भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५४० * अविच्छिन्नञ्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होता है। जो समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित अपनी बुद्धिगुहा—हृदयाकाशमें विराजमान परमात्मपदमें स्वेच्छानुसार स्थित रहता है, वह अपने आत्मामें ही रमण करनेवाला परमेश्वररूप ही है। जो लोग सदा अन्तर्मुख रहकर बाहरके कार्योंका सम्पादन करते रहते हैं, उनके जीवित रहते हुए भी उनके मनमें उसी तरह वासना नहीं उत्पन्न होती, जैसे जड पत्थरोंमें वह नहीं उत्पन्न होती। जगत् न तो द्वैतरूपमें है और न अद्वैतरूपमें ही।

श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तो अहम्भावकी प्रतीतिरूप वसिष्ठ-नामक आप यहाँ कैसे स्थित हैं? यह बताइये।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी आधे मुहूर्ततक चुपचाप ही बैठे रह गये। उनकी यह चेष्टा सुस्पष्ट ज्ञात हो रही थी। उनके चुप हो जाने-पर सभामें जो बड़े-बड़े लोग बैठे हुए थे, वे संशयके समुद्रमें गोते लगाने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीने फिर पूछा—'भगवन् ! आप मेरी ही तरह चुपचाप क्यों बैठे हैं? संसारमें कोई ऐसा प्रश्न नहीं है, जिसका उत्तर आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष न दे सकें।'

श्रीवसिष्ठजीने कहा—निष्पाप रघुनन्दन ! मुझमें कुछ कहनेकी शक्ति न होनेके कारण मेरे पास युक्तियोंका अभाव हो गया हो ऐसी बात नहीं है। परंतु यह प्रश्न जिस कोटिका है, उसमें चुप हो जाना ही इसका उत्तर है। प्रश्नकर्ता दो प्रकारके होते हैं—एक तत्त्वज्ञ और दूसरे अज्ञानी। अज्ञानी प्रश्नकर्ताको अज्ञानी बनकर ही उत्तर देना चाहिये और ज्ञानीको ज्ञानी बनकर। परम सुन्दर श्रीराम ! तत्त्वज्ञ पुरुषको उसके प्रश्नका कलङ्कयुक्त उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु कोई भी ऐसी वाणी नहीं है, जो निष्कलङ्क हो और तुम केवल ज्ञानी ही नहीं, परम ज्ञानी हो। अतः तुम्हारे प्रश्नका मौन ही उत्तर है। जो परमपद है, वह तत्त्वज्ञानके पूर्व इस रूपमें उपस्थित किया जाता है जिससे उसके विषयमें उपदेश वाणीकी प्रवृत्ति हो सके। अतः अज्ञानसे, ही उसको ससंकल्प वाणीका विषय बताया गया है एवं उसका कल्पित स्वरूप ही उपदेशका विषय होता है। किंतु तत्त्वज्ञानके पश्चात् जो उसका यथार्थ स्वरूप प्रकट होता है, उसे मौन अर्थात् वाणीका अविषय ही कहा गया है। इसीलिये तुम-जैसे तत्त्वज्ञशिरोमणिको मौनके रूपमें ही सुन्दर उत्तर दिया गया है। प्रिय रघुनन्दन ! वक्ता पुरुष स्वयं जैसा होता है, उसके अनुरूप ही वह उपदेश करता है। मैं ज्ञेय ब्रह्मरूप ही हूँ। अतः उस परमपदमें प्रतिष्ठित हूँ, जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है। जो वाणीसे अतीत पदमें प्रतिष्ठित है, वह वाणीरूप मलको कैसे ग्रहण कर सकता है। मैं मौन रहकर उस तत्त्वका प्रतिपादन कर रहा हूँ, जो अनिर्वचनीय है—जिसका वाणीद्वारा ठीक-ठीक वर्णन हो नहीं सकता, क्योंकि वाणी संकल्परूप कलङ्कसे युक्त होती है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वाणीमें जो-जो दोष आते हैं, उनका आदर न करके विधिरूपसे और निषेधरूपसे यह बताइये कि वास्तवमें आप कौन हैं?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! यदि तुम मुझसे मेरे स्वरूपका परिचय सुनना चाहते हो तो इस विषयको यथावत् सुनो। 'तुम कौन हो,' 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' इसका विवेचन किया जा रहा है। तात ! यह जो निर्विकार अनन्त चिन्मय परमात्मा है, वही मैं हूँ। इसमे बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंका सर्वथा अभाव है तथा यह समस्त कल्पनाओंसे परे है। मैं निर्मल अनन्त चेतन हूँ, तुम अनन्त चेतन हो, सारा जगत् अनन्त चेतन है और सब कुछ अनन्त चेतनमात्र ही है। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मामें मैं विशुद्ध

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमार्थ-तत्त्वका उपदेश * ५४१

ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हूँ। मुझमें भेदज्ञानकी दृष्टि है ही नहीं। अतः मैं किसी भी वस्तुको अपनेसे भिन्न कहना नहीं जानता । जीवित रहकर व्यवहारपरायण होता हुआ भी जो परम शान्त है, उस ज्ञानी पुरुषकी जो मुर्देके समान स्थिति है, उसीको परमपद कहते हैं। जो बाहर- भीतरके साधनोंसे रहित, शान्त, अनन्त, साधनरूप और सम है, जिसे न सुख कहा जा सकता है न दुःख, जो 'अहं' भी नहीं है तथा 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा जिसके स्वरूपका निर्देश कराया गया है, वह कल्याणस्वरूप तत्त्व ही परम पद है। उसे मैं अपनेसे भिन्न नहीं समझता। वस्तुतः उसे दूसरा कोई नहीं जानता। लोकैषणासे विरक्त ज्ञानी पुरुषके द्वारा आत्मामें ज्ञातापनकी भाँति उसका स्वयं ही अनुभव किया जाता है। उस परम पद- में न अहंता (मैं-पन) है न त्वत्ता (तू-पना), न अहंताका अभाव है और न अन्यता ही। वह केवल निर्वाणस्वरूप विशुद्ध कल्याणमय कैवल्य ही है। इस चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्तरूपता है, यही इसका संसार है और यही महान् कष्ट देनेवाला बन्धन है। चेतन जीवात्माका चेत्य विषयोंकी ओर उन्मुख न होना ही अचेत्यरूपता है। इसीको मोक्ष समझो। यही शान्त एवं अविनाशी परमपद है। जो दिशा और देश-काल आदिकी सीमासे बँधा हुआ नहीं है, वह शान्तस्वरूप शान्तात्मा परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान है, उसमें चेत्य (दृश्य) की सम्भावना ही नहीं है। फिर कौन, किसका और किस प्रकार चिन्तन करता है ? ये जो मन-बुद्धि आदि हैं, ये सब अन्तर्मुख दशामें चैतन्यरूप ही हैं। मन-बुद्धि आदि शब्दोंके अर्थरूपसे भावित होनेपर वे ही जडरूप मानी गयी हैं। समस्त दृश्योंका बाध हो जानेपर जो विशुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा अवशिष्ट रह जाता है, उसमें और शून्य आकाशमें क्या अन्तर है—इसे साधारण लोग नहीं जानते—विद्वान् ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं। उनका कहना है, कि वह परमात्मा चिन्मय और निरतिशयानन्दस्वरूप है, इसलिये वाणीका विषय नहीं होता। जैसे अन्धकारमें देखनेका प्रयत्न करनेसे नेत्रोंमें कुछ सद्सद्रूप आभास दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें जो आभास परिलक्षित होता है, वही यह जगत् है। 'मैं अज्ञानी हूँ' इस रूप- में जो जीवोंको अपने अज्ञानका बोध होता है, उससे सुरक्षित अज्ञानरूपी वायुका सहारा पाकर उनकी अविद्याग्नि प्रज्वलित होती रहती है। फिर जब उन्हें 'मैं ब्रह्म हूँ' यह यथार्थ बोध होता है, तब वही वायु उस अविद्याग्निको दुर्बल पाकर बुझा देती है।

अनावृत स्वप्रकाश निरतिशयानन्दरूपसे स्थित हुए तत्त्वज्ञानी पुरुषोंकी संसारके भानसे रहित तथा दुःखरूप क्षोभसे शून्य जो स्थिति है, उसीको मोक्ष कहते हैं और वही अविनाशी पद है। परमात्मज्ञानके साथ सांसारिक पदार्थोंके ज्ञानसे युक्त हो मनुष्य मुनि बन जाता है। परंतु जो परमात्माके अज्ञानके साथ-साथ सांसारिक पदार्थों- के ज्ञानसे शून्य होता है, वह पशु एवं वृक्ष बन जाता है। जैसे सुषुप्तावस्थामें स्वप्नका लय हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर उस तत्त्वज्ञके समाहित अन्तःकरणके भीतर सारे दृश्य-प्रपञ्चका लय हो जाता है। फिर तो केवल अपना परमात्मस्वरूप ही लक्षित होता है। जैसे आकाशमें नीलिमाकी प्रतीति भ्रममात्र ही है, उसी प्रकार कल्याणस्वरूप परमात्मामें पृथ्वी आदि पाञ्चभौतिक जगत्की प्रतीति भ्रमके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जैसे आकाश नील आदि वर्णोंसे रहित निर्मल है, उसी प्रकार शिवस्वरूप परमात्मा भी दृश्य-प्रपञ्चसे रहित एवं निर्मल है। जिस पुरुषकी बुद्धिमें यह निश्चय हो गया है कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च असत् (मिथ्या) ही है, वह समस्त विशुद्ध वासनाओं- से युक्त होनेपर भी उन वासनाओंसे रहित ही है। सर्वव्यापी शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें कर्तृत्व और भोक्तृत्वका

५४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होना असम्भव है; इसलिये यहाँ न दुःख है न सुख, न पुण्य है न पाप और न किसीका कुछ नष्ट ही हुआ है । जिस अहंकारमें यह ममताबुद्धि होती है, वह भी दो चन्द्रमा और स्वप्नके नगरकी भाँति असत् (मिथ्या) ही है; इसलिये सब कुछ निराकार एव निराधार है। समस्त द्वैतसे रहित तत्त्वज्ञ पुरुष व्यवहारपरायण हो अथवा काष्ठ या पाषाणके समान निश्चल होकर चुपचाप बैठा रहे, सभी अवस्थाओंमें वह ब्रह्मस्वरूपताको ही प्राप्त है। रघुनन्दन ! जो ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंद्वारा पूर्णरूपसे सेवित है, जिसे दूसरा कोई छीन नहीं सकता तथा जो ज्ञानस्वरूप, निर्मल, शिव, अजन्मा, अविनाशी, नित्य- सिद्ध, सम, परमार्थ सत्य तथा शान्त ब्रह्मपद है, वही तुम हो । तुम उस परमपदमें नित्य प्रतिष्ठित हो ।

