सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
परमोच्च तवांश--उच्च नवांश को ही परमोच्च नवांश समझो । क्योंकि कोई ग्रह
उच्च में हो उसे परमोच्च नवांश में लाने को उसका उच्च स्थान ही बदल जाता है।
दोदशांश का फल दया
किसी राशि के द्वादशांश का कोई क्रम हो उससे द्वादशांश में जो राशि आवे उस
राशि के फल के समान सभी राशियों के द्वादशांश के फल होंगे जसे यहाँ बताया गया है ।
मेष लग्न में प्रत्येक द्वादशांश का फल
(१) पहिला द्वादशांश ( मेष )--नेत्र लाळ, गोल, भोजन में उष्ण पदार्थ प्रिय,
अल्प भोजन जल्दी खाये, प्रसन्न कीति, अल्प यथुन, बहुत धन न हो, शूरवीर, स्त्रियों
का प्रिय, नौकरी करे, खुशामदी, मस्तक में फोड़ा, गविष्ठ, सबसे श्रेष्ठ, अति चपल, जल से भय करे, हाथ में चिह्न ।
(२) .दूसरा द्वादशांश ( वृष )--सुन्दर, विलास कर गमन करे, जांघ के ऊपरी
भाग, मुँह, पीठ का भाग व छाती के दोनों वाजू मोटे हों, दयालु, क्लेश सहन करने
वाला, मुख्य अधिकारी, अधिक #न्या हों, कफ प्रकृति, लोकप्रिय, क्षमाशील, बहुत खाने
वाला, स्त्री प्रिय, बहुत मित्र हों, वालपन में दु:खी, तरुणपन और वृद्धावस्था में सुखी, बंधु, धन, कुटुम्ब नहीं रहे ।
(३) तीसरा द्वा० ( मियन )--स्त्रियों का अभिलाष करे, कोक शास्त्र में
प्रवीण, लाळ नेत्र, कुञ्चित केश, चतुर, शास्त्र जानने वाला, नौकरी करे, बुद्धिमान्,
लोगों का इशारा जाने, जुआडी, सुन्दर शरीर मधुर भाषण, अधिक भोजन करे, गीत नृत्य प्रिय, नपुंसक की संगति, नाक ऊँची और लम्बी ।
(४) चौथा द्वा० ( कर्क ) - कुटिल, जल्दी चलने वाला, स्त्रियों के कहुने में रहे,
उत्तम, सित्र, ज्योतिष का ज्ञान हो, बहुत घर फिरने वाला, भ्रमण, द्रव्य नाश, ठिगना,
गला बड़ा, मीठी वोली से वश में करने वाला, मित्रों का प्रिय, जलाशय या बगीचे में फिरे । कूल्हा बड़ा ।
(५) पञ्च हा० (सिंह) --अधाभि 5, क्रोधी, ठुड्डी गाल व मुँह बडा, पिग नेत्र,
अल्प संतति, स्त्री का द्वेषी, मांस, वन और पर्वत का प्रेमी, नौकरों की वात पर
क्रोध करे, असामयिक भूख व तृष्णा के कारण पेट दाँत को पीड़ा होवे, दाता व परा- क्रभी, स्थिर बुद्ध, यविष्ठ, मातृभक्त माता के कहने में रहे ।
(६) षष्ट द्वा० ( कन्या )--उत्तम शरीर, गम्भीर, लज्जालु, शीतल दृष्टि, सुखी,
प्रिय बोलने वाला, सत्य वक्ता, धार्मिक, परमार्थ सम्बन्धी वात करे, सूक्ष्म देह, नृत्य,
गीत, वाद्य व चित्रकारी में कुशल, पंडित, वुद्धिमान्, काम साधने में तत्पर, परदेश भ्रमण, दूसरों से द्रव्य मिले, बहुत कन्या, पुत्र अल्प ।
(७) सप्तम द्वा० ( तुला )--देव ब्राह्मण साधु सन्त को मान देवे, गई बात
स्मरण करे, बुद्धिमान्, विचारशील, लोगों के धन की इच्छा करे, शुद्ध, अग्निहोत्र करे,
स्त्री वश, अधिक ऊँचा, नाक ऊँची, दुबला, चञ्चल स्वभाव, अति भ्रमण, धन युक्त,
अङ्गहीन हो, क्रय-विक्रय करने में कुशल, बड़ी पदवी पावे, सभ्य, रोगी, कुटुम्ब पर उपकार करे, बांधवों से निद्य, बन्धुजनों को त्याग दे ।
षड्वगे वित्रार : ८९
(ऽ) अष्टम द्वा० (वृश्चिक) नेत्र व छाती बड़ी, गोल जाँघ, माँ बाप गुरु इनकी शिक्षा में रहे, संतान से दुःखी, राज दरबार में मान व महत्त्व, पिंगट वर्ग, बुरा स्वभाव, गुप्त पापी, मछली या पक्षी द्वारा कहीं भी चिह्न हो । (९) नवम ढ्वादशांश (धन)--मुँह व गर्दैन लम्बी, बाप का बहुत धन हो, दयालु, कवि, अच्छा बोलने वाळा, दाँत, कान व नाक बड़े, कार्य साधन में उद्योगी, कुबड़ा, लम्बे नख, लिखने पड़ने का ज्ञान हो, पुस्तक बाँधने व चित्रकारी का ज्ञान हो, प्रौढ़, धार्मिक प्रिय वोली बोले, वन्धुओं का दष करे । (१०) दशम द्वा० (मकर)--स्त्री पुत्र पर बहुत प्रेम, दांभिक, अन्ध, कृश, कमर के पास दुबल, छोटी कमर नेत्र उत्तम, सबकी सुनने वाला, सबका प्रिय, आळसी, शीत सहन करे, परिभ्रमण करे, बलिष्ठ, काव्य का करने वाला, विद्वान्, लोभी, जहाँ न जाना हो वहाँ जावे, निळंज्ज, निर्दय । (११) एकादश द्वा० (कुम्भ)--चूहे सरीखी गर्दन, अङ्गो पर बहुत नसे, कड़े केश, ऊँचा शरीर, पैर, जाँघ, जाँघ के ऊपर का भाग और पीठ का भाग लम्बा हो, मुँह, कमर व बस्ती मोटी, पर स्त्री में आसक्त, परद्रव्य लेने की वुद्धि, पापी, नाशक, मिलनसार, पुष्प चन्दन प्रिय, चलने वाला मित्रों को प्रिय । (१२) द्वादश ह्वा० (मीन)--जल में होते वाले पदार्थों का भोक्ता, मोती व शाक-भाजी वेचने वाळा, स्त्री में आसक्त, शरीर उत्तम, नाक ऊँची, बड़ा मस्तक, शत्रु का पराभव करने वाला, स्त्री के वश, नेत्र कांति उत्तम, धनवान्, गड़ाधन प्राप्त हो। मेष लग्न में पहिला द्वा० मेष राशि से आरम्भ होकर क्रमानुसार बारहवाँ मीन का होता है
(२) वृष के द्वादशांश का फल
६--पहिला द्वा० वृष का है--मेष में दुसरा द्वादर्शांश जो वृष राशि का है उसी अनुसार फल होगा अर्थात् सुन्दर विकास कर गमन करे आदि जो फल कहा हैः क्यों कि जो राशि होती है द्वादशांश में पहिले उसी राशि का द्वादशांश होता है । इससे जिस राशि का द्वादशांश हो उसी के अनुसार फल विचारना । २--वृष में दूसरा द्वा० मिथुन का है इससे मेष छूग्न के तीसरे द्वा० में मिथुन है उसके समान फल होगा ।
३--तीसरा द्वा० ककं का है-मेष के चौथे द्वा० में ककं है उस समान फल होगा । ४ चौथा द्वा० सिंह का है-मेष के पांचवे द्वा० में सिंह है उस समान फल होगा । ५--'पांचवा द्वा० कन्या का है-मेष के छठे द्वा० में कन्या है उस समान फल होगा ।
६--छठा द्वा० तुळा का है-मेष के सातवें द्वा० में तुला है उस समान फल होगा। ७--सातवां द्वा० चुश्चिक को है-मेष के आठवें द्वा० में वृश्चिक है उस समान फल होगा ।
८--आठवां द्वा० घन का है-मेष के नवमें द्वा० में धन है उस समान फल होगा । ९--नवां द्वा० मकर का है-मेष के दशम द्वा० में मकर है उस समान फ्रल होगा !
