है और इष्ट दिन (दशमी) को ज्येष्ठा नक्षत्र है। अब पुष्य नक्षत्र से सूर्य के आश्लेषा नक्षत्र तक गिना = यह दूसरा नक्षत्र है = २ संख्या हुई। फिर श्रावण से इष्ट नक्षत्र ज्येष्ठा तक गिना २३ आये। = २३ + २ = २५ ÷ २७ = शेष २५ रहे, २५ वां योग ब्रह्म योग आया, पंचांग में २६ वां योग ऐन्द्र है। नक्षत्रों के घट बढ़ जाने से इसमें भी कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।

(५) बिना पंचाङ्ग के करण जानना

शुक्ल प्रतिपदा से इष्ट तिथि को गिन कर दूना करो और १ घटा कर ७ का भाग दो तो ये चर करण निकलेंगे। वह करण तिथि के उत्तरार्द्ध में मिलेगा। पूर्वार्द्ध में उसके पहिले का करण जानना।

विना पंचांग के तिथिक्रम : १-१

ये ७ चर करण है : (१) वव (२) वालव, (३) कोलव, (४) तैतिल (५) गर, (६) वणिज, (७) विष्टि ।

स्थिर करण ४ है :—(१) शकुनि, (२) चतुष्पद, (३) नाग (४) किस्तुज ।

स्थिर करण—शुक्ल परिव्रा को पूर्वार्द्ध में किस्तुज; उत्तरार्द्ध में वव (चर) अमावस्या, कृष्ण ३० को पूर्वार्द्ध में चतुष्पद उत्तरार्द्ध में नाग, कृष्ण १४ को पूर्वार्द्ध में विष्टि (चर) उत्तरार्द्ध में शकुनि ।

उदाहरण—सम्बत् २००० में श्रावण पूर्णिमा को करण जानना है । पूर्णिमा तक १५ तिथि=१५ X २=३०-१=२९÷७=शेष १=वव करण उत्तरार्द्ध में, इसके पूर्वार्द्ध में (इसके पहिले का) विष्टि करण होगा । १ तिथि में २ करण होते हैं ।

पहिले करण जानना का चक्र दे चुके हैं, उसके द्वारा किसी भी तिथि का करण सरलता से जान सकते हैं ।

(६) विना पंचाङ्ग को चन्द्र जानना

(इष्ट तिथि X २) X (कृष्ण पक्ष में ३५, शुक्ल पक्ष में ५) ÷ = लब्धि वर्तमान संक्रांति जिस राशि की हो उस राशि से लब्धि संख्या तक गिनो तो चन्द्र की राशि निकलैगी । गिनने में १२ से अधिक संख्या हो तो १२ घटा कर शेष अंक लेना ।

(१) जैसे सं० २००० वैशाख शुक्ल १२ को चन्द्र जानना है ।

तिथि १२ X २=२४+५ शुक्ल पक्ष के=२९÷५=लब्धि ५ ५) २९(५ लब्धि दशमी को वृष संक्रांति थी । वृष से लेकर लब्धि का अंक ५ तक २५ गिना तो कन्या आई । तो उस दिन कन्या का चन्द्र था । ४

(२) कार्तिक अमावस को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+३५ (कृष्ण पक्ष होने से)=६५÷५=१३ लब्धि । लब्धि १३ यह १२ से अधिक है तो १३÷१२=शेष १ तुला की संक्रांति कृष्ण चौथ को थी उससे १ गिना तो तुला का चन्द्र आया ।

(३) ज्येष्ठ पूर्णिमा सं० २००० को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+५ (शुक्ल के)=३५÷५=लब्धि ७ । मिथुन संक्रान्ति १२ तिथि को थी, मिथुन से ७ गिना-सातवां धनु आया, इस कारण इष्ट दिन को धनु का चन्द्र हुआ ।

दूसरी रीति—अमावस्या को सूर्य चन्द्र एक राशि पर रहते हैं तो जो सूर्य की राशि हो वही से सवा दो दिन चन्द्र एक राशि पर रहता है । तिथि में २५ दिन=३ का भाग दो । अर्थात् तिथि X ४ ÷ ९=जो लब्धि होगी, सूर्य की राशि से उतना गिनो तो चन्द्र की राशि जान होगी । जैसे वैशाख शुक्ल १२=१२ X ४ ÷ ९=१५÷९=२ लब्धि । सूर्य वृष का है तो वृष से लब्धि ५ तक गिना तो कन्या राशि आई । इस कारण चन्द्र की राशि कन्या हुई ।

सूर्य को संक्रांति जानना आगे बताया है ।

१८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ३६

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति

मासतारीखअंग्रेजी महीनासूर्य की संक्रांतिअंशगति कला
१ भाष२०जनवरीकुंभ१°६१'
२ फाल्गुन१९फरवरीमीन६०
३ चैत्र२१मार्चमेष५९
४ वैशाख२०अप्रैलवृष५९
५ ज्येष्ठ२१मईमिथुन५८
६ आषाढ़२१जूनकर्क५७
७ सावन२३जुलाईसिंह५७
८ भादों२२अगस्तकन्या५८
९ कुआँर२३सितम्बरतुला५८
१० कार्तिक२३अक्टूबरवृश्चिक६०
११ अगहन२३नवम्बरधनु५९
१२ पूस२२दिसम्बरमकर५९

यहाँ अंग्रेजी तारीख के अनुसार सायन सूर्य दिया है। इष्ट दिन का सायन सूर्य जानने की रीति—

चक्र में सायन सूर्य की संक्रान्ति और उसकी तारीख इष्ट दिन के समीप की खोजो और उससे इष्ट दिन का अन्तर निकालो। उसी के आगे सूर्य की गति दी है। अन्तर समय की गति स्थूल रूप से निकाल कर उसे चक्र में दिए हुए सायन सूर्य में जोड़ या घटा कर इष्ट दिन का सायन सूर्य जान सकते हो। चक्र में दिए हुए तारीख के पहले का समय हो तो घटाना पड़ेगा, आगे का हो तो जोड़ना पड़ेगा, तब इष्ट दिन का सायन सूर्य निकलेगा।

