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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

१०७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

पवित्रतापूर्वक भोजन बनाया जाय; भोजनको भगवान्के अर्पण किया जाय और भगवान्का चिन्तन तथा उनके नामका जप करते हुए प्रसाद-बुद्धिसे भोजन ग्रहण किया जाय—ऐसा भोजन सात्त्विक होता है।

स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यताको लेकर सत्य-असत्यका कोई विचार न करते हुए पैसे कमाये जायें; स्वाद, शरीरकी पुष्टि, भोग भोगनेकी सामर्थ्य बढ़ाने आदिका उद्देश्य रखकर भोजनके पदार्थ खरीदे जायें; जिह्वाको स्वादिष्ट लेंगे और दीखनेमें भी सुन्दर दीखें—इस दृष्टिसे, रीतिसे उनको बनाया जाय; और आसक्तिपूर्वक खाया जाय—ऐसा भोजन राजस होता है।

झूठ-कपट, चोरी, डकैती, धोखेबाजी आदि किसी तरहसे पैसे कमाये जायें; अशुद्धि-शुद्धिका कुछ भी विचार न करके मांस, अंडे आदि पदार्थ खरीदे जायें; विधि-विधानका कोई खयाल न करके भोजन बनाया जाय और बिना हाथ-पैर धोये एवं चप्पल-जूती पहनकर ही अशुद्ध वायुमण्डलमें उसे खाया जाय—ऐसा भोजन तामस होता है।

परन्तु भगवान्ने यहाँ केवल सात्त्विक, राजस और तामस पुरुषोंको प्रिय लगनेवाले खाद्य पदार्थोंका वर्णन किया है, जिससे उनकी रुचिकी पहचान हो जाय।

(४) इसके सिवाय गीतामें जहाँ-जहाँ आहारकी बात आयी है, वहाँ-वहाँ आहारीका ही वर्णन हुआ है; जैसे—‘नियताहाराः’ (४।३०) पदमें नियमित आहार करनेवालेका, ‘नात्यश्नतस्तु’ और ‘युक्ताहारविहारस्य’ (६।१६-१७) पदोंमें अधिक खानेवाले और नियत खानेवालोंका; ‘यदृश्नासि’ (९।२७) पदमें भोजनके पदार्थको भगवान्के अर्पण करनेवालेका, और ‘लच्छाशी’ (१८।५२) पदमें अल्प भोजन करनेवालोंका वर्णन हुआ है।

इसी प्रकार इस अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘यज्ञस्तपस्तथा दानम्’ पदोंमें आया ‘तथा’ (वैसे ही) पद यह कह रहा है कि जो मनुष्य यज्ञ, तप, दान आदि कार्य करते हैं, वे भी अपनी-अपनी (सात्त्विक, राजस अथवा तामस) रुचिके अनुसार ही कार्य करते हैं। आगे ग्यारहवेंसे बाईसवें श्लोकतकका जो प्रकरण है, उसमें भी यज्ञ, तप और दान करनेवालोंके स्वभावका ही वर्णन हुआ है।

भोजनके लिये आवश्यक विचार

उपनिषदोंमें आता है कि जैसा अन्न होता है, वैसा ही मन बनाता है—‘अन्नमयं हि सोम्य मनः।’ (छान्दोग्य०

६।५।४) अर्थात् अन्नका असर मनपर पड़ता है। अन्नके सूक्ष्म सारभागसे मन (अन्तःकरण) बनता है, दूसरे नम्बरके भागसे वीर्य, तीसरे नम्बरके भागसे रक्त आदि और चौथे नम्बरके स्थूल भागसे मल बनता है, जो कि बाहर निकल जाता है। अतः मनको शुद्ध बनानेके लिये भोजन शुद्ध, पवित्र होना चाहिये। भोजनकी शुद्धिसे मन-(अन्तःकरण-)की शुद्धि होती है—‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः’ (छान्दोग्य० २।२६।२)। जहाँ भोजन करते हैं, वहाँका स्थान, वायुमण्डल, दृश्य तथा जिसपर बैठकर भोजन करते हैं, वह आसन भी शुद्ध, पवित्र होना चाहिये। कारण कि भोजन करते समय प्राण जब अन्न ग्रहण करते हैं, तब वे शरीरके सभी रोमकूपोंसे आसपासके परमाणुओंको भी खींचते—ग्रहण करते हैं। अतः वहाँका स्थान, वायुमण्डल आदि जैसे होंगे, प्राण वैसे ही परमाणु खींचेंगे और उन्हींके अनुसार मन बनेगा। भोजन बनानेवालेके भाव, विचार भी शुद्ध सात्त्विक हों।

भोजनके पहले दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख—ये पाँचों शुद्ध, पवित्र जलसे धो ले। फिर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके शुद्ध आसनपर बैठकर भोजनकी सब चीजोंको ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥’ (गीता ९।२६)—यह श्लोक पढ़कर भगवान्के अर्पण कर दे। अर्पणके बाद दायें हाथमें जल लेकर ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥’ (गीता ४।२४)—यह श्लोक पढ़कर आचमन करे और भोजनका पहला ग्रास भगवान्का नाम लेकर ही मुखमें डाले। प्रत्येक ग्रासको चबाते समय ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’

—इस मन्त्रको मनसे दो बार पढ़ते हुए या अपने इष्टका नाम लेते हुए ग्रासको चबाये और निगले। इस मन्त्रमें कुल सोलह नाम हैं और दो बार मन्त्र पढ़नेसे बत्तीस नाम हो जाते हैं। हमारे मुखमें भी बत्तीस ही दाँत हैं। अतः (मन्त्रके प्रत्येक नामके साथ) बत्तीस बार चबानेसे वह भोजन सुपाच्य और आरोग्यदायक होता है एवं थोड़े अन्नेसे ही तृप्त हो जाती है तथा उसका रस भी अच्छा बनता है और इसके साथ ही भोजन भी भजन बन जाता है।

भोजन करते समय ग्रास-ग्रासमें भगवन्नाम-जप करते रहनेसे अन्नदोष भी दूर हो जाता है*।

  • कवले कवले कुर्वन् रामनामानुकीर्तनम्। यः कश्चित् पुरुषोऽश्नाति सोऽन्नदोषैर्न लिप्यते॥

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७५

जो लोग ईर्ष्या, भय और क्रोधसे युक्त हैं तथा लोभी हैं, और रोग तथा दीनतासे पीड़ित और द्वेषयुक्त हैं, वे जिस भोजनको करते हैं, वह अच्छी तरह पचता नहीं अर्थात् उससे अजीर्ण हो जाता है*। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह भोजन करते समय मनको शान्त तथा प्रसन्न रखे। मनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोषोंकी वृत्तियोंको न आने दे। यदि कभी आ जायँ तो उस समय भोजन न करे; क्योंकि वृत्तियोंका असर भोजनपर पड़ता है और उसीके अनुसार अन्तःकरण बनता है। ऐसा भी सुननेमें आया है कि फौजी लोग जब गायको दुहते हैं, तब दुहनेसे पहले बछड़ा छोड़ते हैं और उस बछड़ेके पीछे कुत्ता छोड़ते हैं। अपने बछड़ेके पीछे कुत्तेको देखकर जब गाय गुस्सेमें आ जाती है, तब बछड़ेको लाकर बाँध देते हैं और फिर गायको दुहते हैं। वह दूध फौजियोंको पिलाते हैं, जिससे वे लोग खूँखार बनते हैं।

ऐसे ही दूधका भी असर प्राणियोंपर पड़ता है। एक बार किसीने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध और कुछ घोड़ोंको गायका दूध पिलाकर उन्हें तैयार किया। एक दिन सभी घोड़े कहीं जा रहे थे। रास्तेमें नदीका जल था। भैंसका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलमें बैठ गये और गायका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलको पार कर गये। इसी प्रकार बैल और भैंसेका परस्पर युद्ध कराया जाय, तो भैंसा बैलको मार देगा; परन्तु यदि दोनोंको गाड़ीमें जोता जाय, तो भैंसा धूपमें जीभ निकाल देगा, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहेगा। कारण कि भैंसके दूधमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि गायके दूधमें सात्त्विक बल होता है।

जैसे प्राणियोंकी वृत्तियोंका पदार्थोंपर असर पड़ता है, ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिका भी असर पड़ता है। बुरे व्यक्तिकी अथवा भूखे कुत्तेकी दृष्टि भोजनपर पड़ जाती है, तो वह भोजन अपवित्र हो जाता है। अब वह भोजन पवित्र कैसे हो? भोजनपर उसकी दृष्टि पड़ जाय, तो उसे देखकर मनमें प्रसन्न हो जाना चाहिये कि भगवान् पथारे हैं! अतः उसको सबसे पहले थोड़ा अन्न देकर भोजन करा दे। उसको देनेके बाद बचे हुए शुद्ध अन्नको स्वयं

ग्रहण करे, तो दृष्टिदोष मिट जानेसे वह अन्न पवित्र हो जाता है।

दूसरी बात, लोग बछड़ेको पेटभर दूध न पिलाकर सारा दूध स्वयं दुह लेते हैं। वह दूध पवित्र नहीं होता; क्योंकि उसमें बछड़ेका हक आ जाता है। बछड़ेको पेटभर दूध पिला दे; और इसके बाद जो दूध निकले, वह चाहे पावभर ही क्यों न हो, बहुत पवित्र होता है।

भोजन करनेवाले और करानेवालेके भावका भी भोजनपर असर पड़ता है; जैसे—(१) भोजन करनेवालेकी अपेक्षा भोजन करानेवालेकी जितनी अधिक प्रसन्नता होगी, वह भोजन उतने ही उत्तम दर्जेंका माना जायगा। (२) भोजन करानेवाला तो बड़ी प्रसन्नतासे भोजन कराता है; परन्तु भोजन करनेवाला 'मुफ्तमें भोजन मिल गया; अपने इतने पैसे बच गये; इससे मेरेमें बल आ जायगा' आदि स्वार्थका भाव रख लेता है, तो वह भोजन मध्यम दर्जेंका हो जाता है, और (३) भोजन करानेवालेका यह भाव है कि 'यह घरपर आ गया, तो खर्चा करना पड़ेगा, भोजन बनाना पड़ेगा, भोजन कराना ही पड़ेगा' आदि और भोजन करनेवालेमें भी स्वार्थभाव है, तो वह भोजन निकृष्ट दर्जेंका हो जायगा।

इस विषयमें गीताने सिद्धान्तरूपसे कह दिया है—'सर्वभूतहिते रताः' (५।२५, १२।४)। तात्पर्य यह है कि जिसका सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव जितना अधिक होगा, उसके पदार्थ, क्रियाएँ आदि उतनी ही पवित्र हो जायँगी।

भोजनके अन्तमें आचमनके बाद ये श्लोक पढ़ने चाहिये—

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

(गीता ३।१४-१५)

फिर भोजनके पाचनके लिये 'अहं वैश्वानरो भूत्वा०' (गीता १५।१४) श्लोक पढ़ते हुए मध्यमा अंगुलीसे नाभिको धीरे-धीरे घुमाना चाहिये।

  • ईर्ष्याभयक्रोधसमन्वितेन लुब्धेन रुदैन्यनिपीडितेन। विद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक् परिपाकमेति॥

( भावप्रकाश-दिनचर्याप्रकरण ५।१२८ )

१०७६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

सम्बन्ध—पहले यजन-पूजन और भोजनके द्वारा जो श्रद्धा बतायी, उससे शास्त्रविधिका अज्ञतापूर्वक त्याग करनेवालोंकी स्वाभाविक निष्ठा—रुचिकी तो पहचान हो जाती है; परन्तु जो मनुष्य व्यापार, खेती आदि जीविकाके कार्य करते हैं अथवा शास्त्रविहित यज्ञादि शुभकर्म करते हैं, उनकी स्वाभाविक रुचिकी पहचान कैसे हो—यह बतानेके लिये यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन भेदोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

अफलाकाइक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥

यष्टव्यम्, एव = यज्ञ करना हीकरकेयज्ञः = यज्ञ
कर्तव्य हैअफलाकाइक्षिभिः=फलेच्छारहितइज्यते = किया जाता है,
इति = —इस तरहमनुष्योंद्वारासः = वह
मनः = मनकोयः = जोसात्त्विकः = सात्त्विक
समाधाय = समाधान (सन्तुष्ट)विधिदृष्टः = शास्त्रविधिसे नियतहै।

व्याख्या—‘यष्टव्यमेवेति’—जब मनुष्य-शरीर मिल गया और अपना कर्तव्य करनेका अधिकार भी प्राप्त हो गया, तो अपने वर्ण-आश्रममें शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार यज्ञ करनामात्र मेरा कर्तव्य है। ‘एव इति’—ये दो अव्यय लगानेका तात्पर्य है कि इसके सिवाय दूसरा कोई भाव न रखे अर्थात् इस यज्ञसे लोकमें और परलोकमें मेरेको क्या मिलेगा? इससे मेरेको क्या लाभ होगा?—ऐसा भाव भी न रहे, केवल कर्तव्यमात्र रहे।

