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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

८८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

९ भोजन--छरीर में पीड़ा, परस्त्री गामी, पर-स्त्री के कारण धन नाश, बल का ह्वास,

असत्य भाषण, मस्तक पीडा, क्षुद्र अन्न भोजन, कुमार्ग गमन, उग्र स्वभाव,

मांस का लालची, शास्त्र का ज्ञाता, मीन भक्षी, सतगुण कार्य का अनुयायी,

गठिया के रोग से युक्त । इस अवस्था में नवम घर में सूर्य हो तो पुण्य कर्म

में बाधा हो ।

१० नृत्यलिप्त--कणं रोगी, नाना विषय के अध्ययन में मर्न, विद्वान्‌, राजा से मान,

विज्ञजनों से सम्मानित, काव्य विद्याओं का ज्ञाता, राजपूज्य बड़ा

पंडित, पंडित पुरुषों के साथ रहने वाला ।

११ ष्लोतुक--सवंदा हषं युवत, ज्ञानी, यज्ञ करने वाला, राजा का आश्रित, शन्नु से जीत,

सुन्दर मुर्ख, काव्य प्रेमी, कार्य शील, धनी, सदा हास्य युक्त, दानी, आनन्द

भोवता, अपनी स्त्री और संतान का प्रेमी, कला के काम का प्रेमी । इस

अवस्था में छठे घर में सूर्य हो तो--शन्नु नाश हो, पंचम दोषप्रद में शरीर

में बिगाडू, पुत्र, मृत्यु, गुप्तेन्द्रिय में रोग हो ।

१९ निग्रा- आँख निद्रा से भरी, विदेश वास, स्त्री की हानि, अनेक प्रकार के घन का

नाश, निद्रालु या ऊंघता, रोगी, रक्त नेत्र, उम्र स्वभाव दूसरों को डांटने

की आदत ।

(२) चंद्र की १२ अवस्थाओं का फळ

चन्द्र शुक्ल पक्ष में शुभ होता है । कुष्ण पक्ष में अशुभ होता है ।

चन्द्र की शासन अवस्था को छोड़कर अन्य अवस्थायें बुरी नहीं हैं ।

१ शयन अवस्था-गरीब हो, क्रोधी स्वभाव का, बुरे आचरण का, निद्वालु, शरीर के

गुप्तांग में रोग । बड़ा अभिमानो, बड़ा कामी, घन का व्यर्थ खर्चे

करने वाला । मृदु स्वभाव, कृष्ण पक्ष में बुरा प्रभाव पड़ता है, कृपण,

झगड़ाछू, क्रूर, मर्यादा के बाहर कार्य करने वाला (बुरे आचरण का)

दुसरे को डांटने वाळा, दाहिनी वाजू त्रण, अग्नि में जलने की सभ्भा-

बना, सपं से भय, जळ में डूबने का भय ।

२ उपवेधन--पितृज पीड़ा या अन्य प्रकार का रोग, मलिन हृदय, कृपण, घन रहित,

घोखेबाज, विदेशवासी, दांत के गड़ने या काटे जाने की सम्भावना, मन्द

बुद्धि, घन हीन, बड़ा कठोर, वियोगी, दूसरे के घन को इरने वाला ।

३ चेत्रपाणि--नेत्र के रोग, हाथी पांव रोग, उपद्रवी, घोखेवाज प्रकृति का, अधिक कानूनी,

बड़ा रोगी, निरर्थक बोलने वाळा, धूतं, कुकर्म में रत ।

४ प्रझाशन- घन के लिये लाम जनक, दुढ़ शरीर, तीर्थ यात्रा की भोर झुकाव, विमल

गुण युक्त, राजा के सम्बन्ध से गुण प्रकाश, संसार में ख्याति, राजा से धन

लाभ, हाथी घोड़े आदि वाहन युवत, सम्पत्ति भूषण वस्त्र और स्त्री के सुख

से युक्त, तोथं करने वाला । कृष्ण पक्ष में इसका उल्टा फल होगा ।

ग्रहो की अवस्थाए ओर चन्द्र क्रिया : ८९

५ ग्रभनेज्छा--विदेश वास, क्रूर कार्य करने वाला, मस्तक पीड़ा, दंत पीड़ा, गरीब,

कृष्ण पक्ष में विशेष रूप से क्रूर, नेत्र रोग से पीडित, पाप में निरत, शुक्ल

पक्ष में भयभीत ।

६ गणशव--बड़ा अमिमानी, पांवों ५ रोग, गुप्त पाप में निरत, बड़ा दीन, वृद्धि सन्तोष

से रहित ।

७ सभावसति--सदा दानी, धर्म या गुण की ओर प्रेम, राजा या राजकीय पुरुष का

पुत्र हो । उच्च पुरुष हो । पूर्ण चन्द्र--सब मनुष्यों में उत्तम, सत्यवक्ता,

राजाओं से मान पाने वाला, कामदेव के समान सुन्दर, कामिनी स्त्रियों को

शांत करने वाला उत्तम रीत व प्रीत जानने वाला, वडा गुणज्ञ ।

८ आगसब--वातूनी, शांत, दो स्त्री हों, गुणी कुछ निद्रालु, रोगी सरीखा, बहुत दुःखी

और एक पुत्र हो । पूर्ण चंद्र-बहुत वाचाल, धर्म से पुर्ण । कृष्णपक्ष ( क्षीण

चंद्र )--२ पलीवाला, रोगी, दुष्ट, हठी ।

९ भोजन--बहुत लालची, धनी, क्रूर, दुर्बल देह, दानी, विदेश वासो, सदा रोगी, हाथी

पांव का रोग ।

शुक्लपक्ष (पूर्ण चंद्र) लोक में आदर, पारिवारिक सुख, स्त्री पुत्रों का सुख ।

कृष्णपक्ष ( क्षीण चंद्र ) यह फल नहीं होता विपरीत होता š ।

१० नृत्यलिप्सा--धन देवे, कई प्रकार के गुण, दान देने को ओर झुकाव, कई पुत्र, चंद्र

बलवान हो ( शुक्लपक्ष में )--ब ड़ा बलवान, संगीतज्ञ, रसज्ञ ।

कृष्णपक्ष मे--पाप करने वाला ।

११ फौतुक--लरन से ९ या १० घर मे इस अवस्था में चंद्र हो तो वह विद्वान हो सब

प्रकार का सुख भांगे, कभी गरीव न हो । साधारण फल-राजा या पूर्ण

धनवान हो, काम कला में कुशल, वेश्या से प्रम ।

१२ चिद्रा--चन्द्र की यह स्थिति बहुत अलाभजनक है । दन्त पीडा, कामी, अशान्ति,

आपत्तिवान, रोगी, सदा भ्रमण शीळ, अपने पुत्र की हानि का दुःख भोगे ।

इस अवस्था में चन्द्र गुरु के साथ किभी घर में हो तो प्रत्येक बात सूळभ होती

है। प्रतिष्ठा प्राप्त हो । यदि गुरु से युक्त न हो क्षीण हो तो स्त्री और

संचित धन का नाण होता है उसके घर में गाली रोती है । यदि राहु युक्त

हो तो सबाप्रकार का नाश हो । कई प्रकार के अवगुणो से युक्त हो ।

३. मंगल की १२ अवस्थाओं का फल

१ शयन--वुरे आचरण का, कृपण, अति क्रोधी, अधिक योग्यता, आनंद और विद्या,

ब्रण, खुजली, दाद से अति पीडित । शयन में मंगळ पंचम में हो तो पहली

संतान की मृत्यु, सप्तम हो तो पहिलो स्त्री को मृत्यु, यदि षष्ठ में हो और

शत्र ग्रह से दृष्ट हो तो कामदेव के निमित्त इसका हाथ और कान काटे जाने

लायक हो । यदि राहुं युक्त मंगल लग्न में हो तो नेत्र रोग, शरीर में घाव

९० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शिर पीड़ा या सिर काटे जाने की संभावना । मंगल रुग्न में हो तो खुजलो