जैसे १८ मार्च का सायन सूर्य निकालना है। चक्र में देखा अपने इष्ट समय के समीप २१ मार्च दिया है। अब इष्ट दिन और चक्र की तारीख का अन्तर निकालना (चक्र की तारीख २१ मार्च—इष्ट तारीख १८ मार्च)=२१-१८=३ दिन का अन्तर आया। २१ मार्च के आगे गति ५९' दी है। १ दिन में सूर्य ५९' चलता है तो ३ दिन के अन्तर में =५९' × ३=१७७ कला=२°—५७' गति हुई। यह सूर्य की इष्ट काल तक की गति हुई। अर्थात् २१ मार्च के आगे सूर्य का अन्तर २—५७' हो गया। इस गति को चालन कहते हैं। अर्थात् सूर्य को इतना चलना पड़ेगा।

चक्र की तारीख से अपना इष्ट समय पहिले का है, इसलिए यह चालन घटाना पड़ेगा। जहाँ घटाना पड़ता है उसे चालन ऋण कहते हैं। जहाँ जोड़ना पड़ता है उसे चालन धन कहते हैं। इष्ट काल २१ मार्च के आगे का हो तो चालन धन होता

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८३

परन्तु अपनी तारीख २१ मार्च के पहिले की है। इस कारण यहाँ चालन श्रृण हुआ। वक्र में जो दिया है उसे पंक्तिस्थ ( जो पंक्ति में है ) या वक्रस्थ कहते हैं। अब पंक्तिस्थ २१ मार्च के सायन सूर्य को लिया। वह भेद १° पर है = रा ०-१५' इसमें

रा.अं. क. | | से चालन २°-५७' ( चालन श्रृण होने से ) घटाया तो भेद रहा ---|--- ०-१-० ०-२-५७ = ११-२८-२

स्पष्ट सायन सूर्य

गणित करने से इष्ट समय का ग्रह आदि निकलता है उसे स्पष्ट ग्रह आदि कहते हैं।

इष्ट कालीन सायन रवि स्पष्ट ११ रा २८° ३' में यदि २° ५७' जोड़ दिया जाय तो वही ० रा १° सायन रवि २१ मार्च का आ जाता है।

यदि घंटा भी दिया है तो उतने घंटे की गति निकाल कर उस चालन का भी + ( धन श्रृण जैसा आवश्यक हो ) करो। घंटे की गति श्रं'राशिक से इस प्रकार निकालेंगे — ६० घड़ी ( एक दिन रात ) में सूर्य की गति उस दिन ५९' ( या जा गति हो ) भी इनमें घड़ी में ( इष्ट घड़ी में ) कितनी होगी ? घंटा की घड़ी बना लो।

जैसे ५ घड़ी की गति निकालनी है ६० घड़ी में ५९' तो ५ घड़ी में

५९ X ५=५९=४' - ५५"गति हुई। मान लो १८ मार्च को१२) ५९ ( ४'
६०=१२४८

सूर्योदय के आगे ५ घड़ी की और गति जाननी है तो इष्ट दिन के बाद की गति होने से जोड़ना पड़ेगा। पहिले का समय होता तो चालन घटाना पड़ता। १८ मार्च के

सूर्य में घड़ी की गति और जोड़ा तो योग ११ रा २८° ३४' ५५" हुआ। अर्थात् उस समय मीन के २८° ३४' ५५" पर सूर्य होगा। सूक्ष्म गणित करने पर १०-१५ कला का अन्तर आ जाता है।

| रा | ° | ' | " ---|---|---|---|--- १८ मार्च को सूर्य | ११ | २८ | ३० | ० + ५ घड़ी और | ० | ० | ४ | ५५ योग= | ११ | २८ | ३४ | ५५

यह इष्ट काल का सायन सूर्य

सायन सूर्य में से अयनांश घटा देने से निरयन सूर्य होता है अयनांश निकालना पहिले बता चुके हैं।

सौर मास की संक्रान्ति की तारीख

१८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सौर मास | संक्रान्ति (अर/म) | संक्रांति की तारीख | इसके आगे दिन का हिसाब ---|---|---|--- १ वैशाख | मेव | १३ अप्रैल | लगाने से सौर मास की तारीख २ ज्येष्ठ | वृष | १४ जुलाई | ( तिथि ) जानी जा सकती है । ३ आषाढ़ | मिथुन | १४ जून | अर्थात् इस प्रकार बताई हुई ४ श्रावण | कर्क | १६ जुलाई | तारीखों के आगे गिनने पर सौर ५ भाद्रपद | सिंह | १६ अगस्त | मास की तिथि किसी भी इष्ट दिन ६ आश्विन | कन्या | १६ सितम्बर | की निकाल सकते हो । इसमें भी ७ कार्तिक | तुला | १७ अक्टूबर | कभी-कभी एक दिन का अन्तर ८ मार्गशीर्ष | वृश्चिक | १६ नवम्बर | पड़ जाता है । यहाँ अंग्रेजी तारीख ९ पौष | धन | १५ दिसम्बर | के हिसाब से कौन संक्रांति उस १० माघ | मकर | १३ जनवरी | समय होगी यह साधारण प्रकार से ११ फाल्गुन | कुंभ | १२ फरवरी | जानी जा सकती है । १२ चैत्र | मीन | १५ मार्च |

स्थूल रीति से विना पञ्चभाग के चन्द्र साधन ( चन्द्र स्पष्ट करना )

जन्म समय पर किसी ग्रह की ठीक स्थिति इष्टकाल तक गणित द्वारा निकालने से जो जानी जाती है उसी को ग्रह स्पष्ट करना कहते हैं और उस ग्रह के स्पष्ट करने के गणित को साधन ( साधन करने की विधि ) कहते हैं ।

ऊपर सायन सूर्य का साधन करना ( विना पं गङ्ग के ) बताया है, उन्हीं प्रकार यहाँ चन्द्र का साधन करना भी बताते हैं ।

सूर्य और चन्द्र में जब १२ अंश का अन्तर पड़ जाता है तब एक तिथि होती है । इस कारण चन्द्र स्पष्ट करने के लिए उस समय का सूर्य स्पष्ट कर लेना आवश्यक है ।

