संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
२१० * अविच्छिन्नमचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
जाता है; इसलिये इसे 'तनुमानसा' कहते हैं।*
| भूमिकात्रितयाभ्यासाच्चित्तेऽर्थे विरतेर्वशात्।<br>सत्यात्मनि स्थितिः शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृताः ॥ | 'ऊपर बतायी हुई शुभेच्छा—श्रवण, विचारणा—मनन और तनुमानसा—निदिध्यासन भूमिकाओंके अभ्याससे चित्तके सांसारिक विषयोंसे अत्यन्त विरक्त हो जानेके |
जरा और रोग आदिरूपमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना; पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव; ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना; मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्धदेशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना, अध्यात्मज्ञानमें नित्य-स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है—यों कहा गया है।
दूसरी भूमिकामें परिपक्व हो जानेपर उस साधकमें उपर्युक्त गुण और आचरण आने लगते हैं।
ऊपर प्रथम भूमिकामें बताये हुए महावाक्योंका निरन्तर मनन और चिन्तन करना ही प्रधान होनेके कारण इस दूसरी भूमिकाको 'विचारणा' कहा गया है, अतः इसे 'मनन' भूमिका भी कहा जा सकता है।
* अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त कामना, आसक्ति और ममताके अभावसे, सत्पुरुषोंके सङ्ग और सत्-शास्त्रोंके अभ्याससे तथा विवेक-वैराग्यपूर्वक निदिध्यासन—ध्यानके साधनसे साधककी बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है तथा उसका मन शुद्ध, निर्मल, सूक्ष्म और एकाग्र हो जाता है, जिससे उसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मतत्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता अनायास ही प्राप्त हो जाती है। इसीको 'तनुमानसा' भूमिका कहा गया है।
इस तीसरी भूमिकामें स्थित साधकके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण अवगुणोंका अभाव होकर स्वाभाविक ही अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनसूया (दोषदृष्टिका अभाव), अमानिता, निष्कपटता, पवित्रता, संतोष, शम, दम, समाधान तेज, क्षमा, दया, धैर्य, अद्रोह, निर्भयता, निरहंकारता, शान्ति, समता आदि सद्गुणोंका आविर्भाव हो जाता है। फिर उसके द्वारा जो भी चेष्टा होती है, वह सब सदाचाररूप ही होती है तथा उस साधकको 'संसारके सम्पूर्ण पदार्थ मायाके कार्य होनेसे सर्वथा अनित्य हैं और एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सर्वत्र समभावसे परिपूर्ण हैं' ऐसा दृढ़ निश्चय होकर शरीरसहित संसारके सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मोंमें उसकी वासनाका भी अभाव हो जाता है। भाव यह है कि उसके अन्तःकरणमें उनके चित्र संस्काररूपसे भी नहीं रहते एवं शरीरमें अहम्भाव तथा मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान नहीं रहता; क्योंकि वह परवैराग्यको प्राप्त हो जाता है। परवैराग्यका स्वरूप महर्षि पतञ्जलिने यों बतलाया है—
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् । (योगदर्शन १।१६)
'प्रकृतिसे अत्यन्त विलक्षण पुरुषके ज्ञानसे तीनों गुणोंमें जो तृष्णाका अत्यन्त अभाव हो जाता है, यह परवैराग्य या सर्वोत्तम वैराग्य है।'
पूर्वोक्त दूसरी भूमिकामें स्थित पुरुषकी तो विषयोंका विशेष संसर्ग होनेसे कदाचित् उनमें कुछ आसक्ति हो भी सकती है; परंतु इस तीसरी भूमिकामें पहुँचे हुए पुरुषकी तो विषयोंके साथ संसर्ग होनेपर भी उनमें आसक्ति नहीं होती; क्योंकि उसके निश्चयमें एक सच्चिदानन्दघन परमात्माके सिवा अन्य कोई वस्तु रहती ही नहीं। अतः परवैराग्य हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ सम्पूर्ण संसारसे अत्यन्त उपरत हो जाती हैं। यदि किसी कालमें कोई स्फुरणा हो भी जाती है, तो भी उसके संस्कार नहीं जमते; क्योंकि उसकी एक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें ही निरन्तर गाढ़ स्थिति बनी रहती है, जिसके कारण उसे कभी-कभी तो शरीर और संसारका विस्मरण होकर समाधि-सी हो जाती है। ये सब लक्षण परमात्माकी प्राप्तिके अत्यन्त निकट पहुँच जानेपर होते हैं।
सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते-करते उस परमात्मामें तन्मय हो जाना तथा अत्यन्त वैराग्य और उपरतिके कारण परमात्माके ध्यानमें ही नित्य स्थित रहनेसे मनका विशुद्ध होकर सूक्ष्म हो जाना ही 'तनुमानसा' नामकी
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद् विवेचन * २११
अनन्तर उसके प्रभावसे आत्माका शुद्ध तथा सत्यस्वरूप परमात्मामें तद्रूप हो जाना 'सत्त्वापत्ति' कहा गया है।'* तीसरी भूमिका है। अतः इसे 'निदिध्यासन' भूमिका भी कह सकते हैं।
ये तीनों भूमिकाएँ साधनरूपा हैं। इनमें संसारसे कुछ सम्बन्ध रहता है, अतः यहाँतक साधककी 'जाग्रत्-अवस्था' मानी गयी है।
* उपर्युक्त श्रवण, मनन और निदिध्यासनके तीव्र अभ्याससे जब साधक सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त हो जाता है, तब उसीको 'सत्त्वापत्ति' नामकी चौथी भूमिका कहते हैं। इसीको गीतामें निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति कहा गया है—
