सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
९४: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(३) मंगल का अष्टक वर्ग (४) बुध अष्टक वगं
सू० च० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग
३ ३१ ३६ ६ १ १ LRT EAR A
५ ६ २ ५१० ८ ४ ३ 3 ४८२० त का रा र, २
६ ११ ४ ६११ ११ ७ ६ ९ ६ ४ ५११ ३ ४ हैं
१० ७ ११ १२१२ ८१० ११ ८ ७ ६१२ ४ ७ ६
११ यु ९ ११ १२ १० ८ ९ ५ ८ ८
१० १० ११ ९ १० ८ ९ १०
११ ११ १० ११ ९ १० ११
& ११ १२ ११ ११ शुभ योग=३९ शुभ योग-५४
(५) गुरु अष्टक वर्गे (६) शुक्र अष्टक वे
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल०
MERE ONS २ ३ १ ८ १ ३३ ५' १ ३ १
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१० ११ ११ १० ११ १० ११
११ ११ . १२ ११ शुभ योग=५६ शुभ योग=५२
(७) शनि अष्टक बगे (८) लग्न अष्टक वर्गं
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न सू० च० मं० बु० गु० शु० श० लग्न
१ ३ ३ ६ ५ ६ २३ १ २२ १. १. १-१. ३
२ ६ ५ ८ ६ ११ ५ ३ पती RFR RR ४११ ६ ९१११२ ६ ४ ६१० ६ ४ ४ ३ ४ १० ७ १० १० १२ ११ ६.|१० ११ १० ६ ५ ४ ६ ११ द ११ ११ १०.५ ११ ११ ८ ६ ५ १० १० १२ १२ ११ | १२ १० ७ ८ ११ ११ ११ ०२९
१० ११
११ शुभ योग-३९ शुभ योग=४९
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बड्वगं विचार : ९५
राहु अष्टक वर्ग कि न एन 7 एरा एफए, छम १ १ २ २ १ ५ ३ ३
२ ३ ३ ¥ ३ ६ ४
३ श भ ७ ¥ ७ ७ पर
4 ७ १२ ८ ६ ११ १० ९
७ दु १२ दु १२ ११ १२
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१० १०
शुभ योग=४३
अष्टक वर्ग में लग्न सहित ८ ही ग्रह लिये जाते हैं परन्तु “घुवताराप्रकाश' में राहु
का भी अष्टक वर्ग दिया हैं। वह भी यहाँ दे दिया गया है ।
प्रत्येक अष्टक वर्ग चक्र करना आगे बताया है । किसी ग्रह को आदि लेकर उसके
स्थान को गिनकर जहाँ शुभ हैं वहाँ रेखा बना देनी चाहिये जहाँ शुभ नहीं है केवल
शून्य रख देना चाहिये ।
पृथक् २ अष्टक वर्ग चक्र में शुभ रेखाओं का योग इस प्रकार है :-सूर्य=४८, चंद्र
में=४९, मंगल=३९, बुध-५४, गुरु-५६, शुक्र=५२, शनि=३९, लग्न>४ ९, राहु=४३।
उदाहरणस्वरूपं अष्टक वर्ग चक्र
अष्टक वर्ग चक्र बनाने का उदाहरण ( यहां जन्म कुण्डली के अनुसार राशियाँ
और ग्रह दिये है ) ।
(१) सूर्य का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियां ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९१०१११२ १
ग्रह लग्न श० ० ० मं के०गु० चं सू० ० ०
~
रा० CID
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३मंगल। 1 । । ० | । ० | ० ० ।
४सूयं । ० ० 1॥ । । । ० ॥ ०
शुक्र ० ० । । ० ० ० ० 1 ० ० ०
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७ चन्द्र ० [| © o 06 1 1 ० 9 ० 1 ०
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शेखायोगश/ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३ ५ ४
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योग ३ ४ ६४ ३ ५ ७ ५ २
रेखायोग ५ ३ ५ १२ ४ ५ २
(३) मंगल का अष्टंक वर्ग चक्र
(२) चन्द्र का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियाँ
(४) बुध का अष्टक वर्ग चक्र
राशियाँ
९६: सचिव ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
राशियाँ
ग्रह
८ लग्न
१ शनि
२ गुरु ३ मंगल
४ सूर्य
भ शुक्र
६ बुध ७ चंद्र
८ लग्न
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अष्टक वर्ग विचार : ९७.
(५) गुरु का अष्टक वर्ग चक्र
राशि' ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० १११११ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
० ० । ० । || ०७ ७ ७ ©
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रेखायोग ५ ५ ४ हिवा क PT) > पे पपपप्प्प्प्प्््््स
(६) शुक्र का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
१शनि । ० ० ० । | । ०८ ००-४४ 02,
२ गुरु ° ० 1 || 11 ० ० ० ० oI
मंग ० || ० । । ० ० । ० । । ०
है| सूर्य ७6००७७०७/७७० o ll ° ० । o (0 ©
श शुक्र । ० ० 195. | ॥ ° । । 1
६ बुघ || । ० ० I 0100 0० ० ० । ०°
७चन्द्र । ० ० । 1 ० । ॥ 1 1 [| [| घरून । । । ॥ । ० ० tr । ० | ०
योग ए ४ २ ४ ८ ३ ४ ५ ३ ४ ६ ४
(७) शनि का अष्टक वर्ग चक्र
राशि है। ४ HY OD है १०५११ वर Fi
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
रा० बरु शु०
वशति । ० ० ० । ० | । ० ० ० ०
२ गुरु Io: Jone: Jess Jo 2 io, To) ‘of Jo El
३मगल ० ० | । । ० ० । ० । । ०
असूर्यं । ० ० । । ० ॥। । ० । । °
Et शुक्र ७०७ ७ t 0 ° ° ° 1 [| 6 0 0
६ बुध, 5०२ lo Is iI 71 115०० 2
७ चन्द्र ० || ° ० ७० ० 1 ॥ ० ० 1०
८ लग्न 1 ० 1 1 ० 1 ० ० ० [| । ०
रेखायोग ४ २ ३ ४ ४ ३ ५ ५ १ ३ ४ १
९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) लग्न का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
अह लर् ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
1 ०6 1 ०
1 ० [] 1
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प्रत्येक ग्रह का अष्टक वर्ग चक्र बनाने में कई लोग कुण्डली बनाकर उसमे रेखा भर देते हैं यह ठीक नहीं है उसमें कभी भूल हो जाती है । उपरोक्त प्रकार से चक्र चना कर उसमें शुभ रेखा एवं अशुभ का शून्य भी लिख दिया जावे तो भूल नहीं हो सकती और उसकी जाँच में सुविधा होती है ।
यहाँ उदाहरण में शुभ के स्थान में रेखा ओर अशुभ के स्थान में बिन्दु दिया है कई ग्रंथकार विन्दु को शुभ सूचक मानकर रेखा को अशुभ का चिल्ल मानते हैं । परन्तु रेखा को शुभत्व का चिह्न मान लेना उचित जेंचता है । ;