जैसे वैशाख कृष्ण पंचमी ता० २५ अग्रेल सन् १९४३ ई० के ४ बजे संध्या समय समय चन्द्र स्पष्ट करना है ।

पहले इस दिन का सूर्य स्पष्ट करेंगे । वैशाख में २० अग्रेल को वृष के १ अंश पर चक्र में सायन सूर्य दिया है और गति ५९ कला है । ( २५ अग्रेल-२० अग्रेल ) = ५ X ५९' गति=चालन धन (इष्टकाल पंक्ति के आगे होने से)+हुआ ५ X ५९'=२९५'=२९ अंश-४५' चालन+इष्ट ४ बजे संध्या का है=(१२+४)=१६ बजे इष्ट । यह समय सूर्योदय के बाद का है । मान लो सूर्योदय ६ बजे हुआ । (१६ घण्टा-६ बजे सूर्योदय) १० घण्टा इष्ट । २४ घण्टा में ५९' गति तो १० घण्टा में = ५९ X १० = ५९५' २५ कला के लगभग ।

इन सब को जोड़ा तो इष्ट काल में सायन स्पष्ट रवि=ता १-६अंश-२०'-०' हुआ=(वृष के ६ अंश-२०')

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८५

\begin{array}{r} \text{सूर्य ( वृष १° )} = \text{रा } ० \ १ \\ \qquad \qquad \qquad १ \ १ \ ० \\ ५ \text{ दिन का चालन} + = ० \ ४ \ ५५ \\ \hline \text{योग} = १ \ ५ \ ५५ \\ १० \text{ घंटे का} + = ० \ ० \ २५ \\ \hline = १ \ ६ \ २० \end{array}

इष्ट कालीन सायन रवि

तिथि शुक्ल प्रतिपदा से गिनी जाती है। पूर्णिमा को १५ और अमावस्या को ३० तिथि होती है। अपनी इष्ट तिथि—बैगाख कृष्ण ५ है—१५ शुक्ल पक्ष के १५ गत तिथि कृष्ण पक्ष के—(१५ + ५) = २० + १ = २१ गत तिथि।

१ तिथि = १२° तो २१ तिथि = २१ × १२ अंश = २५२ अंश = रा. १२ अंश

\begin{array}{r} \text{सूर्य स्पष्ट} \quad \text{रा } ० \ ' \\ \qquad \qquad \qquad १ \ ६ \ २० \\ \text{गत तिथि} = ८ \ १२ \ ० \\ \hline \text{प्रातः चन्द्र स्पष्ट} = ९ \ १८ \ ० \\ \hline = \text{मकर का } १८^{\circ} - २०' \end{array}

यह पञ्चमी को सूर्योदय पर चन्द्र की स्थिति हुई और प्रातः काल का सायन चन्द्र हुआ।

चन्द्र की दैनिक गति १२ अंश से १५° तक है अर्थात् साधारण प्रकार से मध्यम गति १४ अंश है। २४ घण्टा में १४ अंश गति है तो आधे दिन की संख्या तक ७ अंश हुई है। १ घण्टा में लगभग ३५' गति हुई। यहाँ ४ बजे संख्या की गति निकालनी है। मान लो सूर्योदय ६ बजे हुआ तो सूर्योदय से इष्ट काल तक १० घण्टा हुआ। १ घण्टा में ३५' तो १० घण्टा में = ३५' × १० = ३५०' = ५ अंश — ५०' गति हुई। यहाँ चालन + है।

\begin{array}{r} \text{रा } ० \ ' \\ \text{प्रातः चंद्र स्पष्ट} \quad १ - १८ - २० \\ १० \text{ घण्टे का चालन} + ० - ५ - ५० \\ \hline \text{इष्ट कालीन} \quad \left. \vphantom{० - ५ - ५०} \right\} = १ - २४ - १० \\ \text{सायन चंद्र स्पष्ट} \quad \left. \vphantom{० - ५ - ५०} \right\} = \text{मकर का } २४ \text{ अंश} - १०' \end{array}

इस प्रकार ४ बजे तक चंद्र मकर के २४ अंश—१०' पर हुआ। यह स्थूल मान से चन्द्र स्पष्ट हुआ। सूक्ष्म रीति से गणित करने में लगभग ११ कला का अन्तर पड़ जाता है।

( सायन चन्द्र—अयनोश ) = निरयन चंद्र।

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चंद्र साधन करने का दूसरा उदाहरण

तारीख २५ मई के ६ बजे संध्या का चन्द्र स्पष्ट करना है; ज्येष्ठ कृष्ण पञ्चमी का।

२१ मई की सूर्य-मिथुन १ अंश गति ५८'=इष्ट-२५ मई को ६ बजे संध्या= चालन+ (२५ मई-२१ मई)=४ X ५८' गति=२३३'=३अंश—५२ चालन+। ६ बजे संध्या इष्ट है। मान लो सूर्योदय ६ बजे है, ६ बजे से १२ घण्टा हुआ। २४ घण्टा में ५८' तो १२ घण्टा में २९' गति हुई। इन सबको जोड़ा तो इष्ट कालीन सायन सूर्य स्पष्ट २ रा-५अंश-२१' हुआ।

सूर्य मिथुन १ अंश=रा-१अंश-०'

चार दिन का चालन+०-३-५२

१२ घण्टे का ,, +०-०-२९

इष्ट कालीन } =२-५-२१

सूर्य स्पष्ट }

तिथि ज्येष्ठ ५ है=शुक्ल पूर्णिमा=१५+कृष्ण पञ्चमी तक गत तिथि ४=१५+४=१९ दिन।

१ तिथि में १२' तो १९ तिथि में=१९ X १२ अंश=२२८ अंश=३ रा. १८ अंश रा ० ,,

सायन सूर्य-२-५-२१ १ दिन की चन्द्र की मध्यम गति (औसत गति) १४°

तिथि के अंश+७-१८-० है तो १२ घण्टा ( ३ दिन की ७°

=चन्द्र स्पष्ट=९-२३-२१=चतुर्थी के अन्त तक का।

आधे दिन का+२-०-७-०

इष्ट कालीन } =१-०-०-२१=कुंभ के ०°-२१' पर चन्द्र है।

सायन चंद्र स्पष्ट } =इष्ट कालीन सायन चन्द्र कुंभ के ०°-२१' पर है।

चंद्र साधन करने की दूसरी रीति—

चंद्र की मध्यम गति १२ अंश है कोई १४ अंश लेते हैं। रवि और चंद्र में १२° अंश का अन्तर पड़ने पर १ तिथि होती है, शेष २ अंश मध्यम गति के हैं। उसके मिला देने से चंद्र के अंश ज्ञात हो जाते हैं।