और दाद से युक्त हो ।

२ उपबेशन--नीच आचरण, क्रूर, रोगी, दुगुंणी, सम्बन्धियो से त्यक्त, बलवान, पाप

कर्ता; मिथ्या वादी, दरिद्र, धनवान, घमंहीन, यदि लग्न पे हो तो उपरोक्त

फल हो । यदि मंगल ९वें घर में हो तो कई प्रकार से हानि करे उसको

स्त्री-पंतान न जिये । परन्तु मङ्गल उच्च का हो तो इसके विरुद्ध फल होने

की सम्भावना है।

३ नेन्रपाणि--लम्न में हा तो नेत्र खोवे, स्त्री सन्तान, धन खोवे, सदा गरोव रहे ।

अन्य घर में हो तो सब प्रकार आनन्द भोगे, स्त्री सन्तान धन होवे ओर

कुछ निद्रालु हो, अङ्ग के जोड़ों में दोष हों, बाघ सर्प अग्नि और जळ से

भय हो, परन्तु किसी नगर का स्वामी होता है। मङ्गल सप्तम घर में हो

तो कामदेव के निमित्त से भंग, सपं, दाँतों से काटने से अग्नि रो या जल मे

भय, पत्नी का अभाव हो 1

४ प्रक्ाशन--धनी और कुछ समय के लिये आनन्दित रहे, बांये आँल में कुछ चिन्ह या

दाग हो, ऊँची जगह से पतन, गुण का विकाम हो, राजा से आदर हो, लग्न

से पञ्चम घर मे हो तो सब समय परदेश मे निवास करने वाला गुण रहित

होने पर भी राजा से मान पाये परन्तु स्त्रो पुत्रों का नाश करे । मङ्गल प्रका-

शन अवस्था में पाप ग्रह युक्त होकर या पाप ग्रहों के बोच होकर पञ्चम घर s

हो तो यह कुकर्मी हो । राहुँ से युक्त हा तो महा पतन होता है, पुत्र स्त्री से

वियोग, वृक्ष से पतन या लाठी की चोट से दुःख ।

५ गमनेच्छा-बिदश वास, गुप्तांग में रोग, भरीव, बुरे कर्म का प्र मो, नित्य गमन करने

वाला, घाव का भय, स्त्री से कलह, दाद खाज युक्‍त, शस्त्र से भय, घन

की हानि ।

६ गमन-सदा उदास, दाद खाज या दूसरे चमं रोग, पित्तज पीड़ा, अङ्ग के जोड़ों

प्रे पीड़ा, काये शील, शान्त, अपनी स्त्री के प्रभाव में, बातूनी, नेत्र हानि,

दन्त और सिर के रोग, दोष युक्त चर्म, जल से भय में विचित्रता, गुणी, मणि

रत्न से युक्त, तीक्ष्ण खडग धारण करे, कत्रुओ का नाशक. परिजनों का

पालक, गज समान गति, यदि लग्न में हो तो सब बातें लाम जनक हों ।

यदि गमन अवस्था से और किसी अवस्था में हो तो उपरोक्त अगुभ बातें न

होंगी परन्तु वह धनो योग्य, दानी होकर सुख भोगे और आलसी हो ।

७ सभावसति-गुण, घन, सम्पत्ति याग्यता देवे, दान को ओर झुकाव, सिर का रोग हो ।

मङ्गल उच्च पञ्चम नवम घर में हो ता युद्ध कला में प्रवोण, धर्म रहित,

. घन युक्त परन्तु विद्या से हीन, सत्कायं में बाधा । वारहुवे हो तो स्त्री पुत्र

ग्रहों को अवस्थाएं' और चन्द्र क्रिया : ९१

मित्र से रहित हो । इससे मित्र स्थान में हो तो घनी मानी दानी हो 1 राज

= als सभा में बैठने वाला बुद्धिमान हो।

८ आगसत-जीवन भर लंगडा, पित्तज पीड़ा, कान के रोग हों, दुर्गुणी, नीच आचरण

पर न्यायी धनी हो । घमं कर्म रहित, रोग से दुःखी, बड़ा शूल रोग, कातर

बुद्धि, (डरपोक) दुष्ट संग, यदि दशम घर में हो तो उन्नति हो, धन हो, सब

प्रकार से अच्छा, माननीय हो, २ स्त्री और कई सन्तान हों!

९ भोजन -मांस खाने का इच्छुक, क्रोधी, सदा उग्र, घनी, ठिंगना शरीर, यदि बलवान

मङ्गल हो तो मिष्टान्न भोजी हो | निबंल हो ता नीच कर्म करने वाला और

मान होन हो। यह इस अवस्था या शयन अवस्था में अष्टम घर में हो तो

वह पशु से मारा जाये ।

१० नृत्यलिप्सा-घनो, दानी, अच्छा खाने का प्रेमी, सदा निराश, कई गौ से युक्त ।

राजा से लक्ष्मी प्राप्ति, सुवर्ण रत्न दुर्गो से सुशोभित, यदि लग्न दवितीय या

दशम या सप्तम घर में हो तो-सब प्रकार का सुख भोगे यदि अष्टम या

नवम घर में हो तो कई प्रकार का दु:ख भोगे, धर्म से, पतन, अचानक मृत्यु ।

११ कौतुक-विद्यावान पुत्र हो, धन, उन्नति हो, कोतुक करने वाला, भित्र, पुत्र आदि से

युक्त । उच्च का मंगळ हो तो राजा और गुणज्ञ जनों से पूजित हो बड़ा

पंडित हो, यदि ५,७ और ९ घर को छोड़ कर्‌ अन्यत्र हो तो उपरोक्त फल

यदि ५,७ य। ९ घर में हो तो दोष युक्त अंग, कई प्रकार के रोग, पहिली

स्त्री पहिला पुत्र मरे ।

१२ निद्रा-बड़ा क्रोधी, बुद्धि और घन से होन, बड़ा धूतं, घर्म से होन, रोगों से पीडित ।

यदि लग्न, २,३,९ या ११ वें घर में हो तो वह अज्ञानी गरीब, क्रोधी

दुगुणी हो । यदि ५ या ७ घर में हो तो कई पुत्र हों और कई प्रकार से

सुखी हो । यदि मंगळ राहु युक्त हो तो ज्येष्ठ पुत्र की हानि हो कई प्रकार

से दुःखी हो, कई स्त्रो हों दानी ओर गुणवान हो, पाव रोगी हा ।

४. बुध को १२ अवस्थाओं का फल

१ शयन — में हो तो धनी हो, सदा भूखा, लंगडा, शरीर का कोई अंग काटा जावे,

लालनेत्र बाळा, असमथं । अन्य भाव में हो तो गरीब और आचरण होन

हो, गड़ा कामी और धूतं हो 1

२ उपवेशन-अच्छा ववता हो कवि हो शुद्ध व्योहार । लग्न में हो तो गुणों की राशि से

पूर्ण । पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो दुर्गुणी हो दरिद्री हो । भित्रक्षत्री या

उच्च का या मित से दुष्ट हो तो घनी और सुखी हो पदित्र आर घामिक हो

परन्तु नेत्र रोग से पीडित हो!

९२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३ नेश्रपाणि-हाथी पांव रोग हो, गरम आंखें, सुन्दर वाल, कई गुण हों सत्यवादी हो.

परन्तु पुत्र मरे । विद्या विवेक से रहित मित्र और संतोष से होन, बड़ा

अभिमानो हो । यदि पंचम भाव में हो तो पत्र हीन हो कई कन्याएँ हों जो

जीवित रहेँ, राजा से घन पाने वाला, श्रेष्ठ पुरुषों में गणना, स्त्री के सुख से

होन 1

४ प्रकाशन-दानी, धार्मिक, धनी, बहुत गुण युक्त, वेद का ज्ञाता, दयाट्‌, पुण्य कर्म करने

वाला, अनेक विद्याओं में पारंगत, विवेकी, दुष्टो का दमन कर्ता ।

५ गमनेच्छा-आचरण हीन, वातूनी, बहुत दुःखी, रोगी, व्यसनो, झगड़ालू, स्त्री बुरी

जिसके प्रभाव में रहे, लाठी से चोट, राजदरबार में आने जाने वाला, धर

लक्ष्मी से परिपूर्ण, भूमि का पालक ।

६ गम्नन -ज्यापार से लाभ, बहुत आपत्तियाँ भोगे, तर्प, जळ का भय अपनी स्त्री और

सम्बंधियो की हानि, अज्ञानी, गुण रहित । इसमें गमनेच्छा सदृश भी फल

होता है।

७ समावसति-अज्ञानी, घनी, गुणी, जीवन भर रोगो, उच्च का बुध-घनवान, राजा या

मंत्री, ईश्वर में भक्ति अंत में मुक्ति प्राप्त । ५ या १२ घर में-कई स्त्री

हों, आलसी पुत्र हो, विशेष कंजूस । ५ या ७ घर में कन्या संतति, सप्तम

घर में-काला हो, वेशर्म, अल्प सुख हो, पुत्र हो ।

८ आगसन-क्र्र, चालाक, अपढ़, व्यसनी, २ पुत्र हों, थोड़ा घन हो, मन बदलने वाळा,

गुप्तांग में रोग, मूत्र रोग की शंका सदा रहे । हीन मनुष्यों की सेवा से घन

पाने वाळा, २ पुत्र १ कन्यां हो ।

९ भोजन-गरीब, कलुषित हृदय, वृद्धावस्था में रोग से पीड़ित, विदेश वास, बाई

ओर ब्रण, दंत रोग चर्म रोग, व्रण या ग्रन्थि हो, ग्रन्थिक पीड़ा, कठिन

मस्तक रोग | वादविवाद में धन हानि, राज भय, कृषदेह, चंचळ सन;

शरीर स्त्री और धन के सुख से रहित ।

१० नृत्यलिप्सा-क्रवि, घनी. विद्वान, उग्र, क्रोधी, पर सुखो हो 1 अच्छी स्त्री, अच्छे पुत्र