जब उससे कुछ मिलनेकी आशा ही नहीं रखनी है, तो फिर (फलेच्छाका त्याग करके) यज्ञ करनेकी जरूरत ही क्या है?—इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘मनः समाधाय’ अर्थात् ‘यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है’ ऐसे मनको समाधान करके यज्ञ करना चाहिये।

‘अफलाकाइक्षिभिः’—मनुष्य फलकी इच्छा रखनेवाला न हो अर्थात् लोक-परलोकमें मेरेको इस यज्ञका अमुक फल मिले—ऐसा भाव रखनेवाला न हो।

‘यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते’—शास्त्रोंमें विधिके विषयमें जैसी आज्ञा दी गयी है, उसके अनुसार ही यज्ञ किया जाय। इस प्रकारसे जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक होता है—‘स सात्त्विकः।’

सात्त्विकताका तात्पर्य

सात्त्विकताका क्या तात्पर्य होता है? अब इसपर थोड़ा विचार करें। ‘यष्टव्यम्’*—‘यज्ञ करनामात्र कर्तव्य है’—ऐसा जब उद्देश्य रहता है, तब उस यज्ञके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जुड़ता। परन्तु जब कर्तामें ‘वर्तमानमें मान,

आदर, सत्कार आदि मिलें, मरनेके बाद स्वर्गादि लोक मिलें तथा आगेके जन्ममें धनादि पदार्थ मिलें’—इस प्रकारकी इच्छाएँ होंगी, तब उसका उस यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ जायगा। तात्पर्य है कि फलकी इच्छा रखनेसे ही यज्ञके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। केवल कर्तव्यमात्रका पालन करनेसे उससे सम्बन्ध नहीं जुड़ता, प्रत्युत उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और (स्वार्थ तथा अभिमान न रहनेसे) कर्ताकी अहंता शुद्ध हो जाती है।

इसमें एक बड़ी मामिक बात है कि कुछ भी कर्म करनेमें कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध रहता है। कर्म कर्तासे अलग नहीं होता। कर्म कर्ताका ही चित्र होता है अर्थात् जैसा कर्ता होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है—‘यो यच्छद्धः स एव सः’ अर्थात् जो जैसी श्रद्धावाला है, वैसा ही उसका स्वरूप होता है और वैसा ही (श्रद्धाके अनुसार) उससे कर्म होता है। तात्पर्य यह है कि कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध होता है और कर्मके साथ सम्बन्ध होनेसे ही कर्ताका बन्धन होता है। केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे कर्ताका कर्मके साथ सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् कर्ता मुक्त हो जाता है।

केवल कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करना क्या है? अपने लिये कुछ नहीं करना है, सामग्रीके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है; मेरा देश, काल आदिसे भी कोई सम्बन्ध नहीं है; केवल मनुष्य होनेके नाते जो कर्तव्य प्राप्त हुआ है, उसको कर देना है—ऐसा भाव होनेसे कर्ता फलाकांक्षी नहीं होगा और कर्माका फल कर्ताको बाँधेगा नहीं अर्थात् यज्ञकी क्रिया

  • जो करनेयोग्य है, जो अपनी सामर्थ्यके अनुरूप है, जिसे अवश्य करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है, वह ‘कर्तव्य’ होता है। वही कर्तव्य यज्ञमें ‘यष्टव्य’ और दानमें ‘दातव्य’ है।

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७७

और यज्ञके फलके साथ कर्ताका सम्बन्ध नहीं होगा। गीता कहती है—'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि' (५।११) अर्थात् करण (शरीर, इन्द्रियाँ आदि) उपकरण (यज्ञ करनेमें उपयोगी सामग्री) और अधिकरण (स्थान) आदि किसीके भी साथ हमारा सम्बन्ध न हो।

यज्ञकी क्रियाका आरम्भ होता और समाप्ति होती है। ऐसे ही उसके फलका भी आरम्भ होता और समाप्ति होती है। क्रिया और फल दोनों उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले हैं और स्वयं (आत्मा) नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; परन्तु यह (स्वयं) क्रिया और फलके साथ अपना

सम्बन्ध मान लेता है। इस माने हुए सम्बन्धको यह जबतक नहीं छोड़ता, तबतक यह जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ा रहता है—'फले सक्तो निबध्यते' (गीता ५।१२)।

एक विलक्षण बात है कि गीतामें जो सत्त्वगुण कहा है, वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माकी तरफ ले जानेवाला होनेसे 'सत्' अर्थात् निर्गुण हो जाता है*। दैवी-सम्पत्तिमें भी जितने गुण हैं, वे सब सात्त्विक ही हैं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिवाला तभी परमात्माको प्राप्त होगा, जब वह सत्त्वगुणसे ऊँचा उठ जायगा अर्थात् जब गुणोंके संगसे सर्वथा रहित हो जायगा।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ १२॥

तु = परन्तु भरतश्रेष्ठ = हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! यत् = जो फलम् = फलकी अभिसन्धाय = इच्छाको लेकर एव = ही इज्यते = किया जाता है च = अथवा दम्भार्थम् = दम्भ (दिखावटीपन)-के लिये अपि = भी (किया जाता है), तम् = उस यज्ञम् = यज्ञको (तुम) राजसम् = राजस विद्धि = समझो।

व्याख्या—'अभिसन्धाय तु फलम्'—फल अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिकी कामना रखकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस हो जाता है। 'इस लोकमें हमें धन-वैभव मिले; स्त्री-पुत्र, परिवार अच्छा मिले; नौकर-चाकर, गाय-भैंस आदि भी हमारे अनुकूल मिलें; हमारा शरीर नीरोग रहे; हमारा आदर-सत्कार, मान-बड़ाई, प्रसिद्धि हो जाय तथा मरनेके बाद भी हमें स्वर्गादि लोकोंके दिव्य भोग मिलें' आदि इष्टकी प्राप्तिकी कामनाएँ हैं।

  • श्रीमद्भागवतमें एकादश स्कन्धके पचीसवें अध्यायमें जहाँ तामस, राजस और सात्त्विक—इन तीन गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ उनके साथ एक 'निर्गुण' और कहा है। परन्तु गीतामें तीन ही गुण कहे गये हैं। जब दोनोंके वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, तो फिर ऐसा भेद क्यों? गीताका जो सात्त्विक भाव है, उसमें भगवान्ने 'यष्टव्यम्' (१७।११), 'दातव्यम्' (१७।२०), 'कार्यमित्येव' (१८।९) आदि पद कहे हैं। इन्हें कहनेका तात्पर्य यह है कि जिस कर्ताका 'यज्ञ करनामात्र, दान देनामात्र और कर्तव्य करनामात्र' उद्देश्य रहता है, उसका कर्म और कर्मफलके साथ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् सात्त्विक यज्ञ, दान आदि भी 'निर्गुण' हो जाते हैं। सत्रहवें अध्यायके अन्तमें परमात्माके तीन नामों 'ॐ, तत्, सत्' के वर्णनमें 'सत्' शब्दकी व्याख्या करते हुए भगवान्ने बताया कि उस परमात्माके निमित्त जितने कर्म किये जाते हैं, वे सभी 'सत्' (निर्गुण) हो जाते हैं—'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' (१७।२७)। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगीका कर्म और कर्मफलके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे और भक्तियोगीके कर्मोंका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़नेसे उनके सभी कर्म 'निर्गुण' हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों ही बातें एक हीमें आ जानेसे गीतामें निर्गुणका अलग वर्णन नहीं आया है। गीतामें जहाँ सत्त्वगुणको अनामय बताया है, वहाँ सत्त्वगुणसे बन्धन होनेकी बात भी कही है (१४।६) और कहा है कि सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं (१४।१८)। इसका तात्पर्य यह है कि बन्धन सत्त्वगुणसे नहीं होता, प्रत्युत उसका संग करनेसे ही बन्धन होता है—'सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ' (१४।६) और 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१)। ऐसे ही सत्त्वगुणमें अपनी स्थिति मानना 'सत्त्वस्थाः' (१४।१८) भी बन्धनकारक है।

१०७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

‘हमारे वैरी नष्ट हो जायें; संसारमें हमारा अपमान, बेइज्जती, तिरस्कार आदि कभी न हो; हमारे प्रतिकूल परिस्थिति कभी आये ही नहीं’ आदि अनिष्टको निवृत्तिकी कामनाएँ हैं।

दुर्भार्थमपि चैव यत् ’—लोग हमें भीतरसे सदगुणी, सदाचारी, संयमी, तपस्वी, दानी, धर्मात्मा, याज्ञिक आदि समझें, जिससे संसारमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय—ऐसे दिखावटीपनेको लेकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस कहलाता है। इस प्रकारके दिखावटी यज्ञ करनेवालोंमें ‘यक्ष्ये दास्यामि ’ (१६।१५) और ‘यजने नामयज्ञेत् ’ (१६।१७) आदि सभी बातें विशेषतासे आ जाती हैं।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ’—इस प्रकार फलकी कामना और दम्भ—(दिखावटीपन—) को

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें आये ‘यत् ’ पदसे यह भाव निकलता है कि फलेच्छा और दम्भके लिये जो भी यज्ञ, दान, तप आदि कर्म किये जायें, वे सब राजस समझने चाहिये।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥

विधिहीनम् = शास्त्रविधिसे हीन,मन्त्रहीनम् = बिना मन्त्रोंके,किये जानेवाले
असृष्टान्नम् = अन्न-दानसे रहित,अदक्षिणम् = बिना दक्षिणाके (और)यज्ञम् = यज्ञको
श्रद्धावि-रहितम् = बिना श्रद्धाकेतामसम् = तामस
परिचक्षते = कहते हैं।

व्याख्या —‘विधिहीनम् ’—अलग-अलग यज्ञोंकी अलग-अलग विधियाँ होती हैं और उसके अनुसार यज्ञकुण्ड, सुवा आदि पात्र, बैठनेकी दिशा, आसन आदिका विचार होता है। अलग-अलग देवताओंकी अलग-अलग सामग्री होती है; जैसे—देवीके यज्ञमें लाल वस्त्र और लाल सामग्री होती है। परन्तु तामस यज्ञमें इन विधियोंका पालन नहीं होता, प्रत्युत उपेक्षापूर्वक विधिका त्याग होता है।

असृष्टान्नम् ’—तामस मनुष्य जो द्रव्ययज्ञ करते हैं, उसमें ब्राह्मणादिको अन्न-दान नहीं किया जाता। तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि मुफ्तमें रोटी मिलनेसे वे आलसी हो जायेंगे, काम-धंधा नहीं करेंगे।

मन्त्रहीनम् ’—वेदोंमें और वेदानुकूल शास्त्रोंमें कहे हुए मन्त्रोंसे ही द्रव्ययज्ञ किया जाता है। परन्तु तामस यज्ञमें वैदिक तथा शास्त्रीय मन्त्रोंसे यज्ञ नहीं किया जाता। कारण

लेकर जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस हो जाता है।

जो यज्ञ कामनापूर्तिके लिये किया जाता है, उसमें शास्त्रविधिकी मुख्यता रहती है। कारण कि यज्ञकी विधि और क्रियामें यदि किसी प्रकारकी कमी रहेगी, तो उससे प्राप्त होनेवाले फलमें भी कमी आ जायगी। इसी प्रकार यदि यज्ञकी विधि और क्रियामें विपरीत बात आ जायगी, तो उसका फल भी विपरीत हो जायगा अर्थात् वह यज्ञ सिद्धि न देकर उलटे यज्ञकर्ताके लिये घातक हो जायगा।

परन्तु जो यज्ञ केवल दिखावटीपनके लिये किया जाता है, उसमें शास्त्रविधिकी परवाह नहीं होती।

यहाँ ‘विद्धि ’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि हे अर्जुन! सांसारिक राग (कामना) ही जन्म-मरणका कारण है। अतः इस विषयमें तेरेको विशेष सावधान रहना है।

कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि आहुति देनेमात्रसे यज्ञ हो जाता है, सुगन्ध हो जाती है, गंदे परमाणु नष्ट हो जाते हैं, फिर मन्त्रोंकी क्या जरूरत है? आदि।

अदक्षिणम् ’—तामस यज्ञमें दान नहीं किया जाता। कारण कि तामस पुरुषोंका यह भाव रहता है कि हमने यज्ञमें आहुति दे दी और ब्राह्मणोंको अच्छी तरहसे भोजन करा दिया, अब उनको दक्षिणा देनेकी क्या जरूरत रही? यदि हम उनको दक्षिणा देंगे तो वे आलसी-प्रमादी हो जायेंगे, पुरुषार्थहीन हो जायेंगे, जिससे दुनियामें बेकारी फैलेगी; दूसरी बात, जिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा मिलती है, वे कुछ कमाते ही नहीं, इसलिये वे पृथ्वीपर भाररूप रहते हैं, इत्यादि। वे तामस मनुष्य यह नहीं सोचते कि ब्राह्मणादिको अन्नदान, दक्षिणा आदि न देनेसे वे तो प्रमादी बनें, चाहे न बनें; पर शास्त्रविधिका, अपने कर्तव्य-कर्मका त्याग करनेसे हम तो प्रमादी बन ही गये!