अधिक मध्यम गति का अन्तर इस प्रकार से होता है।

तिथि प्रतिपदा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पञ्चमी से द्वादशी शेष तिथि में

अन्तर२°२°
तिथि पूर्णिमा सेएकादशी से
कृष्ण पञ्चमी तक अमावस्या तकचंद्र स्पष्ट करने के लिएसूर्य स्पष्ट में
अन्तर३ अंश३ अंशतिथि के अनुसार ये अंश मिला देने चाहिए। चंद्र की गति प्रति दिन १२ अंश के १५ तक २° बढ़ जाती है। इसी के

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८७

कारण साधारण रीति से अधिक बड़े हुए अंश ऊपर जोड़ना बताया है। इस रीति से चन्द्र स्पष्ट करने में १° के लगभग अन्तर पड़ जाता है, परन्तु ३° से अधिक अन्तर नहीं आता। तिथियाँ १ मास में पूरी ३० नहीं होती। इससे ये अंश बढ़ जाते हैं।

जैसे सन् १९४३ में २५ मई को तदनुसार ज्येष्ठ वद्यी ६ को १२ बजे दिन का चंद्र साधन करना है। १२ बजे दिन अर्थात् सूर्योदय से लगभग ६ घंटा हुआ।

२१ मई को सायन रवि=मिथुन १° गति ५८' इष्ट २५ मई का है। आगे का होने से चालन घन हुआ।

( २५ मई-२१ मई ) = ४ दिन X ५८' गति=२३२'=३° - ५२'=३° - ५२'-०'अंश २४ घटा में ५८' गति तो ६ घंटा में=५८'=१४३' +०-१४-३०

रा-०

२१ मई को सूर्य २-१°-०' + चालन ०-४-६३'

४-६॥ चालन +

=सायन सूर्य=२-५-६३'

रा ०

६ तिथि है=गति तिथि ५=५ X १२°=६०°=२-०° + पंचमी के अन्त =२-०-०

तक चन्द्र योग ४-५-६३'

+०-३-०

पंचमी की बढ़ती के अंश

+०-३-०

छठ ,, ,, "

योग=४-११-६३' ( क्योंकि छठ उदय है )

६ घंटा का + =३-३० २४ घंटा में चन्द्र १४ अंश चला तो ६ घंटा में

चन्द्र स्पष्ट=४-१५-३६५' ७ १४ X ६ ७° २४ = ३°-३०' ४२

∴ इष्ट कालीन सायन चन्द्र स्पष्ट ४-रा १४°-३६५°

यह कुछ मोटा हिसाब है। गणित से १-२ अंश का अन्तर पड़ जाता है। सायन चन्द्र से अयमांश घटा दो तो निरयन चन्द्र होगा।

चंद्र से नक्षत्र और उसका चरण साधन करना

चंद्र स्पष्ट की राशि आदि की कला बना कर १३ अंश-२०'=८००' का भाग दो तो लब्धिगत नक्षत्र होगा। शेष में ४ गुणाकर ८००' का भाग दो तो वर्तमान नक्षत्र का चरण निकलेगा। १ नक्षत्र में ४ चरण होते हैं। सायन नक्षत्र १३°-२०' का

१८८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

होता है और अथिनी से आरम्भ होता है। जैसे चंद्र मकर का २९°-५२' है। = ९२-२९°-५२' = १७९९२" ÷ ८००' = २२ गत नक्षत्र (श्रवण) वर्तमान २३ वां नक्षत्र धनिष्ठा का २ चरण।

रा. अं. क.८००' ) १७९९२" ( २२ गत नक्षत्र
९-२९-५२१६००
× ३०१९९२
२७०१६००
+ २९३९२
२९९× ४
× ६०८०० ) १६६८ ( १ गत
१७९४०८०० चरण
+ ५२७६८ शेष
१७९९२ विकला= वर्तमान दूसरा चरण हुआ

किसी राशि के नाम पर से जन्म नक्षत्र और चरण जानना—

आगे होड़ा चक्र दिया है जिस पर से हिन्दुओं के नाम विचार कर रखे जाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं और प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर नियुक्त है। जन्म समय जो नक्षत्र होता है उस नक्षत्र का जो चरण वर्तमान हो उसी चरण के अक्षर के अनुसार नाम रखा जाता है। जैसे किसी का जन्म शतभिषक नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ तो चक्र में देखने से प्रगट हुआ कि शतभिषक के तीसरे चरण का अक्षर 'सी' है। इसी अक्षर पर से सीताराम, शिगुपाल आदि नाम उस वालुक का रखा जावेगा। स अक्षर में श अक्षर भी लिया जा सकता है। वह ह्रस्व हो या दीर्घ हो उसका कुछ विचार नहीं होता। यहाँ सी अक्षर है इसमें "छोटी इ" की भी मात्रा हो तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। इसमें केवल अक्षर और मात्रा का विचार होता है। मात्रा ह्रस्व हो तो उसे दीर्घ भी ले सकते हैं जैसे कू और कु एक है। इसी प्रकार म और मा एक है। मचा के पहले चरण का जन्म होता है म अक्षर है तो मक्खन सिंह या माशती प्रसाद भी नाम रख सकते हैं।

कई अक्षर ऐसे भी हैं जिन पर से नाम नहीं रखा जा सकता है जैसे ड. ल. ण. जव ये अक्षर आते हैं तो नाम "न" अक्षर या किसी दूसरे अक्षर से रख देते हैं।

इसी प्रकार किसी राशि के नाम पर से नाम के आदि अक्षर का विचार कर जन्म नक्षत्र या राशि भी जान सकते हैं। जैसे किसी का नाम रामलाल है। नाम का आदि अक्षर रा है। चक्र देखा तो तुला राशि के आगे चित्रा के तीसरे चरण का जन्म है और तुला राशि है।