अहंभावना ही सबसे बड़ी अविद्या है, जो मोक्षकी प्राप्तिमे रुकावट डालनेवाली होती है । मूढ़ मनुष्य उस अविद्याके द्वारा ही जो मोक्षका अन्वेषण करते हैं, वह उनकी पागलोंकी-सी चेष्टा है। अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाली अहंता ही अज्ञानकी सत्ताका पूर्ण परिचय देनेवाली है; क्योंकि जो तत्त्वज्ञानी शान्त पुरुष है, उसमें ममता या अहन्ता नहीं रहती । अहंताका भलीभाँति त्याग करके आकाशकी भाँति निर्मल तथा मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष सदाके लिये निश्चिन्त हो जाता है; उसका शरीर रहे या न रहे; उसकी उपर्युक्त स्थितिमें कोई अन्तर नहीं आता । जो तत्त्ववेत्ता पुरुष भीतरकी मानसिक तरङ्गोंसे कभी क्षुब्ध नहीं होता, बाहरसे भी अस्तगत सूर्यकी भाँति शान्त रहता है और जिसे सदा प्रसन्नता बनी रहती है, वह मुक्त कहलाता है। इष्ट और अनिष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होनेपर भी वह सदा शान्त बना रहता है—हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता । व्यवहारमें संलग्न रहनेपर भी द्वैतभावका अनुभव नहीं करता तथा भीतरसे पूर्ण परमानन्दमें निमग्न रहता है । जैसे समुद्रमें जलरूप आधारकी सत्ता ही नावों या जहाजोंको क्रय-विक्रयकी वस्तुओका दुःखद भार वहन करनेके लिये अवसर देती है, उसी प्रकार जीव और जगत्की जड सत्ता ही तृष्णाके पाशमें बँधे हुए मनुष्योंको इस जगत्में केवल दुःखका भार वहन करनेके लिये प्रेरित करती है । जो-जो वस्तु संकल्पसे प्राप्त होती है, वह संकल्पसे ही नष्ट भी हो जाती है । इसलिये जहाँ इस संकल्पकी सम्भावना ही नहीं है, वही सत्य एवं अविनाशी पद है । विचार करनेसे जिन पुरुषोंके सम्पूर्ण विशेष (भेदभाव) शान्त हो चुके हैं, उनके लिये केवल अहंताका नाश करनेवाली मुक्तिका उदय होता है । उनका कुछ बिगड़ता नहीं । अज्ञानी पुरुषो ! मोक्षकी प्राप्तिके लिये भोगोंके त्याग, विवेक-विचार तथा मन और इन्द्रियोंके निग्रहरूप पुरुषार्थ—इन तीनके सिवा चौथी किसी वस्तुका उपयोग नहीं है । अतः अनात्मवस्तुका त्याग करके तुमलोग शीघ्र अपने आत्माकी ही शरणमें आ जाओ ।

(सर्ग २९-३०)

निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका सयुक्तिक वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! ब्रह्मके अतिरिक्त न नाश है न अस्तित्व, न अनर्थ है न जन्म- मृत्यु, न आकाश है न शून्यता और न नानात्व ही है । अर्थात् सब कुछ ब्रह्म ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं । जैसे मिथ्या अवभासित होनेवाले संकल्पनगरका नाश किसी प्रकार सम्भव नहीं—क्योंकि वह तो मिथ्या है ही, फिर उसका विनाश कैसा, उसी तरह जगत् और अहंकार आदि भी असत् हैं, अतः उनके लिये 'नाश' शब्दका प्रयोग नहीं होता; क्योंकि असत् वस्तु स्वयं ही विद्यमान नहीं रहती । स्वप्नपुरुषकी भाँति जिन

निर्वाण-प्रकरण उ०] * निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका वर्णन * ५२३

अज्ञानियोंकी दृष्टिमें यह संसार विद्यमान है, वे पुरुष तथा वह सृष्टि—सब-के-सब मृगतृष्णाकी जलतरङ्गके समान मिथ्या ही हैं। यही कारण है कि जो लोग असत्पदार्थोंको ही सत्-सा मानते हैं, उनकी उस मान्यताको हमलोग वन्ध्यापुत्रकी वाणीकी तरह निर्णयात्मक नहीं समझते। इसीलिये जलसे परिपूर्ण महासागरकी तरह तत्त्वज्ञानियोंकी पूर्णता कोई अपूर्व ही होती है—वे सदा चिदानन्दसे परिपूर्ण रहते हैं; क्योंकि वे द्रष्टा और दृश्यांशके फेरमें नहीं पड़ते। वे व्यवहारयुक्त हों अथवा व्यवहारशून्य—किसी भी अवस्थामें पर्वतकी भाँति निश्चल और वायुशून्य स्थानमें रखे हुए समप्रकाशयुक्त दीपककी तरह एकरस रहते हुए सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं।

श्रीराम ! अज्ञानी पुरुष तो इस जगत्में वासनारूप ही हैं और वह वासना तत्त्वदृष्टिसे विचार करनेपर ठहरती नहीं; परन्तु कोई भी उस वासनाके असली स्वरूपपर विचार नहीं करता, इसी कारण यह संसार उपस्थित हुआ है। वास्तवमें तो जिस पुरुषको इस संसारका भ्रम है, वह असत् ही है और असत् पदार्थ तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर मृगतृष्णाके जलकी भाँति लक्षित होता नहीं; फिर किसीके लिये भी कौन-सा संसार कहाँसे आ गया। 'यह सारा दृश्य जगत् सद्ब्रह्म ही है' ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जानेपर कल्याणमय ब्रह्मरूपका उदय होता है। जिसे परम पदमें विश्राम प्राप्त हो चुका है, ऐसे समदर्शी—तत्त्वज्ञानीके आचरणमें शान्तरूपता अथवा राग-द्वेषशून्य व्यवहार दोनों परिलक्षित होते हैं। अथवा जो निर्वाणरूप सप्तम भूमिकामें पहुँच चुका है, उस ज्ञानीकी शान्तरूपता ही अवशेष रह जाती है; क्योंकि वह तो वासनारहित मुनि हो जाता है, फिर वह व्यवहार कैसे कर सकता है। परन्तु जबतक उस ज्ञानीका निर्वाण (सप्तम भूमिकाकी प्राप्ति) सुदृढ़ नहीं हो जाता, तबतक वह राग-द्वेष और भय आदिसे रहित हो व्यवहार करता है। तथा सप्तम भूमिकामें सुदृढ़ रूपसे स्थित हुए ज्ञानीका मन शान्त हो जाता है। उसके राग-द्वेष, भय, क्रोध आदि विकार सर्वथा नष्ट हो जाते हैं तथा वह मुनि होकर शिष्य न होते हुए भी शिलाकी तरह सदा निश्चलरूपसे स्थित रहता है।

राघव ! आत्मा ही बाह्यताकी भावना करनेसे बाह्य और आत्मत्वकी भावना करनेसे आत्मरूप होता है, इसलिये परब्रह्म-तत्त्वमें तत्-तत् भावना ही उसके बाह्य और अन्तर होनेमें कारण है। अन्तःकरणमें जो जाग्रत्-स्वप्नादिकी विभ्रान्ति है, वही बाह्यता कही जाती है। वस्तुतः तो जैसे दूधको दो पात्रोंमें रख देनेसे उस दूधमें कोई भेद नहीं होता, उसी तरह स्वप्न और जाग्रत्में थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है। उनमें जो जाग्रत्में स्थिरता और स्वप्नमें अस्थिरताकी प्रतीति होती है, वह तो केवल भ्रान्तिमात्र है। उसी तरह जाग्रत्में आधारता और स्वप्नमें आधेयता-की प्रतीति भी जल और उसकी तरङ्गकी भाँति भेदशून्य ही है। जैसे आत्म के अन्यत्वज्ञानसे स्वप्नकालके पदार्थोंमें भी अन्यताकी प्रतीति होती है और आत्मैक्यका ज्ञान हो जानेपर उस आत्मासे भिन्न कुछ नहीं दीखता, उसी तरह जाग्रत्-कालमें जबतक शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं हो जाता, तभीतक पदार्थोंमें अन्यरूपता प्रतीत होती है। आत्मतत्त्वका बोध हो जानेपर तो सभी एकरूप-से ही दीखते हैं। परमात्माका जो कल्पनाओंसे रहित तथा शान्त रूप है, उसकी जिस जिस रूपमें भावना की जाती है, वह उसी रूपमें परिणत हो जाता है। स्वप्नादिके ज्ञानके भलीभाँति शान्त हो जानेपर परमात्माका जो शुद्ध रूप अवशिष्ट रहता है, उसे 'यह है' न तो ऐसा ही कह सकते हैं और न 'यह नहीं है' ऐसा ही कह सकते हैं; अतः वह वाणीका विषय नहीं है।

सं० यो० व० अं० १९—

५५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वत्स राम ! चित्तिका जो बाह्य पदार्थोंकी ओर प्रसरण है, वह तो (अज्ञानयुक्त) अनुभवसे ही सिद्ध है। जब विद्यासे उस अनुभवका बाध हो जाता है, तब पुरुषको असत् पदार्थका अनुभव नहीं होता। उस समय उसके अनुभवमें यह बात आती है कि जैसे बालक असत्य प्रेतका अनुभव करता है, वैसे ही मैं भी व्यर्थ ही अबतक असत् पदार्थका अनुभव करता रहा। जब अपने अंदर 'यह मैं हूँ' ऐसा अनुभव होने लगता है, तब वह अहंभाव भी दुःख ( बन्धन ) का ही कारण होता है और जब अहंकारका अनुभव नहीं होता, तब वह मुक्तिका कारण बन जाता है; अतः बन्धन और मुक्ति तो अपने ही अधीन हैं। श्रीराम ! जिस पुरुषकी वासना सुदृढ हो गयी है, वह जैसे संकल्पद्वारा रचित रूपालोक और मानसिक व्याधियोंका अनुभव करता है, उसी तरह असत् दुःखका भी खमद्रष्टाकी तरह आश्रय ग्रहण करता है; परंतु जिसकी वासनाएँ क्षीण हो गयी हैं, उसे जैसे संकल्प-शून्य रूपालोक और मानसिक व्याधियोंका अनुभव नहीं होता, वैसे ही वह प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए दुःखका भी सोये हुए पुरुषकी भाँति उपभोग नहीं करता। इसलिये जैसे देश, काल और क्रियाके सम्पर्कसे पदार्थोंमें उत्पन्न हुई भावना पदार्थरूपताको प्राप्त होती है, वैसे ही वासना ही अत्यन्त सूक्ष्म होकर मुक्तिमें कारण होती है। जैसे आकाशमें उत्पन्न होनेवाले मेघ और कुहरा आदि अत्यन्त सूक्ष्म हो जानेसे उसी आकाशके रूपमें परिणत हो जाते हैं, वैसे ही वासना अत्यन्त सूक्ष्म होकर मुक्तिके स्वरूपमें परिणत हो जाती है।

आत्मामें जो यह जगत् आदि भासित होता है, वह 'मैं कौन हूँ?' और 'यह कैसे उत्पन्न हुआ?' इस प्रकारके विचारसे ही शान्त हो जाता है। 'जब अहंताकी सत्ताका अभाव ही मोक्ष है, तब इतनेको ही लेकर मूढ़ताका आश्रय क्यों ग्रहण किया जाय ?' ऐसा ज्ञान सत्सङ्ग और विचारसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। जैसे प्रकाशसे अन्धकारका और दिनसे रात्रिका विनाश हो जाता है, वैसे ही तत्त्वज्ञानीके सङ्गसे अहंता-रूपी बन्धन नष्ट हो जाता है।