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७९

‘श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिच्छते’—अग्निमें आहुति देनेके विषयमें तामस मनुष्योंका यह भाव रहता है कि अन्न, घी, जौ, चावल, नारियल, छहारा आदि तो मनुष्यके निर्वाहके कामकी चीजें हैं। ऐसी चीजोंको अग्निमें फूँक देना कितनी मूर्खता है!* अपनी प्रसिद्धि, मान-बड़ाईके लिये वे यज्ञ करते भी हैं तो बिना शास्त्रविधिके, बिना अन्नदानके, बिना मन्त्रोंके और बिना दक्षिणाके करते हैं। उनकी शास्त्रोंपर, शास्त्रोक्त मन्त्रोंपर और उनमें बतायी हुई विधियोंपर तथा शास्त्रोक्त विधिपूर्वक की गयी यज्ञकी क्रियापर और उसके पारलौकिक फलपर भी श्रद्धा-विश्वास नहीं होते। कारण कि उनमें मूढ़ता होती है। उनमें अपनी तो अक्ल होती नहीं और दूसरा कोई समझा दे तो उसे मानते नहीं।

इस तामस यज्ञमें ‘यः शास्त्रविधिमुत्पृच्छ्य वर्तते कामकारतः’ (गीता १६।२३) और ‘अश्रद्धया हुतं

दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्’ (गीता १७।२८)—ये दोनों भाव होते हैं। अतः वे इहलोक और परलोकका जो फल चाहते हैं, वह उनको नहीं मिलता—‘न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्’, ‘न च तत्त्वैव नो इह।’ तात्पर्य है कि उनको उपेक्षापूर्वक किये गये शुभ-कर्मोंका इच्छित फल तो नहीं मिलेगा, पर अशुभ-कर्मोंका फल (अधोगति) तो मिलेगा ही—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८)। कारण कि अशुभ फलमें अश्रद्धा ही हेतु है और वे अश्रद्धापूर्वक ही शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हैं; अतः इसका दण्ड तो उनको मिलेगा ही।

इन यज्ञोंमें कर्ता, ज्ञान, क्रिया, धृति, बुद्धि, संग, शास्त्र, खान-पान आदि यदि सात्त्विक होंगे, तो वह यज्ञ सात्त्विक हो जायगा; यदि राजस होंगे, तो वह यज्ञ राजस हो जायगा; और यदि तामस होंगे, तो वह यज्ञ तामस हो जायगा।

सम्बन्ध—ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन करते हैं (जिसका सात्त्विक, राजस और तामस-भेद आगे करेंगे)।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥

देवद्विजगुरु-करना,अहिंसा= हिंसा न करना—
प्राज्ञपूजनम्= शुद्धि रखना,(यह)
ब्राह्मण, गुरुजनशौचम्शारीरम्= शरीर-सम्बन्धी
और जीवन्मुक्तआर्जवम्तपः= तप
महानुरूपकाब्रह्मचर्यम्उच्यते= कहा
यथायोग्य पूजनकरनाजाता है।
= और

व्याख्या—‘देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्’—यहाँ ‘देव’ शब्द मुख्यरूपसे विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य—इन पाँच ईश्वरकोटिके देवताओंके लिये आया है। इन पाँचोंमें जो अपना इष्ट है, जिसपर अधिक श्रद्धा है, उसका

  • जब खेतमें हल चलानेवाला अनाजके बढिया-बढिया बीजोंको मिट्टीमें मिला देता है, तो खेती होनेपर उन बीजोंसे कई गुणा अधिक अनाज पैदा हो जाता है; फिर शास्त्रीय मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक वस्तुओंका हवन करना क्या निरर्थक जायगा? मिट्टीमें मिलाया हुआ बीज तो आधिभौतिक है; क्योंकि पृथ्वी जड़ है, पर शास्त्रविधिंसहित अग्निमें दी गयी आहुति आधिदैविक है; क्योंकि देवता चेतन हैं। अतः उन देवताओंके लिये दी गयी आहुति वर्षाके रूपमें बहुत बड़ा काम करती है। मनुजीने कहा है—

अग्नीं प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरनं ततः प्रजाः ॥

(मनुस्मृति ३।७६)

अर्थात् अग्निमें डाली हुई आहुति आदित्यकी किरणोंको पुष्ट करती है और उन पुष्ट हुई किरणोंसे वर्षा होती है (इस बातको भौतिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं)।

मात्र जीव अन्से पैदा होते हैं और अन्न जलसे पैदा होता है—‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः।’ (गीता ३।१४)। अतः सृष्टिमें जल ही प्रधान है। जल बरसनेमें ‘यज्ञ’ ही खास हेतु है—‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ (३।१४)।

१०८०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

निष्कामभावसे पूजन करना चाहिये।*

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैतीस शास्त्रोक्त देवता भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत आते हैं। यज्ञ, तीर्थ, व्रत आदिमें, दीपमालिका आदि विशेष पर्वोंमें और जातकर्म, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारोंके समय जिन देवताओंके पूजनका शास्त्रोंमें विधान आता है, उन सब देवताओंको भी ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत मानना चाहिये। इन देवताओंका यथावसर पूजन करनेके लिये शास्त्रोंकी आज्ञा है। अतः हमें तो केवल शास्त्रमर्यादाको सुरक्षित रखनेके लिये अपना कर्तव्य समझकर निष्कामभावसे इनका पूजन करना है—ऐसे भावसे इन देवताओंका भी यथावसर पूजन करना चाहिये। तात्पर्य है कि शास्त्रोंने जिन-जिन तिथि, वार, नक्षत्र, आदिके दिन जिन-जिन देवताओंका पूजन करनेका विधान बताया है, उन-उन तिथि आदिके दिन उन-उन देवताओंका पूजन करना चाहिये।

‘द्विज’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंका वाचक है; परन्तु यहाँ पूजनका विषय होनेसे इसे केवल ब्राह्मणका ही वाचक समझना चाहिये, क्षत्रिय और वैश्यका नहीं।

जिनसे हमें शिक्षा प्राप्त होती है, ऐसे हमारे माता-पिता बड़े-बूढ़े, कुलके आचार्य, पढ़ानेवाले अध्यापक और आश्रम, अवस्था, विद्या आदिमें जो हमारेसे बड़े हैं, उन सभीको ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत समझना चाहिये।

द्विज (ब्राह्मण) एवं अपने माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना और उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना तथा पत्र-पुष्प, आरती आदिसे उनकी पूजा करना—यह सब उनका पूजन है।

यहाँ ‘प्राज्ञ’ शब्द जीवन्मुक्त महापुरुषके लिये आया है। यदि वह वर्ण और आश्रममें ऊँचा होता, तो ‘द्विज’ पदमें आ जाता और यदि शरीरके सम्बन्धमें (जन्म और विद्यासे) बड़ा होता, तो ‘गुरु’ पदमें आ जाता। इसलिये जो वर्ण और आश्रममें ऊँचा नहीं है एवं जिसके साथ गुरुका सम्बन्ध भी नहीं है—ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषको यहाँ ‘प्राज्ञ’ कहा गया है। ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषके वचनोंका, सिद्धान्तोंका आदर करते हुए उनके अनुसार अपना जीवन बनाना ही वास्तवमें

उनका पूजन है। वास्तवमें देखा जाय तो द्विज और गुरु तो सांसारिक दृष्टिसे आदरणीय हैं, पूजनीय हैं; परन्तु प्राज्ञ (जीवन्मुक्त) तो आध्यात्मिक दृष्टिसे आदरणीय—पूजनीय है। अतः जीवन्मुक्तका हृदयसे आदर करना चाहिये; क्योंकि केवल बाहरी (बाह्य दृष्टिसे) आदर ही आदर नहीं है, प्रत्युत हृदयका आदर ही वास्तविक आदर है, पूजन है।

‘शौचम्’—जल, मृत्तिका आदिसे शरीरको पवित्र बनानेका नाम ‘शौच’ है। शारीरिक शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है।

शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।

(योगदर्शन २।४०)

शौचसे अपने शरीरमें घृणा होगी कि हम इस शरीरको रात-दिन इतना साफ करते हैं, फिर भी इससे मल, मूत्र, पसीना, नाकका कफ, आँख और कानकी मैल, लार, थूक आदि निकलते ही रहते हैं। यह शरीर हड्डी, मांस, मज्जा आदि घुणित (अपवित्र) चीजोंका बना हुआ है। इस हड्डी-मांसके थैलेमें तोलाभर भी कोई शुद्ध, पवित्र, निर्मल और सुगन्धयुक्त वस्तु नहीं है। यह केवल गंदगीका पात्र है। इसमें कौरी मलिनता—ही-मलिनता भरी पड़ी है। यह केवल मल-मूत्र पैदा करनेकी एक फैक्टरी है, मशीन है। इस प्रकार शरीरकी अशुद्धि, मलिनताका ज्ञान होनेसे मनुष्य शरीरसे ऊँचा उठ जाता है। शरीरसे ऊँचा उठनेपर उसको वर्ण, आश्रम, अवस्था आदिको लेकर अपनेमें बड़पनका अभिमान नहीं होता। इन्हीं बातोंके लिये शौच रखा जाता है।

आजकल प्रायः लोग कहते हैं कि जो शौचाचार रखते हैं, वे तो दूसरोंका अपमान करते हैं, दूसरोंसे घृणा करते हैं। उनका ऐसा कहना बिलकुल गलत है; क्योंकि शौचका फल यह नहीं बताया गया कि तुम दूसरोंका तिरस्कार करो, प्रत्युत यह बताया गया कि इससे दूसरोंके साथ संसर्ग नहीं होगा—‘परैरसंसर्गः।’ तात्पर्य है कि शरीरमात्रसे ग्लानि हो जायगी कि ये सब पुतले ऐसे ही अशुद्ध हैं। जैसे, मिट्टीके ढेलेको जलसे धोते चले जायँ, तो अन्तमें वह सब (गलकर) समाप्त हो जायगा, पर उसमें मिट्टीके सिवाय कोई बढ़िया चीज नहीं मिलेगी; ऐसे ही शरीरको कितना ही शुद्ध करते रहें, पर वह कभी शुद्ध होगा नहीं; क्योंकि इसके मूलमें ही अशुद्धि है—

  • इनमें भी वैष्णव भगवान् विष्णुको, शैव भगवान् शिवको, गाणपत भगवान् गणेशको, शाक्त भगवती शक्तिको और सौर भगवान् सूर्यको सर्वोपरि ईश्वर मानते हैं। अतः इन पाँचोंमें भी अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार अपना इष्ट तो सर्वोपरि ईश्वर होगा और अन्य सभी देवता होंगे।

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८१

स्थानाद् बीजादुपष्टम्भानिः स्यन्दानिधनादपि । कायमाधेयशौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचि विदुः ॥

(योगदर्शन २।५ का व्यास-भाष्य)

‘विद्वान् लोग शरीरको स्थान (माताके उदरमें स्थित), बीज (माता-पिताके रजोवीर्यसे उद्भूत), उपष्टम्भ (खाये-पीये हुए आहारके रससे परिपुष्ट), निःस्यन्द (मल, मूत्र, शुक्र, लार, स्वेद आदि स्नावसे युक्त), निधन (मरणधर्मा) और आधेय शौच (जल-मृत्तिका आदिसे प्रक्षालित करनेयोग्य) होनेके कारण अपवित्र मानते हैं।’

‘आर्जवम्’—शरीरकी ऐंट-अकड़का त्याग करके उठने, बैठने आदि शारीरिक क्रियाओंको सीधी-सरलतासे करनेका नाम ‘आर्जव’ है। अभिमान अधिक होनेसे ही शरीरमें टेढ़ापन आता है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, ऐसे साधकको अपनेमें अभिमान नहीं रखना चाहिये। निरभिमानता होनेसे शरीरमें और शरीरकी चलने, उठने, बैठने, बोलने, देखने आदि सभी क्रियाओंमें स्वाभाविक ही सरलता आ जाती है, जो ‘आर्जव’ है।

‘ब्रह्मचर्यम्’—ये आठ क्रियाएँ ब्रह्मचर्यको भंग करनेवाली हैं—(१) पहले कभी स्त्रीसंग किया है, उसको याद करना, (२) स्त्रियोंसे रागपूर्वक बातें करना, (३) स्त्रियोंके साथ हँसी-दिल्लगी करना, (४) स्त्रियोंकी तरफ रागपूर्वक देखना, (५) स्त्रियोंके साथ एकात्ममें बातें करना, (६) मनमें स्त्रीसंगका संकल्प करना, (७) स्त्रीसंगका पक्का विचार करना और (८) साक्षात् स्त्रीसंग करना। ये आठ प्रकारके मैथुन विद्वानोंने बताये हैं। इनमेंसे कोई भी क्रिया कभी न हो, उसका नाम ‘ब्रह्मचर्य’ है।

