साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
एकादशोऽध्यायः
(सूर्यपुत्राणां विवरणम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रजास्तस्य महात्मनः।
त्रीण्यपत्यानि संज्ञायां जनयामास वै रविः॥१॥
द्वौ पुत्रौ तु महाभागौ कन्यां कालिन्दिमेव च।
मनुर्वैवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः॥२॥
ततो यमो यमी चैव यमलौ सम्बभूवतुः।
तेजस्त्वभ्यधिकं तस्य नित्यमेव विवस्वतः॥३॥
नारद कहते हैं—इसके पश्चात् महात्मा सूर्य के सन्तानों का वर्णन करता हूँ। रवि की संज्ञा नामक भार्या से तीन सन्तानें हुईं। महाभाग्यवान दो पुत्र हुये तथा कन्या कालिन्दी का जन्म हुआ। ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु तथा द्वितीय हैं—प्रजापति श्राद्धदेव। तत्पश्चात् यमज (जुड़वा) सन्तान हुई—यम तथा यमी। इस प्रकार इन सूर्य का तेज नित्य अधिक होने लगा॥१-३॥
तेनातितापयामास त्रींल्लोकान् सचराचरान्।
गोलाकारं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती तु तत्तेजः स्वां छायां प्रेष्य चाब्रवीत्॥४॥
सूर्य का वह तेज तीनों लोकों को तापित करने लगा। सूर्य का वह गोलाकार रूप देखकर संज्ञा उसे सहन न कर सकी। उन्होंने अपनी छाया से कहा॥४॥
संज्ञोवाच
भव नारीस्वरूपा त्वं लक्षणैः सदृशी मम॥५॥
एवमुक्त्वा समुत्तिष्ठत्तस्याः सदृशलक्षणा।
महीमयी तु सा संज्ञा तस्या च्छाया समुत्थिता॥६॥
संज्ञा कहती है—‘तुम मेरे समान नारीरूपा हो जाओ’। तत्पश्चात् संज्ञा पृथिवीमयी होकर छायारूपेण उत्थित हो गयीं॥५-६॥
प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञामभाषत॥७॥
यदर्थमहमुत्पन्ना तदाज्ञापय शोभने।
सर्वमेव करिष्यामि यद्यपि स्यात्तु दुष्करम्॥८॥
५६ | श्रीसाम्बपुराणम्
विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके छाया ने संज्ञा से कहा कि मैं जिस कार्य के लिये उत्पन्न हुई हूँ, मुझसे कहें। आप जो भी कहेंगी, वह सब मैं करूँगी, यद्यपि यह बहुत ही दुष्कर है॥७-८॥
संज्ञोवाच
अहं यास्यामि भद्रं ते स्वयमेव गृहं विभुः।
निर्विकारेण वक्तव्यं त्वयेह भवने मम ॥९॥
हेमौ च बालकौ ह्यङ्के कन्या च वरवर्णिनी।
सम्भाव्या नैव चाख्येयमिदं भगवतस्त्वया ॥१०॥
संज्ञा कहती है—तुम्हारा मंगल हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। तुम मेरे रूप में स्थिर भाव से अवस्थान करो। इन दो बालकों की तथा वरवर्णिनी गोद की कन्या की तुम देखभाल करो। तुम भगवान् सूर्य से कभी भी यह सब नहीं कहना॥९-१०॥
नाख्यास्यामि मतं तस्मै गच्छ देवि! यथासुखम्।
इत्युक्ता छायया संज्ञा जगाम भवनं पितुः ॥११॥
पितुः समीपे गत्वा तु व्रीड़िता सा तपस्विनी।
वर्षाणां तु सहस्रं वै वसमाना पितुर्गृहे ॥१२॥
छाया ने उत्तर दिया—मैं तुम्हारी बात को सूर्यदेव से कभी प्रकट नहीं करूँगी। हे देवि! तुम यथासुख जाओ। छाया द्वारा ऐसा कहने पर संज्ञा पिता के घर चली गयीं; किन्तु पिता के पास जाकर लज्जित होकर सहस्र वर्ष-पर्यन्त पिता के घर में रहती हुई तपस्या करने लगीं॥११-१२॥
भर्तुः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनः पुनः।
आगच्छत् बड़वा भूत्वा त्यक्त्वा रूपं यशस्विनी ॥१३॥
जब पिता ने बार-बार यह कहा कि स्वामी के पास जाओ, तब उन यशस्विनी ने अपना रूप छोड़कर घोड़ी का रूप धारण कर लिया॥१३॥
उत्तरांश्च कुरून् गत्वा तृणान्यथ चचार ह।
ततो गतायां संज्ञायां संज्ञायां वचनेन सा ॥१४॥
संज्ञारूपं ततः कृत्वा छाया सूर्यमुपस्थिता।
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमित्यचिन्तयत् ॥१५॥
तदनन्तर संज्ञा उत्तर कुरु में जाकर तृण खाती हुई रहने लगी। इधर संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर छाया संज्ञा के कथनानुसार संज्ञा का रूप धारण करके सूर्य के पास गई और उन्हें भगवान् सूर्यदेव ने भी संज्ञा ही समझा॥१४-१५॥
एकादशोऽध्यायः ५७
एकादशोऽध्यायः ५७
भास्करो जनयामास पुत्रौ कन्यां च रूपिणीम् । पूर्वजस्य मनोस्तुल्यौ सादृश्येन च तावुभौ ॥१६॥ छाया को सूर्यदेव से दो पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई। उन पुत्रद्वय ने ज्येष्ठ भ्राता मनु का सादृश्यलाभ किया॥१६॥
श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ श्रुतकर्मा तथैव च । श्रुतकर्मा मनुस्ताभ्यां सावर्ण्यो भविष्यति ॥१७॥ श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ एवं श्रुतकर्मा भी उसी प्रकार थे। श्रुतश्रवा तथा मनु से बहुत से सूर्यवंशीगणों का उद्भव हुआ। श्रुतश्रवा भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥१७॥
श्रुतकर्मा स विज्ञेयो ग्रहो यो वै शनैश्चरः । कन्या च तपती नाम्ना रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥१८॥ श्रुतकर्मा ग्रहरूप में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वे शनिग्रह नाम से प्रसिद्ध हैं और कन्या तपती रूप में अत्यन्त अपूर्व थी॥१८॥
