संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण पू०] * ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाका विनाश * ३६५
है, वह तुम्हारा संकल्प होनेसे तुम ही हो और तुम स्वयं प्रकाशरूप हो । वास्तवमें जड़-पदार्थविशेष तुम नहीं हो और न वह सब तुममें है । तुम्हारा संकल्प होनेसे वह तुम्हारा स्वरूप भी है और वस्तुसे असत् होनेके कारण वह नहीं है, तुम अपने सच्चिदानन्द-स्वरूपमें नित्य स्थित हो । तुम्हें नमस्कार है । तुम आदि और अन्तसे रहित, शिलाके समान चेतनघन हो—जिस प्रकार शिलामें पत्थरके सिवा कोई वस्तु नहीं उसी तरह तुममें एक चेतनके सिवा और कुछ नहीं है । तुम आकाशकी तरह निर्मल और स्वस्थ हो । तुम लीलासे ही सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हो । ऐसे ब्रह्मस्वरूप तुम्हें नमस्कार है । (सर्ग २)
ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! जिस प्रकार समुद्रमें उठनेवाली असंख्य तरङ्गोंका मूल कारण जल ही है, उसी प्रकार जो नाना प्रकारके असंख्य ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति और धारण करनेवाला चेतन है, वह तुम हो । समरूप, आकाशकी तरह सौम्य, बड़ी-बड़ी सृष्टिरूपी जल-तरङ्गोंसे घन प्रकाशमय परमात्म-चैतन्यरूप समुद्र तुम ही हो ।* जिस प्रकार अग्निसे उष्णत्व भिन्न नहीं है, कमलसे सौगन्ध्य भिन्न नहीं है, कज्जलसे कृष्ण रूप भिन्न नहीं है, बर्फ-से शुक्ल रूप भिन्न नहीं है, ईखसे माधुर्य भिन्न नहीं है, तेजसे प्रकाश भिन्न नहीं है, चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है, जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्मसे चराचर जगत् भिन्न नहीं है; क्योंकि ब्रह्म ही सबका कारण है । इसलिये चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है । अनुभवसे 'अहम्' भिन्न नहीं है, 'अहम्'से जीव भिन्न नहीं है, जीवसे मन भिन्न नहीं है, मनसे इन्द्रिय भिन्न नहीं है, इन्द्रियोंसे देह भिन्न नहीं है, देहसे यह जड़ दृश्य जगत् भिन्न नहीं है, जगत्से भिन्न अन्य कोई पदार्थ नहीं है ।
* रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
'जिस नित्यानन्द चिदात्मामें योगीलोग निरन्तर रमण करते हैं, वह परब्रह्म 'राम' पदसे कहा जाता है'—ऐसी व्युत्पत्तिवाले 'राम' शब्दके वाच्य भी तुम ही हो ।
श्रीराम ! यह दृश्यमान जगतरूपी चक्र चिन्मय परमात्माने ही अनादि कालसे अपने संकल्पद्वारा प्रवृत्त किया है । वास्तवमें तो कुछ भी प्रवृत्त नहीं किया है । यथार्थमें तो यह सब कुछ विभागरहित अनन्त सच्चिदानन्दरूप आकाश ही अपने आपमें स्थित है । उसके सिवा दूसरा और कुछ भी नहीं है । ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों और मनके व्यापारोंको करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता; क्योंकि उसमें कर्तृत्व है ही नहीं । श्रीराम ! तुम भीतरसे आकाशकी तरह निर्मल हो, बाहरसे अपने वर्णाश्रमानुकूल आचरण करते हो एवं हर्ष और ईर्ष्या आदि विकारोंमें काष्ठ और लोष्टके समान निर्विकार हो । जो तत्क्षण मारनेके लिये उद्यत अत्यन्त ही कठोर शत्रु है, उसे स्वाभाविक प्रियतम मित्रके रूपमें जो देखता है, वही यथार्थ देखनेवाला ज्ञानी महात्मा है । जिस प्रकार तटवर्ती वृक्षको नदी वेगसे मूलोच्छेदपूर्वक उखाड़कर फेंक देती है, उसी प्रकार जो महात्मा सौहार्द और ईर्ष्याको वेगसे समूल उखाड़ फेंक देता है, वही हर्ष और ईर्ष्यारूपी दोषोंका विनाश कर सकता है । जिस पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है ।
३६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीराम ! जिसका त्रिकालमें अस्तित्व नहीं है, उसकी व्यावहारिक सत्ताका ज्ञान करानेके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किया गया है। वह माया उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे निस्संदेह विनष्ट हो जाती है।
निष्पाप श्रीराम ! मन, बुद्धि, अहंकार तथा इन्द्रिय आदि सब कुछ जड़तारहित एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। फिर जीवात्मा उस परमात्मासे अलग कैसे रह सकता है, अर्थात् वह भी परमात्माका स्वरूप ही है। जब भोग-तृष्णारूपी विषका आवेश विनष्ट हो जाता है—संसारके विषयभोगोंसे तीव्र वैराग्य हो जाता है, तब अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे गत रात्रिके अन्धकारके नष्ट हो जानेपर रतौंधी भाग जाती है, भली प्रकारसे आलोचित अध्यात्मशास्त्ररूपी विचारसे तृष्णाविषरूपी महामारी क्षीण हो जाती है। जैसे विस्तृत आकाशमें अव्यक्त वायु स्थिर है, वैसे ही मायाभावसे रहित हुए तुम उस अत्यन्त विस्तृत परम पदरूप अपने ब्रह्मस्वरूपमें स्थिर हो। श्रीराम ! जब साधारण मनुष्योंको भी अपने कुलगुरुके वचन लग जाते हैं, तब फिर तुम उदार (विशाल)-बुद्धिको मेरा उपदेश क्यों नहीं लगेगा? क्योंकि तुमने अपनी बुद्धिसे मेरे वचनोंको ग्रहण करने योग्य समझ लिया है, अतएव मेरे वचन तुम्हारे हृदयके अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ महानुभाव श्रीराम ! मैं रघुकुलको उन्नत करनेवाले तुमलोगोंका सदासे कुलगुरु हूँ, इसलिये तुम मेरे द्वारा कहे गये शुभ वचनोंको हृदयमें हारकी तरह धारण करो।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मैं केवल परम शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और परमानन्दमय स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ। मुने ! मुझे कुहरेसे शून्य दिङ्मण्डलकी भाँति भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त जगत् वास्तविक सच्चिदानन्दस्वरूप दीख रहा है। भगवन् ! मैं संदेहसे, आशारूप मृगतृष्णासे, राग और वैराग्यसे रहित हूँ। नाथ ! मैं अपने आपसे ही अपने उस अविनाशी विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें स्थित हूँ, जहाँपर अमृतका रसास्वाद भी तृणके सदृश नीरस होकर उपेक्षणीय हो जाता है। मैं अपने प्राकृत स्वरूपमें स्थित हूँ,—स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ। लोक जहाँ विश्राम करते हैं, उस सुखका केन्द्रस्वरूप मैं हूँ। अतएव मैं वास्तविक राम हूँ, मैं अपने परमार्थ स्वरूपको तथा आपको प्रणाम करता हूँ। शुद्ध आत्मामें अज्ञान आदि विकार कैसे आ सकते हैं। सदा शुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है। सब कुछ आत्मा ही है। यह दूसरा है, यह दूसरा है—इत्यादि असत् कल्पनाएँ कैसे आ सकती हैं। (सर्ग ३–५)
देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्यमय और प्रभावयुक्त वचन सुनो, जिन्हें मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहता हूँ। श्रीराम ! जिस अज्ञानी पुरुषकी अज्ञानवश देहमें ही आत्मभावना उत्पन्न हो जाती है, उस पुरुषको इन्द्रियाँ रोषपूर्वक शत्रु बनकर पराजित कर देती हैं। किंतु जिस विवेकी पुरुषकी ज्ञानपूर्वक एकमात्र नित्य परमात्माके स्वरूपमें ही स्थिति रहती है, उस निर्दोष पुरुषकी इन्द्रियाँ संतोषपूर्वक मित्र बनकर रहती हैं, उसका पतन नहीं कर सकतीं।* व्यवहार करते हुए जिस ज्ञानी पुरुषको
* कठोपनिषद्में भी बताया गया है—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धिका वर्णन * ३६७
निन्दनीय भोग्य पदार्थोंमें दोष-दर्शनके कारण निन्दाके सिवा स्तुतिबुद्धि उत्पन्न होती ही नहीं, वह पुरुष दुःखदायी देहमें किसलिये आत्मबुद्धि करेगा ? कभी नहीं करेगा। जैसे प्रकाश और अन्धकार एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि शरीर जड और मिथ्या है तथा आत्मा चेतन और सत्य है। इसीसे न आत्मा शरीरका सम्बन्धी है और न शरीर ही आत्माका सम्बन्धी, अर्थात् परस्पर विरुद्ध होनेके कारण इनका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। भगवन् ! समस्त भावविकारोंसे नित्यमुक्त एवं निर्लिप्त आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी विनष्ट ही होता है, वरं वह सदा-सर्वदा एकरूपसे रहता है। पत्थरके समान जड, ज्ञानरहित, तुच्छ, कृतघ्न तथा विनाशशील इस शरीरका जो कुछ भी होनेवाला हो वह भले ही हो, इससे आत्माकी न तो हानि है और न इससे उसका कोई सम्बन्ध ही है।
विभिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर भी सद्रूप ब्रह्म कभी असद्रूप नहीं हो सकता, इसी प्रकार सर्वव्यापक जीवात्माका शरीरके साथ तनिक भी सम्बन्ध सम्भव नहीं। जैसे जलमें स्थित कमलपत्रका जलसे किंचिन्मात्र सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहमें स्थित जीवात्माका भी देहसत्ताके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। परमात्माका अच्छी प्रकार साक्षात्कार हो जानेपर परमार्थ सत्यरूप परमात्मामें ही स्थिति हो जाती है और देहात्मबुद्धिरूप अज्ञान-प्रयुक्त भ्रम नष्ट हो जाता है। देह और आत्माके यथार्थ ज्ञानसे देहकी असत्ता और आत्माकी सत्ता सिद्ध हो जाती है। सभी प्राणियोंमें अविनाशी चेतन रहता ही है, परंतु जीवात्माको इसका भली प्रकार ज्ञान न होनेके कारण उसमें कायरता आ गयी है। ऐसे अज्ञानी जीवोंके शरीरसे श्वास उसी प्रकार निकलते रहते हैं, जैसे लोहारकी धौंकनीसे हवा निकलती है; अतः उनका जीवन व्यर्थ है । अज्ञान ही आपत्तियोंका आश्रय-स्थान है। भला, बतलाइये तो सही कि कौन-सी आपत्तियाँ अज्ञानीको नहीं प्राप्त होतीं ? अज्ञानीको उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं। देह, धन, स्त्री आदिमें आसक्ति रखनेवाले अज्ञानीका यह दुष्ट दुःख कभी भी शान्त नहीं होता। इस अनात्मभूत जड देहमें आत्मभाव करनेवाले अज्ञानी पुरुषकी असत्य बोधमयी माया क्या किसी प्रकार भी नष्ट हो सकती है ? अर्थात् बिना ज्ञानके किसी प्रकार नष्ट नहीं हो सकती। उस अज्ञानी पुरुषका ही जन्म पुनः-पुनः बालपन प्राप्त करता रहता है, बालपन बार-बार यौवन प्राप्त करता रहता है, यौवन बार-बार वार्धक्य प्राप्त करता रहता है और वार्धक्य बार-बार मरण प्राप्त करता रहता है। अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र (रहँट) में संसाररूपी रज्जुसे बँधा हुआ कलश-रूप होकर जलमें डूबता और निकलता रहता है। अर्थात् यह अज्ञानी जीव संसारमें बार-बार जन्मता-मरता रहता है। जिस प्रकार पक्षिणियाँ पिंजरेसे बाहर निकल नहीं पातीं, वैसे ही उदरभरणमें अति आसक्तिरूपी बन्धनसे बँधे ज्ञानदृष्टिसे हीन अज्ञानी पुरुषकी बुद्धियाँ अपारसंसार-समुद्रके पार नहीं जा सकतीं । श्रीराम ! विषयोंकी जो केवल ऊपर-ऊपरसे दिखायी पड़नेवाली मधुरता, परिणाममें अनर्यरूपता, आद्यन्तवत्ता, देशतः परिच्छिन्नता और समस्त अवस्थाओंमें नश्वरता प्रसिद्ध है, वे सब अज्ञानरूपी वृक्षके ही फल हैं।
(सर्ग ६)
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
(कठ० १।३।५, ६)
'जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत चञ्चल मनसे युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथिके दुष्ट घोड़ोंकी भाँति वशमें नहीं रहतीं। परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धिवाला और वशमें किये हुए मनसे सम्पन्न रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथिके अच्छे घोड़ोंकी भाँति वशमें रहती हैं।'
३६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मदरूपी चन्द्रके उदित होनेपर मोतियोंसे वेष्टित तथा रत्नोंसे सुशोभित स्त्रियों क्षुब्ध काम-क्षीरसागरकी तरङ्गके समान जो दिखायी पडती हैं, वह केवल अज्ञानकी ही विभूति है। वसन्तऋतुमें भूमिपर वनखण्डोंमें पुष्प कामके दास कामियोंको जो रमणीय दिखायी पड़ते हैं, उसमें भी अज्ञान ही कारण है। गीध, गीदड़, कुत्ते आदिके खाने योग्य मांस-पिण्डरूप स्त्रियोंके शरीरोंकी जो चन्द्रमा, चन्दन और कमलसे उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। लारसे आर्द्र ओष्ठनामक मांसके टुकड़ेकी जो रसायन, अमृत, मधु आदिके साथ उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञान ही है। आरम्भमें अज्ञानी लोगोंको अत्यन्त मधुर लगनेवाली, मध्यमें राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे बाँधनेवाली एवं अन्तमें शीघ्र नष्ट हो जानेवाली धनराशिकी जो अभिलाषा की जाती है, वह भी अज्ञान ही है। जिसने अनन्त ब्रह्माण्डरूपी पके हुए फलोंको ग्रास बना लिया है और जो सदा खानेकी चेष्टा करनेवाली जठराग्निसे युक्त है, वह काल कल्पोंतक जो तृप्त नहीं होता, उसमें भी अज्ञानकी ही महिमा है। जीवोंकी जो यौवन-रात्रि चिन्तारूपी पिशाचोंसे उपहत तथा विवेकरूपी चन्द्रमाके उदयसे शून्य, अतएव अन्धकारकी तरह प्रकाशरहित बीत जाती है, वह अज्ञानका ही विलास है। आरम्भकालमें कानोंके संनिहित कपोल-प्रदेशको आक्रान्त कर चारो ओरसे निश्चयपूर्वक स्फुरणशील जरारूपी बूढ़ी बिल्ली, जो यौवनरूपी चूहोंका भक्षण करती रहती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। प्रतीतिरूपी पुष्पोंसे उज्ज्वल व्यावहारिक सत्तारूपी लता, जिसमें जगत्रूपी पल्लव हैं और जो धर्म-अर्थरूपी फल धारण करती है एवं विकसित होती है, इसका कारण भी माया ही है। जिसमें बड़े-बड़े पर्वत ही खंभे हैं, सूर्य-चन्द्र ही खिड़कियाँ हैं, आकाश ही आच्छादन (छत) है, ऐसा जगत्-त्रयरूपी महल जो खड़ा हो जाता है, वह भी मायाकी ही महिमा है। अपनी वासनारूपिणी शलाकाओंसे निर्मित शरीरके भीतर स्थित इन्द्रिय-समूहरूप पिंजरेमें जो जगत्के अन्तर्गत जीवरूपी पक्षी आशारूपी सूतसे बँधा हुआ है, उसमें भी उसका अज्ञान ही कारण है।
संसाररूपी स्वल्प जलाशयमें स्फुरित होनेवाली सृष्टिरूपी क्षुद्र मछलीको शठ कृतान्तरूपी वृद्ध गीध जो पकड़ लेता है, उसमें भी मायाकी ही महिमा है। परमपदरूप अचल ब्रह्ममें संकल्पसे उत्पन्न असंख्य जगत्रूप जंगलोंके जाल युगान्तरूपी अग्निसे जो दग्ध हो जाते हैं, उसमें भी अविद्या ही कारण है। निरन्तर उत्पत्ति और विनाशसे तथा दुःख और सुखकी सैकड़ों दशाओंसे, इस प्रकार जगत्स्थिति जो पुनः-पुनः बदलती रहती है, उसमें भी अविद्या ही कारण है। वासनारूपी जंजीरोंसे बँधी हुई अज्ञानियोंकी दृढ़ धारणा क्षुभित युगोंके आवागमन तथा कठोर वज्रोंके आघातोंसे भी जो विदीर्ण नहीं होती, इसमें उनकी अविद्या ही कारण है। राग-द्वेषसे होनेवाले उत्पत्ति-विनाशसे तथा जरा-मरणरूपी रोगसे समस्त जंगम जाति जीर्ण-शीर्ण हो गयी है, इसमें उनका अज्ञान ही कारण है। कभी लक्ष्यमें न आनेवाले बिलमें रहनेके कारण अदृश्य और अपरिमिति भोजन करनेवाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर इस समस्त जगत्को जो क्षणभरमें ही निगल जाता है, यह सब मायाकी ही महिमा है। प्रत्येक कल्परूप क्षणमें क्षीण हो जानेवाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुद्बुद, जो भयंकर कालरूपी महासमुद्रमें उत्पन्न और विनष्ट हो जाते हैं, यह भी मायाकी महिमा है। उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हें चिन्मय परमात्माके सकाशसे प्रकाश-शक्ति प्राप्त हुई है, जो प्रकट होती हैं, वह भी मायाकी महिमा है। अनन्त संकल्पोंवाली समस्त विकल्पोंसे शून्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मरूप पदमें
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूपका वर्णन ३६९
आश्चर्योंकी पूर्ति करनेवाली ऐसी कौन-सी शक्तियाँ नहीं हैं ? अर्थात् सभी शक्तियाँ उसमें विद्यमान हैं। उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पोंसे प्राप्त अर्थसमूहसे देदीप्यमान जगत्की ब्रह्ममें जो यह कल्पना है, उसमें भी अज्ञान ही हेतु है। इसलिये श्रीराम ! जो कुछ बारंबार प्राप्त होनेवाली सम्पत्तियाँ या आपत्तियाँ हैं, जो बाल्य-यौवन-जरा-मरणरूपी महान् संताप हैं, जो सुख-दुःखकी परम्परारूप संसार-सागरमें गोता लगाना है, वह सब अज्ञानरूपी गाढ़ अन्धकारकी विभूतियाँ हैं।
(सर्ग ७)
अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंसे रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता कब और किस प्रकार विकसित हुई, इसका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता बड़े-बड़े मेरु आदि पर्वतरूप पर्वोंसे युक्त, ब्रह्माण्ड-रूपी त्वचासे आवृत और जनरूपी पत्र, अङ्कुर आदि विकासोंसे युक्त है। ये तीनों लोक इसकी देह हैं। इस अविद्यारूपी लतामें प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करनेवाले सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु और ज्ञान तो फल हैं और अज्ञान इसका मूल है। जन्मसे ही अविद्या उत्पन्न होती है और वह बादमें जन्मान्तररूप फल प्रदान करती है। जन्मसे ही वह संसारके रूपमें अपना अस्तित्व प्राप्त करती है और बादमें स्थितिरूप फल प्रदान करती है। वह अविद्या अज्ञानसे वृद्धि प्राप्त करती है और बादमें अज्ञान-रूप फल देती है। ज्ञानसे आत्माका अनुभव प्राप्त करती और अन्तमें आत्माका अनुभवरूप फल देती है। प्रतिदिन आकाशमें चारों ओरसे विकसित होनेवाली चन्द्र, सूर्य आदिके सहित ग्रहरूप ज्योतियोंकी जो पंक्तियाँ हैं, वे ही इस सृष्टिरूपा लताके पुष्प हैं। रघुनन्दन ! आकाश-मण्डलको व्याप्तकर स्थित इस लताके ऊपर प्रस्फुरित नक्षत्र और तारे ही पुष्पोंकी कलियाँ हैं। चन्द्र, सूर्य तथा अग्निके प्रकाश इस लताके पराग हैं। इसी परागसे यह शुभाङ्गी स्त्रीके समान लोगोंके मनका आकर्षण करती है। यह लता चित्तरूप हाथीद्वारा प्रकम्पित, संकल्परूप मधुर कलनाद करनेवाली कोकिलसे युक्त, इन्द्रियरूपी साँपोंसे वेष्टित और तृष्णारूपी त्वचासे आच्छादित, चतुर्दश भुवनरूपी वनोंसे शोभित, सात समुद्ररूपी सुन्दर खाइयोंसे आवृत्त एवं स्त्रीरूप पुष्पसमूहोंसे शोभित, मनके स्पन्दरूप वायुसे कम्पित, शास्त्रनिषिद्ध कर्मरूपी अजगरसे व्याप्त, स्वर्गकी शोभारूपी पुण्यमण्डलसे शोभित तथा जीवोंकी जीविकासे पूर्ण एवं अनेक प्रकारके विषयभोगोंकी वासनारूप गन्धोंसे अज्ञोंको उन्मत्त करने-वाली है। वह अविद्यारूपा लता अनेक बार उत्पन्न हो चुकी है और उत्पन्न हो रही है, अनेक बार मर चुकी है और मर भी रही है। वह अतीत कालमें थी और वर्तमान कालमें भी है। वह सर्वदा असत्यपदार्थके सदृश होती हुई भी सत्य पदार्थके सदृश बार-बार प्रतीत होती है तथा नित्य विनष्ट भी होती है। यह अविद्याका कार्य संसार निश्चय ही महती विषमयी लता है; क्योंकि अविचारसे इसका सम्बन्ध होनेपर यह तत्क्षण संसाररूपी विषसे उत्पन्न होनेवाली मूर्च्छा लाती है और विवेकपूर्वक सद्-असत्के विचारसे तत्क्षण नष्ट हो जाती है। इसलिये यह विवेकीके लिये तो नष्ट हो जानी है और अविवेकीके लिये स्थित रहती है। यह सृष्टिरूपा लता जलके रूपमें, पर्वतोंके रूपमें, नागोंके रूपमें, देवताओंके रूपमें, पृथिवीके रूपमें, द्युलोकके रूपमें, चन्द्र, सूर्य और तारोंके रूपमें विस्तृत हो रही है। श्रीराम ! इन समस्त भुवनोंमें उत्कृष्ट प्रभाव-से चारों ओर व्याप्त अथवा जीर्णताको प्राप्त हुए क्षुद्र तिनकेके रूपमें जो कुछ यह दृश्य प्रतीत हो रहा है उस सबको