रघुनन्दन ! जैसे आकाशमें चाहे जितने घने बादल छा जायें और महासागरमें तरङ्ग उठने लगें, किंतु उनसे आकाश तथा महासागरमें किसी प्रकारकी हानि अथवा वृद्धि नहीं होती, उसी प्रकार सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित ज्ञानीको इष्ट-अनिष्टकी प्राप्तिमें कुछ भी लाभ-हानिका अनुभव नहीं होता। समस्त विकारोंसे शून्य एवं परिपूर्ण-स्वरूप शान्त ब्रह्मका विचार कर लेनेपर—परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह सारा जगत्-प्रपञ्च मृगतृष्णाके जलकी भाँति असत् सिद्ध हो जाता है। उस समय अहंताका भी विनाश हो जाता है; तब भला, उस ज्ञानीको संसारके मनन आदिका भ्रम कहाँ, कैसे और किस कारणसे हो सकता है। ( सर्ग ३१-३२ )


जीवकी बहिर्मुखताके निवारणसे भ्रान्तिकल्पनाके निवर्तक उपाय तथा परलोककी चिकित्साका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! यदि सत्पुरुषोंके समागससे विकासको प्राप्त हुई अपनी बुद्धिरूप पुरुषार्थके द्वारा पुरुषको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई तो फिर उसके अतिरिक्त उसकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। एकमात्र अहंताको छोड़कर दूसरी कोई अविद्या है ही नहीं। उसकी भावना न करनेसे जब उस अहंताका शमन हो जाता है, तब दूसरा कोई मोक्ष पाना शेष नहीं रह जाता अर्थात् अहंताका नाश ही मोक्ष है। पत्थरके सदृश निश्चल वृत्तिवाले जिस पुरुषके लिये यह साग जगत् असत् होता हुआ भी सत्‌की तरह शान्त हो गया

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * भ्रान्तिसल्पनाके निवर्तक उपाय तथा परलोकरूपी चिकित्सा * ५४२


है, उस महात्माको नमस्कार है । जिसका चित्त परब्रह्ममें पूर्णतया लीन हो गया है, उसे पत्थरके सदृश बाहरका ज्ञान नहीं होता और भीतर चितिरूपताकी भावनासे उसकी संकल्प-शून्य-सी अवस्था हो जाती है, जिससे उसके लिये यह सारा दृश्य-प्रपञ्च शान्त हो जाता है ।

श्रीराम ! प्राणियोंके लिये दो व्याधियाँ बड़ी भयंकर हैं—एक तो यह लोक और दूसरा परलोक । क्योंकि इन्हीं दोनोंसे पीड़ित होकर सभी प्राणी भीषण दुःख भोगते हैं । इनमें जो अज्ञानी जीव हैं, वे इस लोकमें व्याधिग्रस्त होनेपर उसके निवारणके लिये भोग-रूपी कुत्सित औषधोंद्वारा जीवनपर्यन्त यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं; परंतु परलोकरूपी व्याधिके लिये वे कुछ भी चिकित्सा नहीं करते । तथा जो उत्तम पुरुष हैं, वे परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्साके लिये अमृत-तुल्य शम, सत्सङ्ग और आत्मविचाररूप उपायोंद्वारा प्रयत्न करते हैं । जो लोग परलोकरूपी व्याधिकी चिकित्साके लिये सदा सावधान रहते हैं, वे मोक्षमार्गकी उत्कट इच्छा उत्पन्न होनेपर अपनी शम-शक्तिद्वारा विजयी होते हैं । जो पुरुष इस लोकमें ही नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह रोगग्रस्त होकर औषधरहित स्थान (नरक) में जाकर फिर क्या करेगा । इसलिये अज्ञानियो ! तुमलोग इहलोककी चिकित्सा में ही अपने जीवनको मत गँवा दो । इसीके साथ-साथ आत्मज्ञानरूपी औषधोंद्वारा परलोककी भी चिकित्सा कर लो । अरे ! यह आयु तो वायुके वेगसे हिलते हुए पत्तेके ऊपर पड़े हुए छोटे-से जल-कणके समान क्षणभङ्गुर है, अतः पूर्ण प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही परलोकरूपी महाव्याधिकी चिकित्सा में जुट जाओ; क्योंकि शीघ्र ही यत्नपूर्वक परलोकरूपी महा-व्याधिकी चिकित्सा कर लेनेपर इस लोककी व्याधि तत्काल ही अपने-आप नष्ट हो जाती है ।

राघव ! जितने जन्तु हैं, वे सभी संवित्मात्र (आत्माके ही स्वरूप) हैं और उस संवित्के संकल्पका जो विस्तार है, वही जगत् है। ऐसा यह सारा जगत् एक छोटे-से परमाणुके भीतर सैकड़ों पर्वतोंके विस्तारसहित विद्यमान है । आत्मचितिका जो प्रसरण है, वह बाह्य तथा आन्तर विषय है । उन विषयोंका विस्तार चेतन-आकाशमें ही अनुभव होता है, इसलिये जगत्‌का भ्रम कभी सत्य नहीं हो सकता । यदि मनुष्य अपने पुरुषार्थके चमत्कार-से भोगरूपी कीचड़के समुद्रमें फँसे हुए अपने आत्माका उद्धार नहीं कर लेता तो फिर उसके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है । जो मनुष्य अपने आत्माको काबूमें नहीं कर सका है, अतएव विषयभोगरूपी दलदलमें फँसा है, वही मूढ़ सम्पूर्ण आपत्तियोंका पात्र है। जैसे बाल्यावस्था जीवनकी प्रथम सीढ़ी मानी जाती है, वैसे ही भोगोंका सर्वथा त्याग, जो रागोंसे शान्ति प्रदान करनेवाला है, मोक्षका प्रथम सोपान है; परंतु जो अज्ञानी हैं, उनकी जीवन-रूपी नदियाँ करुण-क्रन्दनोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त भयावनी होती हैं । उनमें रागवृत्तियोंसे उत्पन्न अनेक प्रकारके विक्षोभरूपी कल्लोल साथ-साथ बहनेवाली भँवरियाँ हैं । जैसे अज्ञानसे दो चन्द्रमा, बाल-वेताल, मृगतृष्णाका जल और स्वप्न-संसार—ये सभी प्रकट होते हैं, वैसे ही अज्ञानियोंके लिये जीवकी बहिर्मुखताके कारण अनेक प्रकारके सर्ग उत्पन्न होते रहते हैं। संवित्की बहिर्मुखताके भ्रमसे आकाश-मण्डलमें (गन्धर्व-नगर आदि) बहुत-से जगत् सत्‌-से अनुभूत होने लगते हैं; परंतु विचार करनेपर वे सत्य नहीं ठहरते । संवित्का निर्वाण—बहिर्मुखताका न होना जगत्‌का क्षय है और संवित्का उन्मीलन जगत् है । वास्तवमें तो न कुछ अंदर है न बाहर, जो कुछ है वह सर्वानन्द ब्रह्म ही है ।

५४६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ

चिद्रूप, अजन्मा, अव्यक्त, एक, अविनाशी, ईश्वर, खत्व और भावत्वसे रहित ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है। वह आकाशसे भी अत्यन्त शान्त है। जैसे आत्मामें स्वप्नका अनुभव भ्रान्ति है, वैसे ही ब्रह्मरूपी समुद्रमें अविद्या-जनित संसाररूपी तरङ्गें भी भ्रान्तिरूप ही हैं। वास्तवमें तो परमात्मामें न स्वप्न है न सृष्टि ही है। ब्रह्म एक ही है, उसमें न तो कोई आभास है, न चित्स्वरूप कोई दूसरा धर्म है और न जड़ता है। वह न सत् है, न असत् है; बल्कि वह सत्-असत्‌से विलक्षण सम, अविनाशी और द्वैतभावसे रहित है। पूर्वोक्त स्थितिके अनुसार आचरण करनेवाले जिस सत्पुरुषको यथार्थ आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसे मुनियोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे संकल्प-जनित नगरकी सृष्टि पुनः उसका संकल्प न करनेसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही विषयानुभवसे उत्पन्न अहंकाररूप जगत् पुनः अनुभव न करनेसे चिद्ब्रह्ममें लीन हो जाता है। वास्तवमें तो यहाँ किसी भी पदार्थका कोई स्वभाव है ही नहीं। ये जितनी अनुभूतियाँ हैं, ये सभी महाचितिरूप जलकी द्रवरूपता हैं। वे ही अनुभूतियाँ महाचेतनरूपी वायुके स्पन्दन हैं तथा इन्हींको ब्रह्मरूपी आकाशकी शून्यता भी जानना चाहिये। जैसे वायु और उसका स्पन्दन—दोनों अभिन्न हैं, वैसे ही ब्रह्म और उसकी सृष्टिमें भी कोई भेद नहीं है। परंतु अपने स्वरूपकी भ्रान्ति हो जानेपर उनमें विभिन्नता प्रतीत होती है, यद्यपि वह स्वप्नमें देखी गयी अपनी मृत्युके समान असत्य है। जबतक ब्रह्मविचार स्पष्ट नहीं हो जाता, तभीतक यह भ्रान्ति रहती है; परंतु विचार स्पष्ट होते ही वह भ्रान्ति ब्रह्मरूपताको प्राप्त हो जाती है।

(सर्ग ३३)


जगत्‌के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! तुम ऐसा समझो कि सुखके प्राप्त होनेपर दुःखका और दुःखके प्राप्त होनेपर सुखका नाश हो जाता है; अतः ये दोनों ही नाशवान् हैं और जिसका नाश नहीं होता, वह अविनाशी आत्मा है। बस, अब इस विषयमें विशेष शास्त्रोपदेश करना व्यर्थ है। जिसके मनमें इच्छाओंकी परम्परा बनी हुई है, उसे सुख-दुःखादि अवश्य ही प्राप्त होते रहते हैं। इसलिये यदि उन सुखादि रोगोंकी भलीभाँति चिकित्सा करना अभिप्रेत है तो पहले इच्छाका ही परित्याग करना चाहिये। परमपदरूप परमात्मामें अहंकार और इस जगत्‌की भ्रान्ति है ही नहीं। वह तो शान्त, निरालम्ब, सर्वात्मक, अविनाशी मोक्षरूप है। वास्तवमें तो न अहं है, न जगत् है; क्योंकि जो शान्त और अद्वितीय है, वह तो सर्वात्मकरूप है। ऐसी दशामें उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व कैसे और कहाँसे सम्भव हो सकते हैं। ज्ञान भी आत्मस्वरूप ही है, अतः जो कुछ दीखता है, वह सब तद्रूप ही है। इसलिये अहंकारसहित सारा जगत् परमात्मासे अभिन्न है। एक आत्मा ही जब अज्ञानके कारण अनेकरूपताको प्राप्त हुआ-सा दीखता है, तब वही संसार कहलाता है और वह संसार स्वयं असत् है, इसी कारण तत्त्वदृष्टिसे विचार करनेपर उसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती। जैसे प्रवहणशील होनेके कारण सागर तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह चिद्रूप होनेके कारण यह ब्रह्म ही अपनी सत्तासे निर्मल जगत्‌के रूपमें विकसित हुआ-सा जान पड़ता है। जैसे मेघाच्छादित आकाशमें वृक्ष, हाथी, घोड़े और मृग आदिका आकार परिलक्षित होता है, वैसे ही अवयव एवं आकाररहित परब्रह्ममें सृष्टि और अहंकारका रूप दीख पड़ता है। यह सारा जगत् परब्रह्ममें उसका अवयव-सा प्रतीत होता है। रामभद्र ! उसकी उपमा यों समझो—जैसे वटवृक्ष और

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जगत्‌के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन * ५९३

