श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
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जैसे, विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं, तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्राह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारा-पीटा, पर वे मेरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदर-सत्कार किया और कहा कि 'महाराज! इसने ब्राह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा, पर यह मरा नहीं।' भगवान् रामने कहा कि 'हे ब्राह्मणो! विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है, वह कैसे मारा जा सकता है! और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है? वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें।' भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्चर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली।
तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस अपनेपनके समान योग्यता, पात्रता, अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटा-सा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये।
'मा शुचः' का तात्पर्य है—
१-वर्मं मयैव मरणं मद्भक्तो हयते कथम्। राज्यमायुर्मया दत्तं तथैव स भविष्यति॥ भूत्पापराधे सर्वत्र स्वामिनो दण्ड इष्यते। रामवाक्यं द्विजाः श्रुत्वा विस्मयादिदमबुवन्॥
(पद्मपुराण, पाताल० १०४। १५०-१५१)
२-कौरवोंकी सभामें द्रौपदीका चीर खींचा गया तो द्रौपदी अपनी साड़ीको हाथोंसे, दांतोंसे पकड़ती है और भगवान्को पुकारती है। अपने बलका आश्रय रखते हुए भगवान्को पुकारनेसे भगवान्के आनेमें देरी लगती है। परन्तु जब द्रौपदी अपना उद्योग सर्वथा छोड़कर भगवान्पर ही निर्भर हो जाती है, तब दुःशासन चीरको खींच-खींचकर थक जाता है और चीरोंका ढेर लग जाता है, पर द्रौपदीका कोई भी अंग उघड़ता नहीं।
(१) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है, यह मेरे प्रति अपराध है, तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कर्लक है।
मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास, भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है; क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ, अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे, छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है, चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है, प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय हैं और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी? लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त है और चिन्ता करता है! भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते! तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कर्लक आता है मेरेपर, मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे।
(२) तेरे भाव, वृत्तियाँ, आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा।
(३) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धन-धान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है; क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है, यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
(४) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोक-परलोक, सद्गत-दुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है—
दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।
अवधीरितशरदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥
‘हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें, चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें, वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें, वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद्-ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्यु-जैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ; आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।’
शरणागति-सम्बन्धी विशेष बात
शरणागत भक्त ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है, स्वीकार कर लेता है तो उसके भय, शोक, चिन्ता, शंका आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखातापर ही टिके रहते हैं।
भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं, जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।
सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है? भय, शोक, चिन्ता, शंका, परीक्षा और विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।
(१) निर्भय होना —आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे
भय पैदा होता है और साँप, बिच्छू, बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं, पतंजलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है और जो बड़े-बड़े विद्वानोंको भी होता है, वह भय भी सर्वथा मिट जाता है।
अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी!—ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये; क्योंकि ‘मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ, अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका; क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है—‘ममता मल जरि जाड् ’ (मानस ७।११७ क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका? अब तो केवल भगवान्की कृपा-ही-कृपा है! भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है! यह बड़ी खुशीकी, बड़ी प्रसन्नताकी बात है।’
कई ऐसी शंका करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त—ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है—‘द्वितीयद्वै भयं भवति ’ (बृहदारण्यक १।४।२)। पर यह शंका निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है, पर आत्मीयसे भय नहीं होता अर्थात् भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर-संसार द्वितीय है, इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है; क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्न-भिन्न है; जैसे एक जड़ है और एक चेतन, एक विकारी है और एक निर्विकारी, एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील, एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक, इत्यादि।
१-भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर जब संसार-शरीरका आश्रय सर्वथा नहीं रहता, तब जीनेकी आशा, मरनेका भय, करनेका राग और पानेका लालच—ये चारों ही नहीं रहते।
२-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (योगदर्शन २।३)
३-स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः। (योगदर्शन २।९)
४-तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धम् प्रभो॥
(श्रीमद्भा १०।२।२३३)
‘भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकते।’
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
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भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं; क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है, उनका स्वरूप है। अतः भगवान् के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है? प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है, पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है; क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान् का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है, पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं है।
(२) निःशोक होना —जो बात बीत चुकी है, उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है; क्योंकि जो हुआ है, वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है, वह ठीक-ठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है, फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है। प्रभुके इस मंगलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है; शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।
(३) निश्चिन्त होना —जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान् के समर्पित कर देता है, तब उसको लौकिक-पारलौकिक किंचिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कहाँ रहना होगा? मेरी क्या दशा होगी? क्या गति होगी? आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं।
भगवान् के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि 'अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी? अर्थात् नहीं आयी; क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं।' वास्तवमें 'मेरी वृत्तियाँ हैं' ऐसा मानना ही दोष है, वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिमें जो मेरापन है—यही गलती है; क्योंकि जब मैं भगवान् के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया, तो फिर मन, बुद्धि आदि मेरे कहाँ रहे? इसलिये शरणागतको मन, बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं
हैं—ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसे 'हे मेरे नाथ! हे मेरे प्रभो! बचाओ! बचाओ!! बचाओ!!!' ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये; क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं, मेरे सर्वसमर्थ प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ? और भगवान्ने भी कह दिया है कि 'तू चिन्ता मत कर' (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान् के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे—'हे नाथ! यह सब आपके हाथकी बात है, आप जानें।'
सर्वसमर्थ प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें—ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं; क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी? और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी? इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब भगवान् यह कहते हैं कि 'मैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा', तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा? मैं तो बस, आपका हूँ। हे भगवान्! मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ! शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि—ये कभी मेरे दीखें ही नहीं। परन्तु हे नाथ! सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभी-कभी मेरे दीख जाते हैं; अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये—ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।
(४) निःशंक होना —भगवान् के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान् का हुआ या नहीं? भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं? प्रत्युत इस बातको देखे कि 'मैं तो अनादिकालसे भगवान् का ही था, भगवान् का ही हूँ और आगे भी सदा भगवान् का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग—विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ, तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ?' क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है—'मम एव अंशः ' (गीता १५।७)। इस प्रकार 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शंकाएँ—सन्देह मिट जाते हैं, शंकाओं—सन्देहोंके लिये किंचिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।
१-(१) राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करे अन्यथा अस नहिं कोई॥ (मानस १।१२८।१)
(२) होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावे साखा॥ (मानस १।५२।४)
२-चिन्ता दीनदयालको, मो मन सदा अनन्द। जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोविन्द॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
(५) परीक्षा न करना —भगवान् के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसे-ऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसे-ऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान् के शरण कहाँ हुआ?' प्रत्युत 'अद्वैष्टा ' आदि (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी!* ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी, मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वैष्टा आदि गुण जितने कम थे, उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं, वे सब बिना प्रयत्न किये आते हैं।
(६) विपरीत धारणा न करना —भगवान् के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है कि 'मैं भगवान् का नहीं हूँ'; क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान् का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है, वह अटूट है, अखण्ड है, नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया, यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी, तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती है?