| ३७० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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अविद्याका कार्य होनेसे विनाशशील अविद्या ही समझना चाहिये । उसका विवेक-वैराग्यपूर्वक यथार्थ ज्ञानद्वारा विनाश हो जानेपर सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
श्रीराम ! यहाँ दृश्यरूप जगत्के सम्बन्धसे और कल्पनाओंसे रहित, परम शान्त, सबका आत्मस्वरूप केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। जिस प्रकार जलसे तरङ्गें प्रकट होती हैं, वैसे ही उस परमात्माके संकल्पसे कलारूप प्रकृति प्रकट होती है। यह प्रकृति सत्त्व, रज, तम—त्रिगुणमयी है। सत्त्व आदि तीन गुणस्वरूप धर्मोंसे युक्त प्रकृति ही अविद्या (माया) है। यही प्राणियोंका संसार है। इस प्रकृतिसे पार हो जाना ही परमपदकी प्राप्ति है। जो कुछ भी यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी पड़ता है, वह सब इसी अविद्याका कार्य होनेसे उसीके आश्रित है। श्रीराम ! ऋषि, मुनि, सिद्ध, दिव्य नाग, विद्याधर, देवता—इनको प्रकृतिके सात्त्विक, अंशस्वरूप जानो। प्रकृतिका जो शुद्ध सत्त्व-अंश है, वह विद्या है; उस विद्यासे अविद्या उसी प्रकार उत्पन्न होती है, जिस प्रकार जलसे बुद्बुद उत्पन्न होते हैं। और जिस प्रकार बुद्बुद जलमें लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस विद्यामें ही यह अविद्या विलीन भी हो जाती है। जैसे जल और तरङ्गकी द्वित्वभावनासे ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या और अविद्या-दृष्टियोंकी भेदभावनासे ही भिन्नता है, वस्तुतः नहीं। जिस प्रकार परमार्थतः जल और तरङ्गकी एक-रूपता ही है उसी प्रकार विद्या और अविद्या भी एक-रूप ही हैं, पृथक् नहीं। वास्तवमें एक परमात्मासे भिन्न विद्या और अविद्या नामकी कोई वस्तु ही नहीं है; अतः विद्या और अविद्या-दृष्टिका परित्याग करनेपर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही वास्तवमें विद्यमान है, दूसरा नहीं; क्योंकि न अविद्या नामका पदार्थ है और न विद्या नामका ही पदार्थ है, इसलिये यह कल्पना व्यर्थ है। वास्तवमें परमात्माको छोड़कर बच रहनेवाला कुछ भी नहीं है; यदि कुछ है तो वह एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। जब परमात्मा-के स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं रहता, तब वह अज्ञान ही अविद्या कहलाता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ज्ञान ही अविद्याक्षय—इस नामसे कहा जाता है। आतप और छायाकी तरह परस्पर-विरुद्ध विद्या और अविद्या दोनोंमेंसे विद्याका अभाव होनेपर अविद्या नामक मिथ्या कल्पना प्रकट होती है, जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर छाया-ही-छाया रह जाती है। श्रीराम ! अविद्याका विनाश हो जानेपर विद्या और अविद्या दोनों ही कल्पनाओंका विनाश हो जाता है। इन दोनोंका अभाव हो जानेपर एक प्राप्तव्य सच्चिदानन्द परब्रह्म ही बच रहता है। जैसे समुद्र तरङ्गोंका और निर्मल मणि रश्मियोंका खजाना है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अनन्त चराचर प्राणियोंका खजाना है। जैसे अनन्त घड़ोंमें एक ही आकाश बाहर-भीतर परिपूर्ण है, उसी प्रकार समस्त जड़-चेतन वस्तुओंमें बाहर और भीतर भी एक अविनाशी सत् वस्तुस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। जिस प्रकार अयस्कान्तमणि (चुम्बक) के सकाशमात्रसे जड लोह क्रियाशील हो जाता है, वैसे ही एकमात्र चिन्मय परमात्माके सकाशसे जड देहादि पदार्थ क्रियाशील होते हैं। जगत्के एकमात्र कारण उस चिन्मय परमात्मामें उसकी कल्पनासे ही यह कल्पित दृश्य जगत् स्थित है—ठीक उसी प्रकार, जैसे चित्र-विचित्र चञ्चल तरङ्ग-समूह जलमें स्थित है। वास्तवमें अनन्त आकाशकी तरह निराकार चिन्मय परमात्मामें यह कुछ भी नहीं है।
(सर्ग ८-९)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा अविद्याके नाशका प्रतिपादन * ३७१
अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! परमात्माके सिवा जो यह स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् प्रतीत होता है, यथार्थमें वह कुछ भी नहीं है; क्योंकि विवेकपूर्वक विचार करने-पर जैसे रज्जुमें होनेवाले सर्पभ्रमसे किसी भी सर्पकी उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार हृदयके भीतर जो यह देहमें अहंता और बाह्य विषयोंमें ममतारूपी सम्बन्ध भी होता है, विवेकपूर्वक विचार करनेपर उसकी किसी तरह भी उपलब्धि. नहीं होती । जाने बिना ही भ्रमसे ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रतीत होता है, ब्रह्मका अच्छी प्रकार ज्ञान हो जानेपर सम्पूर्ण जड़-चेतनकी अन्तिम सीमारूप ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। अज्ञानी बालककी तरह यह जीवात्मा अज्ञानके कारण चित्तस्वरूपको प्राप्त हुआ है, इसलिये चित्तके चलनेपर अपने आपको चलता हुआ देखता है, चित्तके स्थिर होनेपर अपनेको भी स्थिर देखता है। यह आत्मा इस तरह अज्ञानसे इस उपद्रवयुक्त चित्तको ही अपना स्वरूप समझता है। यह चित्त बालक यानी विवेकशून्य है, इसलिये वह चित्तप्राय मनुष्य रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको चित्तगत वासनारूप दीर्घतन्तुओं-से भीतर बाँधता हुआ भी नहीं जानता।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! अत्यन्त घनीभावको प्राप्त हुआ अविवेक (अज्ञान) वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनियोंको प्राप्त होता हुआ किस प्रकार स्थित रहता है ? यह कृपा करके कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अमनस्त्व अर्थात् सुषुप्तिकी भाँति मनके लयको प्राप्त न हुआ और मनस्त्व अर्थात् मननशीलतासे च्युत हुआ जीवात्मा स्थावर योनिमें साक्षी (उदासीन)-की भाँति स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि स्थावर योनियोंमें जीवात्माका चित्त न तो सुषुप्तिकी तरह विलीन ही होता है और न जंगम प्राणियोंकी तरह चञ्चल ही रहता है; बल्कि मूढ़ मनुष्यकी तरह वह बीचकी-सी स्थितिमें रहता है। ज्ञातव्य ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! उन स्थावर योनियोंमें जीवात्मा विवेकशून्य और दुःखका प्रतीकार करनेमें असमर्थ रहता है; अतः उन स्थावर शरीरोंमें मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसा मैं मानता हूँ; क्योंकि वहाँ जीवात्मा कर्मेन्द्रियोंसे, ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारोंसे तथा मानस व्यापारोंसे शून्य हुआ केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! जिन स्थावर शरीरोंमें जीवात्मा एकमात्र सत्तारूपसे ही स्थित रहता है, वहाँ मुक्ति दुर्लभ है—ऐसा ही मैं भी मानता हूँ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! बुद्धिपूर्वक विचारने-पर यथार्थ वस्तुरूप परमात्माके साक्षात्कारसे चिन्मय सत्ताका जो सबमें समान भावसे अनुभव होता है, वही अविनाशी मोक्षपद है। परमात्मतत्त्वको यथार्थतः जान लेने-पर वासनाओंका जो उत्तम यानी अशेषरूपसे अभाव है, उसे ही सबमें समभावसे सत्तारूप मोक्षपद कहा गया है। ज्ञानी महात्मा पुरुषोंके साथ विचार करके और अध्यात्मभावनासे शास्त्रोंको समझकर सत्ता-सामान्यमें जो निष्ठा होती है, उसी निष्ठाको मुनिलोग परब्रह्म कहते हैं। यही परब्रह्मकी प्राप्ति है। जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन भलीभाँति लीन हो गया है। तथा चारों ओरसे जिसमें वासनाएँ तिरोहित हो गयी हैं, वह जड़ वर्गवाली स्थावर जीवोंकी सुषुप्ति सैंकड़ों जन्म-रूपी दुःखोंको देती है। जड़ स्वभाववाले ये सभी वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनिके जीव सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त हुए-से पुनः-पुनः जन्मके भागी होते हैं। श्रेष्ठ श्रीराम ! जिस तरह बीजोंमें अङ्कुरसे लेकर पुष्पतक पदार्थ स्थित हैं एवं जिस तरह मिट्टीमें घट स्थित है, उसी तरह स्थावरोंके भीतर भी अपनी वासना स्थित है । वासना,