उसके बीजमें कार्य-कारणभाव है, वैसी ही कार्य-कारणता जगत् और ब्रह्ममें है। वस्तुतः तो न तुमलोग हो, न हमलोग हैं, न ये जगत् हैं और न आकाश आदि ही हैं; बल्कि सर्वोपद्रवशून्य अपरोक्ष ब्रह्म ही सर्वत्र अशेषरूपसे वर्तमान है।

रघुकुलतिलक ! जैसे वायु और स्पन्दनमें भेद-प्रतीति होती है, वैसे ही अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्मामें भी अज्ञानसे भेद प्रतीत होता है; अतः इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि चित् और अचित्‌का भेददर्शन ही संसार है तथा अद्वितीय ब्रह्म और जीवात्माकी एकता ही मोक्ष है। इस प्रकार यह सारा जगत् निर्विकार परब्रह्ममय है, अतः इसे भी निर्विकार, आदि- अन्तरहित और निरामय ही समझो। संकल्पजनित नगरके समान द्वैताद्वैत-विकाररूप यह जगत् जीवके अपने ही संकल्पसे उत्पन्न होता है और अपने ही संकल्पसे नष्ट भी हो जाता है। वस्तुतः इस जगत्-रूप ब्रह्ममें कुछ भी उत्पन्न नहीं होता—ठीक वैसे ही, जैसे जलकी तरङ्गका उठना वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं है और उसका नष्ट होना वास्तवमें नाश नहीं है; क्योंकि दोनों अवस्थाओंमें वह एकमात्र जल ही है।

रघुनन्दन ! क्षणमात्रमें ही एक देशसे दूसरे अत्यन्त दूर देशमें प्राप्त हुए संवित् (ज्ञान) का उन दोनों देशोंके मध्यमें जो निर्मल रूप होता है, वही परब्रह्म परमात्माका सर्वोत्कृष्ट रूप है। जीवन्मुक्तोंकी स्थिति तथा आचारके अनुसार व्यवहार करते हुए उस निराभास, सत्य तथा वासना और इच्छासे रहित चित्स्वरूपसे सुमेरु- गिरिकी तरह कभी चलायमान न होना ही विद्या है तथा भलीभाँति विवेक-विचारपूर्वक अन्वेषण करनेपर जिसकी उपलब्धि नहीं होती, वही अविद्या है। अविद्याका अभाव हो जानेपर क्या कहीं चिति और चेत्यका भेद सम्भव हो सकता है ? अर्थात् नहीं। और भेदका अभाव हो जानेपर फिर चिति अपने अंदर कैसे किसीको प्रकट कर सकेगी; इसलिये शान्ति—विषयशून्य चिन्मात्र स्थिति ही स्वतः प्रकट होती है। वास्तवमें तो ब्रह्म और जगत् एक ही हैं, अज्ञानके कारण वे अनेक-से अर्थात् विभिन्न जान पड़ते हैं। अज्ञानसे ही सर्वव्यापी, परिपूर्ण तथा शुद्ध ब्रह्म अपूर्ण एवं अशुद्ध-सा प्रतीत होता है। वही ब्रह्म अज्ञानसे निर्विकार होते हुए विकारयुक्त, शान्त एवं समरूप होते हुए अशान्त एवं विषम, सत् होते हुए अदृश्य होनेके कारण असत्, तद्रूप होते हुए अनद्रूप, विभाग- रहित होते हुए विभागवाला, जडतारहित होते हुए जडतायुक्त, निर्विषय होते हुए विषयी, अवयवशून्य होते हुए सावयव, स्वप्रकाश होते हुए घनान्धकार और पुरातन होते हुए नूतनके समान प्रतीत होता है। वह परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होकर जगत्-समूहोंको अपने उदरमें समेट लेनेवाला है।

वत्स राम ! वह अनन्त और अपार होकर भी किसी एक स्थानपर नियतरूपसे स्थित नहीं रहता तथा आकाश- में भी वनकी कल्पना और पर्वतका निर्माण करनेमें तत्पर रहता है। (अर्थात् असम्भवको भी सम्भव कर सकता है।) वह सूक्ष्म पदार्थोंमें सबसे सूक्ष्म, स्थूलोंमें सबसे स्थूल, गरिष्ठोंमें सबसे अधिक गरिष्ठ और श्रेष्ठोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ है तथा कर्ता, कर्म और कारणसे रहित है। वह जगत्‌का उद्गमस्थान होकर भी नित्य अरण्यकी भाँति शून्य है और असंख्य पर्वतोंकी कठोरतासे युक्त होनेपर भी आकाशके लवांशसे भी कोमल है। वह प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक कालस्वरूप होकर प्रायः सबसे परे, प्राचीन होनेपर भी कोमल और नवीन, प्रकाशस्वरूप होकर भी अन्धकारके सदृश मलिन और प्रलयकालीन तमस्वरूप होकर भी प्रकाशरूपसे सर्वत्र व्याप्त है। वह प्रत्यक्ष होते हुए भी आँखोंकी पहुँचके बाहर, परोक्ष होते हुए भी सम्मुख उपस्थित, चिद्रूप होते हुए भी जड और जड होते हुए भी चिद्रूप है। वह ब्रह्म अनहंभावरूप होकर अहम्भाव ही

५४८* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अहंभावरूप होकर अनहंभाव तथा अन्यरूप होकर आत्मरूप और आत्मरूप होकर अन्यरूप-सा स्थित है। इस चिद्रूपी परिपूर्ण सागरके भीतर ये त्रिभुवनरूपी तरंगें, द्रवता ही जिनका स्वभाव है, स्फुरित-सी हो रही हैं। यह चिद्रूप परमदेव यद्यपि देश-काल आदि अवयवोंसे रहित है, तथापि रात-दिन असद्रूप जगत्‌का वैसे ही विस्तार करता रहता है, जैसे जल तरङ्गसमूहका। इस चिद्रूपी जलकी जो द्रवता है वही जगत् कहलाता है। उस जगत्‌के संवित्द्वारा उपलब्ध खादिष्ट रूप, रस आदि विषय ही अङ्ग हैं और वह भुवनरूपी आवर्तोंसे युक्त है। इस उदीप्त चितिके प्रकाशित रहने-पर सम्पूर्ण प्रकाशशील पदार्थोंकी श्री उसके सामने शान्त हो जाती है और पुनः उसीसे उत्पन्न भी होती है, जैसे सूर्य आदिके तेजसे उनका अपना प्रकाश। यह चिदाकाश रङ्गभूमिके समान है, इसमें नियति (ईश्वरका विधान) रूपी नर्तकी भुवन-रचनारूपी नाटकके विभ्रमोंसे युक्त होकर अनवरत कार्यमें संलग्न हो रात-दिन नाचती रहती है। इस परब्रह्म परमात्माका उन्मेष ही जगत्‌का सौन्दर्य है और निमेष ही प्रलयका सूचक है। वास्तवमें तो वह उन्मेष और निमेषसे रहित होकर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है।

(सर्ग ३४-३५)


जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा 'इच्छा ही बन्धन है और इच्छाका त्याग ही मुक्ति है' इसका सविस्तर वर्णन और उससे छूटनेके उपायका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! जितने अनर्थस्वरूप सांसारिक पदार्थ हैं, वे सभी जलमें आवर्तकी भाँति भिन्न-भिन्न रूप धारण करके चमत्कार पैदा करते हैं अर्थात् इच्छाओंको उत्पन्न करके चित्तको मोहमें डाल देते हैं; परंतु जैसे सभी लहरें जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही सम्पूर्ण पदार्थ वस्तुतः नश्वर स्वभावके ही हैं। जैसे बालककी चिन्तासे कल्पित यक्ष-पिशाच आदिका रूप उसके सामने आकाशमें दीख पड़ता है; परंतु मुझ-जैसे ज्ञानीके लिये वह कुछ भी नहीं है, उसी तरह मेरी दृष्टिमें तत्त्वतः यह विश्व कुछ नहीं है; परंतु अज्ञानीके चित्तमें यही सत्य-सा प्रतीत होता है। यह विश्व पत्थरपर खुदी हुई पुतलियोंकी सेनाकी भाँति रूपावलोक तथा बाह्य और आभ्यन्तर विषयसे शून्य है, फिर इसमें विश्वता कैसी ? परंतु अज्ञानियोंके लिये यह रूपावलोक और मनन आदिसे युक्त प्रतीत होता है। श्रीराम! जगत्‌को जगद्रूपसे जानना भ्रम है और इसे जगद्रूपसे न जानना भ्रमशून्यता है। राघव! त्वत्ता और अहंता आदि सारे विभ्रम-विलास शान्त, शिव तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसीलिये मुझे ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखायी पड़ता—ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें कानन दृष्टिगोचर नहीं होता।

श्रीराम! जिसकी चेष्टा प्रारब्धप्राप्त कर्मोंमें कठपुतलीकी तरह इच्छाशून्य तथा व्याकुलतारहित होती है, वही विश्रान्त मनवाला जीवन्मुक्त मुनि है। जीवन्मुक्त ज्ञानीको इस जगत्‌का जीवन बाँसकी तरह बाहर-भीतरसे शून्य, रसहीन और वासनारहित प्रतीत होता है। जिसकी इस दृश्य-प्रपञ्चमें रुचि नहीं है और हृदयमें जिसे चिन्मात्र अदृश्य ब्रह्म ही अच्छा लगता है, उसने मानो बाहर-भीतरसे शान्ति प्राप्त कर ली और वह इस भवसागरसे पार हो गया।

रघुनन्दन! शास्त्रज्ञोंका कहना है कि मनका इच्छारहित हो जाना ही समाधि है; क्योंकि मनको जैसी शान्ति इच्छाका त्याग कर देनेसे प्राप्त होती है, वैसी सैकड़ों उपदेशोंसे भी उपलब्ध नहीं होती। इच्छाकी उत्पत्तिसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख तो नरकमें भी नहीं मिलता; और इच्छाकी शान्तिसे

३१-ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन

कल्याण


शेषनागपर भगवान् विष्णु, स्वर्गमें इन्द्र और पातालमें प्रह्लाद
(उपशम-प्रकरण, सर्ग ४०)

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा इच्छाके बन्धनसे छूटनेके उपायका निरूपण * ५४९


जैसा सुख मिलता है, वैसे सुखका अनुभव तो ब्रह्मलोकमें भी नहीं होता। इसीलिये समस्त शास्त्रों, तपस्याओं, धर्मों और नियमोंका पर्यवसान इतनेमें ही है कि इच्छा-मात्रको ही दुःखदायक चित्त कहते हैं और उस इच्छा-की शान्ति ही मोक्ष कहलाता है । प्राणीके हृदयमें जैसी-जैसी और जितनी-जितनी इच्छा उत्पन्न होती है, उतनी-उतनी ही उसके दुःखोंके बीजोंकी मूँठ बढ़ती जाती है तथा विवेक-विचारद्वारा जैसे-जैसे उसकी इच्छा क्षीण होती जाती है, वैसे-वैसे ही उसके दुःखोंकी चिन्तारूपी विषूचिका शान्त होती जाती है । सांसारिक विषयोंकी इच्छा आसक्तिवश ज्यों-ज्यों घनीभूत होती जाती है, त्यों-त्यों दुःखोंकी चिन्तारूपी विषैली तरङ्गें बढ़ती जाती हैं । यदि अपने पौरुष-प्रयत्नके बलसे इस इच्छा-रूपी व्याधिकी चिकित्सा न की जा सकी तो मैं यह दृढ़तापूर्वक समझता हूँ कि इस व्याधिसे छूटनेके लिये दूसरी कोई औषध है ही नहीं । यदि एक ही साथ सम्पूर्ण इच्छाओंका पूर्णतया त्याग न किया जा सके तो धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके ही उसका त्याग करना चाहिये । रहना चाहिये इच्छा-त्यागके साधनमें संलग्न ही; क्योंकि सन्मार्गका पथिक दुःखभागी नहीं होता । जो नराधम अपनी इच्छाओंके क्षीण करनेका प्रयत्न नहीं करता, वह मानो दिन-पर-दिन अपने-आपको अन्धकूपमें फेंक रहा है । इच्छा ही दुःखोंको जन्म देनेवाली इस संसृतिरूपी बेलका बीज है । यदि उसे आत्मज्ञानरूपी अग्निसे भलीभाँति जला दिया जाय तो यह पुनः अङ्कुरित नहीं होती ।