९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१०--दशवां द्वा० कुंभ का है-मेष के ग्यारहवें द्वो० में कुम्भ है उस समान
फल होगा ।
११--यारहवां द्वा० मीन काँ है- भेष के बारहवें द्वा० में मीन है उस समान
फल होगा ।
१२-बारहवां द्वा० मेष का है-मेष के पहिले द्वा० में मेष है उस समान फळ होगा ।
इस प्रकार किसी भी राशि के द्वादशांश का फल जान सकते हैं उस द्वाशांश में जो
राशि है उस राशि का फल मेष के द्वादशांश में जहाँ मिले उसके अनुसार फल जानना।
जैसे कुम्भ लग्न के दूसरे द्वादशांश का फल जानना है । कुम्भ में पहिला द्वादशांश
कुम्भ का होता है । दूसरा मीन का हुआ । मेष लग्न के द्वादशांश के फल वर्णन में
मीन राशि का फल मेष लग्न के अंतिम द्वादशांश में दिया है वही लेना अर्थात् जल में
होने वाले पदार्थों का भोक्ता मोती व शाक भाजी बेचने वाला स्त्री में आसक्त आदि ।
द्वादशांश का संक्षिप्त जन्म फल
मेष द्वा७ में जन्म--खलात्मा, चोर, पाप आचरण ।
वृष द्वा० में जन्म--स्त्री के धन से धनी, रोगवान् ।
मिथुन द्वा० में जन्म--जुआड़ी, सुशील ।
ककं द्वा० में जन्म--दुष्ट आचरण और तपस्वी ।
सिंह द्वा० में जन्म-सुशीळ, रःजकार्यं परायण ।
कन्या द्वा० में जन्म--जुआड़ी, स्त्री में लीन !
तुला द्वा० में जन्म-व्यापारी या धनी ।
वृश्चिक द्वा० में जन्म--धूते, चोरों का स्वामी, मारने की इच्छा वाला ।
घन द्वा० में जन्म--पिता तथा देव ब्राह्मण भक्त ।
मकर द्वा० में जन्म -शस्यादि युक्त और दूत वाळा ।
कुम्भ द्वा० में जन्म--खल ।
मीन द्वा० में जन्म--धनी और पंडित । र
ग्रह मित्र के या उच्च द्वा० में हो--अनेक स्त्रियों का अधिकारी और अनेक ऋद्धि
सिद्धि युक्त । द्वादशांश से आयु और मृत्यु विचार मेष आदि १२ राशियों के द्वादशांश के अनुसार आयु इस प्रकार है ।
राशि १ र ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ पश्चात्
आयु ८० ८४ ८५६ ८७ ८५ ६० ५६ ७० ९० ६६ ५६ १०० मृत्यु ।
पूर्वोक्त आयु के बीच में भी मृत्यु का भय होता है ।
१--प्रथम द्वा० वाला-१८ वर्ष में जल से भय ।
२--ढितीय द्वा० वाला-९ वर्ष में सपं से भय ।
३--तृतीय द्वा० वाला-१० वषं में घोर ज्वर से भय ।
४--चतुर्थ द्वा० वाला-३२ वर्ष में राजयक्ष्मा से भय ।
षड्वर्गः गिचार : ९१
५-- पंचम द्वा० वाला-२० वर्ष में रक्त विकार से भय ।
६--षष्ठ द्वा० वाला-२२ वर्ष में अग्नि से भय ।
७--सप्तम द्वा० वाला-२८ वर्ष में जलोदर से भय ।
=--अष्टम द्वा० वाला-३० वर्ष में व्याघ्र से भय ।
९--नवम द्वा० वाला-३२ वर्ष में वाण के पारेका से भय ।
१०-दशम द्वा० वाला-३० वर्ष में जल में डूवने या वायु विकार का भय ।
११-एकादश द्वा० वाळा-३१ वर्ष में भार्या तथा कन्या की मृत्यु के कारण तथ
जल से भय ।
१९--दडादश द्वा० वाला-२९ वर्षे में गाड़ी के पहिये से दबने का भय ।
इन सब अल्प मृत्युयों से बचने पर पूर्ण आयु भोगे ।
त्रिशांश फल
१ मंगल स्व त्रिशांश मॅ-स्त्री सहित हो, तेजस्वी, बल, पराक्रम, आभूषण युक्त,
साहस का काम करनेवाला ।
२ शनि स्व त्रिशांश मे--उसकी स्त्री शीघ्र मरे या भाग जावे या विवाह ही न
हो, परस्त्री से आसक्त, दुःखो, घर वस्त्र और परिवार से युक्त हो, मलिन रहे, क्रूर या क्रोधी स्वभाव का हो, रोगी रहें । ३ गुरु स्व त्रि० में-धन, कीति, सौख्य बुद्धि इनसे युक्त, तेजस्वी सब लोगों में
मान्य उद्योगी, भाग्यवान् ।
४ वध स्व त्रिं० में-वृद्धिमान, गीत नाच, वाद्य पुस्तक चित्र इनका ज्ञाता, कपटी,
कविता करे, बोलने में चतुर, साहसी, शास्त्रार्थ को जानने वाला, उत्तम आचार, लोक
में मान्य, वढ़ई आदि कला का काम जानने वाला ।
५ शुक्र स्व त्रि० मे--बहुत संतति, निरोग बहुत सुख, ऐश्वयंवान, धनवान्,
रूपवान्, स्त्री सुख हो, क्र स्वभाव, कोमल अंग, बहुत स्त्री वादी ।
त्रिं० में सूर्ष और चन्द्र का त्रिं० नहीं होता इससे सूर्य चन्द्र जिसके त्रि० में हो
उनके फल का प्रथम विचार होता है।
१ मंगल के त्रि० में सूयं हो--शूरवीर हो
मंगर के त्रि० में चन्द्र हो--शिथिल हो ( देर से काम करे। )
२ शनि के त्रि० में सूयं हो--विषम या क्रूर स्वभाव ।
शनि के त्रि० में चन्द्र हो--हिंसक ( जीवघाती ) ।
३ गुर के त्रि० में सूय हो--उत्तम गुणवान् ।
गुरु के त्रि में चन्द्र हो--धनवान्, शान्त स्वभाव ।
४ बुध के त्रि० में सूर्य हो--सुखी ।