हों ४ लड़की हों । मान, वाहन, रत्न, मित्र, ओर प्रताप से युक्त, सभा

चतुर । यदि पाप राशि में हो तो लम्पट और वेश्यागामी हो ।

' ११ कौतुक्क-जहुत मिलन सार; अशं रोग अवश्य हो; दाद, चर्म हो । छान में-पंगीतज्ञ 1

७ या ८ घर में-कई कन्याएं हों ज्येष्ठ पुत्र मरे । ९ या १० घर में-बहुत

प्रकार का सुख भोगे, धामिक कार्य करें ।

१२ निव्रा-पुख्ी और घनी हो, संतान हो, दोघं व शांति पूर्वक जीवन, निद्रा से सुख

( आलस ) आधि व्याधि से युक्त, अधिक संताप, अपने जनों से विषाद और

धन नाश । सहोदर होन या सगे भाइयों के निमित्त से विफलता और नाश ।

ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्र क्रिया : ९३

५. गुरु को १२ अवस्थाओं का फल

१ झथच--विद्वान, धनी, वहुत गुणी. बहुत वृद्धिमान । बलवान, मंद स्वर से बोलने

वाला, गौर वर्ण, बड़ी ठोडी वाला, अति शत्रु भय ।

२ उपवेशन-गरीब हो, बातूनी, ( वक्ता ) रोगी, पशु के दांत की चोट, दस्तकारी के

व्यौपार में योग्य, हाथी पाँव रोग, बहुत गवं वाला, राजा और शत्रु से

सुख पाने वाला, पैर जांघ मुख और हाथ में ब्रण । यदि २,३,११ या १२

घर में हो-तो बड़ी बुद्धि हो शास्त्र की अनेक शाखाओं में दक्ष हो 1

३ नेत्रपाणि-रोगो; धन होन, गीत ओर नृत्य प्रिय, कामी, गौर वर्ण, दीन वर्ण मनुष्यों

से प्रीत । लग्न में हो तो-अनो, सुन्दर, सिर का रोग हो, शंका युक्त, कोई

कार्य या व्यापार में असफल होने को संभावना । पैरों में सदा qo, यदि

६, ८ या ९ घर में हो-शत्रुओं का दमन करे ।

४ प्रकाशन-गुणों से आनंद, सुख, तेज, वृन्दावन आदि गमन, उच्च का हो तो मान्य

कुबेर सम धनी । लग्न या दशम में-राजा. का मंत्री हो, बहुमूल्य पदार्थ व

घन युक्त रहे ।

५ गश्नेज्छा-साहसी,. मित्र वर्गो से युक्त, पंडित, अनेक सम्पत्ति से युक्त, वेद

ज्ञाता । बिना विचारे काम करने वाला, सदा मित्र व पुत्रों के सुख से सम्पन्न

लग्न में हो तो विद्वान हो अन्य घर में हो तो गुप्तांग में रोग हो । यदि

२-५-७ या १० घर में हो तो आडम्बर हीन पापी और रोगी हो कृष्ण

वणं से पीड़ा हो, धनी हो, विदेश वास करे ।

६ गसन--शूर वोर हो, सर्प से भय, विविध कार्यों में संलग्न रहे परन्तु दूसरों के धन

से घनी हो | उस फे घर में जन समूह, सुन्दरी स्त्री और लक्ष्मी सदा रहे ।

७ सभावसति-तेज वक्ता हो, धनी, दानी, राजभक्त, विद्वान और देखने में सुन्दर ।

गुरु के समान वक्ता, मुक्ता आदि घन से परिपूर्ण, अनेक वाहनों से युक्त

अनेक विद्या का ज्ञाता । यदि केन्द्र में हो तो बहुत सुखी ओर घनी हो

परस्त्रो भोगे । ८ या १२ घर में हो तो दुःखी हो और नष्ट हो ।

८ आगसन-घामिक विद्वान, माननीय, शक्तिवान, घमंडो, तीर्थ घूमे, झोक में आदर,

अनेक बाहन, सेवक, पुत्र, स्त्री मित्र आदि से युक्त, उत्तम विद्या, राजा से

सन्मान, उत्तम बुद्धि, काव्य में प्रेम, सन्मार्ग, सुखी, सर्वत्र मान, राजा के

समान प्रतापी ।

q सोजन-नित्य उत्तम भोजन मिले, अनेक वाहन से सुशोभित, घर को लक्ष्मों कमी न

छोड़े, सदा पंडित : लग्न में हो तो प्रसिद्ध पुरुष हो, बहुत सुखी हो परन्तु

ब्यसना हो और मानने योग्य बात कहे, घनुर्घर हो । ५ या ९ घर म-सत

गुणो हो पुत्र हो परन्तु घन होन हो । गुरु पाप युक्त ५ या ९ घर में-पुत्र

संतति से रहित हो ।

९४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

१० नृत्यलिप्सा-विद्धान, धनी धामिक बडप्पन हो, राजा का मान्य, मंत्रज, पंडितों में

श्रेष्ठ, शब्द शास्त्र में पंडित लग्न, ५, ९ या १० वें घर में हो तो इन

विषयों में भाग्यवान हो, न हो तो नहीं होगा ।

११ कौतुक कुतूहलो, महा धनवान, अपने कुल में सूर्य समान कृपाळू, सुखी, पुत्र, भूमि,

नीति गे युक्त. महाबठ़ राज पण्डित, पूजित, लग्न, ९ या १० घर में हो-

होता घनी, धार्मिक, बहुत संतुट, उम्र, विशेष रीति से सुखी । किसी दूसरे घर

में हो तो गरीब, कामी, दुःखी, अकार्य शील या आलसी ।

१२ नित्रा सत्र प्रकार से मूर्ख दरिद्र और पुण्यहीन, बातूनी, कृपण, नेत्र रोगी, पृथ्वी भर

में भ्रमण करें, बहुत दुःखो हो । ५-७-१० वें घर में हो तो स्त्री संतान

भरे लग्न में हो तो गराब हो ।

६. शुक्र की १२ अवस्थाओ का फल

१ शयन-बली होता हुआ भी दंत रोगी, क्रोधी, धन हीन, वेश्या गामी हो, धर्म रहित

हो । ७-१० घर में हो ती सब प्रकार फा सुख भोगे, कभी दुःख न हो, ७

पुत्र ५ कन्या हो ' उच्च में हो तो कई संतान हों । यदि निर्बल हो तो अल्प

संतान हों यदि अन्य घर में हो तो घनी शिक्षायुक्त, घामिक, बहुत सुखी हो

परन्तु निश्चय उस का पुत्र गरे ।

२ उपवेश्ञन-रत्न सुवणं आदि धन से मुख, शत्रु का नाश राजा से आदर प्रतिष्ठा की

वृद्धि । घामिक हो, दाहिगी ओर व्रण, अंग की जोड़ में पीड़ा, यदि स्वस्थानी

या उच्च का या शुभ युक्त हो तो कई प्रकार से मुखी हो । १८

३ नेत्रपाणि-नेत्र हानि हो । लग्न या सप्तम घर में हो तो अवश्य नेत्र, हानि हो १२ वें