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन तीनोंका तो बिल्कुल ही वीर्यपात नहीं होना चाहिये और न ऐसा संकल्प ही होना चाहिये। गृहस्थ केवल सन्तानार्थ शास्त्रविधिके अनुसार ऋतुकालमें स्त्रीसंग करता है, तो वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी ब्रह्मचारी माना जाता है। विधवाओंके विषयमें भी ऐसी ही बात आती है कि जो स्त्री अपने पतिके रहते पातिव्रत-धर्मका पालन करती रही है और पतिकी मृत्युके बाद ब्रह्मचर्य धर्मका पालन करती है, उस विधवाकी वही गति होती है, जो आबाल ब्रह्मचारीकी होती है।

वास्तवमें तो ‘ब्रह्मचारिव्रते स्थितः’ (गीता ६।१४)—ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित रहना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु इसमें भी यदि स्वप्नदोष हो जाय अथवा प्रमेह आदि शरीरकी खराबीसे वीर्यपात हो जाय, तो उसे ब्रह्मचर्यभंग नहीं माना गया है। भीतरके भावोंमें गड़बड़ी आनेसे जो वीर्यपात आदि होते हैं, वही ब्रह्मचर्यभंग माना गया है। कारण कि ब्रह्मचर्यका भावोंके साथ सम्बन्ध है। इसलिये ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको चाहिये कि अपने भाव शुद्ध रखनेके लिये वह अपने मनको परस्त्रीकी तरफ कभी जाने ही न दे। सावधानी रखनेपर कभी मन चला भी जाय, तो भीतरमें यह दूह विचार रखे कि यह मेरा काम नहीं है, मैं ऐसा काम करूँगा ही नहीं; क्योंकि मेरा ब्रह्मचर्य-पालन करनेका पक्का विचार है; मैं ऐसा काम कैसे कर सकता हूँ?

‘अहिंसा’—सभी प्रकारकी हिंसाका अभाव अहिंसा है। हिंसा स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोह-(मूढ़ता-) को लेकर होती है। जैसे, अपने स्वार्थमें आकर किसीका धन दबा लिया, दूसरोंका नुकसान करा दिया—यह ‘स्वार्थ’ को लेकर हिंसा है। क्रोधमें आकर किसीको थोड़ी चोट पहुँचायी, ज्यादा चोट पहुँचायी अथवा खत्म ही कर दिया—यह ‘क्रोध’ को लेकर हिंसा है। चमड़ा मिलेगा, मांस मिलेगा, इसके लिये किसी पशुको मार दिया अथवा धनके कारण किसीको मार दिया—यह ‘लोभ’ को लेकर हिंसा है। रास्तेपर चलते-चलते किसी कुत्तेको लाठी मार दी, वृक्षकी डाली तोड़ दी, किसी घासको ही तोड़ दिया, किसीको ठेकर मार दी, तो इसमें न क्रोध है, न लोभ है और न कुछ मिलनेकी सम्भावना ही है—यह ‘मोह’ (मूढ़ता)—को लेकर हिंसा है। अहिंसामें इन सभी हिंसाओंका अभाव है।

‘शारीरं तप उच्यते’—देव आदिका पूजन, शौच, आर्जव, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह पाँच प्रकारका ‘शारीरिक तप’ कहा गया है। इस शारीरिक तपमें तीर्थ, व्रत, संयम आदि भी ले लेने चाहिये।

जब कष्ट उठाना पड़ता है, तपन होती है, तब वह तप होता है; परन्तु उपर्युक्त शारीरिक तपमें तो ऐसी कोई बात नहीं है, फिर यह तप किस प्रकार हुआ? कष्ट उठाकर जो तप किया जाता है, वह वास्तवमें श्रेष्ठ कोटिका तप नहीं है।

१-स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गृह्यभाषणम्। सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्यतिरेच च ॥ एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मृमुक्षुभिः ॥

२-यहाँ ‘अहिंसा’ शारीरिक तपके अन्तर्गत आयी है, इसलिये यहाँ शरीर-सम्बन्धी अहिंसा ही ली जायगी, मन-वाणीकी अहिंसा नहीं ली जायगी।

१०८२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

तपमें कष्टकी मुख्यता रखनेवालोंको भगवान्ने 'आसुर-निश्चयान्' (१७।६)—आसुर निश्चयवाले बताया है। तप तो वही श्रेष्ठ है, जिसमें उच्छृंखल वृत्तियोंको रोककर शास्त्र, कुल-परम्परा और लोक-परम्पराकी मर्यादाके अनुसार संयमपूर्वक चलना होता है। ऐसे ही साधन करते हुए स्वाभाविक ही देश, काल, परिस्थिति, घटना आदि अपने विपरीत आ जायें, तो उनको साधन-सिद्धिके लिये प्रसन्नतापूर्वक सहना भी तप है। इस तपमें शरीर, इन्द्रिय, मन आदिका संयम होता है।

अष्टांगयोगमें जहाँ यम-नियमादि आठ अंगोंका वर्णन किया गया हैं, वहाँ 'यम' को सबसे पहले बताया है। यद्यपि पाँच ही 'यम' हैं—'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रह यमाः' (योगदर्शन २।३०) और पाँच ही 'नियम' हैं—'शौचसन्तोषपराः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः' (योगदर्शन २।३२), तथापि इन दोनोंमेंसे नियमकी अपेक्षा

यमकी ज्यादा महिमा है। कारण कि 'नियम' में व्रतोंका पालन करना पड़ता है और 'यम' में इन्द्रियों, मन आदिका संयम करना पड़ता है।

लोगोंकी दृष्टिमें यह बात हो सकती है कि शरीरको कष्ट देना तप है और आरामसे रहकर संयम करना, त्याग करना तप नहीं है; परंतु वास्तवमें देखा जाय तो समस्त सांसारिक विषयोंमें अनासक्त होकर जो संयम, त्याग किया जाता है, वह तपसे कम नहीं है, प्रत्युत पारमार्थिक मार्गमें उसीका ऊँचा दर्जा है। कारण कि त्यागसे परमात्माकी प्राप्ति होती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)। केवल बाहरी तपसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं बतायी गयी है; किंतु अन्तःकरणकी शुद्धिका कारण होनेसे वह तप परमात्मप्राप्तिमें सहायक हो सकता है। इसलिये साधकको मुख्यरूपसे यमोंका सेवन करते हुए समय-समयपर नियमोंका भी पालन करते रहना चाहिये।

परिशिष्ट भाव —शारीरिक तपमें त्याग मुख्य है; जैसे—पूजन करनेमें अपनेमें बड़पनके भावका त्याग है; शुद्धि रखनेमें आलस्य-प्रमादका त्याग है; सरलता रखनेमें अभिमानका त्याग है; ब्रह्मचर्यमें विषयसुखका त्याग है; अहिंसामें अपने सुखके भावका त्याग है। इस प्रकार त्याग करनेसे शारीरिक तप होता है।

अनुद्देगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥

यत् | = जो | प्रियहितम् | = प्रिय तथा हितकारक | अभ्यास | (नामजप आदि) ---|---|---|---|---|--- अनुद्देग- | | वाक्यम् | = भाषण है, (वह) | एव | = भी करम् | = किसीको भी उद्दिग्न न करनेवाला, | च | = तथा | वाङ्मयम् | = वाणी- सम्बन्धी सत्यम् | = सत्य | स्वाध्या- | | तपः | = तप च | = और | याभ्यसनम् | = स्वाध्याय और | उच्यते | = कहा जाता है।

व्याख्या —'अनुद्देगकरं वाक्यम्'—जो वाक्य वर्तमानमें और भविष्यमें कभी किसीमें भी उद्देग, विशेष और हलचल पैदा करनेवाला न हो, वह वाक्य 'अनुद्देगकर' कहा जाता है।

'सत्यं प्रियहितं च यत्'—जैसा पढ़ा, सुना, देखा और निश्चय किया गया हो, उसको वैसा-का-वैसा ही अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंको समझानेके लिये कह देना 'सत्य' है।

१-यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि। (पातंजलयोगदर्शन २।२९) २-हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण आदि राक्षसोंमें भी 'नियम' तो मिलते हैं, पर उनमें 'यम' नहीं मिलते। ३-सत्यं बूयात् प्रियं बूयान् बूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानुत् बूयादेष धर्मः सनातनः ॥ (मनुस्मृति ४।१३८) 'मनुष्यको सत्य बोलना चाहिये और प्रिय बोलना चाहिये। उसमें भी सत्य हो, पर अप्रिय न हो और प्रिय हो, पर असत्य न हो—यही सनातन धर्म है।'

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८३

जो क्रूरता, रूखेपन, तीखेपन, ताने, निन्दा-चुगली और अपमानकारक शब्दोंसे रहित हो और जो प्रेमयुक्त, मीठे, सरल और शान्त वचनोंसे कहा जाय, वह वाक्य 'प्रिय' कहलाता है।*

जो हिंसा, डाह, द्वेष, वैर आदिसे सर्वथा रहित हो और प्रेम, दया, क्षमा, उदारता, मंगल आदिसे भरा हो तथा जो वर्तमानमें और भविष्यमें भी अपना और दूसरे किसीका अनिष्ट करनेवाला न हो, वह वाक्य 'हित' (हितकर) कहलाता है।

'स्वाध्यायाध्यसनं चैव'—पारमार्थिक उन्नतिमें सहायक गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना, भगवान् तथा भक्तोंके चरित्रोंको पढ़ना आदि 'स्वाध्याय' है।

गीता आदि पारमार्थिक ग्रन्थोंकी बार-बार आवृत्ति करना,

उन्हें कण्ठस्थ करना, भगवन्नामका जप करना, भगवान्की बार-बार स्तुति-प्रार्थना करना आदि 'अध्यसन' है।

'च एव'—इन दो अव्यय पदोंसे वाणीसम्बन्धी तपकी अन्य बातोंको भी ले लेना चाहिये; जैसे—दूसरोंकी निन्दा न करना, दूसरोंके दोषोंको न कहना, वृथा बकवाद न करना अर्थात् जिससे अपना तथा दूसरोंका कोई लौकिक या पारमार्थिक हित सिद्ध न हो—ऐसे वचन न बोलना, पारमार्थिक साधनमें बाधा डालनेवाले तथा शृंगार-रसके काव्य, नाटक, उपन्यास आदि न पढ़ना अर्थात् जिनसे काम, क्रोध, लोभ आदिको सहायता मिले—ऐसी पुस्तकोंको न पढ़ना आदि-आदि।

'वाङ्मयं तप उच्यते'—उपर्युक्त सभी लक्षण जिसमें होते हैं, वह वाणीसे होनेवाला तप कहलाता है।

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो

मानसमुच्यते ॥ १६ ॥

मनःप्रसादः = मनकी प्रसन्नता,

सौम्यत्वम् = सौम्य

भाव,

मौनम् = मननशीलता,

आत्मविनि-

ग्रहः = मनका निग्रह

(और)

भावसंशुद्धिः = भावोंकी

भलीभाँति

शुद्धि

इति = —इस तरह

एतत् = यह

मानसम् = मन-सम्बन्धी

तपः = तप

उच्यते = कहा जाता है।

व्याख्या—'मनःप्रसादः'—'मनकी प्रसन्नताको 'मनःप्रसाद' कहते हैं। वस्तु, व्यक्ति, देश, काल, परिस्थिति, घटना आदिके संयोगसे पैदा होनेवाली प्रसन्नता स्थायीरूपसे हरदम नहीं रह सकती; क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, वह वस्तु स्थायी रहनेवाली नहीं होती। परन्तु दुर्गुण-दुश्चारोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर जो स्थायी तथा स्वाभाविक प्रसन्नता प्रकट होती है, वह हरदम रहती है और वही प्रसन्नता मन, बुद्धि आदिमें आती है, जिससे मनमें कभी अशान्ति होती ही नहीं अर्थात् मन हरदम प्रसन्न रहता है।

मनमें अशान्ति, हलचल आदि कब होते हैं? जब मनुष्य धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र आदि नाशवान् चीजोंका सहारा ले लेता है। जिसका सहारा उसने ले रखा है, वे सब चीजें आने-जानेवाली हैं, स्थायी रहनेवाली नहीं हैं।

अतः उनके संयोग-वियोगसे उसके मनमें हलचल आदि होती है। यदि साधक न रहनेवाली चीजोंका सहारा छोड़कर नित्य-निरन्तर रहनेवाले प्रभुका सहारा ले ले, तो फिर पदार्थ, व्यक्ति आदिके संयोग-वियोगको लेकर उसके मनमें कभी अशान्ति, हलचल नहीं होगी।

मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय

(१) सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, देश, काल, घटना आदिको लेकर मनमें राग और द्वेष पैदा न होने दे।

(२) अपने स्वार्थ और अभिमानको लेकर किसीसे पक्षपात न करे।

(३) मनको सदा दया, क्षमा, उदारता आदि भावोंसे परिपूर्ण रखे।

(४) मनमें प्राणिमात्रके हितका भाव हो।

  • प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥

'प्रिय वाक्य बोलनेसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सम्पूर्ण प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिये मनुष्यको प्रिय वाक्य ही बोलना चाहिये। बोलनेमें दरिद्रता—कंजूसी किस बातकी ?'