बुध के नि० में चन्द्र हो- पंडित हो ।
५ शुक्र के वि० में सूर्य हो--उत्तम शोभागुक्त शरीर ।
शुक्र के त्रि० सें चन्द्र हो-संवें लोक प्रिय ।
९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
'साधारण त्रिशांश फल
१ मंगळ के त्रि० में जन्म--चपल, कठिन वचन बोलने वाला, क्रूर बुद्धि।
२ शनि के त्रि० में जन्म--घूमने वाला, मलिन बुद्धि ।
३ गुरु के त्रि० में जन्म--धनवान् ।
४ बुध के त्रि० में जन्ग--गुरु, देव, भक्ति में निरत, साधु प्रिय, बंधुमान् ।
५ शुक्र के त्रि० में जन्म--कामी सुंदंर शरीर सुखी । त्रिशांश विशेष फल ।
१ त्रि० कुंडली में भिन्नगही या उच्च के ग्रह हों--तो सब कायं करने में उत्साह रखने वाला, धर्मात्मा, सज्जनों से पूज्य । २ त्रि० कुण्डली में ग्रहों के सत रज तम गुण विचार कर इनमें जो अधिक बली
अकाशवान् हो--उसी ग्रह के अनुसार फल का विचार कर फल कहना ।
पे चन्द्र गुरु-सतगुणी । 3 बुध--रजोगुणी ।
शनि मंगल--तमोगुणी ।
सात्विक ग्रह बली हो दयालु स्थिरता युक्त, सत्यवक्ता, विनीत, देव ब्राह्मण का भक्त ।
रजोगुण ग्रह बली हो--काव्य करने वाला, शूरवीर, कुछ स्त्रियों में पूर्ण तन मन रखने वाला ।
तमोगुणी ग्रह बली हो तो दूसरों को ठगने वाला, मुखं, आलसी, क्रोधी, अति निद्रालु । इन के मेळ से फलों के भी कई भेद हो जाते हैं ।
अध्याय-५.
अष्टक वर्ग
फल कहने की विधि जन्म लग्न, चन्द्र लग्न, नवांश लग्न, द्वारा बताई ही जाती है परन्तु गोचर का अष्टक वर्ग द्वारा सूक्ष्म फळ भी निकाला जाता है । टर्न शरीर है जिससे शरीर का विचार होता है और चन्द्र मन है जिससे मान- सिक ऐहिक पारलौकिक आदि सभी कार्यों कां विचार होता है ये सब जन्म कुंडली से विचार होता है । जन्म चन्द्र की राशि को आदि लेकर गोचर के वर्तमान ग्र हों की स्थिति पर राशि अनुसार फल कुछ स्थूल हो जाता है जिससे उसमें सूक्ष्मता लाने को अष्टक द्वारा फल का विचार होता है जिसमें प्रत्येक ग्रह और लग्न को भी आदि मानकर उनके शुझ स्थानों की गणना कर अष्टक वर्ग चक्र बनाया जाता है जिससे सब द में इसके द्वारा फल का अच्छा या बुरा प्रभाव स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है ।
'अष्टक वर्ग से ४ प्रकार से फल का विचार होता है । (१) आयु साधन. करना, (२) भिन्न भिन्त वर्गों मे रेखाओं और बिन्दुओ के द्वारा अनेक प्रकार के शुभाशुभ फल बनाया जाता है । (३) ऊपर वर्ग के रेखा और
अष्टकवर्ग विचार : ९३
बिन्दु दारा गोचर फल का विचार होता है । (४) अष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन एवं ऐकाधिकत्व शोधन के पश्चात् फल विचारने की विधि है । अष्टक वर्ग विचार
जन्म राशि के अनुसार गोचर का फल आगे बताया गया है। गोचर फल माँ स्थूलता है क्योंकि एक ही राशि के अनेकों मनुष्य होते हैं। इसलिए गोचर फल मे सूक्ष्मता लाने के लिए आचार्यो ने अष्टक वर्ग अंक कहा है । गोचर में चन्द्र राशि को प्रधान मानकर शुभ स्थान की गणना कर प्रत्येक ग्रह का शुभाशुभ जाना जाता है परन्तु अष्टक वर्ग में प्रत्येक ग्रह की राशि को प्रधान मान कर उससे शुभ स्थान की गणना की जाती है इसमें ७ ग्रह और लग्न सहित ८ हो जाते हैं यहाँ ८ प्रकार से शुभत्व की गणना की जाती है इस कारण अष्टक वर्गे द्वारा फल विचारने में सूक्ष्मता आ जाती है । इसके लिए प्रत्येक ग्रह का पृथक् २ चक्र बनाना पड़ता है इस प्रकार ८ अष्टक वर्ग बन जाते हैं । इसमें शुभता सूचक रेखा और अशुभता सूचक ० शून्य वना दिया जाता है। कोई दो शुभ के लिए ० शून्य और अशुभ स्थान के लिए । रेखा का चिल्ल वना देते हैं । चिह्ल किसी प्रकार का हो वह तो अपनी इच्छानुसार बनाया जा सकता है जिससे शुभ या अशुभ स्थान प्रगट हो । पश्चात् प्रत्येक चक्र में शुभ रेखा का योग किया जाता है ।
चक्र बनाने के लिए १२ राशियों को ऊपर लिख लो। जिस राशि पर लग्न हो वहाँ लग्न रिख दो जहाँ जो २ ग्रह हो सव ग्रह लिख देना । उसके नीचे ८ लकीर देना _ जिनके बाँई भोर ग्रहों के नाम लिखे हों और ग्रह से शुभ स्थान गिनते जाना यहाँ शुभ हो वहाँ रेखा जहां अशुभ हो शून्य लिख दो । पश्चात् सव शुभ रेखाओं का योग
करो । इसके पश्चात् प्रत्येक चक्र की शुभ रेखाओं का एक ओर चक्र बना लो ।