घर में भारी दुःख परन्तु अन्य बर में हो तो २ स्त्री हो बहुत घन हो शूरवीर

और राजभक्त हो, माननीय हो कई तीर्थ करे । १-७ या १० घर में नेत्रों में

रोग हो घन नाश हो 1 अन्य स्थान में उत्तम मक्रान वाळा हो । अन्य मत से

( भा० कुं. ) १,७ या १० भाव में-अति शुभ वल वृद्धि हो, कामदेव की

वृद्धि हो परन्तु थोड़ी अथस्था में दाँत उखड जावे । 3

४ प्रकाशन-स्वोच्च; स्वगृह या मित्र राशि में हाथी के सर्मान : बलशाली हो राजा

समान धनी और सुखी, काव्य तथा संगीत में पारंयत, बड़ा कोतुकी,

कलाओं में प्रवोण, कीतिमान ' यदि लग्न, 4 या ७ या ७ घर में हो तो,

घनी-पवित्र और घामिक हो यदि दशम में उच्च का हो तो उपरोक्त फल

अधिक भोगे । यदि अन्य घर में हो तो दु:खी और रोगी हो विदेश वास

करे, सदा किसी काम में लगा रहे।

५ गमनेच्छा--भाई मां परे, बचपन में रोग युक्त रहें। मातमिक चिता बंघूओं का

वियोग, शत्रु भय ।

ग्रहों को अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया : ९५

६ गसन--उत्साही, कला कोश में दक्ष, तोर्थ यात्रा का प्रेमी, टखने में रोग, घनवान,

हाथ पैर में रोग ।

७ सभावासति--राजा का मंत्री हो, घनी दक्ष परन्तु पीड़ा हो, उदय होकर बली हो तो

अपने प्रताप से राजदरबार में प्रगल्भता, गुणी, शत्र, का नाणक,

महावली, दाता और वाहन पर चलने वाला । यदि शत्र क्षेत्री या छात्र

युवत या दृष्ट हो-तो नाना प्रकार के रोग हों और नष्ट हो जावें ।

८ आगमन--घन लाभ नहीं होता, शत्रुओं द्वारा हानि, पुत्र और परिजन का वियोग,

रोग भय, स्त्री सुख की हानि । बुरे आचरण का, गरीब और वातूनी,

दाद का रोग, पुत्र शोक 1 शत्र, णकत या ६ घर में हो-अपनी सब सम्पत्तियां

विशेष कर अपनी संतान ओर स्त्री खोवे। यदि २, var ८ घर में

हो तो सब प्रकार से दुःखी हो।

१ भोजन--मजबूत, सतगुणी कार्य में मन, सेवा या व्यापार से धन, क्षुधा की कमी,

पित्तज पीड़ा, मस्तक पीड़ा, विदेश वास, पराई सेवा, कई प्रकार की आपत्तियां

  • क्षूघा से व्याकुळ, रोग से पीडित, शत्रु से तंग, कन्याराशि में-घनवान ओर

पंडितों का आश्रित ।

१० नृत्यलिप्सा-काव्य करने वाला, वुद्धिमान, वीणा मृदंग आदि बाजा बजाने में निपुण,

घन को बढ़ाने वाला । वक्ता हो उसकी विद्या और कवित्त शक्ति दिन २

बढ़े । परन्तु नीच का हो तो वह अज्ञानी हो। यदि स्वस्थानी हो तो राजा

का मंत्री बहुत दृढ़ और कामी हो, कई स्त्री हों पर-स्त्री से मन काला हो,

बातुनी हो माननीय यज्ञ कर्ता और घामिक पूजा शादि करे 1

७. शनि की १२ अवस्थाओं का फल

१ शयन- बाल अवस्था में रोग, भूख प्यास से पीडित, बहुत बड़ा श्रमित परन्तु वृद्घा-

वस्था में भाग्य से सम्पन्न होता Š । शनि चाहे कहीं हो जिस शयन आदिं

अवस्था में बैठा हो उसो तुल्य फळ देता है । शयन में गुप्तांग में रोग, दोषित

अंग, पोता बढ़ जाने का रोग 1 लग्न, ६ या ८ घर में-निरंतर विदेश वास,

गरीब हो, कुरूप अंग मोटा, ५, ७, ९ या १० घर में-घामिक हो, पुत्र हो,

अपनी सम्पत्ति स्वतंत्रता पूर्वक वाँट सकता है । ;

२ उपवेशन-हाथीपांव रोग, दाद, सदा वीमार <ë, नित अपना घन गंवावे, प्रबल शत्र,

से पीड़ित, व्यथं खर्च, अभिमानी, राजा से दंडित ।

३ नेत्रपाणि -सुन्दरी स्त्री और सम्पत्ति से युक्त, राजा ओर मित्रों से उपकृत, बहुत

कलाओं का ज्ञाता, प्रिय वक्ता । इस अवस्था में अज्ञानी भी विद्वानों सरीखा

प्रसिद्ध हो, धनवान और बातुनी हो, २ स्त्री हो, उदर शूल, पेट ओर सिर

में रोग, अग्नि व जल से भय, ज़ोडों में पीड़ा हो, उसका क्रोध थोड़े समय

९६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

<š । यदि लग्न या १० घर में हो तो इससे विरुद्ध फल हो सब अकार का दुःख भोगे उप के कार्य से लोग घृणा करें, ५ या ७ घर में स्त्री संतान और घन गंवाये । अन्य घर में हो तो धनी होकर कई प्रकार का सुख भोगे । ११ क्षीतुक-इन्द्र समान पराक्रमी, समा में चतुर, उत्तम विद्या, धर में सदालक्ष्मोका निवास, धनी, पवित्र, आनंदित, बहुत सुखी, हास्य का प्रेमी, वक्ता हो, पुत्र हो, नीच के घर में-उपरोक्त बातें विरुद्ध हों वह दुःखी और आपत्ति में रहें ।

१२ निष्रा-दूसरों को गेवा करने वाला, पर निंदक, वीर, व्यश बोलने वाला, भ्रमण शवित । चित्त में शान्ति न रहे, रोगी, गरीब, सदा आपत्तिवान, कुरूप अंग और मोटा । यदि मित्र क्षेत्री हो तो सत्र सम्पत्ति गंवा देवे ।

४ प्रबाशन-अनेक गुण धन और वुद्धि से युवत, तेजस्त्री, दयाळु, ईश्वर का अक्त, बड़ा

प्रतापी । राजा का मंत्री, बडी बुद्धि हो, धनी हो पवित्र और धार्मिक हो । लग्न या ७ घर में-सब सम्पत्ति Tara जाति से व हिष्क्कत । ५ गसनेच्छा-कई पुत्र, बहुत घन हो, विद्वान्‌, दानी शत्रु की भूमि छीनने वाला, राज- दरबार का पंडित, खचं करने वाला, राजा का मुख्य कामदार ।

६ गमन-मुखं, स्त्री पुष के सुख से रहित, दीन, किसी के आश्रित, भ्रमण करने वाला, पांव रोग, ( हाथी पांव ) बहुत क्रोधी, कृपण, दांत से शरीर में चोट, दुसरो को डांटे, ५ या ७ घर में हो तो अपने सब पुत्र खोबे विशेष कर स्त्री । लग्न में हो तो कोई स्त्री या संतान न हा, पांव में कोई रोग हो स्वाभाविक

यात्री या तीर्थ यात्रा करने वाला हो । ७ या ९या १० या...१ २ घर मे- विद्वान्‌, धनो हो सब प्रकार का सुख भोगे!

७ सभावसति-लगातार घनी और ध।मिक हो सव प्रकार का सुख भोगे सुवर्ण रत्न आदि घन से सम्पन्न गीत जानने वाला बड़ा घनो व वडा पुष्षार्थी हो। स्त्री संतान घन और आभूषण युक्त हो शत्र, के घर में हो, या शत्र से दुष्ट हो तो असामयिक मृत्यु हो ।

< आगमन-रोग की वृद्धि, दरबार से लाम करने में बुद्धि नही होवो भूमि में घोरे चलने वाला मांगने की इच्छा से रहित । क्रोधी, सर्प काटने की संभावना । अपना भाई गंवावे । लग्न में हो तो उपरोक्त बातें नहीं होती । २, ३, ५ या ७ वें घर में हो तो-घनी हो स्वी संतान और भाई का सुख भोगे ९ वें घर में हो तो घामिक कार्य से सदा बाघा होती ë ।

९ ओजन -सरल भोजन, नेत्र का ज्योति मंद, मोह से बुद्धि चंचळ क्षघा, हानि, अर्श, क्‌ पेट शूर ओर नेत्र रोग हो स्वस्थान या उच्च में हो तो निरोग रहे सब प्रकार सुखी रहे । ु BET

ग्रहो की अवस्थाए और चन्द्र क्रिया : ९७

१० नृत्य लिप्सा-धर्मात्मा, धनी, राज मान्य, घीर, रण में वीर, सब प्रकार का सुख

भोगे, पांचवें घर में-सब पुत्र हानि, ५, ७, ९ या ११ घर में-सब गंवावे,

नाना प्रकार के रोग हों ।

११ कौतुक-रक्षा का मंत्री, दानी, धार्मिक, विद्वान्‌, पवित्र सत्र प्रकार के कार्य में बहुत

दक्ष घनी, अच्छा भोजन, भूमि और घन से परिपूर्ण अति सुखी, सुन्दर स्त्री

व सुख से पूर्ण, काव्य कला का ज्ञाता ।

१२ निद्रा -घनवान्‌, गुणवान, पराक्रमी, शत्रु को जीतने वाला, वेश्या से प्रेम, धार्मिक,

नेत्र रोगी, शूल रोग, २ स्त्री, कई सन्तान हों । १० £ घर में-नष्ट हो जाये,

सज कार्य में और धामिक कार्य में उस का जीवन असफल रहे । सदा qar,

दुःखी, रोगी, सदा विदेश वास । अन्य कोई अवस्था में १० वें घर में हो

तो उसे लाभ जनक होगी 1 शनि स्वस्थान, उच्च केन्द्र या त्रिकोण में हो तो

उपरोक्त हानि कारक बातें नहीं होंगी, ५ या ७ घर में-२ स्त्री और कई

सन्तान हो सब प्रकार का सुख भोगे ।

.८. राहु की १२ अवस्थाओं का फल

१ शयन -बहुत दुःख भोगे, रोगी रहे, हाथी पांव रोग हो, सदा घन गंवाये, राज￾कीय पुरुष से कप्ट भोगे, कन्या, सिंह या मिथुन या वृष में उन्नत शील हो

सव प्रकार का सुख भोगे । अन्यमत से मेष वृष या मिथुन में-घन धान्य

युक्त समाज में मुख्य । ( अन्यमत ) लग्न से राहु २,११ या १२ घर में हो

निर्धन होकर भ्रमण करे । राहु स्वक्षत्र ( कन्या का ) या उच्च ( मिथुन )

