संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
१८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर भी—यह बात तीनों लोकोंमें अधिकारी प्राणियोंके उपदेशके लिये कही जाती है। यह बाह्य और आन्तरिक स्थितिका भेद 'शब्द'तक ही सीमित है, वस्तुमें नहीं है; क्योंकि वस्तु चेतनरूप है, अतः उसमें उक्त भेदका होना कदापि सम्भव नहीं। द्रष्टा परमात्मा दृश्य जगत्का रूप नहीं धारण कर सकता; क्योंकि दृश्यत्व असत् एव वास्तविक हैं। जो कोई भी वस्तु परमात्मामें हैं ही नहीं, परमात्मा उसका स्वरूप कैसे धारण कर सकता है। व्यवहारदृष्टिसे द्रष्टा ही दृश्यभावको प्राप्त होता है। जैसे पिताके बिना पुत्र और भोक्ताके बिना भोग्य नहीं हैं, उसी प्रकार दृश्यके बिना द्रष्टापन नहीं है।
जैसे विशुद्ध सुवर्णमें यह सामर्थ्य है कि उसका कगन आदि बन सके, उसी प्रकार चिन्मय होनेके कारण द्रष्टामें यह शक्ति है कि वह दृश्यका निर्माण कर सके। जैसे सोनेका कड़ा यह सामर्थ्य नहीं रखता कि वह सुवर्णका निर्माण कर सके, उसी प्रकार जड होनेके कारण दृश्यमें यह शक्ति नहीं है कि वह द्रष्टाका निर्माण कर सके। जैसे सुवर्ण कंगनके भ्रमको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार चिन्मय परमात्मा दृश्यका निर्माण करता है। उक्त दृश्य असत् होता हुआ भी अज्ञानवश सत्-सा प्रतीत होता है। दृश्य अज्ञानमात्रसे उत्पन्न है। जबतक कारणभूत अज्ञान रहता है तभीतक उसकी स्थिति रहती है। जैसे कड़े और कगन आदिकी प्रतीतिके समय सुवर्णकी सुवर्णता सत्य होनेपर भी स्फुटरूपसे स्फुरित नहीं होती, क्योंकि मूढ़ पुरुषकी बुद्धि उक्त आभूषणके नाम-रूपमें ही उलझी रहती है, उसी प्रकार द्रष्टाके दृश्यरूपमें स्थित होनेपर उसके वास्तविक स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती। जैसे कगनके रूपमें प्राप्त होनेपर सुवर्ण अपनी पूर्वसिद्ध सुवर्णताको लक्ष्य कराता है, वैसे ही दृश्यरूपमें स्थित हुआ द्रष्टा अपने द्रष्टापनको लक्षित कराता है। द्रष्टा जब अज्ञानवश अपनेको दृश्यरूपमें देखता है, तब अपने वास्तविक स्वरूपको नहीं देख पाता। द्रष्टामें दृश्यत्वकी प्राप्ति होनेपर उसकी सत्ता भी असत्ता-सी हो जाती है अर्थात् वह सद्रूप होनेपर भी असत्-सा भासित होने लगता है। परंतु जब ज्ञानसे दृश्य गलित हो जाता है, तब केवल द्रष्टाकी ही सत्ता रह जाती है। जैसे कड़े और कंगनको गला देनेपर जब उसके नाम-रूपकी प्रतीति नहीं रहती, तब केवल सुवर्णकी सुवर्णता ही रह जाती है।
जैसे जल, भूमि आदि पाँच भूतोंसे भौतिक पदार्थ तनिक भी पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार इस स्वभावसिद्ध परमात्मारूप अणुसे कुछ भी पृथक् नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी अनुभवरूप है तथा सबका अनुभव भी उसीका स्वरूप है; अतः एकत्वके यथार्थ अनुभवकी युक्ति जब सुदृढ़ हो जाती है, तब इस परमात्माकी सबके साथ एकता समझमें आती है। परमात्मा दिशा, काल आदिसे सीमित नहीं है। वह एकमात्र, अद्वितीय है। सबका आत्मा होनेके कारण सबसे अभिन्न है। स्वतः तो वह सर्वानुभवरूप ही है, जड नहीं है।
जैसे कड़े या कंगनकी सत्ता सुवर्णसे पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार द्वैत भी ब्रह्मसे अलग नहीं है—जिसे भलीभाँति ऐसा ज्ञान हो चुका है, उसका वह ज्ञान ही द्वैत है और वह ज्ञान सत् नहीं है। जैसे जलकी द्रवता जलसे, वायुका स्पन्दन वायुसे तथा आकाशकी शून्यता आकाशसे अलग नहीं है, वैसे ही द्वैत परमात्मासे पृथक् नहीं है। द्वैत और अद्वैतकी प्रतीति दुःखस्वरूप प्रवृत्तिकी सिद्धिके लिये ही है, निवृत्तिके लिये नहीं। वास्तवमें जो इन दोनोंकी अनुपलब्धि या अप्रतीति है, वह यदि अच्छी तरह समझमें आ जाय तो ज्ञानी पुरुष उसीको परमपद मानते हैं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय-रूप तथा द्रष्टा, दर्शन और दृश्यरूप जो यह सम्पूर्ण जगत् है, वह अणुसे-भी-अणु चेतन परमात्माके स्वरूपमें ही स्थित है। जैसे वायु अपने शरीरमें ही स्पन्दनको उत्पन्न करती और लीन भी कर लेती है,
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन और भेदकी व्यावहारिकताका प्रतिपादन * १८५
उसी प्रकार अणुसे भी अणु परमात्माने अपने स्वरूपमें इस जगत्रूपी अणुको अनेक बार उत्पन्न और विलीन किया है। जैसे बीजके भीतर फल और पल्लवोंसहित समूचे वृक्षका विस्तार निहित है और वह अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाता है, उसी तरह चेतन परमात्मामें अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे युक्त जगत् स्थित है और वह परमार्थ-दृष्टिसे उन्हींमें देखनेमें आता है (इसलिये जगत् वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न ही है)। जैसे बीजके भीतर अपने शाखा, फल, फूल आदिका त्याग न करता हुआ वृक्ष स्थित है, वैसे ही चेतन परमात्मामें यह शाखा-प्रशाखाओं-सहित विशाल जगत् विद्यमान है। जैसे बीजके भीतर वृक्ष है, उसी प्रकार चेतन परमात्माके भीतर स्थित हुए द्वैतरूप जगत्को जो अद्वैत देखता है, उसीका देखना तत्त्वदर्शन है। वास्तवमें तो न द्वैत है न अद्वैत; न बीज है न अङ्कुर; न स्थूल है न सूक्ष्म; न जात है न अजात; न सत्ता है न असत्ता और न यह सौम्य है न क्षुब्ध। उस चेतन परमात्माके भीतर तीनों लोक, आकाश और वायु आदि भी कुछ नहीं हैं। न जगत् है, न उसका अभाव। केवल एक सर्वोत्कृष्ट उत्तम चेतन परमात्मा ही है।
( सर्ग ८०-८३ )
जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिकता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परमकारणभूत, आदि, अन्त और मध्यसे रहित, एक परमपदसे यद्यपि यह जगत् उत्पन्न नहीं हुआ है, तथापि उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। जैसे जलराशिमें उठती हुई तरङ्गें जलसे भिन्न न होकर भी भिन्न-सी स्थित हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें सारी सृष्टियाँ अभिन्न होकर भी भिन्न-सी जान पड़ती हैं। जो नित्य उदित एवं नित्य प्रतिष्ठित है, वह ब्रह्म ही कर्ता-सा होकर इस जगत्का अनेक रूपोंमें निर्माण करता है। फिर भी वह अपनी समता और सौम्यता आदिका त्याग नहीं करता। जैसे बीजमें वृक्ष एवं फल आदि अभिन्नरूपसे ही स्थित हैं, तथापि वे उससे इस तरह प्रकट होते हैं मानो भिन्न हों, उसी तरह चेतन परमात्मामें यह चेत्य (स्थूलजगत्) अनन्य-भावसे स्थित होनेपर भी अन्य-सा प्रकट हुआ प्रतीत होता है। जैसे बीजसे लेकर फलपर्यन्त जो एक ही द्रव्य-सत्ता है, उसका विच्छेद न होनेके कारण फल और बीजमें कोई भेद नहीं है, जैसे जल और तरङ्गमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार चित् और चेत्य (ब्रह्म और जगत्) में कोई भेद नहीं है। अविचार (विवेक-शून्यता) के कारण जो इनमें भेदकी कल्पना की जाती है, उसकी सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि जिस किसी कारणसे भ्रान्तिवश उत्पन्न हुआ भेद विचारसे नष्ट हो जाता है। सारा जगत् ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है और सब-का-सब ब्रह्ममें ही लीन होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे पहले-पहल आकाश-तत्त्व उत्पन्न हुआ ) इत्यादि श्रुतियोंमें जो 'तस्माद्' आदि पदोंमें पञ्चमी विभक्ति है, वह भेदका प्रतिपादन करनेवाली है अर्थात् जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, वह उससे भिन्न है—इस बातको सूचित करती है। ऐसी दशामें आप यह कैसे समझते हैं कि देवेश्वर परमात्मासे उत्पन्न हुआ यह सारा जगत् उससे अभिन्न है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! उपदेशके लिये जो शास्त्रीय शब्द है अथवा लोकसिद्ध अर्थजनित व्यावहारिक भेदका उपपादक जो लौकिक-शब्द है, वह प्रतियोगी, व्यवच्छेद (अभाव), संख्या, लक्षण और पक्षसे युक्त होता है। जो भेद दिखायी देता है, यह व्यवहारदृष्टिसे
१८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ही है, वास्तविक नहीं। अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कार्य-कारणभाव, सेवक-स्वामिभाव, हेतु-हेतुमद्भाव अवयवावयविभाव, भेदाभेद अथवा अन्वयव्यतिरेक, परिणाम आदिका विश्रम, भावोंके विचित्र विलास, विद्या-अविद्या और सुख-दुःखइत्यादि रूपसे मिथ्या संकल्पोंकी संकलना की गयी है। वास्तवमें जो सत्य वस्तु है, उसमें कोई भेद नहीं है। यह भेदवाद परम तत्त्वको न समझनेके कारण ही है। परमार्थ वस्तुके ज्ञात हो जानेपर द्वैत नहीं रह जाता। उस समय सारी कल्पनाएँ अथवा संकलनाएँ शान्त हो जाती हैं। फिर तो मौनस्वरूप परमार्थ-तत्त्व ही शेष रहता है। वह परमतत्त्व परमात्मा आदि और अन्तसे रहित, अविभक्त, एक, अखण्ड और सर्वरूप है। जिन्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं हुआ है, ऐसे अज्ञ पुरुष अपने विकल्पोंसे उत्पन्न हुए तर्कोंद्वारा अद्वैतके विषयमें विवाद करते हैं। उपदेशसे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जानेपर यह वाद और द्वैत नहीं रह जाता। द्वैतके बिना वाच्य-वाचकका बोध नहीं सिद्ध होता। परंतु द्वैत किसी तरह भी सम्भव नहीं है। इसलिये मौनरूप परमात्मा ही पूर्णतया सिद्ध होता है।
रघुनन्दन ! 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थमें अपनी बुद्धिको प्रतिष्ठित करके वचनभेदकी उपेक्षा कर दो और जो मैं कहता हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो। चित्त ही विकासरूपसे जगत्को प्राप्त हुआ है। जैसे बालूके भीतर तेल नहीं है, उसी तरह ब्रह्ममें शरीर आदिकी सत्ता नहीं है। राग-द्वेष आदि क्लेशोंसे कलुषित यह चित्त ही संसार है। उन राग आदि दोषोंसे जभी छुटकारा मिल जाता है, तभी इस संसार-बन्धनका नाश हो गया, —यह कहा जाता है। चित्त ही साधन, पालन, विचार श्रेष्ठ पुरुषकी भाँति कर्तव्यका अनुष्ठान, आहार-व्यवहार, संचरण और आदरपूर्वक धारण करनेके योग्य है। तीनों लोकोंकी कल्पनाका आकाशरूप चित्त सम्पूर्ण दृश्यको अपने भीतर धारण करता है। सृष्टिके आरम्भमें पृथ्वी-आदिरूप यह सारा प्रपञ्च अविद्यमान—असत् ही था। अव्यक्तरूप अजन्मा ब्रह्म स्वप्नके समान इसे देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। हृदयंगम दृष्टान्त और युक्तिसे तथा मधुर एवं युक्तियुक्त पदार्थवाली वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, वह श्रोताके हृदयमें उसकी शङ्काको दूर करके सब ओर व्याप्त हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे जलमें डाला हुआ तेल उसमें सब ओर फैल जाता है। जिसमें दृष्टान्त और मनोहर पद नहीं होते, जो दुर्बोध होता है, जिससे क्षोभ प्रकट होता है तथा जिसका प्रत्येक अक्षर अपने स्थानसे च्युत होता है और जिसके कई वर्ण मुँहमें ही रह जाते हैं---स्पष्टतः उच्चारित नहीं होते, ऐसा उपदेशवाक्य श्रोताके हृदयतक नहीं पहुँच पाता। वह राखमें आहुतिके रूपमें डाले गये घीके समान व्यर्थ हो जाता है। साधो! इस भूतलपर जो-जो महाभारत आदि आख्यान तथा छोटी-छोटी कथाएँ हैं, जो-जो प्रमाणोंद्वारा जाननेयोग्य प्रमेय ग्रन्थ हैं, जो औचित्यसे युक्त तथा शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टियोंसे मधुर एवं कोमल हैं, वे सभी लोकप्रसिद्ध दृष्टान्तों तथा प्रमाणयुक्त दर्शनोंके प्रतिपादनपूर्वक वर्णित होनेपर उसी प्रकार श्रोताके हृदयमें शीघ्र प्रकाशित हो जाते हैं, जैसे श्वेत किरणवाले चन्द्रमाके प्रकाशसे सारा विश्व प्रकाशित हो उठता है।
(सर्ग ८४)
यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं — निष्पाप रघुनन्दन ! पूर्व-कालमें ब्रह्माजीने मुझे जो उपदेश दिया था, वह सब उनकी कही हुई कथाके साथ मैं तुम्हें बता रहा हूँ। पहलेकी बात है, मैंने कमलयोनि भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'ब्रह्मन् !