कोई ग्रन्थकार रेखा के स्थान में रेखा न बनाकर उसी ग्रह का सूचक संकेत अक्षर बना देते हैं जैसे रवि के लिए र० चंद्र के लिए चं इत्यादि इसको यहाँ उदाहरण देकर बताया है :--
सूर्ये का अष्टक वर्ग चक्र अन्य प्रकार
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
ग्रह् लग्न ० श० ० ० मृ» के० गु० चं० सु० ० ०
रा० बु० शु०
१ शनि श० ० श० श० ७ श० ० ० श० श० श० ए०
२ गुरु गु० ० ० गु० ० गुण 09 oo o ° ० गु०
३ मंगल मं० सं० मं० मं) ० -मं० मं० ० मं० ० ० मं०
४ सुय सू ० ० सू० सु० सु० सु० सू० ० सू० सु० ०
५ शुक्र ० २ शु० शु० ० ० ० ० शु० ० ० ०
६ बुध बु० बु० ० ० बु० बु० बु० बु० ० ० बु० ०
७ चन्द्र ० च० ० ० ० चूं०चूं० ० ० ७० 'चं० ०
झू ० ० ल० रलू० ० लढ ० ० ० ० छ० ल०
शुभयोग५ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३५ ४
अष्टक वर्ग विचार : ९९
इसमें विशेष कोई अन्तर नहीं है रेखा के स्थान में यहाँ ग्रह का नाम दिया है ।
परन्तु रेखा का चिह्न शुभता सूचक बना देना सरल जेंचता है ।
कई ग्रंथकार वाई ओर दिए गिए ग्रहों का क्रम इस प्रकार रखते हैं (१) सूर्य (२)
शनि (३) गुरु (४) शुक्र (५) मंगल (६) बुध (७) चन्द्र (०) लग्न परन्तु यहाँ
उपयोग किया हुआ क्रम ही उचित समझ पड़ता है ।
अष्टक वर्ग चक्र की शुभ रेखाओं में मत भेद
यहाँ जो अष्टक वर्ग शुभ रेखा चक्र दिया है उसमें कुछ मत भेद भी हैं-
(१) सूर्य अष्टक वर्ग में शुभ होरा में बुध और गुरु का ८दिया है परन्तु वृहज्जा०
जा० भ० आदि अन्य ग्रन्थों में ९ दिया है ८ नहीं दिया । यहाँ जातक पारिजात के
अनुसार ही बुध और गुरु में ९ दिया है । ८ नहीं दिया ।
(२) चन्द्र अ० वर्ग में गुरु में वृहस्पाराशर में २ दिया है १२ नहीं दिया । वृहज्जातक जा० भऽ, जा० पारि० आदि में २ नहीं दिया १२ दिया है। इससे यहाँ भी
२ नहीं दिया १२ दिया है।
(३) मंगल के अ० वर्ग में बुध का जा० भ० में ११ की जगह १२ दिया है।
बृहत्पारा० जा० पारि० आदि कई ग्रन्थों में ११ ही दिया है १२ नहीं है । इससे यहाँ
भी ११ दिया है १२ नहीं दिया ।
(४) बुध अ० वर्ग में चन्द्र का २फे वदले ५ जा० भ० में दिया है अन्य ग्रन्यो में
२ ही दिया है ५ नहीं दिया इससे जा० पारि० आदि के अनुसार २ दिया है ५
नहीं दिया। बुध अ० वर्ग में लग्न में जा० भ० में ८ के बदले ९ और १० के बदले
१२ दिया है परन्तु जा०'पारि० वृ० पारा० आदि में ८ और १० दिया है वही यहाँ भी
दिया है ।
(५) गुरु अ० वर्ग में शंभु होरा० में लग्न में ८ दिया है शेष ग्रन्थों गेंद नहीं दिया
९ दिया है उसी के अनुसार यहाँ भी दिया है ।
(६) शुक्र अ० वर्ग में वृहत्पारा० में मंगल का ४ दिया है वृ० जा०, जातक
यारि० आदि कई ग्रन्थों में ४ नहीं दिया इससे यहाँ ४ छोड़ दिया ।
(७) शनि अ० वर्ग में जा० भ० में २ के बदले ३ सूर्य का दिया है । जा०पारि०,
बु० पारा०, वु० जा० आदि में २ ही दिया है ३ नहीं दिया यही यहाँ दिया है ।
बुध में जा० भ० में ११ नहीं दिया जातक पारिजात आदि में ११ दिया है इससे
यहाँ भी दिया है। लग्न में जा० भ० में ९ अधिक दिया है जातक पारि० आदि में ९
नहीं दिया इससे यहाँ नहीं दिया ।
२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) जा० भरण, फल दीपि० आदि ने लग्न अष्ट० वर्ग नहीं दिया । शेष. ग्रन्थों में दिया है यहाँ वू० जा० वृहृत्पारा० आदि के अनुसार ही दिया है ।
लर्न अ० वर्ग में कहीं चन्द्र में १२ भी दिया है और शुक्र में ११ नहीं दिया ॥ परन्तु यहाँ वृ० जा० आदि के अनुसार चन्द्र में १२ नहीं दिया । और शुक्र में ११ दिया है ।
(९) राहु का शुक्र में ५ नहीं दिया शनि का १२ अधिक किसी में दिया है इस प्रकार मतभेद है ।
अष्टक वर्ग चक्र उदाहरण का स्पष्टीकरण
यहां लग्न का अष्टक वर्ग भरना समझा देते हैं जिसके समझ लेने पर उदाहरण देख कर सम्पुर्ण अष्टक वर्ग चक्र भरना आ जायगा । छ्न अष्टकवगं चक्र आठवां है उसे देखो । उसमें सूर्य ३,४,६,१०,११,१२ स्थान में शुभ रेखा देता है। यहाँ सूर्य मीन में है वहाँ से गिनना आरम्भ किया वहाँ पहले स्थान में ० रखा । वहाँ से दूसरा स्थान मेष में भी० है तीसरे स्थान वृष में शुभ की रेखा दी है । चोथे स्थान मिथुन में भी शुभ की रेखा दी है। पांचवा स्थान कर्क में ० हैं । छठे स्थान सिंह में शुभ रेखा है । ७,८,९ स्थान कन्या तुला वृश्चिक में ० है आगे १०,११,१२ स्थानों शुभ की रेखा है इससे नवाँ स्थान घन, दशम मकर और एकादश स्थान कुम्भ में रेखा दी है । चन्द्र जहाँ है वहाँ से इसीप्रकार ३,६,१०,११ स्थान में शुभ रेखा पड़ी है शेष अशुभ स्थानों में ० दिया है अर्थात् चन्द्र कुम्भ में है वहाँ से तीसरा स्थान मेष राशि, छठा स्थान ककं में, १० स्थान वृश्चिक राशि में और चन्द्र से म्यारहवें स्यान धन राशि में शुभता सूचक रेखा दी है । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह या छन्न से गिनती करके उनके शुभ स्थानों में रेखा दी है शेष अशुभ में ० दिया है। ध्यान पुर्वक आगे भी उदाहरण देखने से सव समझ में आ जायगा ।
इन अष्टक वर्ग चक्रों में एक विशेषता यहाँ दी है । सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि लग्न आदि क्रम से जैसा कि इतर ग्रंथकारों ने दिया है, यहाँ न देकर शनि गुरु मंगल सूर्य शुक्र बुध चन्द्र और लग्न इस क्रम से दिया है। इसका कारण यह है जब अष्टक वर्ग के अनुसार उसके प्रभाव का समय जानने की आवश्यकता हो तो उस राशि के पूरे तीस अंश में इसी क्रम से ग्रहों का प्रभाव पडेगा । पहिले शनि का फिर गुरु का फिर मंगल का इत्यादि यहाँ दिये क्रम से अपने-अपने अष्टमांश में प्रभाव पड़ेगा ।
भष्टक वर्ग विचार : १०१
उस राशि के ८ भाग करने से एक भाग ३०-६-८ भंशर>३०-४५? का पड़ेगा दूसरा
भाग ७०-३०' तक, तीसरा ११९९-१४! तक, चौथा १५°-०' तक, पांचवां १८५९-४५?