का या शुक्र या बुध के धर का या मित्र गृही या अपने वर्ग का शुभ ग्रह के

वर्ग का हो तो पूर्ण शुभ फल देगा उक्त स्थान छोड़ अन्य घर में हो तो

अनिष्ट फल देता ë ।

२ उपवेशन-कोढ़ से दुःख भोगे, अपने शत्रु या राजासे हानि हो । दाद रोग, घन से

रहित राज सभा में बैठने वाला, अभिमानी ।

३ ेत्रपाणि-नेत्र रोग हो, सर्प या व्याघ्र से चोट, उतावला, बातूनो, घनो, कुटिल हृदय

या घोखेबाज, स्त्री के प्रभाव में रदे, बचपन से रोगी, अंडकोष दोष युक्त,

गुप्तांग में रोग, जल में डूबने को संभावना शत्र, और चोर से भय, घनका

नाश ।

४ प्रकाशन-सुन्दर स्थान, सुयश, धन और गुणों को उन्तति, राजा से अधिकार, विदेश

में उन्नति, नवीन मेघ समान, धार्मिक, उग्र (या विदेश वास) । मिथुन या

कन्या का-शुभ आसन पर बैठने वाला भादि उपरोक्त शुभफल । यदि कर्के

या सिंह में हो तो सिर काटे जाने की संभावना हो ।

९८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५ गमनेच्छा-बहुत पवित्र, बहुत घनी, विद्वान, गुणी, दानी ओर प्रसिद्ध-बहुत सन्तान

वाला, पंडित, राजपूज्य 1

६ गसन -दांत के चोट के निशान शरीर पर, बहुत क्रोधी, उपद्रवी, परपीड़क, निंदक,

सपं या व्याघ्र से काटा जावे, पांव में लोहे की सांकल पड़ने की ' संभावना,

कई प्रकार की बीमारी में घन नष्ट, उसकी स्त्री ओर सम्वन्धी की मृत्यु, धन

से हीन, कृपण, कामी, कुटिल ।

७ सभाबसति-बड़ा पंडित, अत्यन्त कृपण, अनेक गुणों से सम्पन्न, घन से सुखी । बुद्धि-

मान, घामिक हो । लग्न, ५ या १० घर में-अपनी स्त्री पुत्र, धन गंवाये ।

अस्थिर मन रहे ।

८ आगमन-प्रत्येक को दुःख दायक हो, कुटुम्बियो ओर सम्बन्धियों की हानि, स्वतः

कष्ट भोगे । व्याकुलता, शत्रु भय, घन का नाश, शठता और दुर्बलता,

बन्धुओं से विवाद, भृत्य वर्गो का नाशक ।

९ भोजन -भोजन बिना विकल, मंद वुद्धि; कार्यं में आलसी, स्त्री पुत्र के सुख से रहित

बहुत लालची, उपद्रवी, झगड़ाळू, कृपण, दुःखी, लग्न या १० घर में-पतित

भाग जावें चाहे वह भले कुटुम््र में हुआ हो । ७ या १० घर में-अपनी स्त्री

को अवश्य खोवे,.उसके सब कायं में बाधा हो ।

१० नृत्यलिप्सा-महारोग भय, नेत्र रोग, शत्र भय, घन और घर्म की हानि। लगन में-

कष्ट प्रद रोग से दुःख लंगड़ा या अंधा हो या पर पीड़क हो । परन्तु और

कोई घर में हो तो धनी, उन्नति शील बुद्धिमान हो, २ स्त्री ओर कई

सन्तान हो ।

११ कोतुक-स्थान हानि, पर स्त्री से प्रेम, परधन का लोभी । उन्नति प्राप्त करे और

पूर्ण हो परन्तु शूल रोग हो । ५, ७ या १० घर छोड़ कर अन्य घर में हो

तो स्त्री और सन्तान न होने से अनेक दुःख भोगे | यदि स्वस्थान या उच्च

में हो तो निश्चय पूर्वक प्रत्येक बातें लाभ जनक होंगी ।

१२ निद्रा -गुणो से युक्त, स्त्री पुत्र आदि सुख से युक्त, घोर, गौरव युक्त, महाधनवान,

गर्वीला । अन्यमत-दुःख ओर कष्ट से पुणं, गरीब, सन्तान हीन, विदेश

वासी, यदि W या ७ घर में हो तो बुद्धिमान पुत्र और अच्छी स्त्री हो, ५

या ९ में हो तो पवित्र क्षेत्र में निवास करे, ९ या १० घर में हो तो प्रसिद्ध

तीथं प्रयाग आदि में मृत्यु हो । २,१० या १२ स्थान में-गरीबी से कष्ट

भोगे, संसार भर में भ्रमण करे।

९. केतु की १२ अवस्थाओं का फल

१ शयन १, २, ३, या ६ राशि का-घनवान अन्य राशि में रोग से पीडित ।

२ उपवेशन-दाद खजुली हो, शत्रू , राजा, सर्प या चोर से भय ।

ग्रहों की अवस्थाएँ ओर चन्द्र क्रियां: ९. |

३ नेत्रपाणि-नेत्र रोग हो, दुष्टों से व शत्रू, सर्प और राजा से भय । 3

४ प्रकादान-घनघान्य पूर्ण, राजा से मान, यश लाभ, उत्साही, मल प्रकृति, Í T

या परदेश में जाने से सुख ।

५ गसनेच्छा पुत्र और सम्पत्ति युक्त, बड़ा पंडित, राजा से मान पाने वाला

गुणी, दानी, पुरुषों में श्रेष्ठ । 0002.

६ गमन -अनेक रोग, घन रहित, दंत रोग, पिशुन, परनिंदक, दुष्ट बुद्धि, अति कार्य,

धर्म हीन, क्रोधी ।

७ सभावसति-चड़ा गित, वाचाल, कृपण, बड़ा कामी, धूर्त मनुष्यों की विद्या में

प्रवीण ।

८ आगभन-पापियों का सरदार, बंधुजनों से विवाद करने वाला, अतिदुष्ट, शत्रु और रोग

से पीड़ित ।

९ भोजन -भूख से पीड़ित, अति दरिद्र, रोगी होकर भूमि में भ्रमण करता है ।

१० नृत्यलिप्सा-रोग से पीड़ित, आंख में फूछो वाला, किसी के बश में नहीं होने वाला,

बड़ा qd, और अनर्थ करने वाला ।

११ फौतुक-वेश्याओं से प्रेम, स्थान हानि, दुराचारी, दरिद्र, भ्रमण शील ।

२ निद्रा-घन धान्य से सुखी, अनेक गुणों के विनोद से अपना समय व्यतोत करने

वाला ।

चंद्र की विशेष १२ अवस्थाएँ

१ आत्मस्थानात्‌ प्रवासी = अपने स्थान से अनुपस्थिति ।

२ महितनृपहितो = हितैषी राजा का प्रिय ।

३ दासता प्राणहानिः = सेवा के कारण अपना जीवन खोने का भय |

४ भूपालस्व = पृथ्वी का शासक होने की योग्यता प्राप्त होना ।

५ स्ववंश उचित गुण = अपने कुटुम्ब के योग्य गुण और योग्यता होने की प्रसन्नता ।

६ रोगी 5 बीमार ।

७ आस्थानत्वम्‌ = सभा में नायक या नेता बनने की इच्छा !

८ भीति = भय ।

९ क्षुद्व्याधित्वं = क्षुघा की पीड़ा से दुःख।

` १० युवतिपरिणयो = युवती स्त्री से विवाह ।

११ रभ्यणग्यानुषकितः = रमणक शय्या प्राप्त करने को इच्छा । -

१२ मिष्टाशित्वं = स्वादिष्ट भोजन करना 1

अवस्था.निकालने की रीति

जन्म नक्षत्र के भुक्त घड़ी पल के पल बनाकर ३०० का भाग देना-छन्धि

चंद्र कौ अवस्था होगी । यदि शेष बचता है तो उसके आगे को अवस्था जानना

१०० 1 ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

घ० प०

उवाहरण--जन्म नक्षत्र घनिष्ठा भुक्त ३७-३ = २२२३. पल

पल

३००) २२२३ (७गत यहां लब्धि ७ होने से ७ अवस्था गत हो गई दोष १२३ बचा

२१०० वह ८ वीं अवस्था का दै इस कारण आगे ८ वीं अवस्था

प्र

'ंद्र क्रिया जानना

चंद्र क्रिया ६० हैं जो नीचे दी हैं ।

१ स्थान भ्रष्ट

२ तपस्वी ( तपस्या करने वाला )

३ परयुवतीरत

४ दूत कृत

५ हस्ति मुख आरूढ

६ सिंहासनस्थ

७ नरपति ( मनुष्यों का नेता )

< अरिहंता (शत्र नाशक )

९ दंडनेता ( जज )

१० गुणी

११ निष्प्राण (मृत या बिलकुल थका)

` १२ छिन्न मूर्धा (मस्तक कटना)

१३ क्षतकरचरण (हाथ पैर जख्मी)

१४ बंघनस्थ (बन्दी)

१५ विनष्ट = (गुमा हुआ या नष्ट)

१६ राजा

१७ वेदानघीते (वेद अध्ययन)

१८ स्वपित (निद्रित)

१९ सुचरितः संस्मृतो (अच्छे चरित्र

का) स्मरण

२० घर्मकर्ता (घमं करने वाला)

२१ सदूवंशीयो (अच्छे वंश में उत्पन्न)

२२ निघिसंगताः (निधि संग लेकर आया)

२३ श्रुतकुलो (प्रसिद्ध कुल का)