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्म निर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
(५। २४)
'जो पुरुष आत्मामें ही सुखी है, आत्मामें ही रमण करता है तथा जो आत्मामें ही ज्ञानवान् है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त—'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अनुभव करनेवाला ज्ञानयोगी शान्त ब्रह्मको प्राप्त होता है।'
जिस प्रकार गङ्गा-यमुना आदि सारी नदियाँ बहती हुईं अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें ही विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर परम दिव्य पुरुष परात्पर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है, उसीमें विलीन हो जाता है—
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
(मुण्डकोपनिषद् ३।२।८)
गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
(१८। ५४-५५)
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस प्रकारके अनुभवसे सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित प्रसन्न मनवाला ज्ञानयोगी न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी पराभक्ति (ज्ञान-निष्ठा) को प्राप्त हो जाता है। उस ज्ञाननिष्ठारूप पराभक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है तथा उस ज्ञान-निष्ठासे मुझको तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।'
जब साधकको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ब्रह्म ही हो जाता है—
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति। (मुण्डकोपनिषद् ३।२।९)
फिर उसका इस शरीर और संसारसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। ब्रह्मवेत्ता पुरुषके अन्तःकरणमें शरीर और अन्तःकरणके सहित यह संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है जैसे स्वप्नसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नकी घटनाको मनकी कल्पनामात्र समझता है, वैसे ही उस ब्रह्मवेत्ताके अन्तःकरणमें यह संसार कल्पनामात्र प्रतीत होता है अर्थात् इस संसारकी काल्पनिक सत्ता प्रतीत होती है। स्वप्नमें और इसमें इतना ही अन्तर है कि स्वप्नका समय तो भूतकाल है और संसारकी स्वप्नवत् प्रतीतिका समय वर्तमानकाल है, तथा स्वप्नमें तो जो मन-बुद्धि थे, वे वर्तमानमें भी इस जीवात्माके साथ सम्बन्धित हैं किंतु जब मनुष्य ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, तब उसके मन-बुद्धि इस शरीरमें ही रह जाते हैं, उस ब्रह्मवेत्ताके साथ ब्रह्ममें सम्बन्धित नहीं होते, इसलिये ब्रह्मकी दृष्टिसे इस संसारका अत्यन्त अभाव है।
वास्तवमें तो ब्रह्मके कोई दृष्टि ही नहीं है, केवल समझानेके लिये उसमें दृष्टिका आरोप किया जाता है। ब्रह्मकी दृष्टिमें तो केवल एक ब्रह्म ही है; उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं। ब्रह्मवेत्ताके शरीरका जो अन्तःकरण है, उसमें इस संसारका अत्यन्त अभाव और सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका भाव प्रत्यक्ष है—यह ब्रह्मवेत्ताका अनुभव है। इसी अनुभवके बलपर शास्त्रोंमें यह कहा गया है कि एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके सिवा अन्य कुछ भी नहीं है।
२१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जो ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, वह ब्रह्म ही बन जाता है। श्रुतिमें भी कहा गया है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' ( बृहदारण्यक० ४ । ४ । ६ )—'वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।' इसलिये वह लौटकर नहीं आता। श्रुति कहती है— न च पुनरावर्तते । न च पुनरावर्तते । ( छान्दोग्य० ८ । १५ । १ ) 'फिर वह कभी नहीं लौटता, फिर वह कभी नहीं लौटता।' जब ब्रह्मकी दृष्टिमें सृष्टिका अत्यन्त अभाव है, तब ब्रह्म ही हो जानेपर लौटकर कौन कैसे कहाँ आये। गीतामें भी बतलाया गया है— तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ 'जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्तिको अर्थात् पुनः न लौटनेवाली परमगतिको प्राप्त होते हैं।'
भाव यह कि उसका मन तद्रूप—ब्रह्मरूप हो जाता है। पूर्ण आनन्द, अपार आनन्द, शान्त आनन्द, घन आनन्द, अचल आनन्द, ध्रुव आनन्द, नित्य आनन्द, बोधस्वरूप आनन्द, ज्ञानस्वरूप आनन्द, परम आनन्द, महान् आनन्द, एक आनन्द-ही-आनन्द परिपूर्ण है; एक आनन्दके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है—इस प्रकार ब्रह्मके स्वरूपका मनन करते-करते जब मन तन्मय—ब्रह्ममय हो जाता है, तब उसको 'तदात्मा' कहते हैं।