तक छठा २२-३० तक, सातवां २६-१५" तक और आठवाँ भाग ३००-०' तक
का होगा । इस प्रकार अष्टक वर्ग में जिस भाग में शुभ रेखा हो उस ग्रह के उतने अंश
तक शुभता रहेगी जहाँ ० हो उस भाग में अशुभता रहेगी । इसके सम्बन्ध में गोचर में
भी और समझा दिया गया है ।
यह जानने के लिए कि वह शुभ या अशुभ फल किस समय तक रहेगा । उस ग्रह
के एक राशि में भुगतने के समय को ८ से भाग देने से जो अष्टमांश प्राप्त होगा वह
उस रेखा या बिन्दु के फल के भोग का समय रहेगा ।
ना
ग्रह एक राशि में भोगने १ अष्टमांश १ अष्ठमांश का
'का समय मास-दिन-घडी-पल भोग्यांश
१ शनि ३० मास-:-८ ३-२२-३०---० ३-४५
२ गुरु १३ मास- ८ १-१ ८-४ ५---० ३-४५
३ मंगल १॥ मास-<-८ ०- ५-३७-३० ३-४५
४ सूर्य १ मास -- ८ ०- ३-४५० ३-४५
५ शुक्र १ मास ८ ०- ३-४५-० ३-४४
६ बुध १ मास -+८ ०० ३-४५--० ३-४५
७ चन्द्र २। दिन--८ ०- ०-१६-५२ ३-४५
जैसे शनि के अष्टक वर्ग से फल का समय जानना है जन्म समय जन्म राशि के सप्तम
में सिंह का शनि है। गोचर में भी मान लो सिंह राशि पर शनि है । शनि के अष्टक वर्गे
में सिह राशि में केवल तीसरा, पाँचवाँ और आठवाँ अन्तिम भाग से शुभ रेखा है शेष में
अशुभ सूचक शून्य है तीसरा भाग ७१-३० से ११-१५ तक है पांचवां भाग १५-०”
से १८५९-४४” तक आठवां भाग २६०-२५' के वाद ३०-०' तक और शनि के इनके
अंशों में शुभता रहेगी शेष अंशों में अशुभता रहेगी । शनि का एक भाग २ मास २२
दिन ३० घड़ी में भुक्त होता है इसलिये सबसे शनि के अंशों के विचार से वह समय
कब से कब तक रहेगा समय निकाल लेना चाहिये नीचे दिये हुए चक्र से वह स्पष्ट
हो जायगा ।
१०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
| है 12122 >५९ 102122 (७४७० 19: । हे ७ 182 ih 12४५ k ३012 be] 80 Rb 1120 891९ 102५ 1५४ 1७ kik ER LS 21819 १० ४ १:२ ७२२ > ३० है 1015 म फा kh 1५२ Da) ५४ (122keh 1७ ॥ REID? hi 9७ ६०९ 3 हा (22 ७४४७ ५ h 1६४५४२७४ पू [hut खाण
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Wtt-At-b ॥&-2७ la -५९८-०१०० -५ ०१-८८-०।, ४५-५७ +
ok—e— b ° —kb ' ot—tt-o ० —kb-b ° -०-४४ ०-३ a
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॥2४-४७-० 1902 ॥9९-३-० ४१५-५७-७ ० पेने ४४-४६ b
85 18७ 122] ४७ ४४] ७८४ 81४... 1२३ शु 811 1818 ७७] 919 2५ 122 hh २1७० ८०1५ ८1५ 4215 15102012
21% brs 1% ४2० Ie wf ‘sb ‘ph hls le 2108 hel 1७ 26 0५७ km Je hk ४२७२ कील
अष्टक वर्ग विचार : १०३
स॒वं अष्टक वर्ग चक्र का उदाहरण
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १ २ “ग्रह लग्न शनि मंगल केतु गुरु चन्द्र सूयं योग रा बुध शुक्र सूर्यं ५ ३ .४ ६ २ ७ ४ २ ३ ३ ५ ४ ४८ चन्द्र है ४ इ. ४ ३. ३. ७ ९ र कर TERS मंगल ५ ३ ५ १ २ ४ ५ २ ३ २ ४ ३ ३९ बुध ३ ६° ४ ४ रा डी Ev NINN RR गुर
शुक्र ३ थे ४ ह. ६ ६ ७ डो NT भ Rr ४ ४ ४२० ४४ दा RN Ou र ENS शनि ४ २ ३ ४ ४ ३ ४ ४ १ ३ ४ ३९ छन ४ ४ ४ ३ ३ ७३ ४३४३ ३४३ ४५ ४ ४९ शुभयोग ३७ ३१ ३२ २९ ३० ४३ ३९ ३२ २३ २६ ३७ २७ ३८६ सर्वयोग
यहाँ सूर्ये अष्टक वर्ग चक्र में जो योग शुभ रेखाओं का आया था वह सूर्य के आगे लिख दिया । चन्द्र अष्टक वर्ग चक्र का योग चन्द्र के सामने लिख दिया इसी प्रकार प्रत्येक अष्टक वर्ग चक्र के योग को वहाँ लिखकर अन्त में सब का योग कर दिया है । यहाँ १२ भाव का शुभ रेखा चक्र नीचे लिखें अनुसार हुआ । इन रेखाओं से शुभाशुभ फल का विचार होता है। इसी से सबै अष्टक वर्ग कुंडली बनती है । द्वादश भावस्थ शुभ रेखा योग चक्र राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १ १ २ भाव लग्न धन सहज चतुर्थ पंचम षष्ठ सप्तम अष्टम नवम दशम ळाभ व्यय शुभरेखा योग ३७ ३१ ३२ २९ २९ ४३ ३९ ३१ २३ २६ ३७ २७
त सर्वं अष्टक वर्ग कुण्डली पिछले दिये हुए शभ योग को यहाँ कुंडली में रख दिया है जिससे प्रकट हो कि
भाव को कितनी रेखा मिली हैं ।
इस सवं अष्टक वर्ग कुंडली में कोई लग्न छोड़ कर केवळ ग्रहों का शुभ योग दे
देते हैं कोई लग्न सहित देते हैं या प्रथम
दोनों दे देते हैं ।
इनं रेखाओं का क्या क्या फल होता
है आगे दिया है ।
व (३१)
७ (३०) न ९ De ड0
चमं» (४३) १ “(३२६ A
re EE “रश ८०
१०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सवं अष्टक वगं कुण्डली.से अवस्था का विचार (१) बाल्यावस्था प्रथम खंड आदि खंड की राशियाँ १२-१ २३ (२) युवावस्था द्वितीय खंड मध्य खंड की राशियाँ ४+५+६+७ (३) वृद्धावस्था तृतीय खंड अन्त खंड की राशियाँ ८-९-१०११
की मीन राशि से आरम्भ कर ४-४ राशियों का एक खंड होता है। इन्हीं राशियों