इसको सब अष्टक वर्ग चक्र कहेंगे उसमें भी सब शुभ रेखाओं का योग कर दो जिससे स्पष्ट हो जावे किस राशि ने सम्पूर्ण कितनीं शुभ रेखा पाई है ।
पहिले प्रत्येक ग्रहों का अष्टक वर्ग शुभ चक्र देते हैं पश्चात् प्रत्येक का चक्र बनाना वतावेंगे ।
प्रत्येक ग्रहों का शुभ अष्टक वर्ग चक्र
(१) सूर्य का अष्टक वग (२) चन्द्र का अष्टक वग सूर्य चन्द्र मं० वु० गु० शु० श० लर्न | सूर्य चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न
१.३ १: ३-५. ६६ १ ये ३ १ रत वक ३ ३६३ २६२५६७२४1६३२३ ३०४७४५६ ४ ४ ६ ९ १२४ ६ | ७ ६ ५ ४ ७ ५ ६१० ७१० ७ ९ ११ ७ १० ८ ७ ६ ७ १ ७ ११ ११ द ११ ८ १० ८ ११ | १०१० ९ ८5११ ९
९ ९ ९१२ | ११ ११ ११ १० १२ ११ १० १० ११ १० ११ ११ १२ ११ ११ ११ १९
९४: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(३) मंगल का अष्टक वर्ग (४) बुध अष्टक वगं
सू० च० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग
३ ३१ ३६ ६ १ १ LRT EAR A
५ ६ २ ५१० ८ ४ ३ 3 ४८२० त का रा र, २
६ ११ ४ ६११ ११ ७ ६ ९ ६ ४ ५११ ३ ४ हैं
१० ७ ११ १२१२ ८१० ११ ८ ७ ६१२ ४ ७ ६
११ यु ९ ११ १२ १० ८ ९ ५ ८ ८
१० १० ११ ९ १० ८ ९ १०
११ ११ १० ११ ९ १० ११
& ११ १२ ११ ११ शुभ योग=३९ शुभ योग-५४
(५) गुरु अष्टक वर्गे (६) शुक्र अष्टक वे
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल०
MERE ONS २ ३ १ ८ १ ३३ ५' १ ३ १
रका री २० २. ४ OW २:११. २ ५.५. RNR
३ ७ ४ ४ ३ ६ ६ ४ ६१२ ३ ६ ६ ९ हे ५ २ डी HU LUE ९. १२. ५ SRN Ef ie ढं,
७११ ८ ६ ७ १० ६ ५११११११ ५ ९ ५
द १० ९ ८ ११ ७ ८ १२ ८१० ८ ९ ११ १० १० ९ ९ ९ ११ ९
१० ११ ११ १० ११ १० ११
११ ११ . १२ ११ शुभ योग=५६ शुभ योग=५२
(७) शनि अष्टक बगे (८) लग्न अष्टक वर्गं
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न सू० च० मं० बु० गु० शु० श० लग्न
१ ३ ३ ६ ५ ६ २३ १ २२ १. १. १-१. ३
२ ६ ५ ८ ६ ११ ५ ३ पती RFR RR ४११ ६ ९१११२ ६ ४ ६१० ६ ४ ४ ३ ४ १० ७ १० १० १२ ११ ६.|१० ११ १० ६ ५ ४ ६ ११ द ११ ११ १०.५ ११ ११ ८ ६ ५ १० १० १२ १२ ११ | १२ १० ७ ८ ११ ११ ११ ०२९
१० ११
११ शुभ योग-३९ शुभ योग=४९
ग ™™ अब
बड्वगं विचार : ९५
राहु अष्टक वर्ग कि न एन 7 एरा एफए, छम १ १ २ २ १ ५ ३ ३
२ ३ ३ ¥ ३ ६ ४
३ श भ ७ ¥ ७ ७ पर
4 ७ १२ ८ ६ ११ १० ९
७ दु १२ दु १२ ११ १२
प्र ९
१० १०
शुभ योग=४३
अष्टक वर्ग में लग्न सहित ८ ही ग्रह लिये जाते हैं परन्तु “घुवताराप्रकाश' में राहु
का भी अष्टक वर्ग दिया हैं। वह भी यहाँ दे दिया गया है ।
प्रत्येक अष्टक वर्ग चक्र करना आगे बताया है । किसी ग्रह को आदि लेकर उसके
स्थान को गिनकर जहाँ शुभ हैं वहाँ रेखा बना देनी चाहिये जहाँ शुभ नहीं है केवल
शून्य रख देना चाहिये ।
पृथक् २ अष्टक वर्ग चक्र में शुभ रेखाओं का योग इस प्रकार है :-सूर्य=४८, चंद्र
में=४९, मंगल=३९, बुध-५४, गुरु-५६, शुक्र=५२, शनि=३९, लग्न>४ ९, राहु=४३।
उदाहरणस्वरूपं अष्टक वर्ग चक्र
अष्टक वर्ग चक्र बनाने का उदाहरण ( यहां जन्म कुण्डली के अनुसार राशियाँ
और ग्रह दिये है ) ।
(१) सूर्य का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियां ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९१०१११२ १
ग्रह लग्न श० ० ० मं के०गु० चं सू० ० ०
~
रा० CID
पृशनि । ०। । ० । ० ०। | | 1
२।गु्ः- 05.0 yl 5 ०३५०३३०८७० NO
३मंगल। 1 । । ० | । ० | ० ० ।
४सूयं । ० ० 1॥ । । । ० ॥ ०
शुक्र ० ० । । ० ० ० ० 1 ० ० ०
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७ चन्द्र ० [| © o 06 1 1 ० 9 ० 1 ०
८लग्न ० ० | । ० 1 ० ० 9 ॥ । 1
शेखायोगश/ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३ ५ ४
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३ ४ ५ ३ ७ ८ ९ १० ११ १२ १ २
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०
०
योग ३ ४ ६४ ३ ५ ७ ५ २
रेखायोग ५ ३ ५ १२ ४ ५ २
(३) मंगल का अष्टंक वर्ग चक्र
(२) चन्द्र का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियाँ
(४) बुध का अष्टक वर्ग चक्र
राशियाँ
९६: सचिव ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
राशियाँ
ग्रह
८ लग्न
१ शनि
२ गुरु ३ मंगल
४ सूर्य
भ शुक्र
६ बुध ७ चंद्र
८ लग्न
रखा
»
025:
mC
52
०0
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०.
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अष्टक वर्ग विचार : ९७.