उपर्युक्त प्रकारके विशेषणोंसे विभूषित ब्रह्मका मनन करते-करते जब मन ब्रह्ममें विलीन हो जाता है और उन विशेषणों-की आवृत्तिके प्रभावसे ब्रह्मके विशेष स्वरूपका बुद्धिमें अनुभव हो जाता है, तब बुद्धिके द्वारा अनुमान किये हुए उस ब्रह्मके विशेष स्वरूपको लक्ष्य बनाकर जीवात्मा उस ब्रह्मका ध्यान करता है। यहाँ ब्रह्म तो ध्येय है, ध्यान करनेवाला साधक ध्याता है और बुद्धिकी वृत्ति ही ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करते-करते जब बुद्धि उस ब्रह्ममें विलीन हो जाती है, तब उसे 'तद्बुद्धि' कहते हैं। इसके पश्चात् जब ध्याता, ध्यान और ध्येयरूप त्रिपुटी न रहकर साधककी ब्रह्मके स्वरूपमें अभिन्न स्थिति हो जाती है, तब उसे 'तन्निष्ठ' कहते हैं। इसमें ब्रह्मका नाम, रूप और ज्ञान रहता है; इसलिये यह प्रारम्भिक 'सविकल्प समाधि' है। इसीको सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। महर्षि पतञ्जलिने बतलाया है— तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः। ( योगदर्शन १ । ४२ ) 'उसमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे मिली हुई समाधि सवितर्क है।'
इस प्रकार सविकल्प समाधि होनेके बाद जब स्वतः ही साधककी निर्विकल्प समाधि हो जाती है, तब ब्रह्मका नाम ( शब्द ), रूप ( अर्थ ) और ज्ञान—ये तीनों विकल्प भिन्न-भिन्न नहीं रह जाते, एक अर्थमात्र वस्तु—ब्रह्मका स्वरूप ही रह जाता है। इसीको निर्वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। महर्षि पतञ्जलिने कहा है— स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। ( योगदर्शन १ । ४३ ) '( शब्द और प्रतीतिकी ) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर अपने रूपसे शून्य हुईके सदृश केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली ( अन्तःकरणकी स्थिति ही ) निर्वितर्क समाधि है।'
इसमें साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही बन जाता है। अतः उसको 'तत्परायण' कहते हैं। इस निर्विकल्प समाधिका फल जो निर्बीज असम्प्रज्ञात योग है, वही वास्तवमें ब्रह्मकी प्राप्ति है; उसीको यहाँ गीतामें अपुनरावृत्ति कहा गया है। क्योंकि ब्रह्मज्ञानके द्वारा जिसके मल, विक्षेप और आवरणरूप कल्मषका नाश हो गया है, वह ब्रह्मको प्राप्त पुरुष ब्रह्म ही हो जाता है; वह लौटकर नहीं आता।
यही 'सत्त्वापत्ति' नामकी चौथी भूमिका है। इसमें पहुँचे हुए पुरुषको ब्रह्मवित्—ब्रह्मवेत्ता कहा जाता है। इसमें संसार उस ज्ञानी महात्माके अन्तःकरणमें स्वप्नवत् भासित होता है, इसलिये यह उसके अन्तःकरणकी 'स्वप्नावस्था' मानी जाती है।
श्रीयाज्ञवल्क्यजी, राजा अश्वपति और जनक आदि इस चौथी भूमिकामें पहुँचे हुए माने गये हैं।
यहाँ योगवासिष्ठमें जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त पुरुषकी चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं भूमिकाके रूपमें चार भेद बतलाये गये हैं, इस प्रकारके भेद गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंमें नहीं पाये जाते।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद् विवेचन * २१३
दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसङ्गफलेन च।
रूढसत्त्वचमत्कारात् प्रोक्तासंसक्तिनामिका ॥
'शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति—इन चारोंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक अभ्याससे चित्तके बाह्याभ्यन्तर सभी विषय-संस्कारोंसे अत्यन्त असङ्ग (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जानेपर अन्तःकरणका समाधिमें आरूढ—स्थिर हो जाना ही 'असंसक्ति' नामकी पाँचवीं भूमिका कहा गया है।' *
भूमिकापञ्चकाभ्यासात् स्वात्मारामतया दृढम्।
आभ्यन्तराणां बाह्यानां पदार्थानामभावनात् ॥
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनार्थभावनात् ।
पदार्थाभावनामाख्या षष्ठी संजायते गतिः ॥
'उपर्युक्त पाँचों भूमिकाओंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक अभ्याससे उस ज्ञानी महात्माकी आत्मारामताके प्रभावसे उसके अन्तःकरणमें संसारके पदार्थोंका अत्यन्त अभाव-सा हो जाता है, जिससे उसे बाहर-भीतरके किसी भी पदार्थका स्वयं भान नहीं होता, दूसरोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक चिरकालतक प्रेरणा करनेपर ही कभी किसी पदार्थका भान होता है; इसलिये उसके अन्तःकरणकी
परमात्माको प्राप्त पुरुषके लक्षण तो गीतामें जगह-जगह आते हैं, किंतु उसके इस प्रकारके अलग-अलग भेद नहीं बताये गये हैं। वास्तवमें ब्रह्मकी प्राप्ति होनेके पश्चात् ज्ञानी महात्मा पुरुषका शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, क्योंकि वह देहाभिमानसे सर्वथा रहित होकर ब्रह्ममें तल्लीन हो जाता है। अतः यहाँ योगवासिष्ठमें बतलाये गये उन भेदोंको ब्रह्मप्राप्त पुरुषके भेद न समझकर उसके अन्तःकरणके भेद समझने चाहिये।
* परम वैराग्य और परम उपरतिके कारण उस ब्रह्मप्राप्त ज्ञानी महात्माका इस संसार और शरीरसे अत्यन्त सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, इसलिये इस पाँचवीं भूमिकाको असंसक्ति कहा गया है।
ऐसे पुरुषका संसारसे कोई भी प्रयोजन नहीं रहता। अतः वह कर्म करने या न करनेके लिये बाध्य नहीं है। गीतामें भगवान्ने कहा है—
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
( ३ । १८ )
'उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेमें ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।'