संज्ञा तु पार्थिवी तेषामात्मजानां तथाकरोत् । स्नेहेन पूर्वजानां तु तथा कृतवती तु सा ॥१९॥ पृथिवी संज्ञा (अर्थात् छाया) अपने पुत्र से जितना स्नेह करती थी, वैसा पूर्वजात (पहले उत्पन्न हुये) संज्ञा के पुत्रों से नहीं करती थी॥१९॥
मनुस्तु क्षमते तस्या यमस्तस्या न च क्षमेत् । बहुशो शोच्यमानस्तु पितुः पत्न्या सुदुःखितः ॥२०॥ स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात् । पादेन तर्जयामास छायां वैवस्वतो यमः ॥२१॥ वह मनु को जिस प्रकार प्रेम करती थी, उस प्रकार यम को प्रेम नहीं करती थी, इस कारण अत्यधिक शोक करते हुये अपने पिता की पत्नी से दुःखित उन वैवस्वत यम ने क्रोध से बाल्यवशात् तथा भावी दैवावेश के कारण पैर से छाया का तर्जन किया॥२०-२१॥
तं शशाप ततः क्रुद्धा संज्ञा सा पार्थिवी शुभा । यदा तर्जयसे यन्मां पितुर्भार्या गरीयसीम् । तस्मात्तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ॥२२॥ इससे क्रुद्ध होकर पार्थिवी संज्ञा (छाया) ने यम को अभिशाप दिया कि 'पिता की भार्या गरीयसी होती है; क्योंकि तुमने मेरा तर्जन किया है, अतएव तुम्हारा यह पैर (जिससे मुझ पर प्रहार किया है) गिर जायेगा'। यह निःसंदिग्ध है॥२२॥
५८ | श्रीसाम्बपुराणम्
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः।
मनुना सह धर्मात्मा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्॥२३॥
स्नेहेन तुल्यं महता माता देव! न वर्त्तते॥२४॥
इससे धर्मात्मा यम ने उस शाप से अत्यन्त पीड़ित होकर मनु के साथ पिता के पास जाकर समस्त वृत्तान्त बताया। 'हे देव (पिता)! माँ के समान स्नेह की समता इसमें कहीं नहीं है॥२३-२४॥
सन्त्यज्य प्रायशोऽस्मान् सा कनीयांसो विधित्सति।
तस्यां मयोद्यतः पादो न च देहे निपातितः॥२५॥
प्रायः हमारा परित्याग करके वे छोटे भाइयों का अधिक यत्न करती हैं। मैंने उन्हें पैर दिखलाया था, किन्तु वह उनके शरीर से नहीं लगा॥२५॥
बालाद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् वक्तुमर्हसि।
शप्तोऽहमेव देवेश जनन्या तपसा वर।
तव प्रसादाच्चरणस्त्रायतां महतो भयात्॥२६॥
हे देवेश! बालक-स्वभाव से अथवा मोह से आप जो भी कहें, हे तपश्रेष्ठ! जननी द्वारा मैं अभिशप्त हो गया हूँ। उस महाभय से आपकी कृपा से मेरी रक्षा हो॥२६॥
रविरुवाच
असंशयं मरुत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं धर्मशालिनम्॥२७॥
रवि कहते हैं—हे पुत्र! इस व्यापार में निश्चय ही विशेष कारण है; क्योंकि धर्मज्ञ तथा धर्मशाली तुममें क्रोध ने प्रवेश किया है॥२७॥
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातस्तु विद्यते।
न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिन्मोक्षो भवेदिह॥२८॥
न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव।
क्वचित्तेऽहं विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्॥२९॥
कृमयो मांसमादाय पतिष्यन्ति महीतले।
कृतमस्या वचः सत्यं त्वं च त्राता भविष्यसि॥३०॥
समस्त शाप का प्रतिकार है; किन्तु माता के अभिशाप को मिथ्या कर सकने में मैं भी समर्थ नहीं हूँ। किन्तु पुत्रस्नेह के कारण कुछ कृपा कर सकता हूँ। कृमिगण मांस लेकर भूमि पर पतित होंगे, इससे उनके वाक्य की सत्यता भी होगी और तुम भी त्राण पा जाओगे॥२८-३०॥
एकादशोऽध्यायः ५९
एकादशोऽध्यायः ५९
नारद उवाच
आदित्यस्त्वब्रवीत् छायां किमर्थं तनयेषु वै।
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया ॥३१॥
सा परिहरन्त्यस्मै नाचचक्षे विवस्वतः।
आत्मानं स समाधाय युक्तस्तथ्यमपश्यतः ॥३२॥
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुपितः प्रभुः।
ततः छाया यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वतः ॥३३॥
नारद कहते हैं—तत्पश्चात् आदित्य भगवान् ने छाया से पूछा कि तुम बराबर के पुत्रों में से एक में अधिक स्नेह करती हो? युक्तियुक्त कोई मार्ग न देखकर स्वयं को संयत करके छाया ने परिहार करने की इच्छा से सूर्य को कोई उत्तर नहीं दिया। इससे क्रुद्ध होकर प्रभु सूर्यदेव छाया के विनाश के लिये शाप देने हेतु कुपित हो गये। तदनन्तर छाया ने सूर्य को सब वृत्तान्त बतलाया॥३१-३३॥
विवस्वांस्तु ततः श्रुत्वा क्रुद्धः श्वशुरमभ्यगात्।
स चापि तं यथान्यायमर्चयित्वा तु रोपितम् ॥३४॥
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास तं शनैः ॥३५॥
विवस्वान् छाया के वचन सुनकर क्रोधित हो अपने श्वसुर के पास गये। उन्होंने (विश्वकर्मा ने) भी उनकी यथायोग्य संवर्धना करके उनके कोप से दग्धकाम चित्त को धीरे-धीरे सान्त्वना प्रदान किया॥३४-३५॥
विश्वकर्मोवाच
तवातितेजसाविष्टमिदं रूपं सुदुःसहम्।
असहन्ती तु सा संज्ञा वने वसति शाद्वले ॥३६॥
द्रक्ष्यसे तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम्।
रूपार्थं भवतोऽरण्ये चरन्तीं सुमहत्तपः ॥३७॥