''भीति.' आई जिसका फल अवस्थानुसार :अर्थात्‌ भय है ।

२४ व्यापारपरः (प्रदर्शन में चतुर)

२५ चत्रुहा (शत्रु नाशक)

२६ रोगी

२७ शत्र जितः (शत्र, द्वारा पराजित)

२८ स्वदेश चलनो (स्वदेश को प्रस्थान)

२९ भृत्य (नौकर)

३० विनष्टार्थकः (थोड़ा माल है वह

भी) नष्ट कर दिया

३१ आस्थानी (सभा में सदैव उपस्थित)

३२ सुमंत्रक (अच्छा सलाहकार)

३३ परमहीभर्ता (दूसरे क्री भूमि का

संरक्षक)

३४ सभार्या (अपनी स्त्री के साथ रहना)

३५ गजत्रस्तः (हाथी से भयभीत)

३६ संयुग भीतिमान (झगड़े में डरपोक)

३७ अतिभयो (वहुघा अधिक डरपोक)

३८ लीन (छिपे तौर पर रहना)

३९ अन्न दाता (दूसरों को भोजन देने

वाला)

४० अग्तिगः (अग्नि में या अग्निसमीप)

४१ क्षुद्बाघासहित ( भूख से व्याकुल )

४२ अन्नमत्ति (पके चावल खाता है)

४३ विचरना (घुमना)

४४ माँस अशनो (मांस भोजन)

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया: १०१

५३ समुहुद (मित्रों से घिरा)

५४ योगो (भक्त या महात्मा)

५५ भार्यान्वित (स्त्री के साथ)

५६ मिष्टाशी (स्वादिष्ट भोजन करता है)

५७ पयः पिबन्‌ (दूध पीये)

५८ सुकृतकृत्‌. (अच्छे कार्य करे)

५९ स्वस्थ (आत्म निर्भर या विश्वस्त)

६० सुखी (सुखी रहे)

४५ अस्त्रक्षतः (हथियार से घाव)

४६ सोद्वाहो (विवाह में)

४७ धुत कन्दुको (हाथ में गेंद लिये)

४८ विहरति दूतैः (sar खेलने में मग्न) ४९ नृपो (राजा)

५० दु:खिता (दुःखी)

५१ शय्यास्थो (शैया में है)

५२ रिपु सेवित (शत्रु द्वारा मान्य)

चंद्रक्रिया जानने की रीति जन्म समय चंद्र नक्षत्र जितना गत हुआ हो उस भुक्त नक्षत्र घड़ीपल के पल बमा कर ६० का भाग दो जो लब्ध प्राप्त हो वही चंद्र क्रिया होगी । यदि कुछ शेष बचे तो आगे वाली संख्या लेना अर्थात लब्धि में १ जोड़ कर लेना ।

उदाहरण--जन्म धनिष्ठा नक्षत्र ३७१ के पल २२२३ हुए

६०) २२२३ (३७ लब्धि यहां ३७ गत होकर दोष बचने के कारण आगे का ३८

१८० गत वां “लीन” आया

४२३

४२० इस का फल क्रिया के नाम के अनुसार विचारना । इ शेष - इसका विचार जन्म, प्ररन महतं आदि में उपयोगी है ।

चंद्र वेला निकालना :

चंद्र वेला ३६ हैं जिनके नाम आगे दिये a—

१ ) मृदुर्घामयो ( मस्तक पीड़ा)

२ ) मुदितता (आनन्दित)

३ ) यजन (यज्ञ आदि करना)

४ ) सुखस्थो (सुख पूर्वक रहना)

५ ) नेत्रामयः ( नेत्र रोग)

६ ) सुखितता (सुखी होना)

७ ) वनिताविहारः (युवतो के

साथ मनोरंजन)

( ८ ) उग्र ज्वर (तीव्र ज्वर)

( ९ ) कनक भूषण (सुवणं के आ-

( (

( ( ( ( (

मूषण) i ( १० ) अभुमोक्षः (अथु पतन) ( ११ ) क्वेलाशन (विष भक्षण)

( १२ ) निधुवन (स्त्री भोग)

( १३ ) जठरस्य रोग (उदर रोग से

पीड़ा)

( १४) क्रीड़ा जले (जळ में बिहार)

चित्रविलेखने (आनन्द मनाना

और चित्रकारो)

( १५ ) क्रोषश्च-क्रोघ

( १६) नृत्त करणं (नाचना) .

( १७ ) घृतयुक्ति (घी सहित भोजन

करना)

( १८ ) निद्रे (सोना)

( १९ ) दानक्रिया (दान देना)

( २० ) दशनए्क्‌ (दन्त पीड़ा)

१०२: ज्योतिष-शिक्षा, qata फलित खण्ड

( २१ ) कलह (झगडा) ( ३६ ) प्रहषं ( जीने पर हर्ष )

( २२ ) प्रयाण (यात्रा को प्रस्थान) ( २३) उन्मत्तता ( पागल या नशे में

( २९ ) शास्त्रलाभं ( शास्त्र आदि उन्मत्त ;

का लाभ होना ) (२४ ) सलिलाप्लवनं (जल में तैरना)

( ३० ) स्वैरं ( उद्ण्डता आदि ) a, र ५ ) विरोध ( वेर

( ३१ ) गोष्ठो ( वार्तालाप ) BU (र) ( ३२) योधने ( युद्ध करना ) ( २६) स्वेच्छा ( अपनो इच्छानुसार

( ३३ ) पुण्य कमं (पुण्य कमं करना ) कि 22028 )

( ३४ ) पापाचार ( पाप कर्म करना ) | (२७) स्तानं (स्नान करना )

( ३५ ) क्रूरकर्मा ( क्रूर कर्म करना ) ( २८ ) क्षुङ्धयं ( क्षुघा का भय )

चन्द्र वेला जानने की रीति

जन्म नक्षत्र की भुक्त घडीपल के पल बना कर १०० का भाग दो तो लन्च चन्द्र

वेला होगी, यदि शेष बचे तो आगे का लेना ।

उदाहरण- जन्म नक्षत्र घनिष्ठा क भुक्त घडी N: 5 = २२२३ पल

पल

१००) २२२३ ( २२ लब्धि ` यहाँ लब्चि २२. गत हो गई शेष बचा है तो

` २०० गत १ जोड़ कर आगे का २३ वां लिया । २३ =

२२३ उन्मत्तता वेला प्राप्त हुई ।

२०० ° यहाँ बताये चन्द्र अवस्था, क्रिया, वेला

२३: का विचार जन्म, प्रश्‍न, मुहुर्त आदि में कर

उनका फल विचारना । इनमें नाम सदृश फल होना है 1

अध्याय ६

ग्रह कारक

प्राणी मात्र का सुख दुःख जिन ग्रहों के प्रभावपर निभंर है उनके कायं में कर्ता ग्रह

को कारक कहते हैं ।

प्रत्येक ग्रह का कायं भिन्न है और ये घटनाओं पर अपना प्रभाव डालते हैं । इस

कारण बताया गया है कि कौन ग्रह किस कार्य का कारक है । अर्थात्‌ किस ग्रह से क्या

बातें विचारनी चाहिये यह आगे दिया है उन बातों के कारक या अधिकारी प्रभाव कर्ता

वे ग्रह हैं जो आगे बताये हैं ।

ग्रहों कीईअवस्थाए और चन्द्र क्रिया : १०३

ग्रह के कारक

१ सूर्य---पिता का सुख, शरीर का सुख, पूर्व पुन्याई, मन की रुचि, राज्य कार्य, बड़े

भाई का सुख, वैद्यक विद्या, समीप या प्रयाण ( यात्रा ), श्रीमान और अघि-

कारी लोगो से मित्रता, राज विद्या, राज से मान सम्मान, श्रेष्ठ अधिकारी

सत्ताधारी योग, राज्याधिकारी वर्ग, लोक मान्यता, प्रसिद्ध नेता, राष्ट के

कर्णधार, बड़ी संस्थाओं के कर्णघार, जागीरदार, दीवान आदि व राज सेवा,

उपजीविका वोरता, योग्यता, तत्त्व ज्ञान, मन की शुद्धि, आत्मा, फजूल खर्ची,

स्वर्ण, अश्व, पद्मराग मणि; सिंहासन, रक्त तात्र, ब्रण, भेषज, शौर्य, नेत्र चिकित्सा,

प्रताप, बड़प्पन, धैर्य, सामर्थ्य, ( शक्ति ) साहस, युद्ध में जीत, शिव ईश्वर

के सम्बन्ध का कोई कार्य, जंगल वा पहाड़ो स्थान का जाना, होम यज्ञ कायं में

प्रवृत्त होना, देव स्थान, स्वभाव, निरोगता, लक्ष्मी का विचार, ज्ञान का उदय,

भाग्य, राजनैतिक शक्ति, पिता औरं पिता की ओर के सम्बन्धी, क्षत्रिय, रक्‍त

वस्त्र, रक्त चन्दन, मू गा, माणिक्य, गोधूम, गुड, केशर, कमल, नवीन गुड,

सवत्सा गौ आदि का ।

२ चन्द्र--मातृ सुख, सौन्दर्य सुख, यश प्राप्ति, ज्योतिष विद्या की रुचि, दूर का प्रयास,