फिर भी उस ज्ञानी महात्मा पुरुषके सम्पूर्ण कर्म शास्त्रसम्मत और कामना एव संकल्पसे शून्य होते हैं। इस प्रकार जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं—
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
( गीता ४ । १९ )
अतः ऐसे पुरुषको उसके सम्मानके लिये 'ब्रह्मविद्वर' कहा जा सकता है। ऐसा महापुरुष जब समाधि-अवस्थामें रहता है, तब तो उसे सुषुप्ति अवस्थाकी भाँति संसारका बिल्कुल भान नहीं रहता और व्युत्थान अवस्थामें—व्यवहार-कालमें उसके द्वारा पूर्वके अभ्याससे सत्ता, आसक्ति, कामना, संकल्प और कर्तृत्वाभिमानके बिना ही सारे कर्म होते रहते हैं। उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे शास्त्रविहित ही होते हैं। उसकी कभी समाधि-अवस्था रहती है और कभी व्युत्थानावस्था, उसकी किसी दूसरेके प्रयत्नके बिना स्वतः ही व्युत्थानावस्था हो जाती है। किंतु वास्तवमें संसारके अभावका निश्चय होनेके कारण उसकी व्युत्थानावस्था भी समाधिके तुल्य ही होती है, इस कारण उसकी इस अवस्थाको 'सुषुप्ति-अवस्था' भी कहते हैं।
श्रीजडभरतजी इस पाँचवीं भूमिकामें स्थित माने जा सकते हैं।
२१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
'पदार्थाभावना' नामकी छठी भूमिका' हो जाती है।'*
भूमिषट्कचिराभ्यासाद् भेदस्यानुपलम्भतः ।
यत्स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥
'उपर्युक्त छहों भूमिकाओंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक चिरकालतक अभ्यास होनेसे जिस अवस्थामें दूसरोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक प्रेरित करनेपर भी भेदरूप संसारकी सत्ता-स्फूर्तिकी उपलब्धि नहीं होती, वरं अपने आत्मभावमें स्वाभाविक निष्ठा रहती है, उस स्थितिको उसके अन्तःकरणकी 'तुर्यगा' भूमिका जानना चाहिये।'†
यह तुर्यावस्था जीवन्मुक्त पुरुषोंमें इस शरीरमें रहते हुए ही विद्यमान रहती है। इस देहका अन्त होनेपर विदेह-मुक्तिका विषय साक्षात् तुर्यातीत ब्रह्म ही है (अतः भूमिकाओंमें उसकी गणना नहीं है)। श्रीराम ! जो महाभाग सातवीं भूमिकामें पहुँच गये हैं, वे आत्माराम महात्मा महद्-पद (परब्रह्म) को प्राप्त हो चुके हैं। जीवन्मुक्त पुरुष सुख-दुःखमें आसक्त नहीं होते। केवल देहयात्राके लिये छठी भूमिकामें कुछ कार्य करते हैं, अथवा सातवीं भूमिकामें नहीं भी करते। पूर्वोक्त महात्मा पार्श्ववर्ती पुरुषोंद्वारा बोधित होकर उन-उन आश्रमोंमें स्थित पुरुषोंकी आचार-परम्परासे प्राप्त सम्पूर्ण सदाचारोंका ही सावधानीकी भाँति पालन करते हैं। उनका वह आचार फलकी कामना और आसक्ति नामक दोषोंसे रहित होता है। वे अपने आत्मामें ही रमण
* पाँचवीं भूमिकाके पश्चात् जब वह ब्रह्मप्राप्त पुरुष छठी भूमिकामें प्रवेश करता है, तब उसकी नित्य समाधि रहती है; इसके कारण उसके द्वारा कोई भी क्रिया नहीं होती। उसके अन्तःकरणमें शरीर और संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंका अत्यन्त अभाव-सा हो जाता है। उसे संसारका और शरीरके बाहर-भीतरका बिल्कुल ज्ञान नहीं रहता, केवल श्वास आते-जाते हैं; इसलिये इस भूमिकाको 'पदार्थाभावना' कहते हैं। जैसे गाढ सुषुप्तिमें स्थित पुरुषको बाहर-भीतरके पदार्थोंका ज्ञान बिल्कुल नहीं रहता, वैसे ही इसको भी ज्ञान नहीं रहता। अतः उस पुरुषकी इस अवस्थाको 'गाढ सुषुप्ति अवस्था' भी कहा जा सकता है। किंतु गाढ सुषुप्तिमें स्थित पुरुषके तो मन-बुद्धि अज्ञानके कारण अपने कारण मायामें विलीन हो जाते हैं, अतः उसकी स्थिति तमोगुणमयी है; पर इस ज्ञानी महापुरुषके मन-बुद्धि ब्रह्ममें तद्रूप हो जाते हैं (गीता ५। १७), अतः इसकी अवस्था गुणातीत है। इसलिये यह गाढ सुषुप्तिसे अत्यन्त विलक्षण है।
गाढ़ सुषुप्तिमें स्थित पुरुष तो निद्राके परिपक्व हो जानेपर स्वतः ही जाग जाता है; किंतु इस समाधिस्थ ज्ञानी महात्मा पुरुषकी व्युत्थानावस्था तो दूसरोंके बारंबार प्रयत्न करनेपर ही होती है, अपने-आप नहीं। उस व्युत्थानावस्थामें वह जिज्ञासुके प्रश्न करनेपर पूर्वके अभ्यासके कारण ब्रह्मविषयक तत्त्व-रहस्यको बतला सकता है। इसी कारण ऐसे पुरुषको 'ब्रह्मविद्वरीयान्' कहते हैं।
श्रीमदृषभदेवजी इस छठी भूमिकामें स्थित माने जा सकते हैं।
† छठी भूमिकाके पश्चात् सातवीं भूमिका स्वतः ही हो जाती है। उस ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महात्मा पुरुषके हृदयमें संसारका और शरीरके बाहर-भीतरके लौकिक ज्ञानका अत्यन्त अभाव हो जाता है। क्योंकि उसके मन-बुद्धि ब्रह्ममें तद्रूप हो जाते हैं, इस कारण उसकी व्युत्थानावस्था तो न स्वतः होती है और न दूसरोंके द्वारा प्रयत्न किये जानेपर ही होती है। जैसे मुर्दा जगानेपर भी नहीं जाग सकता, वैसे ही यह मुर्देकी भाँति हो जाता है; अन्तर इतना ही रहता है कि मुर्देमें प्राण नहीं रहते और इसमें प्राण रहते हैं तथा यह श्वास लेता रहता है। ऐसे पुरुषका संसारमें जीवन-निर्वाह दूसरे लोगोंके द्वारा केवल उसके प्रारब्धके संस्कारोंके कारण ही होता रहता है। वह प्रकृति और उसके कार्य सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंसे और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे अतीत होकर ब्रह्ममें विलीन रहता है; इसलिये यह उसके अन्तःकरणकी अवस्था 'तुर्यगा' भूमिका कही जाती है।