३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार
उत्पत्ति-प्रकरण ] * यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादन * १८७
ये सृष्टिके समुदाय ( ब्रह्माण्ड ) कैसे प्रकट होते हैं !' मेरे इस प्रश्नको सुनकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही ।
ब्रह्माजी बोले—वत्स ! यह मन जगत्-भावको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न है, अतः यही इस तरह सब पदार्थोंके रूपमें स्फुरित होता है, जैसे जल ही जलाशयमें फैले हुए विचित्र आवर्तोंके रूपमें स्फुरित ( भासित ) होता है । पहलेके किसी कल्पकी बात है । मैं अपने दिनके आरम्भमें जब सोकर उठा और संसारकी सृष्टिकी इच्छा करने लगा, उस समय कैसी घटना घटित हुई, यह बताता हूँ; सुनो । एक दिन संध्याके समय ( कल्पके अन्तमें ) सारी सृष्टिका संहार करके मैंने एकाग्र एवं स्वस्थचित्त हो अकेले ही वह रात बितायी। रात्रिके अन्तमें मैं जाग उठा और विधिपूर्वक संध्या करके प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये मैंने अपनी फैली हुई आँखें आकाशमें लगायीं—मैं एकटक दृष्टिसे आकाशकी ओर देखने लगा। ज्यों ही दृष्टि डाली, त्यों ही मुझे आकाश अत्यन्त विस्तृत, अन्तरहित और शून्य दिखायी दिया । वह न तो अन्धकारसे व्याप्त था और न तेजसे ही ।
'अब मैं सृष्टिके लिये संकल्प करूँ' ऐसा निश्चय करके मैंने सूक्ष्म चित्तसे विशुद्ध भावके साथ उस स्रष्टव्य ( सृष्टिके योग्य ) वस्तुकी समीक्षा—पर्यालोचना आरम्भ की । इतनेमें ही उस विशाल आकाशके भीतर मैंने मनसे अनेक बड़े-बड़े ब्रह्माण्ड देखे, जो पृथक्-पृथक् विद्यमान थे । उन सबकी स्थिति व्यवस्थित थी । कहीं कोई प्रतिबन्ध नहीं था । उन ब्रह्माण्डोंमें दस पद्मयोनि ब्रह्मा विराजमान थे, जो मेरे ही प्रतिबिम्ब-से प्रतीत होते थे । वे सभी कमलकोशके निवासी थे और राजहंसोंपर चढ़े हुए थे । पृथक्-पृथक् स्थित हुए उन ब्रह्माण्डोंमें जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणी उत्पन्न हो रहे थे । उन सभी ब्रह्माण्डोंमें जल देनेवाले, विशुद्ध ( अनग्रह आदि दोषोंसे रहित ) मेघ-समुदाय छा रहे थे । बड़ी-बड़ी नदियाँ बहती थीं और समुद्रोंके समान गर्जना करती थीं। आकाशमें अनेक सूर्य तपते थे तथा मरुद्गण इधर-उधर संचरण करते थे। स्वर्गमें देवता, भूतलपर मनुष्य तथा पातालोंमें रहकर दानव एवं नाग यथेष्ट क्रीडाएँ करते थे। कालचक्रमें गुँथी हुई तथा सर्दी, गरमी और वर्षाके स्वभाववाली सब ऋतुएँ यथासमय प्रकट हो फल-फूलोंसे सम्पन्न होकर भूमण्डलकी सब ओरसे शोभा बढ़ाती थीं। प्रत्येक दिशामें स्वर्ग और नरकरूपी फल देनेवाले शुभाशुभ आचारका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतियाँ सर्वत्र प्रौढ़ताको प्राप्त थीं—उनका सब ओर प्रचार और प्रसार था। भोग और मोक्षरूपी फल चाहनेवाले विभिन्न जातिके समस्त प्राणी क्रमशः अपनी अभीष्ट वस्तु पानेके लिये यथासमय प्रयत्न करते थे । सात लोक, सात द्वीप, सातों समुद्र और सातों पर्वत, जो कालद्वारा नष्ट होनेवाले हैं, बड़े कोलाहलसे युक्त प्रतीत होते थे। उन ब्रह्माण्डोंमें अन्धकार कहीं ( खुले स्थानोंमें ) क्षीण हो गया था, कहीं ( पर्वतकी गुफा आदिमें ) अधिक स्थिर होकर छा रहा था और कहीं सब झाड़ियों एवं कुञ्जोंमें लेशमात्र तेजसे मिश्रित होकर विद्यमान था। नभरूपी नील कमलके भीतर मेघरूपी भ्रमर मँडरा रहे थे तथा तारक-समूहरूपी केसरोंसे वह परिपूर्ण था । मेरु पर्वतके कुक्षोंमें कल्पान्तकालके मेघोंकी भाँति घनीभूत कुहासा छा रहा था, जो सेमलके फलके भीतर रहनेवाली सफेद रूईके समान दिखायी देता था । लोकालोक पर्वत ही जिसकी करधनी है, गर्जते हुए समुद्र ही जिसके आभूषणोंकी झनकार हैं तथा जो अपने ही रत्नोंसे विभूषित है, वह पृथ्वी उन ब्रह्माण्डोंमें उसी प्रकार विराजमान थी जैसे कोई कुलाङ्गना अपने अन्तःपुरमें निवास करती हो ।
भुवनरूपी गड्ढोंमें रहनेवाले बहुत-से प्राणी जिनमें बीजके समान जान पड़ते थे, वे पृथक्-पृथक् ब्रह्माण्ड-गोलक अरुण तेजसे प्रकाशित हो अनारके फलोंके समान दिखायी देते थे । चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल
१८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ कान्तिवाली, तीन प्रवाहवाली तथा ऊपर-नीचे एवं मध्य —तीन मार्गोंपर विचरनेवाली गङ्गा जगद्रूपी पुरुषके यज्ञो- पवीतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं। दिशारूपी लताओंमें विद्युद्रूपी फूलोंसे युक्त मेघरूपी पल्लव वायुसे टकराकर इधर-उधर झोंके खाते, बिखर जाते और फिर नये पैदा हो जाते थे। विभिन्न भुवनोंके भीतर समूह-के-समूह बसे हुए देवता, असुर, मनुष्य और नाग गूलरके फलोंमें रहनेवाले मच्छरोंके समान जान पड़ते थे। उन लोकोंमें युग, कल्प, क्षण, लव, कला और काष्ठा आदिसे युक्त एवं सबके अतर्कित विनाशकी प्रतीक्षा करनेवाला काल प्रवाहरूपसे स्थित था। अपने शुद्ध एवं उत्तम चित्तके द्वारा ऐसा दृश्य देखकर मैं बड़े विस्मयमें पड़ गया कि यह क्या है और कैसे प्रकट हुआ है। इस स्थूल नेत्रसे जो मुझे कुछ भी नहीं दिखायी देता, उसी अनुपम मायाजालको मैं मनसे आकाशमें स्पष्ट देख रहा हूँ-यह कैसे सम्भव हुआ है ? उसके बाद देरतक उस मायाजालको देखनेके पश्चात् मैंने मनसे ही उस ब्रह्माण्डके आकाशसे एक सूर्यको अपने समीप बुलाकर पूछा- 'देवदेवेश्वर ! महातेजस्वी सूर्य ! आओ, तुम्हारा स्वागत है' यों कहकर मैंने पहले तो उनका स्वागत किया। फिर उनके सामने अपना प्रश्न इस प्रकार रखा- 'भगवन् ! तुम कौन हो ? तुम्हारा यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? इसके अतिरिक्त जो और जगत् दिखायी देते हैं, इनकी उत्पत्ति भी किस प्रकार हुई है ? निष्पाप देव ! यदि जानते हो तो यह सब बताओ।' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा और पहचान लिया। फिर मुझे नमस्कार करके उत्तम पदोंसे युक्त वाणीद्वारा इस प्रकार कहा । सूर्य बोले-जगदीश्वर ! आप इस दृश्य-प्रपञ्चके नित्य कारण हैं, फिर भी इसे जानते कैसे नहीं ? और यदि जानते हैं तो मुझसे पूछते क्यों हैं ? सर्वव्यापी देव ! यदि मेरी बातें सुननेके लिये आपके मनमें कौतूहल हो तो सुनिये। महात्मन् ! आप परम महान् परमात्मा हैं (आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है)। 'सत्-असत्' का बोध न होनेसे जो मोहमें डालनेवाली हैं तथा जिनसे अनवरत नाना प्रकारकी सृष्टियाँ होती रहती हैं, उन सदसत् कलाओं (संकल्पों) से जो विस्तारको प्राप्त हुआ है, वह मन ही यहाँ विविध पदार्थोंके रूपमें विलसित हो रहा है। तात्पर्य यह कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च मनका ही विलास या संकल्प है। (सर्ग ८५-९१) स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! इस संसारमें ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जातिके प्राणियोंके सदा दो-दो शरीर होते हैं। एक तो मनोमय शरीर होता है, जो शीघ्रतापूर्वक सब कार्य करनेवाला और सदा चञ्चल है। दूसरा मांसका बना हुआ स्थूलशरीर है, जो मनके बिना कुछ नहीं कर सकता। उक्त दोनों शरीरोंमेंसे जो मांसमय स्थूलशरीर है, वह सभी लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है। उसीपर सब प्रकारके शापों, विद्याओं (आभि- चारिक कृत्यों) तथा विष, शस्त्र आदि विनाशके साधन- समूहोंका आक्रमण होता है। यह मांसमय शरीर असमर्थ, दीन, क्षणभङ्गुर, कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलके समान चञ्चल तथा प्रारब्ध आदिके अधीन है। देहधारियोंका जो यह मन नामक दूसरा शरीर है, वह तीनों लोकोंमें प्राणियोंके अधीन होकर भी प्रायः अधीन नहीं रहता
३८—मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता
उत्पत्ति-प्रकरण ] * स्थूलशरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा * १८९ वह यदि सदा बने रहनेवाले धैर्यका अवलम्बन करके अपने पौरुषके सहारे स्थित होता है, तो दुःखोंकी पहुँचसे बाहर हो जाता है-दुःखके हेतुभूत जो दोष हैं, वे उसे दूषित नहीं करते । प्राणियोंका मनोमय शरीर जैसे-जैसे चेष्टा करता है, वैसे-ही-वैसे वह अपने निश्चयके एकमात्र फलका भागी होता है । मांसमय देह (पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर ) का कोई भी पौरुष-क्रम सफल नहीं होता, परंतु मनोमय शरीरकी प्रायः सभी चेष्टाएँ सफल होती हैं ( क्योंकि मन ही प्रधान है ) । माण्डव्य ऋषिने मानसिक पुरुषार्थसे मनको रागरहित और दुःखशून्य बना शूलीपर चढ़कर भी सम्पूर्ण क्लेशोंपर विजय प्राप्त कर ली थी ।