तुम्हारा यह तेजोरूप अत्यन्त दुःसह है। वह संज्ञा उसे सहन न कर पाने से तृणाच्छादित वन में तप कर रही है। आज तुम अपनी मंगलचारिणी भार्या को देख सकोगे। तुम्हारे इस तेजोरूप के कारण वह अरण्य में महान् तप कर रही है॥३६-३७॥
मतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव! रोचते।
रूपं निवर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिन्दम ॥३८॥
रूपं विवस्वतश्चासीत्तिर्यगूर्ध्वमधः समम्।
तेनापि पीड़ितो देवो रूपेण ते दिवस्पतिः ॥३९॥
६० श्रीसाम्बपुराणम्
सन्तुष्टस्तस्य तद्वाक्यं बहु मेने महातपाः।
अनुज्ञातस्ततस्त्वष्टा रूपनिर्वर्त्तनस्य तु॥४०॥
हे देव! मेरे समान ब्राह्मण का वाक्य यदि आपको रुचिकर लगे, तब हे अरिन्दम! आपके इस रूप को मैं कमनीय बना दूँ। सूर्य का रूप तब तिर्यक्, ऊर्ध्व, अधः, सम था। उस रूप से सूर्यदेव स्वयं पीड़ित थे। सन्तुष्ट होकर महातपा सूर्य ने उनके वाक्य का सम्मान किया और रूप-परिवर्त्तनार्थ त्वष्टा (विश्वकर्मा) को अनुमति प्रदान किया॥३८-४०॥
विश्वकर्माभ्यनुज्ञातः शकद्वीपे विवस्वतः।
भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शान्तयमास तस्य वै॥४१॥
आज्ञया लिखितश्चासौ निपुणं विश्वकर्मणा।
नाभ्यनन्दत्तल्लिखनं ततस्तेनावतारितः॥४२॥
तत्तु निष्पादितं रूपं तेजसापहृतेन तु।
कान्तात् कान्तरं भूत्वा ह्यधिकं शुशुभे ततः॥४३॥
विश्वकर्मा ने अनुज्ञात होकर शकद्वीप में चक्र का आरोपण करके सूर्य के उस तेज को संयत किया। आदेश पाकर विश्वकर्मा ने निपुणता से रेखा बनाया; किन्तु उस अङ्कन को सूर्य ने पसन्द नहीं किया। तब उन्होंने वहाँ से उतर कर तेज का अपहार करके (तेज-संवरण करके) अपना रूप निष्पन्न किया। तदनन्तर सुन्दर से सुन्दर रूप में इनकी आकृति शोभित हो गयी॥४१-४३॥
ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां बड़वां तदा।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा स्वेन संवृताम्॥४४॥
अश्वरूपेण मार्तण्डस्तां मुखे समभावयत्।
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसो विशङ्कया॥४५॥
सा तद्विवस्वतः शुक्रं नासिकाभ्यां निरावमत्।
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ॥४६॥
तब सूर्यदेव ने अपने योगबल से अपने तेज को संवृत करके सकल प्राणियों द्वारा अधृष्य घोड़ी रूप से वर्तमान अपनी भार्या को देखा। तब मार्त्तण्ड ने भी अश्वरूप धारण करके उनसे मुख मिलाया। परपुरुष से मैथुन असंगत जानकर संज्ञा ने सूर्य के शुक्र को अपनी नासिका से बाहर निकाल दिया, जिससे चिकित्सकश्रेष्ठ अश्विनीकुमार उत्पन्न हुये॥४४-४६॥
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ तौ नामतोऽश्विनौ।
ततः कान्तं स्वकं रूपं दर्शयामास भास्करः॥४७॥
एकादशोऽध्यायः ६१
वे अश्विनीकुमार नासत्य (नासिका से तेज त्याग करने से) तथा दस्र (रोग नाशकारी) नाम से अभिहित हो गये। तदनन्तर सूर्यदेव ने संज्ञा के समक्ष अपना रूप प्रदर्शित किया॥४७॥
तं दृष्ट्वा सापि संज्ञा तु तुतोष च मुमोद च।
तस्माच्च शुक्रसंयोगाद् गुणाद् भूमेस्तथैव च ॥४८॥
अश्वारूढ़शरी धन्वी कुमारः समजायत।
यतो यं रेतसो जातस्तेन देवेन भावितः ॥४९॥
रैवतो नामतस्त्वेष ख्यातिं लोके गमिष्यति।
सप्तद्वयादितो लोकात् पूजां प्राप्स्यति नित्यशः ॥५०॥
उन्हें देखकर संज्ञा भी तुष्ट तथा आनन्दित हो गयीं। उस शुक्रसंयोग तथा भूमि के गुण से अश्वारूढ़ कुमार उत्पन्न हुये। सूर्यदेव का जो रेतः जहाँ गिरा था, वह जगत् में रैवत नाम से प्रसिद्ध हो गया तथा वह चतुर्दश भुवन में नित्य पूजित हो गया॥४८-५०॥
प्लवन गच्छन् प्रयन् यस्माद्वसुमतयां यतस्ततः।
मनुर्यमो यमी चैव सावर्णिंश्च शनैश्चरः ॥५१॥
तपती चाश्विनौ चैव रेवन्तश्च रवेः सुताः ॥५२॥
वसुमति से धावन, गमन तथा संयमन के कारण मनु, यम तथा यमी, सावर्णि, शनि-ग्रह, तपती, अश्विनीकुमार-द्वय तथा रेवन्त—ये सब रवि के पुत्रगण हुये॥५१-५२॥
एवमेषा पुरा संज्ञा द्वितीया पार्थिवी स्मृता।
या संज्ञा सा स्मृता राज्ञी छाया या सापि निक्षुभा ॥५३॥
इस प्रकार इनमें पूर्व में जो थीं, वे संज्ञा थीं और जो द्वितीया थीं (छाया थीं) वे पार्थिवी कही जाती हैं। जो संज्ञा हैं, वे राज्ञी हैं और जो छाया है, वे हैं निक्षुभा॥५३॥
राजृ दीप्तौ स्मृतो धातुः राजा राजयते सदा।
अधिकं सर्वभूतेभ्यो राजते च दिवाकरः ॥५४॥
राजपत्नी तु सा यस्मात्तेन राज्ञी प्रकीर्तिता ॥५५॥
राज् धातु का अर्थ है—दीप्ति। जो सदा प्रदीप्त हैं, वे राजा एवं समस्त प्राणिगण के मध्य अधिक दीप्तिलाभ करते हैं। अधिक रूप से दीप्त होने के कारण वे राजा कहलाते हैं। संज्ञा राजपत्नी होने के कारण राज्ञी कहलाती हैं॥५४-५५॥
ते यं सञ्चालिता यस्माद् राज्ञा यत्तदुपाहतम्।
क्षुभ सञ्चलने धातुर्निक्षुभा तेन निश्चला ॥५६॥
राजा द्वारा सञ्चालित होने के कारण उन्हें ऐसा कहा गया है। क्षुभ धातु का अर्थ है—संचालन। अतएव निक्षुभा का अर्थ है—निश्चला॥५६॥
६२ श्रीसाम्बपुराणम्
भवन्त्यतीव यस्माद्वा स्वर्गेऽपि क्षुद्विवर्जिता ।