है
सर्वे शुभ रेखाओं का योग करने से स्थूल रूप से जीवन का शुभाशुभ समझा जाता
जोड़ी
। इसमें
जाती विशेष
। बात यह है कि इसमें अष्टम एवं द्वादश स्थान की राशियाँ नहीं : ऊपर की सवं अष्टक वर्ग कुंडली देखो (१) राशि १२ १ ३ योग १०० रेखा इसमें वृष राशि व्यय भाव रेखा २६ ३७ ३७ में पड़ने से छोड़ दिया । (३) इगि ३१ $ याम १२२ रेखा इन सबको पूरा ल्या ।
(३) राशि ८ ९ ११ रेखा ४३ ३९ २३ योग १०५ रेखा इसमें मकर राशि अष्टम में पड़ने
योग कप
इसका
है
और भी विचार इस प्रकार होता है कि जो तीनों खंड की रेखाओं का
उस खंड में सुख उसके
अधिक ३ भाग रहेगा करना । । इस तृतीयांश से जिस खंड में रेखा अधिक हो “७2
भाव को रेखाओं के अनुसार आयु खंड पर विचार
उसका प्रत्येक
उदाहरण खंड मे नीचे ऐयक-पुथक
दिया भाव की रेखाओं पर से भी फल का विचार होता है है-- १ खंड भावं १० ११ १२ १ राशि १२ १ २ ३ ब स २11६ रा
अष्टक वर्ग विचार: १०५
२ खंड भाव २ ३ ४ ष्र राशि ¥ ण ६ ७
रेखा ३१ ३२ २९ ३०
ग्रह + श० + x
३ खंड भाव ६ ७ दु ९ राशि ऱ ९ १० ११
रंखा ४३ ३९ ३२ २३
ग्रह मं० के० गु० चण्बु०
(१) यहाँ प्रथम बाल्यावस्था में दशम भाव में २६ रेखा हैं । २७ से अधिक रेखा
शुभ समझी जाती हैं। यहाँ २७ से कुछ ही कम हैं तो व्यापार पिता कमं आदि संबंध
से साधारण फल होगा मध्यम फल के लगभग है । क्योंकि इस भाव में सूयं और शुक्र
भी है । जिससे कुछ मिश्र उन्नति साधारण प्रकार से होगी।
लाभ में ३७ रेखा हैं अधिक रेखा होने से आथिक सुख अच्छा रहेगा । व्यय में
२७ रेखा होने से व्यय की समता रहेंगी । लग्न में ३७ रेखा होने से शारीरिक सुख
आरोग्यता आदि उत्तम रहेगा ।
(२) द्वितीय खंड में धन भाव में ३१ रेखा होने से धन का लाभ अच्छा रहेगा ।
तृतीय भाव में ३२ रेखा होने से भाई बंधुओं का सुख श्रेष्ठ रहेगा । परन्तु इसमें शनि
होने से पूणं सुख में कुछ हानि करेगा । चतुर्थ में २९ रेखा है सुख, माता हा सुख
आदि साधारण अच्छा रहेगा ! पंचम में ३० रेखा हैं इससे बिद्या संतान आदि का सुख
साधारणतः अच्छा रहेगा |
(३) तृतीय अवस्था में रिपु भाव में ४३ रेखा हैं शत्रु रोग आदि का नाश होकर
पूर्ण सुख रहेगा । सप्तम में ३९ रेखा है । स्त्री सुख अच्छा रहेगा परन्तु इष्ट में पाप
ग्रह केतु के होने से स्त्री सुख क्षीण करेगा बाधा उत्पन्न करेगा । अष्टम में ३३ रेखा हैं
स्वास्थ्य ठीक रहेगा । इसमें गुरु शुभ ग्रह होने से स्वास्थ्य सम्बन्धी सुख अच्छा
रहेगा । नवम में केवल २३ रेखा हैं मध्यम से कुछ कम रेखा हैं इससे धमं आदि संबंध
'से कुछ कष्ट होगा परन्तु इसमें शुभ ग्रह चन्द्र और बुध होने से शुभता को बढ़ावेगे ।
इससे धमं आदि की हानि नहीं होने पायगी ।
इस प्रकार रेखाओं से साधारण प्रकार से फल का विचार होता है । यहाँ लाभ
भाव में ३७ रेखा हैं व्यय में २७ ही रेखा हैं | लाभ से व्यय में कम रेखा होने से
अच्छा है। लग्न में व्यय से अधिक रेखा हैं ३७ रेखा हैं इससे जातक धनवान् ओर
"भाग्यवान् रहेगा ।
अवस्था के खण्ड त्रय विचार में कुछ मतान्तर भी है
खंड त्रय कोई भाव के अनुसार गिनते हैं :--
(१) खंड १२-१-२-३ भाव का (१) खंड लग्न, २, ३, ४ भाव का (२) खंड ४, ५, ६, ७ भाव का (२) खंड ५, ६, ७, ८ भाव का (३) खंड ९, १०, ११ भाव का (३) खंड ९,१०,११,१२ भव का
Fs rr(> दुत
१०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
परन्तु ये मत अधिक मान्य नहीं हैं । उपरोक्त मत ही मान्य हैं।
अष्टक वर्ग रेखाओं का फल आगे दिया है ।
(४) तीनों खंड में बराबर रेखा हो तो जीवन सदा एक सा रहेगा । जिस खंड
में कम रेखा हों उस भाग में सुख कम होगा । बहुत ही कम रेखा हों तो उस भाग
में रोग संताप आदि से पीड़ा होगी । जिस भाग में बहुत रेखा हों वह भाग सुखदाई
एवं उन्नतिकारी होगा । अष्टक वर्ग की रेखा या शून्य पर से शुभत्व विचार
यहाँ रेखा शुभ और शून्य अशुभ बताया है।
रेखा बिन्दु शुभ अशुभ विचार ८-० ८-० ऊष +१ पूणं शुभ अधिक
- ७+१ ७--१ +६/८ + ३/४ पौन शुभ अधिक
६५२ ६२ +४/ष + १/२ आधा शुभ अधिक
५+ हे श- रे --२॥/८ + १/४ पाव शुभ अधिक `
४--४ ४-४ +०|ऽ +° समफल सम
३+५ ३—५ २/७८ --१/४ पाव अशुभ अधिक
२+६ २६ ४८ --१/२ आधा अशुभ अधिक
१०७ १--७ --६|८ --३/४ पोन अशुभ अधिक
०+ ०_—ष _८|ष १ पूर्ण अशुभ अधिक
साधारण प्रकार से ८ रेखा पूर्ण शुभ फल । ६ रेखा पौन शुभ फल । ४ रेखा,
आधा शुभ फल । २ रेखा पाव शुभ फल ऐसे ही बिन्दुओं से अशुभ फल समझना ।
अर्थात्. किसी अष्टक वर्ग की राशि में पूरी ८ रेखा हो तो वहाँ पूर्ण शुभता होगी ।