* अन्धकारपूर्ण कुएँमें गिरे होनेपर भी दीर्घतपा ऋषिने मानसिक यज्ञोंका ही अनुष्ठान करके देवताओंका पद (स्वर्गलोक) प्राप्त कर लिया था । दूसरे भी जो सावधान धीर देवता और महर्षि हैं, वे मनसे की जानेवाली उपासना अथवा ध्यानका तनिक भी त्याग नहीं करते । संसारमें सावधान चित्तवाला कोई भी पुरुष कभी स्वप्न अथवा जागरणमें भी दोष-समूहोंसे थोड़ा-सा भी अभिभूत नहीं होता । इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह इस संसारमें पुरुषार्थके साथ अपनी बुद्धिके द्वारा ही अपने मनको पवित्र मार्गमें लगाये । जैसे कुम्हारके घट-निर्माण-सम्बन्धी व्यापारके अनन्तर घड़ा अपने मृत्पिण्डावस्थाको त्याग देता है, उसी प्रकार पुरुष उत्तर पदार्थकी वासनाके पश्चात् पूर्वकी स्थितिका त्याग कर देता है ( तात्पर्य यह है कि आगेकी दृढ़ वासनासे पिछली वासना नष्ट हो जाती है ) । श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! भगवान् ब्रह्माने पूर्वकालमें मुझसे ये बातें कही थीं, उन्हींका आज मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया है। नाम और रूपसे रहित उस सर्वात्मा ब्रह्मसे सम्पूर्ण प्रपञ्च उत्पन्न होता है। वह समय पाकर स्वयं ही घनताको प्राप्त हो संकल्प-विकल्परूप मनकी सामर्थ्यसे मनोरूप बन जाता है । इसलिये श्रीराम ! जो ये परमेष्ठी ब्रह्मा हैं, इन्हें तुम परमात्माका समष्टि मन ही समझो । समष्टि मनरूप तत्त्व ही जिनका आकार है, वे भगवान् ब्रह्मा संकल्पमय होनेके कारण जिस वस्तुका संकल्प करते हैं, उसीको देखते हैं । तदनन्तर उन्होंने इस अविद्याकी कल्पना की। अनात्मामें आत्माका अभिमान होना ही इस अविद्याका स्वरूप है । फिर उन ब्रह्माने क्रमशः पर्वत, तृण और समुद्ररूप इस जगत्की कल्पना की । इस प्रकार यद्यपि क्रमशः परब्रह्म-तत्त्वसे यह सृष्टि आयी है, तथापि कुछ लोगोंको यह और ही किसीसे उत्पन्न हुई दिखायी देती है । अतः श्रीराम ! तीनों लोकोंके भीतर वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति ब्रह्मासे ही हुई है-ठीक उसी तरह, जैसे तरङ्गोंकी उत्पत्ति समुद्रसे होती है । जो अन्य व्यष्टि-चेतन शक्तियाँ अर्थात् प्राणी हैं, वे सब वास्तवमें सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं-साक्षात् ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब यह जगत् विस्तारको प्राप्त होता है, तब वे ही प्राणी समष्टि-मनरूप ब्रह्मासे पूर्वकर्मानुसार विकासको प्राप्त होते हैं । ये सब सहस्रो व्यष्टि चेतन संसरणशील जीव कहे जाते हैं । वे जीव सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट होकर आकाशमें तन्मात्राओंके साथ संयुक्त होते हैं । फिर आकाशस्थित वायुओंके मध्यवर्ती जो चौदह श्रेणियोंमें विभक्त जीव हैं, उनमेंसे जिस प्रकारकी जीव-जातिमें रहनेसे जो जीव जैसी वासना और कर्मके अभ्यासमें प्रवृत्त होते हैं, उसी जीव-जातिकी प्राणशक्तिद्वारा वे स्थावर अथवा जङ्गम शरीरमें प्रविष्ट हो रज-वीर्यरूपी बीजभावको प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात् योनिसे जगत्में जन्म ग्रहण करते हैं । तदनन्तर वासना-प्रवाहके अनुसार अपने कर्मफलके भागी होते हैं । फिर शुभ और अशुभ
- माण्डव्य ऋषिकी कथा महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १०६ में है।- १. जीवोंकी 'इदम्प्रथमता' आदि चौदह श्रेणियाँ आगे बतायी जायेंगी।
१९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वासनाओंसे युक्त पुण्य-पाप कर्मरूपी रस्सियोंसे जिनका लिङ्गशरीर बँधा है, ऐसे वे जीव घूमते हुए कभी उत्तम लोकोंमें जाते हैं और कभी नरकोंमें गिरते हैं।
जीवोंकी ये सब जातियाँ वासनारूप ही हैं। कितने ही जीव हजारों जन्मोंतक कर्मरूपी बवंडरमें पड़कर चक्कर काटते हुए जंगलके पत्तोंकी भाँति झड़ जाते हैं और पर्वतके कुक्षिभागमें लुढ़कते फिरते हैं। कितने ही जीव जिन्हें सच्चिदानन्दघन परमात्माका ज्ञान नहीं है, अतएव जो मोहित रहते हैं, वे असंख्य जन्म धारण करते हैं। चिरकालसे जन्म लेकर इस संसारमें सैकड़ों कल्पोंतक जन्म और मरणकी परम्परामें बँधे रहते हैं। कतिपय जीव, जिनके कई असुन्दर जन्मान्तर व्यतीत हो चुके हैं, वर्तमान जन्ममें शुभकर्मपरायण हो इस जगत्में विचरण करते हैं। कई जातिके जीव तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी तरह परमपदको प्राप्त हो गये हैं, जैसे वायुसे उड़ाये हुए समुद्रके जलबिन्दु पुनः समुद्रके ही जलमें प्रवेश कर जाते हैं। इस प्रकार यहाँ परमपदरूप ब्रह्मसे सम्पूर्ण जीवोंकी गुण और कर्मके अनुसार उत्पत्ति (सृष्टि) हुई है। यह सृष्टि आविर्भाव और तिरोभावके कारण क्षणभङ्गुर है तथा जन्म-मरणकी परम्पराको प्रकट करनेवाली है। वासनारूपी विषकी विषमतासे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके दुःखरूपी ज्वरको धारण करती है। अनन्त संकटोंसे भरे हुए अनर्थकारी कार्योंका समादर करनेवाली है। अनेक दिशाओं, देशों, कालों तथा विविध पर्वतोंकी कन्दराओंमें घुमानेवाली—कर्मफलका भोग करानेवाली है। स्वयं निर्मित उत्तम विचित्रताओंसे इसने चारों ओर भ्रमका जाल बिछा रक्खा है। परमार्थदृष्टिसे यह सृष्टि असत् ही है। वत्स रामभद्र ! विक्षुब्ध मन ही जिसका शरीर है, वह संसाररूपी जंगलकी जीर्ण-शीर्ण लता यदि तत्त्वज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे जड़सहित काट दी जाय तो फरसेसे काटी गयी बेलके समान यह फिर पनप नहीं सकती।
(सर्ग ९२-९३)
जीवोंकी चौदह श्रेणियाँ तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे सभी पदार्थ उत्तम, मध्यम और अधम—इन तीन श्रेणियोंमें विभक्त होते हैं। इनकी जो इधर-उधर विभिन्न भुवनोंमें उत्पत्तियाँ बतायी गयी हैं, उनका विभाग इस प्रकार है—बताता हूँ, सुनो। जिस जीवको अपने पूर्वजन्ममें शम, दम आदि समस्त साधन तथा गुण-सम्पत्ति प्राप्त होनेपर भी ज्ञान नहीं हुआ, वह जीव इसी जन्ममें ज्ञान-लाभके योग्य बनकर उत्पन्न होता है; अतः यही उसका प्रथम जन्म है। उस श्रेणीके जीवका वह जन्म 'इदं प्रथम' नामसे विख्यात होता है। यह इदम्प्रथमता पूर्व-जन्मके शुभ अभ्याससे प्रकट होती है। वही इदम्प्रथमता यदि पूर्वजन्ममें वैराग्यकी कमीके कारण शुभ लोकोंका आश्रय लेनेवाली रही हो अर्थात् उत्तम लोकोंकी प्राप्ति-के लिये किये गये शुभ कर्मोंसे संयुक्त हो और इसीलिये विचित्र संसार-वासनाके कारण भोग-व्यवहारवाली हो तो भोगोंसे वासनाका क्षय होनेपर वह कुछ ही जन्मोंमें मोक्षकी प्राप्ति करा देती है। अतः शान्ति आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण उस दूसरी जीव-जातिको 'गुण-पीवरी' कहते हैं।
श्रीराम ! नाना प्रकारके सुख-दुःखरूपी फलोंको देनेमें मुख्य कारणभूत पूर्वजन्मके पुण्य और पापका अनुमान करानेवाली जो जीवोंकी श्रेणी है, उसे पुण्यात्मा पुरुषोंने 'ससत्त्वा' कहा है (क्योंकि वह सत्त्वगुणकी वृद्धिके द्वारा मोक्षकी भागिनी होती है)। जो जीव-श्रेणी विचित्र संसारकी वासनाओंसे युक्त होकर अत्यन्त कलुषित हो गयी हो अर्थात् पूर्वजन्ममें संचित किये गये अधिक दुष्कर्मजनित दुर्वासनाओंसे मलिन हो गयी
उत्पत्ति-प्रकरण] * जीवोंकी चौदह श्रेणियाँ तथा परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी एकरूपता * १९१
हो और भाँति-भाँतिके भले-बुरे फल प्रदान करनेवाले मुख्य कारणभूत पूर्वजन्मके धर्म और अधर्मका अनुमान करनेवाली हो, वह सहस्रों जन्मोंमें ज्ञानकी भागिनी होती है। इसलिये साधुपुरुष उसे 'अधमसत्त्वा' कहते हैं। वही जीवश्रेणी, यदि अध्यात्म-शास्त्रसे विमुख होनेके कारण असंख्य, अनन्त जन्मोंके पश्चात् वर्तमान जन्ममें भी उसके मोक्ष होनेमें संदेह ही रह जाय तो उसे 'अत्यन्त तामसी' कहते हैं। नृपश्रेष्ठ श्रीराम ! जीवकी जो उत्पत्ति पूर्वजन्मकी वासनाओंके अनुरूप एवं वैसे ही आचार-व्यवहारवाली हो तथा दो-तीन जन्मोंके अनन्तर जिसे मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ हो और वैसे ही कार्य कर रही हो, वह लोकमें 'राजसी' कही गयी है। जिसके लिये ज्ञान-प्राप्तिके योग्य जन्मका मिलना दूर नहीं है, जब जीवको ऐसी उत्पत्ति सुलभ हो जाती है, तब उस जन्ममें मृत्यु होनेमात्रसे उसमें मोक्ष-प्राप्तिकी योग्यता आ जाती है। उस जन्ममें उसके द्वारा वैसे ही कार्य होनेसे जो अनुमान होता है, उसके आधारपर ही मुमुक्षुओंने उस अवस्थाको 'राजस-सात्त्विकी' कहा है। वही उत्पत्ति यदि पूर्वोक्त मनुष्य-जन्मोंसे भिन्न, थोड़े-से ही (देवता आदि) जन्मोंमें क्रमशः ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा मोक्षकी भागिनी हो तो वैसी उत्पत्तिको उसके ज्ञाता विद्वान् 'राजस-राजसी' कहते हैं। वही यदि राजस-राजसीकी अपेक्षा चिरकालमें मोक्षकी इच्छासे सम्पन्न होकर सैकड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्ष-प्राप्तिकी अधिकारिणी हो और ऐसे कार्योंका आरम्भ करे, जिनसे राजस एवं तामस कर्मजनित फलोंकी प्राप्ति हो तो वह जीव जाति या जीव-श्रेणी सज्जन पुरुषोंद्वारा 'राजस-तामसी' कही गयी है। यदि वही उत्पत्ति ऐसे कार्योंका आरम्भ करे, जिनसे सहस्रों जन्मोंके पश्चात् भी मोक्ष मिलनेमें संदेह ही रहे, उसे 'राजसात्यन्ततामसी' कहा गया है।
सर्गके आदिमें हिरण्यगर्भ ब्रह्मासे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। तभीसे सहस्रों जन्म भोग लेनेके पश्चात् भी यदि बहुत जन्मोंके बाद चिरकालमें मोक्ष मिलनेकी सम्भावना हो तो महर्षियोंने उसे 'तामसी' उत्पत्ति कहा है। वह तामस उत्पत्ति यदि तामस योनि होनेपर भी मोक्षकी सम्भावनासे युक्त हो और वैसे ही कर्मोंके आयोजनसे सुशोभित होती हो तो उसे विद्वान् पुरुष 'तामससत्त्वा' कहते हैं। तामस-राजस गुणोंसे सम्पन्न कतिपय जन्मोंमें ही जहाँ मोक्ष-प्राप्तिकी सम्भावना हो, उस उत्पत्तिको 'तमोराजसरूपिणी' कहा गया है तथा जो उत्पत्ति पहलेके हजारों जन्मोंसे लेकर आगे होनेवाले सैकड़ों जन्मोंतक मोक्ष-प्राप्तिकी योग्यतासे रहित हो, उसे उत्पत्तिकी श्रेणीका विभाजन करने और जाननेवाले विद्वानोंने 'तामस-तामसी' कहा है। जिस उत्पत्तिमें अतीतकालके लाखों जन्मोंसे लेकर भविष्यत्कालके लाखों जन्मोंतक मोक्ष मिलनेमें संदेह ही रहे, उसे 'अत्यन्त तामसी' कहते हैं।