१०८४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

(५) हितपरिमितभोजी नित्यमेकान्तसेवी सकृदुचित्तहितोक्तिः स्वल्पनिद्राविहारः । अनुनियमनशीलो यो भजत्युक्तकाले स लभत इव शीघ्रं साधुचित्तप्रसादम् ॥

(सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह ३७२)

जो शरीरके लिये हितकारक एवं नियमित भोजन करनेवाला है, सदा एकान्तमें रहनेके स्वभाववाला है, किसीके पुछनेपर कभी कोई हितकी उचित बात कह देता है अर्थात् बहुत ही कम मात्रामें बोलता है, जो सोना और घूमना बहुत कम करनेवाला है। इस प्रकार जो शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खान-पान-विहार आदिका सेवन करने-वाला है, वह साधक बहुत ही जल्दी चित्तकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है।

—इन उपायोंसे मन सदा प्रसन्न रहता है।

'सौम्यत्वम्'—हृदयमें हिंसा, क्रूरा, कुटिलता, असहिष्णुता, द्वेष आदि भावोंके न रहनेसे एवं भगवान्के गुण, प्रभाव, दयालुता, सर्वव्यापकता आदिपर अटल विश्वास होनेसे साधकके मनमें स्वाभाविक ही 'सौम्यभाव' रहता है। फिर उसको कोई टेढ़ा वचन कह दे, उसका तिरस्कार कर दे, उसपर बिना कारण दोषारोपण करे, उसके साथ कोई वैर-द्वेष रखे अथवा उसके धन, मान, महिमा आदिकी हानि हो जाय, तो भी उसके सौम्यभावमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता।

'मौनम्'— अनुकूलता-प्रतिकूलता, संयोग-वियोग, राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको लेकर मनमें हलचलका न होना ही वास्तवमें 'मौन' है।*

शास्त्रों, पुराणों और सन्त-महापुरुषोंकी वाणियोंका तथा उनके गहरे भावोंका मनन होता रहे; गीता, रामायण, भागवत

परिशिष्ट भाव —प्रतिकूल परिस्थितिमें भी प्रसन्न रहे। अपने ऊपर परिस्थितिका असर न पड़े। दूसरोंकी प्रतिकूल बात सुनकर भी सौम्य रहे। मनकी स्वतन्त्रताका त्याग करके मनन करे; क्योंकि मनको स्वतन्त्र छोड़नेसे सुखभोग होता है, मननशीलता नहीं आती। मनकी मूढ़, क्षिप्त और विशिप्त वृत्तियोंका त्याग करे। अपने मनमें किसीके अहितका भाव न हो। यह सब मन-सम्बन्धी तप है।

आदि भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें कहे हुए भगवान्के गुणोंका, चरित्रोंका सदा मनन होता रहे; संसारके प्राणी किस प्रकार सुखी हो सकते हैं? सबका कल्याण किन-किन उपायोंसे हो सकता है? किन-किन सरल युक्तियोंसे हो सकता है? उन उपायोंका और युक्तियोंका मनमें हरदम मनन होता रहे—ये सभी 'मौन' शब्दसे कहे जा सकते हैं।

'आत्मविनिग्रहः'—मन बिलकुल एकाग्र हो जाय और तैलधारावत् एक ही चिन्तन करता रहे—इसको भी मनका निग्रह कहते हैं; परन्तु मनका सच्चा निग्रह यही है कि मन साधकके वशमें रहे अर्थात् मनको जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय और जहाँ जितनी देर लगाना चाहें, वहाँ उतनी देर लगा रहे। तात्पर्य यह कि साधक मनके वशीभूत होकर काम नहीं करे, प्रत्युत मन ही उसके वशीभूत होकर काम करता रहे। इस प्रकार मनका वशीभूत होना ही वास्तवमें 'आत्मविनिग्रह' है।

'भावसंशुद्धिः'—जिस भावमें अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग हो और दूसरोंकी हितकारिता हो, उसे 'भावसंशुद्धि' अर्थात् भावकी महान् पवित्रता कहते हैं।

जिसके भीतर एक भगवान्का ही आसरा, भरोसा है, एक भगवान्का ही चिन्तन है और एक भगवान्की तरफ चलनेका ही निश्चय है, उसके भीतरके भाव बहुत जल्दी शुद्ध हो जाते हैं। फिर उसके भीतर उत्पत्ति-विनाशशील सांसारिक वस्तुओंका सहारा नहीं रहता; क्योंकि संसारका सहारा रखनेसे ही भाव अशुद्ध होते हैं।

'इत्येतत्तपो मानसमुच्यते'—इस प्रकार जिस तपमें मनकी मुख्यता होती है, वह मानस (मन-सम्बन्धी) तप कहलाता है।

  • यहाँ 'मौनम्' पद वाणीके मौन-(चुप रहने-) का वाचक नहीं है। यदि यह वाणीके मौनका वाचक होता, तो इसे वाणी-सम्बन्धी तपमें देते। परन्तु यहाँ 'मौन' शब्द मानसिक तपके अन्तर्गत आया है।

गीतामें प्रायः यह देखा जाता है कि जहाँ अर्जुनका क्रियापरक प्रश्न है, वहाँ भगवान् भावपरक उत्तर देते हैं। जैसे दूसरे अध्यायके चौवनवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा कि 'स्थितधीः किं प्रभाषेत्' 'स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है?' तो भगवान्ने उसका उत्तर दिया—'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः' 'स्थितधीर्मनिरुच्यते ॥' अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर जिसके मनमें हर्ष-शोक नहीं होते, वह स्थितप्रज्ञ मुनि (मौनी) है। तात्पर्य यह कि भगवान् क्रियाकी अपेक्षा भावको श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ भी 'मौन' को मानसिक तपमें लिया है।

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

१०८५

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस तपका वर्णन करते हैं।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्विविधं नरैः।

अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥

परया= परमनरैः= मनुष्योंके द्वारातपः= तप
श्रद्धया= श्रद्धासे(जो)तप्तम्= किया जाता है,
युक्तैः= युक्तत्रिविधम्= तीन प्रकारतत्= उसको
अफला-(शरीर, वाणी औरसात्त्विकम्= सात्त्विक
काङ्क्षिभिः= फलेच्छारहितमन)-कापरिचक्षते= कहते हैं।

व्याख्या—‘श्रद्धया परया तप्तम्’— शरीर, वाणी और मनके द्वारा जो तप किया जाता है, वह तप ही मनुष्योंका सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है और यही मानव-जीवनके उद्देश्यकी पूर्तिका अचूक उपाय है* तथा इसको सांगोपांग—अच्छी तरहसे करनेपर मनुष्यके लिये कुछ करना बाकी नहीं रहता अर्थात् जो वास्तविक तत्त्व है, उसमें स्वतः स्थिति हो जाती है—ऐसे अटल विश्वासपूर्वक श्रेष्ठ श्रद्धा करके बड़े-बड़े विघ्न और बाधाओंकी कुछ भी परवाह न करते हुए उत्साह एवं आदरपूर्वक तपका आचरण करना ही परम श्रद्धासे युक्त मनुष्योंद्वारा उस तपको करना है।

‘अफलाकाङ्क्षिभिः युक्तैः नरैः’— यहाँ इन दो विशेषणोंसहित ‘नरैः’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि आंशिक सदगुण-सदाचार तो प्राणिमात्रमें रहते ही हैं; परन्तु मनुष्यमें यह विशेषता है कि वह सदगुण-सदाचारोंको सांगोपांग एवं विशेषतासे अपनेमें ला सकता है और दुर्गुण-दुराचार, कामना, मूढ़ता आदि दोषोंको सर्वथा मिटा सकता है। निष्कामभाव मनुष्योंमें ही हो सकता है।

सात्त्विक तपमें तो ‘नर’ शब्द दिया है; परन्तु राजस-तामस तपमें मनुष्यवाचक शब्द दिया ही नहीं। तात्पर्य यह है कि अपना कल्याण करनेके उद्देश्यसे मिले हुए अमूल्य शरीरको पाकर भी जो कामना, दम्भ, मूढ़ता आदि दोषोंको पकड़े हुए हैं, वे मनुष्य कहलानेके लायक ही नहीं हैं।

फलकी इच्छा न रखकर निष्कामभावसे तपका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ उपर्युक्त पद आये हैं।

‘तपस्तत्त्विविधम्’— यहाँ केवल सात्त्विक तपमें ‘त्रिविध’ पद दिया है और राजस तथा तामस तपमें ‘त्रिविध’ पद

न देकर ‘यत्-तत्’ पद देकर ही काम चलाया है। इसका आशय यह है कि शारीरिक, वाचिक और मानसिक—तीनों तप केवल सात्त्विकमें ही सांगोपांग आ सकते हैं, राजस तथा तामसमें तो आंशिकरूपसे ही आ सकते हैं। इसमें भी राजसमें कुछ अधिक लक्षण आ जायेंगे, क्योंकि राजस मनुष्यका शास्त्रविधिकी तरफ खयाल रहता है। परन्तु तामसमें तो उन तपोंके बहुत ही कम लक्षण आयेंगे; क्योंकि तामस मनुष्योंमें मूढ़ता, दूसरोंको कष्ट देना आदि दोष रहते हैं।

दूसरी बात, तेरहवें अध्यायमें सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जो ज्ञानके बीस साधनोंका वर्णन आया है, उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण—शौच, आर्जव और अहिंसा तथा मानसिक तपके दो लक्षण—मौन और आत्मविनिग्रह आये हैं। ऐसे ही सोलहवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे श्लोकतक जो दैवी-सम्पत्तिके छब्बीस लक्षण बताये गये हैं, उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण—शौच, अहिंसा और आर्जव तथा वाचिक तपके दो लक्षण—सत्य और स्वाध्याय आये हैं। अतः ज्ञानके जिन साधनोंसे तत्त्वबोध हो जाय तथा दैवी-सम्पत्तिके जिन गुणोंसे मुक्ति हो जाय, वे लक्षण या गुण राजस-तामस नहीं हो सकते। इसलिये राजस और तामस तपमें शारीरिक, वाचिक और मानसिक—यह तीनों प्रकारका तप सांगोपांग नहीं लिया जा सकता। वहाँ तो ‘यत्-तत्’ पदोंसे आंशिक जितना-जितना आ सके, उतना-उतना ही लिया जा सकता है।

तीसरी बात, भगवद्गीताका आदिसे अन्ततक अध्ययन करनेपर यह असर पड़ता है कि इसका उद्देश्य केवल जीवका कल्याण करनेका है। कारण कि अर्जुनका जो प्रश्न

  • शरीर, वाणी और मनका तप सांगोपांग-रूपसे तभी सम्पन्न होता है, जब नाशवान् वस्तुओंसे सम्बन्ध-विच्छेदका उद्देश्य रहता है।

१०८६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

है, वह निश्चित श्रेय- (कल्याण-) का है (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। भगवान्ने भी उत्तरमें जितने साधन बताये हैं, वे 'सब जीवोंका निश्चित कल्याण हो जाय'—इस लक्ष्यको लेकर ही बताये हैं। इसलिये गीतामें जहाँ-कहीं सात्त्विक, राजस और तामस भेद किया गया है, वहाँ जो सात्त्विक विभाग है, वह ग्राह्य है; क्योंकि वह मुक्ति देनेवाला है—'दैवी सम्पद्भिर्भोक्षाय' और जो

राजस-तामस विभाग है, वह त्याज्य है; क्योंकि वह बाँधनेवाला है—'निबन्ध्यायसुरी मता'। इसी आशयसे भगवान् यहाँ सात्त्विक तपमें शारीरिक, वाचिक और मानसिक—इन तीनों तपोंका लक्ष्य करानेके लिये 'त्रिविधम्' पद देते हैं।

'सात्त्विकं परिचक्षते'—परम श्रद्धासे युक्त, फलको न चाहनेवाले मनुष्योंके द्वारा जो तप किया जाता है, वह सात्त्विक तप कहलाता है।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्वुवम् ॥ १८ ॥