जो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिकी स्वीकार कर लेता है, उसमें भय, शोक, चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है; जैसे—
- इसे समझनेके लिये एक ग्रामीण कहानी है। एक माँके तीन लड़के थे। दो लड़के बड़े थे और काम-धंधा करते थे। तीसरा लड़का सीधा-सादा और भोला था। उनकी माँ मर गयी। दोनों बड़े भाइयोंने छोटे भाईसे कहा कि माँके फूल (अस्थियाँ) गंगाजीमें डाल दे, इतना काम तू कर दे। उसने कहा—'बहुत ठीक है।' वह माँके फूल लेकर अपने घरसे चला। घरसे गंगाजी ३०० कोस दूर थीं। पैदल रास्ता चलते-चलते वह थक गया तो किसीसे पूछा—'भैया! गंगाजी कितनी दूर हैं?' वह बोला—'तुम तो १५० कोस आये हो, अभी १५० कोस गंगाजी और आगे हैं। उसने सोचा कि गंगाजी कब पहुँचूँगा और फिर लौटकर कब आऊँगा! ऐसे दुःखी होकर उसने वे हड्डियाँ जंगलमें ही फेंक दीं और गाँवके पाससे वर्षाका मीठा जल बर्तनमें भर लिया; क्योंकि गंगाजी जाते हैं तो लौटते समय गंगाजल लाते हैं। फिर वह वहाँसे पीछे चला आया और अपने गाँव पहुँच गया। बड़े भाई सोचने लगे कि अगर यह गंगाजी जाकर आता तो इतने दिनोंमें नहीं आ सकता था, यह गंगाजी गया ही नहीं। बड़े भाइयोंने उससे पूछा—'तू गंगाजी जाकर आया है क्या? उसने कहा—हां, गंगाजी जाकर आया हूँ; ठीक गंगाजीके ब्रह्मकुण्डमें फूल डालकर वहाँसे गंगाजीका यह जल लाया हूँ। ऐसे वह झूठ बोल गया। भाइयोंने समझ लिया कि यह ठीक नहीं बोल रहा है, इसलिये वे चुप हो गये।
दूसरे दिन नींदसे उठकर एक भाई छोटे भाईसे बोला—'अरे भाई! तू सच्ची बात बता दे, क्या तू गंगाजी हो आया और फूल ठीक गंगाजीमें डाल दिये। उसने कहा—हां, बिलकुल गंगाजी जाकर आया हूँ। बड़े भाईने कहा—'देख, रातको स्वप्नमें मेरेको माँ मिली थीं और मॉने मेरेसे कहा कि इसने तो मेरेको गंगाजी पहुँचाया ही नहीं, बीचमें ही डालकर आ गया। अब तू ही बता कि माँकी बात सच्ची या तेरी बात सच्ची? छोटा भाई बोला—'माँ इधर ही क्यों आयी, उधर क्यों नहीं गयी? अर्थात् १५० कोस तो मैंने पहुँचा ही दिया था, यहाँ न आकर उधर ही चली जाती तो ठीक गंगाजी पहुँच जाती।
इस कहानीका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् के शरण होनेके बाद यह कसौटी कसते हैं—'परीक्षा करते हैं कि 'भक्तोंके, सन्तोके लक्षण मेरेमें नहीं आये तो मैं भगवान् के शरण नहीं हुआ'—यह माँ उलटी क्यों आयी, सुलटी ही क्यों नहीं गयी कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया तो अब इन लक्षणोंकी कमी क्यों रह गयी? मेरेमें ये लक्षण क्यों नहीं आये?' ऐसी मान्यतासे तो साधक शरणागत हो जायगा और पूर्णता भी हो जायगी। परन्तु यह मान्यता करेगा कि 'मेरेमें ऐसे लक्षण नहीं आये तो मैं शरण नहीं हुआ' तो धोखा हो जायगा!
विवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्ध-विच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादी-परदादी बन जाती है, तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्घण्डता करती है, खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है, तब भगवान् के ही अंश इस प्राणीका भगवान् के साथ जो नित्य सम्बन्ध है, वह दृढ़ हो जाय—इसमें आश्चर्य ही क्या है! वास्तवमें भगवान् के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धोंका त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।
सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव, आचरण आदिकी किंचित् कमी रह जाय, कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किंचित् कोई दुष्कर्म हो जाय, तो उसके हृदयमें जलन पैदा
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
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ही जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं।
भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, गुणों और अवगुणोंको नहीं१ अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं, उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है, वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगान्तुक होनेसे आते-जाते रहते हैं और वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे, कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है, तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेके मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे, पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं, उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी, तभी केशोंको बाँधूँगी! परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है, भगवान् चट आ जाते हैं; क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।
भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं—(१) भगवान् मेरे हैं और (२) मैं भगवान्का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भी ‘भगवान् मेरे हैं’—इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा हो सकती है कि ‘भगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते?’ परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा नहीं हो सकती; क्योंकि ‘मैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें, वैसा ही निःसंकोच होकर करें’। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे, भगवान्पर अपना किंचित् भी आधिपत्य न माने, प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीं भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा! यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता, प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है।
शरणागत भक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।
शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किंचिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर दिया, जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने, कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिन-से-कठिन और भयंकर-से-भयंकर घटना, परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है, मस्त रहता है। जैसे, गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मण-शरीरकी कथा सुनायी, जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया; परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं, प्रत्युत मन-ही-मन बोल उठे—‘उर प्रेरक रघुवंस विभूषण’ (मानस ७।११३।१)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी, तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यार भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया—‘मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध, अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे, वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे, उसमें एक योजनपर्यन्त मायाका कण्टक किंचिन्मात्र भी नहीं आयेगा’ आदि-आदि। इस प्रकार बहुत-से आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई कि ‘हे ऋषे! तुमने जो कुछ कहा, वह सब सच्चा होगा, यह मन, वाणी, कर्मसे मेरा भक्त है।’ इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है—
भगति पच्छु हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप।
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥
(मानस ७।११४ ख)
१-स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्वभावस्य हरिः पेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥
(श्रीमद्भा० ११।५।४२)
‘जो प्रेमी भक्त भगवान्के चरणोंका अनन्यभावसे भजन करता है, उसके द्वारा यदि अकस्मात् कोई पाप-कर्म बन भी जाय तो उसके हृदयमें विराजमान परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसे सर्वथा नष्ट कर देते हैं।’
२-रहित न प्रभु चित्त चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (मानस १।२१।३)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
यहाँ 'भजन प्रताप' शब्दोंका अर्थ है—भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिक-से-अधिक बढ़ती रहती है; क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।
यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है, वह सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं—'सब मम प्रिय सब मम उपजाए' (मानस ७।८६।२) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ, यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण, अखण्डितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना—इन तीन बातोंके लिये समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है, नहीं तो भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता, कृपालुता, प्रियता, हितैषिता, सुहृता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है, और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं—'मद्भक्तो भव, मन्यना भव, मद्याजी भव, मां नमस्कुरु।' इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है, जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ; क्योंकि दुःख, संताप, बार-बार जन्मना-मरना, मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।
भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं, वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं—बस, भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय, तो फिर उसके
लिये क्या करना बाकी रहा? जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़फन है, इसीलिये भगवान् 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज' वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (५।२९) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं, उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख, संताप आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।
वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अष्टांगयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं, वे सब-के-सब भगवान्के द्वारा और भगवत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओत-प्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है, पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।
शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए, भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ, अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुई, आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदे-फाँदे, किधर भी जाय, बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।
भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें, प्रेम दें या न दें, वृत्तियोंको ठीक करें या न करें, हमें शुद्ध बनायें या न बनायें—यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे, चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथ-पैर समेटकर केवल भगवान्का चिन्तन, नाम-जप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है, उसमें परम प्रसन्न रहता है, अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।
१-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुष्ट तुष्टार सेवक असुरारी॥ (मानस ७।४७।३)
२-भक्त जो कुछ काम करता है, उसको भगवान्का ही समझकर, भगवान्की ही शक्ति मानकर, भगवान्के ही लिये करता है, अपने लिये किंचिन्मात्र भी नहीं करता—यही उसका हाथ-पैर समेटना है।
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
१२३३
जैसे, कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ, सकोरा बनाओ, मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये, उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी, मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है, भगवत्कृपा उसको अपने-आप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है, अपना बल मानता है, उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण, विचित्र, अखण्ड, अटूट कृपा आती है, अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।
जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं; परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है, वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया-(संसार-) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मते-मरते रहते हैं; परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं, वे मायाको तर जाते हैं—‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ’ (गीता ७।१४)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है; परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है, तभी तो वे कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज। ’ जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायामें फँस जाते हैं।
जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं;* परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है, उस कीलके आस-पास रहनेवाले दाने ज्यों-के-त्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्म-मरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सब-के-सब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं; परन्तु जिसके आधारपर संसार-चक्र चलता है, उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है—‘कोई हरिजन ऊबरे, कील माकड़ी
पास। ’ परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता; क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है, वही जन्म-मरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।
संसार और भगवान्—इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है, गुलाम बनाता है, पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है, चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिक!
किसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है, यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, त्याग, वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता, दासता ही है। जैसे, कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई, खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है, पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।
संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है, उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं, पद-दलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है, उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं, प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता, विलक्षणता, विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें, तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती, अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसी-किसीमें यहाँतक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जड़ताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये, अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें
- चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। दो पाटनमें
आयके साबूत बचा न कोय।
१२३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छीटा-सा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये।
ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता; क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्ध-विच्छेद करके, असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती, तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उत्तर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ, लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है, पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं।
भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है, पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभु-शरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है, वे कितना अधिक प्यार करती हैं, इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।
दूसरी बात, प्रेमभावसे परिपूर्ण प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं, तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं, जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता है! परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है, तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं, पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उसका बड़ा भारी पतन हो जाता है; क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है, इसलिये वह महान् अधम है।
तीसरी बात, जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है, वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं, पर जहाँ केवल लक्ष्मीको चाहना है, वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायें—यह नियम नहीं है।
शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी, रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे।
उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमल-कोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयी-नयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले—‘देखो हनुमान्! यह लता कितनी सुन्दर है! वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है! यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फूल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है! इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख रहा है! इतना ही नहीं, इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लता!’
भगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रशंसा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं—‘देखो बेटा हनुमान्! तुमने खयाल किया कि नहीं? देखो, इस लताका ऊपर चढ़ जाना, फूल-पत्तोंसे छा जाना, तन्तुओंका फैल जाना—ये सब वृक्षके आश्रित हैं, वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण है। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है? कैसे छा सकती है? अब बोलो हनुमान्! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्षकी ही हुई न?’
रामजीने कहा—‘क्यों हनुमान्! यह महिमा तो लताकी ही हुई न?’
हनुमान्जी बोले—‘हमें तो तीसरी ही बात सूझती है।’
सीताजीने पूछा—‘वह क्या है बेटा?’
हनुमान्जीने कहा—‘माँ! वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया-(चरणोंके आश्रय- ) में रहना ही अच्छा लगता है!’
सेवक सुत पति मातु भरोसें।
रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥
(मानस ४। ३। २)
ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति—दोनों ही एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है, कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति—दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है।
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
१२३५
एक बार एक प्रज्ञाचशु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारे-किनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमें गिर पड़े। हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं, अब तैरें तो किधर तैरें? भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चल पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है, उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय, उसीमें वह प्रसन्न रहता है।
बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरते-चरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामेंसे निकलनेमें बहुत देर लगी, तबतक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गलीली जमीनपर सिंहका एक चरण-चिह्न अंकित था। वह उस चरण-चिह्नके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया कि 'पहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ, तब मुझे खाना!' वे चिह्नको देखकर कहने लगे—'अरे, यह तो सिंहके चरण-चिह्नके शरण है, जल्दी भागो यहाँसे! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।' इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें
जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला—'तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है?' बकरीने कहा—'यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ।' सिंहने देखा कि 'ओह! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई।' सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो।
रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा—'तू इस बकरीको अपनी पीठपर चढ़ा ले। इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ? मार डालूंगा।' सिंहकी बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सँडुसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठे-बैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती।
खोज पकड़ सेंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय।
ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है, उनके चरणोंका सहारा ले लेता है, तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे, विघ्न-बाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
जो जाको शरणो गहै, ताकहैं ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज।
भगवान्के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है*। तात्पर्य यह हुआ कि काम, भय,
- (१) कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः॥ गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्वादयो नृपाः। सम्बन्धाद् वृण्वयः स्नेहाद् यूर्यं भक्त्या वर्यं विभो॥
( श्रीमद्भागवतम् ७।१।२९-३० )
'एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप शोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिये। जैसे गोपियोंने कामसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगों- (युधिष्ठिर आदि- ) ने स्नेहसे और हमलोगों- (नारद आदि- ) ने भक्तिये अपने मनको भगवान्में लगाया है।'
(२) सत्संगेन हि दैतैया यातुधाना मृगाः खगाः। गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चाराणगृह्यकाः॥ विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्यजाः। रजस्तमः प्रकृतयस्तस्मिन्तस्मिन् युगेऽन्य॥ बहवो मत्पदं प्राप्तास्तत्त्व्याष्टकायाधवादयः। वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः॥ सुग्रीवो हनुमान्शुक्रो गजो गृध्रो वणिक्मथः। व्याधः कुब्जा ब्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे॥ ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहतमाः। अत्रातपतपसः सत्संगान्मायुपाताः॥
( श्रीमद्भागवतम् ११।१२।३-७ )
भगवान् कहते हैं—'निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संग अर्थात् मेरे सम्बन्धद्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गृह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है।'
१२३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
द्रेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह गये! भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा है— नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः।
(नारदभक्तिसूत्र ७२)
‘उन भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदिका भेद नहीं है।’
तात्पर्य यह है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति, विद्या आदि भेद हो सकते हैं, वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं— ‘यत्तत्तदीयाः’ (नारदभक्तिसूत्र ७३), संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वे ‘अच्युत गोत्र’ के ही कहलाते हैं।
शरणागतिका रहस्य
शरणागतिका रहस्य क्या है—इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे
समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं, इसलिये ऐसी बातको कहने-सुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।
भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं—
(१) ‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) ‘अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा।’