यदि शुभ रेखा एक भी न हो पूरे ८ शून्य हों तो वहां पूर्ण अशुभता रहेगी । यदि ४
रेखा ओर ४ शून्य हो तो अच्छा और बुरा फल बराबर होकर सम फल होगा यदि ७
रेखा हों तो उसमें एक अशुभता आने से उस राशि में पौन शुभता की अधिकता रहेगी
यदि ७ विन्दु हों तो उसमें अशुभता तो अधिक रहेगी परन्तु पूरा अशुभ फ नहीं होगा पौन अशुभ फल होगा । जहा+चिल्व है वहाँ शुभता अधिक रहेगी । जहाँ-ऋण चिह्न है वहाँ अशुभता अधिक रहेगी । अब रेखाओं के अनुसार शुभाशुभ फल का विचार नीचे दिया है (१) रेखाफछ- नाना रोग, दुःख, भय, कष्ट, देशाटन ।
(२) रेखाफल--मन में संताप, राज भय, चोर हानि, धन हानि ।
(३) रेखाफल- मानसिक विफलता, यात्रा, शरीर कष्ट, दुःख, व्यसन । (४) रेखाफल--समफल, सुख और दुःख, धन का लाभ और व्यय ।
(४) रेखाफल--सन्तान सुख, धनागम, सन्त संगति, कल्याण, आरोग्य, नित्य सुख, विद्या लाभ ।
(६) रेखाफल--यश, घन, वाहन, साहस,, विजय, चित्त, घन लास. !
भष्टक वर्ग विचार : १०७
(७) रेखाफल--वाहन, सुख, धन एवं पद वृद्धि, पूर्ण सुख सम्पत्ति की वृद्धि 1 (ऽ) रेखाफल--राज सम्मान, श्रेष्ठ लक्ष्मी की प्राप्ति, सब मनोरथ सिद्ध, सुख दायक समय, कार्य पूर्ण ।
५ से अधिक रेखा ( शुभ ) जिस राशि में हो उस राशि में अपने अष्टक वर्ग में ग्रहों ग्रह वह सदा शुभ होता है । अल्प रेखा वाला ग्रह गोचर में दुष्ट फल देता है । ग्रहों के अनुसार अष्टक वर्ग का रेखा बिन्दु फल १. सूर्य रेखा--जिस भाव से उत्पन्न हुई सूर्य की रेखा हो तो शत्रुओं का पराजय, सहसा सिद्धि ।
“विन्दु अशुभ फल दायक, अधिक व्यसन करने वाला, रोग शोक देने वाला, बिना कारण राजा द्वारा उद्देग ।
२. चन्द्र रेखा--वस्त्र भूषण, भोजन प्राप्ति, राजा से सम्मान, अकस्मात् उत्तम कमं की प्राप्ति\ ` :
“बिन्दु ' कष्ट फळ, शत्रुओं से कलह, दुष्ट स्वप्न, वित्त धन का नाश । ३. मंगल रेखा-सदा अथे को प्राप्ति, आरोग्यता,आयुष्य की वृद्धि, कांति की वृद्धि 1 “बिन्दु” सदा जठराग्नि का रोग, सिर पीड़ा, रक्त पित्त का रोग ।
४ बुध रेखा-सुख ओर मिष्ठान्न भोजन लाभ, दान कमं में धमं में रत, देव द्विज और अग्नि का पूजक ।
'बिन्दु' भंग, शत्रुओं से कलह, दुःस्वप्न दर्शन, नित्य असमय भोजन ।
५ गुरु रेखा--सदा धन सुख आदि तथा पुष्टि, स्त्री भोग दायक है शत्रु का नाश मनोत्साह अधिक,अतुळ विभव वस्त्र सुवर्ण सुख आदि की वृद्धि बंधु वर्ग से सौख्यछाभ ॥ “बिन्दु” कष्ट, धन और बुद्धि का नाश, मानसिक एवं घर की चिता,मागं में दुःख, वाहन से पतन, सर्वत्र कलह, अपने ही वचनों द्वारा अपमान, शत्रुओं से द्वेष के कारण
खर्च और साहस से कार्य हानि ।
६. शुक्र रेखा--राज सम्मान वृद्धि, कपट का लाभ, शरीर का सुन्दर सुख,
दीर्घायु, क्रीडा ( खेल ) में मग्न, ज्ञान प्राप्ति, अर्थ की सिद्धि, लक्ष्मी का लाभ, सुख
सम्पत्ति की वृद्धि ।
“बिन्दु! शत्रु से कष्ट, धन नाश, स्त्री को पीड़ा, कलह, भूमि का नाश, बुद्धिनाश, सदा अधिक खर्च, घोडे से गिरना, मार्ग में चोर भय आदि ।
७. शनि रेखा- श्रेष्ठ फल, नौकरों के हेतु धन, कार्य सिद्धि, राजा से मित्रता,
सत्पुरुषों से सम्बन्ध, भूमि की प्राप्ति, दुष्ट जनों से जय प्राप्त हो, स्नान, दान, पूजन में
प्रेम, राज आश्रय से मिष्ठान्न भोजन खेती तथा धान्य की वृद्धि हो ।
“बिन्दु! कष्ट, राज से भय, बन्धुजनों में पीडा की वृद्धि धातु शस्त्र या दुष्टजनों से
धन नाश, चित्त में उद्देग, भुमि का नाश, कलह, बुद्धि नाश, वाहन से हीन ।
इन रेखः या विन्दुओं का फल--इनकी संख्या अधिक हो तो अधिक फल होगा ।
संख्या अल्प होगी तो अल्प फल होगा ।
२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
समुदाय रेखा अनुसार भाव फल
जिस भाव में ३० से अधिक रेखा हों वह शुभ । २५ से ३० रेखा हों तो मध्यम
'फल । २५ से कम रेखा हों तो वह भाव या राशि अशुभ है कष्ट प्रद होती है । जिस
राशि में ७ रेखा या कम हो उस महीने में ( उस राशि के सूयं में ) मृत्यु भय हो इस
के दोष निवारण के लिए उचित दान द्वारा शांति करायें।
८ रेखा--मृत्यु संभावना ।
९ रेखा--सर्प भय ।
१० रेखा- शस्त्र भय ।
११ रेखा--मिथ्या अपवाद का भय ।
१२ रेखा--जल में डूब कर मरने का भय ।
१३ रेखा- व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु से मृत्यु भय ।
१४ रेखा- मृत्यु भय या धमं अर्थ काम की हानि, अंग पीड़ा, व्याधि ।
'१५ रेखा--राजभय, या बडी आपत्ति ।
१६ रेंखा--अरिष्ट भय या राजभय अंग पीड़ा व्याधि ।
१७ रेखा--रोगभय या नाश, दुःख, हानि ।
१८ रेखा--कलहभय या धन हानि ।
१९ रेबा--प्रवास ( विदेश वास ), या कुपति एवं बंधु वर्ग से कष्ट ।