यत्= जोदम्भेन= दिखानेकेचलम्= अनिश्चित
तपः= तपभावसे(और)
सत्कारमान-एव= भीअध्वुवम्= नाशवान् फल
पूजार्थम्= सत्कार, मानक्रियते= किया जाता है,देनेवाला (तप)
और पूजाके लियेतत्= वहराजसम्= राजस
= तथाइह= इस लोकमेंप्रोक्तम्= कहा गया है।

व्याख्या—'सत्कारमानपूजार्थं तपः क्रियते'— राजस मनुष्य सत्कार, मान और पूजाके लिये ही तप किया करते हैं; जैसे—हम जहाँ-कहीं जायेंगे, वहाँ हमें तपस्वी समझकर लोग हमारी अगबानीके लिये सामने आयेंगे। गाँवभरमें हमारी सवारी निकालेंगे। जगह-जगह लोग हमें उत्थान देंगे, हमें बैठनेके लिये आसन देंगे, हमारे नामका जयघोष करेंगे, हमसे मीठा बोलेंगे, हमें अभिनन्दनपत्र देंगे इत्यादि बाह्य क्रियाओंद्वारा हमारा 'सत्कार' करेंगे। लोग हृदयसे हमें श्रेष्ठ मानेंगे कि ये बड़े संयमी, सत्यवादी, अहिंसक सज्जन हैं, वे सामान्य मनुष्योंकी अपेक्षा हमारेमें विशेष भाव रखेंगे इत्यादि हृदयके भावोंसे लोग हमारा 'मान' करेंगे। जीते-जी लोग हमारे चरण धोयेंगे, हमारे मस्तकपर फूल चढ़ायेंगे, हमारे गलेमें माला पहनायेंगे, हमारी आरती उतारेंगे, हमें प्रणाम करेंगे, हमारी चरणरजको सिरपर चढ़ायेंगे और मरनेके बाद हमारी वैकुण्ठी निकालेंगे, हमारा स्मारक बनायेंगे और लोग उसपर श्रद्धा-भक्तिसे पत्र, पुष्प, चन्दन, वस्त्र, जल आदि चढ़ायेंगे, हमारे स्मारककी परिक्रमा करेंगे इत्यादि क्रियाओंसे हमारी 'पूजा' करेंगे।

'दम्भेन चैव यत्'—भीतरसे तपपर श्रद्धा और भाव न होनेपर भी बाहरसे केवल लोगोंको दिखानेके लिये आसन लगाकर बैठ जाना, माला घुमाने लग जाना, देवता

आदिका पूजन करने लग जाना, सीधे-सरल चलना, हिंसा न करना आदि।

'तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्वुवम्'—राजस तपका फल चल और अध्वुव कहा गया है। तात्पर्य है कि जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये किया जाता है, उस राजस तपका फल यहाँ 'चल' अर्थात् नाशवान् कहा गया है और जो तप केवल दिखावटीपनके लिये किया जाता है, उसका फल यहाँ 'अध्वुव' अर्थात् अनिश्चित (फल मिले या न मिले, दम्भ सिद्ध हो या न हो) कहा गया है।

'इह प्रोक्तम्' पदोंका तात्पर्य यह है कि इस राजस तपका इष्ट फल प्रायः यहाँ ही होता है। कारण कि सात्त्विक पुरुषोंका तो ऊर्ध्वलोक है, तामस मनुष्योंका अधोलोक है और राजस मनुष्योंका मध्यलोक है (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये राजस तपका फल न स्वर्ग होगा और न नरक होगा; किन्तु यहाँ ही महिमा होकर, प्रशंसा होकर खत्म हो जायगा।

राजस मनुष्यके द्वारा शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप हो सकता है क्या? फलेच्छा होनेसे वह देवता आदिका पूजन कर सकता है। उसमें कुछ सीधा-सरलपन भी रह सकता है। ब्रह्मचर्य रहना मुश्किल है। अहिंसा भी मुश्किल है। पुस्तक आदि पढ़ सकता है। उसका मन हरदम प्रसन्न

श्लोक १९-२० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८७

नहीं रह सकता और सौम्यभाव भी हरदम नहीं रह सकता। कामनाके कारण उसके मनमें संकल्प-विकल्प होते रहेंगे। वह केवल सत्कार, मान, पूजा और दम्भके लिये ही तप करता है, तो उसके भावकी संशुद्धि कैसे होगी अर्थात् उसके भाव शुद्ध कैसे होंगे? अतः राजस मनुष्य तीन प्रकारके तपको सांगोपांग नहीं कर सकता।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥ १९॥

यत् = जो, तपः = तप, मूढग्राहेण = मूढतापूर्वक हठसे, आत्मनः = अपनेको, पीडया = पीडा देकर, क्रियते = किया जाता है, वा = अथवा, परस्य = दूसरोंको, उत्सादनार्थम् = कष्ट देनेके लिये, तत् = वह (तप), तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या—'मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः'—तामस तपमें मूढतापूर्वक आग्रह होनेसे अपने-आपको पीडा देकर तप किया जाता है। तामस मनुष्योंमें मूढताकी प्रधानता रहती है; अतः जिसमें शरीरको, मनको कष्ट हो, उसीको वे तप मानते हैं। 'परस्योत्सादनार्थं वा'—अथवा वे दूसरोंके दुःख देनेके लिये तप करते हैं। उनका भाव रहता है कि शक्ति प्राप्त करनेके लिये तप (संयम आदि) करनेमें मुझे भले ही कष्ट सहना पड़े, पर दूसरोंको नष्ट-भ्रष्ट तो करना ही है। तामस मनुष्य दूसरोंको दुःख देनेके लिये उन तीन (कायिक, वाचिक और मानसिक) तपोंके आंशिक भागके सिवाय मनमाने ढंगसे उपवास करना, शीत-घामको सहना आदि तप भी कर सकता है। 'तत्तामसमुदाहृतम्'—तामस मनुष्यका उद्देश्य ही दूसरोंको कष्ट देनेका, उनका अनिष्ट करनेका रहता है। अतः ऐसे उद्देश्यसे किया गया तप तामस कहलाता है। [सात्त्विक मनुष्य फलकी इच्छा न रखकर परमश्रद्धासे तप करता है, इसलिये वास्तवमें वही मनुष्य कहलानेलायक है। राजस मनुष्य सत्कार, मान, पूजा तथा दम्भके लिये तप करता है, इसलिये वह मनुष्य कहलानेलायक नहीं है; क्योंकि सत्कार, मान आदि तो पशु-पक्षियोंको भी प्रिय लगते हैं और वे बेचारे दम्भ भी नहीं करते! तामस मनुष्य तो पशुओंसे भी नीचे हैं; क्योंकि पशु-पक्षी स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख तो नहीं देते, पर यह तामस मनुष्य तो स्वयं दुःख पाकर दूसरोंको दुःख देता है।]

परिशिष्ट भाव—'मूढग्राहेण' में तो शुद्ध तमोगुण है, पर 'परस्योत्सादनार्थम्' में रजोगुण मिला हुआ है। मूढता तमोगुण है और स्वार्थभाव, क्रोध आदि राजस हैं। क्रोध रजोगुणसे पैदा होकर तमोगुणमें चला जाता है—'क्रोधाद्भवति सम्मोहः' (गीता २।६३)।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस दानके लक्षण बताते हैं।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ २०॥

दातव्यम् = दान देना कर्तव्य है—इति = ऐसे भावसे, यत् = जो, दानम् = दान, देशे = देश, काले = काल, च = तथा, च = और, पात्रे = पात्रके प्राप्त होनेपर, अनुपकारिणे = अनुपकारीको अर्थात् निष्कामभावसे, दीयते = दिया जाता है, तत् = वह, दानम् = दान, सात्त्विकम् = सात्त्विक, स्मृतम् = कहा गया है।

१०८८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

व्याख्या—इस श्लोकमें दानके दो विभाग हैं—

(१) 'दातव्यमिति यद्दानं दीयते अनुपकारिणे' और

(२) 'देशे काले च पात्रे च।'

'दातव्यमिति ..... देशे काले च पात्रे च'— केवल देना ही मेरा कर्तव्य है। कारण कि मैंने वस्तुओंको स्वीकार किया है अर्थात् उन्हें अपना माना है। जिसने वस्तुओंको स्वीकार किया है, उसीपर देनेकी जिम्मेवारी होती है। अतः देनामात्र मेरा कर्तव्य है—इस भावसे दान करना चाहिये। उसका यहाँ क्या फल होगा और परलोकमें क्या फल होगा—यह भाव बिलकुल नहीं होना चाहिये। 'दातव्य' का तात्पर्य ही त्यागमें है।

अब किसको दिया जाय? तो कहते हैं—'दीयते-उनुपकारिणे' अर्थात् जिसने पहले कभी हमारा उपकार किया ही नहीं, अभी भी उपकार नहीं करता है और आगे हमारा उपकार करेगा, ऐसी सम्भावना भी नहीं है—ऐसे 'अनुपकारी' को निष्कामभावसे देना चाहिये। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिसने हमारा उपकार किया है, उसको न दे, प्रत्युत जिसने हमारा उपकार किया है, उसे देनेमें दान न माने। कारण कि केवल देनेमात्रसे सच्चे उपकारका बदला नहीं चुकाया जा सकता। अतः 'उपकारी' की भी अवश्य सेवा-सहायता करनी चाहिये, पर उसको दानमें भरती नहीं करना चाहिये। उपकारको आशा रखकर देनेसे वह दान राजसी हो जाता है।

'देशे काले च पात्रे च' पदोंके दो अर्थ होते हैं—(१) जिस देशमें जो चीज नहीं है और उस चीजकी आवश्यकता है, उस देशमें वह चीज देना; जिस समय जिस चीजकी आवश्यकता है, उस समय वह चीज देना; और

परिशिष्ट भाव—यह सात्त्विक दान वास्तवमें त्याग है। यह वह दान नहीं है, जिसके लिये कहा गया है—'एक गुना दान, सहस्रगुना पुण्य'; क्योंकि उस दानसे (सहस्रके साथ) सम्बन्ध जुड़ता है। परन्तु त्यागसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। दानके बदलेमें कुछ पानेकी कामना करनेसे वह राजस हो जाता है—'यत्तु प्रत्युपकारार्थम्' (गीता १७।२१)। इस राजसभावका निषेध करनेके लिये यहाँ 'अनुपकारिणे' पद आया है।

गीतामें वर्णित सात्त्विक गुण त्यागकी तरफ जाता है, इसलिये इसको भगवान्ने 'अनामय' कहा है (चौदहवें अध्यायका छठा श्लोक)। सत्त्वगुण सम्बन्ध-विच्छेद (त्याग) करता है, रजोगुण सम्बन्ध जोड़ता है और तमोगुण मूढ़ता लाता है।

१-यहाँ देश, काल और पात्र—तीनोंमें 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इस सूत्रसे सप्तमी की गयी है।

२-सुपात्रदानाच्च भवेद्ब्रह्मादयो धनप्रभावेण करोति पुण्यम्।

पुण्यप्रभावात्पुरलोकवासी पुनर्धनादयः पुनरेव भोगी॥

कुपात्रदानाच्च भवेहरिद्रो दारिद्र्यदोषेण करोति पापम्।

पापप्रभावान्नरकं प्रयाति पुनर्दिरिः पुनरेव पापी॥

जिसके पास जो चीज नहीं है और उसकी आवश्यकता है, उस अभावग्रस्तको वह चीज देना।

(२) गंगा, यमुना, गोदावरी आदि नदियाँ और कुरुक्षेत्र, प्रयागराज, काशी आदि पवित्र देश प्राप्त होनेपर दान देना; अमावस्या, पूर्णिमा, व्यतिपात, अक्षय तृतीया, संक्रान्ति आदि पवित्र काल प्राप्त होनेपर दान देना; और वेदपाठी ब्राह्मण, सदगुणी-सदाचारी भिक्षुक आदि उत्तम पात्र प्राप्त होनेपर दान देना।

'देशे काले च पात्रे च' पदोंसे उपर्युक्त दोनों ही अर्थ लेने चाहिये।

'तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्'—ऐसा दिया हुआ दान सात्त्विक कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण सृष्टिकी जितनी चीजें हैं, वे सबकी हैं और सबके लिये हैं, अपनी व्यक्तिगत नहीं हैं। इसलिये अनुपकारी व्यक्तिको भी जिस चीज—वस्तुकी आवश्यकता हो, वह चीज उसीकी समझकर उसको देनी चाहिये। जिसके पास वह वस्तु पहुँचेगी, वह उसीका हक है; क्योंकि यदि उसकी वस्तु नहीं है, तो दूसरा व्यक्ति चाहते हुए भी उसे वह वस्तु दे सकेगा नहीं। इसलिये पहलेसे यह समझे कि उसकी ही वस्तु उसको देनी है, अपनी वस्तु (अपनी मानकर) उसको नहीं देनी है। तात्पर्य यह है कि जो वस्तु अपनी नहीं है और अपने पास है अर्थात् उसको हमने अपनी मान रखी है, उस वस्तुको अपनी न माननेके लिये उसकी समझकर उसीको देनी है।