(५) गुरु का अष्टक वर्ग चक्र
राशि' ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० १११११ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
० ० । ० । || ०७ ७ ७ ©
॥ Il ० [| || [|
० [| ०
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° । ८लग्त । । ०
रेखायोग ५ ५ ४ हिवा क PT) > पे पपपप्प्प्प्प्््््स
(६) शुक्र का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
१शनि । ० ० ० । | । ०८ ००-४४ 02,
२ गुरु ° ० 1 || 11 ० ० ० ० oI
मंग ० || ० । । ० ० । ० । । ०
है| सूर्य ७6००७७०७/७७० o ll ° ० । o (0 ©
श शुक्र । ० ० 195. | ॥ ° । । 1
६ बुघ || । ० ० I 0100 0० ० ० । ०°
७चन्द्र । ० ० । 1 ० । ॥ 1 1 [| [| घरून । । । ॥ । ० ० tr । ० | ०
योग ए ४ २ ४ ८ ३ ४ ५ ३ ४ ६ ४
(७) शनि का अष्टक वर्ग चक्र
राशि है। ४ HY OD है १०५११ वर Fi
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
रा० बरु शु०
वशति । ० ० ० । ० | । ० ० ० ०
२ गुरु Io: Jone: Jess Jo 2 io, To) ‘of Jo El
३मगल ० ० | । । ० ० । ० । । ०
असूर्यं । ० ० । । ० ॥। । ० । । °
Et शुक्र ७०७ ७ t 0 ° ° ° 1 [| 6 0 0
६ बुध, 5०२ lo Is iI 71 115०० 2
७ चन्द्र ० || ° ० ७० ० 1 ॥ ० ० 1०
८ लग्न 1 ० 1 1 ० 1 ० ० ० [| । ०
रेखायोग ४ २ ३ ४ ४ ३ ५ ५ १ ३ ४ १
९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) लग्न का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
अह लर् ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
1 ०6 1 ०
1 ० [] 1
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० 6 ~
७ रे
प्रत्येक ग्रह का अष्टक वर्ग चक्र बनाने में कई लोग कुण्डली बनाकर उसमे रेखा भर देते हैं यह ठीक नहीं है उसमें कभी भूल हो जाती है । उपरोक्त प्रकार से चक्र चना कर उसमें शुभ रेखा एवं अशुभ का शून्य भी लिख दिया जावे तो भूल नहीं हो सकती और उसकी जाँच में सुविधा होती है ।
यहाँ उदाहरण में शुभ के स्थान में रेखा ओर अशुभ के स्थान में बिन्दु दिया है कई ग्रंथकार विन्दु को शुभ सूचक मानकर रेखा को अशुभ का चिल्ल मानते हैं । परन्तु रेखा को शुभत्व का चिह्न मान लेना उचित जेंचता है । ;
कोई ग्रन्थकार रेखा के स्थान में रेखा न बनाकर उसी ग्रह का सूचक संकेत अक्षर बना देते हैं जैसे रवि के लिए र० चंद्र के लिए चं इत्यादि इसको यहाँ उदाहरण देकर बताया है :--
सूर्ये का अष्टक वर्ग चक्र अन्य प्रकार
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
ग्रह् लग्न ० श० ० ० मृ» के० गु० चं० सु० ० ०
रा० बु० शु०
१ शनि श० ० श० श० ७ श० ० ० श० श० श० ए०
२ गुरु गु० ० ० गु० ० गुण 09 oo o ° ० गु०
३ मंगल मं० सं० मं० मं) ० -मं० मं० ० मं० ० ० मं०
४ सुय सू ० ० सू० सु० सु० सु० सू० ० सू० सु० ०
५ शुक्र ० २ शु० शु० ० ० ० ० शु० ० ० ०
६ बुध बु० बु० ० ० बु० बु० बु० बु० ० ० बु० ०
७ चन्द्र ० च० ० ० ० चूं०चूं० ० ० ७० 'चं० ०
झू ० ० ल० रलू० ० लढ ० ० ० ० छ० ल०
शुभयोग५ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३५ ४
अष्टक वर्ग विचार : ९९
इसमें विशेष कोई अन्तर नहीं है रेखा के स्थान में यहाँ ग्रह का नाम दिया है ।
परन्तु रेखा का चिह्न शुभता सूचक बना देना सरल जेंचता है ।
कई ग्रंथकार वाई ओर दिए गिए ग्रहों का क्रम इस प्रकार रखते हैं (१) सूर्य (२)
शनि (३) गुरु (४) शुक्र (५) मंगल (६) बुध (७) चन्द्र (०) लग्न परन्तु यहाँ
उपयोग किया हुआ क्रम ही उचित समझ पड़ता है ।
अष्टक वर्ग चक्र की शुभ रेखाओं में मत भेद
यहाँ जो अष्टक वर्ग शुभ रेखा चक्र दिया है उसमें कुछ मत भेद भी हैं-
(१) सूर्य अष्टक वर्ग में शुभ होरा में बुध और गुरु का ८दिया है परन्तु वृहज्जा०
जा० भ० आदि अन्य ग्रन्थों में ९ दिया है ८ नहीं दिया । यहाँ जातक पारिजात के
अनुसार ही बुध और गुरु में ९ दिया है । ८ नहीं दिया ।
(२) चन्द्र अ० वर्ग में गुरु में वृहस्पाराशर में २ दिया है १२ नहीं दिया । वृहज्जातक जा० भऽ, जा० पारि० आदि में २ नहीं दिया १२ दिया है। इससे यहाँ भी
२ नहीं दिया १२ दिया है।
(३) मंगल के अ० वर्ग में बुध का जा० भ० में ११ की जगह १२ दिया है।
बृहत्पारा० जा० पारि० आदि कई ग्रन्थों में ११ ही दिया है १२ नहीं है । इससे यहाँ
भी ११ दिया है १२ नहीं दिया ।
(४) बुध अ० वर्ग में चन्द्र का २फे वदले ५ जा० भ० में दिया है अन्य ग्रन्यो में
२ ही दिया है ५ नहीं दिया इससे जा० पारि० आदि के अनुसार २ दिया है ५
नहीं दिया। बुध अ० वर्ग में लग्न में जा० भ० में ८ के बदले ९ और १० के बदले
१२ दिया है परन्तु जा०'पारि० वृ० पारा० आदि में ८ और १० दिया है वही यहाँ भी
दिया है ।
(५) गुरु अ० वर्ग में शंभु होरा० में लग्न में ८ दिया है शेष ग्रन्थों गेंद नहीं दिया
९ दिया है उसी के अनुसार यहाँ भी दिया है ।
(६) शुक्र अ० वर्ग में वृहत्पारा० में मंगल का ४ दिया है वृ० जा०, जातक
यारि० आदि कई ग्रन्थों में ४ नहीं दिया इससे यहाँ ४ छोड़ दिया ।