ब्रह्मकी दृष्टिमें संसारका अत्यन्त अभाव है। उपर्युक्त महात्मा पुरुष उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको नित्य ही प्राप्त है। अतः उसके मन-बुद्धिमें भी शरीर और संसारका अत्यन्त अभाव है। इसलिये ऐसे पुरुषको ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहते हैं।
ऐसे ही ब्रह्मविद्वरिष्ठ महापुरुषसे वार्तालाप न होनेपर भी उसके दर्शन और चिन्तनसे ही मनुष्यके चित्तमें मल, विक्षेप और आवरणका नाश होनेसे उसकी वृत्ति परमात्माकी ओर आकृष्ट होनेपर उसका कल्याण हो सकता है।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण * २१५
करनेके कारण बाह्य विषयोंसे विरत होते हैं। अत उन्हें जगत्के व्यवहार उसी तरह सुख नहीं दे पाते, जैसे गाढ नींदमें सोये हुए पुरुषोंको दर्शनीय रूप- सौन्दर्यसे सुशोभित स्त्रियाँ नहीं सुख दे सकतीं। ज्ञानकी ये सात भूमिकाएँ विवेकी पुरुषोंको ही प्राप्त होती हैं। इस ज्ञानदशाको प्राप्त हुए पशु (हनुमान् और नन्दी), अन्त्यज (मूक चाण्डाल, धर्मव्याध, गुह, भील और शबरी) आदि भी सदेह (जीवन्मुक्त) अथवा विदेहमुक्त ही हैं--इसमें संशय नहीं है। चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद ही ज्ञान है। उसके प्राप्त होनेपर मुक्ति हो जाती। क्योंकि मृगतृष्णामें जलबुद्धि अथवा रज्जुमें सर्पबुद्धि आदिका जो बाध है, वैसा ही चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद भी है। कुछ लोग एक ही जन्ममें क्रमशः ज्ञानकी सारी भूमिकाओंको प्राप्त हो जाते हैं। कोई कोई एक, दो या तीन भूमिकाओंतक ही पहुँच पाते हैं। कोई छ भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई एकमात्र सातवीं भूमिकामें ही स्थित रहते हैं। कोई तीन भूमिकाओंतक जाते हैं। कोई अन्तिम भूमिकामें पहुँच जाते हैं। कोई चार भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई दो भूमिकाओंमें स्थित होते हैं। कोई ज्ञानभूमिकाके एक अंशतक ही पहुँच पाते हैं। कोई साढ़े तीन, कोई साढ़े चार और कोई साढ़े छः भूमिकाओंतक पहुँच जाते हैं। जो उन भूमिकाओंमें पहुँचकर उत्तरोत्तर उत्कृष्ट स्थानोंपर विजय पाते जाते हैं, वे महात्मा निश्चय ही वन्दनीय हैं। उन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली है। उस चतुर्थ ज्ञानभूमिका (जीवन्मुक्तावस्था) में पहुँच जानेपर सम्राट् (भूमण्डल- का राजा) और विराट् (देवलोकका राजा) भी तिनकेके समान तुच्छ प्रतीत होता है; क्योंकि वे ज्ञानी महात्मा उस अवस्थामें परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। (सर्ग ११८)
मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! जैसे मृगतृष्णाके जलमें, दो चन्द्रमाओंके भ्रममें और शरीर आदिकी अहंतामें मायासे जो रूप परिलक्षित होता है, वह विचारपूर्वक देखनेपर दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार सुवर्णमें जो कड़े, कुण्डल, अँगूठी आदिका भाव है, वह केवल भ्रान्ति है। वह असत् स्वरूपवाली माया है; क्योंकि उसका वह रूप ही ऐसा है, जो ज्ञानदृष्टिसे देखनेपर कायम नहीं रहता। असद्वस्तु तो सीपमें चाँदी और मरुस्थलमें जलकी भ्रान्तिके समान विचारहीनताके कारण ही सत्-सी प्रतीत होती है। असत् शरीरमें जो अहंताकी भावना है, वही परमा अविद्या है, वही माया है और वही संसृति है। जैसे सुवर्णमें अँगूठीपना आदि वास्तवमें कल्पित हैं, उसी तरह आत्मामें अहंता आदिकी भावना भी कल्पित है। इस प्रकार जो स्वच्छ, शान्त एवं निर्मल है, उस परमो- त्कृष्ट आत्मामें अहंताकी भावना असत् है। वह शुद्ध आत्मा मेरुता, असुरता, मनपना, देहता और महाभूततासे रहित है। उसमें तीनों कालोंकी कल्पना और भावाभाव वस्तुका अभाव है। स्वता, अहंता, आत्मता, तत्ता, सत्ता, असत्ता आदिसे भी वह रहित है। उसमें न कहीं भेदकी कल्पना है, न राग और रञ्जन ही है; क्योंकि ये सब मायामात्र हैं। वह तो सर्वात्मक, शान्त, आश्रयरहित, जगत्का कारण, शाश्वत, कल्याणमय, निर्विकार, इन्द्रियों- द्वारा अग्राह्य तथा नाम एवं कारणरहित ब्रह्म है।
रघुनन्दन ! वासनायुक्त चित्त जिस वस्तुकी पर्याप्त- रूपमें जैसी भावना करता है, वह वस्तु चाहे सत् हो अथवा असत्, उसको उसी समय उसी रूपमें प्रतीत होने
२१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लगती है; क्योंकि अहंता आदि भावोंसे युक्त अविद्याका ज्यों ही अभ्युदय हुआ, त्यों ही आदि, मध्य और अन्तसे रहित अनन्त अंगोंका ताँता लग जाता है। जैसे बहुत-से व्यक्तियोंके मनःकलित वचन बहुधा एक-से होते हैं, उसी तरह स्वप्नमें भी देश, काल और क्रिया भी एक-से दीख पड़ते हैं। परंतु उस व्यवहारकी सत्ता अज्ञानसे ही प्रतीत होती है। वास्तवमें तो चेतन सत्ताके अतिरिक्त सम्पूर्ण पदार्थोंकी कोई अन्य सत्ता है ही नहीं। वह चेतन सत्ता भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंमें मौजूद रहती है और वही भिन्न-सी प्रतीत होती है—ठीक उसी तरह, जैसे समुद्रमें तरङ्ग और बीजमें वृक्ष भिन्न-से भासित होते हैं। और जैसे बालूमें तेल आदिका होना असम्भव है, वैसे ही अविद्या कोई वस्तु नहीं है। भला, सोनेके बने हुए कङ्कणमें स्वर्णताके अतिरिक्त दूसरी कौन वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कोई नहीं। अतः अविद्याके साथ आत्मतत्त्वका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता; क्योंकि यह तो अपने अनुभवसे स्पष्ट है कि सभीका अपने समानके साथ ही सम्बन्ध होता है। जब जगत्के सम्पूर्ण पदार्थ चिन्मात्रमय एवं सन्मात्रमय होते हैं, तब वे भाव परस्पर अपने अनुभवके बलपर प्रकाशित होते हैं। विषम पदार्थोंका निरन्तर साक्षात् सम्बन्ध होना असम्भव है और परस्पर सम्बन्ध हुए बिना आपसमें अनुभव भी नहीं हो सकता।
तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! वास्तवमें जैसे मिट्टीकी बनी हुई सेना मृद्बुद्धिसे देखनेपर विचित्र होनेपर भी विचार-दृष्टिसे एकमात्र मिट्टी ही है, तरङ्ग आदि एकमात्र जल ही हैं, काठकी बनी हुई पुतलियोंमें एकमात्र काष्ठ ही व्याप्त है और घट आदि केवल मिट्टी ही हैं, उसी प्रकार यह भ्रमसे प्रतीत होनेवाला जगत् एकमात्र ब्रह्म ही है। द्रष्टाका दृश्य और दर्शनके साथ सम्बन्ध होनेपर उसके मध्यमें जो उसका द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदिसे रहित शुद्ध रूप है, वही वह परब्रह्म है।
श्रीराम ! जैसे शिलामें जल और जलमें अग्नि नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मामें चित्त नहीं है; फिर वह परमात्मामें कहाँसे हो सकता है। विचारपूर्वक देखनेपर जो स्वयं ही कुछ नहीं है, उसके द्वारा जहाँ-कहीं जो कुछ किया जाता है, वह 'कृत' नहीं कहलाता। जो मूर्ख असत्य स्वरूपवाले चित्तका अनुवर्तन करते हैं, उन्हें धिक्कार है; क्योंकि वे केवल आकाश-ताडनरूपी कर्ममें व्यर्थ ही समय बितानेवाले हैं।
इस प्रकार भूतलपर पैदा हुए पुरुषको बुद्धिके कुछ भी विकसित होनेपर पहले सत्सङ्गपरायण होना चाहिये; क्योंकि अनवरत प्रवाहित होते हुए इस अविद्यारूपी नदियोंके समूहको शास्त्र एवं सज्जनोंके सम्पर्कके अतिरिक्त और किसी उपायसे पार नहीं किया जा सकता। उस सत्सङ्गद्वारा विवेककी प्राप्ति होनेसे पुरुषको 'यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है', ऐसा विचार उत्पन्न होता है। तब वह शुभेच्छा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। तदनन्तर विवेकवश विचारणा नामकी ज्ञानभूमिमें आता है। वहाँ यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे मिथ्या वासनाका परित्याग करनेवाले पुरुषका मन सांसारिक वासनाओंसे रहित हो तनुता (सूक्ष्मता) को प्राप्त होता है। इस कारण वह तनुमानसा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। फिर ज्यों ही योगी यथार्थ ज्ञानका उदय होनेसे परमात्मामें तद्रूप हो जाता है, त्यों ही उसे सत्त्वापत्ति नामकी ज्ञानभूमि प्राप्त होती है। तब वासनाका विनाश हो जानेके कारण वह 'अमंस्क' कहलाने लगता है और कर्मफलके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् वासनाओंका विनाश हो जानेके कारण स्वाभाविक अभ्यास-से जब वह कार्योंको करता हुआ अथवा उनसे विरत हुआ या संसारकी अनन्य वस्तुओंमें स्थित हुआ भी अपने आत्मामें ही मनके क्षीण हो जानेके कारण बाह्य वस्तुओंका व्यवहार करते हुए भी न तो उन्हें देखता है, न रुचि-पूर्वक उनका सेवन करता है और न स्मरण ही करता
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण * २१७
है, बल्कि अर्ध-सुप्त एवं अर्ध-प्रबुद्ध पुरुषकी भाँति केवल कर्तव्य-कर्मोंको करता रहता है, तब वह योगी पदार्थ-भावना नामकी योगभूमिको प्राप्त होता है। इस प्रकार जिसका चित्त ब्रह्ममें लीन हो गया है, वह योगी कुछ वर्षोंतक ऐसे स्वाभाविक अभ्याससे बाह्य पदार्थोंका व्यवहार करता हुआ भी जब उनकी भावनासे रहित हो स्वयं तुर्यात्मा हो जाता है, तब 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। जीवन्मुक्त पुरुष न तो प्राप्त हुई वस्तुका अभिनन्दन करता है न अप्राप्तके लिये चिन्ता। वह जो कुछ सामने उपस्थित हो जाता है, उसीका निश्शङ्क होकर अनुवर्तन करता है। रघुनन्दन ! तुम सम्पूर्ण कार्योंकी वासनासे रहित हो, इसलिये तुम सबके अंदर वर्तमान जानने योग्य सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें स्थित हो। अतः तुम चाहे संसारके कल्याणके लिये शास्त्रविहित कर्म करते रहो चाहे एकान्तमें ध्यान-समाधिमें स्थित रहो। श्रीराम ! आत्मा न तो प्रकट होता है न विलीन ही। जैसे घड़ेके फूटकर टुकड़े हो जानेपर घटाकाशका नाश नहीं होता, उसी प्रकार इस शरीरके नष्ट हो जानेपर भी आत्माका विनाश नहीं होता। अरे, यह आत्मा तो अद्वितीय है। फिर दूसरी कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसकी वह अभिलाषा करेगा ? राघव ! जगत्में श्रवण करने योग्य, स्पर्श करने योग्य, देखने योग्य, चखने योग्य और सूँघने योग्य कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो आत्मासे पृथक् हो। वह आत्मा सर्वशक्तिमान्, विस्तृत और व्यक्त है। वासनाक्षयरूप मनोनाश हो जानेपर इस मायाका, जिसमें संस्काररूपसे कर्म करते हैं, अत्यन्त अभाव हो जाता है। जबतक इस मायाका यथार्थ ज्ञान नहीं हो पाता, तभीतक यह बड़े-बड़े मोहोंमें डालती रहती है; किंतु जब यह माया बिना हुए ही प्रतीत हो रही है—इस प्रकारका इसका वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। यह ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुई है और संसारकी लीला करके ब्रह्ममें ही विलीन हो जाती है।