२० रेखा--बुद्धिनाश, कलह ।
२१ रेखा--रोग कष्ट, हृदय में दुःख या हृदय रोग
२२ रेखा--बन्धुओं को पीड़ा, अपमान, कार्य में निष्फलता, पराजय, दीनता,
चुद्धि भ्रष्ट । रे
२३ रेखा--स्वयं कष्ट, धमं काम तथा अर्थ की हानि ।
२४ रेखा--बन्धुओं की मृत्यु, अकस्मात धन हानि ।
२५ रेखा--बुद्धि हानि, हस्तागत द्रव्य की हानि ।
२६ रेखा--धन हानि, कलह क्लेश ।
२७ रेखा--धन हानि, समता दुःख सुख की समता, शुभाशुभ फल की समता ।
२८ रेखा--सर्वांश में हानि या धनागम सुख, मान प्राप्ति ।
२९ रेखा-- अनेक चिता से व्याकुल, या मनुष्यों में पूज्यता ।
३० रेखा--घन धान्य की पूर्ण प्राप्ति, र।ज पूज्यता, पुण्य, सुख, मान ।
३१ रेखा--धन, सुकृत और सुख प्राप्त ।
| ~ ___ ३२ रेखा-विशेष सम्मान ।
.। ३३ रेखा--समस्त सिद्धि, विशेष लाभ । | ३१ से ५६ तक--अधिक उत्तम फल की उत्तरोत्तर वृद्धि हो राज्य प्राप्ति कार्य
. सिद्धि बादि हो ।
अष्टक वर्ग विचार : १०९.
"पर्वं अष्टक वर्ग कुण्डली पर विचार
(१) जहाँ कुम्भ में २३ रेखा=कनिष्ट
फल । मीन में २६ वृष में २७, तुला में
३० रेखा है=मध्यम शुभ। ककं ६० सिंह
और मकर ३२=कुछ अधिक मध्यम से
शुभ । मेष और मिथुन ३७, धन ३९-्श्रेष्ठ
फल । वृश्चिक ४३ का अति श्रेष्ठ फल
होगा ।
(२) लग्न में ३७ रेखा होने से भाग्यवान् होगा ।
« (३) सबसे लग्न की रेखा अधिक हो तो भाग्यवान् होता है सबसे कम होने से
भाग्यहीन होता है 1
(४) दशम से एकादश में कम रेखा होने से लाभ अल्प व्याधि अधिक हो यहाँ
लान रेखा होने से लाभ आदि अधिक हो वहाँ दशम से लाभ में रेखा अधिक होने से शुभ है।
हृ (५) दशम से लग्न की रेखा अधिक होने से लाभ मान आदि अधिक होगा मध्यम
से मध्यम फल, हीन से भोग सम्पत्ति की हानि होती है यहाँ दशम से लग्न में अधिकः
रेखा है शुभ है लाभजनक है ।
(६) लग्न की दिशा--लग्न आदि १२ राशियों का सबं मागे से पूर्व आदि क्रम से'
तीन-तीन राशियाँ पूर्व आदि दिशा में जानना ।
जैसे पूर्वे-१-१२-११ भाव ] प्रत्येक दिशा के ३ राशियों का फल योग
दक्षिण--१०- ९-८ „ ( जहां अधिक हो उस दिशा में शुभ या पश्चिम--७- ६-५ ,, । लाभ । जहाँ हीन फल हो वहाँ अशुभ ।
उत्तर--४- ३-२ » J
यहाँ लग्न से लाभ तक ३७+ २७+ ३७=१०१ पूर्व यहाँ पश्चिम दिशा
दशम से अष्टम , २६+ २३+ ३२-८१ दक्षिण | में अधिक रेखा हैं वहाँ से सप्तम से पंचम , २९--४३ -- ३०१११ पश्चिम|छाभ होगा उससे कम रेखा
चतुर्थ से धन ,, २९+ ३२+ ३१-९१ उत्तर | उत्तर की हैं ।
यहाँ ५४ से ७५ तक क्षीण फल होता है । ७५ से ९० तक योग में मध्यम फल
और ६० के ऊपर उत्तम फल होता है । यहाँ दक्षिण दिशा में मध्यम फल है । शेष
दिशाओं में उत्तम फल है । उन २ दिशाओं से लाभ होगा ।
(७) जिस दिशा में रेखा अधिक हों वहाँ स्वोच्च आदि गत ग्रह भी हो उस दिशा
में कायं सिद्ध होता है ।
(८) धनेश जिस दिशा में हो वहाँ से घन लाभ । अष्टमेश जिस दिशा में हो वहाँ
मृत्यु । वहाँ धनेश चन्द्र नवम में दक्षिण है और अष्टमेश शनि तृतीय उत्तर में है ।
4१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अष्टक वर्ग रेखा का विशेष विचार
(१) शुक्र या पाप ग्रह की रेखा--सब शुभ फल देती है ।
(२) शुभ या पाप ग्रह का शुन्य--दुःख देने वाले हैं ।
(३) रेखा अधिक हो तो शूभ फल, बिन्दु अधिक हो तो अशुभ फल होता है रेखा
और बिन्दु समान हो तो--समफल प्राप्त होता है यदि गोचर में अन्तर न होवे तव ।
(४) १ रेखा अधिक--लक्ष्मी प्राप्त १ बिन्दु अधिक---उद्देग ।
२ रेखा अधिक--भोग प्राप्त २ विन्द्र अधिक--हानि ।
३ रेखा अधिक--सूख प्राप्त ३ बिन्दु अधिक--रोग ।
४ रेखा अधिक*न्चेक्रंवर्ती राजा हो ४ बिन्दु अधिक--मृत्यु भय ।
(५) ग्रह गोचर में श्रेष्ठ हो परन्तु अष्टक वग में मध्यम हो और अपनी दशा में
अधम हो तो बहुत खराब ही होता है ।
(६) अष्टक वर्ग से किसी शुभ आदि कार्य करते समय उस दिन का अष्टक वर्ग
बनाकर प्रत्येक ग्रह की रेखाओं का योग करके शुभाशुभ फल का विचार होता है ।
इसे लिये जिस कायं में जिस ग्रह का फल कहा है वह ग्रह जब श्रेष्ठ राशि में हो
तो उस कार्य को करना । जेसे चन्द्र बल सब कायं में देखा जाता है जब चन्द्रमा श्रेष्ट
राशि में हो तभी शुभ कार्य का आरम्भ करना । कष्टप्रद राशियों में शुभ कार्य नहीं
करना । उपनयन विवाह आदि कार्य में गुरु ग्रह की शुद्धता ली जाती है परन्तु वह भी
अष्टक वर्ग में शुद्ध हो तभी ग्रहण करना गोचर शुद्धि नहीं भी हो प रन्तु अष्टकवगं से
शुद्धि हो अर्थात् उस राशि में अधिक रेखा हों तो वह समय शुद्ध समझना । अष्टकवगं
शुद्ध हो तो गोचर शुद्ध विचारने की आवश्यकता नहीं है ।