(२) ‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ’ (१५।१९) ‘वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है’, ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ’ (१८।६२) ‘तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।’
हम भगवान्के शरण कैसे हो जायें? केवल एक भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् भगवान्के गुण, ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।
केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं, प्रभाव हैं, तत्त्व हैं, रहस्य हैं, महिमा हैं, लीलाएँ हैं, नाम हैं, धाम हैं; भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है, माधुर्य है, सौन्दर्य है—इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है कि ‘मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं।’ अगर वह गुण, प्रभाव आदिकी तरफ देखकर
मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, ब्रजकी गोपियाँ, यज्ञपतियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं।
उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना ही की थी। इसी प्रकार उन्होंने कुछचूडामन्त्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संग—मेरे सम्बन्धके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये।
१-(१) पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनाश्चाम्नादयः। न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम्॥ (अध्यात्म०, अरण्य० १०।२०)
‘मेरे भजनमें पुरुष-स्त्रीका भेद अथवा जाति, नाम और आश्रम कारण नहीं है, प्रत्युत मेरी भक्ति ही एकमात्र कारण है।’
(२) किं जन्मना सकलवर्णजोन्मतेन किं विद्यया सकलशास्त्रविचारवत्या।
यस्यास्ति चेत्सि सदा परमेशभक्तिः कोऽन्यततस्त्रिभुवने पुरुषोऽस्ति धन्यः॥ (ब्र० सं० भ० १७)
‘सम्पूर्ण वर्णोंमें उत्तम वर्ण (ब्राह्मण-कुल)-में जन्म होनेसे क्या हुआ? सम्पूर्ण शास्त्रोंके गहरे अध्ययनसे क्या हुआ? अर्थात् कुछ नहीं हुआ जिसके हृदयमें भगवान्की भक्ति विराजमान है, इस त्रिलोकीमें उसके समान दूसरा कौन मनुष्य धन्य हो सकता है?’
(३) व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषम्।
कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः॥
(पद्मावली ८)
‘व्याधका कौन-सा श्रेष्ठ आचरण था? ध्रुवकी कौन-सी बड़ी उम्र थी? गजेन्द्रके पास कौन-सी विद्या थी? विदुरकी कौन-सी ऊँची जाति थी? यदुपति उग्रसेनका कौन-सा पराक्रम था? कुब्जाका कौन-सा सुन्दर रूप था? सुदामाके पास कौन-सा धन था? फिर भी उन लोगोंको भगवान्की प्राप्ति हो गयी। कारण कि भगवान्को केवल भक्ति ही प्यारी है। वे केवल भक्तिये ही सन्तुष्ट होते हैं, आचरण, विद्या आदि गुणोंसे नहीं।
१-पितृगोत्री यथा कन्या स्वामिगोत्रेण गोत्रिका। श्रीरामभक्तिमात्रेणाच्युतगोत्रेण गोत्रकः॥ (नारदपंचरात्र)
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
१२३७
भगवान्की शरण लेता है, तो वास्तवमें वह गुण, प्रभाव आदिके ही शरण हुआ, भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।
उलटा अर्थ लगाना क्या है? भगवान्के गुण, प्रभाव, नाम, धाम, ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है, इनको तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं, न भजन करना है, न भगवान्के गुण, प्रभाव, लीला आदि सुननी है, न भगवान्के धाममें जाना है—यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।
केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है—केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर, कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं, तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं, मेरे हैं*। भगवान्की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, गुण, प्रभाव आदि चले जायेंगे, ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे, तो हमारी असली शरणागति होगी।
जहाँ गुण, प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं, वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते, प्रत्युत गुण, प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं; जैसे—कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं, रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं, मिनिस्टरी-(पद-) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है, उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति-(धनी आदि-) का आदर करे तो इससे धनीका धन या
मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी—यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण, प्रभाव आदि चले जायेंगे—ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये, उनके गुणों आदिपर नहीं।
सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सदगुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा, तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया—
महादेव अवगुन भवन विष्णु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥
(मानस १।८०)
ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी—
ऊधौ! मन माने की बात।
दाख छोहरा छाड़ि अमृतफल,
बिषकीरा बिष खात॥
जो चकोर को दै कपूर कोउ,
तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरे काठमें,
बैधत कमल के पात॥
ज्यों पतंग हित जान आपनो,
दीपक सों लपटात।
‘सूरदास’ जाको मन जासों,
ताको सोड़ सुहात॥
भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको, उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति, ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है, पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं, वह प्रेमी-भक्त भगवान्को बाँध भी सकता है, उनकी बिन्नी भी कर सकता है! भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है, मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं, तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।
प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें
- (१) असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणीर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेष्टी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्मामयम्॥
‘मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण असुन्दर हों या सुन्दर-शिरोमणि हों, गुणहीन हों या गुणियोंमें श्रेष्ठ हों, मेरे प्रति द्वेष रखते हों या करुणासिन्धु-रूपसे कृपा करते हों, वे चाहे जैसे हों, मेरी तो वे ही एकमात्र गति हैं।’
(२) आशिलष्य वा पादरतां पिण्डु मामदर्शनात्मर्हतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥
(शिक्षाष्टक ८)
‘वे चाहे मुझे हृदयसे लगाकर हर्षित करें या चरणोंमें लिपटे हुए मुझे पैरोंतले रौंद डालें अथवा दर्शन न देकर मर्माहत ही करें। वे परम स्वतन्त्र श्रीकृष्ण जैसे चाहें, वैसे करें, मेरे तो वे ही प्राणनाथ हैं, दूसरा कोई नहीं।’
१२३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है, तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायेंगे, भगवान्के अपने हो जायेंगे। पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी* अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले, वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है, उसे तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है, उस मैयाको भगवान् क्या दें? तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये, उन्हें अपने-आपको ही दे दिया! मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने लग जाते हैं! कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्ने मुक्ति चाहता है, उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं, पर जो कुछ भी नहीं चाहता, उसे भगवान् अपने-आपको ही दे देते हैं।
सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है, इन्द्रियाँ वशमें हैं, मन शुद्ध-निर्मल है, बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं, हम पढ़े-लिखे हैं, हम यशस्वी हैं, हमारा संसारमें मान है—इस प्रकार ‘हम भी कुछ हैं’ ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये; हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये; हमारा मन ऐसा होना चाहिये; हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये; हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये; हमारे जीवनमें ऐसे-ऐसे लक्षण आने चाहिये; हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये; हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथा-कीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगे, कण्ठ गद्गद हो जाय; पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए? आदि-आदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण
हो जाता है, वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है? मन चंचल है कि स्थिर है? बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है? अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है? योग्यता है कि अयोग्यता है? आदि। इस सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ा-करकट हैं, जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया, पर भक्तोंके गुण (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराश हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैर-विरोध करें, चाहे द्वेष करें, चाहे ममता करें, चाहे जो कुछ करें? यह अर्थ बिल्कुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सब-के-सब गुण अपने-आप ही आयेंगे, पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।
सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं, तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं।
प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया? भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया? उसपर दुःख क्यों आ गया? उसका बेटा क्यों मर गया? उसका धन क्यों चला गया? उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया? उसका निरादर क्यों हो गया? आदि-आदि। ऐसी कसौटी
- (१) अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिधांसयापाययदप्यासन्धी। लेभे गतिं धान्युचित्तां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं ब्रजेम॥
(श्रीमद्भा० ३। २। २३)
‘अहो! इस पापिनी पूतनाने जिन्हें मार डालनेकी इच्छासे गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उनके अलावा अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायें?’