रघुकुलभूषण राम ! जैसे तेजसे सभी प्रकाश आविर्भूत होते हैं, उसी तरह कल्याणमय, रूपरहित, अप्रमेय और विशुद्ध ब्रह्मसे सभी प्राणी उत्पन्न हुए हैं। जैसे पत्तेमें उसकी नसें, जलमें तरङ्गसमूह, सुवर्णमें कटक-कुण्डल आदि और अग्निमें उष्णता आदि व्याप्त हैं, उसी प्रकार यह त्रिलोकी उस ब्रह्ममें ही स्थित है, उसीसे उत्पन्न हुई है और उसीमें विलीन हो जाती है। वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है और वही ब्रह्म कहा जाता है; उसका ज्ञान हो जानेपर इस मिथ्या जगत्का यथार्थ ज्ञान हो जाता है। श्रीराम ! देहके नष्ट होनेपर जीवात्माका नाश नहीं होता। जो चिन्मय जीवात्मा मनसे अतीत होनेके कारण आकाशकी भाँति अव्यक्त है, वह जड़ सुखों अथवा दुःखोंसे व्याप्त कैसे हो सकता है। उस चिदात्मामें, जो सबका साक्षी, सर्वत्र सम, निर्मल और निर्विकल्प है, ये सभी जगत् किसी प्रकारकी इच्छाके बिना ही उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होते हैं, जैसे दर्पणमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब। संकल्पोंके पूर्णरूपसे क्षय हो जानेके कारण जब चित्त विलीन हो जाता है, तब सांसारिक मोहरूपी तुषार नष्ट हो जाता है। उस समय शरद्ऋतुके आनेपर स्वच्छ आकाशकी तरह चिन्मय शुद्ध आत्मा ही अद्वितीय, अजन्मा, आद्य एवं अनन्तरूपसे विभासित होता है। जैसे महासागरमें जल-लहरियाँ उत्पन्न होती हैं, दीखती हैं और तुरंत ही विलीन हो जाती हैं, उसी तरह यह मिथ्या मन स्वयं अपने अधिष्ठानभूत चेतनकी स्फुरणासे युक्त होकर सद्-सा दिखायी देता है और साक्षीभूत चेतनमें बारंबार उत्पन्न होकर विलीन होता रहता है।
( सर्ग ११९—१२२ )
उत्पत्ति-प्रकरण सम्पूर्ण ॥
२१८
स्थिति-प्रकरण
चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, जगत्की स्थितिका खण्डन करके पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन, मनको ही जगत्का कारण बताकर उसके नाश होनेपर जगत्की शून्यताका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अब उत्पत्ति-प्रकरणके अनन्तर इस स्थिति-प्रकरणको श्रवण करो, जो जान लिये जानेपर निर्वाण प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार जगत्-रूपसे स्थित यह दृश्य-प्रपञ्च और अहंता आदि आकार-रहित भ्रान्तिमात्र और असत्स्वरूप ही हैं। यह आकाशमें उत्पन्न हुए चित्रके समान एक निराधार विलक्षण चित्र है। यह यद्यपि ब्रह्मसे अभिन्न है, तथापि जलमें उसके भँवरकी भाँति ब्रह्ममें अन्य-सा स्थित लक्षित होता है। यह जगद्रूपी चित्र चित्रलिखित उद्यानकी तरह फूला हुआ है। इसकी आकृति मकरन्द आदि रससे रहित होनेपर भी सरस प्रतीत होती है। यद्यपि इसका रूप रोगयुक्त नेत्रों-द्वारा देखे गये अन्धकारके चक्रके समान वास्तवमें नहीं है, तथापि यह प्रत्यक्ष-सा दीखता है। यह रसात्मक होता हुआ भी परिणाममें अत्यन्त कटु है और उसके उत्पत्ति-विनाश होते रहते हैं।
ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ राम ! जो समस्त कल्पनाओंसे अतीत एवं निर्मल है, उस महान् अनन्त निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें यदि वास्तवमें जगत् आदि अङ्कुररूपमें विद्यमान हैं तो बताओ कि वह प्रलयकालके पश्चात् किन सहकारी कारणोंके सहयोगसे उत्पन्न हो सकता है ! क्योंकि इस जगत्में किसीने कभी भी वन्ध्याकी कन्याके समान सहकारी कारणोंके अभावमें अङ्कुरकी उत्पत्ति नहीं देखी है। श्रीराम ! यदि कहो कि सहकारी कारणोंके अभावमें भी (रज्जुमें सर्पकी तरह) जगद्-रूपी अङ्कुर आविर्भूत हुआ है तो ऐसी दशामें मूलकारण ही जगत्स्वभावताको प्राप्त हो गया है; क्योंकि सृष्टिके आदिमें यथास्थिति निराकार ब्रह्म ही सृष्टिरूपसे अपने स्वरूपमें स्थित होता है, अतः वहाँ जन्य-जनकका क्रम कहाँसे घट सकता है। इसलिये श्रीराम ! यह जगत् न तो था, न है और न होगा ही। (अतः ब्रह्ममें जगत्का तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है।) सच्चिदानन्द परमात्मा ही अपने-आपमें इस प्रकार जगत्के रूपमें विकसित हो जाता है। वत्स राम ! जब इस जगत्का अत्यन्ताभाव हो जाता है, तब केवल एक ब्रह्म ही शेष रहता है। किंतु यदि जगत् प्रतीत होता है तो वह ब्रह्म ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है। जब काम कर्म-वासना आदि भावोंके साथ इस दृश्य-प्रपञ्चका उपशमन हो जाता है, तभी इस जगत्का अत्यन्ताभाव होता है; परंतु चित्तके मौजूद रहते दृश्य-जगत्का शमन होना सम्भव नहीं। इसलिये परमात्माके यथार्थ ज्ञानके बिना दृश्यताकी शान्ति नहीं हो सकती। अतः दृश्यस्वरूप जगत्का सर्वथा अत्यन्ताभाव ही दृश्यताकी शान्तिका एकमात्र उपाय है। इसके अतिरिक्त पूर्णरूपसे अनर्थके विनाशके लिये दूसरी कोई युक्ति नहीं है। परमात्मा स्वयं ही अपने संकल्पसे अपने अंदर वर्तमान जिस चमत्कारको प्रकट करता है, वही सृष्टिरूपसे प्रतीत होता है। उसका वास्तवमें न तो कोई रूप है और न कोई आधार ही है। जैसे महाशिलाओंपर खुदे हुए लेखोंके स्वरूप दीख पड़ते हैं, उसी तरह ये सृष्टियाँ न उत्पन्न होती हैं न नष्ट होती हैं तथा न आती हैं, न जाती हैं—केवल प्रतीत होती हैं। जैसे जलका द्रवत्व, वायुका स्पन्दन, समुद्रके आवर्त और गुणीके गुण अपने आधार-स्थानसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह उत्पत्ति-विनाशशील कार्योंवाला यह जगत् एकमात्र अनन्त, शान्त, विस्तृत, विज्ञानघन ब्रह्मरूपसे ही स्थित है, उससे पृथक् नहीं।