(७) जिसके समुदाय अष्टकवगं में दशवे भाव से एकादश भाव में अधिक रेखा हो
और एकादश से व्यय भाव में अल्प रेखा हो तथा व्यय से लग्न में अधिक रेखा हो तो
वह भोगवान सुखी और धनवान् होता है ।
(८) जिस राशि में कम रेखा होने से अनिष्ट फल कहा है उस राशि के सम्वत्सर
सें जब उस राशि का मास (सौर मास) हो तथा उसी राशि में यदि चन्द्रमा झा जाय
इस प्रकार कम से कम ३ ग्रहों का योग उस राशि में हो तभी पूर्वोक्त फल की ( अर्थात्
पहिले जो सामूहिक रेखा का अच्छा या बुरा फल बता चुके हैं उसकी ) संभावना है । यदि उस राशि में और ग्रहों का संयोग हो जाय तब उक्त फल निश्चित रूप से समझना ।
( ९ ) जिस राशि में ३० से अधिक रेखा हो उस राशि के सम्वत्सर और मास एवं
नक्षत्र में धन पुत्र तथा अनेक सुख की वृद्धि हो ४० से अधिक रेखा हो तो धन पुत्रादि प्राप्ति के साथ ही पुण्य प्रतिष्ठा एवं सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है। ( १० ) जो ग्रह उच्च, मित्र गृही हो और जो केन्द्र कोण उप्रचय में हो, शुभवगं में हो, वलवान् हो उनकी भी यदि अल्प रेखा हो तो हानिकारक हैं । (११) जो ग्रह नीच या पाप ग्रह के वर्ग में युक्त हो जो गुलिक राशि के स्वामी
अष्टक वर्ग विचार : १११
के साथ हो तो वे भी यदि अधिक रेखा वाले हों तो सब काल में शुभ फल देने वाले होते हैं । ( १२ ) जितनी रेखा समुदाय अष्टक वर्ग कुण्डली में लग्न में हों उतने वर्ष बीतने पर वाहन, धन पुत्र विशेष विद्या आदि प्राप्त हो यदि वह सम्पत्ति योग वाला हो । (१३) व्यय भावेश शनि की राशि में हो और लग्न, अष्टम का स्वामी निर्बल हो तो लग्न में जितनी रेखा हों उतने वपं की आयु का अनुमान करना । (१४) चतुर्थेश लग्न में और लग्नेश चतुर्थ में हो उन दोनों राशियों में यदि ३३ रेखा हों तो राजलक्ष्मी युक्त राजा हो । यदि ३०-३० ही रेखा हों तो ४० वर्ष पश्चात् अधिकार प्राप्त हो ।
(१५) १--४-११ इन तीनों घर में ३० से अधिक रेखा हों तो तेजस्वी, बड़ा धनी हो ४० वर्ष के ऊपर राज्य मिले ।
(१६) २५ से ३० तक या अधिक रेखा यदि चतुर्थ ओर नवम राशि में हों तो
२८ वर्ष के पश्चात वाहन युक्त हो या यात्रा करे धन प्राप्त हो । (१७) उच्च ककं का गुरु चतुर्थ में ४० रेखा युक्त हो और लग्न में मेष का सूर्य
हो तो राजा हो लक्ष घोड़ों को अपने पास रखे ।
(१८) लग्न में ४० रेखा हो, धनु में गुरु, मीन में शुक्र, अपने उच्च में मंगल मौर कुम्भ में शनि हों तो सवं लक्षणों से युक्त सार्वभौम राजा हो ।
(१९) मेषादि तीन-तीन राशि में उनके अनुसार पूर्व आदि चारों दिशाओं में
अधिक रेखा वाली राशि की दिशाओं में धन आदि की वृद्धि हो ।
(२०) किसी ग्रह के अष्टक वर्ग में एक भी शुभ रेखा ग्रह न हो तो गोचर में जब यह ग्रह उस राशि में आये तो मृत्युभय हो ।
(२१) राशि जिसमें २५ से २८ तक शुभ रेखा हो वह मध्यम, २५ से कम रेखा
शोक या दुःख उत्पन्न करती है । ३० या अधिक शुभ रेखा सदा लाभदायक है ।
(२२) लग्न से १२ घरों तक सब घरों को देखो जिस-जिस भाव में अधिक रेखा
हो उन भावों सम्बन्धी काम करने में अच्छा फल देगा यदि रेखा कम हों तो कष्ट
होगा । इसमें ६-८-१२ घर को छोड़कर विचार करना ।
(२३) लग्न से शनि तक जितने घर हैं उन दोनों के स्थानों को मिलाकर सब
घर की शुभ रेखा जोड़कर ७ का गुणाकर २७ का भाग दो लब्धि में जो प्राप्त हो उन
वर्षो में जातक को रोग या कष्ट होगा ।
(क) इस प्रकार शनि से लग्न तक सब रेखा योग मे ७ का गुणा कर २७ का
भाग देने से लब्धि से उनके वषं में रोग आदि होगा ।
(ख) इसी प्रकार मंगल और राहु के बीच भी गिन कर उपरोक्त क्रिया द्वारा
विचार करना ।
इससे खराब अनहोनी बातों का समय प्रगट होगा ।
(२४) जिन घरों में शुभ ग्रह हो उनकी शुभ रेखा का योग कर ७ से गुणा कर
११२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२७ का भाग देना जो लब्धि हो उससे शुभता सूचक वर्ष प्रगट होगा उस समय जातक
को संतान, धन सुख आदि प्राप्त होंगे ।
(२५) जिस राषि में अधिक शुभ रेखा हैं उसमें सब शुभ काम करना उस विशेष
राशि, मास भाव आदि में अधिक शुभ रेखा देख कर शुभ कायं करना गोचर. में सूर्यादि
दुष्ट स्थानों में हों तो शुभ कार्य निषिद्ध है परन्तु अष्टक वर्ग के अनुस।र सूर्य आदि शुद्ध
हो अर्थात् इनकी अधिक रेखा हों तो शुभ कार्य करना | क्योंकि गोचर का फल स्थूल
है अष्टक वर्ग का फल सूक्ष्म है अष्टक वर्ग की शुद्धिसे कार्य सिद्ध होता है । अष्टकवर्ग
के अनुसार जिस मास में शून्य पड़ा हो उस मास में कलह दुःख. आदि होता है अतः
शुभ कार्य नहीं करना ।.