(७) शनि अ० वर्ग में जा० भ० में २ के बदले ३ सूर्य का दिया है । जा०पारि०,
बु० पारा०, वु० जा० आदि में २ ही दिया है ३ नहीं दिया यही यहाँ दिया है ।
बुध में जा० भ० में ११ नहीं दिया जातक पारिजात आदि में ११ दिया है इससे
यहाँ भी दिया है। लग्न में जा० भ० में ९ अधिक दिया है जातक पारि० आदि में ९
नहीं दिया इससे यहाँ नहीं दिया ।
२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) जा० भरण, फल दीपि० आदि ने लग्न अष्ट० वर्ग नहीं दिया । शेष. ग्रन्थों में दिया है यहाँ वू० जा० वृहृत्पारा० आदि के अनुसार ही दिया है ।
लर्न अ० वर्ग में कहीं चन्द्र में १२ भी दिया है और शुक्र में ११ नहीं दिया ॥ परन्तु यहाँ वृ० जा० आदि के अनुसार चन्द्र में १२ नहीं दिया । और शुक्र में ११ दिया है ।
(९) राहु का शुक्र में ५ नहीं दिया शनि का १२ अधिक किसी में दिया है इस प्रकार मतभेद है ।
अष्टक वर्ग चक्र उदाहरण का स्पष्टीकरण
यहां लग्न का अष्टक वर्ग भरना समझा देते हैं जिसके समझ लेने पर उदाहरण देख कर सम्पुर्ण अष्टक वर्ग चक्र भरना आ जायगा । छ्न अष्टकवगं चक्र आठवां है उसे देखो । उसमें सूर्य ३,४,६,१०,११,१२ स्थान में शुभ रेखा देता है। यहाँ सूर्य मीन में है वहाँ से गिनना आरम्भ किया वहाँ पहले स्थान में ० रखा । वहाँ से दूसरा स्थान मेष में भी० है तीसरे स्थान वृष में शुभ की रेखा दी है । चोथे स्थान मिथुन में भी शुभ की रेखा दी है। पांचवा स्थान कर्क में ० हैं । छठे स्थान सिंह में शुभ रेखा है । ७,८,९ स्थान कन्या तुला वृश्चिक में ० है आगे १०,११,१२ स्थानों शुभ की रेखा है इससे नवाँ स्थान घन, दशम मकर और एकादश स्थान कुम्भ में रेखा दी है । चन्द्र जहाँ है वहाँ से इसीप्रकार ३,६,१०,११ स्थान में शुभ रेखा पड़ी है शेष अशुभ स्थानों में ० दिया है अर्थात् चन्द्र कुम्भ में है वहाँ से तीसरा स्थान मेष राशि, छठा स्थान ककं में, १० स्थान वृश्चिक राशि में और चन्द्र से म्यारहवें स्यान धन राशि में शुभता सूचक रेखा दी है । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह या छन्न से गिनती करके उनके शुभ स्थानों में रेखा दी है शेष अशुभ में ० दिया है। ध्यान पुर्वक आगे भी उदाहरण देखने से सव समझ में आ जायगा ।
इन अष्टक वर्ग चक्रों में एक विशेषता यहाँ दी है । सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि लग्न आदि क्रम से जैसा कि इतर ग्रंथकारों ने दिया है, यहाँ न देकर शनि गुरु मंगल सूर्य शुक्र बुध चन्द्र और लग्न इस क्रम से दिया है। इसका कारण यह है जब अष्टक वर्ग के अनुसार उसके प्रभाव का समय जानने की आवश्यकता हो तो उस राशि के पूरे तीस अंश में इसी क्रम से ग्रहों का प्रभाव पडेगा । पहिले शनि का फिर गुरु का फिर मंगल का इत्यादि यहाँ दिये क्रम से अपने-अपने अष्टमांश में प्रभाव पड़ेगा ।
भष्टक वर्ग विचार : १०१
उस राशि के ८ भाग करने से एक भाग ३०-६-८ भंशर>३०-४५? का पड़ेगा दूसरा
भाग ७०-३०' तक, तीसरा ११९९-१४! तक, चौथा १५°-०' तक, पांचवां १८५९-४५?
तक छठा २२-३० तक, सातवां २६-१५" तक और आठवाँ भाग ३००-०' तक
का होगा । इस प्रकार अष्टक वर्ग में जिस भाग में शुभ रेखा हो उस ग्रह के उतने अंश
तक शुभता रहेगी जहाँ ० हो उस भाग में अशुभता रहेगी । इसके सम्बन्ध में गोचर में
भी और समझा दिया गया है ।
यह जानने के लिए कि वह शुभ या अशुभ फल किस समय तक रहेगा । उस ग्रह
के एक राशि में भुगतने के समय को ८ से भाग देने से जो अष्टमांश प्राप्त होगा वह
उस रेखा या बिन्दु के फल के भोग का समय रहेगा ।
ना
ग्रह एक राशि में भोगने १ अष्टमांश १ अष्ठमांश का
'का समय मास-दिन-घडी-पल भोग्यांश
१ शनि ३० मास-:-८ ३-२२-३०---० ३-४५
२ गुरु १३ मास- ८ १-१ ८-४ ५---० ३-४५
३ मंगल १॥ मास-<-८ ०- ५-३७-३० ३-४५
४ सूर्य १ मास -- ८ ०- ३-४५० ३-४५
५ शुक्र १ मास ८ ०- ३-४५-० ३-४४
६ बुध १ मास -+८ ०० ३-४५--० ३-४५
७ चन्द्र २। दिन--८ ०- ०-१६-५२ ३-४५
जैसे शनि के अष्टक वर्ग से फल का समय जानना है जन्म समय जन्म राशि के सप्तम
में सिंह का शनि है। गोचर में भी मान लो सिंह राशि पर शनि है । शनि के अष्टक वर्गे
में सिह राशि में केवल तीसरा, पाँचवाँ और आठवाँ अन्तिम भाग से शुभ रेखा है शेष में
अशुभ सूचक शून्य है तीसरा भाग ७१-३० से ११-१५ तक है पांचवां भाग १५-०”
से १८५९-४४” तक आठवां भाग २६०-२५' के वाद ३०-०' तक और शनि के इनके
अंशों में शुभता रहेगी शेष अंशों में अशुभता रहेगी । शनि का एक भाग २ मास २२
दिन ३० घड़ी में भुक्त होता है इसलिये सबसे शनि के अंशों के विचार से वह समय
कब से कब तक रहेगा समय निकाल लेना चाहिये नीचे दिये हुए चक्र से वह स्पष्ट
हो जायगा ।
१०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
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अष्टक वर्ग विचार : १०३
स॒वं अष्टक वर्ग चक्र का उदाहरण
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १ २ “ग्रह लग्न शनि मंगल केतु गुरु चन्द्र सूयं योग रा बुध शुक्र सूर्यं ५ ३ .४ ६ २ ७ ४ २ ३ ३ ५ ४ ४८ चन्द्र है ४ इ. ४ ३. ३. ७ ९ र कर TERS मंगल ५ ३ ५ १ २ ४ ५ २ ३ २ ४ ३ ३९ बुध ३ ६° ४ ४ रा डी Ev NINN RR गुर