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८९

इस चक्र से किसी ग्रह की राशि अंश कला आदि मालूम हो तो उसका नक्षत्र और चरण भी जाना जा सकता है।

जैसे जन्म समय चन्द्र स्पष्ट १२।२९°-५२' है तो यह जानने के लिए कि जन्म नक्षत्र और चरण क्या होगा, होड़ा चक्र का अन्तिम भाग देखो। १२।२६°-४०' तक धनिष्ठा का पहला चरण गत हो चुका, धनिष्ठा का दूसरा चरण १०।०°-०° तक है। अपना चन्द्र इन दोनों के भीतर है इससे यह प्रगट हुआ कि धनिष्ठा के दूसरे चरण का जन्म है।

नक्षत्र का चरण (जैसे नाम से प्रगट हो जाता है) जान लेने पर इसी चक्र द्वारा चन्द्र की राशि अंश आदि भी विदित हो सकता है।

जैसे किसी का जन्म धनिष्ठा के तीसरे चरण का है तो तीसरे चरण धनिष्ठा का १३।३°-२०' तक है। दूसरा चरण १०।०°-०' तक है। इस कारण चंद्र इन दोनों के बीच है ऐसा समझना। चंद्र की ठीक स्थिति तो गणित करने से ही प्रगट होती है। यहाँ केवल मोटा हिसाब बतलाया है। गणित खण्ड में इसका गणित दिया है।

होड़ा चक्र को अब कहड़ा चक्र या शतपद चक्र भी कहते हैं।

१ चरण (नक्षत्र का) ३°-२०' का होता है। आगे ३°-२० जोड़ते जाने से राशि के अंशादि का चक्र बन जाता है।

इसमें एक अक्षर को लेकर प्रत्येक चरण के लिए पृथक् मात्रा लगा कर चरण के अक्षर बनाये गये हैं। जैसे ल से ला, ली, लू, ले, लो इत्यादि जैसा नीचे के चक्र से प्रगट होगा।

१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

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साथन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १११

६ कल्या४० फा०टो पापी५-३-२०५-६-४०५-१०-०
हस्तपूव गठा५-१३-२०५-१६-४०५-२०-०५-२३-१०
चिनावेपो५-२६-४०६-०-०
७ तुलाचिनायारी६-३-२०६-६-४०
स्वातोरेता६-१०-०६-१३-२०६-१६-४०६-२०-०
विशाखातीतू तो६-२३-२०६-२६-४०७-०-०
८ वृश्चिकविशाखातो७-३-२०
बहुपाधानानी नूने७-६-४०७-१०-०७-१३-२०७-१६-४०
ज्येष्ठानोया गीयू७-२०-०७-२३-४०७-२६-४०८-०-०
९ धनमूलयेगो माभी८-३-२०८-६-४०८-१०-०८-१३-२०
पू० भा०भूच फा८-१६-४०८-२०-०८-२३-२०८-२६-४०
उ० भा०भे९-०-०
१० मकरउ० भा०भो जाजी९-३-२०९-३-२०९-६-४०९-१०-०
अनखीछू खेखो९-१३-२०९-१६-४०९-२०-०९-२३-२०
धनिष्ठागागी९-२६-४०१०-०-०
११ कुम्भधनिष्ठाने१०-३-२०१०-६-४०
शतभि०गो सासीसू१०-१०-०१०-१३-२०१०-१६-४०१०-२०-०
पू० भाद्र०सेसो वा१०-२३-२०१०-२६-४०११-०-०
१२ मीनपू० भाद्र०दो११-३-२०
उ० भा०डुब घ११-६-४०११-१०-०११-१३-२०११-१६-४०
रेवतीवेदो वाची११-२०-०११-२३-२०११-२६-४०१२-०-०

११२ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में

अक्षर के आगे ठहर नक्षत्र का क्रम और नीचे चरण के अंक दिये हैं । नक्षत्र क्रम से

यहाँ दिये हुए नक्षत्र का नाम प्रकट हो जायगा ।

इनमें ये अक्षर बराबर हैं—

अ=आ ई=ई उ=ऊ ए=ऐ ओ=ओ अ=अः स=सा व=व

जो नहीं हैं अक्षर

घो घू घे घो

छो छू छे छो जो जो जो झो झू झे झो

ठो ठू ठे ठो

होड़ा चक्र के अक्षर और उनका नक्षत्र चरण सूचक चक्र

नक्षत्र

अक्षर जो हैं

क्रमनामअःसःवः
अश्वि.बा३/१३/२३/३३/४४/१
शरणीका५/३की५/४कू६/१के७/१को७/२
कृत्तिकाखी२२/१खू२२/२खे२२/३खो२२/४
रोहिणीगा२३/१गी२३/२गू२३/३गे२३/४गो२४/१
मृग.घा६/२
आर्द्रा६/३
पुन.चा२७/३ची२७/४चू१/१चे१/२चो१/३
पुष्य६/४
आश्ले.जा२१/३जी२१/४
१०मघा२६/३
११पू. फा२६/४
१२उ. फा.टा११/२टी११/३टू११/४टे१२/१टो१२/२
१३हस्त१३/४
१४चित्राडा६/४डी६/१डू६/२डे६/३डो६/४

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १९३

१५ स्वाता.ठ २०/४डी द ठे दो प=खजव हुस्त के
१६ विमल.प १२/४भी भू बे धो धोदूसरे चरण का
१७ मनु.क २४/३ ती १६/१ तु १६/२ ते १६/३ तो १६/४धी धू घे धीजन्म होता है तो
१८ कल.क २६/३व अक्षर होने से
१९ मृग.क २६/३ ती २४/४ दू २६/१ दे २७/१ दो २७/२उसे ख मालकर
२० मृ. घन.क २०/२नाम रख देते हैं
२१ ठ. मल.ता १७/१ ती १७/२ तु १७/३ ते १७/४ ती १८/१जीसे—
२२ खल.पा १२/१ ती १२/४ प्र १२/१ ते १४/१ ती १४/२पराराध=
२३ घति.पा २०/३फी फू फे फोखरागम
२४ शत.भ १८/३ भी १४/४ भू २०/१ ये २१/१ भी २२/२षडान्त=
२५ पू. पा.भा १०/१ भी १०/२ भू १०/३ ये १०/४ भी ११/१खंडान
२६ ल. भा.भा १५/२ ती १५/३ भू १५/४ ये १५/१ भी १५/३
२७ श्वतीरा १४/३ ही १४/४ क १४/१ दे १४/२ दो १४/३
ल १/४ लो २/१ लू २/२ ले २/३ लो २/४
वा ४/२ ली ४/३ लू ४/४ वे ४/१ लो ४/२
व १२/२
सा २४/२ ली २४/४ भू २४/२ वे २४/१ लो २४/२