३७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अग्नि, ऋण, व्याधि, शत्रु, स्नेह, विरोध एवं विष—ये थोड़े-से भी शेष रहनेपर हानि पहुँचाते हैं । जिसका वासना-बीज ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गया है और जिसने सत्त्वमें समान सत्तारूप परमात्माको प्राप्त कर लिया है, वह महात्मा पुरुष, चाहे सदेह हो या देहसे रहित पुनः कभी दुःखका भागी नहीं होता ।
श्रीराम ! आत्मदर्शनके विरोधी अज्ञानसे आवृत हुई यह चेतनशक्ति संसाररूप भ्रमको जन्म देती है और अज्ञानसे मुक्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश कर देती है । इस आत्मदृष्टिका जो अभाव है, उसीको विद्वान्लोग अविद्या कहते हैं । अविद्या जगत्की कारणभूत है, अतः उसीसे सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है । रूपरहित इस अविद्याका जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब तुरंत यह उसी प्रकार विनष्ट हो जाती है, जैसे घाममें तुषारके परमाणु गल जाते हैं । दीपकको प्रज्वलित करनेपर जिस प्रकार अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह अच्छी प्रकार विचार करनेपर यह अविद्या नष्ट हो जाती है । वास्तवमें यह अविद्या कोई वस्तु न होनेसे असत् है और विचार न करनेसे ही दीख पड़ती है । रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देह-यन्त्रमें 'मैं स्वयं कौन हूँ ?' इस प्रकार जब विवेकपूर्वक विचार किया जाता है, तब देहके किसी भी पदार्थमें मैं-पन सिद्ध नहीं होता, वरं शरीरका अभाव हो जाता है । अपने अन्तःकरणके विवेक-विचारसे आदि-अन्तमें असद्रूप इस शरीर और संसारका परिहार कर देनेपर अविद्याका क्षय हो जाता है; फिर शेषमें एक परमात्मा ही रह जाता है । वही वास्तवमें शाश्वत ब्रह्म है । वही वास्तविक पदार्थ और उपादेय है; क्योंकि उसीसे अविद्या निवृत्त हो जाती है । 'अविद्या' इस अपने नामसे ही इसके अभावरूपका ज्ञान हो जाता है । वास्तवमें अविद्या नामकी कोई वस्तु कहीं भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् अखण्ड ब्रह्मस्वरूप ही है, जिस ब्रह्मने कार्य-कारणरूप इस सम्पूर्ण जगत्का निर्माण किया है । 'यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप नहीं है' इस प्रकारका निश्चय ही अविद्याका स्वरूप है और 'यह जगत् ब्रह्मरूप है' यह निश्चय ही उसका विनाश है । (सर्ग १०)
परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एवं महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण-निरोधरूप योगका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अज्ञान अत्यन्त बलवान् है । इसीका दूसरा नाम 'अविद्या' है । वह अन्य असंख्य जन्मोंसे चला आ रहा है, अतएव वह दृढ़ हो गया है । देहकी उत्पत्ति और विनाशमें, बाहर-भीतर—सर्वत्र समस्त इन्द्रियाँ उस अविद्याका ही निरन्तर अनुभव करती हैं, इसलिये वह अविद्या दृढ़ हो गयी है; क्योंकि परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान तो किसी भी इन्द्रियका विषय नहीं है । मनसहित छहों इन्द्रियोंका विनाश हो जानेपर वह सत्स्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही कायम रहता है । इन्द्रिय-वृत्तियोंसे अतीत होनेके कारण वह परमात्माका स्वरूप प्राणियोंको प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि प्राणी तो पदार्थोंका अनुभव मन-इन्द्रियोंके द्वारा ही करते हैं । रघुनन्दन ! जिस प्रकार परमात्मज्ञानके अभ्यासमें निरत राजा जनक परमात्मतत्त्वको यथार्थरूपमें जानकर भूमण्डलमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी विचरण करो । भगवान् नारायण जीवोंके कल्याणके लिये विभिन्न लीलाएँ करनेके जिस निश्चयसे पृथ्वी-पर नाना योनियोंमें अवतार लेते हैं, वही निश्चय वास्तविक यथार्थज्ञान है । रघुनन्दन ! जगदम्बा पार्वतीके साथ रहनेवाले त्रिनेत्र महादेवजीका या रागरहित ब्रह्माका जो
[निर्वाण-प्रकरण पू०] * परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन * ३७३
श्चय है, वही निश्चय वास्तविक है। तुम्हारा भी वही निश्चय होना चाहिये। देवगुरु बृहस्पति, शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, महामुनि नारद, महर्षि अगस्त्य, अङ्गिरा, प्रचेता, भृगु, क्रतु, अत्रि, शुकदेव तथा अन्यान्य जीवन्मुक्त ब्रह्मर्षि और राजर्षि महात्माओंका तथा मेरा भी परमात्माके स्वरूपके विषयमें जो निश्चय है, वही निश्चय तुम्हारा होना चाहिये।
श्रीरामजी बोले—भगवन् ! ब्रह्मन् ! जिस निश्चयके कारण ये पूर्वोक्त महाबुद्धिमान् एवं धीर बृहस्पति आदि शोकरहित हुए स्थित हैं, उसका मुझसे तात्त्विक रूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—समस्त जाननेयोग्य पदार्थोंको यथार्थतः जाननेवाले महाबाहु श्रीराम ! जो तुमने पूछा है, उसका उत्तर स्पष्टरूपसे सुनो। उनका यही निश्चय है, जो मैं बतला रहा हूँ। श्रीराम ! जो कुछ भी यह भोगरूप संसार-जाल स्थित दिखायी पड़ता है, वह सब निर्मल ब्रह्म ही है। ब्रह्म ही जीवात्मा है, चौदह भुवन ब्रह्म ही हैं, आकाशादि भूत भी ब्रह्म ही हैं, मैं भी ब्रह्मस्वरूप हूँ, मेरा शत्रु भी ब्रह्मस्वरूप है; सन्मित्र, बन्धु-बान्धव आदि भी ब्रह्म-स्वरूप हैं। तीनों काल भी ब्रह्मस्वरूप हैं, क्योंकि वे ब्रह्ममें ही अवस्थित हैं। जैसे समुद्र अपने आपमें तरङ्गोंके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही यह सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें सांसारिक पदार्थ-सम्पत्तिके रूपमें प्रकट होता है। नेत्र-दोषके कारण आकाशमें बिना हुए ही भ्रान्तिसे वृक्षकी प्रतीति होती है, किंतु वास्तवमें वृक्ष नहीं है; इसी तरह ब्रह्ममें जो राग-द्वेष आदि दोष भ्रमसे प्रतीत होते हैं, वे वास्तवमें हैं ही नहीं; क्योंकि ये सब कल्पनामात्र हैं, इसलिये संकल्पके अभावसे इनका अत्यन्त अभाव हो जाता है। गमनागमन आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ भी ब्रह्ममें ही होती हैं; क्योंकि ब्रह्म ही अपने संकल्पसे अद्वितीय सुखरूपमें स्फुरित होता है, तब उसमें दुःख और सुख कैसे ? ब्रह्म ही स्वयं ब्रह्ममें तृप्त है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्थित है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्फुरित होता
है; अतः मैं भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ। क्योंकि घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, मैं भी ब्रह्म हूँ, यह विस्तृत जगत् भी ब्रह्मस्वरूप ही है, इसलिये यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त मिथ्या राग-वैराग्य आदिकी कल्पना ही नहीं हो सकती।
जिस प्रकार सुवर्णसे आभूषण और जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं हैं, वैसे ही प्रकृति ब्रह्ममें बिना हुए ही प्रतीत होती है, किंतु ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। यह जीवात्मा चेतन है और यह पदार्थ जड़ है—इस प्रकारका मोह अज्ञानियोंको ही होता है, ज्ञानीको कभी नहीं होता। जिस प्रकार अंधे मनुष्यको जगत् अन्धकाररूप और सुदृष्टिवालेको प्रकाशरूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार अज्ञानीको यह जगत् दुःखमय और ज्ञानीको सच्चिदानन्दमय प्रतीत होता है। सदा-सर्वदा सब ओर एकरस स्थित विज्ञानानन्दघन ब्रह्ममें न कोई मरता है और न कोई जीता है। जिस प्रकार महान् सागरके उल्लसित होनेपर भी उसमें तरङ्ग आदि न जन्मते हैं और न मरते हैं, उसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्ममें प्राणी न जन्मते हैं और न मरते हैं। जैसे जलमें तरङ्गोंके रूपमें प्रचुर जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आपमें जगत्की शक्तिके रूपमें ब्रह्म ही स्थित है। जैसे जलमें जो कण, कणिका, वीचि, तरङ्ग, फेन और लहरी हैं, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्ममें जो देह, मनका व्यापार, दृश्य, क्षय, क्षयका अभाव, भाव-रचना और अर्थ हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जिस प्रकार सुवर्णसे बनी आभूषणकी विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्णसे पृथक् नहीं होतीं, उसी प्रकार ब्रह्मसे उत्पन्न हुई चित्र-विचित्र देहादिकी आकृति-रचनाएँ भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकतीं। अज्ञानियोंको वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है। मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; अतः ब्रह्मसे भिन्न सुख और दुःखकी भी सत्ता नहीं है। ब्रह्मको ब्रह्म न जाननेसे अज्ञानीके लिये वह प्राप्त होते हुए भी अप्राप्त है, जिस तरह, सुवर्णका ज्ञान हुए बिना सुवर्ण प्राप्त हुआ