शुक्र ३ थे ४ ह. ६ ६ ७ डो NT भ Rr ४ ४ ४२० ४४ दा RN Ou र ENS शनि ४ २ ३ ४ ४ ३ ४ ४ १ ३ ४ ३९ छन ४ ४ ४ ३ ३ ७३ ४३४३ ३४३ ४५ ४ ४९ शुभयोग ३७ ३१ ३२ २९ ३० ४३ ३९ ३२ २३ २६ ३७ २७ ३८६ सर्वयोग
यहाँ सूर्ये अष्टक वर्ग चक्र में जो योग शुभ रेखाओं का आया था वह सूर्य के आगे लिख दिया । चन्द्र अष्टक वर्ग चक्र का योग चन्द्र के सामने लिख दिया इसी प्रकार प्रत्येक अष्टक वर्ग चक्र के योग को वहाँ लिखकर अन्त में सब का योग कर दिया है । यहाँ १२ भाव का शुभ रेखा चक्र नीचे लिखें अनुसार हुआ । इन रेखाओं से शुभाशुभ फल का विचार होता है। इसी से सबै अष्टक वर्ग कुंडली बनती है । द्वादश भावस्थ शुभ रेखा योग चक्र राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १ १ २ भाव लग्न धन सहज चतुर्थ पंचम षष्ठ सप्तम अष्टम नवम दशम ळाभ व्यय शुभरेखा योग ३७ ३१ ३२ २९ २९ ४३ ३९ ३१ २३ २६ ३७ २७
त सर्वं अष्टक वर्ग कुण्डली पिछले दिये हुए शभ योग को यहाँ कुंडली में रख दिया है जिससे प्रकट हो कि
भाव को कितनी रेखा मिली हैं ।
इस सवं अष्टक वर्ग कुंडली में कोई लग्न छोड़ कर केवळ ग्रहों का शुभ योग दे
देते हैं कोई लग्न सहित देते हैं या प्रथम
दोनों दे देते हैं ।
इनं रेखाओं का क्या क्या फल होता
है आगे दिया है ।
व (३१)
७ (३०) न ९ De ड0
चमं» (४३) १ “(३२६ A
re EE “रश ८०
१०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सवं अष्टक वगं कुण्डली.से अवस्था का विचार (१) बाल्यावस्था प्रथम खंड आदि खंड की राशियाँ १२-१ २३ (२) युवावस्था द्वितीय खंड मध्य खंड की राशियाँ ४+५+६+७ (३) वृद्धावस्था तृतीय खंड अन्त खंड की राशियाँ ८-९-१०११
की मीन राशि से आरम्भ कर ४-४ राशियों का एक खंड होता है। इन्हीं राशियों
है
सर्वे शुभ रेखाओं का योग करने से स्थूल रूप से जीवन का शुभाशुभ समझा जाता
जोड़ी
। इसमें
जाती विशेष
। बात यह है कि इसमें अष्टम एवं द्वादश स्थान की राशियाँ नहीं : ऊपर की सवं अष्टक वर्ग कुंडली देखो (१) राशि १२ १ ३ योग १०० रेखा इसमें वृष राशि व्यय भाव रेखा २६ ३७ ३७ में पड़ने से छोड़ दिया । (३) इगि ३१ $ याम १२२ रेखा इन सबको पूरा ल्या ।
(३) राशि ८ ९ ११ रेखा ४३ ३९ २३ योग १०५ रेखा इसमें मकर राशि अष्टम में पड़ने
योग कप
इसका
है
और भी विचार इस प्रकार होता है कि जो तीनों खंड की रेखाओं का
उस खंड में सुख उसके
अधिक ३ भाग रहेगा करना । । इस तृतीयांश से जिस खंड में रेखा अधिक हो “७2
भाव को रेखाओं के अनुसार आयु खंड पर विचार
उसका प्रत्येक
उदाहरण खंड मे नीचे ऐयक-पुथक
दिया भाव की रेखाओं पर से भी फल का विचार होता है है-- १ खंड भावं १० ११ १२ १ राशि १२ १ २ ३ ब स २11६ रा
अष्टक वर्ग विचार: १०५
२ खंड भाव २ ३ ४ ष्र राशि ¥ ण ६ ७
रेखा ३१ ३२ २९ ३०
ग्रह + श० + x
३ खंड भाव ६ ७ दु ९ राशि ऱ ९ १० ११
रंखा ४३ ३९ ३२ २३
ग्रह मं० के० गु० चण्बु०
(१) यहाँ प्रथम बाल्यावस्था में दशम भाव में २६ रेखा हैं । २७ से अधिक रेखा
शुभ समझी जाती हैं। यहाँ २७ से कुछ ही कम हैं तो व्यापार पिता कमं आदि संबंध
से साधारण फल होगा मध्यम फल के लगभग है । क्योंकि इस भाव में सूयं और शुक्र
भी है । जिससे कुछ मिश्र उन्नति साधारण प्रकार से होगी।
लाभ में ३७ रेखा हैं अधिक रेखा होने से आथिक सुख अच्छा रहेगा । व्यय में
२७ रेखा होने से व्यय की समता रहेंगी । लग्न में ३७ रेखा होने से शारीरिक सुख
आरोग्यता आदि उत्तम रहेगा ।
(२) द्वितीय खंड में धन भाव में ३१ रेखा होने से धन का लाभ अच्छा रहेगा ।
तृतीय भाव में ३२ रेखा होने से भाई बंधुओं का सुख श्रेष्ठ रहेगा । परन्तु इसमें शनि
होने से पूणं सुख में कुछ हानि करेगा । चतुर्थ में २९ रेखा है सुख, माता हा सुख
आदि साधारण अच्छा रहेगा ! पंचम में ३० रेखा हैं इससे बिद्या संतान आदि का सुख
साधारणतः अच्छा रहेगा |
(३) तृतीय अवस्था में रिपु भाव में ४३ रेखा हैं शत्रु रोग आदि का नाश होकर
पूर्ण सुख रहेगा । सप्तम में ३९ रेखा है । स्त्री सुख अच्छा रहेगा परन्तु इष्ट में पाप
ग्रह केतु के होने से स्त्री सुख क्षीण करेगा बाधा उत्पन्न करेगा । अष्टम में ३३ रेखा हैं
स्वास्थ्य ठीक रहेगा । इसमें गुरु शुभ ग्रह होने से स्वास्थ्य सम्बन्धी सुख अच्छा
रहेगा । नवम में केवल २३ रेखा हैं मध्यम से कुछ कम रेखा हैं इससे धमं आदि संबंध
'से कुछ कष्ट होगा परन्तु इसमें शुभ ग्रह चन्द्र और बुध होने से शुभता को बढ़ावेगे ।
इससे धमं आदि की हानि नहीं होने पायगी ।
इस प्रकार रेखाओं से साधारण प्रकार से फल का विचार होता है । यहाँ लाभ
भाव में ३७ रेखा हैं व्यय में २७ ही रेखा हैं | लाभ से व्यय में कम रेखा होने से
अच्छा है। लग्न में व्यय से अधिक रेखा हैं ३७ रेखा हैं इससे जातक धनवान् ओर
"भाग्यवान् रहेगा ।
अवस्था के खण्ड त्रय विचार में कुछ मतान्तर भी है
खंड त्रय कोई भाव के अनुसार गिनते हैं :--