क. अ. प्र. = इन अक्षरों से नाम नहीं बनता तो इसके बदले "न" या सौर कोई भी अक्षर नाम रख देते हैं।

१३

१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ३७

तारीख से तिथि निकालना

सुवर्णांक १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ विशेषांक ० ११ २२ ३ १४ २५ ६ १७ २८ ९ २० १ १२ २३ ४ १५ २६ ७ १८ आरम्भ महीना=मार्च को पहिला गिनो।

आरम्भ में विशेषांक शून्य है जिसका श्रेपक ११ है अर्थात् प्रतिदिन ११ बढ़ता है। जैसे ११+११=२२+११=३३ इसका ३ ही लिया ३+११=१४, =१४+११=२५। इसी प्रकार ये विशेषांक ऊपर दिये हैं। ३० से अधिक तिथि होने पर ३० घटाने से जो बचता है वही ऊपर चक्र में .....। जैसे २२+११=३३ का ३० घटा कर ३ ही विशेषांक रखा है।

सुवर्णांक Golden number=सन ईस्वी+१=शेष सुवर्णांक का क्रम।

(शाका+७८)=सन ईस्वी।

जैसे शाका १८६५+७८=१९४३ सन्। १९४३+१=१९४४=शेष ६। शेष ६ बचा तो १९४३ सन का सुवर्णांक=६ हुआ। इस सुवर्णांक १९ ) १९४४ ( १०२ ६ के नीचे विशेषांक २५ दिया है। इस वर्ष भर के लिए

इसी विशेषांक से तिथि निकलेगी।

४४

३८

६ शेष

रीति—सन् ईस्वी में १ जोड़ कर १९ का भाग दो जो शेष बचे वह सुवर्णांक होगा। उस सुवर्णांक के नीचे जो विशेषांक मिले उसे लो। फिर जिस अंग्रेजी महीने की तारीख की तिथि जाननी हो, मार्च से उस अंग्रेजी महीने तक गिनो, गिनते समय मार्च को १ गिनो। गिनती में महीने की जो संख्या आवे उसे मास संख्या कहते हैं।

महीने की तारीख+विशेषांक=मास संख्या=तिथि।

महीने की तारीख, विशेषांक और मास संख्या जोड़ने से तिथि निकलती है। तिथि ३० से अधिक आवे तो ३० घटाने से जो बचे उसे लेना। पूर्णिमा को १५ और अमावस्या को ३० तिथि जानो।

सब योग १ से १५ तक आवे तो=शुक्ल पक्ष की तिथियाँ होंगी।

“ १६ से ३० “ “ “=कृष्ण “ “ “

जैसे सन् १९४३ ई० की ७ अप्रैल की तिथि जाननी है। सन् १९४३ का सुवर्णांक ६ निकला था, इसका विशेषांक २५ है, इष्ट मास अप्रैल है। मार्च से गिना, मार्च १, अप्रैल २, इस प्रकार मास संख्या २ हुई।

तारीख से तिथि निकालना : १९५

=विशेषांक+तारीख+मास संख्या=२४—३०=४ शुक्ल पक्ष की तिथि ।

२५ ७ २

यह योग ३० से अधिक है, इस कारण ३० घटाया, शेष ४ रहे । १ से १५ तक शुक्ल पक्ष की तिथि होती है । इस प्रकार ४ शुक्ल पक्ष की तिथि तारीख ७ अग्रल को होगी ।

दूसरा उदाहरण—तारीख १८ मार्च सन १८९० की तिथि जाननी है ।

\begin{array}{r} १८९०+१ \\ \hline \text{सन् } १९ \end{array} = \begin{array}{r} १८९१ \text{ शेष } १० \text{ सुवर्णांक} \\ १९ \text{ विशेषांक } ९ \end{array} \left. \vphantom{\begin{array}{r} १८९१ \\ १९ \end{array}} \right\} \begin{array}{l} \text{मार्च से इष्ट मास} \\ \text{मार्च } १ \end{array}

\begin{array}{r} \text{विशेषांक} \\ ९ \end{array} + \begin{array}{r} \text{तारीख} \\ १८ \end{array} + \begin{array}{r} \text{मास} \\ १ \end{array} = (२८-१५) = १३ \text{ तिथि}

ऊपर बताये नियम से तारीख की तिथि निकलाने में कभी-कभी एक तिथि का अन्तर पड़ जाता है । क्योंकि कभी-कभी एक तारीख में २ तिथियाँ हो जाती हैं । कभी-कभी तिथियों की हानि वृद्धि भी होती है । इस कारण कभी १ तिथि का अन्तर पड़ जाता है । इस रीति से तिथि का अनुमान हो जाता है । (२) इसी रीति को अब दूसरी प्रकार से करते हैं ।

आगे तारीख से चन्द्र की तिथि निकालने की जंश दी है, उसको देखने की रीति यह है ।

सन्+६=विशेषांक ( सन में जोड़ कर १९ का भाग दो जो बचे वह शेषांक कहलाया )

इष्ट महीने के नीचे और शेषांक के आगे चक्र में जो अंक मिले वह मासांक होगा । मासांक+तारीख=तिथि (तिथि ३० से अधिक होने से ३० घटा देना)

जैसे सन् १९४२ में १५ दिसम्बर की तिथि जाननी है ।

\begin{array}{r} १९४२+१ \\ \hline १९ \end{array} = \begin{array}{r} १९४३ = \text{शेषांक} \\ १९ \quad ५ \end{array} \begin{array}{r} (१९) \quad १९४३ \quad (१०२) \\ \hline १९ \\ \hline ४३ \\ \hline ३८ \\ \hline ५ \text{ शेषांक} \end{array}