(२) गई मारन पूतना कुछ कालकूट लगाई। मातुकी गति दर्द ताहि कृपालु जादवराइ॥ (विनय-पत्रिका २१४। २)
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
१२३१
लगाना बिलकुल फालतू बात है, बड़े नीचे दर्जेंकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझाये। वे सत्संगके नजदीक ही नहीं आये, इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है? शरणागति क्या होती है? वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है, उसका संसारमें अपमान होता ही है, उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दा-प्रशंसा, रोग-निरोग-अवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं, बस। अब संसारमें क्या है, क्या नहीं है, त्रिलोकोंमें क्या है, क्या नहीं है, प्रभु ऐसे हैं, वे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं—इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।
किसीने एक सन्तसे पूछा—‘आप किस भगवान्के भक्त हैं? जो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करते हैं, उनके भक्त हैं क्या?’ तो उस सन्तने उत्तर दिया—‘हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका एक ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है।’ शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।
ऋषिकेशमें गंगाजीके किनारे शामको सत्संग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गंगाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा—‘कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है!’ पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा—‘हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया? यह ठण्डी हवा आयी, यह गरम हवा आयी—इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया?’ भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डी आयी या गरम आयी, सुख आया या दुःख आया—इस तरफ जबतक खयाल है, तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ? इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेंकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।
एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटी-छोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है
यह! इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया! वह वहाँ बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी, तब मौलवीने उसको धमकाया कि ‘कैसी बेअक्ल हो तुम! हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे, नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयीं!’ तब वह बोली—
मैं नर-राची ना लखी, तुम कस लख्यो सुजान।
पढ़ि कुरान बीरा भया, राच्यो नहीं रहमान॥
अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है, पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था, फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी? तू केवल कुरान पढ़-पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता? कौन आया, कैसे आया, मनुष्य था कि पशु-पक्षी था, क्या था, क्या नहीं था, कौन ऊपर आया, कौन नीचे आया, किसने पैर रखा—इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता? तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय? दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे? जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है, तबतक वह शरण कहाँ हुआ?
कौरव-पाण्डव जब बालक थे, तब वे अस्त्र-शस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये, तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एक-एक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलग-अलग पूछते कि बताओ, तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है? कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है, कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है, कोई कहता कि हमें तो चिड़िया दीखती है, चौंच भी दीखती है, पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी, तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है, तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है, और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ वेध दिया; क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है, वृक्ष, टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है? अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा, जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है, तबतक
१२४०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
वह अन्य कैसे हुआ? अव्यभिचारी 'अनन्ययोग' होना चाहिये—'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी' (गीता १३।१०)। 'अन्ययोग' नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, अहम् आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये।
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा—'आप जिन रामललाकी भक्ति करते हैं, वे तो बारह कलाके अवतार हैं, पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं, वे सोलह कलाके अवतार हैं।' यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले—'ओह! आपने बड़ी भारी कृपा कर दी! मैं तो रामको दशरथजीके लाड़ले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं! इतने बड़े हैं वे? आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया।' अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं—यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं, इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।
भगवान्के प्रति भक्तोंके अलग-अलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं, वे ही हमारे इष्ट हैं—'इष्टदेव मम बालक रामा' (मानस ७।७५।३); राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं, छोटा-सा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड़डूगोपाल हैं, नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको, नन्दललाको सन्तोसे आशीर्वाद दिलाते हैं, तो भगवान्को यह बहुत प्यारा लगता है। तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान्के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं।
या ब्रजरज की परस से, मुक्ति मिलत है चार।
वा रज को नित गोपिका, डारत डगर बहार॥
आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं, वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती हैं। मैयाके लिये तो वह कूड़ा-करकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये? मैयाकी केवल कन्हैयाकी तरफ ही दृष्टि है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि है और न योग्यताकी तरफ ही दृष्टि है।
सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान्से मिलना हो तो साथमें साथी भी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी, सहारा साथमें है, तो तुम क्या मिले भगवान्से? और मन, बुद्धि, विद्या, धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा।
परदेमें मिलन थोड़े ही होता है! वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं, माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ? इसलिये साथमें कोई साथी और सामान न हो; फिर भगवान्से जो मिलन होगा, वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।
एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक ब्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान्का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा—'तुम क्या करते हो?' उसने कहा—'हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं।' महात्माजीने कहा—'हम भगवान्के अनन्य भक्त हैं, तुम क्या हो?' उसने कहा—'हम फनन्य भक्त हैं।' महात्माजीने पूछा—'फनन्य भक्त क्या होता है?' तो उसने भी पूछा—'अनन्य भक्त क्या होता है?' महात्माजीने कहा—'अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य, शक्ति, गणेश, ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने, केवल हमारे कन्हैयाको ही माने।' उसने कहा—'बाबाजी, हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं, क्या नहीं होते; हमें इनका पता ही नहीं है; तो हम फनन्य हो गये कि नहीं?' इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है? आत्मा क्या होती है? सगुण और निर्गुण क्या होता है? साकार और निराकार क्या होता है? आदि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तकी दृष्टि ही नहीं जानी चाहिये।
ब्रजकी एक बात है। एक सन्त कुर्रैपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है, परमात्मा है, जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी गोपीसे मिली तो उससे पूछा—'अरी सखी! यह ब्रह्म क्या होता है?' उसने कहा—'हमारे लालाका ही कोई अड़ोसी-पड़ोसी, सगा-सम्बन्धी होगा! हमलोग तो जानती नहीं सखी! ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न? इसलिये सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगी, गिरिराजसे कह देंगी कि महाराज! आप कृपा करो। कन्हैया तो भोला-भाला है, वह क्या समझेगा और क्या करेगा? कन्हैयासे क्या मिलेगा? अरी सखी! वह कन्हैया हमारा है, और क्या मिलेगा? हम भी अकेली हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ सामान नहीं और उसके पास भी कुछ सामान नहीं, बिलकुल नंग-धड़ंग बाबा—'नगन मूरति बाल गुपालकी, कतरनी बरनी जग-जालकी।' अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगा?