रघुकुलभूषण राम ! इच्छामात्र ही संसार है और इच्छाका अवेदन—अभाव ही निर्वाण है । इसलिये निरर्थक नाना प्रकारके उलट-फेरमें न पड़कर केवल ऐसा यत्न करना चाहिये कि इच्छा उत्पन्न ही न हो । जिसे अपनी बुद्धिसे इच्छाका विनाश करना दुस्साध्य प्रतीत होता हो, उसके लिये गुरुका उपदेश और शास्त्र आदि निश्चय ही निरर्थक हैं। जैसे अपनी जन्म-भूमि जंगलमें हरिणीकी मृत्यु निश्चित है, वैसे ही नानाविध दुःखोंका विस्तार करनेवाली इच्छारूपी विषके विकारसे युक्त इस जगत्‌में मनुष्योंकी मृत्यु बिल्कुल निश्चित है । यदि मनुष्य इच्छाद्वारा बालकों-जैसा मूढ़ न बना दिया जाय तो उसे आत्मज्ञानके लिये बहुत थोड़ा ही प्रयत्न करना पड़े । इसलिये सब तरहसे इच्छाको ही शान्त करना चाहिये; क्योंकि उसकी शान्तिसे परम पदकी प्राप्ति होती है । इच्छारहित हो जाना ही निर्वाण है और इच्छायुक्त होना ही बन्धन है; इसलिये यथाशक्ति इच्छाको जीतना चाहिये । भला, इतना करनेमें कौन-सी कठिनाई है ? जन्म, जरा और मृत्युरूप करञ्ज और खैरके वृक्ष-समूहोंका बीज इच्छा ही है, अतः उसे शमरूपी अग्निसे सदा भीतर-ही-भीतर जला डालना चाहिये । जहाँ-जहाँ इच्छाका अभाव है, वहाँ-वहाँ मुक्ति निश्चित ही है; अतः विवेक-वैराग्य आदि उपायोंकी प्राप्तिपर्यन्त अपनी शक्तिके अनुसार उत्पन्न हुई इच्छाका सर्वथा विनाश कर डालना चाहिये । इसी तरह जहाँ-जहाँ इच्छाका सम्बन्ध है, वहाँ-वहाँ पुण्य-पापरूपी दुःखराशियों तथा विस्तृत पीड़ाओंसे युक्त बन्धन-फाँसोंकी उपस्थिति ही समझो । ज्यों-ज्यों पुरुषकी आन्तरिक इच्छा शान्त होती जाती है, त्यों-त्यों उसका मोक्षके लिये कल्याणकारक साधन बढ़ता जाता है । विवेकहीन आत्माकी इच्छाको जो भलीभाँति पूर्ण करना है, वही मानो संसाररूपी विष-वृक्षको सींचना है।

(सर्ग ३६)

५५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं और यदि कहीं उत्पन्न होती-सी दीखे तो वह ब्रह्मस्वरूप होती है—इसका सयुक्तिक वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यदि आत्माके अतिरिक्त यहाँ कोई दूसरी वस्तु विद्यमान हो, तब तो इच्छापूर्वक उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा की जाय; परंतु जब उसके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, तब आत्मासे भिन्न किस पदार्थकी इच्छा कैसे की जाय ? वह चिदात्मा आकाशरूप है और स्वयं आकाश ही आकाशरूप विषय और उसका ज्ञाता है तथा जगत्‌का आभास भी आकाशस्वरूप ही है—ऐसी दशामें यहाँ इच्छाका विषय ही क्या है। जहाँ निर्वाण है, वहाँ दृश्य-प्रपञ्च आदि नहीं रहते और जहाँ दृश्य-प्रपञ्च वर्तमान है, वहाँ निर्वाणका रहना असम्भव है। इस प्रकार छाया और आतपकी भाँति इन दोनोंके परस्पर सहयोगका अनुभव नहीं होता। यदि ये दोनों एक साथ रहते तो परस्पर बाधित होनेके कारण दोनों असत्य हो जाते और असत्यमें निर्वाण रहता नहीं; क्योंकि निर्वाणका अनुभव अजर-अमर और दुःखरहित रूपसे होता है। अधम प्राणियो ! दृश्य-प्रपञ्च तो आत्माको बन्धनमें डालनेवाला है, अतः तुमलोग उसे भस्म क्यों नहीं कर डालते और स्पष्टरूपसे स्फुरित होती हुई परमार्थ-वस्तुका दर्शन क्यों नहीं करते।

जब कार्य-कारणभाव आदि सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासने लगता है तभी इस विस्तृत चिन्मात्रस्वरूप प्रत्यगात्मामें ब्रह्मता सिद्ध होती है। अतः जो लोग इस एकमात्र चिदाकाशस्वरूप सर्वात्मक ब्रह्मके सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ब्रह्मज्ञानके लिये अन्य साधनोंका अन्वेषण करते फिरते हैं, उन मृगरूपी शिष्योंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। जब न दुःख है न सुख है, जगत् भी शान्त और मङ्गलमय है तथा चिन्मात्रतासे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, तब इच्छा कहाँसे उत्पन्न हो सकती है। जैसे मिट्टीके बने हुए योद्धाओंकी सेनामें मिट्टीके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, वैसे ही सदात्मक जगत् और अहंता आदि दृश्य-प्रपञ्चमें ब्रह्मके सिवा और कुछ नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! यदि ऐसी बात है तब तो इच्छाका उदय हो या न हो; क्योंकि वह भी तो ब्रह्मरूप ही ठहरी। ऐसी दशामें उसके विधि-निषेधसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर इच्छा ब्रह्मरूप ही हो जाती है, उससे भिन्न नहीं रहती; अतः तुमने जैसा समझा है वह बिल्कुल सत्य है; किंतु इस विषयमें मेरी यह बात और सुनो। जब-जब आत्मज्ञानका उदय होता है, तब-तब इच्छा शान्त हो जाती है। जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रि विलीन हो जाती है, वैसे ही आत्मज्ञान हो जानेपर इच्छा आदि सभी विकार शान्त हो जाते हैं। ज्यों-ज्यों ज्ञानका उदय होता है, त्यों-त्यों द्वैतकी शान्ति और वासनाका विनाश होता जाता है। ऐसी स्थितिमें भला, इच्छा कैसे उत्पन्न हो सकती है। सम्पूर्ण दृश्य पदार्थोंसे वैराग्य हो जानेके कारण जिसकी किसी विषयमें इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं, उस पुरुषकी अविद्या शान्त हो जाती है और निर्मल मुक्तिका उदय हो जाता है। फिर तो उसका दृश्य-प्रपञ्चविषयक वैराग्य और अनुराग—दोनों नष्ट हो जाते हैं। उस समय उसका एकमात्र ऐसा स्वभाव ही हो जाता है कि उसे द्रष्टा और दृश्यकी शोभा रुचती ही नहीं। ऐसी परिस्थितिमें उस तत्त्वज्ञानीकी इच्छा और अनिच्छा—दोनों ही ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है अथवा तत्त्वज्ञानीमें अवश्य ही इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। यदि किसी मनुष्यको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छाके उत्पन्न न होनेका निरूपण * ७५१


गयी तो उसकी इच्छा शान्त हो जाती है; क्योंकि प्रकाश और अन्धकारकी तरह इच्छा और तत्त्वज्ञान—ये दोनों एक साथ रह ही नहीं सकते । और जिसकी सारी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं, उसको भला, कौन किस प्रयोजनके लिये क्या उपदेश दे सकता है । जो इच्छाओंका अत्यन्त क्षीण हो जाना, समस्त प्राणियोंको आह्लादित करना अथवा आत्मानन्दका अनुभव है, वही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका लक्षण है । तत्त्वज्ञानीको जब किसी भी भोगपदार्थमें स्वादका अनुभव नहीं होता, तब सारा दृश्य-प्रपञ्च उसे फीका लगने लगता है । उस समय उसकी इच्छाका प्रसार रुक जाता है और तभी उसे मुक्ति भी मिल जाती है । तत्त्वज्ञान हो जानेसे जो एकता और अनेकता अर्थात् द्वैताद्वैतके प्रपञ्चसे मुक्त होकर शान्त हो गया है, उसके इच्छा और अनिच्छा आदि सभी भाव शिवात्मक—परमब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं । उसका न इच्छासे न अनिच्छासे, न सद्‌वस्तुसे न असद्‌वस्तुसे, न अपनेसे न परायेसे, न जीवनसे न मरणसे—यों किसीसे भी सरोकार नहीं रह जाता ।

रघुवीर ! जिसे निर्वाणका तत्त्वज्ञान हो गया है, उसके हृदयमें तो इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं । यदि कदाचित् उसमें इच्छा-सी उत्पन्न हो भी जाय तो वह शाश्वत ब्रह्मस्वरूप ही होती है । 'यह जगत् न दुःखस्वरूप है न सुखरूप, बल्कि अज, शिवस्वरूप और शान्त है'—ऐसी भावनासे जिसका अन्तःकरण शिलाकी भाँति सुदृढ़ हो गया है, उसे विद्वान् लोग तत्त्वज्ञ कहते हैं । इस प्रकार पूर्ववर्णित परमात्मतत्त्वका निश्चय करके जो धीरात्मा योगी निरतिशयानन्दस्वरूप परमात्माकी भावनासे विषको अमृतरूपमें परिवर्तित कर देनेकी भाँति दुःखका सुखरूपमें अनुभव करता है, वह प्रबुद्ध कहा जाता है। जगत्‌की सत्ताका अभाव समझमें आ जानेपर जब एकमात्र दृश्यानुभवरहित चिन्मय आकाश ही सर्वत्र व्याप्त दीखता है, तब सबमें समानरूपसे रहनेवाले, सौम्य, शान्त एव आनन्दमय परमात्मामें स्थिति हो जानेपर जीवका अहंताका भ्रम मिट जाता है । यह जो कुछ चराचरात्मक जगत् दिखायी पड़ रहा है, वह सब शान्त चिदाकाशात्मक ब्रह्मरूप ही है । इसके सिवा और जो कुछ दीखता है, वह दूसरेके मनोराज्यके नगरकी तरह असत् है । स्वप्नमें देखे गये नगर और बालकोंद्वारा कल्पित प्रेतकी तरह यह जो कुछ दीख रहा है, उसमें असत्यताके अतिरिक्त और क्या है अर्थात् वह निश्चय ही असत्य है । चूँकि सत्य ब्रह्म ही 'अहम्' 'इदम्' आदि रूपसे असत्य-सा भासित होता है, इसलिये यह भ्रान्ति भ्रान्तिग्रस्त पुरुषके बिना ही स्फुरित होती है; अतएव वह असत्य है।