छायाति विशते दिव्या स्मृता सा तेन निक्षुभा ॥५७॥
जो अत्यन्त रूप से विद्यमान है अथवा स्वर्ग में जो क्षुधा-विवर्जित है, दिव्य छाया में जो प्रवेश करती है, इसी कारण उन्हें निक्षुभा कहा गया है॥५७॥
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः ।
धर्मेण रक्षयामास धर्मराजस्ततोऽभवत् ॥५८॥
यम उस अभिशाप से अत्यन्त पीड़ित होकर धर्म द्वारा (पिता द्वारा) रक्षित हुये थे; इसीलिये उनको धर्मराज कहा गया॥५८॥
शुभेन कर्मणा चैव संप्राप्तः परमां द्युतिम् ।
पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च ॥५९॥
शुभ कर्म द्वारा (यम ने) परम द्युति प्राप्त किया तथा पितृगण का आधिपत्य एवं लोकपालत्व पाया॥५९॥
यस्तु ज्येष्ठो मनुस्तेषां सर्गस्तस्य तु साम्प्रतम् ।
तस्याप्यैक्ष्वाकवो वंशो यस्मिन् जातो बृहद्बलः ॥६०॥
इनमें से जो ज्येष्ठ मनु थे, उनसे ही सृष्टि हुई है। उनसे इक्ष्वाकु वंश प्रादुर्भूत हुआ। उसी वंश में महाराज बृहद्बल ने जन्म लिया था॥६०॥
कनीयसी तयोर्यातु यमी कन्या यशस्विनी ।
अभवत्सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकपावनी ॥६१॥
उनमें जो कनिष्ठा, यशस्विनी कन्या यमी थी, वे लोकपावनी श्रेष्ठ नदी यमुना हुईं॥६१॥
मनुः प्रजापतिश्चैव सावर्णिः सुमहातपाः ।
भाव्यः सोऽनागते तस्मिन् मनुः सावर्णिकोऽन्तरे ॥६२॥
मनु प्रजापति एवं महातपा सावर्णि भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥६२॥
मेरुपृष्ठे तपो दिव्यमथापि चरति प्रभुः ।
भ्राता शनैश्चरस्तस्य ग्रहत्वं स तु लब्धवान् ॥६३॥
उनके भ्राता शनिश्चर ने मेरुपृष्ठ पर तपस्या करके ग्रहत्व प्राप्त किया था॥६३॥
तपती नाम या भानोस्तयोः कन्या कनीयसी ।
सा बभूव शुभा पत्नी राज्ञः संवरणस्य तु ॥६४॥
एकादशोऽध्यायः ६३
एकादशोऽध्यायः ६३
जो तपती नामक सूर्य की कनीयसी कन्या थी, वे राजा संवरण की मंगलमयी पत्नी हुईं॥६४॥
तपती नाम नद्येवं विन्ध्यपादाद् विनिस्सृता।
नित्यं पुण्यजला स्नानैर्मार्तण्डतनया शुभा॥६५॥
तपती नामक जो नदी विन्ध्य पर्वत के पाददेश से निकलती है, वे मार्तण्डतनया नित्य पुण्यसलिला तथा स्नान द्वारा मङ्गलदात्री हैं॥६५॥
अश्विनौ देववैद्यत्वं लब्धवन्तौ यशस्विनौ।
तयोः कर्मोपजीवन्ति लोकेऽस्मिन् भिषजः शुभाः॥६६॥
अश्विनी कुमारद्वय देववैद्यत्व लाभ करके यशस्वी हो गये। उनका कर्म इस जगत् के कुशल चिकित्सकगण ग्रहण करके जीवन-यापन करते हैं॥६६॥
रेवन्तो नाम योऽर्कस्य रूपेणाप्रतिमः सुतः।
सत्ववान् पावनः सोऽथ शीघ्रमेव प्रसीदति॥६७॥
रेवन्त नामक रूप में अतुलनीय जो सूर्यपुत्र हैं, वे सात्विक तथा पवित्रकारक हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं॥६७॥
क्षेमेण ब्रजते ध्यानं यस्तु पूजयते पथि।
सुखप्रसादो मर्त्यानामाख्यास्यति यथासुखम्॥६८॥
जो मंगलपूर्ण ध्यान करते हैं तथा कहीं जाते समय इनका ध्यान करते हैं, वे मर्त्यगण के (पृथ्वी के) यथेच्छ सुख प्रसन्नता पाते हैं॥६८॥
य इदं जन्म देवानां शृणुयाद्वा पठेत्तथा।
विवर्द्धयतोऽथ पुत्राणां सर्वेषामपि तैजसम्॥६९॥
आपदं प्राप्य मुच्येते प्राप्नुयाच्च महत्फलम्॥७०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यपुत्राणां विवरणं नामैकादशोऽध्यायः
जो इन देवता के जन्म-वृत्तान्त को सुनते हैं अथवा पाठ करते हैं, वे सभी पुत्रगण की तैजस कृपा (वृद्धि) को प्राप्त करते हैं एवं विपत्ति से मुक्त होकर महान् फल पाते हैं॥६९-७०॥
श्री साम्बपुराण में सूर्यपुत्र-विवरण नामक एकादश अध्याय समाप्त
द्वादशोऽध्यायः
(सूर्यस्य शरीरलिखनम्)
साम्ब उवाच
शरीरलिखनं भानोरुक्तं संक्षेपतस्त्वया ।
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥
साम्ब कहते हैं—सूर्य के शरीर के मसृणता-सम्पादन के विषय में आपने संक्षेप में कहा है। मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ। हे सुव्रत! मुझसे कहिये॥१॥
नारद उवाच
पितृगृहे गतायां तु संज्ञायां यदुनन्दन ।
भास्करश्चिन्तयामास संज्ञां मद्रूपकाङ्क्षिणीम् ॥२॥
याता पितृगृहं यच्च तपस्तेपे यशस्विनी ।
तस्मान्मनीषितं तस्याः पूरयामि मनोरथम् ॥३॥
नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन साम्ब! संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर भास्कर चिन्ता करने लगे ‘संज्ञा मुझे रूपवान् देखना चाहती है। पिता के घर पर वह यशस्विनी तप कर रही है। अतएव मैं उसका मनोरथ पूर्ण करूँगा’॥२-३॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा तत्रागत्य दिवाकरम् ।
ऊचे मधुरया वाचा रवेः प्रीतिकरं वचः ॥४॥
इस अवसर पर ब्रह्मा वहाँ आकर मधुर भाषा में प्रीतिकर वाक्यों द्वारा सूर्य से इस प्रकार कहने लगे॥४॥
आदिदेवोऽसि देवानां ज्ञातमेतत् स्वयं मया ।
श्वशुरो विश्वकर्मा ते रूपं निर्वर्त्तयिष्यति ॥५॥
तुम देवगण के आदिदेव हो, यह मैं स्वयं जानता हूँ। तुम्हारे श्वसुर विश्वकर्मा तुम्हारे रूप का परिवर्त्तन कर देंगे अर्थात् काट-छाँटकर मसृण तथा सुश्रीक कर देंगे॥५॥