इस प्रकार जिस दानको देनेसे वस्तु, फल और क्रियाके साथ अपना सम्बन्ध-विच्छेद होता है, वह दान सात्त्विक कहा जाता है।

श्लोक २१-२२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०८९

गीताके अनुसार दूसरेके हितके लिये कर्म करना 'यज्ञ' है, हरदम प्रसन्न रहना 'तप' है और उसकी चीज उसीको दे देना 'दान' है। स्वार्थबुद्धिपूर्वक अपने लिये यज्ञ-तप-दान करना आसुरी अथवा राक्षसी स्वभाव है।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।

दीयते च परिकिलष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥

तु= किन्तुवा= अथवातत्= वह
यत्= जो (दान)फलम्= फल-प्राप्तिकादानम्= दान
परिकिलष्टम्= क्लेशपूर्वकउद्दिश्य= उद्देश्य बनाकरराजसम्= राजस
= औरपुनः= फिरस्मृतम्= कहा
प्रत्युपकारार्थम्= प्रत्युपकारके लियेदीयते= दिया जाता है,जाता है ।

व्याख्या—'यत्तु प्रत्युपकारार्थम्' —राजस दान प्रत्युपकारके लिये दिया जाता है; जैसे—राजस पुरुष किसी विशेष अवसरपर दानकी चीजोंको गिन करके निकालता है, तो वह विचार करता है कि हमारे सगे-सम्बन्धीके जो कुल-पुरोहित हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे कि हमारे सगे-सम्बन्धी हमारे कुल-पुरोहितको दान करें और इस प्रकार हमारे कुल-पुरोहितके पास धन आ जायगा। अमुक पण्डितजी बड़े अच्छे हैं और ज्योतिष भी जानते हैं, उनको हम दान करेंगे, जिससे वे कभी यात्राका, पुत्रोंका तथा कन्याओंके विवाहका, नया मकान बनवानेका, कुओं खुदवानेका मुहूर्त निकाल देंगे। हमारे सम्बन्धी हैं अथवा हमारा हित करनेवाले हैं, उनको हम सहायतारूपमें पैसे देंगे, तो वे कभी हमारी सहायता करेंगे, हमारा हित करेंगे। हमें दवाई देनेवाले जो पण्डितजी हैं; उनको हम दान करेंगे; क्योंकि दानसे राजी होकर वे हमें अच्छी-अच्छी दवाईयाँ देंगे, आदि-आदि। इस प्रकार प्रतिफलकी भावना रखकर अर्थात् इस लोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, वह 'प्रत्युपकारार्थ' कहा जाता है।

'फलमुद्दिश्य वा पुनः' —फलका उद्देश्य रखकर अर्थात् परलोकके साथ सम्बन्ध जोड़कर जो दान किया जाता है, उसमें भी राजस मनुष्य देश (गंगा, यमुना, कुरुक्षेत्र आदि), काल (अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण आदि) और पात्र (वेदपात्री ब्राह्मण आदि)—को देखेगा तथा शास्त्रीय

विधि-विधानको देखेगा; परन्तु इस प्रकार विचारपूर्वक दान करनेपर भी फलकी कामना होनेसे वह दान राजस हो जाता है। अब उसके लिये दूसरे विधि-विधानका वर्णन करनेकी भगवान्ने आवश्यकता नहीं समझी, इसलिये राजस दानमें 'देशे काले च पात्रे' पदोंका प्रयोग नहीं किया।

यहाँ 'पुनः' पद कहनेका तात्पर्य है कि जिससे कुछ उपकार पाया है अथवा जिससे भविष्यमें कुछ-न-कुछ मिलनेकी सम्भावना है, उसका विचार राजस पुरुष पहले करता है, फिर पीछे दान देता है।

'दीयते च परिकिलष्टम्' —राजस दान बहुत क्लेशपूर्वक दिया जाता है; जैसे—वक्त आ गया है, इसलिये देना पड़ रहा है। इतनी चीजें देंगे तो इतनी चीजें कम हो जायँगी। इतना धन देंगे तो इतना धन कम हो जायगा। वे समयपर हमारे काम आते हैं, इसलिये उनको देना पड़ रहा है। इतनेमें ही काम चल जाय तो बहुत अच्छी बात है। इतनेसे काम तो चल ही जायगा, फिर ज्यादा क्यों दें? ज्यादा देंगे तो और कहाँसे लायेंगे? और ज्यादा देनेसे लेनेवालेका स्वभाव बिगड़ जायगा। ज्यादा देनेसे हमारेको घाटा लग जायेगा, तो काम कैसे चलेगा? पर इतना तो देना ही पड़ रहा है, आदि-आदि। इस प्रकार राजस मनुष्य दान तो थोड़ा-सा देते हैं, पर कसाकसी करके देते हैं।

'तद्दानं राजसं स्मृतम्' —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला दान राजस कहा गया है।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

१०९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

यत्= जोअवज्ञातम्= अवज्ञापूर्वकदीयते= दिया जाता है,
दानम्= दानअदेशकाले= अयोग्य देश औरतत्= वह (दान)
असक्ततम्= बिना सत्कारकेकालमेंतामसम्= तामस
= तथाअपात्रेभ्यः= कुपात्रकोउदाहतम्= कहा गया है।

व्याख्या—‘असक्ततमवज्ञातम्’ —तामस दान असत्कार और अवज्ञापूर्वक दिया जाता है; जैसे—तामस मनुष्यके पास कभी दान लेनेके लिये ब्राह्मण आ जाय, तो वह तिरस्कारपूर्वक उसको उलाहना देगा कि देखो पण्डितजी! जब हमारी माताका शरीर शान्त हुआ, तब भी आप नहीं आये; परन्तु क्या करें; आप हमारे घरके गुरु हो इसलिये हमें देना ही पड़ता है! इतनेमें ही घरका दूसरा आदमी बोल पड़ता है कि तुम क्यों ब्राह्मणोंके झंडटमें पड़ते हो? किसी गरीबको दे दो। जिसको कोई नहीं देता, उसको देना चाहिये। वास्तवमें वही दान है। ब्राह्मणको तो और कोई भी दे देगा, पर बेचारे गरीबको कौन देगा? पण्डितजी क्या आ गया, यह तो कुत्ता आ गया; टुकड़ा डाल दो, नहीं तो भौंकेंगा आदि—आदि। इस प्रकार शास्त्रविधिका, ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेके कारण यह दान तामस कहलाता है।

‘अदेशकाले यदानम्’ —मुद्दताके कारण तामस मनुष्यको अपने मनकी बातें ही जँचती हैं; जैसे—दान करनेके लिये देश—कालकी क्या जरूरत है? जब चाहे, तब कर दिया। जब किसी विशेष देश और कालमें ही पुण्य होगा, तो क्या यहाँ पुण्य नहीं होगा? इसके लिये अमुक समय आयेगा, अमुक पर्व आयेगा—इसकी क्या आवश्यकता? अपनी चीज खर्च करनी है, चाहे कभी दो, आदि—आदि। इस प्रकार तामस मनुष्य शास्त्रविधिका अनादर, तिरस्कार करके दान करते हैं। कारण कि उनके हृदयमें शास्त्रविधिका महत्त्व नहीं होता, प्रत्युत रूपयोंका महत्त्व होता है।

‘अपात्रेभ्यश्च दीयते’ —तामस दान अपात्रको किया जाता है। तामस मनुष्य कई प्रकारके तर्क—वितर्क करके पात्रका विचार नहीं करते; जैसे—शास्त्रोंमें देश, काल और पात्रकी बातें यों ही लिखी गयी हैं; कोई यहाँ दान लेगा तो क्या यहाँ उसका पेट नहीं भरेगा? तृप्ति नहीं होगी? जब पात्रको देनेसे पुण्य होता है, तो इनको देनेसे क्या पुण्य नहीं होगा? क्या ये आदमी नहीं हैं? क्या इनको देनेसे पाप लगेगा? अपनी जीविका चलानेके लिये, अपना मतलब सिद्ध करनेके लिये ही ब्राह्मणोंने शास्त्रोंमें ऐसा लिख दिया है, आदि—आदि।

‘ततामसमुदाहतम्’ —उपर्युक्त प्रकारसे दिया जानेवाला

दान तामस कहा गया है।

शंका— गीतामें तामस—कर्मका फल अधोगति बताया है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः ’ (१४।१८) और रामचरितमानसमें बताया है कि जिस—किसी प्रकारसे भी दिया हुआ दान कल्याण करता है—

‘जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥’

(मानस ७।१०३ ख)

इन दोनोंमें विरोध आता है?

समाधान— तामस मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं—यह कानून दानके विषयमें लागू नहीं होता। कारण कि धर्मके चार चरण हैं—‘सत्यं दया तपो दानमिति ’ (श्रीमद्भा० १२।३।१८)। इन चारों चरणोंमेंसे कलियुगमें एक ही चरण ‘दान’ है—‘दानमेकं कलौ युगे ’ (मनुस्मृति १।८६)। इसलिये गोस्वामीजी महाराजने कहा—

प्रगत चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्याण॥

(मानस ७।१०३ ख)

ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि किसी प्रकार भी दान दिया जाय, उसमें वस्तु आदिके साथ अपनेपनका त्याग करना ही पड़ता है। इस दृष्टिसे तामस दानमें भी आंशिक त्याग होनेसे दान देनेवाला अधोगतिके योग्य नहीं हो सकता।

दूसरी बात, इस कलियुगके समय मनुष्योंका अन्तःकरण बहुत मलिन हो रहा है। इसलिये कलियुगमें एक छूट है कि जिस—किसी प्रकार भी किया हुआ दान कल्याण करता है। इससे मनुष्यका दान करनेका स्वभाव तो बन ही जायगा, जो आगे कभी किसी जन्ममें कल्याण भी कर सकता है। परन्तु दानकी क्रिया ही बन्द हो जायगी, तो फिर देनेका स्वभाव बननेका कोई अवसर ही प्राप्त नहीं होगा। इसी दृष्टिसे एक संतने ‘श्रद्धया देयमश्रद्धयादेयम् ’ (तैत्तिरीयो० १।११) —इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए कहा था कि इसमें पहले पदका अर्थ तो यह है कि श्रद्धासे देना चाहिये, पर दूसरे पदका अर्थ ‘अश्रद्धया अदेयम् ’ (अश्रद्धासे नहीं देना चाहिये) —ऐसा न लेकर ‘अश्रद्धया देयम् ’ (श्रद्धा न हो, तो भी देना चाहिये) —इस प्रकार लेना चाहिये।

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०११

दान-सम्बन्धी विशेष बात

अन्न, जल, वस्त्र और औषध—इन चारोंके दानमें पात्र-कुपात्र आदिका विशेष विचार नहीं करना चाहिये। इनमें केवल दूसरेको आवश्यकताको ही देखना चाहिये। इसमें भी देश, काल, और पात्र मिल जाय, तो उत्तम बात और न मिले, तो कोई बात नहीं। हमें तो जो भूखा है, उसे अन्न देना है; जो प्यासा है, उसे जल देना है; जो वस्त्रहीन है, उसे वस्त्र देना है और जो रोगी है, उसे औषध देनी है। इसी प्रकार कोई किसीको अनुचितरूपसे भयभीत कर रहा है, दुःख दे रहा है, तो उससे उसको छुड़ाना और उसे अभयदान देना हमारा कर्तव्य है।

हाँ, कुपात्रको अन्न-जल इतना नहीं देना चाहिये कि जिससे वह पुनः हिंसा आदि पापोंमें प्रवृत्त हो जाय; जैसे कोई हिंसक मनुष्य अन्न-जलके बिना मर रहा है, तो उसको उतना ही अन्न-जल दे कि जिससे उसके प्राण रह जायँ, वह जी जाय। इस प्रकार उपर्युक्त चारोंके दानमें पात्रता नहीं देखनी है, प्रत्युत आवश्यकता देखनी है।

भगवान्का भक्त भी वस्तु देनेमें पात्र नहीं देखता, वह तो दिये जाता है; क्योंकि वह सबमें अपने प्यारे प्रभुको ही देखता है कि इस रूपमें तो हमारे प्रभु ही आये हैं। अतः वह दान नहीं करता, कर्तव्य-पालन नहीं करता, प्रत्युत पूजा करता है—‘स्वकर्माणा तमभ्यच्च’ (गीता १८।४६)। तात्पर्य यह है कि भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाओंका सम्बन्ध भगवान्के साथ होता है।

कर्मफल-सम्बन्धी विशेष बात

ग्यारहवेंसे बाईसवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें जो सात्त्विक यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘दैवी-सम्पत्ति’ हैं और जो राजस तथा तामस यज्ञ, तप और दान आये हैं, वे सब-के-सब ‘आसुरी-सम्पत्ति’ हैं।

१-राजसके दृष्टका कालान्तरिक फल और अदृष्टका लौकिक फल—दोनों एक-जैसे दीखते हुए भी इनमें अन्तर है; जैसे—भोजनके परिणामस्वरूप जो रोग आदि होंगे, वह भौतिक (कालान्तरिक) फल है अर्थात् वह सीधे भोजनका ही परिणाम है और पुत्रेष्टि यज्ञ आदिका जो फल होगा, वह आधिदैविक (लौकिक) फल है अर्थात् वह प्रारब्ध बनकर फल (पुत्रादि)-के रूपमें आता है।

२-यदि राजस पुरुषोंका दम्भ (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ और अठारहवाँ श्लोक) अधिक बढ़ जाय, तो वे नरकोंमें भी जा सकते हैं।

३-स्वर्गमें भी यज्ञ आदि पुण्यकर्मोंके अनुसार उच्च, मध्यम और कनिष्ठ—ऐसी तीन तरहकी श्रेणियाँ होती हैं। उनमें भी उच्च श्रेणीवाले जब अपने समान श्रेणीवालोंको देखते हैं, तब उन्हें ईर्ष्या होती है कि वे हमारे समान पदपर क्यों आये?