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भी अप्राप्त ही है। ब्रह्मको ब्रह्म जान लेनेपर तत्क्षण ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार सुवर्णको सुवर्ण जान लेनेपर तत्क्षण ही सुवर्ण प्राप्त हो जाता है। कर्म, कर्त्ता, करण, कारण और विकारोंसे रहित स्वयं समर्थ महान् आत्मा ही ब्रह्म है, यों ब्रह्मज्ञानीलोग कहते हैं।
'यह देह मै नहीं हूँ' इस प्रकार जब ज्ञान हो जाता है, तब ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है। इसीसे देहमें अहं-भाव मिथ्या सिद्ध हो जाता है। उस समय पुरुष देहसे विरक्त हो जाता है। 'मै एकमात्र ब्रह्मस्वरूप हूँ' इस प्रकार यथार्थ ज्ञान होनेपर ब्रह्मभावना प्रकट होती है। उस अपने वास्तविक रूपका यथार्थ ज्ञान होनेपर अज्ञान विलीन हो जाता है। मुझे न दुःख है न कर्म हैं, न मोह है न कुछ अभिलषित है। मै एकरूप, अपने स्वरूपमें स्थित, शोकशन्य तथा ब्रह्मस्वरूप हूँ—यह ध्रुव सत्य है। मैं कल्पनाओंसे शून्य हूँ, मैं सर्वविध विकारोंसे रहित और सर्वात्मक हूँ; मै न त्याग करता हूँ और न कुछ चाहता हूँ; मै परब्रह्मस्वरूप परमात्मा हूँ, यह ध्रुव सत्य है। जिसमें सब कुछ स्थित है, जिससे यह सब उत्पन्न हुआ है, जो यह सब है, जो सब ओर विद्यमान है एवं जो सबका अद्वितीय आत्मा है, वही परब्रह्म परमात्मा है। यह निश्चय है, वही चेतन आत्मा—वह व्यापक, दृश्यरहित सच्चिदानन्दघन ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्म, सत्, सत्य, ऋत, ज्ञ इत्यादि नामोंसे सर्वत्र कहा जाता है। विषय-संसर्गरहित, चेतनमात्रस्वरूप, विशुद्ध, समस्त भूत-प्राणियोंको जाननेवाला, सर्वव्यापक, परम शान्त, सच्चिदानन्द ब्रह्मका ब्रह्मज्ञानी अनुभव करते हैं। सुषुप्तिके सदृश समस्त विकल्पोंसे रहित, परम शान्तरूप, विशुद्ध प्रकाशस्वरूप, सांसारिक विषय-सुखोंसे अत्युत्तम तथा वासनाओंसे रहित सच्चिदानन्द ब्रह्म ही मै हूँ। सुख-दुःख आदि कल्पनाओसे रहित, निर्मल, सत्य अनुभवरूप जो शाश्वत सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप है, वही मै हूँ। पर्वत आदि पदार्थ-समुदायके बाहर एवं भीतर सर्वदा समान सत्तारूपसे व्यापक निर्लेप विज्ञानानन्दघन जो परमात्मा है, वही मै हूँ। जो सम्पूर्ण संकल्पोंका फल देनेवाला, अग्नि-सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण तेजोंका प्रकाशक और प्राप्त करनेयोग्य सम्पूर्ण पदार्थोंकी अन्तिम सीमा है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। वह चिन्मय परमात्मा बाहर-भीतर—सर्वत्र प्रकाशस्वरूपसे विद्यमान और अपने आपमें स्थित है; सबके हृदयमें स्थित होते हुए भी उसका अज्ञानके कारण अनुभव नहीं होता; अतः वह दूर न होते हुए भी दूर कहा गया है। उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जो समस्त संकल्पों, कामनाओं तथा रोष आदिसे रहित है, उस चिन्मय परमात्माकी हम उपासना करते हैं। उस परमात्मामें यह सारा जगत् प्रतीत होता है, किंतु वास्तवमें इस जगत्का उसमें अत्यन्ताभाव है तथा वास्तवमें वह है, इसीलिये वह सद्रूप है; किंतु वह मन-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिये असद्रूप है। ऐसे उस एक अद्वितीय निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्द परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि सारे विषय-पदार्थोंका प्रकाशक है और वास्तवमें जो उन सब विषय-पदार्थोंसे रहित है, उस परम शान्त चिन्मय परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो समस्त विभूतियों और महिमाओंसे युक्त प्रतीत होता है, किंतु जो वास्तवमें समस्त विभूतियों एवं महिमाओंसे रहित है तथा जो मायाके सम्बन्धसे जगत्का कर्ता-सा प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें अकर्ता है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्माको मै प्राप्त हूँ।
रघुनन्दन! पूर्वोक्त निश्चयवाले वे सद्रूप जीवन्मुक्त महात्मा सत्यस्वरूप परम शान्त परमपदमें स्थित हो गये थे। वे फूलोंसे पूर्ण, झूलेके-से आन्दोलनोंसे चञ्चल चित्र-विचित्र वनोंकी पंक्तियोंमें एवं मेरु पर्वतकी चोटियो-के ऊपर विचरण करते थे। वे अनेक प्रकारके सदाचारोंके रूपमें इन सभी धर्मोंका स्वयं अनुष्ठान
**२—श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीकी सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वारा उपदेशका आरम्भ, चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण** \dots **३६३**
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७२
करते थे । इसी प्रकार श्रुति-स्मृतिविहित कर्मोंका भी वे कर्त्तव्य-बुद्धिसे आचरण करते थे । उन तत्त्ववेत्ता महापुरुषोंका मन अत्यन्त कमनीय कञ्चन और कामिनीके प्राप्त होनेपर हर्ष और चञ्चलता आदि विकारोंको नहीं प्राप्त होता था । वे सुखकी प्राप्ति होनेपर हर्षित और दुःखकी प्राप्ति होनेपर खिन्न नहीं होते थे ।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अब कृपाकर मुझे यह बतलाइये कि प्राणवायुकी गतिके अवरोधसे वासनाका विनाश हो जानेपर जीवन्मुक्त-पदमें परम शान्ति कैसे मिलती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संसार-सागरसे पार उतरनेके साधनका नाम ही 'योग' है । उस चित्तको शान्त करनेवाले साधनको तुम दो प्रकारका समझो । इसका प्रथम प्रकार परमात्माका यथार्थ ज्ञान है, जो संसारमें प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार प्राण-निरोध है, जिसे मैं आगे बता रहा हूँ; सुनो ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुवर ! योगके इन दोनों प्रकारके साधनोंमें कौन-सा सरल और कष्टरहित उत्तम साधन है, जिसके जाननेसे विक्षेप फिर बाधा नहीं पहुँचाता ?
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यद्यपि शास्त्रोंमें 'योग' शब्दसे उपर्युक्त दोनों ही प्रकार (परमात्म-विषयक ज्ञान और प्राणनिरोध) कहे गये हैं, तथापि इस 'योग' शब्दकी प्राणनिरोधके अर्थमें ही अधिक प्रसिद्धि है । संसार-सागरसे पार उतरनेकी पद्धतिमें एक योग (प्राण-निरोध) और दूसरा ज्ञान—ये दोनों एक फल देनेवाले समान उपाय शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं । किसीके लिये योगका साधन असाध्य-सा है और किसीके लिये परमात्मविषयक ज्ञानका साधन असाध्य-सा है; परंतु मैं तो परमात्मविषयक ज्ञानके साधनको ही सुसाध्य मानता हूँ । यह प्राणनिरोधरूप योग देश, काल, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान आदि उपायोंसे सिद्ध होता है; अतः वह सुसाध्य नहीं है । किंतु साधकको सुसाध्यता और दुःसाध्यताका विचार नहीं करना चाहिये । रघुकुलतिलक ! ज्ञान और योग—ये दोनों ही उपाय शास्त्रोक्त हैं । इन दोनोंमेंसे सब ज्ञानोंसे परे जाननेयोग्य विशुद्ध ज्ञान तुम्हें पहले बतलाया जा चुका है । अब तुम यह योग सुनो, जो प्राण और अपानके निरोधके नामसे प्रसिद्ध है, तथा देहरूपी गुहाका दृढ़ आश्रय करनेवाला, अणिमादि अनन्त सिद्धियोंको देनेवाला और परमार्थ-ज्ञान प्रदान करनेवाला है ।
(सर्ग ११-१३)
देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना, भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! पूर्ववर्णित उस अनन्त परमात्माके किसी एक अंशमें मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति यह ब्रह्माण्ड वर्तमान है । उस ब्रह्माण्डमें सृष्टिकी उत्पत्तिके कारण तथा पूर्वकृत कर्मानुसार प्राणिसमूहकी रचनामें संलग्न कमलयोनि ब्रह्मा पितामहरूपसे स्थित हैं उन्हीं ब्रह्मदेवका मैं एक सदाचारसम्पन्न मानसपुत्र हूँ । मेरा नाम वसिष्ठ है । मैं ध्रुवद्वारा धारण किये गये सप्तर्षिमण्डलमें वैवस्वत मन्वन्तर-पर्यन्त निवास करता हूँ । एक समयकी बात है, मैं स्वर्गलोकमें देवराज इन्द्रकी सभामें बैठा हुआ था । वहाँ देवर्षि नारद आदि भी विराजमान थे । वे चिरजीवियोंकी कथा सुना रहे थे । मैंने भी यह कथा
३७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सुनी थी। उस समय किसी कथा-प्रसङ्गके अवसरपर मुनिवर शातातप, जो मितभाषी, मानी और अगाध बुद्धिसम्पन्न थे, कहने लगे—"मेरुगिरिके ईशानकोणमें पद्मरागमणिसे युक्त एक बहुत ऊँचा शिखर है। उसकी चोटीपर एक अत्यन्त शोभाशाली कल्पतरु है, जो 'चूत' नामसे विख्यात है। उस कल्पतरुके उपरी भागकी दाहिनी शाखामें एक कोटर है, जो चाँदीके समान श्वेतवर्णकी लताओंसे आच्छादित है। उस कोटरमें एक घोंसला विद्यमान है। उस घोंसलेमें एक परम ऐश्वर्यशाली कौआ निवास करता है। उस वीतराग वायसका नाम भुशुण्ड है। देवगण ! वह वायसराज भुशुण्ड इस जगत्में जिस प्रकार चिरकालसे जी रहा है, वैसा चिरजीवी तो स्वर्गलोकमें न कोई हुआ है और न होगा ही। वह दीर्घायु तो है ही, साथ ही रागरहित, ऐश्वर्ययुक्त, शान्त और सुन्दर रूपवाला भी है। उसकी बुद्धि अगाध और स्थिर है। वह कालकी गतिका पूर्ण ज्ञाता है।"