(२६) पाप ग्रह स्वगृही है तो उस भाव के फल को बढ़ावेगा यदि शत्रु स्थान या
नीच में हो तो पतन या हानि करे।
शुभ ग्रह भी यदि दुष्ट स्थान ६-८-१२ भाव में यदि उच्च का भी हो तो हानिः
करेगा । गत राशि का स्वामी जिस ग्रह के साथ हो वह भी अनिष्ट करता है ।
परन्तु अष्टक वर्ग में रेखा अधिक हो तो शुभ फळ देता है और शुभदायक ग्रह भी
रेखा कम हो तो शुभ फल नहीं देते ।
यदि ग्रह शुभ उच्च या स्वगृही हो अधिक रेखा हो तो फल को दुगुना करता है
अन्यथा होने से उसी क्रम से हीन फल देते हैं ।
!( २७ ) जातक की कुण्डली में अन्योन्य योग हो जैसे लग्नेश धन भाव में धनेश
लग्न में हो जिससे उन्नति प्रकट होती है, तो सर्वाष्टक में लग्न में जितनी रेखा पड़ती
, हों उतने वर्ष के पश्चात् भाग्योन्नति हो । मान लो लग्न में २९ रेखा और धन में ३०
रेखा हो तो उसकी उन्नति २९ या ३० वर्ष में होगी ।
( २८ ) एकादश स्थान में एवं लग्न में बरावर रेखा हों तो रेखा तुल्य वर्ष
बीतने पर राजा से मान धन ओर विद्या की उन्नति हो ।
( २९ ` यदि मकर या कुंभ लग्न हो लग्न में व्ययेश हो, लग्नेश और अष्टमेश
निर्बल हों तो सर्वाष्टकवर्ग में जितनी रेखा लग्न में पड़े उतनी ही आयु हो। .( ३० ) सूर्यं अष्टक कुण्डली में लग्न में जितनी रेखा हों उतने वषं में जातक
की उत्नति होगी ।
„ (३१) चन्द्र और लग्न में बरावर रेखा हो तो उतने वर्ष बीतने पर राजा से
सान धन विद्या आदि प्राप्त हो ।
( ३२ ) लग्न व एकादश में ३०-३० से अधिक रेखा हों तो ४० वर्ष बाद बहुत उन्नति हो और अनेक अधिकार प्राप्त हों ।
( ३३ ) लग्न, नवम, दशम एवं लाभ में ३० रेखा से अधिक हो तो जातक सुखी एवं भाग्यवान् हो ।
( ३४ ) यदि लग्न में २० से कम रेखा हो और तीसरे भाव में ४० से अभिक
रेखा हों तो जातक उच्चाधिकारी होता है ।
अध्टक वर्ग विचार : ११२
अष्टक वर्ग से गोचर फल विचार
( १ ) प्रत्येक ग्रहों को अष्टक वर्ग रेखा से गोचर में फल का विचार करने में
जब वह ग्रह गोचर में किसी राशि में आता है तो उसके अष्टक वगं में देखना कितनी
रेखा हैं यदि १, २ या ३ रेखा हो तो उसका फल अच्छा नहीं होगा ४ रेखा हो तो
उसका फल अच्छा नहीं होगा ५ रेखा हो तो मध्यम फल होगा । ५ से अधिक्न रेखा हो
तो उत्तम फल होगा।
जैसे सूर्य अष्टक वर्ग में कर्क में ३ रेखा पड़ी है इसमें गोचर में कर्क के सूर्य में
अच्छा फल नहीं होगा ।
(२ ) जिस राशि में शून्य हो एक भी रेद्या न हो जब सूर्य उस राशि में जायेगा
तो रोग भय अपवाद आदि होंगे ।
(३ ) इसी प्रकार चन्द्र अष्टक वर्ग द्वारा चंद्र का, मंगळ अष्टक बर्ग द्वारा मंगल
का गोचर फल विचार करना । 4
(४) गोचर का शनि जब उस राशि में आता है जिसमें रेखा नहीं है तो रोग
शत्रु भय आदि उत्पन्न करता है । ५
(१) रेखा यदि बिन्दु से कम हो तो दुःख हो (दिव्य शस्त्र आदि का भय हो'।
_ (२) जहा ५ रेखा से अधिक हो यहाँ शुभ फल कहना जितनी रेखा अधिक हो
उत्तना लाभ हो । * *
(३) किसी ग्रह के अष्टक वर्ग से उसकी राशि से फलाफल विचारना जैसे मंगल
के अष्टक वर्ग में कर्क राशि में ५ शून्य और ० रेखा है । रुशमें नुफ रंखा से २ शून्य
अशभता के अधिक है तो उस राशि में मंगळ ३ अशुभता अधिक रहेगी । घन ४ रेखा
० बिन्दु है तो इस राशि भी में डे शुभतो अधिक होने से घन का मंगल गोचर है सदा
शुभ रहेगा । इस प्रकार शुभाशुभ विचार लेना । यहाँ मंगल जब १ गोचर में इन
राशियों में जायगा तो इस प्रकार फल होता है--
मिथुन में रेखा ५ बिन्दु ३ शेष २ रेखा--शुभ भाग बचने से-मेष का मंगल शुभ होगा
कक में ३ रेखा ५ बिन्दुशेष २बिदु १अशुभ अधिक होने से-वृष का मंगल अशुभ होगा
सिह में ४५ ५२ » र ररेखा-शुभ अधिक होने से-मिथुन में शुभ होगा
६ बिन्दु-अशुभअधिक होने फल सदा अशुभ होगा कन्या मे ., ७ ,, »
तुला में १ , ७ » » ६ बिन्दु-अशुभ अधिक होने से तुला का सदा अशुभ होगा
वश्चिक मैँ४,, ४ ,, » ० बिन्दु-शुभाशुभसम है वृश्चिक में मध्यमफल शुभ होगा
धन में ५ ,, ३ » ४ २ रेखा-शुभ अधिक होने से-धन का मंगल शुभ होगा
मकर में २,, * # » * बिन्दु-अशुभ अधिक होने से-मकर का मगल अशुभ होगा
कुंभ में२ + ५» » र बिन्दु-अशुभ अधिक होने से- कुंभका मंगल अशुभ होगा
मीन में २ ,, ६ » » ४ बिन्दु-अशुभ अधिक होने से-मीन का मंगल अशुभ होगा
भेष में ४ „ ४ » २२ ० बिन्दु-सम फल होने से--मेष में मध्यफल
बुधमें , ४ ४ „ रै विन्दु-अशुभ अधिक होने से वप का मंगल अशुभ होगा
ता 11 च