आसुरी सम्पत्तिमें आये हुए ‘राजस’ यज्ञ, तप और दानके फलके दो विभाग हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमें भी दृष्टके दो फल हैं—तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे—राजस भोजनके बाद तृप्तिका होना तात्कालिक फल है और रोग आदिका होना कालान्तरिक फल है। ऐसे ही अदृष्टके भी दो फल हैं—लौकिक और पारलौकिक। जैसे—दम्भपूर्वक ‘दम्भार्थमपि चैव यत्’ (१७।१२), सत्कार-मान-पूजाके लिये ‘सत्कारमानपूजार्थम्’ (१७।१८) और प्रत्युपकारके लिये ‘प्रत्युपकारार्थम्’ (१७।२१) किये गये राजस यज्ञ, तप और दानका फल ‘लौकिक’ है और वह इसी लोकमें, इसी जन्ममें, इसी शरीरके रहते-रहते ही मिलनेकी सम्भावनावाला होता है। स्वर्गको ही परम प्राप्य वस्तु मानकर उसकी प्राप्तिके लिये किये गये यज्ञ आदिका फल ‘पारलौकिक’ होता है। परन्तु राजस यज्ञ ‘अभिधन्धाय तु फलम्’ (१७।१२) और दान ‘फलमुदिश्य वा पुनः’ (१७।२१) का फल लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों ही हो सकता है। इसमें भी स्वर्ग-प्राप्तिके लिये यज्ञ आदि करनेवाले (दूसरे अध्यायका बयालीसवाँ-तैतालीसवाँ और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक) और केवल दम्भ, सत्कार, मान, पूजा, प्रत्युपकार आदिके लिये यज्ञ, तप और दान करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक) दोनों प्रकारके राजस पुरुष जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं। परन्तु तामस यज्ञ और तप करनेवाले (सत्रहवें अध्यायका तेरहवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक) तामस पुरुष तो अधोगतिमें जाते हैं—‘अधोगच्छन्ति तामसाः’ (१४।१८), ‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ (१६।१६), ‘आसुरीष्वेव योनिषु’ (१६।१९) ‘ततो यान्यधर्मा गतिम्’ (१६।२०)।

जो मनुष्य यज्ञ करके स्वर्गमें जाते हैं, उनको स्वर्गमें भी दुःख, जलन, ईर्ष्या आदि होते हैं। जैसे—शतक्रतु

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १७ ]

इन्द्रको भी असुरोंके अत्याचारोंसे दुःख होता है, कोई तपस्या करे तो उसके हृदयमें जलन होती है, वह भयभीत होता है। इसे पूर्वजन्मके पापोंका फल भी नहीं कह सकते; क्योंकि उनके स्वर्गप्राप्तिके प्रतिबन्धकरूप पाप नष्ट हो जाते हैं—‘पूतपापाः’ (९।२०) और वे यज्ञके पुण्योंसे स्वर्गलोकको जाते हैं। फिर उनको दुःख, जलन, भय आदिका होना किन पापोंका फल है? इसका उत्तर यह है कि यह सब यज्ञमें की हुई पशु-हिंसाके पापका ही फल है।

दूसरी बात, यज्ञ आदि सकामकर्म करनेसे अनेक तरहके दोष आते हैं। गीतामें आया है—‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः’ (१८।४८) अर्थात् धूपोंसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। जब सभी कर्मोंके आरम्भमात्रमें भी दोष रहता है, तब सकामकर्मोंमें तो (सकामभाव होनेसे) दोषोंकी सम्भावना ज्यादा ही होती है और उनमें अनेक तरहके दोष बनते ही हैं। इसलिये शास्त्रोंमें यज्ञ करनेके बाद प्रायश्चित्त करनेका विधान है। प्रायश्चित्त-विधानसे यह सिद्ध होता है कि यज्ञमें दोष (पाप) अवश्य होते हैं। अगर दोष न होते, तो प्रायश्चित्त किस बातका? परन्तु वास्तवमें प्रायश्चित्त करनेपर भी सब दोष दूर नहीं होते, उनका कुछ अंश रह जाता है; जैसे—मैल लगे वस्त्रको साबुनसे धोनेपर भी उसके तन्तुओंके भीतर थोड़ी मैल रह जाती है। इसी कारण इन्द्रादिक देवताओंको भी प्रतिकूल-परिस्थितिजन्य दुःख

परिशिष्ट भाव —शास्त्रमें आया है कि कलियुगमें दान ही एकमात्र धर्म है; अतः जिस-किसी प्रकारसे भी दान दिया जाय, वह कल्याण ही करता है। इसका तात्पर्य है कि कलियुगमें यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि शुभकर्म विधिपूर्वक करने कठिन हैं; अतः किसी तरहसे देनेकी, त्याग करनेकी आदत पड़ जाय। इसलिये जिस-किसी प्रकारसे भी दान देते रहना चाहिये।

और मध्यम तथा कनिष्ठ श्रेणीवालोंको देखकर उनके मनमें अभिमान होता है कि हम कितने बड़े हैं!

मध्यम श्रेणीवाले जब अपनेसे उच्च श्रेणीवालोंको देखते हैं, तो उनकी भोग-सामग्री, पद, अधिकार आदिको देखकर उन्हें जलन होती है और कनिष्ठ श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान होता है।

कनिष्ठ श्रेणीवालोंमें उच्च और मध्यम श्रेणीवालोंको देखकर असहिष्णुता होती है, जलन होती है कि उनके पास इतनी भोग-सामग्री क्यों है? वे इतने ऊँचे पद-अधिकारपर क्यों गये हैं? और अपने समान श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि वे हमारे समान कैसे आकर बैठे हैं, तथा जो स्वर्गमें नहीं आये हैं, उनको देखकर अभिमान होता है कि हम कितने उच्च स्थान—स्वर्गमें हैं!

स्वर्गमें जो स्थिति है, वह भी तो नित्य नहीं है; क्योंकि किसी भी श्रेणीवाले क्यों न हों, पुण्य क्षीण हो जानेपर उनको भी मृत्युलोकमें आना पड़ता है—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशिन्ति’ (गीता ९।२१) और इसकी चिन्ता, इसका भय सदा बना रहता है कि यह स्थिति हमारी रहेगी नहीं, एक दिन चली जायगी।

  • दूसरोंकी उन्नति सही न जाय, ईर्ष्या हो जाय आदि जितने भी दोष हैं, वे पूर्वकृत कर्मोंके फल नहीं हैं। वे सब दोष अन्तःकरणकी अशुद्धिके कारण ही होते हैं। शास्त्रविहित सकाम कर्मोंको करनेसे अन्तःकरणकी सर्वथा शुद्धि नहीं होती, प्रत्युत आंशिक शुद्धि होती है, जिससे स्वर्गादि लोकोंके भोगोंको भोगते हैं। अन्तःकरणकी अशुद्धि सर्वथा तभी मिटती है, जब उद्देश्य केवल भगवान्का ही हो।

भोगना पड़ता है।

वास्तवमें दोषोंकी पूर्ण निवृत्ति तो निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करके उन कर्मोंको भगवान्के अर्पण कर देनेसे ही होती है। इसलिये निष्कामभावसहित किये गये कर्म ही श्रेष्ठ हैं। सबसे बड़ी शुद्धि (दोष-निवृत्ति) होती है—‘मैं तो केवल भगवान्का ही हूँ’, इस प्रकार अहंता-परिवर्तनपूर्वक भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य बनानेसे। इससे जितनी शुद्धि होती है, उतनी कर्मोंसे नहीं होती*। भगवान्ने कहा है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अध नासहिं तबहीं॥

(मानस ५।४४।१)

तीसरी बात, गीतामें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों करता है? तो उत्तरमें भगवान्ने कहा—‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः’ (३।३७)। तात्पर्य है कि रजोगुणसे उत्पन्न कामना ही पाप कराती है। इसलिये कामनाको लेकर किये जानेवाले राजस यज्ञकी क्रियाओंमें पाप हो सकते हैं।

राजस तथा तामस यज्ञ आदि करनेवाले आसुरी-सम्पत्तिवाले हैं और सात्त्विक यज्ञ आदि करनेवाले दैवी-सम्पत्तिवाले हैं; परन्तु दैवी-सम्पत्तिके गुणोंमें भी यदि ‘राग’ हो जाता है, तो रजोगुणका धर्म होनेसे वह राग भी बन्धनकारक हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका छठा श्लोक)।

श्लोक २३-२४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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सम्बन्ध-सोलहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें दैवी-सम्पत्ति मोक्षके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये बतायी है। दैवी-सम्पत्तिको धारण करनेवाले सात्त्विक मनुष्य परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो यज्ञ, तप और दानरूप कर्म करते हैं, उन कर्मोंमें होनेवाली (भाव, विधि, क्रिया आदिकी) कमीकी पूर्तिके लिये क्या करना चाहिये? इसे बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥

ॐ = ॐ, तत् = तत्, सत् = सत्—, इति = इन, त्रिविधः = तीन प्रकारके नामोंसे, ब्रह्मणः = (जिस) परमात्माका, निर्देशः = निर्देश (संकेत) किया गया है, स्मृतः = किया गया है, तेन = उसी परमात्मासे, पुरा = सृष्टिके आदिमें, वेदाः = वेदों, च = तथा, ब्राह्मणाः = ब्राह्मणों, च = और, यज्ञाः = यज्ञोंकी, विहिताः = रचना हुई है।

व्याख्या-'ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः'—ॐ, तत् और सत्—यह तीन प्रकारका परमात्माका निर्देश है अर्थात् परमात्माके तीन नाम हैं (इन तीनों नामोंकी व्याख्या भगवान्ने आगेके चार श्लोकोंमें की है)। 'ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा'—उस परमात्माने पहले (सृष्टिके आरम्भमें) वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंको बनाया। इन तीनोंमें विधि बतानेवाले वेद हैं, अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मण हैं और क्रिया करनेके लिये यज्ञ हैं। अब इनमें यज्ञ, तप, दान आदिकी क्रियाओंमें कोई कमी रह जाय, तो क्या करें? परमात्माका नाम लें तो उस कमीकी पूर्ति हो जायगी। जैसे रसोई बनानेवाला जलसे आटा सानता (गूँधता) है, तो कभी उसमें जल अधिक पड़ जाय, तो वह क्या करता है? आटा और मिला लेता है। ऐसे ही कोई निष्कामभावसे यज्ञ, दान आदि शुभकर्म करे और उनमें कोई कमी-अंग-वैगुण्य रह जाय, तो जिस भगवान्से यज्ञ आदि रचे गये हैं, उस भगवान्का नाम लेनेसे वह अंग-वैगुण्य ठीक हो जाता है, उसकी पूर्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव-'महानिर्वाणतन्त्र' में आया है— ॐ तत्सदिति मन्त्रेण यो यत्कर्म समाचरेत्। गृहस्थो वाप्युदासीनस्तस्याभीष्टाय तद् भवेत्॥ जपो होमः प्रतिष्ठा च संस्काराद्यखिलाः क्रियाः। ॐ तत्समन्त्रनिष्पन्नाः सम्पूर्णाः स्युर्न संशयः॥ (१४। १५४-१५५) 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे गृहस्थ अथवा उदासीन (साधु) जो भी कर्म आरम्भ करता है, उसको इससे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ 'ॐ तत् सत्'—इस मन्त्रसे सफल हो जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥

तस्मात् = इसलिये, ब्रह्मवादिनाम् = वैदिक सिद्धान्तोंको माननेवाले पुरुषोंकी, विधानोक्ताः = शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञदानतपःक्रियाः = यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ, सततं = सदा, ओम् = 'ॐ', इति = इस परमात्माके नामका, उदाहृत्य = उच्चारण करके (ही), प्रवर्तन्ते = आरम्भ होती हैं।