इष्ट मास दिसम्बर के नीचे और शेषांक ५ के आगे देखा तो २४ मिला । यही मासांक हुआ । मासांक + तारीख = ३९-३०=९ तिथि शुक्ल पक्ष की ।

दूसरा उदाहरण—

इसी सन् में दिसम्बर की तिथि जाननी है ।

१९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उपयुक्त मासांक+- तारीख-२६ कृष्ण पक्ष की तिथि

२६ २ (२६-१५)=११ तिथि

पंचांग में उस दिन दशमी थी । एक तिथि वृद्धि होने से अन्तर आ गया ।

तारीख से चन्द्र को तिथि जानने की जंत्री FE | लक ८० हि, 9“1०४६६

२ ३ ४ ५ थ ८ ८ १० १०

१३ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १९ १९ ९१ २१

२४ २३ २४ २५ २६ २७ २९८ ० ० र रे

WISE ६ 5७८3५ ९. १० १ १३ १३

१६ १५ १६ १७ १८ १९ २० २२ २२ २४ २४

२७ २६ २७ १८ २९ ० १ ३ ३ ५ ५

८ ७ ८ ९ १० ११ १२ १४ १४ १६ 1६

१९ १८ १९ २० २१ २२ २३ २५ २५ २७ २७

CERNE TO प) त RY ARG ne

११ १० ११ १२ १३ १४ १५ १७ १७ १९ १९

२२९२ ER २३ HY 900 रद रद CE ०... 0

पद पे छै ERS RN ६... NR ९ ११.११

१३ १२ १४ १३ १४ १५ २६ १७ १८ २० २० २२ २२

१४ २३ २५ २४ २५ २६ २७ २८ २९ १ १ ३ रे

7 GQ ४ 0 ७, ८... ९ १० RS १२ २८. १४

१६ १५ १७ १६ १७ १८ १९ २० २१ २३ २५ २७ २७

१७ २६ २८ २७ २८ २९ ० १ २ ३ ४६ ६

१८ ७ ९ ८ ९ १० ११ १२ १३ १५ १५ १७ १८

१९ १८ २० १९ २० २१ २२ २३ २४ २६ १६ १८५ १५

ऊपर के अंक में ११ जोड़ने रो ३० से अधिक होने पर ३० घटा देने से यह

सारिणी बनी है । शुक्ल प्रतिपदा को तारीख जानना सन्‌ ईस्वी के मासांक को ३० से घटा दो तो शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की तारीख निकल आवेगी। जैसे सन्‌ १९४३ के मई का मासांक २८ है। १९४३-१ १९४४ feo ६ शेषांक

सारिणी में ६ शेषांक के आगे और मई के नीचे २८ मासांक मिला। ई ०-२८ मासांक=२ तारीख हुई। मई को शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा ( पडिवा ) ॥

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तारीख से तिथि निकालना : ११७

पूर्णमासी की तारीख जानना

इष्ट सन के बाद मासिक को ३० में से घटा दो, शेष १५ रहे तो ३० तारीख को पूर्णिमा होगी। शेष १५ से अधिक हों तो १५ से जितने अधिक हों वही अधिक तारीख होगी। १५ से कम हों तो उसमें १५ और जोड़ना तो योग फल पूर्णिमा की तारीख होगी।

जैसे सन् १९४३ का शेषांक ६ है। जून के नीचे और ६ शेषांक के आगे जून का मासांक २९ दिया है। ३०-२९ मासांक=शेष १ यह १५ से कम है। इस कारण १+१५=१६ तारीख १६ को पूर्णिमा होगी।

इस रीति में भी १ का कभी कभी का अन्तर आ जाता है।

\frac{\text{सन् } १९४६ + १}{१९} = \frac{१९४७}{१९} = ९ \text{ शेषांक इसके आगे और मई के नीचे १ मासांक है।}

३०—१=२९ यह १५ से अधिक है। २९—१५ शेष=१४ तारीख को मई में पूनम होगी।

तिथि से तारीख निकालना

\text{तारीख} = \left( \frac{\text{शुक्ल पक्ष तिथि} + ३०}{\text{कृष्ण पक्ष तिथि} + १५} \right) - \left( \begin{array}{l} \text{चैत्र से १ गिनकर} \\ \text{इष्टमास तक संख्या} \end{array} \right) + \text{सन् विशेषांक}

सायन शेष संक्रान्ति को चैत्र जानो और इससे १ गिनो।

रीति—शुक्ल पक्ष की तिथि होतो ३० और कृष्ण पक्ष की तिथि हो तो १५ जोड़ना। योग फल को तिथि संख्या जानो।

मास संख्या—जिस मास में सायन शेष संक्रान्ति हो उसे चैत्र जानो और चैत्र को १ गिन कर इष्ट मास तक संख्या गिनो गिनने से जो संख्या आवे वह मासांक हुआ।

यहाँ नक्षत्र मान से जहाँ महीना पूरा हो उसे मास मानना आवश्यक नहीं है। केवल एक सायन शेष संक्रमण वाले मास को चैत्र मान कर इसी चैत्र से गिनना।

सन ईस्वी का सुवर्णांक और विशेषांक निकालना पहले बता चुके हैं। विशेषांक को माससंख्या में जोड़ो और इस योग को तिथि संख्या में घटाओ, जो शेष बचे वही तारीख होगी।

हिन्दी मास में जो अंग्रेजी महीना पड़ता है उस अंग्रेजी महीने की तारीख इस प्रकार निकालना। यदि ३० से अधिक तारीख आवे तो ३० दिन घटा देना। घटाने से जो बचे वह अगले महीने की तारीख होगी।

हिन्दी महीने में लगभग ये अंग्रेजी महीने पड़ते हैं।

चैत्र वैशाख जेठ आषाढ़ सावन भादो कुम्हार कार्तिक अग्रहन पूस माघ फाल्गुन मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टू० नव० दिस० जन० फर० कभी इन महीनों में कुछ अन्तर पड़ जाता है।

१९८ : सचित्र उद्योतिष शिक्षा, आरम्भिक ज्ञान खण्ड

उदाहरण (१)