एवमुक्त्वा रविं ब्रह्मा विश्वकर्माणमब्रवीत् ।
निवर्त्तयस्व रूपं तं मार्त्तण्डस्य तु शोभनम् ॥६॥
तदनन्तर ब्रह्मा ने रवि से ऐसा कहने के उपरान्त विश्वकर्मा से कहा—तुम मार्त्तण्ड को शोभन रूप से युक्त कर दो॥६॥
द्वादशोऽध्यायः ६५
ततो ब्रह्मसमादेशाद् भ्रमिमारोप्य भास्करम्।
रूपं निवर्त्तयामास विश्वकर्मा शनैः शनैः॥७॥
तदनन्तर भगवान् ब्रह्मा के आदेशानुसार विश्वकर्मा ने घूर्णचक्र पर भास्कर को स्थापित करके धीरे-धीरे उनके रूप को मसृणता प्रदान किया॥७॥
ततस्तुष्टाव तं ब्रह्मा सर्वैर्देवगणैः सह।
गुह्यैर्नानाविधैः स्तोत्रैर्वेदवेदाङ्गसम्मितैः ॥८॥
तदनन्तर ब्रह्मा सभी देवगण के साथ उनकी वेद-वेदांगसम्मत नानाविध गुह्य स्तोत्रों से स्तुति करने लगे॥८॥
स्वस्ति तेऽस्तु जगन्नाथ वर्षघर्महिमप्रभ।
शान्तिं जुषस्व लोकानां देवदेव दिवाकर! ॥९॥
ततो रुद्रश्च विष्णुश्च भक्त्या तुष्टुवतुस्तदा।
तेजस्ते वर्धतां देव खिल्यमानं दिवस्पते ॥१०॥
इन्द्रस्त्वागत्य तं देवं लिख्यमानमथास्तुवत्।
जय देव जयस्वेति शश्वज्जय जगत्पते ॥११॥
ऋषयश्च ततः सप्त विश्वामित्रपुरोगमाः।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः स्वस्तिस्वस्तीति वादिनः ॥१२॥
हे जगन्नाथ! आपका मंगल हो। वर्षा, ताप तथा दिन प्रदान करने वाले हे देवदेव दिवाकर! लोकों का शान्ति-विधान करिये। तदनन्तर रुद्र तथा विष्णु ने उनकी स्तुति किया—हे देव! हे दिवस्पति! आपका मसृण तेजवर्द्धित हो। तदनन्तर इन्द्र ने मसृणता-प्राप्त सूर्य की स्तुति की—जय हो! हे देव! आप जयलाभ करें। हे जगत्पते! आपकी सदा जय हो। तदनन्तर विश्वामित्र आदि सप्तर्षियों ने स्तुति की—'आपका मंगल हो'। यह कहकर वे सभी विविध स्तोत्रों को पढ़ने लगे॥९-१२॥
वेदोक्ताभिस्तथाशीर्भिर्बालखिल्याश्च तुष्टुवुः।
त्वं नाथ मोक्षिणां मोक्षो ध्येयस्त्वं ध्यायिनां सदा ॥१३॥
स्वर्गतिः सर्वसत्त्वानां त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
शं प्रजाभ्योऽस्तु देवेश प्रसन्नोऽस्तु जगत्पते ॥१४॥
बालखिल्यादि वेदोक्त आशीर्वाद द्वारा उनकी स्तुति करने लगे। हे नाथ! आप मोक्षार्थी गण के मोक्ष तथा ध्यानकोविदों के सर्वदा ध्येय हैं। सकल प्राणिगण के आप स्वर्ग-प्रापक हैं। आप ही में सबकुछ प्रतिष्ठित है। हे देवेश! प्रजागण का मंगल हो। जगत्पति आप प्रसन्न होईये॥१३-१४॥
६६ श्रीसाम्बपुराणम्
यथा विद्याधरा नागा यक्षराक्षसपन्नगाः।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिः प्रणता रविम् ॥१५॥
ऊचिरे विविधा वाचो मनःश्रोत्रसुखावहाः।
सह्यं भवतु तेजस्ते भूतानां भूतभावन! ॥१६॥
विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस, पन्नग सभी अञ्जलिबद्ध होकर रवि का मन तथा कानों को सुखावह लगने वाले विचित्र स्तोत्र पढ़ने लगे। हे भूतभावन! आपका तेज सभी प्राणीगण सहन कर सकें॥१५-१६॥
ततो हाहा हूहूश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा।
उपगायितुमारब्धा गन्धर्वकुशला रविम् ॥१७॥
षड्ज-मध्यम-गान्धार-ग्रामत्रय-विशारदाः ।
मूर्च्छनाभिश्च तालैश्च सम्यारितशकैशिकैः ॥१८॥
तदनन्तर हाहा, हूहू, तुम्बुरु तथा नारद स्तुति करने लगे। गन्धर्वकुशल गण रवि-सम्बन्धित गायन गाने लगे। षड्ज, मध्यम, गान्धार, ग्रामत्रय में जो विशारद थे, वे मूर्च्छना तथा ताल के संयोग से गायन करने लगे॥१७-१८॥
विश्वाची च घृताची च ह्युर्वशी च तिलोत्तमा।
मेनका च सुजन्या च रम्भा चाप्सरसां वरा ॥१९॥
उपनर्त्तितुमारब्धा लिख्यमानं विभावसुम्।
हावभावविलासैश्च कुर्वन्त्योऽभिनयान् बहून् ॥२०॥
विश्वाची, घृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सुजन्या तथा अप्सरागण में श्रेष्ठ रम्भा नृत्य आरम्भ करके मसृणता-प्राप्त विभावसु के उद्देश्य से हाव-भाव-विलास के द्वारा अनेक अभिनय करने लगीं॥१९-२०॥
ततः तीब्रलयं गेयं मधुरं चाभ्यवर्त्तत।
सर्वेषामेव देवानां मनःश्रोत्रसुखप्रदम् ॥२१॥
तत्पश्चात् अति मधुर अव्यक्त कलकल ध्वनि उत्थित होने लगी, जो सभी देवताओं के मन तथा कर्ण के लिये सुखप्रद थी॥२१॥
प्रवाद्यन्तः ततस्तन्त्री-वीणा-देवादिदर्दुरा।
पणवाः पुष्कराश्चैव मृदङ्गाः पटहास्तथा ॥२२॥
देवदुन्दुभयः शङ्खः शतशोऽथ सहस्रशः।
गायद्भिश्चैव गन्धर्वैर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥२३॥
तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम् ॥२४॥
द्वादशोऽध्यायः ६७
द्वादशोऽध्यायः ६७
ततः कृतैः करपुटैः पद्मकेशरसंयुतैः ।
ललाटोपरि विन्यस्तैः प्रणेमुः सर्वदेवताः ॥२५॥
तत्पश्चात् तन्त्री, वीणा, वेणु-प्रभृति, दर्दुर, पणव, पुष्कर, मृदंग, पटह, देव-दुन्दुभि, शत-सहस्र शङ्ख बजाये गये। गन्धर्वगण गायन करने लगे, अप्सरागण नृत्य करने लगीं। तूर्य वादित्र शब्द की ध्वनि से कोलाहल होने लगा। तदनन्तर पद्म-केसरयुक्त करपुट का ललाट में विन्यास करके समस्त देवगण ने भगवान् सूर्य को प्रणाम किया।।२२-२५।।