प्राणियोंकी ये सारी जातियाँ पूर्व-कर्मानुसार ब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं—ठीक उसी तरह जैसे कुछ चञ्चल हुए समुद्रसे तरङ्गें उठती रहती हैं। जीवोंकी ये सभी श्रेणियाँ उसी तरह ब्रह्मसे उत्पन्न हुई हैं, जैसे प्रज्वलित अग्निसे चिनगारियाँ प्रकट होती हैं। जैसे सुवर्णसे कड़े, बाजूबंद और केयूर आदि आभूषण प्रकट होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मसे सारी जीव-श्रेणियाँ पूर्व-वासना और कर्मोंके अनुसार उत्पन्न होती हैं। श्रीराम ! जैसे घटाकाश, स्थाल्याकाश और छिद्राकाश आदि आकाशके ही कल्पित रूप हैं, उसी तरह अजन्मा परब्रह्मकी ही सम्पूर्ण प्राणिवर्गके रूपमें कल्पना हुई है। अतः वे सब प्राणी ब्रह्मके ही रूप हैं। जैसे जलसे फुहारें, भँवरें, लहरें और बूँदें प्रकट होती हैं, अतः सब जलरूप ही हैं, उसी तरह सम्पूर्ण लोक-रचनाएँ परब्रह्म पदसे ही प्रकट हुई हैं, अतः वे सब ब्रह्म-स्वरूप ही हैं।
श्रीराम ! जैसे सूर्यके तेजसे ही मृग-तृष्णारूपिणी
१९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सरिताओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्य-दर्शन ब्रह्मके ही संकल्पसे प्रकट हुए हैं। ये सारे दृश्य-दर्शन द्रष्टा ब्रह्मके स्वरूपसे भिन्न नहीं हैं—ठीक वैसे ही, जैसे चाँदनी चन्द्रमासे और प्रकाश तेजसे पृथक् नहीं है। इस तरह जो नाना प्रकारकी जीवोंकी श्रेणियाँ हैं, ये जिस ब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं, उसीमें लीन भी हो जाती हैं। रघुनन्दन ! इस प्रकार भगवान् परब्रह्म परमात्माकी इच्छासे व्यवहारमें लगे हुए जो विचित्र आकारवाले रूप-वैभवसे सम्पन्न पूर्वोक्त प्राणिवर्ग हैं; वे आगसे प्रकट होनेवाली चिनगारियोंके समान विभिन्न लोकोंमें आते, जाते और ऊँची-नीची योनियोंमें जन्म लेकर भ्रमण करते हैं। (सर्ग ९४)
कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे वृक्षसे फूल और उसकी गन्ध दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार सृष्टिके आदिमें परम-पदरूप ब्रह्मसे परस्पर अभिन्न कर्म और कर्ता दोनों स्वयं (स्वभाववश) ही एक साथ प्रकट हुए। जैसे अज्ञानी लोगोंकी दृष्टिमें सर्वत्र फैले हुए निर्मल आकाशके भीतर नीलिमा प्रतीत होती है, उसी तरह समस्त संकल्पोंसे रहित सर्वव्यापी विशुद्ध ब्रह्ममें अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे ही जीवोंका प्राकट्य प्रतीत होता है। राघव ! जहाँ अज्ञानी लोगोंका ही आचार-व्यवहार दिखायी देता है, वहींपर 'जीव ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं' ऐसी उक्तियाँ टिक पाती हैं। किंतु जहाँपर ज्ञानी पुरुषोंका व्यवहार है, वहाँ यह कहना शोभा नहीं देता कि 'यह वस्तु तो ब्रह्मसे उत्पन्न हुई है और यह नहीं हुई है।' अतः भेददृष्टिसे जो शोचनीय द्वैत-कल्पना की गयी है, उसे व्यवहारमात्रके लिये स्वीकार करके यह उपदेश दिया जाता है कि 'यह ब्रह्म है और ये जीव हैं।' वास्तवमें यह कथन केवल वाणी-का विलासमात्र है। ये सब जीवराशियाँ सदा उस परमात्मामें स्थित रहती हैं, उसीसे उत्पन्न होती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। रघुनन्दन ! जैसे फूल और गन्ध एक दूसरेसे अभिन्न हैं, उसी तरह पुरुष (कर्ता) और कर्म परस्पर अभिन्न हैं। ये परमात्मासे प्रकट होते और धीरे-धीरे उसीमें लीन हो जाते हैं। ये दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता इस जगत्में वस्तुतः उत्पन्न हुए बिना ही वासनाओंके साथ उत्पन्न होते-से प्रतीत होते हैं और तुरंत गमन आदि क्रियासे युक्त हो जाते हैं। साधो ! उन दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता आदिके संसार-भ्रमणमें आत्माके यथार्थ ज्ञानके अभावके अतिरिक्त दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता। वह आत्मविस्मरण ही जन्मान्तररूपी फल प्रदान करनेवाला है।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! श्रुति, स्मृति-रूप प्रामाणिक दृष्टिवाले, वीतराग ऋषियोंद्वारा अर्थमें श्रुतिसे विरोध न रखनेवाले जो-जो स्मृति, पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थ सिद्धान्त-निर्णयपूर्वक रचे गये हैं, वे सब शास्त्र कहलाते हैं। जो महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, धीर (ज्ञानी) और समदर्शी हैं तथा जिन्हें अनिर्वचनीय ब्रह्मका साक्षात्कार हो चुका है, वे पुरुष साधु (श्रेष्ठ संत) कहे गये हैं। जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, उन पुरुषोंके सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये (उन्हें धर्म और ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेके लिये) श्रेष्ठ पुरुषोंका सदाचार और श्रुति-स्मृतिरूप शास्त्र—ये ही दो नेत्र हैं।
उनकी दृष्टि सदा इन (दोनों—सदाचार और शास्त्र) का ही अनुसरण करती है। जो पुरुष श्रेष्ठ व्यवहारके लिये शास्त्रका अनुसरण नहीं करता, उसका सभी शिष्टजन बहिष्कार कर देते हैं और वह दुःखमें निमग्न
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार * १९३
हो जाता है। प्रभो ! इस लोकमें और वेदमें भी ऐसा सुना जाता है कि कर्म और कर्ता यहाँ क्रमशः एकके-बाद-एक उत्पन्न होकर कार्य-कारणभावसे परस्पर मिले हुए हैं । कर्मके द्वारा कर्ताका निर्माण होता है और कर्तासे कर्मका, जैसे बीजसे अङ्कुर होता है और अङ्कुरसे बीज । यह न्याय लोक और वेदमें भी प्रसिद्ध है । जिस वासनाके कारण जीव इस संसाररूपी पिंजड़ेमें डाला जाता है, उसी वासनाके अनुसार उसे फल भी भोगना पड़ता है । भगवन् ! जाननेयोग्य तत्त्वके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मुझे ठीक-ठीक बताइये कि जीवका किया हुआ कर्म फलरूपमें अवश्य परिणत होता है या नहीं । यदि कर्मका फल अवश्य मिलता है, तब प्राणियोंके जन्म आदिमें वही हेतु हुआ । फिर आपने उत्पत्तिको अकारण या अज्ञानकल्पित कैसे बताया ? मेरे इस महान् संशयका निवारण कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुम्हें साधुवाद देता हूँ, तुमने मेरे सामने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न रक्खा है । सुनो, मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ, जिससे पूर्णतया ज्ञानका उदय हो जाता है । यह संकल्प-विकल्पात्मक मनका विकास ही कर्मोंका कारण है—उसीके अनुसार फल प्राप्त होता है । मनके संयोगके बिना किये हुए कर्म फलदायक नहीं होते । सृष्टिके आरम्भमें परम-पदरूपी ब्रह्मसे जब मनरूपी तत्त्व उत्पन्न हुआ, तभी उस मनके संकल्पके अनुसार जीवोंका कर्म भी उत्पन्न हुआ और जीव पूर्ववासनाके अनुसार देहवाला होनेके कारण देहमें अहंभावसे स्थित है । (मनसे ही कर्मकी उत्पत्ति हुई; इसलिये बीज और वृक्षकी भाँति कारण-कार्यरूप मन और कर्म परस्पर अभिन्न हैं ।) जैसे अभिन्नरूपसे स्थित हुए पुष्प और सुगन्धमें यहाँ भेद नहीं है, उसी प्रकार परस्पर अभिन्न मन और कर्ममें भी भेद नहीं है । इस जगत्में क्रियाका होना ही विद्वानोंद्वारा कर्म बताया गया है । उस क्रियाका आश्रयभूत देह भी पहले मन ही था अर्थात् यह देह भी मनका ही संकल्प होनेके कारण मनोरूप ही है । इसी प्रकार क्रिया भी मनका ही संकल्प होनेसे मनका ही स्वरूप है। न ऐसा कोई पर्वत है, न आकाश है, न समुद्र है और न ऐसा कोई लोक ही है, जहाँ किये हुए अपने कर्मोंका फल नहीं प्राप्त होता । तात्पर्य यह कि कर्मोंका फल अवश्यम्भावी है । ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म चाहे पूर्वजन्मका हो या इस जन्मका, वह क्रियारूप पुरुषार्थ ही पुरुषका परम प्रयत्न है । वह कभी निष्फल नहीं होता । जो मुक्त पुरुष है, उसीके कर्मका नाश होनेपर मनका नाश होता है मनका नाश ही कर्मका अभाव है। जो मुक्त नहीं है, उसके कर्म और मनका नाश कदापि नहीं होता । अग्नि और उष्णताकी भाँति सदा परस्पर मिले हुए चित्त और कर्म--इन दोनोंमेंसे एकका अभाव होनेपर दोनोंका ही अभाव हो जाता है । (सर्ग ९५)
मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! जो जड होकर भी अजड (चेतन-) के समान आकार धारण किये हुए है, उस मनके सङ्कल्पारूढ़ स्वरूपका आप मेरे समक्ष विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! सर्वशक्तिमान्, असीम, महान् विज्ञानानन्दघन परमात्मतत्त्वकी शक्तिसे रचित जो संकल्पमय रूप है, उसको विद्वान् पुरुष मन समझते हैं । वह मन स्वयं भी संकल्पकी सामर्थ्यसे युक्त है । इस लोकमें जैसे गुणीका गुणसे हीन होना सम्भव नहीं, उसी प्रकार मनका कल्पनात्मक क्रियाशक्तिसे रहित होना असम्भव है । एकमात्र संकल्प ही जिसका शरीर है तथा जो नाना प्रकारके विस्तारसे सुशोभित होनेवाला
१९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
एवं फलधर्मी (फलका जनक) है, उस चित्तरूपी कर्मने अपने ही स्वरूपसे इस नानाविध विश्वका, जो मायामय, निष्कारण (हेतु एवं प्रयोजनसे रहित), विन्यासशून्य तथा वासनाकी कल्पनाओंसे व्याप्त है, विस्तार कर रक्खा है। जिसने जहाँ लताकी भाँति जिस वासनाको जिस प्रकार आरोपित किया है, वहाँपर कर्मानुसार फल देनेवाली वह वासना ही उसे तदनुरूप फलरूपमें प्राप्त होती है। मन जिसका अनुसंधान करता है, उसीका सम्पूर्ण कर्मेन्द्रिय वृत्तियाँ सम्पादन करती हैं; इसलिये मनको कर्म कहा गया है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, कर्म, कल्पना, संसृति, वासना, अविद्या, प्रयत्न, स्मृति, इन्द्रिय, प्रकृति, माया, क्रिया तथा इनके सिवा और भी विचित्र शब्दोक्तियाँ संसारभ्रमकी ही हेतुभूत हैं। चित्तभावको प्राप्त हो प्रस्तुत संसार-पदवीको पहुँचे हुए शुद्ध चेतनके अपने ही सैकड़ों संकल्पोंद्वारा ये भिन्न-भिन्न नाम अत्यन्त रूढ़ि (प्रसिद्धि) को प्राप्त हुए हैं। वह शुद्ध चेतन परमात्मा ही लोकमें जीव कहलाता है। मन, चित्त और बुद्धि भी उसीके नाम हैं।