श्लोक ६६ ]
- साधक-संजीवनी *
१२४९
यशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं—‘देख दाऊ! यह कन्हैया बहुत भोला-भाला है, तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय।’ दाऊजी कहते हैं—‘मैया! यह कन्हैया बड़ा चंचल है। जंगलमें मेरे साथ चलते-चलते कोई साँपका बिल देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है, अब इसे कोई साँप काट ले तो?’ मैया कहती है—‘बेटा! अभी वह छोटा-सा अबोध बालक है, तू बड़ा है, इसलिये इसकी निगाह रखा कर।’ अब दाऊ भैया और सब ग्वाल-बाल कन्हैयाकी निगाह रखते हैं। ग्वाल-बालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है, तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा, जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटा-सा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगा?
एक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करते-करते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं, उनका इतना माधुर्य है, उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है, आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं—‘महाराज! उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है! कन्हैयाके पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहोसे देगा?’ इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैयाके पास न जाये। कन्हैयाके पास, उसकी शरणमें तो वही जाये, जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति, मौत आदिकी अवस्थामें भी ‘मेरी थोड़ी सहायता कर दो, रक्षा कर दो’ ऐसा भाव भी नहीं हो!
भगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं—
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥
(मानस २। १३१)
कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं—‘तुम्ह सन सहज सनेहु।’ जिसमें चाह नहीं है, वह भगवान्का खास घर है—‘सो राउर निज गेहु।’ यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथ ‘सहज’ स्नेह हो, स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय, वहाँ प्रेम कैसा? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई
कहती हैं—
मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां
दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः।
विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बविम्बे
धृतः समाकर्षति चित्तवितम्।।
‘अरे पथिको! उस गलीसे मत जाना, वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंगका एक नंग-धड़ंग बालक खड़ा है, वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमेंसे होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।’
वह जो काला-काला नंग-धड़ंग बालक खड़ा है न? उससे तुम लुट जाओगे, रीते रह जाओगे! वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत, पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके लिये ही चले गये! इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न? कृष्ण कहते हैं खींचने-वालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो, तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामके नहीं रहोगे, त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे!
‘नारायन’ बौरी भई डोलै, रही न काहू काम की।
जाहि लगन लगी घनस्याम की॥
हाँ, जो किसी कामका नहीं होता, वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उसको किसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।
शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता।
उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा, प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धंधा नहीं है, इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया, उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता, महान् छटपटाट होने लगती है—‘तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति’ (नारदभक्तिसूत्र १९)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा, तो वह इसे भी ठुकरा
१२४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
देगा। भागवतमें आया है—
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ-
स्मृतिरजितात्मसुरादिर्भिर्विभूष्यात् ।
न चलति भगवत्पदारविन्दा-
त्त्वनिनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रचः ॥
(श्रीमद्भ० ११।२।५३)
‘तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चरणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते, वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।’
न पारमेष्ट्यं न महेन्द्रधिण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत् ॥
(श्रीमद्भ० ११।१४।१४)
भगवान् कहते हैं कि ‘स्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य, पातालादि लोकोंका राज्य, योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।’
भरतजी कहते हैं—
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥
(मानस २।२०४)
परिशिष्ट भाव —भगवान्के साथ कर्मयोगीका ‘नित्य’ सम्बन्ध होता है, ज्ञानयोगीका ‘तात्त्विक’ सम्बन्ध होता है और शरणागत भक्तका ‘आत्मीय’ सम्बन्ध होता है। नित्य सम्बन्धमें संसारके अनित्य सम्बन्धका त्याग है, तात्त्विक सम्बन्धमें तत्त्वके साथ एकता (तत्त्वबोध) है और आत्मीय सम्बन्धमें भगवान्के साथ अभिन्नता (प्रेम) है। नित्य-सम्बन्धमें शान्तरस है, तात्त्विक सम्बन्धमें अखण्डरस है और आत्मीय सम्बन्धमें अनन्तरस है। अनन्तरसकी प्राप्ति हुए बिना जीवकी भूख सर्वथा नहीं मिटती। अनन्तरसकी प्राप्ति शरणागतिसे होती है। इसलिये शरणागति सर्वगृह्णात्म एवं सर्वश्रेष्ठ साधन है।
‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य’ पदका अर्थ ‘सम्पूर्ण धर्मोंका स्वरूपसे त्याग’ नहीं है, प्रत्युत ‘सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग’ है। तात्पर्य है कि किसी भी धर्म (कर्तव्य कर्म)-का आश्रय न हो। जैसे, पहले अध्यायमें आया है—‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ (१।३३)। वहाँ भी ‘प्राणांस्त्यक्त्वा’ का अर्थ ‘प्राणोंका त्याग’ न लेकर ‘प्राणोंके आश्रय (आशा)-का त्याग’ ही लिया जा सकता है; क्योंकि प्राणोंका त्याग करके कोई युद्धमें कैसे खड़ा होगा? असम्भव बात है। इसी तरह पहले अध्यायके नवें श्लोकमें आया है—‘अन्ये च बहवः शूरा मदर्थं त्यक्तजीविताः’ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि बहुत-से अन्य शूरवीर अपने जीवनका त्याग करके खड़े हैं। इसका अर्थ है कि वे शूरवीर अपने जीवनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् उनको अपने जीवनकी परवाह नहीं है। अतः यहाँ भी ‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य’ पदका अर्थ ‘धर्मोंके आश्रयका त्याग’ लेना चाहिये। जैसे शूरवीरोंको अपने प्राणोंकी अथवा अपने जीवनकी परवाह नहीं है, ऐसे ही भक्तको दूसरे धर्मोंकी परवाह नहीं है। उसकी दृष्टिमें दूसरे धर्मों (कर्तव्य कर्मों)-का महत्त्व नहीं है। कारण कि भगवान्की शरणागतिकी जितना महत्त्व है, उतना धर्मोंका महत्त्व नहीं है। धर्म (कर्तव्य-कर्म)-में जड़ताका और शरणागतिमें चिन्मयताका सम्बन्ध रहता है। कर्तव्य कर्म अपने वर्णाश्रमको लेकर होता है; अतः उसमें शरीरकी मुख्यता रहती है। परन्तु शरणागति स्वयंको लेकर होती है; अतः उसमें भगवान्की मुख्यता रहती है।
‘मामेकं शरणं व्रज’ का तात्पर्य है—बाहरसे (व्यवहारमें) सबके साथ प्रेम, आदर-सत्कारका व्यवहार करनेपर भी भीतरसे किसीकी गरज न हो, किसीका आश्रय न हो, केवल भगवान्का ही आश्रय हो—
यह बिनती रघुबीर गुसाई।
और आस-बिस्वास-भरोसो, हर्षी जीव-जड़ताई ॥
(विनय-पत्रिका १०३)