ततः कोलाहले तस्मिन् सर्वदेवसमागमे ।
तेजसः शातनं चक्रे विश्वकर्मा शनैः शनैः ॥२६॥
समस्त देवगण-कृत इस कोलाहल के मध्य में विश्वकर्मा धीरे-धीरे सूर्यदेव के तेज को खण्ड-खण्ड छेदित करने लगे।।२६।।
इति हिमजलघर्मकालहेतो हरकमलासन विष्णुसंस्तुतस्य ।
तनुपरिलिखनं निगद्य भानोर्व्रजति दिवाकरलोकमायुषोऽन्ते ॥२७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्य शरीरलिखनं नाम द्वादशोऽध्यायः
हिम, जल तथा ताप और काल के जो कारण हैं, ब्रह्मा विष्णु से जो संस्तुत हैं, उन सूर्य की मसृणता का जो सम्पादन करते हैं (पाठ करते हैं), वे आयु-समाप्ति के अनन्तर सूर्यलोक प्राप्त करते हैं।।२७।।
श्री साम्बपुराण का श्रीसूर्य शरीर-मसृणता-सम्पादन नामक द्वादश अध्याय समाप्त
त्रयोदशोऽध्यायः
(विश्वकर्मणः सूर्यस्तुतिः)
साम्ब उवाच
तस्मिन् काले भ्रमे रूपे लिख्यमानो दिवस्पतिः।
ब्रह्मादिभिर्यथा देवः स्तुतो वै तद्वदस्व मे ॥१॥
साम्ब पूछते हैं—घूर्णि चक्र से जब सूर्यदेव मसृण हो गये, तब ब्रह्मादि देवगण ने जैसे उनकी स्तुति की, वह कहिये॥१॥
नारद उवाच
ततो लिखितुमारब्धः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
विश्वकर्माथ मार्तण्डः स्तोत्रेणानेन संस्तुवन् ॥२॥
नारद कहते हैं—तदनन्तर विश्वकर्मा प्रहृष्ट अन्तःकरण से मार्त्तण्ड की यह स्तुति करते-करते उनको मसृण करने का कार्य करने लगे॥२॥
विश्वकर्मोवाच
प्रयलतः प्रणतहितानुकम्पिने मरुत्वतः समनवसप्तसप्तये।
विवस्वते कमलकुलावबोधिने नमस्तमःपटलपटावपाटिने ॥३॥
पावनाय शुचिपुण्यकर्मणे नैककामविषयप्रदायिने।
भास्वरामलमयूखमालिने सर्वलोकहितकारिणे नमः ॥४॥
अजाय लोकत्रयकारणाय भूतात्मने गोपतये वृषाय।
नमो महाकारुणिकोत्तमाय सूर्याय सर्वप्रभवाप्ययाय ॥५॥
विश्वकर्मा कहते हैं—जिनकी अनुकम्पा प्रणत जनों के लिये रहती है, मनुगण के साथ जो ४९ मरुत् रूपेण अवस्थित हैं, जो कमलों की निद्रा भंग करने वाले हैं (सूर्य के उदय से कमल खिलते हैं), गाढ़ अन्धकाररूप पर्दे को जो हटाने वाले हैं, उन विवस्वान् को हम प्रणाम करते हैं। जो पवित्र करने वाले, शुचि तथा पुण्यकर्मा हैं, बहुत-सी कामनाओं को फलित—पूर्ण करने वाले हैं, उज्ज्वल-निर्मल किरण वाले, सर्वजनहितकारी सूर्यदेव को नमस्कार करता हूँ। जो अज, त्रिभुवन के कारणरूप, प्राणियों के आत्मस्वरूप, गौ (किरणों) के रक्षक, प्रसिद्ध कामवर्षणकारी, महाकारुणिकों में श्रेष्ठ, सबकी उत्पत्ति तथा विनाश के कारण हैं, उन सूर्यदेव को नमस्कार है॥३-५॥
त्रयोदशोऽध्यायः ६९
त्रयोदशोऽध्यायः ६९
विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धितैषिणे।
स्वयम्भुवे लोकसमस्तचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥६॥
जो ज्ञानियों की अन्तरात्मा, जगत् के प्रतिष्ठारूप, जगत् के हितकामी, स्वयम्भू, समस्त लोकों के चक्षुरूप, देवश्रेष्ठ, असीम तेजोरूप सूर्यदेव हैं, उनको नमस्कार है॥६॥
क्षणमुदयाचलमौलिमणिः सुरगणवन्द्योऽपि हितो जगतः।
त्वमुरुमयूखसहस्रवपुर्जगति विभाति तमोसि नुदन् ॥७॥
तव तिमिरासवपानमदाद् भवति विलोहितविग्रहता।
तिमिरविभासि यतः सुतरां त्रिभुवनभावनतीक्ष्णकरैः ॥८॥
क्षण काल के लिये उदय पर्वत शिखर के मणिरूप, सुरगण से पूजित होने पर भी जगत् का हित करने वाले हे सूर्य! आप सहस्रों किरणयुक्त शरीर से अन्धकार दूर करते हैं और जगत् प्रकाशित होता है। तिमिररूप मद्यपान से मत्ततावशात् आपकी देह रक्तवर्ण हो गयी है, अतएव हे तिमिर! आप अपनी त्रिभुवन-प्रकाशक तीव्र किरणों से अधिक रूप से प्रकाशित हो रहे हैं॥७-८॥
रथमधिरुह्य समावयवैः परिविधिकल्पितभूरुचिरम्।
सततमखिन्नहयैर्भगवंश्चरसि जगत् स्थितयेऽविरतम् ॥९॥
अमृतसुधादिरसेन समं सुरगणभूतगणेन समम्।
प्रणिपतितैकपदं त्रितयं शुकसमवर्णहयप्रथितम् ॥१०॥
तव पदपांसुपवित्रतमं ह्यभिरतवत्सल मां प्रणतम्।
त्रिभुवनपावनपाहि रवे विविधगदार्त्तियुतं सततम् ॥११॥
इति श्रीसाम्बपुराणे विश्वकर्मणः सूर्यस्तुतिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः
हे भगवन्! समान अवयवयुक्त अक्लान्त अश्वगण द्वारा पृथ्वी पर सुन्दर परिधि की रचना करते हुये रथ पर सवार होकर निरन्तर जगत् की स्थिति के लिये आप विचरण करते हैं। अमृत तथा सुधारस के तुल्य, सुरगण तथा भूतगण के समान, एक पद में प्रणिपतित त्रितयरूप, शुक के समान जिनके अश्व हैं, ऐसे आप प्रसिद्ध हैं। हे भक्तवत्सल! त्रिभुवनपावन रवि! आप अपनी चरणधूलि से पवित्रतम, प्रणत नानारोग से ग्रस्त मेरा सतत पालन करिये॥९-११॥
श्री साम्बपुराण में विश्वकर्मकृत सूर्यस्तुतिनामक त्रयोदश अध्याय समाप्त
चतुर्दशोऽध्यायः
(ब्रह्मभाषितः स्तवः)
श्रीसाम्ब उवाच
भूयोऽपि कथय त्वं मां कथां सूर्यसमागताम्।
न तृप्तिमधिगच्छामि कथां शृण्वन्त्रिमां शुभाम् ॥१॥
श्री साम्ब कहते हैं—आप सूर्य से सम्बन्धित और प्रसङ्ग कहिये। इस शुभकर बात को सुनने से मुझे तृप्ति नहीं मिलती॥१॥