रामभद्र ! वास्तवमें तो चाहे इच्छा हो या अनिच्छा, सृष्टि हो अथवा प्रलय; इससे यहाँ न तो किसीकी कोई हानि है और न इससे कुछ लाभ ही है । ये जो इच्छा-अनिच्छा, सद्-असत्, भाव-अभाव और सुख-दुःख आदिकी कल्पनाएँ हैं, इनमेंसे किसीका भी तत्त्वज्ञानीके चिदाकाशमें उत्पन्न होना सम्भव नहीं है । विवेकद्वारा प्राप्त हुई शान्तिमें तृप्त हुए जिस विवेकीकी इच्छाएँ दिन-पर-दिन क्षीण होती जाती हैं, उसीको मोक्षका अधिकारी कहा जाता है । किंतु जिस अविवेकीका हृदय इच्छारूपी छुरीसे विद्ध हो गया है, उसमें ऐसी भीषण वेदना होती है, जिसे ये मणि, मन्त्र और महौषध आदि भी मिटानेमें समर्थ नहीं हो सकते । वस्तुतः तो इस परमात्मामें जगत् आदि कुछ भी पदार्थ न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है; बल्कि निद्रागत हृदयकी तरह चेत्य प्रतिभासित होता है । प्रतिभासमात्र होनेके कारण पृथ्वी आदि कारणोंसहित इस देहकी भी सत्ता नहीं है, केवल चिन्मात्र ब्रह्म ही स्थित है ।

रघुकुलतिलक! योगीलोग ज्ञानरूप निर्विकल्प-समाधिके प्रयोगसे आधे क्षणमें ही जगत्‌को आकाशरूपमें और

५५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आकाशको तीनों लोकोंके रूपमें परिवर्तित कर देते हैं। जैसे आकाशमें सिद्धसङ्कल्पद्वारा कल्पित असंख्य नगर गुप्तरूपसे स्थित रहते हैं, वैसे ही अनन्त चिन्मय परब्रह्मके संकल्पमें सहस्रों सृष्टियाँ अन्तर्हित रहती हैं। जैसे महासागरमें उठी हुई विशाल लहरियाँ परस्पर संयुक्त होनेपर भी एक-दूसरेसे पृथक्-सी स्थित जान पड़ती हैं; परंतु वास्तवमें वे जलसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही महान् चेतन-ब्रह्ममें बहुत-सी बड़ी-बड़ी सृष्टियाँ परस्पर मिली हुई होनेपर भी पृथक्-सी स्थित हैं। वास्तवमें तो वे उससे पृथक् नहीं हैं। श्रीराम! सारे भूत-प्राणी अविनाशी परम शिवस्वरूप ब्रह्ममें स्थित हैं और उसीमें ये सारी सृष्टियाँ भी आकाशमें शून्यताके उल्लासकी भाँति स्वच्छन्दरूपसे स्थित हैं। राघव! काल, उसके अन्तर्गत ब्रह्माण्ड-समूह, उसके भीतर चौदह भुवन, उन भुवनोंमें 'अहं' 'त्वं' आदि भोक्ता, भोक्ताओंके भोगोंके साधनभूत इन्द्रियसम्मूह, इन्द्रियोंके विषय शब्द-स्पर्श आदि और अद्भुत भोग—यह सब कुछ एकमात्र शान्त, अज, अव्यय चिदाकाश ही है—यों निश्चय हो जानेपर राग आदि किसी भी विकारका उत्पन्न होना सम्भव नहीं है। (सर्ग ३७)


चेतन ही जगत् है—इसका तथा तत्त्वज्ञानी और जगत्‌के स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! ब्रह्मका स्वरूप सबसे सूक्ष्म है, इसलिये जो-जो वस्तु जिस-जिस रूपसे अत्यन्त अणुस्वरूप है, वह-वह उसी-उसी रूपमें सूक्ष्मभूत ब्रह्मवस्तु है। ऐसी दशामें ब्रह्मवस्तु ही सर्वत्र वर्तमान है। जैसे घटादि पदार्थ अगल-बगल तथा ऊपर-नीचे सर्वत्र मिट्टी ही है, उससे भिन्न नहीं, वैसे ही इस जगत्‌को जिसने जिस रीतिसे परीक्षा करके देखा, उसे वस्तुतः यह ब्रह्मस्वरूप ही दीख पड़ा। जैसे सुवर्णके भूषणादि सैकड़ो रूपोंमें परिवर्तित हो जानेपर भी उन रूपोंमें सुवर्णत्व ही वर्तमान रहता है, वह दूसरा कुछ नहीं हो जाता, वैसे ही शान्त ब्रह्मके अनेकों जगद्भाव तथा जीवभावमें परिणत होनेपर भी वह उनमें अपने शान्तब्रह्मस्वरूपसे ही स्थित रहता है।

राघव! जिस महात्मा पुरुषकी दृष्टिमें सारा विश्व ही निराकार चेतनाकाशरूप ब्रह्ममें प्रतीत होता है, उस मनो-व्यापारशून्य योगीको किसी निमित्तसे किसी पदार्थकी इच्छा कैसे उत्पन्न हो सकती है? जो पूर्णतया शान्त तथा विशेषरूपसे इच्छाओंसे रहित हो गया है, उस सत्ता-असत्ता अर्थात् वैभव एवं दारिद्र्यको समानरूपसे देखनेवाले ज्ञानीकी महिमाका आकलन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है। जो विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, आत्म-प्रकाशसम्पन्न और चिदाकाशरूप हो गये हैं, उनका न कुछ बिगड़ता है और न कुछ बनता है; किंतु जो अज्ञानी है, उसके मृगतृष्णारूपी नदीके तटके समान भ्रान्त आत्मामें जन्म-मरण असत् होते हुए भी भ्रमवश सत्-से प्रतीत होते हैं। जब उनकी सम्यक्रूपसे परीक्षा कर ली जाती है, तब न तो भ्रान्ति रह जाती है, न परीक्षक रहते हैं और न जनन-मरणका ही नाम-निशान रह जाता है। उस समय केवल अविनाशी शान्त ब्रह्म ही रह जाता है। जो मैं हूँ, जो तुम हो, जो इच्छाएँ एवं दिशाएँ हैं, जो क्रिया, काल और आकाशादि हैं, तथा जो लोकालोक आदि पर्वत हैं, उन सबमें शिव-स्वरूप चिदाकाश ब्रह्म ही व्याप्त है। इसी तरह जो बाह्य और आन्तर विषय हैं, जो भूत आदि तीनों काल हैं, जो जगत् है तथा जो जरा, मरण और पीड़ा आदि हैं, वे सभी महाचिदाकाशस्वरूप ब्रह्म ही हैं। जो वासनारहित हो गया है, जिसे वर्तमान भोग नीरस मालूम देते हैं और भावी भोगोंकी जिसे इच्छा नहीं है, ऐसे साधकके लिये सत्-शास्त्रके अतिरिक्त आत्मसुखकी प्राप्तिका हेतु और क्या हो सकता है।

• निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्‌के स्वरूपका ज्ञान और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजा * ५५३

रघुनन्दन ! जिसे संसारको क्षीण कर देनेवाले स्वाभाविक सत्य अर्थका साक्षात्कार हो गया है, वह पुरुष संकल्परहित हो जाता है; क्योंकि वह संकल्पको आत्मासे पृथक् जानता ही नहीं, इसलिये यह संकल्पाभास असत् है। जिसके आवरण क्षीण हो गये हैं और जिसकी सारी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं, वह परमानन्दरूपी अमृतसे परिपूर्ण हो जाता है और निरतिशयानन्द-स्वरूप ब्रह्म-सत्तासे ही सुशोभित होता है। जैसे पूर्णिमाके चन्द्रमासे सारा आकाश-मण्डल उदीत हो जाता है, वैसे ही जिसकी बुद्धि ज्ञानालोकसे प्रकाशित है और जो समस्त संदेहरूपी घोर अन्धकारात्मक कुहासेको छिन्न-भिन्न कर देनेके लिये वायुके समान है, उस पुरुषसे सारा देश उद्भासित हो उठता है। विचारजन्य तत्त्वज्ञानसे देखनेपर जिसका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता, वह सदाके लिये सत्ताहीन है; इसलिये जगत्‌का रूप स्वरूपरहित है और ब्रह्म स्वयं अपने ही रूपमें स्थित है।

श्रीराम ! जैसे स्वप्नद्रष्टा पुरुषको स्वप्न सत्-सा प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानियोंकी दृष्टिमें मेरा शरीर भी सत् ही है; परंतु मेरी दृष्टिमें वह निश्चय ही उसी प्रकार असत् है, जैसे सुषुप्त पुरुषकी दृष्टिमें स्वप्न। उसके साथ जो मेरा व्यवहार होता है, वह व्यवहारमात्रके लिये ब्रह्म-स्वरूप ही है; परंतु वे जो कुछ देखते हैं, भले ही देखा करें, उनसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं उनके वसिष्ठरूपमें तो कुछ नहीं हूँ, किंतु स्व-स्वरूपमें दृढतासे स्थित हूँ। यह व्यापक ब्रह्मसत्ता मानो तुम्हारे ही लिये वसिष्ठरूपसे प्रकट हुई है और मेरी यह वाणी भी ब्रह्म-सत्तारूप ही है। जिसे प्रतिकूल दुःख आदि भी अनुकूल प्रतीत होते हैं, उस शुद्ध ब्रह्मस्वरूप तत्त्वज्ञानीके हृदयमें न तो भोगोंकी इच्छा ही जाग्रत् होती है और न मोक्षकी ही। मनुष्योंका जो यह बन्धन और मोक्षका भ्रम है, यह तो स्वभावके ही अधीन है। यह संसार-पीड़ा तो मोहके कारण ही उत्पन्न हुई है। कैसा आश्चर्य है जो गौके खुरमें सागरका भ्रम हो रहा है। जब-जब ज्ञान-रूप सूर्य अपने पूर्ण प्रकाशसे स्थित होता है, तब-तब भोगरूपी अन्धकारका नाश हो जाता है और उनका अस्तित्व रहते हुए भी वह अनुभवमें नहीं आता। यों भोगान्धकारके नष्ट हो जानेपर बुद्धि आदि दृग्गोचर समूह अज्ञानकी सत्तासे रहित हो जाता है और ब्रह्माकार-वृत्तिके प्रकाशसे उद्भासित हो उठता है। इसलिये यह दीपकके प्रकाशकी तरह द्रव्यभूत होकर चारों ओर भासित होने लगता है। (सर्ग ३८-३९)

जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्‌के स्वरूपका ज्ञान, स्वभावका लक्षण तथा विश्व और विश्वेश्वरकी एकता और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजाका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! विषयभोग भवरूपी महान् रोग है, भाई-बन्धु आदि सुदृढ बन्धन हैं और धन-सम्पत्ति महान् अनर्थके कारण हैं—यों समझकर अपने द्वारा आत्मामें ही शान्ति-लाभ करना चाहिये। जैसे सुषुप्ति-अवस्थामें पड़े हुए पुरुषको स्वप्नका भान नहीं होता और स्वप्नद्रष्टाको सुषुप्तिका ज्ञान नहीं होता, वैसे ही ब्रह्मस्वरूपमें स्थित पुरुषको जगत्‌का भान नहीं होता और जगजालमें फँसा हुआ ब्रह्मस्वरूपसे अनभिज्ञ रहता है। परंतु जिसकी बुद्धि पूर्णतया शान्त हो गयी है तथा जो जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी हैं, वह दृश्य और जगत्‌के प्रकाशमान रूपको वैसे ही जानता है, जैसे जागृत और स्वप्नद्रष्टाको क्रमशः उनके रूपकी जानकारी होती है। तत्त्वज्ञानीको इस सम्पूर्ण जगत्‌के यथार्थ स्वरूपका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है, जिससे वह शरत्कालीन मेघके समान शुद्धात्मा होकर मनीषियोंके मान्य हो जाते हैं।

रामभद्र ! जैसे जहाँ सूर्य रहेंगे वहाँ प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, उसी प्रकार जहाँ तत्त्वज्ञानमयी बुद्धि होगी, वहाँ विषयोंसे पूर्ण वैराग्य रहेगा ही। जब सम्पूर्ण चित्त,

५५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


जो कर्ता, कर्म और करण आदि सामग्रियोंसे रहित, द्रष्टा, दृश्य और दर्शनसे शून्य तथा उपादेय पदार्थोंसे हीन है, दीवालरूपी आधारके बिना ही आविर्भूत हुआ है। तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जानेसे जाग्रत्-कालमें जो राग और वासनासे रहित सुषुप्ति-अवस्था प्राप्त होती है, उसे तत्त्वज्ञ पुरुष स्वभाव कहते हैं, और उसमें परिनिष्ठित हो जाना मुक्ति कहलाती है। ऐसी निष्ठा प्राप्त हो जानेपर तत्त्वज्ञानीको कर्ता, कर्म और करणसे हीन, द्रष्टा, दृश्य और दर्शनसे शून्य तथा बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसे रहित ब्रह्म जगद्रूपसे स्थित जान पड़ता है अर्थात् जगत् ब्रह्मस्वरूप ही प्रतीत होता है। उस समय उस ज्ञानीको ऐसा लक्षित होता है कि प्रकाशमान वस्तुमें प्रकाशमान वस्तु प्रकाशित हो रही है, पूर्णमें पूर्ण स्थित है और द्वैताद्वैतरहित प्रत्यगात्मामें द्वैताद्वैतशून्य ब्रह्म ही अखण्ड एकरस्रूपसे स्थित है। वस्तुतः तो ब्रह्मके सृष्टिरूपमें स्थित होनेपर भी आकाशमण्डलके सदृश शान्त एवं सत्यस्वरूप स्वयं परमात्मा ही अपने सत्यस्वरूपमें शिला-जठरकी भाँति अक्षुब्ध हुआ स्थित है। जैसे भविष्यमें जिस नवीन नगरका निर्माण करना होता है, उसका नक्शा पहलेसे ही चित्तमें वर्तमान रहता है, उसी तरह यह पूर्ण प्रकाशस्वरूप जगत् ब्रह्ममें ही स्थित है। जैसे गन्धर्वनगर एवं तल-मलिनता आदि दोषोंका बाध हो जानेपर आकाश अकस्मात् ही अपने शून्यस्वभावसे दीखने लगता है, उसी तरह तत्त्वज्ञान हो जानेपर जब सृष्टि उत्पत्ति-विनाशसे रहित मिथ्या सिद्ध हो जाती है, तब हठात् आनन्दघन ब्रह्म ही विशेषरूपसे भासित होने लगता है।

रघुकुलभूषण राम ! जैसे किसी सहायककी अपेक्षा किये बिना ही वायुमें स्पन्दन होता है और जैसे सूर्य आदिकी प्रभाका प्रसार होता है, वैसे ही यह जगत् परब्रह्म परमात्मामें स्थित है और उसीसे प्रादुर्भूत होता है। जैसे जलमें द्रवत्व, आकाशमें शून्यता और वायुमें स्पन्दन ओतप्रोत है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मामें अनिर्वचनीय विवर्तरूप यह जगत् है। महाचिद्रूप महाकाशमें जो यह जगत् भासित होता है, वह चिद्रूप ही है, जो मणिमें उसकी निर्मलताकी तरह स्फुरित होता है। जैसे वायु और उसके स्पन्दनका भेद कथनमात्र है, वास्तविक नहीं, वैसे ही विश्व और विश्वेश्वरका भेद भी असत्-रूप ही है। जो तीनों कालोंमें सत् है और जिसमें द्वैतकी सम्भावना नहीं है, वह महाचिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म ही विश्व-रूपमें भासता है। वास्तवमें तो न विश्व ही सत् है और न विश्वका स्वरूप ही। जो रूप ब्रह्मका है, वही रूप जगत्‌का है तथा जो रूप आकाशका है, वही रूप उसके गुण सारी शून्यताका है; फिर इनमें द्वैत-अद्वैतका होना असम्भव है। पत्थरपर खुदी हुई सेनामें पाषाणत्वकी तरह एकात्मा, सर्वव्यापक, निर्मल, चिन्मात्र, सर्वरूप परब्रह्म परमात्माके स्थित रहते कार्य-कारणकी विचित्रता कहाँसे और कैसे सम्भव हो सकती है तथा द्वैतके सम्भव न होनेके कारण आकाशमें आकाशशून्यता कैसे हो सकेगी।

वत्स राम ! ज्ञान-प्राप्तिके लिये पूर्ण विवेकरूपी उपचारसे यथाप्राप्त पूजन-सामग्रीद्वारा बुद्धिपूर्वक स्वभाव-रूप परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि विचार, शम, सत्सङ्ग और त्यागरूपी पुष्पोंद्वारा पूजित हुआ परमेश्वर तुरत मोक्षरूपी फल प्रदान करता है। सज्जन-शिरोमणे ! वह परमेश्वर तो अपना आत्मा ही है। एक-मात्र यथार्थ अनुभवरूपी पूजन-सामग्रीसे पूजित होनेपर, जो सर्वोत्तम मोक्ष-फल प्रदान करनेवाला है, वह आत्मा-रूपी ईश्वर जहाँ वर्तमान है, वहाँ उसे छोड़कर भला, कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो किसी दूसरेका आश्रय ग्रहण करेगा। मनुष्यको अपने अन्दर शमरूपी अमृतके सिंचन-से विवेकको धीरे-धीरे ऐसा बढ़ाना चाहिये, जिससे वह विषयोंकी भ्रान्तिसे पुनः नष्ट न हो जाय। उसे चाहिये कि वह देहकी सत्ताकी अवहेलना करके उसमें स्थित तात्त्विक वस्तुका साक्षात्कार करे और लज्जा, भय,

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जगत्‌की असारताका और तत्त्वज्ञानसे उसके नाशका वर्णन *

विषाद, ईर्ष्या, सुख और दुःखपर समानरूपसे विजय प्राप्त करे।

राघव ! जैसे संकल्पकी शान्ति हो जानेपर संकल्प-नगर सदाके लिये शान्त हो जाता है तथा जैसे जाग्रत् पुरुषके लिये स्वप्न नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्म-ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सारा जगत् सदाके लिये अस्त-सा दीख पड़ता है। यदि कोई पुरुष अविद्या-स्वरूप जिस-किसी काल्पनिक उपदेशसे 'मैं कृतार्थ हो गया हूँ' यों अपनेको मानने लगता है तो अज्ञानी होनेके कारण वह वास्तवमें अकृतार्थ ही है। मूर्खतासे विमोहित होनेके कारण ही वह अपनेको कृतार्थ मानने लगा है, परंतु दूसरे ही क्षण जब उसे नाना प्रकारके कष्ट आ घेरते हैं, तब उसे अपनी अकृतार्थताका ज्ञान होता है। विद्वानोंका मत है कि जो काल्पनिक उपशम है, वह क्षणभरमें ही भाव, अभाव और इच्छाके विविध विलाससे दुःखदायी हो जाता है; अतः यह निर्दोष उपाय नहीं है। जगद्भ्रमका पूर्णतया ज्ञान हो जानेपर जो वासनारहित स्थिति प्राप्त होती है, उसीको निर्वाण कहा जाता है। उसके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण विषय स्वतः ही नीरस हो जाते हैं। (सर्ग ४०-४२)


जगत्‌की असारताका निरूपण करके तत्त्वज्ञानसे उसके विनाशका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुवीर ! जो अज्ञानरूपी ज्वरसे मुक्त हो गया है और जिसका आत्मा ज्ञान-प्राप्ति-से शान्त हो गया है, उसका यही लक्षण है कि उसे फिर भोगरूपी जल रुचिकर नहीं लगता। जैसे स्वप्नमें दृष्टिगोचर हुए पदार्थ जाग जानेपर उस स्वप्नद्रष्टाको न तो किसी प्रकारका आनन्द देते हैं और न उसकी दृष्टिमें उनकी सत्ता ही रहती है, उसी तरह 'यह मैं हूँ, यह जगत् है' इत्याकारक भ्रमसे प्रतीत हुए पदार्थ तत्त्वज्ञानीके लिये न तो आनन्ददायक होते हैं और न अपना अस्तित्व ही रखते हैं। जैसे विभ्रमस्वरूप यक्षनगर वास्तवमें मिथ्या हैं, वैसे ही अहंता और जगत् भ्रमरूप ही हैं। वस्तुतः तो वे मिथ्या ही हैं। जैसे आवरणशून्य होनेके कारण विभ्रमरूपी यक्ष जंगलमें प्रतीत होते हैं, वैसे ही ये चौदह भुवन भी प्रतीत होते हैं। सत्ताकी उत्पत्तिसे शून्य यह विस्तृत दृश्य-प्रपञ्च द्रष्टाके संकल्पसे होनेवाला होनेसे द्रष्टाका स्वरूप ही है अथवा कुछ भी नहीं है; क्योंकि परमार्थ चिद्रूप सत् क्या कहीं तुच्छ दृश्यरूपसे स्थापित किया जा सकता है ? अर्थात् कदापि नहीं। जैसे वसन्तऋतुका रसप्रवाह वृक्ष और लताओंके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, वैसे ही अपने स्वरूपमात्रसे परिपूर्ण कर देनेवाली आत्मचेतनता ही सृष्टिके रूपमें परिणत हुई है।

रघूद्वह ! यह जो जगत्‌का आभास है, वह विशुद्ध चिन्मात्रका आभासरूप ही है; फिर इसमें एकत्व और द्वित्वकी कल्पना कैसे हो सकती है। सज्जनो ! तुमलोग चिन्मय आकाशरूप हो जाओ, परम रम्य निरतिशयानन्दका पान करो और निर्वाणानन्दस्वरूप नन्दनवनमें निःशङ्क होकर निवास करो। अरे भ्रान्तबुद्धि मनुष्यो ! तुमलोग संसाररूपी काननकी इन अत्यन्त शून्य मरुस्थलियोंमें मृगमरीचिकाके पीछे भागे हुए हिरणोंकी तरह क्यों भटक रहे हो ? तुमलोगोंकी बुद्धि त्रिलोकीरूपी मृगतृष्णाके जलकी चकाचौंधमें पड़कर अंधी हो गयी है और तुम्हारे हृदयको अज्ञाने अन्धा कर दिया है, अतः तुमलोग व्याघ्र होकर तृष्णाके पीछे मत दौड़ो। बाह्य और आन्तरिक भोगरूपी मृगतृष्णाके जलका पान करनेवाले हिरणरूपी जीवो ! तुमलोग व्यर्थ ही परिश्रम करके अपनी आयु मत गँवाओ, मत गँवाओ। यह जगत् गन्धर्वनगरके समान है। इसमें चित्तका अपहरण करनेवाले महान् अहंकारसे युक्त होकर तुमलोग अपना विनाश मत करो। इन सुखरूप दीखनेवाले भोगोंकी श...