जैसे नाटकमें नट अनेक प्रकारके रूप धारण करता है, उसी प्रकार मन भी भिन्न भिन्न कर्मोंका आश्रय ले अनेक प्रकारके नाम धारण करता है। जैसे एक ही मनुष्य भोजन बनानेसे पाचक और पढ़ानेसे पाठक कहलाता है--विभिन्न एवं विलक्षण अधिकारोंके कारण विचित्र तथा विकृत (उन-उन कर्मोंके प्रकाशक) नाम पाता है, उसी प्रकार मन भी कर्मवश उक्त नाम धारण करता है रघुनन्दन! मैंने चित्तकी जो ये अनेक संज्ञाएँ बतायी हैं, इन्हींको अन्यान्य वादियोंने अपनी सैकड़ों कल्पनाओंद्वारा अन्य प्रकारसे कहा है। अपने भावोंके अनुरूप बुद्धिका मनमें आरोप करके उन वादियोंने मनके द्वारा स्वेच्छासे मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिके विचित्र-विचित्र नामभेद किये हैं। एक वादीके मतसे मन जड है तो दूसरेके मतसे वह जीवसे भिन्न है। तीसरेके मतसे वह अहंभावनाका प्रतीक है तथा चौथे वादीके मतानुसार उसका नाम बुद्धि है।
रघुनन्दन! अन्तःकरणके एकरूप होनेके कारण उसकी संकल्प आदि भिन्न-भिन्न वृत्तियोंके भेदसे निर्मित जो अहंकार, मन और बुद्धि आदि नाम मैंने बताये हैं, उनकी नैयायिकोंने अन्य प्रकारसे कल्पना की है। सांख्यों और चार्वाकोंने भी उनकी विभिन्न रूपोंमें कल्पना की है। मीमांसक, जैन, बौद्ध, वैशेषिक तथा पाञ्चरात्र आदि अन्य विभिन्न वादियोंने भी अपनी-अपनी मान्यताके अनुसार उन नामोंकी भिन्न-भिन्न प्रकारसे कल्पना कर रक्खी है। जैसे बहुत-से राहगीरोंका एक ही नगरमें जाना होता है, उसी प्रकार उन सभी वादियोंका गन्तव्य स्थान एकमात्र पारमार्थिक पद ही है। परम पदमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले वे जिज्ञासु-जन परमार्थ-वस्तुको न समझने तथा विपरीत बुद्धिको अपनानेके कारण अनेक प्रकारके विकल्पोंद्वारा केवल विवाद या तर्क-वितर्क करते हैं। जैसे विचित्र देश-कालमें उत्पन्न हुए पथिक अपनी विभिन्न दृष्टिके अनुसार अपने-अपने गन्तव्य मार्गकी प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न देशों और कालोंमें पैदा हुए वे सभी वादी दृष्टिभेदके कारण अपने-अपने मार्ग (मत) का समर्थन करते हैं। यह सब कुछ चित्त ही है, ऐसा अनुभव प्रायः सभी लोगोंको होता है; क्योंकि यदि चित्तका सहयोग न हो तो मनुष्य इस संसारको देखकर भी नहीं देख पाता। मनको साथ रखनेपर ही पुरुष भली-बुरी वस्तुको सुनकर, छूकर, देखकर, आस्वादन-कर और सूँघकर अपने भीतर हर्ष तथा विषादका अनुभव करता है। जैसे विभिन्न रूपोंके दर्शनमें प्रकाश कारण है, उसी प्रकार विभिन्न विषयोंके अनुभवमें मन ही कारण है।
जिस पुरुषका चित्त विषयोंमें बँधा हुआ है, वह बन्धनमें पड़ता है तथा जिसका चित्त कर्मवासनाके
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके द्वारा जगत्के विस्तार एवं त्रिविध आकाशका निरूपण * १९५
बन्धनसे रहित है, वह मुक्तिको प्राप्त होता है। मनके एकमात्र ब्रह्माकार होनेपर संसारका लय हो जाता है। यदि चित्तसे पृथक् जगत्की सत्ता होती तो जिसका चित्त लीन हो गया है, उस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी दृष्टिमें सारे जगत्का लय क्यों हो जाता (अतः चित्तसे अतिरिक्त जगत् नहीं है)। जैसे एक ही काल विभिन्न ऋतुओंके कारण नाना रूपोंमें प्रकट होता है, उसी तरह एक ही मन विभिन्न कर्मोंके कारण विचित्र आकार धारण कर लेता और अनेक नामोंसे प्रतिपादित होता है। जैसे चेतन मकड़ीसे जड तन्तुकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार नित्य-प्रबुद्ध पुरुष परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे जड प्रकृति एवं प्राकृत पदार्थ प्रकट होते हैं।
(सर्ग ९६)
मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! आपके पूर्वोक्त कथनसे यह तात्पर्य प्रकट होता है कि यह जगत्रूपी आडम्बर मनसे ही आविर्भूत हुआ है। अतः यह जगत् मनका ही कार्य है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे मरु प्रदेशका प्रचण्ड घाम अपनेमें मृगतृष्णारूपी जलका भ्रम ग्रहण करता है, उसी प्रकार दृढ़भावनासे अनुरञ्जित हुए मनने ही स्वयं-प्रकाश आत्मापर आवरण डालनेवाले जड जगत्को स्वीकार किया है। मैं ऐसा मानता हूँ कि विविध प्रकारके आचार-आकाश-प्रदेश, ग्राम और नगर आदिका रूप धारण करनेवाली विस्तृत आकृतिके द्वारा मन ही अपने स्वरूप-का विस्तार कर रहा है। ऐसी स्थितिमें शरीरोंके समुदाय तृण, काष्ठ और लता आदिके समान हैं। अतः उनके विचारसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा। हमें तो इनके मूलभूत केवल मनका ही विचार करना चाहिये। मैं समझता हूँ कि यह सम्पूर्ण विस्तृत जगत् मनसे ही व्याप्त है। मनसे भिन्न तो केवल परमात्मा ही शेष रहते हैं। परमात्मा सर्वातीत, सर्वव्यापी और सर्वाधार हैं, परमात्माके ही प्रसादसे मन सम्पूर्ण संसारमें दौड़ लगाता एवं नाचता-कूदता है। मेरे मतमें मन ही क्रिया है और वही विभिन्न शरीरोंका कारण है। मन ही जन्म लेता और मरता है; क्योंकि ऐसे गुण (भाव-विकार) आत्मामें नहीं हैं। मेरी रायमें मन ही एक ऐसी वस्तु है, जिसका विचार करनेसे वह स्वयं विलीन हो जाता है। मनका विलय होनेमात्रसे परम श्रेय (मोक्ष) की प्राप्ति हो जाती है। भ्रम उत्पन्न करनेवाली मन नामकी क्रियाका क्षय होनेपर जीव मुक्त कहा जाता है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है।
श्रीराम ! जिनका भीतरी भाग अत्यन्त विस्तृत है, ऐसे तीन आकाश विद्यमान हैं। पहला चित्ताकाश, दूसरा चिदाकाश और तीसरा भूताकाश। जो बाहर और भीतर परिपूर्ण है, जगत्की उत्पत्ति और विनाशका ज्ञाता है तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंमें व्यापक है; वह विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही चिदाकाश कहलाता है। जो इन्द्रियो और महाभूतोंसे श्रेष्ठ है, कालकी कलना जिसका स्वभाव है और जिसने अपने संकल्पके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया है, वह समस्त प्राणियोंका हितकारी संकल्पात्मक मन ही चित्ताकाश कहा जाता है। दसों दिशाओंके मण्डलाकार विस्तारसे भी जिसका कलेवर सीमित नहीं होता तथा जो वायु और मेघ आदिका आश्रय है, वह भूतात्मक आकाश ही भूताकाश कहलाता है। भूताकाश और चित्ताकाश—ये दोनों परब्रह्म परमात्मरूप चिदाकाशकी शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं। जैसे दिन अपनी संनिधिमात्रसे समस्त कार्य-
१९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
समूहोंके सम्पादनमें कारण होता है, उसी प्रकार चेतन परमात्मा भी अपने सकाशमात्रसे सबके कारण हैं। जिसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं है, उसीके लिये तीन आकाशोंकी कल्पना हुई है। उसीको उपदेश देनेके लिये त्रिविध आकाशकी कल्पना की जाती है। जिसे आत्मतत्त्वका बोध हो गया है उसके लिये यह कल्पना नहीं है। आत्मज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें तो सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित सर्वव्यापी, सर्वरूप एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही नित्य विराजमान हैं। अज्ञानी पुरुषको ही अनेक प्रकारकी वाक्य-रचनासे युक्त द्वैत एवं अद्वैतके भेदोंका निरूपण करते हुए तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया जाता है। ज्ञानी पुरुषको किसी तरह भी ऐसा उपदेश नहीं दिया जाता।
निष्पाप श्रीराम ! मन जिस किसीसे भी उत्पन्न हुआ हो और जो कुछ भी उसका स्वरूप हो, उसकी उधेड़बुनमें न पड़कर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह उसे नित्य प्रयत्नपूर्वक अपनी मुक्तिके लिये परमात्मामें लगाये। रघुकुलतिलक ! परमात्मामें लगाया हुआ चित्त वासनारहित एवं शुद्ध हो जाता है। तत्पश्चात् वह कल्पनाशन्य होकर परमात्मभावको प्राप्त हो जाता है।
श्रीराम ! यह सारा चराचर जगत् चित्तके अधीन है। इसलिये बन्धन और मोक्ष भी चित्तके ही अधीन हैं। (अतः मनुष्यको उचित है कि वह मोक्ष-प्राप्तिके लिये चित्तको परमात्मचिन्तनमें लगाये ।)
चिरकालतक चित्तके निरोधकी रक्षा करने और दीर्घकालतक परमात्माका चिन्तन करनेसे अभ्यासवश शून्यताको प्राप्त होकर मन फिर शोक नहीं करता। मनके प्रमादसे नाना प्रकारके दुःख बढ़ते हैं और बढ़कर पर्वत-शिखरके समान हो जाते हैं तथा उसीको वशमें कर लेनेसे ज्ञानका उदय होनेके कारण वे सारे दुःख उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्यके सामने बर्फका ढेर गल जाता है। यदि मन शास्त्रोंके अर्थज्ञानसे उत्पन्न हुई अनिन्द्य वासनासे युक्त हो राग आदिके विषयमें मौन (निरोध) का आश्रय ले जीवनपर्यन्त मुनिकी तरह रमता है तो आगे चलकर पावनको भी पावन बनानेवाले, जन्मरहित, शीतल (शान्तिमय) परिपूर्ण ब्रह्मपदको प्राप्त करके उसीमें स्थित हुआ जीवनमुक्त पुरुष बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंमें पड़नेपर भी कभी शोक नहीं करता।
(सर्ग ९७—९९)
मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति, सबकी ब्रह्मरूपता, मनके संकल्पसे ही सृष्टि-विस्तार तथा वासना एवं मनके नाशसे ही श्रेयकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे जल-जातिका बोध रखनेवाले पुरुषोंकी दृष्टिमें तरङ्ग समुद्रसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार इस लोकमें जिन्हें परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो गया है, उनकी दृष्टिमें उनका मन भी परब्रह्म परमात्मा ही है, उनसे भिन्न नहीं। रघुनन्दन ! अज्ञानी पुरुषोंका मन ही संसाररूपी भ्रमका कारण है (अथवा जन्म-मरणरूपी संसारमें भटकानेका हेतु है)—जैसे जो लोग जल-सामान्यपर दृष्टि नहीं रखते, उन्हींको समुद्रके जल और तरङ्गमें भेद प्रतीत होता है। अज्ञानियोंके पक्षमें उन्हें केवल ज्ञानका उपदेश देनेके लिये ही वाच्य-वाचक-सम्बन्धजनित भेदकी कल्पना की जाती है। परब्रह्म परमात्मा सर्वशक्तिमान्, नित्य, परिपूर्ण एवं अविनाशी है, उन सर्वव्यापी परमात्मामें जो न हो, ऐसी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं है। भगवान् सम्पूर्ण शक्तियोंसे परिपूर्ण हैं। उन्हें जब जो शक्ति रुचती है, तब उसी अनन्त शक्तिको वे सर्वव्यापी परमात्मा प्रकाशित करते हैं (उपयोगमें लाते हैं)। श्रीराम ! प्राणियोंके शरीरोंमें ब्रह्मकी चेतन-शक्ति दिखायी देती है। इसी तरह प्रवह आदि वायुओंमें ब्रह्मकी स्पन्दशक्ति, प्रस्तरमें जड-शक्ति, जलमें द्रव-शक्ति, अग्निमें तेजस्शक्ति, आकाशमें शून्य-शक्ति और जगत्की
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति एवं सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * १९७
स्थितिमें उनकी भाव ( सत्ता )-शक्ति विद्यमान है। ब्रह्मकी सम्पूर्ण शक्ति दसों दिशाओंमें व्याप्त दिखायी देती है। विनाशकालमें नाशशक्ति, शोकयुक्त प्राणियोंमें शोक-शक्ति, प्रसन्न जीवोंमें आनन्दशक्ति, योद्धाओंमें वीर्यशक्ति, सृष्टिकालमें सर्गशक्ति और प्रलयकालमें उनकी सर्वशक्तिमत्ता दृष्टिगोचर होती है। जैसे वृक्षके बीजमें फल, फूल, लता, पत्र, शाखा-प्रशाखा तथा जड़सहित वृक्ष अव्यक्त-रूपसे विद्यमान रहता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है।
रघुनन्दन ! अब इस जगत्को और अहंतत्त्व (जीव) को तुम ब्रह्मरूप ही देखो। वह परब्रह्म परमात्मा सर्व-व्यापी है। उसका महान् ( अनन्त ) स्वरूप नित्य प्रकाशमान है। वही ब्रह्म जब किंचित् मननशक्तिको धारण करता है, तब मन कहलाता है। जैसे आकाशमें भ्रमवश मोरके पंखोंकी प्रतीति होती है और जैसे जलमें आवर्त-बुद्धि होती है, उसी तरह मनमें ब्रह्मकी प्रतीति होती है। शत्रुसूदन श्रीराम ! यह जो मनका मननात्मक रूप प्रकट हुआ है, वह ब्रह्मकी शक्ति ही है; इसलिये वह ब्रह्म ही है। 'इदं' ( यह ), 'तत्' ( वह ) और 'अहं' ( मैं )—वह सब भेद प्रतीतिमात्र ही है, वास्तविक नहीं। जैसे निश्चल और निर्मल जलाशयमें अपने-आप स्पन्द ( कम्पन ) होता है, उसी तरह परमात्मामें यह जीव पूर्वकर्म और वासनाके अनुसार प्रकट हुआ है। यही संसारका कारण है। श्रीराम ! जैसे समुद्रका जल ही कल्लोल, ऊर्मि और तरङ्ग-समुदायके रूपमें सब ओर स्थित रहता है, उसी तरह ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सारा प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप ही है। जैसे विविध तरङ्गोंसे व्याप्त विशाल महासागरमें जलके अतिरिक्त दूसरी कोई कल्पना या सत्ता नहीं है, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें नाम-रूप क्रियात्मक संसारकी ब्रह्मसे अतिरिक्त सत्ता नहीं है। यह जो कुछ जगत् जन्म लेता, नष्ट होता, गमन करता अथवा स्थित रहता है, वह सब ब्रह्मके द्वारा ब्रह्ममें ब्रह्म ही वर्तता है। करण, कर्म, कर्ता, जन्म, मरण और स्थिति—ये सब ब्रह्म ही हैं। उसके बिना दूसरी कोई कल्पना ही नहीं। यह सारा जगत् परमात्मा ही है। जो कुछ यह संकल्प-क्रम है, वह सब भी परमात्मा ही है। जैसे सुवर्ण बाजूबंदके रूपमें प्रकट होता है, उसी प्रकार परमात्मा मनरूपसे प्रकट हुआ है; इसलिये मन भी परमात्मा ही है।
राघव ! बन्धन और मोक्ष आदिका कोई सम्मोह ज्ञानीको नहीं होता। मोहजनित बन्धन और मोक्ष आदि तो अज्ञानीको ही होते हैं।
निष्पाप श्रीराम ! विकल्प-जालसे परिपूर्ण यह संसार-रचना प्रतीतिमात्र ही है, जो बन्ध, मोक्ष आदिकी कल्पनाओंके रूपमें विस्तारको प्राप्त हो रही है। वास्तवमें यहाँ सङ्कल्पमात्रके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो कुछ विकल्परूप प्रतीत होता है, वह संकल्पके कारण ही प्रतीतिका विषय होता है। वह वास्तवमें कुछ नहीं हैं; अथवा कुछ है अर्थात् परमात्माका संकल्पमात्र है। स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ—ये सब अपने स्वप्नके समान मनके सङ्कल्पमात्रमें ही विकसित हुए हैं। जैसे केवल जलमय चञ्चल समुद्र अपने स्वरूपभूत जलमें स्वयं ही स्फुरित होता है, उसी तरह परमात्मामें एकमात्र सङ्कल्प ही सब ओर स्फुरित हो रहा है। पहले परमात्मामें एकमात्र सङ्कल्प ही प्रकट हुआ। वही संकल्प सूर्यके व्यापारोंसे बढ़नेवाले दिनकी भाँति लोगोंके विविध व्यापारोंसे विस्तारको प्राप्त हुआ है।
वस्तुतः भेदरहित परमात्मामें अहंकार नहीं है। जैसे सूर्यकी प्रचण्ड धूपमें भ्रमवश मृगतृष्णारूपिणी नदीकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार असम्यक्-दृष्टि ( अज्ञान ) के कारण ही परमात्मामें अहंकारका भान होता है। मनरूपी चिन्तामणिके द्वारा कल्पित जो महान् आरम्भ ( कार्यसमूहकी सृष्टि ) है, वही संसाररूपमें देखा जाता है। जैसे जल अपने स्वरूपका आश्रय लेकर स्वयं ही
१९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तरङ्ग आदिके रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्माका आश्रय लेकर मन स्वयं ही संसारके रूपमें स्फुरित होता है। अद्वितीय परमात्मामें अज्ञानके कारण भेद और अभेदकी भ्रान्ति हो रही है। इस भ्रमका बाध होनेपर जब यह सब कुछ ब्रह्मतत्त्वके रूपमें ही अवशिष्ट रह जाता है, तब यहाँ कौन बद्ध है और कौन मुक्त होता है ? जबतक ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं होता, तभीतक देह आदिके पीड़ित होनेपर यह पीड़ारहित जीव भी पीड़ासे युक्त-सा प्रतीत होता है। अच्छेद्य होनेपर भी देहके किसी अङ्गके कट जानेपर तमतमा उठता है। परंतु जब परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब ये बातें नहीं होतीं; क्योंकि परमात्मामें भेद, अभेद, विकार और पीड़ा—कुछ भी नहीं हैं।
यह शरीर गिर जाय या उठ खड़ा हो अथवा आकाशके भीतर चला जाय, उससे विलक्षण रूपवाले मुझ आत्माकी क्या हानि है ? श्रीराम ! मन ही सम्पूर्ण जगत्का शरीर है। मनकी कारणभूत आद्याशक्ति-रूप चिन्मय परमात्माका कभी नाश नहीं होता। यह वासना इष्ट वस्तुमें राग और अनिष्ट वस्तुमें द्वेषके कारण बन्धनमें डालनेवाली मनकी ही शक्ति है। इसीके द्वारा व्यर्थ भ्रमसे स्वप्नकी भाँति इस जगत्की कल्पना हुई है। यह वासना अविद्या है। ज्ञानके बिना इसका अन्त होना बड़ा कठिन है। यह केवल दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है। इसके स्वरूपका ज्ञान न होनेसे ही यह इस मिथ्या प्रपञ्चका विस्तार करती है। इस मानसी-शक्ति वासनाने ही इस विशाल जगत्को दीर्घकालतक रहनेवाले स्वप्नके समान रचा है। यह है तो असत्, किंतु सत्-सा प्रकट हुआ जान पड़ता है। आरम्भमात्र ही इसका फल है अर्थात् यह निस्सार एवं आपात रमणीय है। मनका नाश ही महान् अभ्युदय—परम पुरुषार्थकी प्राप्ति है और वही समस्त दुःखोंके समूल नाशका उपाय है। निरन्तर सुख-दुःखरूपी वृक्ष-समूहोंसे भरपूर और क्रूर कालरूपी विषैले सर्पके निवास-स्थान इस समस्त संसाररूपी वनमें यह विवेकहीन मन ही बड़ी-बड़ी विपत्तियोंका एकमात्र कारण और प्रभु है।
महर्षि वसिष्ठके इतना उपदेश दे लेनेपर दिन बीत गया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। उस राजसभामें बैठे हुए ऋषि-मुनि तथा अन्य सभासद् सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये स्नानके उद्देश्यसे उन महामुनिको नमस्कार करके चले गये तथा रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके साथ ही वे सब सभासद् फिर वहाँ आ गये। (सर्ग १००-१०२)
जगत्की चित्स्वरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे सागरसे उसकी बड़ी-बड़ी लहरें उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मासे इस चित्तरूपी तरङ्गका उत्थान हुआ है। यही अपने संकल्पसे विशालताको प्राप्त होकर चारों ओर इस भुवनका विस्तार करता है। सब प्रकारकी वस्तुओंसे सम्पन्न यह जो कुछ भी चराचर जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, सब-का-सब चित्तके संकल्पसे ही प्रकट हुआ है। श्रीराम ! जैसे छोटा बच्चा घरमें कीचड़ या गीली मिट्टीसे विचित्र खिलौने बनाता है, वैसे ही मन अपने संकल्पसे विकल्परूपी जगत्की सृष्टि करता है। जैसे ऋतुओंका निर्माण करनेवाला काल विभिन्न ऋतुओंमें वृक्षका कुछ और ही विलक्षण रूप कर देता है, उसी प्रकार चित्त भी इन सब पदार्थोंको विलक्षण-सा बना देता है। जैसे वृक्षसे पल्लव प्रकट होते हैं, उसी प्रकार मनके संकल्पसे व्यामोह, सम्भ्रम, अनर्थ, देश, काल, गमन और आगमन—ये सब-के-सब उत्पन्न होते हैं। जैसे जल ही समुद्र है और उष्णता ही अग्नि है, उसी प्रकार चित्त ही विविध व्यापारोंसे पूर्ण संसार है (क्योंकि वह उसीके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है)।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष * १९९