नारद उवाच
आदित्यस्य कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।
वक्ष्यामि कथिता पूर्वं ब्रह्मणा लोकभाविना ॥२॥
ऋषयः परिपृच्छन्ति ब्रह्मलोके पितामहम्।
तापिताः सूर्यकिरणैः ऋषयोऽज्ञानमोहिताः ॥३॥
नारद कहते हैं—लोकस्रष्टा ब्रह्मा के सर्वपापनाशक आदित्य की दिव्य कथा को कहता हूँ। इसे पूर्व में ऋषिगणों ने ब्रह्मलोक में पितामह से पूछा था। वे ऋषिगण सूर्यकिरणों से तप्त तथा अज्ञानमोहित थे॥२-३॥
ऋषय ऊचुः
कोऽयं दीप्तो महातेजा वह्निरश्मिसमप्रभः।
एतद्वेदितुमिच्छामः प्रभवोऽस्य कुतः प्रभो ॥४॥
ऋषिगण कहते हैं—अग्निशिखा-तुल्य यह दीप्त महातेज-युक्त कौन है? यह हम जानना चाहते हैं। हे प्रभु! इनकी उत्पत्ति कहाँ से है?॥४॥
ब्रह्मोवाच
ततो भूतेषु सर्वेषु नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रवृत्ते गुणहेतुत्वे पूर्वं बुद्धिरजायत ॥५॥
ब्रह्मा कहते हैं—स्थावर-जंगम समस्त प्राणी के लय प्राप्त होने पर गुणों (सत्व-रजः-तमोगुण) के कारण सबसे पहले बुद्धि उत्पन्न होती है॥५॥
अहङ्कारस्ततो जातो महाभूतप्रवर्त्तकः।
वाय्वग्निजलखंभूमिस्ततस्त्वण्डमजायत ॥६॥
चतुर्दशोऽध्यायः ७१
चतुर्दशोऽध्यायः ७१
तदनन्तर महाभूत द्वारा प्रवर्त्तित होकर अहंकार उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् वायु, अग्नि, जल, आकाश तथा भूमि उत्पन्न होता है, तदनन्तर अण्ड उत्पन्न होता है॥६॥
तस्मिंस्त्वण्डे इमे लोकाः सप्त वै सम्प्रतिष्ठिताः।
पृथिवी सप्तभिर्द्वीपैर समुद्रैश्चैव सप्तभिः॥७॥
वह अण्ड इस सप्तलोक में प्रतिष्ठित हुआ। तत्पश्चात् सप्तद्वीप तथा सप्त समुद्र के साथ पृथिवी प्रतिष्ठित हो गई॥७॥
तत्र चावस्थितो ह्यासन्नहं विष्णुर्महेश्वरः।
विमूढास्तमसः सर्वे प्रध्यायन्तीश्वरं परम्॥८॥
वहाँ (मैं (ब्रह्मा), विष्णु तथा महेश्वर अवस्थित थे। हम सब अन्धकार में विमूढ़ होकर परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे॥८॥
ततोऽचिन्त्यं महत्तेजः प्रादुर्भूतं तमोनुदम्।
ध्यानयोगेन चास्माभिर्विज्ञातः सविता तदा॥९॥
तदनन्तर अन्धकार-विदारक अचिन्त्य महत् तेज प्रादुर्भूत हो गया। तब ध्यानयोग से हमने जाना कि वे सविता हैं॥९॥
ज्ञात्वा च परमात्मानं सर्व एव पृथक्-पृथक्।
दिव्याभिस्तुतिभिर्देवास्तं स्तोतुमुपचक्रमुः॥१०॥
उन परमात्मा को जानकर हम देवगण ने पृथक्-पृथक् रूप से दिव्य स्तुति से उनकी स्तुति आरम्भ कर दिया॥१०॥
आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वरः।
आदिकर्त्तासि भूतानां देवदेवो दिवाकरः॥११॥
देवों में तुम आदिदेव हो, ऐश्वर्य में तुम ईश्वर हो, तुम प्राणीगण के आदिकर्त्ता एवं देवताओं के देवता दिवाकर हो॥११॥
जीवनं सर्वसत्त्वानां देव-गन्धर्वरक्षसाम्।
मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम्॥१२॥
तुम समस्त प्राणीगण, देवता-गन्धर्व तथा किन्नर, राक्षस, सिंह, मुनि, नाग, पक्षीगण के जीवन हो॥१२॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं जगत्पतिः।
वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् अरुणस्तथा॥१३॥
तुम ही ब्रह्मा, महादेव एवं जगत् के पति हो। तुम ही वायु, इन्द्र, सोम, विवस्वान् तथा अरुण हो॥१३॥
७२ श्रीसाम्बपुराणम्
त्वं कालः सृष्टिकर्त्ता च हन्ता भर्त्ता प्रभुस्तथा।
सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च॥१४॥
तुम ही काल तथा सृष्टिकर्त्ता हो। तुम विनाशक, पोषणकारी तथा प्रभु हो। नदी-सागर-पर्वत-विद्युत् तथा इन्द्रधनुष भी तुम्हीं हो॥१४॥
प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।
ईश्वरात् परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः॥१५॥
शिवात् परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः॥१६॥
प्रलय तथा उत्पत्ति, व्यक्त एवं अव्यक्त, सनातन तुम हो। ईश्वर से विद्या श्रेष्ठ है, विद्या से शिव श्रेष्ठ है एवं शिव से तुम श्रेष्ठ हो। तुम ही परमेश्वर हो॥१५-१६॥
सर्वतः पाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१७॥
तुम सर्वभावेन हस्त-पादयुक्त, सर्वतः चक्षु-मस्तक तथा मुख-विशिष्ट (तुम ही सबके हस्तपाद, चक्षु-मस्तक-मुख) हो। सर्वतः कर्म-विशिष्ट हो तथा तुम ही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित हो॥१७॥
सहस्त्रांशुः सहस्राक्षः सहस्रचरणेक्षणः।
भूतादिर्भूर्भुवःस्वश्च महः सत्यं तपो जनः॥१८॥
तुम्हारी किरणें हजारों हैं। हजारों मुख, चरण तथा नयन हैं। तुम ही प्राणियों के आदि, भूः (पृथिवी), भुवः (अन्तरिक्ष), स्वः (स्वर्गलोक), महः, सत्य, तप एवं जनलोक भी तुम ही हो॥१८॥
प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशनम्।
दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः॥१९॥
प्रदीप्त, उज्ज्वल, दिव्य, सर्वलोक-प्रकाशक, दुर्निरीक्ष्य, देवश्रेष्ठों का जो रूप है, वही तुम्हारा रूप है; तुमको नमस्कार है॥१९॥
सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिप्लहादिभिः।