सन् १९४३ ज्येष्ठ शुक्ल १४ की तारीख जाननी है—

(१९४३ + १) = १३३९ = शेष सुवर्णांक, इसका विशेषांक २५ इसी के नीचे दिया है।

तारीख = (शुक्ल १४ + ३०) — (चैत्र से ज्येष्ठ मास + ३ विशेषांक २५) = ४४-२८ = १६ तारीख हुई। इस तारीख में भी कभी-कभी १ का अन्तर पड़ जाता है। क्योंकि तिथि की हानि-वृद्धि होती है और कभी कभी एक तारीख में २ तिथि हो जाती हैं।

दूसरा उदाहरण—चैत्र कृष्ण १३ सन १८१० को तारीख जानना है— १८३० + १ = १८३१ = शेष १०, १० सुवर्णांक के नीचे ९ विशेषांक दिया है।

तारीख = (कृष्ण १३ + १५) — (चैत्र से चैत्र मास ४ + विशेषांक ९) = २८-१० = १८ तारीख आई। मार्च की १८ तारीख हुई।

अभावस्या की तारीख जानना

तारीख = ३० — (सन का विशेषांक + चैत्र से इष्ट मास तक मास संख्या) जैसे सन १९४२ के दिसम्बर में अभावस्या कौन तारीख पड़ेगी जानना है। १३३२ + १ = १३३३ = शेष ५ सुवर्णांक के नीचे १४ विशेषांक दिया है। तारीख = ३० — (विशेषांक + मार्च से दिसम्बर तक) = ३० - २४ = ६ तारीख।

१४ महीना १०

इसमें भी कभी कभी १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। पंचांगों में ७ तारीख को अभावस्या दी है।

विशेष विचार—संक्रान्ति मान में वृद्धि

संक्रान्ति मान ७२ वर्ष में १ दिन आगे बढ़ता है। जनवरी और फरवरी की तिथि निकालने को इष्ट वर्ष के पिछले वर्ष का विशेषांक निकालो और इन दोनों महीनों की अभावस्या निकालने के लिए गत वर्ष का विशेषांक लो।

अभावस्या निकालने का विशेषांक और महीने का योग ३० से अधिक हो तो ३० से घटा देना; जहाँ ० शेष रहे उसे ३० तारीख समझना। तिथि की क्षय वृद्धि से कभी-कभी तारीख में १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। इस कारण इष्ट बार पर से शुद्ध तारीख निकाल कर मिलान कर लेना चाहिए। बार से तारीख निकालने की रीति आगे दी है।

तारीख से दिन निकालना

यदि तिथि से तारीख निकालनी है और दिन भी मालूम करना है तो यह निश्चय कर लेना चाहिए कि उस दिन वह तारीख पड़ती है या नहीं। जानने की रीति आगे दी है।

तारीख से तिथि निकालना : १९९

मासांक और वारांक

अंक
मासजनवरीमईलीप-फरवरीजूनसितम्बरलीप--जनवरी
अक्टूबरफरवरीमार्चदिसम्बरअप्रैल
अगस्तनवम्बरजुलाई

दिन रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार

इस चक्र में महीने के ऊपर जो अंक दिए हैं वे मासांक हैं और दिन के ऊपर के अंक वारांक हैं।

रीति सन् ईस्वी का उत्तरार्द्ध अर्थात् इकाई और दहाई को लेकर उस उत्तरार्द्ध का चतुर्थांश भी उसी में जोड़ दो। चतुर्थांश निकालते समय आधा या पौन अंक मिले उसे जोड़ते समय छोड़ देना चाहिए। उस योग फल में तारीख और अंग्रेजी महीने का अंक ( मासांक ) भी जोड़ दो और ७ का भाग दो जो शेष बचे वही बार उपर्युक्त क्रम से होगा।

जैसे सन् १९४३ में २३ मई का दिन जानना है, सन् १९४३ का उत्तरार्द्ध ४३ हुआ=४३ + ४३=४३ + १०३=५३ (यहाँ जोड़ते समय ३ छोड़ दिया)=५३+तारीख २३+मई का मासांक २=७५। ७५+७=शेष १ रविवार। यहाँ मई के ऊपर २ अंक लिखा हैं इससे मई का मासांक २ हुआ। सब का योग ७५ था, ७ का भाग देने से १ बचा, १ के नीचे इतवार लिखा है। इससे प्रकट हुआ कि २३ मई सन् १९४३ को इतवार का दिन था।

बीसवीं सदी में उपर्युक्त नियम से तारीख का दिन निकालना है। परन्तु इसके पहिले की गत सदी की तारीख जानने के लिए प्रति सदी में २ अधिक जोड़ना और भविष्य की सदी में २ अंक घटा देना होगा, तब ठीक तारीख निकलेगी।

लीप फरवरी हो तो लीप वर्ष में जनवरी और फरवरी की तारीख से दिन निकालने में कुछ सावधानी की आवश्यकता है। ऊपर चक्र में लीप फरवरी और लीप जनवरी जहाँ लिखा है उस वर्ष उसके ऊपर लिखा मासांक को अर्थात् लीप जनवरी का निकालने को लीप जनवरी का विशेषांक ० या ७ लेना और लीप फरवरी के लिए मासांक ३ लेना। क्योंकि लीप फरवरी के ऊपर ३ अंक लिखा है। यदि लीप वर्ष न हो तो साधारण जनवरी का अंक १ और फरवरी का साधारण अंक ४ लेना जैसा पहिले चक्र में बता चुके हैं।

लीप वर्ष ( Leap year )=प्लुत वर्ष। जिस वर्ष में सन् ईस्वी में ४ का पूरा २ भाग चला जाय या पूर्ण सदी हो तो उसमें ४०० का भाग पूरा २ चला जाय अर्थात् भाग देने से शेष कुछ न बचे तो वह लीप इयर (प्लुतवर्ष) कहलाता है। जैसे ४, ८, १२, ८८, १२, १६ में ४ का भाग पूरा २ चला जाता है। शेष कुछ नहीं बचता ता ये सब लीप वर्ष होंगे। और ४००, ८००, १२००, १६००, २०००, इत्यादि इन ईस्वी में जिसमें सदी शेष कुछ नहीं बचता तो ये सब लीप वर्ष कहलायेंगे,