राघव ! इस प्रकार जब कथाका समय समाप्त हुआ और सभी देवता अपने-अपने वासस्थानको चले गये, तब मैं कुतूहलवश उस भुशुण्ड पक्षीको देखनेके लिये चल पड़ा। फिर तो तुरंत ही मैं मेरुगिरिके उत्तम शिखरपर जा पहुँचा, जहाँ वह भुशुण्ड नामक कौआ रहता था। वह विशाल शिखर पद्मरागमणिसे निर्मित था। वहाँ झरते हुए गङ्गाजीके झरनोंके शब्द गूँज रहे थे। उसके लताकुञ्जोंमें देवता विराजित थे। गन्धर्वोंकी गीत-ध्वनिसे वह अत्यन्त रमणीय लग रहा था और वहाँ शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु बह रही थी। उसी शिखरपर मैंने 'चूत' नामक कल्पवृक्षको देखा। वह देवता, किन्नर, गन्धर्व एवं विद्याधरोंसे युक्त, ब्रह्माण्डकी तरह विस्तृत, असीम तथा दसों दिशाओं और आकाशको व्याप्त किये हुए था। वह सब ओरसे पुष्पों, फलों और कोमल पल्लवोंसे आच्छादित था। उसके पुष्पोंसे सबको आह्लाद प्रदान करनेवाले पराग झड़ रहे थे, जिनसे उसकी अत्यन्त विचित्र शोभा हो रही थी। वहाँ मैंने देखा, अनेक जातिके पक्षी उस वृक्षके तने और शाखाओंकी संधियोंमें, लताओंसे आवृत्त शाखाग्रभागोंमें, लता-पत्रोंमें, गाँठोंमें और पुष्पोंमें घोंसले बनाकर उनमें छिपे हुए बैठे थे। वहाँ मैंने ॐकार और वेदके मित्रभूत ब्रह्माके वाहन हंसोंके बच्चोंको भी देखा, जिन्हें ब्रह्मविद्याकी विधिवत् शिक्षा प्राप्त हो चुकी थी एवं जो सामवेदका गान करनेवाले थे। तत्पश्चात् मैंने अग्निदेवके वाहन शुकोंको देखा। उनके शरीरका रंग शङ्ख, विद्युत्पुञ्ज और नील मेघके समान था तथा कोई-कोई यज्ञवेदियोंपर बिछाये गये हरित वर्णके कुश-लताओंके दलोंकी भाँति हरे रंगके भी थे। देवगण सदा उनका दर्शन करते थे। वे मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे। उनकी बोली स्वाहाकारकी-सी जान पड़ती थी। वहाँ मयूरोंके बच्चे भी थे, जिनकी शिखाएँ अग्नि-शिखा-सी उद्दीप्त थीं, जिनके पर जगज्जननी पार्वती (अपने जूड़ेमें
निर्वाण-प्रकरण पू०]* देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७१
बाँधनेके लिये) सँभालकर रखती थीं तथा जो स्कन्दद्वारा विस्तारित शिव-सम्बन्धी सम्पूर्ण विज्ञानोंके विशेष जानकार थे।
इस प्रकार ज्यों ही मेरी दृष्टि उस वृक्षकी दाहिनी शाखाके एकान्त कोटरपर पड़ी, त्यों ही मैने देखा कि वहाँ बहुत-से कौए बैठे हुए हैं और उनके बीचमें ऐश्वर्यशाली एवं अत्यन्त उन्नत शरीरवाला वायसराज भुशुण्ड विराजमान है। उसका मन आत्मज्ञानसे परिपूर्ण है। वह दूसरोंको मान देनेवाला, समदर्शी और सर्वाङ्गसुन्दर है। प्राण-क्रियाके निरोधसे वह सदा अन्तर्मुख वृत्तिवाला और सुखी है तथा चिरजीवी होनेके कारण वह 'चिरजीवी' नामसे विख्यात है। वह भूतकालीन सुर, असुर और महीपालोंके इतिहासका ज्ञाता, प्रसन्न एवं गम्भीर मनसे युक्त, चतुर तथा कोमल एवं मधुर वाणी बोलनेवाला है। वह परमात्माके सूक्ष्मतत्त्वका वक्ता तथा विज्ञाता है। वह ममता और अहंकारसे रहित, बुद्धिमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर, प्राणीमात्रका हितैषी, बन्धु एवं मित्र है। वह एक मनोरम सरोवरकी भाँति सौम्य, प्रसन्न, मधुर, ब्रह्म-रससे युक्त, महान् आनन्दरससे सम्पन्न और आन्तरिक अखण्ड शान्ति-समन्वित है। गम्भीरताका परित्याग न करनेके कारण उसके अन्तः-करणकी शोभा प्रकटित हो रही थी।
रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं उस भुशुण्ड पक्षीके सामने उतर पड़ा, मानो पर्वतपर आकाशसे कोई नक्षत्र आ गिरा हो। मेरा शरीर कान्तिमान् तो था ही, अतः मेरे आनेसे वह सभा कुछ चञ्चल हो उठी। यद्यपि वहाँ मेरे जानेकी कोई सम्भावना नहीं थी, तथापि मुझे देखते ही भुशुण्डने पहचान लिया कि ये तो वसिष्ठजी पधारे हैं। फिर तो वह पर्वतसे उठे हुए छोटे-से मेघ-खण्डके समान अपने पत्र-पुञ्जके आसनसे उठ खड़ा हुआ और मधुर वाणीमें बोला—'मुनिवर ! आपका स्वागत है।' तत्पश्चात् उसने आसन, अर्घ्य और पाद्य आदि देकर मेरा सत्कार किया। उस समय उस महान् तेजस्वी भुशुण्डका मन परम प्रसन्न था। उसने सौहार्दवश मधुर वाणीमें मुझसे कहना आरम्भ किया।
भुशुण्ड बोला—मुने ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि चिरकालके पश्चात् आज आपने हमलोगोंपर महान् अनुग्रह किया है; क्योंकि आपके दर्शनामृतके सिञ्चनसे सिक्त होकर आज हमलोग पुण्यवृक्ष-सरीखे परम पवित्र हो गये। मुनिवर ! आप तो माननीयोंके भी मान्य हैं। इस समय जो आपने मुझे दर्शन दिया है, इसमें चिरकालसे सञ्चित मेरी पुण्यराशिकी प्रेरणा ही कारण जान पड़ती है। अच्छा, अब यह बताइये कि कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है तथा किसलिये आज आपने यहाँ पधारनेका कष्ट उठाया है। हमलोग सदा आपके आदेशपूर्ण वचन सुननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं, अतः आप हमें आज्ञा देनेकी कृपा कीजिये। मुनिराज ! आपके चरणोंके दर्शनसे ही मुझे सारी बातें ज्ञात हो गयी हैं। आपने अपने शुभागमनके पुण्यसे
३७८ * अविच्छिन्नचिन्मात्रैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हमलोगोंको संयुक्त कर दिया । ( बात यह है कि इन्द्रसभामें चिरजीवियोंके विषयमें चर्चा हो रही थी, उसी प्रसङ्गमें आपको हमारा स्मरण हो आया । इसी कारण आपने अपने चरणोंसे इस स्थानको तथा मुझे भी पवित्र बनाया है । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार यद्यपि आपके आगमनका प्रयोजन मुझे ज्ञात हो गया है, फिर भी जो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, इसका कारण यह है कि आपके वचनामृतके रसास्वादकी वाञ्छा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है। श्रीराम ! तीनो कालोंका निर्मल ज्ञान रखनेवाले उस चिरजीवी पक्षी भुशुण्डने जब इस प्रकार पूछा, तब मैंने उसे यों उत्तर दिया ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—पक्षियोंके सरदार ! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह बिल्कुल सत्य है । आज मैं तुम चिरजीवीको देखनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। सौभाग्य-की बात है कि तुम्हारा अन्तःकरण पूर्णतया शान्त है, तुम सकुशल हो और परमात्मज्ञान-सम्पन्न होनेके कारण इस भीषण जगज्जालमें भी नहीं फँसे हो । परंतु ऐश्वर्यशाली वायसराज ! मेरे मनमें एक संदेह है, उसे तुम अपने यथार्थ वचनोंद्वारा दूर करो । (वह संशय यह है कि) तुम किस कुलमें उत्पन्न हुए हो ? किस प्रकार तुम्हें ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हुआ ? तुम्हारी आयु कितनी है ? तुम्हें अपना कौन-सा वृत्तान्त अर्थात् किस कल्पका चरित्र याद है ? किस महानुभावने तुम-जैसे दीर्घदर्शीके लिये यह निवासस्थान निश्चित किया है ?
श्रीराम ! वह भुशुण्ड न तो अभीष्ट-लाभसे प्रसन्न ही होता था, न तो उसकी बुद्धि ही क्रूर थी । उसके सभी अङ्ग सुन्दर थे तथा शरीरका वर्ण वर्षाकालीन मेघके सदृश श्याम था । उसके वचन स्नेहपूर्ण और गम्भीर होते थे । वह मुस्कुराकर ही बोलता था । तीनों लोकों-की इयत्ता उसके लिये हस्तामलकवत् थी । वह सम्पूर्ण भोगोंको तृण-सरीखे तुच्छ समझता था । वह परावर ब्रह्मका ज्ञाता था । उसकी बुद्धि पूर्णतया शान्त थी तथा वह शान्त और परमानन्दसे परिपूर्ण था । उसके वाक्य प्रिय और मधुर, अतएव सुनने योग्य तथा वीणाके गानकी भाँति मनोहर थे । उसका शरीर तो ऐसा लगता था मानो सम्पूर्ण भयोंका अपहरण करनेवाले स्वयं ब्रह्मने ही नवीन भुशुण्ड-शरीर धारण किया हो । वह स्वाभाविक प्रसन्नतासे युक्त था तथा प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये उत्सुक होनेके कारण उसके मुखकी अद्भुत शोभा हो रही थी । इस प्रकार उस वायसराज भुशुण्डने शुद्ध, अमृतमय तथा क्रमबद्ध रूपसे निर्मल वाणीद्वारा अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मुझसे कहना आरम्भ किया ।
(सर्ग १४-१७)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डके द्वारा अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन * ३७९
भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञान-प्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना
भुशुण्ड बोला—मुनिवर वसिष्ठजी ! इस जगत्में देवाधिदेव महादेव समस्त स्वर्गवासी देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मादि देवता भी उनकी अभिवन्दना करते हैं। उनके शरीरके वामार्धमें सौन्दर्यशालिनी भगवती पार्वती विराजमान रहती हैं। उन महादेवजीके मस्तकपर गङ्गारूपी पुष्पमाला सुशोभित है, जो हिमके हारकी भाँति धवल तथा लहरीरूपी पुष्प-गुच्छोंसे गुँथी हुई है। उस मालाने ही उनके जटा-जूटको आवेष्टित कर रखा है। क्षीरसागरसे जिसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिससे अमृतके झरने झरते रहते हैं, वह शोभाशाली चन्द्रमा उनके ललाटमें स्थित है। उस चन्द्रमाके अनवरत अमृत-प्रवाहसे अभिषिक्त होनेके कारण जिसकी विषैली शक्ति शान्त होकर अमृत-स्वरूपिणी हो गयी है तथा जिसका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है, वह कालकूट विष उनके कण्ठमें आभूषणके समान सुशोभित है। निर्मल अग्निसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह अत्यन्त शुभ्र भस्म उन महादेवजीका भूषण है। आकाश ही उनका वस्त्र है, जो चन्द्रमाकी सुधाधारासे प्रक्षालित, नील मेघके समान सुशोभित और तारारूपी बिन्दुओंसे समन्वित है। हिलनेके कारण जिनके मस्तककी मणियाँ चमक रही हैं तथा जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, ऐसे चिकने अङ्गवाले सर्प ही उनके हाथके कङ्कण हैं। उनका मुख तीन नेत्रोंसे देदीप्यमान है। जैसे प्रमथगण उनके परिवाररूप हैं, उसी प्रकार निर्मल कान्तिवाली मातृकाएँ भी उनके परिवारमें ही हैं। ये मातृकाएँ पर्वतशिखरोंपर, आकाशमें, विभिन्न लोकोंमें, गड्डोंमें, श्मशानोंमें तथा प्राणियोंके शरीरोंमें निवास करती हैं। उन सभी मातृकाओंमें जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, सिद्धा, रक्ता, अलम्बुषा और उत्पला—ये आठ मातृदेवियाँ प्रधान हैं। शेष माताएँ इन्हीं आठोंका अनुगमन करती हैं।
दूसरोंको मान देनेवाले मुनीश्वर ! उन महामहिमा-शालिनी मातृकाओंमें माता अलम्बुषा अत्यन्त निष्णात हैं। उनका वाहन कौआ है। उस कौएका नाम चण्ड है। वह इन्द्रनील-पर्वतके समान नीला है तथा उसके ठोरकी हड्डी वज्रके समान कठोर है। एक समयकी बात है, भयंकर चेष्टावाली तथा अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन्न वे सभी मातृकाएँ किसी कारणवश आकाशमें इकट्ठी हुईं। वहाँ उन सबका एक महोत्सव हुआ, जो नाच-गान आदिसे अत्यन्त मनोहर था। उस उत्सवमें ब्राह्मी देवीके रथमें जुतनेवाली उनकी ज्ञानी हंसियों और अलम्बुषा देवीका वाहन चण्डनामक काक—ये सभी
३८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशप्रदेशमें एकत्र होकर नृत्य करने लगे। इस प्रकार साथ-साथ नाचनेके कारण वह वायस सात कुलहंसियोंका वल्लभ हो गया। फिर तो उसने क्रमशः प्रत्येक हंसीके साथ रमण किया, जिससे वे ब्राह्मी शक्तिके रथकी हंसियाँ गर्भवती हो गयीं। मुनीश्वर ! तब उन हंसियोंने ब्राह्मी-देवीसे अपना वृत्तान्त यथार्थ रूपसे कह सुनाया।
इसपर ब्राह्मीदेवीने कहा—पुत्रियो ! इस समय तुमलोग गर्भवती हो गयी हो, इसलिये मेरा रथ वहन करनेमें समर्थ नहीं हो; अतः अब तुमलोग स्वेच्छानुसार विचरण करो। इस प्रकार ब्राह्मीदेवी दयापरवश हो गर्भके कारण अलसाई हुई उन हंसियोंसे ऐसा कहकर सुखपूर्वक निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गयीं। तदनन्तर समय आनेपर उन हंसियोंने इक्कीस अंडे दिये। मुने ! इस प्रकार उन अंडोंसे ये हमलोग इक्कीस भाई चण्डके पुत्ररूपमें कौएकी योनिमें उत्पन्न हुए। धीरे-धीरे हम बड़े हुए। हमारे पर निकल आये और हम आकाशमें उड़ने योग्य भी हो गये। जब भगवती ब्राह्मी समाधिसे विरत हुईं, तब हमलोगोंने अपनी माता हंसियोंके साथ उन देवीकी चिरकालतक भलीभाँति आराधना की। तदनन्तर उपयुक्त समय आनेपर कृपापरवश हुई भगवती ब्राह्मीने हमलोगोंपर ऐसा अनुग्रह किया, जिसके फलस्वरूप हमलोग जीवन्मुक्त होकर स्थित हैं। जब- हमलोगोंका मन पूर्णतया शान्त हो गया, तब ऐसी धारणा हुई कि अब एकान्त प्रदेशमें चलकर ध्यान-समाधिमें स्थित रहना चाहिये। ऐसा निश्चय करके हमलोग अपने पिताजीके पास विन्ध्यप्रदेशमें गये। वहाँ पहुँचनेपर पिताजीने हमलोगोंका आलिङ्गन किया। तत्पश्चात् हमलोगोंने अलम्बुसा देवीका पूजन किया, जिससे उन देवीने हमलोगोंको कृपादृष्टिसे देखा। फिर तो हमलोग समाहित-चित्त होकर वहीं रहने लगे।
तब पिता चण्डने पूछा—पुत्रो ! क्या तुमलोग इस जगज्जालसे, जो अनन्त वासनारूपी तन्तुओंसे गुँथा हुआ है, मुक्त हो चुके हो ? यदि नहीं तो हम इन मृत्य-
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपनी ज्ञानप्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना * ३८१
असल भगवती अलम्बुसासे प्रार्थना करें, जिससे तुमलोग ज्ञानमें पारंगत हो जाओगे।
कौओंने कहा—पिताजी ! ब्राह्मीदेवीकी कृपासे हमलोगोंको ज्ञेय तत्त्वका पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका है; किंतु अब हमें एकान्तवासके लिये किसी उत्तम स्थानकी अभिलाषा है।
चण्डने कहा—पुत्रो ! मेरु नामक एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत है, जो रत्नसमूहोंका आधार और देवताओंका आश्रय-स्थान है। उसके पृष्ठभागमें एक महान् कल्पवृक्ष है, जो नाना प्रकारके प्राणियोंसे समावृत है। उसके दाहिने तनेपर एक शाखा है, जिसमें सुवर्ण-सदृश पीले रंगके चमकीले पल्लव लगे हैं और वह रत्न-तुल्य घने पुष्प-गुच्छोंसे तथा चन्द्रबिम्बकी तरह प्रकाशमान फलोंसे सुशोभित है। पुत्रो ! पूर्वकालमें मैंने उसी शाखापर चमकीली मणियोंसे युक्त घोंसला बनाया था और उसीमें क्रीडा की थी। उस घोंसलेके बाहरी दरवाजोंकी रचना चिन्तामणिकी शलाकाओंसे की गयी है। वह रत्न-सदृश चमकीले पुष्पदलोंसे आच्छादित, स्वादु रसयुक्त फलोंसे युक्त और विचारपूर्वक व्यवहार करनेवाले कौओंके बच्चोंसे परिपूर्ण है। अतः प्यारे बच्चो ! तुमलोग उसी घोंसलेपर जाओ। वहाँ रहते हुए तुमलोगोंको पर्याप्त मात्रामें भोग और निर्विघ्न मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे।
मुनिवर ! यों कहकर हमारे पिताने हमलोगोंका चुम्बन तथा आलिङ्गन किया। तब हमलोग भगवती अलम्बुसा और पिताजीके चरणोंमें अभिवादन करके अलम्बुसाके वासस्थान उस विन्ध्यप्रदेशसे उड़ चले। फिर तो क्रमशः आकाशको लाँघकर और मेघोंके कोटरोंसे निकलकर पवनलोकमें जा पहुँचे। वहाँ हमलोगोंने आकाशचारी देवोंको प्रणाम किया। मुनीश्वर ! फिर सूर्यमण्डलका अतिक्रमण करके हमलोग स्वर्गकी अमरावतीपुरीमें गये और फिर स्वर्गको लाँघकर ब्रह्मलोकमें पहुँच गये। वहाँ हमलोगोंने माता भगवती ब्राह्मीदेवीको प्रणाम किया और तुरंत ही पिताद्वारा कहा हुआ वह सारा वृत्तान्त उन्हें ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। तब उन्होंने स्नेहपूर्वक हमलोगोंका आलिङ्गन किया और 'जाओ' यों आज्ञा प्रदान करके हमें उत्साहित किया। तत्पश्चात् हमलोग उन्हें नमस्कार करके ब्रह्मलोकसे चल पड़े। आकाशमार्गसे चलनेमें हमलोग चपल तो थे ही; अतः पवनलोकमें विचरते हुए लोकपालोंकी पुरियोंको, जो सूर्यके समान देदीप्यमान हैं, लाँघकर इस कल्पतरुपर आ पहुँचे और अपने घोंसलेमें प्रविष्ट हो गये। मुने ! यहाँ सारी बाधाएँ हमलोगोसे दूर रहती हैं और हमलोग सदा समाधिमें ही स्थित रहते हैं। महानुभाव ! आपके पूर्व प्रश्नके उत्तरमें हमलोग जैसे उत्पन्न हुए, जिस प्रकार यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेसे हमलोगोंकी बुद्धि शान्त हुई एवं जिस तरह हमलोग इस घोंसलेमें आये—वह सारा वृत्तान्त आपको अविकलरूपसे भलीभाँति कह सुनाया।
( सर्ग १८-१९ )
| ३८२ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान
भुशुण्डने कहा—मुने ! मैं जो निर्विघ्नतापूर्वक आपका दर्शन कर रहा हूँ, इससे प्रतीत होता है कि चिरकालसे संचित किये गये मेरे पुण्योंका फल आज ही प्रकट हुआ है। मुनिराज ! आज आपके दर्शनसे यह घोंसला, यह शाखा, यह मैं और यह कल्पतरु—ये सब-के-सब पवित्र हो गये।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—पक्षिराज ! उस प्रकार बलवान् एवं अगाध बुद्धिसम्पन्न तुम्हारे भाई यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते ? अकेले तुम्हीं क्यों दृष्टिगोचर हो रहे हो ?
भुशुण्डने कहा—निष्पाप महर्षे ! हमलोगोंको यहाँ रहते बहुत लम्बा समय व्यतीत हो गया, यहाँतक कि दिनकी भाँति युगोंकी पङ्क्तियाँ समाप्त हो गयीं। अतः इतना लंबा समय बीत जानेके कारण मेरे सभी छोटे भाई तृणकी तरह अपने शरीरोंका त्याग करके कल्याण-मय शिवपदमें लीन हो गये; क्योंकि चाहे कोई दीर्घायु हो, महान् हों, सज्जन हों, बलवान् हों—कैसे भी क्यों न हों, अलक्षितस्वरूपवाला काल सभीको निगल जाता है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—प्यारे वायसराज ! जिस समय प्रलयवायु अनवरत वेगपूर्वक बहने लगती है, उस समय क्या तुम्हें खेद नहीं होता ? उदयाचल और अस्ताचलके अरण्यसमूहोंको भस्म करनेवाली सूर्यकी किरणोंसे क्या तुम्हें कष्ट नहीं होता ? यह कल्पवृक्ष जो स्वयं ही अत्यन्त ऊँचा है तथा ऊँचे-से-ऊँचे स्थानपर स्थित है, जागतिक विषम क्षोभोंसे क्षुब्ध क्यों नहीं होता ?