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥
(दोहावली २७७)
वास्तवमें पूर्ण शरणागति भगवान् ही प्रदान करते हैं। जैसे छोटा बालक अपना हाथ ऊँचा करता है तो माँ उसको उठा लेती है, ऐसे ही भक्त अपनी शक्तिसे भगवान्के सम्मुख होता है, शरणागतिकी तैयारी करता है तो भगवान् उसको पूर्ण शरणागति दे देते हैं।
श्लोक ६७ ]
- साधक-संजीवनी *
१२४३
अर्जुन पापोंसे छूटना चाहते थे, इसलिये भगवान्ने भी पापोंसे मुक्त करनेकी बात कही है; क्योंकि भगवान्का स्वभाव है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)। वास्तवमें केवल पापोंसे मुक्ति ही शरणागतिका फल नहीं है। अन्य शरणागतिसे मनुष्य भगवान्से अभिन्न होकर अनन्तरसको प्राप्त कर सकता है! इसलिये साधकको पापोंसे अथवा दुःखोंसे मुक्ति पानेकी इच्छा न रखकर केवल भगवान्के शरणागत हो जाना चाहिये। कुछ भी चाहनेसे कुछ (अन्तवाला) ही मिलता है, पर कुछ भी न चाहनेसे सब कुछ (अनन्त) मिलता है! भगवान् भी शरणागत भक्तके वशमें हो जाते हैं, उसके ऋणी हो जाते हैं।
यह शरणागति गीताका सार है, जिसको भगवान्ने विशेष कृपा करके कहा है। इस शरणागतिमें ही गीताके उपदेशकी पूर्णता होती है। इसके बिना गीता अधूरी रहती! इसलिये अर्जुनके द्वारा ‘करिष्ये वचनं तव’ कहकर पूर्ण शरणागति स्वीकार करनेपर फिर भगवान् नहीं बोले।
सम्बन्ध—अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करते हैं।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
| इदम् | = यह सर्वगुह्यतम | कदाचन | = कभी | कहना चाहिये |
|---|---|---|---|---|
| वचन | न | = नहीं कहना | च | |
| ते | = तुझे | चाहिये | यः | |
| अतपस्काय | = अतपस्वीको | च | = तथा | माम् |
| न | = नहीं | अशुश्रूषवे | = जो सुनना | अभ्यसूयति |
| (उसको भी) | ||||
| वाच्यम् | = कहना | नहीं | चाहता, | न |
| चाहिये; | चाहिये। | |||
| अभक्ताय | = अभक्तको | न | = (उसको) नहीं |
व्याख्या—‘इदं ते नातपस्काय’—पूर्वश्लोकमें आये ‘सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’—इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ ‘इदम्’ पद आया है।
अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय, विपरीत परिस्थिति आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम ‘तप’ है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होती। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है, उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।
जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है, वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है—
(१) द्रुन्द्रसहिष्णुता—राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि द्रुन्द्रोंसे रहित
हो जाना—‘ते द्रुन्द्रमोहनिर्मुक्ताः’ (गीता ७।२८); ‘द्रुन्दैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ज्ञैः’ (गीता १५।५)।
(२) वेगसहिष्णुता—काम, क्रोध, लोभ, द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना—‘कामक्रोधोद्भव वेगम्’ (गीता ५।२३)।
(३) परमतसहिष्णुता—दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्भिन्न न होना*—‘एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति’ (गीता ५।५)।
(४) परोल्लक्षसहिष्णुता—अपनेमें योग्यता, अधिकार, पद, त्याग, तपस्या आदिकी कमी है, तो भी दूसरोंकी योग्यता, अधिकार आदिकी प्रशंसा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना—‘विमत्सरः’ (गीता ४।२२); ‘हर्षामर्षभयोद्भोगैर्मुक्तः’ (गीता १२।१५)।
- आपसमें मतभेद होना और अपने मतके अनुसार साधन करके जीवन बनाना दोष नहीं है, प्रत्युत दूसरोंका मत बुरा लगना, उनके मतका खण्डन करना, उनके मतसे घृणा करना ही दोष है।
१२४४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों, वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों, वही अतपस्वी है।
ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है कि 'सम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अन्यभावसे मेरी शरण आ जा'—इस बातको सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय, तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा, जिससे उसका पतन हो जायगा।
दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों, आचरणों, भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है, वह यदि मेरी 'तू मेरी शरणमें आ जा, तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर'—इन बातोंको सुनेगा तो 'मैं चिन्ता क्यों करूँ? चिन्ता भगवान् करेगे' ऐसा उलटा समझकर दुर्गुण-दुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।
'नाभक्ताय कदाचन '—जो भक्तिसे रहित है, जिसका भगवान्पर भरोसा, श्रद्धा-विश्वास नहीं है, उसको भी यह बात मत कहना; क्योंकि श्रद्धा-विश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है कि 'भगवान् तो आत्मश्लाधी हैं, स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है, वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा? उसके शरण होनेसे क्या लाभ?' आदि-आदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे अभक्तको कभी मत कहना।
'न चाशुश्रूषवे वाच्यम् '—जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता, इसकी उपेक्षा करता है, उसको भी कभी मत
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अभक्तको और दोषदृष्टिवालेको सर्वगुह्यतम वचन न कहनेपर विशेष जोर दिया है। अभक्त और दोषदृष्टिवालेको कहनेमें जितना दोष है, उतना दोष अतपस्वी और सुनना न चाहनेवालेको कहनेमें नहीं है; क्योंकि अभक्त और दोषदृष्टिवालेमें विपरीत बुद्धि है।
'अभक्त ' का अर्थ है—भक्तिका विरोधी। जिसमें भक्तिका अभाव है, उसको यहाँ 'अभक्त' नहीं कहा गया है। जो भक्त है, उसमें भी बेसमझीसे असूया-दोष आ सकता है, पर भक्तिके कारण वह दोष स्वतः मिट जाता है।
'अशुश्रूषवे ' का अर्थ है—जो अहंकारके कारण नहीं सुनना चाहता। जो बेसमझीसे नहीं सुनना चाहता, उसको यहाँ 'अशुश्रूषवे' नहीं कहा गया है।
१-असहिष्णुता और असूयामें थोड़ा अन्तर है। दूसरोंकी विशेषताको न सहना 'असहिष्णुता' है और दूसरोंके गुणोंमें दोष देखना 'असूया' है।
२-श्रद्धा होनेपर भी साथमें असूया-दोष रह सकता है, इसीलिये भगवान्ने श्रद्धाके साथ-साथ असूया-दोषसे रहित होनेकी बात भी कही है—'श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तः' (गीता ३।३१), 'श्रद्धावानसूयश्च' (गीता १८।७१)।
सुनाना; क्योंकि बिना रुचिके, जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा, उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा, उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत सुनाना।
'न च मां योऽभ्यसूयति '—जो गुणोंमें दोषारोपण करता है, उसको भी मत सुनाना; क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।
दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वंचित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है।
इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता—तीसरे अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें) जहाँ अपना मत बताया, वहाँ
'श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः ' पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कभीसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (इसी अध्यायके इकहत्तरवें श्लोक)-में भी 'श्रद्धावानसूयश्च' पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुनेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।
इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना—यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वंचित रखना नहीं है, प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं), भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय, इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है।
श्लोक ६८ ]
- साधक-संजीवनी *
१२४५
सम्बन्ध-गीताजीका यह प्रभाव है कि जो इसका प्रचार करेगा, उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा-यह
बात भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
मयि
= मुझमें
परमम्
= परम
माम्
= मुझे
पराम्, भक्तिम् = पराभक्ति
गुह्यम्
= गोपनीय संवाद
एव
= ही
कृत्वा
= करके
(गीताग्रन्थ) को
एष्यति
= प्राप्त होगा-
यः
= जो
मद्भक्तेषु
= मेरे भक्तोंमें
असंशयः
= इसमें कोई सन्देह
इदम्
= इस
अभिधास्यति = कहेगा, (वह)
नहीं है।
व्याख्या-'भक्तिं मयि परां कृत्वा'-जो मेरेमें
पराभक्ति करके इस गीताको कहता है। इसका तात्पर्य है
कि जो रुपये, मान-बड़ाई, भेंट-पूजा, आदर-सत्कार
आदि किसी भी वस्तुके लिये नहीं कहता, प्रत्युत भगवान्में
भक्ति हो जाय, भगवद्भावोंका मनन हो जाय, इन भावोंका
प्रचार हो जाय, इनकी आवृत्ति हो जाय, सुनकर लोगोंका दुःख,
जलन, सन्ताप आदि दूर हो जाय, सबका कल्याण हो जाय-
ऐसे उद्देश्यसे कहता है। इस प्रकार भगवान्की भक्तिका
उद्देश्य रखकर कहना ही पराभक्ति करके कहना है।
इसी अध्यायके चौवनवें श्लोकमें कही गयी और इस
श्लोकमें कही गयी पराभक्तिमें अन्तर है। वहाँ 'मद्भक्तिं
लभते पराम्' पदोंसे कहा गया है कि ब्रह्मभूत होनेके बाद
सांख्ययोगी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् भगवान्से
जो अनादिकालका सम्बन्ध है, उसकी स्मृति हो जाती है।
परन्तु यहाँ सांसारिक मान-बड़ाई आदि किसीकी भी
किंचिन्मात्र कामना न रखकर केवल भगवद्भक्तिकी,
भगवत्प्रेमकी अभिलाषा रखना पराभक्ति है, इसलिये यहाँ
'भक्तिं मयि परां कृत्वा' 'मेरेमें पराभक्ति करके'-ऐसा
कहा गया है।
'य इदं परमं गुह्यम्'-इन पदोंसे पूरी गीताका
परमगुह्य संवाद लेना चाहिये, जो कि गीता-ग्रन्थ कहलाता
है। 'परमं गुह्यम्' पदोंमें ही गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम और
सर्वगुह्यतम-ये सब बातें आ जाती हैं।
'मद्भक्तेष्वभिधास्यति'-जिसकी भगवान् और उनके
वचनोंमें पूज्यबुद्धि है, आदरबुद्धि है, श्रद्धा-विश्वास है और
सुनना चाहता है, वह भक्त हो गया। ऐसे मेरे भक्तोंमें जो
इस संवादको कहेगा, वह मेरेको प्राप्त होगा।
पीछेके श्लोकमें 'नाभक्ताय' पदमें एकवचन दिया
और यहाँ 'मद्भक्तेषु' पदमें बहुवचन दिया। इसका तात्पर्य
है कि जहाँ बहुत-से श्रोता सुनते हों, वहाँ पहले बताये
दोषोंवाला कोई व्यक्ति बैठा हो तो वक्ताके लिये पहले
कहा निषेध लागू नहीं पड़ेगा; क्योंकि वक्ता केवल उस
(दोषी) व्यक्तिको गीता सुनाता ही नहीं। जैसे कोई
कबूतरोंको अनाजके दाने डालता है और कबूतर दाने
चुगते हैं। यदि उनमें कोई कौआ आकर दाने चुगने
लग जाय तो उसको उड़ाया थोड़े ही जा सकता है!
क्योंकि दाना डालनेवालेका लक्ष्य कबूतरोंको दाना
डालना ही रहता है, कौओंको नहीं। ऐसे ही कोई गीताका
प्रवचन कर रहा है और उस प्रवचनको सुननेके लिये
बीचमें कोई नया व्यक्ति आ जाय अथवा कोई उठकर चल
दे तो वक्ताका ध्यान उसकी तरफ नहीं रहता। वक्ताका
ध्यान तो सुननेवाले लोगोंकी तरफ होता है और उन्हींको
वह सुनाता है।
'मामेवैष्यत्यसंशयः'-अगर गीता सुनानेवालेका केवल
मेरा ही उद्देश्य होगा तो वह मेरेको प्राप्त हो जायगा, इसमें
कोई सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि गीताकी यह एक
विचित्र कला है कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंसे भी
परमात्माका निष्कामभावपूर्वक पूजन करता हुआ परमात्माको
प्राप्त हो जाता है (इसी अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)
और जो खाना-पीना, शौच-स्नान आदि शारीरिक कार्योंको
भी भगवान्के अर्पण कर देता है, वह भी शुभ-अशुभ
फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवान्को प्राप्त हो
जाता है (नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ श्लोक)।
तो फिर जो केवल भगवान्की भक्तिका लक्ष्य करके
गीताका प्रचार करता है, वह भगवान्को प्राप्त हो जाय,
इसमें कहना ही क्या है!
१२४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृतमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६१ ॥
| तस्मात् | = उसके समान | न | = नहीं है | अन्यः | = दूसरा |
|---|---|---|---|---|---|
| मे | = मेरा | च | = और | कोई | |
| प्रियकृतमः | = अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला | भुवि | = इस भूमण्डलपर | प्रियतरः | = प्रियतर |
| मनुष्येषु | = मनुष्योंमें | तस्मात् | = उसके समान | भविता | = होगा |
| कश्चित् | = कोई भी | मे | = मेरा | च | = भी |
| न | = नहीं । |
व्याख्या— ‘न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रिय-कृतमः’—‘जो अपनेमें लौकिक-पारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता, लिप्सा, आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है, वह पराभक्ति (इसी अध्यायका अड़सठवाँ श्लोक)—के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत वही आ सकता है, जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किंचिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति, भगवद्दर्शन, भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मान-बड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं; क्योंकि मान-बड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।
भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही ‘तस्मात्’ पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृतम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है; क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।
‘प्रियकृतमः’ पदमें जो ‘कृत’ पद आया है, उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है; केवल भगवत्प्रतीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृतम—भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।
मनुष्योंमें प्रियकृतम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी, बहादुरीकी बात नहीं है। देवता, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है; परन्तु कामनाका त्याग
करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें, परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।
‘भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि’—जिसमें अपनी मान-बड़ाईकी वासना है, कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृतमके समान) नहीं बना है; परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना, गीता कण्ठस्थ करवाना, गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है, उसके समान पृथ्वी-मण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।
अपने धर्म, सम्प्रदाय, सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है, पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।
भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसी-ऐसी विलक्षण, सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं, जिनको मनुष्य-मात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है, ऐसा मनुष्य हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो; किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो; अपनी रूचिके अनुसार किसी भी शैली, उपाय, सिद्धान्त, साधनको माननेवाला क्यों न हो, वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर, पक्षपात-विषमताको छोड़कर, किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके, मनमें किसी भी लौकिक-पारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर, अपना