जल प्रयास, मन बुद्धि, स्वास्थ्य, राज ऐश्‍वर्य, सम्पत्ति, सुगन्धित वस्तुओं का

शौक, वाइन: सुख, द्रव्य सञ्चय, धंधे में उन्नति, प्रजा पक्ष, जनता, सामान्य

लोग, जनता की वृत्ति, प्रजा पक्षीय नेताओ के मन को स्थिति तथा स्त्री मन,

आनन्द, चाँदी, चेहरा, कीति, दूध, यात्रा, वस्त्र, जल, कृषि, घन, गौ, शस्य,

लज्जा, मणि, शङ्क, विनय, पुष्प रस वर्ग, घातृ, दीप्ति, सन्तोष, समुद्र स्नान,

सफेद चादर, छत्र, सुव्यजन ( पंखा ) कोमलता, मुक्ता प्राप्ति, कांसा, सख

भोजन, प्रसन्नता, राजा, दया, हर्ष, हृदय की चेतना शक्ति, बुद्धि, राज कृपा,

ब्राह्मण, श्वेत वस्त्र, श्वेत चन्दन, श्वेत चावल, श्वेत पुष्प, घृत, दही, कपूर,

बैल, गेहूँ, लवण, वंश पात्र आदि का कारक है ।

३ मङ्गल--साहस, लघुआता सुख, पराक्रम, घैयं, अभिमान, शत्र कीति, बुद्धि के

आचार कार्य, युद्ध, नेतृत्व, धनुबिद्या, रोग घातु, विद्या, रक्त विकार, पास्त्रः

क्रिया ( आपरेशन ), युद्ध, लड़ाई; अग्नि, प्रलय अपनी सामर्थ्यं का घमंड

सेनापति, सेना, दुर्ग, क्रूरता, विजय, भूमि, भाई, क्रोध, पित्तविकार

ऋण, सोना, कृषि, शिव भक्ति, नुकताचीनो करना, काम, प्रलाप, उत्साह,

परस्त्रीरत, पाप, घाव, हाकिमो, युवराजत्व, उषण, बाहुबल, ताम्र, मूंगा,

माणिक्य, दण्ड नोति,. गृह, विष, कीट, वंश, खेर, गन्धक सिंह, व्याघ्र,

बल, विद्वेष, पकाने के बर्तन, अग्नि, अस्त्र, चौर, श मिथ्या-भाषण, .

मानसिक विचारों को उच्चता, पुत्र, खज्ग, पर्सा, कुल्हाड़ा, तोप, धनुष, बाण,

` —— SCRE -

१०४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

आदि, गम्भीरता, कलंक, स्वातंत्र्य, आचरण के गुण, रक्त के सम्बन्ध के

बन्धु, बहिन ( पितृ वंश के ), उद्योग, शाला, पुत्र, मसूर, गोधूम, केसर,

कस्तूरी, रक्त वस्त्र, रक्त पुष्प, रक्त चन्दन, रक्त वृष, गुड़ ।

४ बुघ--युवराज, कौमार, बंधु सौख्य, बुद्धि, विद्या ववतृत्व शक्ति, प्रवीणता, मित्र सुख,

मनः शान्ति, सम्पत्ति, स्वतन्त्र धन्या, वाणी, लेखन कला, वेदान्त विषय की

रुचि, कला कौशल, ज्योतिष विद्या की रुचि तथा ज्ञान, गणित शास्त्र,

विद्वत्ता, विवेक, लेखक, ग्रन्थकार, वक्ता, सम्पादक, मुद्रक, प्रकाशक पर￾राष्ट्रीय मन्त्रो, कारभारी, व्यापारी, सराफी का धन्या, ज्योतिषी, वकीली

आदि घन्धा, तत्व ज्ञान, विष्णु की भक्ति, व्यापार, चाक्य चातुर्य, उपासना

आदि में पटुता, घर्म, चाची, मामा, मौसी, मामी, बान्धव, सुहद्‌, बहन को

सन्तान, युवराज सन्तान, शान्ति, नर्मता, हास्य, नृत्य, वैद्य, भय, दासी,

मुद्ग मैथुन, तरुण, शस्य, यजन, कोलाहल, माध्यस्थ्य, चित्र क्रीड़ा, सौभाग्य,

शुक्र, पिजरा, ताम्बूल, पलास, कांसा, सुवर्ण, सीप, गजदन्त, मूंगा, घृत,

पन्ना, पुष्प, रत्न, कर्पूर, फल, शस्त्र, षटरस, सत्य भाषण, क्रीडास्थल ।

५ गुरु सन्तति, सम्पत्ति, ज्ञान, अधिकार, ऐक्वयं, राजसन्मान, लोक संग्रह, वेदान्त

ज्ञान, घन्धा, उपजीविका, मल्ल विद्या, तीब्र बुद्धि, ग्रहण शक्ति, धर्माभिमानी,

ग्रन्थकर्ता, स्थिर वृत्ति, राज कारण, परोपकारी, घामिकक्नुत्य, वाहन आदि

सुख, धर्म गुरु, संस्कृत विद्या, व्याकरण, शास्त्र, अधिकारी, न्यायाधीश,

वकील, श्रीमान, व्यापारी, जागीरदार, शान्तिप्रिय, संस्थापक आदि ।

स्वास्थ्य, घन, कोमल वाणी, पुत्र, घरेलू आनन्द, मन्त्रीपना, सचिव, उचित

व्यय आत्मज्ञान, स्वतन्त्रता, दान, हृदय, कविता, वेद वेदान्त, ब्राह्मण्य,

भवित, श्रद्धा, मेधा, प्रणय, सदाचार, वैष्णव, गौरव, प्रज्ञता, प्रवचन,

पाण्डित्य, विद्या, सुख, आचायं, माहात्म्य, सदगति, देव ब्राह्मण भक्ति, बलि,

तप, जितेन्द्रिय, कोष स्थल, पति का सुख, सन्मान, धन, जीवन का उपाय,

कमं योग, सिंहासन, शारीरिक विकास, पितामह, देव ब्राह्मण, गृह, पीत वस्त्र,

पीत घान्य, पीत पुरुष, पीत फल, सुवणे, पुखराज, मधु, हल्दो, लवण,

गज, छत्र, सत्कर्म, अध्ययन, मित्र, कातंस्वर, शिष्टत्व, जथपत्र, कीति, श्रुति

शास्त्र और स्मृति ज्ञान, सर्व उन्नति, वाहन, अनेक रंग के वस्त्र ।

६ शुक्त--स्त्री, व प्रापञ्चिक सुख, कवित्व, गायन, वादन कला में निपुण, प्राचीन

संस्कृति का अभिमानी, सौन्दर्य के प्रति प्रीति, विषय सुख इन्द्रिय आनन्द,

सुगन्ध पदार्थ का प्रेमी, कला-कीशलप्रिय, द्रव्य लाभ, स्वतन्त्र धन्या,

राजाश्रय, राजकायंभार का ज्ञान, अलङ्कार, यान्त्रिक विद्या, अष्ट सिद्धि,

साहित्य ज्ञान, व्यापार, होरा, मोतो, कपास का व्यापारी, शेयर, ऐश

आरामी, देश की सम्पत्ति, विवाह, कोति, सुन्दरता, ललित कला, गाना

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ग्रह कारक : १०५

नाचना, कविता आदि, आनन्द, बुद्धि, तमाशा, व्यभिचार, कुटुम्ब, नेत्र, अकाश, शयन गृह, वाहन, देवी की भक्ति, हाथो घोडे आदि वाहन सुख, मन्त्रित्व, सहनशील, स्त्रो संभोग, स्वतः के द्रव्य के सम्बन्ध का ज्ञान, काम- क्रीडा, मन्दिर, उन्नति, विलास, सुन्दर भाषण, उत्सव, दासत्व, रस, अद्भुत (रस), सुन्दरता, राजा, राजपुरुष, वशीकरण, गरुड़ विद्या; इन्द्रजाल, चातुरी, भाग्य, आचरण, सुख, गौरव, विभव, श्वेत तण्डुल, इवेत चन्दन, चित्र वस्त्र, श्वेत पुष्प, घृत, दघि, सुवणं, चाँदो, हीर', सुगन्ध द्रव्य, गौ, भूमि, कौमार, यौवन, अवस्था और रस, सृष्टि, सोभाग्य, सुभोजन, शैया