५५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विषयभोगोंको दुःखरूप ही समझो । मनुष्यो ! ये मानव-देह वायुके झोंकेसे चञ्चल हुई पीपलवृक्षकी ऊपरी शाखाके पत्तोंपर स्थित ओसकी बूँदोंके सदृश क्षणभङ्गुर हैं अतः तुमलोग इन अन्धकारपूर्ण गर्भशय्याओंपर शयन मत करो । आदि-अन्तरहित पारमार्थिक ब्रह्ममात्रमें लगातार शान्तभावसे स्थित रहो । द्रष्टा-दृश्य आदि विरुद्ध स्वभावरूपी दोषसे अपना पतन मत कर डालो । यह संसार तो अज्ञानीकी ही दृष्टिमें सत्य है । वास्तवमें तो इसमें कुछ भी सत्य नहीं है । 'यह मैं हूँ और यह मेरा है' इस प्रकारके अभिमानरूपी भ्रान्तिकी सर्वथा शान्ति ही मुक्ति है और वह मुक्ति जिस-किसी भी प्रकारसे स्थित योगीकी अपने स्वरूपकी सत्ता ही है ।

रघुकुलतिलक राम ! जो संसार-मार्गमें चलते-चलते थकावटसे चूर हो गया है, उस पथिकके लिये निर्वाणता, वासनाशून्यता, त्रिविध तापशून्यता और उत्कृष्ट ज्ञान—ये शान्ति प्रदान करनेवाले विश्रामस्थान हैं । यह जगत्रूपी पदार्थ परस्पर अनिर्वचनीय है । इसे तत्त्वज्ञानी जैसा समझता है, वैसा मूर्ख नहीं जानते और जैसा मूर्ख जानता है, वैसा तत्त्वज्ञानी नहीं समझते अर्थात् अज्ञानीके लिये यह दुःखमय है और ज्ञानीके लिये आनन्दमय ब्रह्म है । जीवन्मुक्त ज्ञानीके लिये भ्रान्तिकी शान्ति हो जानेपर जगत्‌का स्वरूप भी नष्ट हो जाता है । उसकी दृष्टिमें तो एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही विद्यमान दीखता है । जैसे खूब जले हुए घास-फूसोंकी भस्मराशि वायुके वेगसे उड़कर न जाने कहाँकी कहाँ चली जाती है, वैसे ही सत्पुरुषोंकी संगतिसे आत्मस्वरूपमें विश्राम प्राप्त हो जानेपर इस जगत्‌का अस्तित्व न जाने कहाँ विलीन हो जाता है । क्योंकि जो समस्त प्राणियोंकी रात्रिके समान है, उस परमानन्दमें संयमी पुरुष जागता रहता है और जिस संसारमें प्राणी जागते रहते हैं, वह तत्त्वद्रष्टा ज्ञानीके लिये रात्रिके समान है । जैसे जन्मान्धको रूपका अनुभव नहीं होता, वैसे ही ज्ञानीको जगत्‌का अनुभव नहीं होता और यदि कदाचित् होता भी है तो वह भ्रम-तुल्य एवं असद्रूप ही होता है । अज्ञानियोंके लिये दुःखरूपसे प्रसिद्ध जो तीनों लोक हैं, वे अज्ञानियोंकी ही दृष्टिमें हैं, तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें उनका अस्तित्व नहीं है; क्योंकि वे सत् नहीं हैं ।

श्रीराम ! जैसे नदियोंका जल जबतक समुद्रमें नहीं मिल जाता तबतक नदी, प्रवाह आदि सैकड़ों नाम-रूपोंमें व्यवहृत होता है, किंतु जब वह समुद्रमें मिलकर एकाकार हो जाता है, तब एकमात्र जल ही कहलाता है, वैसे ही बाह्य और आभ्यन्तररूपमें जो अर्थों एवं अनर्थोंका समुदाय संकल्पसे प्रतीत होता है, वह व्यापक मन ही है; क्योंकि उसीसे अर्थोंकी प्रतीति होती है । जैसे जल और उसकी तरङ्गमें कोई भेद नहीं है, वैसे ही मन और सांसारिक पदार्थोंमें भिन्नता नहीं है ।

संसारके सभी पदार्थ संकल्परूप ही हैं, इसलिये विवेकी पुरुष उनकी कामना नहीं करते । मन भी संकल्प-रूप है, इसी कारण सम्यक् ज्ञान हो जानेसे मन और पदार्थ दोनोंकी शान्ति हो जाती है । जैसे मिट्टीकी मूर्तिमें कोई पुरुष अज्ञानवश शत्रुताकी कल्पना कर लेता है, किंतु ज्यों ही विवेकसे उसे ज्ञात होता है कि यह मिट्टी है त्यों ही उसकी शत्रुता और भय—दोनों उस मूर्तिसे निकल जाते हैं, वैसे ही ज्ञानीके ये अर्थ और मन—दोनों ही स्वतः नष्ट हो जाते हैं । जैसे पास ही सोये हुए पुरुषका स्वप्न और डरपोक बच्चेके सामने दीखनेवाला पिशाच असत् है, उसी तरह प्रारब्धानुसार प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि भोगोंका साधनभूत जगत्, संसारकाल दैवकृत जन्मादि विकार, उसका भोक्ता अज्ञानी और अज्ञानीके शब्दादि विषय—ये सभी असत् हैं । जैसे धीर-वीर पुरुषकी दृष्टिमें पिशाचबुद्धिका अस्तित्व नहीं रहता, वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टिमें अज्ञानीके जगत्‌की सत्ता नहीं रहती । अज्ञानी तो चिरकालतक ज्ञानीको भी अज्ञ ही समझता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें तो वन्ध्या भी पुत्र-पौत्रोंके विस्तारद्वारा बढ़ती है, जो सर्वथा असम्भव है ।

रामभद्र ! यह संसार तो मनसे ही उत्पन्न होता है

निर्वाण-प्रकरण उ० ] ❖ मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिता ❖ [ ९०३


और परमात्मज्ञानसे शान्त हो जाता है, परंतु मनुष्य सीपीमें चाँदीके भ्रमकी भाँति संसारभ्रममें पड़कर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है। संसारके अभाव और परब्रह्म परमात्माके वास्तविक स्वरूपको यथार्थ जान लेना ही ज्ञान है। निर्वाणसे भिन्न 'अहम्' इत्याकारक भ्रमरूप जो सत्ता है, वह तो दुःखका ही कारण होती है। इस अहंकारका स्वरूप मृगतृष्णाके जलके सदृश असत् एवं शून्य है—ऐसा ब्रह्मज्ञान हो जानेपर अहंकार पूर्णतया शान्त हो जाता है। बोधस्वरूप ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान न होनेसे यह अज्ञानी जीवात्मा देश-काल आदि सामग्रीके बिना ही जगद्रूपताको प्राप्त हो जाता है। वस्तुतः तो वह परमात्मा एक ही है। यद्यपि शुद्ध चिदात्मामें अज्ञान आदि किंचिज्ज्ञ होना सम्भव नहीं है, तथापि अज्ञानावस्थामें उस सम्बन्धके बोधनके लिये उसमें उसकी कल्पना कर ली जाती है। अतः तत्त्वज्ञानके द्वारा मूलाज्ञानका उपशम हो जानेपर जब मनुष्योंका अभिमान नष्ट हो जाता है, तब वे सम्यक्-रूपसे परमात्मामें लीन हो जाते हैं। उन्हें नित्यनिजानन्दकी प्राप्ति हो जाती है, जिससे वे शान्त एवं विक्षेपरहित होकर निरन्तर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही समाविष्ट रहते हैं।

(सर्ग ९३)


प्राणियोंके श्रान्त हुए मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिताका वर्णन

**श्रीरामजीने कहा—**मुनिवर ! अब आप समाधिरूपी वृक्षके स्वरूपका, जो विवेकी पुरुषोंके जीवनोपयोगी फलोंसे सुशोभित, लताओंसे परिवेष्टित, पुष्पोंसे सुरभित और मनरूपी मृगको विश्राम देनेवाला है, क्रमशः वर्णन कीजिये।

**श्रीवसिष्ठजी बोले—**रघुनन्दन ! मैं उस समाधिरूपी वृक्षका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो। वह विवेकी पुरुषरूपी वनमें उत्पन्न हुआ है और ऊपरको बढ़ता ही जा रहा है। पत्रों, पुष्पों और फलोंसे लदा हुआ वह वृक्ष ज्ञानी जनोंको सर्वथा जीवन प्रदान करनेवाला है। विद्वानोंका कहना है कि दुःखके कारण अथवा स्वयं ही—जिस-किसी भी प्रकारसे इस संसाररूपी वनसे उत्पन्न हुआ जो परम वैराग्य है, वही उस समाधिरूपी वृक्षका बीज है और चित्त उस बीजके उगनेके लिये उत्तम क्षेत्र है, जो शुभकर्म-समूहरूपी हलसे जोता गया है, रात-दिन शान्ति आदि जलसे सींचा गया है और प्राणायामरूपी जल-प्रवाहसे युक्त है। जब विवेकी जनरूपी काननमें चित्तरूपी भूमि विवेकद्वारा परिष्कृत हो जाती है, तब संसारसे वैराग्यरूप समाधि-वृक्षका बीज स्वयं ही जाकर उस भूमिमें गिरता है। उस समय दृढ़ बुद्धिवाले पुरुषको चाहिये कि अपने चित्तरूपी भूमिमें गिरे हुए उस ध्यान-समाधिवीजको खेदरहित होकर यत्नपूर्वक सींचता रहे तथा कायिक, वाचिक और मानसिक तप एवं दानसे, अमानित्व आदि गुणोंसे और तीर्थाटनाश्रम-निवास्यरूपी शान्तिमयी वृत्तिसे उस बीजकी यत्न-पूर्वक रक्षा करता रहे। इस प्रकार सिंचन आदिके पश्चात् जब उस बीजमें अङ्कुर निकल आये, तब उसकी रक्षाके लिये रखवाली करनेमें अत्यन्त निपुण सन्तोष नामक पुरुषको उसकी प्रियरूपी मुदिताके साथ रक्षरूपमें नियुक्त कर देना चाहिये। पश्चात् उस अङ्कुरका विनाश कर डालनेके लिये टूट पड़नेवाली दुष्ट वासनाओंमें स्थित आशारूपी ढिगों, पुत्र-कलत्रादि-अनुरागरूपी पक्षियों और कामनारूप आदि कौंचोंको उस रक्षकके द्वारा भगा देना चाहिये। फिर उस अङ्कुरके खेतसे अत्यन्त कोमल सत्कर्मरूपी तृणोंको उखाड़कर तथा अचिन्त्य ब्रह्मरूपी अप्रमेय प्रभाव जगानेवाले ज्ञानरूपी सूर्यकी धूपसे तमोगुणरूप अन्धकारको नष्ट कर देना चाहिये। इस अङ्कुरका विनाश न होने देकर