कर्ता, कर्म और करणके साथ जो यह द्रष्टा, दर्शन और दृश्यसे सम्पन्न संसार प्राप्त हुआ है, वह सब-का-सब चित्त ही है। जैसे सुवर्ण-तत्त्वकी परीक्षा करनेवाला पुरुष बाजूबंद, मुकुट, कड़ा और हार आदि आकारोंसे सुशोभित उसके विविध रूपोंको छोड़कर एकमात्र सुवर्णमें ही बुद्धिको लगानेपर वास्तविक सुवर्णको देख पाता है, उसी प्रकार विवेकी पुरुष भी विभिन्न लोकों, उनके भीतरके भुवनों और उनके भी भीतर फैले हुए वनान्तर आदि समस्त वस्तुओंको त्यागकर जब यह समझ लेता है कि इन सबके रूपोंमें अपने ही स्वरूप-भेदसे—अपने ही संकल्प-विकल्पोंसे चित्त स्वयं ही प्रकट हुआ है, तब यह सारा जगत् उसे चित्तरूप ही दिखायी देता है; फिर चित्तके सिवा दूसरी कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती ।
जैसे बालिका वेतालोंका विस्तार करती है, उसी प्रकार अत्यन्त तुच्छ वासनारूपी सहस्रों दोषोंसे मलिन हुई मनोवृत्ति, जो नहीं है उस दुःखका भी पूर्णरूपसे विस्तार करती है; किंतु जो वासनारूप कलङ्कसे मलिन नहीं हुई है—निष्कलङ्क है, वह मनोवृत्ति महान् दुःख विद्यमान हो तो भी उसे उसी प्रकार क्षणभरमें मिटा देती है, जैसे सूर्यकी प्रभा अन्धकारको । वासनायुक्त अज्ञानी चित्तको जहाँ भय नहीं है, वहाँ भी भय दिखायी देता है। जैसे भ्रममें पड़े पथिकको ठूंठा काठ दूरसे पिशाच-जैसा जान पड़ता है । कलङ्कसे मलिन हुआ मन मित्रमें भी शत्रुभावकी आशङ्का करता है, जैसे नशेमें चूर हुआ प्राणी इस पृथ्वीको घूमती हुई देखता है । मनके व्याकुल होनेपर चन्द्रमासे भी वज्रपात होता जान पड़ता है। विष-बुद्धिसे भक्षण किया गया अमृत भी विषका काम करता है । मनकी उत्कट वासना ही जीवके लिये एकमात्र मोहका कारण है, अतः यत्नपूर्वक उसीकी जड़ काटकर उसे उखाड़ फेंकना चाहिये । मनुष्योंका मनरूपी हिरन संसाररूपी वनकी झाड़ीमें वासनारूपी जालसे आकृष्ट हो बडी विवशताको प्राप्त हो जाता है । जिस विचारसे जीवकी
सं० यो० व० अं० ८—
ज्ञेय-पदार्थसम्बन्धिनी वासना कट जाती है, उसका प्रकाश बादलोंके आवरणसे रहित सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होता है । अतः तुम मनको ही मानव समझो, इस स्थूल देहको नहीं । देह जड है; किंतु इसके भीतर रहनेवाले मनको न जड माना जाता है न अजड । तात ! निष्पाप रघुनन्दन ! मनने जो कर दिया, उसीको किया हुआ समझो और मनने जिसे छोड़ दिया, उसीको छोड़ा हुआ मानो । यह सारा जगत् एकमात्र मन ही है । मन ही सम्पूर्ण भूमण्डल है । मन ही आकाश, मन ही भूमि, मन ही वायु और मन ही महत्तत्त्व है । यदि मन सूर्य आदि पदार्थोंमें प्रकाश आदिरूपसे अपने-आपको योजित न करे तो ये सूर्य आदि भी कभी प्रकाशित न हों । जिसका मन मोहको प्राप्त होता है, वही मूढ कहलाता है; यदि शरीर मोहको प्राप्त हो तो उसके शवको कोई मूढ़ नहीं कहता । मन जब देखता है तब नेत्र बन जाता है, सुनता है तब श्रवण या कान बन जाता है, स्पर्शका अनुभव करनेसे वही त्वगिन्द्रियका रूप ग्रहण करता है, सूँघनेसे घ्राणेन्द्रिय और रसास्वादन करनेसे रसनेन्द्रिय हो जाता है । जैसे नाटकमें एक ही नट अनेक भूमिकाओं (विविध रूपों) में देखा जाता है, उसी प्रकार देहके भीतर इन विचित्र इन्द्रिय-वृत्तियोंमें केवल मनकी ही अनुवृत्ति होती है। मन छोटेको बड़ा बना देता, सत्य पदार्थमें असत्ता स्थापित कर देता, स्वादिष्टको कडुवा बनाता और शत्रुको मित्र बना लेता है ।
यदि भगवत्-स्मरण आदि मनोहर मनोवृत्तिका उदय हो तो रौरव नरकका दुःख भी सुखके रूपमें परिणत हो जाता है। जिसे कल सबेरे राज्य मिलनेका विश्वास है, वह यदि कारागारमे अच्छी तरह बँधा हो तो भी उसका वह बन्धन दुःखद नहीं होता । मनके जीत लिये जानेपर सारी इन्द्रियों स्वतः वशमे हो जाती हैं । श्रीराम ! सर्वत्र विद्यमान, स्वच्छ, निर्विकार, सम, सूक्ष्म, साक्षिरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुगत, चेत्य पदार्थोंसे अभिन्न तथा चिन्मात्ररूप जो आत्मसत्ता है, उससे उपलक्षित जो
२०० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वाग् आदि सब क्रियाओंसे रहित ब्रह्म है, उसे भी यह मन देहके तुल्य और जड बनाकर अन्तःकरणमें काम-संकल्प-रूप भ्रान्तिसे और बाहर पर्वत, नदी, समुद्र, आकाश एवं नगर आदिकी लीलासे युक्त हो व्यर्थ घूमता रहता है।
जिसे चित्तने देखा है, वही वस्तु देखी गयी मानी जाती है। यदि चित्तने नहीं देखा तो सामने रक्खी हुई वस्तु भी नहीं दिखायी देती। जैसे अन्धकारमें नील रूपकी कल्पना की गयी है, उसी तरह मनने अपनेमें ही इन्द्रियोंका निर्माण कर रक्खा है। इन्द्रियोंसे मन साकार होता है और मनसे इन्द्रियाँ। इस प्रकार यद्यपि दोनों समान हैं, तथापि इनमें मन ही उत्कृष्ट है; क्योंकि मनसे इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, इन्द्रियोंसे मन नहीं। इस तरह चित्त और शरीर एक-दूसरेसे अत्यन्त भिन्न होनेपर भी जिनकी दृष्टिमें इन दोनोंकी एकता है अर्थात् जो चित्त और शरीर दोनोंको जड-कोटिमें मानकर उन्हें एक-सा समझते हैं, वे ज्ञेय आत्माके ज्ञाता परम ज्ञानी महात्मा हम सबके लिये वन्दनीय हैं। जब मन अन्यत्र आसक्त होता है—किसी दूसरे काममें उलझा रहता है, तब बड़े यत्नसे कही जाती हुई कथाका क्रम भी टूट जाता है। स्वप्नमें जब मन उल्लासको प्राप्त होता है, तब हृदयके भीतर ही निर्मित हुए नगर एवं पर्वत आदि विस्तृत आकाशमें निर्मित नगर और पर्वत आदिके समान अपने-अपने कार्यको करनेमें समर्थ दिखायी देते हैं। जैसे चञ्चल समुद्र अपने-आपमें ही तरङ्गमालाओंका विस्तार करता है, उसी तरह मन स्वप्नावस्थामें अपनेसे विक्षिप्त हुए हृदयमें ही पर्वत और नगरोंकी श्रेणीको फैला देता है। जैसे समुद्रके भीतर जलसे तरङ्गमालाएँ और छोटी-छोटी लहरें प्रकट होती हैं, उसी तरह देहके भीतर मनसे ही स्वप्नगत पर्वत और नगरोंकी पंक्तियाँ प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे पत्र, लता, फूल और फलकी शोभा अङ्कुरका ही स्वरूप है—उससे भिन्न नहीं, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नकी विलास-भूमियाँ मनका ही विकास हैं, मनसे भिन्न नहीं। जैसे सुवर्णकी नारी-प्रतिमा सुवर्णसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नावस्थाकी क्रिया-लक्ष्मी चित्तसे पृथक् नहीं है। जैसे जलका वैभव ही धारा, जलकण, तरङ्ग और फेन आदिकी शोभाके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार जगत्के विविध पदार्थोंके रूपमें यह चित्तका ही विचित्र वैभवशाली नानात्व प्रकट हुआ है। जैसे नट शृङ्गार आदि रसके आवेशसे विभिन्न भूमिका (वेश-वैचित्र्य) को ग्रहण करता है, उसी प्रकार अपनी चित्त-वृत्ति ही यहाँ रागके आवेशसे जाग्रत् और स्वप्नगत दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें उदित होती है।
सब ओर फैला हुआ वासनारूढ मन विषयोंके मननसे अतिशय मोहको प्राप्त हो अपने संकल्पके अनुसार विभिन्न प्रकारकी योनि (जन्मस्थान), सुख-दुःख तथा भय-अभयको प्राप्त होता है। जैसे तिलमें तेल रहता है, उसी तरह मनमें सुख और दुःख रहते हैं। वे ही देश और कालका प्रभाव पड़नेसे कभी घनभूत हो जाते हैं और कभी अत्यन्त सूक्ष्म। मनःशरीरके संकल्पके सफल होनेपर ही स्थूल-शरीर शान्ति एवं उल्लासको प्राप्त होता है, आता-जाता है और उछलता-कूदता है। वह स्वतन्त्र-रूपसे कुछ नहीं करता। जैसे साध्वी स्त्री अन्तःपुरके आँगनमें ही अपने संकल्पसे उदित विविध एवं विस्तृत उल्लासोंके साथ क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार मन इस देहके भीतर अपने संकल्पोंद्वारा कल्पित अनेक प्रकारके बढ़े हुए उल्लासजनक भावोंसे क्रीडा-विलास करता है। इसलिये जो पुरुष अन्तःकरणमें मनको चपलता (विषय-चिन्तन) के लिये अधिक अवसर नहीं देता, उसका वह मन खंभेमें बँधे हुए हाथीके समान स्थिर होकर लयको प्राप्त हो जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! जिसका मन एक लक्ष्यमें स्थिर होकर अपनी चपलताका त्याग कर चुका है, वह ध्यानके द्वारा सर्वोत्तम पद (परब्रह्म परमात्मा) से संयुक्त हो जाता है। जैसे मन्दराचलके स्थिर हो जानेपर क्षीरसागर शान्त हो गया था, उसी प्रकार मनके संयमसे संसाररूपी भ्रान्तिका शमन हो जाता है।
(सर्ग १०३-११०)
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ * २०१
चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह चित्त एक महान् रोग है। इसकी चिकित्साके लिये एक बहुत बड़ी औषध है, जो अभीष्टसाधक, निश्चितरूपसे लाभ पहुँचाने-वाली, परम स्वादिष्ट और अपने ही अधीन है; उसे बताता हूँ, सुनो। रागके विषयभूत बाह्य विषयोंका परित्याग करके परमात्मचिन्तनरूपी अपने ही पुरुषार्थमय प्रयत्नसे चित्तरूपी वेतालपर शीघ्र विजय पायी जाती है। जो अभीष्ट वस्तु (बाह्य विषयभोग) को त्यागकर चित्तके राग आदि रोगोंसे रहित हो स्वस्थ रहता है, उसने अपने मनको उसी प्रकार जीत लिया है, जैसे मजबूत दाँतोंवाला हाथी खराब और कमजोर दाँतवाले हाथीको जीत लेता है। स्वसंवेदन (आत्मा या परमात्माके निरन्तर चिन्तन) रूपी प्रयत्नसे चित्तरूपी बालकका पालन किया जाता है अर्थात् उक्त यत्नसे उसके राग और चपलता आदि रोगोंकी चिकित्सा करके उसे स्वस्थ बनाया जाता है। उसे अवस्तु (मिथ्या अथवा अनात्मवस्तु) से हटाकर वस्तु (सत्य अथवा आत्मतत्त्व) में लगाया जाता है तथा उसे बोधसे सम्पन्न किया जाता है। जैसे बालकको प्यार या भय दिखाकर बिना प्रयत्नके ही इधर-उधर जहाँ चाहे लगाया जा सकता है, उसी प्रकार भावोंसे मनको भी अनायास ही अन्तरात्मामें लगाया जा सकता है। ऐसा करनेमें कठिनाई ही क्या है ?