स्तुतं परममव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नमः॥२०॥
देवताओं तथा सिद्धों द्वारा प्रीति से सेवित एवं भृगु-अत्रि-पुलह आदि द्वारा स्तुत जो परम अव्यक्त रूप है, वह तुम्हारा ही है; अतः तुमको नमस्कार है॥२०॥
वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितम्।
सर्वदेवातिदेवस्य यद्रूपं तस्य ते नमः॥२१॥
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
वेदविद्गणों के तुम ही वेद्य हो, नित्य सर्वज्ञानयुक्त सकल देवगण के भी श्रेष्ठ देवता का जो रूप है, वही तुम्हारा रूप है। तुमको नमस्कार है॥२१॥
विश्वकृद्विश्वभूतिश्च वैश्वानरसुरार्चितम्।
विश्वस्थितमचिन्त्यञ्च यद्रूपं तस्य ते नमः॥२२॥
तुम विश्वकृत् (विश्व के सृष्टिकर्त्ता), विश्व के पालक, वैश्वानर (जठराग्नि) तथा देवताओं से अर्चित हो। विश्व में स्थित तथा अचिन्त्य जो रूप है, वह तुम्हारा है। ऐसे तुमको मैं नमस्कार करता हूँ॥२२॥
परं वेदात्परं यज्ञात् परं लोकात् परं दिवः।
परमात्मेति विख्यातं तद्रूपं यस्य ते नमः॥२३॥
जो वेद के परतत्त्व, यज्ञ के परतत्त्व हैं, भूलोक-द्युलोक से भी जो श्रेष्ठ हैं, वे परमात्मा नाम से विख्यात हैं। वह जिनका रूप है, ऐसे तुमको नमस्कार है॥२३॥
अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यात्मगति चाव्ययम्।
अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः॥२४॥
सहज में जाना नहीं जाता, दुर्निरीक्ष्य, आत्मा के प्रापक एवं आदि-अन्तहीन जो रूप है, वह तुम्हारा है। तुमको नमस्कार है॥२४॥
नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविमोचनाय।
नमो नमो वन्दितवन्दिताय नमो नमस्तापविनाशनाय॥२५॥
जो कारण के भी कारण हैं, उन तुमको नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पापविमोचक को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पूज्य से भी पूजनीय को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम ताप-पाप-विनाशक को नमस्कार है, नमस्कार है (अर्थात् तुम्हें मैं पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ)॥२५॥
नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वधनप्रदाय।
नमो नमः सर्वसुखप्रदाय नमो नमः सर्वमतिप्रदाय॥२६॥
सबको सभी वर देने वाले तुमको नमस्कार-नमस्कार। समस्त धनप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार। सकल सुखप्रदायक तुमको नमस्कार-नमस्कार। सबके मतिप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार॥२६॥
श्रुत्वा भगवान् देवस्तैजसं रूपमास्थितः।
उवाच वाचं कल्याणीं को वरो वः प्रदीयताम्॥२७॥
यह सब सुनकर भगवान् लीलाशील सूर्यदेव ने तैजस रूप में विराजित होकर कल्याणकर वाक्य कहा—तुम सबको क्या वर दूँ?॥२७॥
७४ श्रीसाम्बपुराणम्
ब्रह्मोवाच
तवातितेजसं रूपं न कश्चित् सोढुमुत्सहेत्।
सहनीयं भवत्वेतद्धिताय जगतः प्रभो ॥२८॥
ब्रह्मा कहते हैं—आपके इस तेजस्कर रूप को कोई सहन नहीं कर पाता। हे प्रभु! जगत् के हित के लिये आपका यह रूप सहनीय हो जाय॥२८॥
एवमस्त्विति सोऽप्युक्त्वा भगवान् दिनकृद् विभुः।
लोकानां कार्यसिद्ध्यर्थं घर्मवर्षहिमप्रदः ॥२९॥
सूर्यदेव ने कहा—ऐसा ही हो और भगवान् विभु दिनकर लोक की कार्यसिद्धि के लिये उष्ण, वृष्टि तथा शीतल हिमप्रद हो गये (वर्षा, ग्रीष्म तथा शीत—तीन रूप वाले हो गये)॥२९॥
अतः सांख्याश्च योगाश्च ये चान्ये मोक्षकाङ्क्षिणः ।
ध्यायन्ति ध्यानिनो नित्यं हृदयस्थं दिवाकरम् ॥३०॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ।
सर्वमन्तवते पापं देवमर्कसमाश्रितः ॥३१॥
इसीलिये सांख्य गण, योगीगण एवं अन्य मोक्षार्थी तथा ध्यानीगण हृदयस्थ दिवाकर का नित्य ध्यान करते हैं। समस्त लक्षणहीन होने पर भी अथवा सर्वपातकी व्यक्ति भी सूर्यदेव का आश्रय लेकर समस्त पापों को दूर कर लेता है॥३०-३१॥
अग्निहोत्रञ्च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।
भानोर्भक्तेर्नमस्कारात् कलां नार्हति षोडशीम् ॥३२॥
अग्निहोत्र, समस्त वेद, यज्ञ तथा बहुत दक्षिणा आदि भी सूर्यभक्त को नमस्कार करने की तुलना में सोलहवाँ भाग भी नहीं है॥३२॥
तीर्थानां परमं तीर्थं मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्।
पवित्राणां पवित्रं च प्रपद्येऽहं दिवाकरम् ॥३३॥
ब्रह्माद्यैः संस्तुतं देवैर्यै नमस्यन्ति भास्करम् ।
सर्वकिल्विषनिर्मुक्ताः सूर्यलोकं व्रजन्ति ते ॥३४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मभाषितः स्तवो नाम चतुर्दशोऽध्यायः
जो तीर्थों में परमतीर्थ, मंगल में परम मंगल, पवित्रों में परम पवित्र हैं, उन दिवाकर का मैं शरणापन्न होता हूँ। जो ब्रह्मादि देवगण द्वारा संस्तुत दिवाकर को नमस्कार करता है, वह सभी पापों से निर्मुक्त होकर सूर्यलोक में जाता है॥३३-३४॥
श्रीसाम्बपुराण में ब्रह्मा द्वारा कथित सूर्यस्तव नामक चतुर्दश अध्याय समाप्त