सुख, विनोद पुष्प गन्ध, मन्द, भोगस्थान, वेश्या रति, स्त्री जन के शरीर,

वेत वस्त्र ।

७ शनि--आयुष्य, दुष्ट बुद्धि, लोभ, मोह, घात कर्म, रोगी, सरकारो आरोप, राज दण्ड,

कंद, उद्योग हानि, दासत्व, नीच विद्या, मजदूर वगग, खेती, खनिज, नौकर

वर्ग, पराधीनता, विश्‍वासघात, कामगार, प्रेस का स्वामी, अशिक्षित, कायदा-

कानून में प्रवीण, नपुसकता, मिथ्यापन, पाप, नरक, शोक, अंग्रेजी शिक्षा,

जुआ खेलना, मदिरापान, मृत्यु दण्ड, जीवन, पेट, लिवर, वातव्याधि, कष्ट,

क्लेश, पराभव, भय, पतित होना, दुःख अपमान, रोग, अपवाद, कुलीपना,

अशौच, निन्दा, आपत्ति, बुढापा, स्थिरता, नीच जन आश्रय, तन्द्रा, ऋण,

महिष, लोहा, नोछ वस्त्र कम्बळ, गर्देभ, पादुका, दलिया, कृष्ण अन्न,

माषान्न, तिल तेल, कृष्ण वस्त्र, कुल्यी, कृष्णघेनु, कृष्णपुष्प, जूता, कस्तुरी,

गज, नीलम, - आयुर्दाय, जीवन का उपाय, सवं राज्य, आयुष, शूद्र, भूत्य,

(सेवक) विघ्न, शल्य, शूल रोग, बात, कृषि साधन, मृत्यु का कारण, ठगी,

मोह, लोभ, पर पीडा, निष्ठुरता, दरिद्रता, दुर्दशा और पुत्र ।

८ राहु-- आजा का सुख, गारुडी विद्या, आकस्मिक घटना, भूत बाधा, अरुचि, राज

छत्र, सन्मान, अंग्रेजी शिक्षा, बगीचा, राज्य, नाना, म्लेच्छ प्रताप, धूप,

इमशान, तस्कर भेद, विधवा, व्यौहार, शिला, बाल्मीक, चमं, ज्वर, अप￾स्मार, विशूचिका, संकोच, देशाटन, बैराग्य, बलात्कार, भ्रष्टता, घोर युद्ध,

पितामहे, यश, प्रतिष्ठा, छत्र का कारण, अन्धेरापन, विष, सपं, यात्राकाल,

द्यूत, माषान्न, सप्त धान्य, गोपद, नील वस्त्र, खड्ग, तिल तैछ, लोह,

कस्बल, घोडा, कृष्ण पुष्प, ताम्र पात्र, महारण्य, महोत्पात, सुख कष्ट

आदि ।

९ केतु-- तन्त्र, मन्त्र, गुप्त विद्या, आजी का सुख, एक तन्त्री विचार, मन्त्र सिद्धि के

प्रयत्न, युक्ति, गंगा स्नान, मन्त्र शास्त्र, आत्मज्ञान, विष, ज्वर, शंका,

तत्वज्ञान की ओर मन का झुकाव, वैराग्य, तीर्थाटन, भिक्षाटन, क्षोभ,

१०६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

कलह, विप्लव, शिव की भक्ति, गुहा प्रवेश, चिताएँ; स्त्री, माता पिता

` सास स्वसुर, मातामह ( नाना ) मातामही, ब्रण, चमं रोग, शूरु, क्षुघा,

पीड़ा, कम्बल, कस्तूरी, वैड्यं, शस्त्र, माषान्न, कृष्ण पुष्प, तिल तैल, रक्त,

सुवणं, लोहा, सप्त धान्य ।

अन्य प्रकार के कारक

(१) ग्रह एक दूसरे.के सम्बन्ध से जन्म समय में कारक होते है । जैसे-गुरु जन्म में

सूर्य से नवम हो तो यह कारक होता है । शनि जन्म में चन्द्र से ११ वां होतो

यह कारक होता है इत्यादि प्रकार से । शनि मंगल का कारक तब होता है जब

वह जन्म समय जहां है वहाँ से ११ वें स्थान में हो इत्यादि । एक दूसरे ग्रह

के शुभ मम्बन्ध से कारक कहलाते हैं ।

(२) अन्य प्रकार-ग्रह जन्म समय उच्च में, मूल त्रिकोण में हो और केन्द्र में हो तो वह

दूसरे ग्रह का कारक होता हैं। जो जन्म से दूसरे केन्द्र में होकर उच्च मूल

त्रिकोण या स्वगृही हा तो इसी प्रकार दूसरे कारक ग्रह होते है । अर्थात्‌ ग्रह

की लाभ जनक स्थिति जब हो तब उपरोक्त बताये । स्वगृही, उच्च या मूल

त्रिकोण में ग्रह हो तो ये सब आपस में कारक होते हैं । इनमें कर्म स्थान स्थित

ऐसा ग्रह विशेष कारक होता है । जैसे लग्न में कर्क राशि में चन्द्र हो, मंगल,

शनि, सूर्य तथा गुरु अपने उच्च के हों ये परस्पर कारक कहलायेंगे । लग्न में

स्थित ग्रह का चतुर्थं दशम स्थान में स्थित ग्रह पूणं कारक होता है ।

कारक विचार पर कुछ उदाहरण

अधिकार के सम्बन्त्र में विचार करना है तो {ण्डली में रवि की स्थिति पर पहिले

बिचार करना क्योंकि इसकी शुभाशुभ स्थिति पर दशमेश और लग्नेश का फल

निभर है ।

स्त्री और प्रापडिचक सुख का निर्णय करते समय केवल सप्तम के ग्रह तथा सप्तमेश

की स्थिति से ही नहीं बिचारना किन्तु शुक्र जो इस सुख का दाता है इससे भी प्रथम

बिचार करना । विद्या सन्तति सम्पत्ति का निर्णय करते समय केवल लग्नेश, धनेश,

पञ्चमेश, नवमेश, और लामेश की ही स्थिति नही विचारना किन्तु गुर की शुभाशुभ

स्थिति पर विचार कर इन स्थानों पर उनको दृष्टि का विचार अवश्य करना चाहिये

तब पूर्ण फल प्रगट होगा ।

आथिक सुख का विचार करते समय धनेश और छामेश के साथ शुक्र चन्द्र का भी

बिचार अवश्य करना चाहिये ।

दुःख, संकट, रोग, आयुष्य आदि का शनि कारक है । इन विषयों का विचार

करते समय शनि के उच्च नीच राशि और अंश शुभ ग्रहों को दृष्टि और युति का भी

विचार करना चाहिये तभी ठीक फल मिलेगा । 1).

ग्रह कारक : १०७

आशय यह है कि किसी भी बात के विचारने में केवल ST भाव के ग्रह या उस भावेश के हो विचार करने से काम न चलेगा किन्तु उस विपय के कारक ग्रह का भी विचार कर कारक ग्रह का शुभाशुभत्व, ग्रहों की युति और दृष्टि एवं स्थिति आदि पर भी विचार करना आवश्यक है। इस कारण किसी फल के निर्णय करते समय उसके

कारक ग्रह की स्थिति आदि पर पूरा विचार करना आवश्यक है तभी ठीक फल

निकलता है 1

सुख दुःख के कारक ग्रह पर विचार

मन में सुख की इच्छा स्वाभाविक होती है परन्तु प्रत्येक प्रकार के सुख की परिभाषा भिन्न है । यहाँ वताया है कि किस ग्रह से किस प्रकार के सुख का विचार करना ।

गुरु शुक्र से--धन की स्थिति एवं द्रव्य लाभ का विचार ।

शुक्र से--स्त्री व प्रापञ्चिक सुख ।

रवि चन्द्र से--शारीरिक एवं मानसिक सुख ।

गुरु से- बुद्धि विद्या एवं सन्तति सुख ।

रवि गुरु शनि से--नौकरी अधिकार राज सम्मान ।

शुक्र बुध से--व्यौपारं या लेनदेन के धस्थे साहुकारी आदि ।

मंगल से--साहस, पराक्रम या यश का विचार करना ।

सुख का विचार करने के प्रथम कुंडली में इन ग्रहों का शुभाशुभ स्थिति आदि का

विचार करना चाहिये । इनकी शुभाशुभ स्थिति के अनुसार प्रत्येक को हानि या लाम

होना निश्चित है । इन ग्रहों का फल कुण्डली में इन ग्रहों के उच्च, नोच राशि, अंश,

गुण; दृष्टि आदि के अनुसार मिलता हे । इस कारक फल का विचार करते समय कारक

का अवश्य विचार, करना ।

भावेश और कारक में अन्तर है'

भावेश और किसी विषय का कारक भिन्न है । जैसे चौथा भाव कृषि माता भूमि

शिक्षा वाहन और पशु का है तो उस भाव के स्वामी से विचारने के अतिरिक्त उस भाव

के कारक से भी फल विचारना । इन भिन्न २ विषयों के कारक ग्रह पृथक्‌ २ ë परन्तु

उस भाव का भावेश एक ही हूँ । जिस विषय को विचारना हैँ उसका कारक कोन ग्रह

है उससे फल निकालना ।

जैसे पाँचवां घर सन्तान और मन्त्रणा शक्ति का है । मानो मेष लग्न है तो षञ्च￾मेश सूर्य होगा जो सिंह का स्वामी है । परन्तु पुत्र कारक गुरु है यें दोनों अर्थात सूयं

और गुरु शक्तिशालो हों ता अच्छी और उन्नति शोल सन्तान होतो. हैं । परन्तु मन्त्रणा

शक्ति का कारक शुक्र है इससे शुक्र से भो विचार करने से मन्त्रणा शवित का फळ

प्रकट होगा ।