भुशुण्डने कहा—भगवन् ! हम सदा परमात्मामें ही संतोष मानकर स्थित रहते हैं, इसलिये भ्रमके अवसर आनेपर भी हमें कभी इस जगत्में भ्रम नहीं होता। ब्रह्मन् ! हम अपने स्वभावमात्रसे संतुष्ट रहते हैं और कष्ट-दायक विचारोंसे मुक्त होकर अपने इस घोंसलेमें रहकर केवल काल्यापन करते हैं। हमें न तो इस देहके जीवित रहनेसे किसी फलकी अभिलाषा है और न हम मरणद्वारा इसका विनाश ही चाहते हैं; क्योंकि हमलोग वर्तमान समयमें जिस प्रकार स्थित हैं, वैसे ही आगे भी स्थित रहेंगे। हमने प्राणियोंकी जन्म-मरण आदि दशाओंका अवलोकन कर लिया और हमारे मनने अपने चञ्चल स्वरूपका सर्वथा त्याग कर दिया है। निरन्तर शान्ति प्रदान करनेवाले अपने अविनाशी सच्चिदानन्दघनस्वरूप ज्ञानमें स्थित होकर मैं इस कल्पवृक्षके ऊपर बैठा हुआ सदा कालकी कलापूर्ण गतिको जानता रहता हूँ। ब्रह्मन् ! मैं रत्न-सदृश चमकीले पुष्प-गुच्छोंके प्रकाशसे युक्त इस कल्प लतागृहमें बैठकर प्राणायामके द्वारा योगबलसे सम्पूर्ण कल्पकी बात जान लेता हूँ। मैं इस ऊँचे शिखरपर बैठा हुआ अपनी बुद्धिसे लोकोंके कालक्रमकी स्थितिको जानता रहता हूँ। मुनिवर ! मेरा मन सार और असार वस्तुओंका विभाग करनेवाले ज्ञानकी प्राप्तिसे उत्तम शान्तिको प्राप्त हो गया है, अतः इसकी चञ्चलता नष्ट हो गयी है और अब यह शान्त होकर भलीभाँति स्थिर हो गया है। अगाध-बुद्धिसम्पन्न महर्षे ! सांसारिक व्यवहारोंसे उत्पन्न मिथ्या आशारूपी पाशोंसे बँधा हुआ भूलोकवासी साधारण कौआ जिस प्रकार सिसकारियोंसे भयभीत हो जाता है, उस प्रकार मैं भयभीत नहीं होता; क्योंकि उत्कृष्ट शान्तिरूप धर्मवाली तथा आत्मप्रकाशसे शीतल हुई बुद्धिद्वारा जागतिक मायाको देखते हुए हमलोग धैर्यसम्पन्न हो गये हैं, इसलिये भयंकर दशाओंमें भी हमारी बुद्धि पर्वतके समान स्थिर रहती है। परम ऐश्वर्यशाली मुने ! समस्त भूतसमुदाय व्यवहारदृष्टिसे आते और जाते हैं, परंतु परमार्थदृष्टिसे न कोई आता
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान * ३८३
है न जाता है; अतः इस विषयमें हमलोगोंको भय कैसा। क्योंकि प्राणि-समुदायरूपी तरङ्गोंसे युक्त तथा कालसागरमें प्रवेश करनेवाली संसार-सरिताके तटपर स्थित होते हुए भी हमलोग उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। जिनके शोक, भय और आयास नष्ट हो चुके हैं तथा जो आत्मलाभसे संतुष्ट हैं—ऐसे आप-सरीखे उत्तम पुरुष हमलोगोंपर अनुग्रह करते रहते हैं; इसलिये हमलोग सारे दुःखोंसे मुक्त हो गये हैं। भगवन् ! हमलोगोंका मन यद्यपि व्यवहारार्थ इधर-उधर कार्योंमें व्यस्त रहता है, तथापि न तो वह राग आदि वृत्तियोंमें फँसता है और न तत्त्व-विचारसे शून्य ही होता है। क्योंकि हमारा आत्मा निर्विकार, क्षोभरहित और शान्त हो गया है, इसलिये चिद्रूप तरङ्गवाले हमलोग पूर्णिमाके पर्वकालमें बढ़नेवाले महासागरकी भाँति प्रबुद्ध हो गये हैं। ब्रह्मन् ! इस समय आपके आगमनसे हमलोगोंका अन्तःकरण हर्षसे प्रफुल्लित हो उठा है। समस्त एषणाओंका परित्याग कर चुकनेवाले संत-महात्मा अपने शुभागमनद्वारा जो हमपर अनुग्रह करते हैं, इससे बढ़कर कल्याणकारक मैं अपने लिये और कुछ नहीं समझता। भला, आपातरमणीय भोगोंसे कौन-सा लाभ मिल सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। किंतु सत्सङ्गरूपी चिन्तामणिसे तो सबके सारभूत यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। सज्जन-शिरोमणे ! आपकी वाणी स्नेहपूर्ण, गम्भीर, कोमल, मधुर, उदार और धीरतायुक्त है; मैंने परमात्माको जान लिया है और आपके दर्शनसे मैं पवित्र हो चुका हूँ। इसलिये मेरी तो ऐसी धारणा है कि आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि साधु पुरुषोंका सङ्ग समस्त भयोंका अपहरण करनेवाला होता है।
मुनीश्वर ! युगान्तकालमें जब भीषण उपद्रव होने लगते हैं और प्रचण्ड वायु बहने लगती है, उस समय भी यह कल्पवृक्ष सुस्थिर रहता है। यह कभी भी कम्पित नहीं होता। अन्य लोकोंमें विचरण करनेवाले समस्त प्राणियोंके लिये यह अगम्य है, इसीलिये हमलोग यहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं। ऐसे उत्तम वृक्षपर निवास करनेवाले हमलोगोंके निकट भला, आपत्तियों कैसे फटक सकती हैं।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—महाबुद्धिमान् भुशुण्ड ! प्रलय-कालमें जब सूर्य और चन्द्रमाको भी गिरा देनेवाली उत्पातवायु बहने लगती है, उस समय तुम संतापरहित कैसे रह पाते हो ?
भुशुण्डने कहा—मुनिश्रेष्ठ ! कल्पान्तके समय जब सांसारिक व्यवहारका विनाश हो जाता है, उस समय जैसे कृतघ्न आपत्तिकालमें सन्मित्रको त्याग देता है, उसी तरह मैं इस घोंसलेको छोड़ देता हूँ और आकाशमें ही स्थित रहता हूँ। उस अवसरपर वासनाशून्य मनकी तरह मैं सारी कल्पनाओंसे रहित रहता हूँ और मेरा सारा शरीर निश्चल हो जाता है। फिर मैं ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर समस्त तत्त्वोंके अन्तर्भूत एवं विशुद्ध परमात्मामें अचल सुषुप्तावस्थाके सदृश निर्विकल्पसमाधिमें तबतक स्थित रहता हूँ, जबतक कमलयोनि ब्रह्मा पुनः सृष्टिकर्ममें प्रवृत्त नहीं होते। सृष्टिरचना हो जानेके पश्चात् मैं ब्रह्माण्डमें प्रवेश करके पुनः अपने इस घोंसलेमें आ जाता हूँ।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—विहगराज ! कल्पान्तके अवसरोंपर जैसे तुम धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा अखण्डरूपसे स्थित रहते हो, वैसे अन्य योगी क्यों नहीं रहते ?
भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! यह तो परमेश्वरकी नियामिका शक्ति है, जो सबको नियमबद्ध रखती है। उसका उल्लङ्घन करना कठिन है। इसी कारण मुझे ऐसे रहना पड़ता है और दूसरे योगी दूसरी प्रकारसे रहते हैं। जो अवश्यम्भावी है, उसकी इदमित्थरूपसे अवधारणा नहीं की जा सकती; क्योंकि परमेश्वरकी नियामिका शक्तिरूप स्वभावका ऐसा निश्चय है कि जैसा होनहार होता है, वैसा ही होता है। इसीलिये प्रत्येक कल्पमें
३८४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
केवल मेरे संकल्पसे ही मेरुगिरिके इसी शिखरपर इस प्रकार यह कल्पवृक्ष बारंबार उत्पन्न होता है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—कल्याणस्वरूप वायसराज ! तुम्हारी आयु अत्यन्त लंबी है। तुम भूतकालीन पदार्थोंका निर्देश करनेवालोंमें अग्रगण्य, ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न और धीर हो। तुम्हारी मनोगति योगसाधनके योग्य है। तुमने अनेक प्रकारकी असंख्य सृष्टियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी देखा है। अतः अब यह बताओ कि इस सृष्टि-क्रममें तुम्हें किस-किस आश्चर्यजनक सृष्टिका स्मरण है ?
भुशुण्डने कहा—'मुनिश्रेष्ठ ! मुझे इस पृथ्वीके विषयमें ऐसा स्मरण है कि किसी समय यह शिला और वृक्षोंसे रहित थी। इसपर तृण और लता आदि भी नहीं थे; पर्वत, वन और भाँति-भाँतिके वृक्ष—ये कुछ भी नहीं थे और यह मेरुके नीचे स्थित थी। वहाँ यह ग्यारह हजार वर्षोंतक भस्मसे परिपूर्ण रही—ऐसा मुझे सम्यक् रूपसे स्मरण है। मुझे यह भी खूब याद है कि जब बल और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हुए असुरोंका घोर संग्राम चल रहा था, उस समय इस पृथ्वीका भीतरी भाग क्षीण हो गया था और यह युद्धसे भागे हुए जनोंसे परिपूर्ण हो गयी थी। फिर एक चतुर्युगीतक यह उन मतवाले असुरोंके अधिकारमें रही, इसका भी मुझे पूर्ण स्मरण है। अन्य चतुर्युगीके दो युगोंतक यह भूमि वनैले वृक्षोंसे खचाखच भरी रही। उस समय उन वृक्षोंके अतिरिक्त और किसी पदार्थका निर्माण नहीं हुआ था—इसका भी मुझे ठीक-ठीक स्मरण है। एक समय यह वसुधा चारों युगोंसे भी अधिक कालतक घने पर्वतोंसे आच्छादित रही। उसपर मनुष्य चल-फिर भी नहीं सकते थे—यह भी मुझे स्मरण है। मुझे वह समय भी याद आता है, जब अन्तरिक्ष आदि लोकोंमें समस्त विमानचारी देवता भयके कारण अन्तर्धान हो गये थे और यह पृथ्वी वृक्षशून्य होकर अन्धकारसे आच्छादित हो गयी थी। इनका तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-सी बातोंका मुझे स्मरण है; परंतु इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ। जो सार वस्तु है, उसे मैं संक्षेपसे कहता हूँ, सुनिये। ब्रह्मन् ! मुझे तो यहाँतक स्मरण है कि मेरे सामने सैकड़ों चतुर्युगियाँ बीत गयीं और ऐसे असंख्य मनु समाप्त हो गये, जो सब-के-सब प्रभावाधिक्यसे परिपूर्ण थे। मुझे एक ऐसी सृष्टिका स्मरण है, जिसमें पर्वत और भूमिका नाम-निशान भी नहीं था। चन्द्रमा और सूर्यके बिना ही पूर्ण प्रकाश छाया रहता था और देवता तथा सिद्ध मानव आकाशमें ही रहते थे। मुझे ऐसी ही एक और सृष्टिका स्मरण है, जिसमें न कोई इन्द्र था न भूपाल तथा उत्तम, मध्यम और अधमका भेद भी नहीं था। सब एकरूप था और दिशामण्डल अन्धकारसे व्याप्त था।
मुनिराज ! पहले सृष्टि-रचनाका संकल्प हुआ, फिर तीनों लोकोंका निर्माण हुआ। उस त्रिलोकीमें अवान्तर प्रदेशोंका विभाग होनेके बाद उनमें सात कुलपर्वतोंकी स्थापना हुई। उन्हीं प्रदेशोंमें जम्बूद्वीपकी पृथक् स्थापना हुई। ब्रह्माजीने उस जम्बूद्वीपमें ब्राह्मण आदि वर्ण, उनके धर्म और उन वर्णोंके लिये योग्य विधानविशेषोंकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अवनिमण्डल एवं नक्षत्र-चक्रकी स्थिति और ध्रुवमण्डलका निर्माण किया। तात ! तदनन्तर चन्द्रमा और सूर्यकी उत्पत्ति, इन्द्र और उपेन्द्रकी व्यवस्था, हिरण्याक्षद्वारा पृथ्वीका अपहरण, वराहरूपधारी भगवान्-द्वारा उसका उद्धार, भूपालोंकी रचना, मत्स्यरूपधारी भगवान्द्वारा वेदोंका लाया जाना, मन्दराचलका उन्मूलन, अमृतके लिये क्षीरसागरका मन्थन, गरुड़का शैशव, जब कि उनके पंख नहीं जमे थे, और सागरोंकी उत्पत्ति आदि जो निकटतम सृष्टिकी स्मृतियाँ हैं, उन्हें तो मेरी अपेक्षा अल्प आयुवाले योगी भी स्मरण करते हैं; अतः उनमें मेरी क्या आदर-बुद्धि हो सकती है।
मुनिश्रेष्ठ ! हयग्रीव, हिरण्याक्ष, कालनेमि, बल, हिरण्यकशिपु, क्राथ, बलि और प्रह्लाद आदि असुरोंमें,