(१) खंड १२-१-२-३ भाव का (१) खंड लग्न, २, ३, ४ भाव का (२) खंड ४, ५, ६, ७ भाव का (२) खंड ५, ६, ७, ८ भाव का (३) खंड ९, १०, ११ भाव का (३) खंड ९,१०,११,१२ भव का
Fs rr(> दुत
१०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
परन्तु ये मत अधिक मान्य नहीं हैं । उपरोक्त मत ही मान्य हैं।
अष्टक वर्ग रेखाओं का फल आगे दिया है ।
(४) तीनों खंड में बराबर रेखा हो तो जीवन सदा एक सा रहेगा । जिस खंड
में कम रेखा हों उस भाग में सुख कम होगा । बहुत ही कम रेखा हों तो उस भाग
में रोग संताप आदि से पीड़ा होगी । जिस भाग में बहुत रेखा हों वह भाग सुखदाई
एवं उन्नतिकारी होगा । अष्टक वर्ग की रेखा या शून्य पर से शुभत्व विचार
यहाँ रेखा शुभ और शून्य अशुभ बताया है।
रेखा बिन्दु शुभ अशुभ विचार ८-० ८-० ऊष +१ पूणं शुभ अधिक
- ७+१ ७--१ +६/८ + ३/४ पौन शुभ अधिक
६५२ ६२ +४/ष + १/२ आधा शुभ अधिक
५+ हे श- रे --२॥/८ + १/४ पाव शुभ अधिक `
४--४ ४-४ +०|ऽ +° समफल सम
३+५ ३—५ २/७८ --१/४ पाव अशुभ अधिक
२+६ २६ ४८ --१/२ आधा अशुभ अधिक
१०७ १--७ --६|८ --३/४ पोन अशुभ अधिक
०+ ०_—ष _८|ष १ पूर्ण अशुभ अधिक
साधारण प्रकार से ८ रेखा पूर्ण शुभ फल । ६ रेखा पौन शुभ फल । ४ रेखा,
आधा शुभ फल । २ रेखा पाव शुभ फल ऐसे ही बिन्दुओं से अशुभ फल समझना ।
अर्थात्. किसी अष्टक वर्ग की राशि में पूरी ८ रेखा हो तो वहाँ पूर्ण शुभता होगी ।
यदि शुभ रेखा एक भी न हो पूरे ८ शून्य हों तो वहां पूर्ण अशुभता रहेगी । यदि ४
रेखा ओर ४ शून्य हो तो अच्छा और बुरा फल बराबर होकर सम फल होगा यदि ७
रेखा हों तो उसमें एक अशुभता आने से उस राशि में पौन शुभता की अधिकता रहेगी
यदि ७ विन्दु हों तो उसमें अशुभता तो अधिक रहेगी परन्तु पूरा अशुभ फ नहीं होगा पौन अशुभ फल होगा । जहा+चिल्व है वहाँ शुभता अधिक रहेगी । जहाँ-ऋण चिह्न है वहाँ अशुभता अधिक रहेगी । अब रेखाओं के अनुसार शुभाशुभ फल का विचार नीचे दिया है (१) रेखाफछ- नाना रोग, दुःख, भय, कष्ट, देशाटन ।
(२) रेखाफल--मन में संताप, राज भय, चोर हानि, धन हानि ।
(३) रेखाफल- मानसिक विफलता, यात्रा, शरीर कष्ट, दुःख, व्यसन । (४) रेखाफल--समफल, सुख और दुःख, धन का लाभ और व्यय ।
(४) रेखाफल--सन्तान सुख, धनागम, सन्त संगति, कल्याण, आरोग्य, नित्य सुख, विद्या लाभ ।
(६) रेखाफल--यश, घन, वाहन, साहस,, विजय, चित्त, घन लास. !
भष्टक वर्ग विचार : १०७
(७) रेखाफल--वाहन, सुख, धन एवं पद वृद्धि, पूर्ण सुख सम्पत्ति की वृद्धि 1 (ऽ) रेखाफल--राज सम्मान, श्रेष्ठ लक्ष्मी की प्राप्ति, सब मनोरथ सिद्ध, सुख दायक समय, कार्य पूर्ण ।
५ से अधिक रेखा ( शुभ ) जिस राशि में हो उस राशि में अपने अष्टक वर्ग में ग्रहों ग्रह वह सदा शुभ होता है । अल्प रेखा वाला ग्रह गोचर में दुष्ट फल देता है । ग्रहों के अनुसार अष्टक वर्ग का रेखा बिन्दु फल १. सूर्य रेखा--जिस भाव से उत्पन्न हुई सूर्य की रेखा हो तो शत्रुओं का पराजय, सहसा सिद्धि ।
“विन्दु अशुभ फल दायक, अधिक व्यसन करने वाला, रोग शोक देने वाला, बिना कारण राजा द्वारा उद्देग ।
२. चन्द्र रेखा--वस्त्र भूषण, भोजन प्राप्ति, राजा से सम्मान, अकस्मात् उत्तम कमं की प्राप्ति\ ` :
“बिन्दु ' कष्ट फळ, शत्रुओं से कलह, दुष्ट स्वप्न, वित्त धन का नाश । ३. मंगल रेखा-सदा अथे को प्राप्ति, आरोग्यता,आयुष्य की वृद्धि, कांति की वृद्धि 1 “बिन्दु” सदा जठराग्नि का रोग, सिर पीड़ा, रक्त पित्त का रोग ।
४ बुध रेखा-सुख ओर मिष्ठान्न भोजन लाभ, दान कमं में धमं में रत, देव द्विज और अग्नि का पूजक ।
'बिन्दु' भंग, शत्रुओं से कलह, दुःस्वप्न दर्शन, नित्य असमय भोजन ।
५ गुरु रेखा--सदा धन सुख आदि तथा पुष्टि, स्त्री भोग दायक है शत्रु का नाश मनोत्साह अधिक,अतुळ विभव वस्त्र सुवर्ण सुख आदि की वृद्धि बंधु वर्ग से सौख्यछाभ ॥ “बिन्दु” कष्ट, धन और बुद्धि का नाश, मानसिक एवं घर की चिता,मागं में दुःख, वाहन से पतन, सर्वत्र कलह, अपने ही वचनों द्वारा अपमान, शत्रुओं से द्वेष के कारण
खर्च और साहस से कार्य हानि ।
६. शुक्र रेखा--राज सम्मान वृद्धि, कपट का लाभ, शरीर का सुन्दर सुख,
दीर्घायु, क्रीडा ( खेल ) में मग्न, ज्ञान प्राप्ति, अर्थ की सिद्धि, लक्ष्मी का लाभ, सुख
सम्पत्ति की वृद्धि ।
“बिन्दु! शत्रु से कष्ट, धन नाश, स्त्री को पीड़ा, कलह, भूमि का नाश, बुद्धिनाश, सदा अधिक खर्च, घोडे से गिरना, मार्ग में चोर भय आदि ।
७. शनि रेखा- श्रेष्ठ फल, नौकरों के हेतु धन, कार्य सिद्धि, राजा से मित्रता,
सत्पुरुषों से सम्बन्ध, भूमि की प्राप्ति, दुष्ट जनों से जय प्राप्त हो, स्नान, दान, पूजन में
प्रेम, राज आश्रय से मिष्ठान्न भोजन खेती तथा धान्य की वृद्धि हो ।
“बिन्दु! कष्ट, राज से भय, बन्धुजनों में पीडा की वृद्धि धातु शस्त्र या दुष्टजनों से
धन नाश, चित्त में उद्देग, भुमि का नाश, कलह, बुद्धि नाश, वाहन से हीन ।
इन रेखः या विन्दुओं का फल--इनकी संख्या अधिक हो तो अधिक फल होगा ।
संख्या अल्प होगी तो अल्प फल होगा ।