भविष्यमें अभ्युदयरूपी फलको देनेवाले सत्कर्म (समाधिके अभ्यास) में लगे हुए मनको अपने पुरुषार्थसे ही चेतन परमात्माके साथ संयुक्त करे। जो सर्वथा अपने अधीन और परम हितकर है, वह अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी वैराग्य जिसके लिये कठिन हो गया है, वह मनुष्य नहीं, विषयोंका कीड़ा है। उसे धिक्कार है। जैसे कोई पहलवान किसी बालकको अनायास ही पछाड़ देता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धिसे अशेष विषय-समूहमें परम रमणीय परब्रह्म परमात्माकी भावना करके मनको बिना यत्नके ही जीत लिया जा सकता है। पौरुषरूपी प्रयत्नसे चित्तको शीघ्र ही जीत लिया जाता है। जो चित्तको जीतकर उसके प्रभावसे रहित हो गया है, वह बिना किसी प्रयासके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है। अपने चित्तपर आक्रमण करके उसे वशमें कर लेना-मात्र जो सहजसाध्य और स्वाधीन कार्य है, उसे ही जो लोग नहीं कर सकते, वे पुरुष नहीं, गीदड़ हैं। उन्हें धिक्कार है। एकमात्र अपने पौरुषमें ही सिद्ध होनेवाला जो अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी मनोनिग्रहकर्म है, उसके बिना शुभगति नहीं हो सकती। अभीष्ट बाह्य विषयोंका स्मरण न करना अथवा मनोवाञ्छित मोक्ष-सुखकी प्राप्ति कराना जिसका स्वरूप है, उस मुख्य साधन मनोनिग्रहके बिना गुरुका उपदेश, शास्त्रके अर्थका चिन्तन और मन्त्र आदि सारे साधन या युक्तियाँ तिनकोंके समान व्यर्थ हैं*।
संकल्पोंके परित्यागरूपी शस्त्रसे जब चित्तरूपी वृक्षका समूल उच्छेद हो जाता है, तब साधक सर्व-स्वरूप सर्व-व्यापी शान्त ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रीराम ! जैसे दिग्भ्रम होनेपर पूर्वमें पश्चिमकी प्रतीति होने लगती है और वह अनुभवके विपरीत बुद्धि उस समय बिल्कुल स्थिर हो जाती है; परंतु विवेकरूपी पुरुष-प्रयत्नसे उस भ्रान्त बुद्धिका भी शीघ्र ही निवारण किया जा सकता है, उसी तरह मनको भी वैराग्यरूपी पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र ही जीता जा सकता है। मनमें उद्वेगका न होना राज्य आदि सम्पत्तिका मूल कारण है। उद्वेग या उकताहट न होनेसे ही जीवको अपने मनपर विजय प्राप्त होती है, जिससे तीनों लोकोंपर विजय पाना तृणके समान सहज हो जाता है। जो नराधम अपने मनके निग्रहमें भी समर्थ
* यह बात मनोनिग्रहकी प्रशंसाके लिये कही गयी है। गुरुके उपदेश और शास्त्रके अभ्यासको व्यर्थ बताना इसका उद्देश्य नहीं है। सद्गुरुके उपदेश और शास्त्रार्थ-चिन्तन कभी व्यर्थ नहीं जाते।
२०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं हैं, वे व्यवहार-दशाओंमें व्यवहारका निर्वाह कैसे कर सकेंगे। मैं पुरुष हूँ, मरा हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ और जी रहा हूँ इत्यादि कुदृष्टियाँ चञ्चल चित्तकी वृत्तियों ही प्रतीत होती हैं, जो बिना हुए ही प्रकट हुई हैं। यहाँ न तो किसीकी मृत्यु होती है और न कोई जन्म ही लेता है। मन स्वयं ही अपने मरणका तथा लोकान्तर-गमनका सङ्कल्पमात्रसे अनुभव करता है। जो नित्य सत्, सबका हितकारी, मायामयी मलिनतासे रहित और सर्व-व्यापी परमात्मा हैं, उनमें चित्तका लय हुए बिना मुक्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। इस बातका ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंमें रहनेवाले तत्त्वदर्शी विद्वानोंने बारंबार विचार किया है और सब-के-सब इसी निश्चयपर पहुँचे हैं कि चित्तकी शान्तिके सिवा मुक्तिका दूसरा कोई उपाय है ही नहीं। ऋत, सत्य, व्यापक और निर्मल ज्ञानका हृदयमें उदय होनेपर मनके लय होनेमात्रसे परम शान्ति प्राप्त हो जाती है। यदि आपातरमणीय विषयोंको तुम-जैसे विद्वानूने अरमणीय वस्तुओंकी कोटिमें समझ लिया है, तब तो मेरा विश्वास है कि तुमने चित्तके सारे अङ्ग काट डाले हैं। यह सामने दिखायी देनेवाला जो वह ( पितासे उत्पन्न ) शरीर है, वह मैं हूँ और यह जो घर, खेत आदि धन है, यह सब मेरा है। यह 'मैं' और 'मेरा' ही मन है। यदि यह मैं और-मेरेपनकी भावना न की जाय तो उससे मन उसी तरह कट जाता है, जैसे हँसियासे तृण। जैसे शरद् ऋतुमें आकाशमें बिखरे हुए बादलोंके टुकड़े वायुद्वारा उड़ा दिये जाते हैं, उसी प्रकार मैं और मेरेपनकी कल्पना या भावना न करनेसे मन भी उड़ा दिया जाता है—नष्ट कर दिया जाता है। इसलिये कोई विज्ञ पुरुष जैसे अपने बालक पुत्रको अच्छे कर्ममें लगाता है, उसी तरह विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको कल्याणमें लगाये। जिसका नाश होना कठिन है तथा जो नूतन या बालक न होकर सयाना और दर्पसे भरा हुआ है, उस मनरूपी सिंहको, जो संसारका विस्तार करनेवाला है, जो लोग मार डालते हैं, वे निर्वाणपदका उपदेश देनेवाले महात्माजन इस संसारमें धन्य हैं। उनकी सदा ही विजय होती है। भले ही प्रलयकालके प्रचण्ड पवन प्रवाहित हों, चारों समुद्र एकमें मिलकर एकार्णव हो जायें और बारहों सूर्य एक साथ तपने लगें; परंतु जिसका मन शान्त हो गया है, उस पुरुषकी कभी कोई हानि नहीं होती।
(सर्ग १११)
मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा
श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे बर्फका रूप शीतलता और काजलका रूप कालिमा है, उसी प्रकार मनका रूप अत्यन्त चञ्चलता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! इस अत्यन्त चञ्चल मनके तीव्र वेग या चपलताका बलपूर्वक निवारण कैसे हो सकता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में कहीं भी चपलतासे रहित मन नहीं देखा जाता। जैसे उष्णता अग्निका धर्म है, वैसे ही चञ्चलता मनका। चेतन तत्त्वमें जो यह चञ्चल क्रियाशक्ति विद्यमान है, उसीको तुम जगत्का आडम्बररूप मानसी शक्ति समझो। जैसे स्पन्दन और अस्पन्दनके बिना वायुके अस्तित्वका पता ही नहीं चलता, वैसे ही चञ्चल स्पन्दन ( चेष्टा ) के बिना चित्तका अस्तित्व ही नहीं है। जो मन चञ्चलतासे रहित है, वही मरा हुआ कहलाता है। वही तप है और वही शास्त्रका सिद्धान्तभूत मोक्ष कहलाता है। मनके विनाशमात्रसे सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्ति हो जाती है और मनके संकल्पमात्रसे परम दुःखकी प्राप्ति होती है।
उत्पत्ति प्रकरण] * मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा * २०३
श्रीराम ! मनकी जो यह चपलता है, वह अविद्यासे उत्पन्न होनेके कारण अविद्या कही जाती है। उस अविद्याका ही दूसरा नाम वासनापद है। उसका विचारके द्वारा नाश कर देना चाहिये। विषय-चिन्तनका त्याग कर देनेसे अविद्या और वासनामयी उस चित्त-सत्ताका अन्तःकरणमें लय हो जाता है और ऐसा होनेसे परम श्रेय (मोक्ष-सुख) की प्राप्ति होती है। पौरुष-प्रयत्नके द्वारा मनको जिस वस्तुमें भी लगाया जाता है, उसीको प्राप्त होकर वह अभ्यासवश तद्रूप हो जाता है।
जो संसार-सागरके वेगमें पड़कर तृणारूपी ग्राहकी दाढ़ोंमें फँस गये हैं और भ्रमरूपी आवर्तोंद्वारा दूर बहाये जा रहे हैं, उनके वहाँसे पार जानेके लिये अपना जीता हुआ मन ही नौकारूप है। जिसने परम बन्धनकारी मनरूपी पाशके अपने (जीते हुए) मनके द्वारा ही काटकर आत्माका उद्धार नहीं कर लिया, उसे दूसरा कोई बन्धनसे नहीं छुड़ा सकता। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि हृदयको वासित करनेवाली जो-जो वासना, जिसका दूसरा नाम मन है, उदित होती है उस-उसका परित्याग करे—उसे मिथ्या समझकर छोड़ दे। इससे (वासनात्मक मनके साथ ही) अविद्याका क्षय हो जाता है। भावनाकी भावना न करना ही वासनाका क्षय है। इसीको मनका नाश एवं अविद्याका नाश भी कहते हैं।
रघुनन्दन ! भ्रमसे दो चन्द्रमाओंकी प्रतीतिके समान यह वासना नित्य असत्य होती हुई ही सत्यके समान उठ खड़ी हुई है। इसलिये इसका त्याग कर देना ही उचित है। यहाँपर तत्त्व (अद्वितीय परब्रह्म) के सिवा न कोई सद् वस्तु है न असद् वस्तु। जैसे तरङ्ग-मालाओंसे परिपूर्ण विशाल महासागरमें जलराशिके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है (उसी तरह संसारमें ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भाव या अभावरूप पदार्थ नहीं है)। यदि कर्मका फल सत्य हो तो कर्म उपादेय (ग्राह्य) होना चाहिये और यदि उसका फल मिथ्या हो तो वह कर्म सर्वथा हेय (त्याज्य) ही होना चाहिये, क्योंकि सब लोग एकमात्र उपादेय वस्तुमें ही आसक्त होते हैं। चूँकि कर्मका फल मिथ्या है, अतः उसमें आसक्त न होना ही उचित है। इन्द्रजालके समान यहाँ सब कुछ मायामय और अवास्तविक है; फिर उसमें क्या आस्था हो सकती है—कैसे हेय और उपादेय दृष्टियाँ हो सकती हैं। रघुकुलतिलक श्रीराम ! संसार-वृक्षकी बीज कणिकारूप जो यह अविद्या है, इसका अस्तित्व नहीं है, तो भी यह सत्तायुक्त वस्तुकी भाँति विस्तारको प्राप्त हुई है।
यह अविद्या मनोराज्यकी भाँति केवल कल्पित आकृति-मात्रसे भासित होती है। सत्यताका इसमें सर्वथा अभाव है। यद्यपि यह सैकड़ों, हजारों शाखाओंसे युक्त जान पड़ती है, तथापि वास्तवमें कुछ भी नहीं है। यह जंगलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति मिथ्या ही है, तो भी इसने व्यर्थ ही आडम्बर फैला रखा है। जैसे मृगतृष्णा उन भोले-भाले मृगोंको ही धोखेमें डालती है—मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार यह अविद्या अज्ञ पुरुषोंको ही धोखा देती है, विज्ञ पुरुषोंको नहीं। जैसे प्रलयकालकी आँधी भीषण रूप धारणकर धूलराशिसे व्याप्त हो बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त कर लेती है, उसी प्रकार अविद्या भी भयंकर आकार धारणकर विचरती है। रजोगुणके आधिक्यसे वह धूसर जान पड़ती है और हठात् लोक-लोकान्तरोंको पददलित कर देती है। जैसे आकाशमें अकारण ही नीलिमा दिखायी देती है, उसी प्रकार यह अविद्या भी किसी कारणके बिना ही प्रतीतिका विषय होती है। दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति इसकी उत्पत्ति हुई है। यह स्वप्नके समान भ्रम उत्पन्न करती है और जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले लोगोंको तटवर्ती ठूँठ काठमें भी गतिशीलताकी प्रतीति होती है, वैसे ही यहाँ इस अविद्याका उत्थान हुआ है।