श्रीरामजीने पूछा—गुरुदेव ! महाप्रलयके पश्चात् सृष्टिके आरम्भमें सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले ये प्रजापति स्मृतिरूपसे
स्थिति-प्रकरण ] * चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन * २१९
ही उत्पन्न होते हैं, इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि उन स्मृत्यात्मासे प्रकट हुआ यह जगत् भी स्मृतिरूप ही है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघूद्वह ! यह ऐसा ही है। महाप्रलयके अनन्तर सर्गके आदिमें सर्वप्रथम ये प्रजापति स्मृतिरूपसे ही प्रकट होते हैं, अतः उनका संकल्परूप यह जगत् भी स्मृतिरूप ही है। उन प्रजापतिके प्राथमिक संकल्पनगर ही जगद्रूपसे प्रकाशित हो रहा है। ज्ञानीके लिये यह जगत् शान्त एव अविनाशी केवल ब्रह्म ही है, परंतु वही अज्ञानीकी बुद्धिसे भासमान नाना लोकोंसे युक्त है। पर्वतपर स्थित परमाणु जैसे पर्वतसे भिन्न नहीं हैं और न उनकी गणना ही की जा सकती है, उसी प्रकार ब्रह्मरूपी महान् मेरुगिरिपर स्थित त्रैलोक्यरूपी परमाणु ब्रह्मसे अभिन्न तथा असंख्येय हैं। इस सृष्टिको यदि सृष्टिके रूपमें ही समझा गया, तब तो यह अधोलोकमें ले जाती है; परंतु इसीको यदि ब्रह्मरूपसे जान लिया गया तो यह परम मङ्गलमयी हो जाती है। यह सब जगत् विश्वके कारण विज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा ही है; क्योंकि जिससे जो उत्पन्न होता है, उसे तद्रूप ही समझना चाहिये। इसलिये समस्त वेद्य दृश्य-प्रपञ्च आत्मज्ञान हो जानेपर ज्ञानीकी दृष्टिमें शुद्ध चिन्मात्र ही है।
श्रीराम ! साधकके द्वारा इन्द्रियसमुदायपर विजय-प्राप्ति-रूपी पुलके आश्रयसे ही इस भवसागरको पार किया जा सकता है, अन्य किसी भी कर्मसे इससे पार पाना कठिन है। निरन्तर शास्त्राध्ययन और सत्संगतिके अभ्याससे जो विवेकयुक्त हो गया है, वही इन्द्रियजयी होता है और उसीको इस दृश्य-प्रपञ्चके अत्यन्ताभावका ज्ञान भी प्राप्त होता है। सौन्दर्यशालियोंमें श्रेष्ठ राम ! संसार-सागरकी श्रेणियाँ जैसे आती हैं और पुनः जैसे चली जाती हैं, वह सारा स्वरूप मैंने तुमसे वर्णन कर दिया। अब इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? मन ही कर्मरूपी वृक्षका अङ्कुर है। उस मनके नष्ट हो जानेपर कर्मरूपी शरीरवाला संसार-वृक्ष भी नष्ट हो जाता है। श्रीराम ! यह सब कुछ मन ही है। इस मनकी चिकित्सा हो जानेपर जगज्जालरूपी सारी व्याधियोंकी चिकित्सा हो जाती है। यह मन ही जब देहाकारका मनन करता है, तब लोकमें कर्म करनेमें समर्थ देह उत्पन्न होती है। भला, कहीं मनसे भिन्न भी देह देखी जाती है ! जैसे विशाल आकाशमें असत्स्वरूप गन्धर्वनगरकी प्रतीति होती है, उसी तरह विषयोंके चिन्तनसे वृद्धिगत हुए मनमें यह सारा जगत् स्फुरित होता है। मन ही जगत् है तथा सम्पूर्ण जगत् ही मन है; ये दोनों एक साथ रहते हैं।
रघुनन्दन ! समस्त एषणाओंकी शान्ति हो जानेपर विशुद्ध-चित्त पुरुषकी जो स्थिति है, उसीको सत्य आत्मतत्त्व कहा गया है और उसीको निर्मल चैतन्य कहते हैं। निर्मल सत्वरूप मन जिस वस्तुके विषयमें जैसी भावना करता है, वह वस्तु तत्काल वैसी ही हो जाती है। जैसे इस समय जाग्रत्-अवस्थामें हमलोगोंको संसारका स्वयं ही प्रत्यक्ष भान होता है, उसी प्रकार स्वप्न और भ्रम आदि अवस्थाओंमें सहस्रों संसार भी मिथ्या दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे एकको दूसरेके स्वप्न और मनोरथसम्बन्धी नगरोंके व्यवहार पृथक् होनेके कारण दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्तिके ये संसाररूपी भ्रम पृथक्-पृथक् होनेके कारण एक दूसरेके दृष्टिगोचर नहीं होते। इसी प्रकार संकल्परूपी आकाशमें अनेक संसार-रूपी नगरोंके समुदाय हैं; परंतु वे ज्ञानदृष्टिके बिना मिथ्या नहीं प्रतीत होते। जैसे एकमात्र वसन्त ऋतुका रस ही वन, लता और गुल्म आदिके रूपमें प्रकट होता है, उसी तरह एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही प्रत्येक व्यक्तिके लिये मिथ्या जगतरूपसे प्रकट हुआ है। अपना यह संकल्प ही जगत्के आकारमें प्रतीत हो रहा है, यह बात अत्यन्त परमार्थ-दृष्टिसे ही ज्ञात होती है।
२२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
अपने-अपने स्वभाव ( अनादि अज्ञान ) के भीतर स्थित चित्त ही प्रत्येक जीवमें इदमित्थं रूपसे प्रतीत होनेवाला यह जगत् है । इस प्रकार प्रतीतिमात्र जगत्को असत्य समझनेवाला चित्त स्वयं ही नष्ट हो जाता है; क्योंकि प्रतीतिकालमें ही इस जगत्की सत्ता है। परमार्थ वस्तु ( अधिष्ठानरूप ब्रह्म )-का साक्षात्कार होनेपर उसकी सत्ता नहीं रहती । चित्तकी सत्ता ही जगत् है और जगत्की सत्ता ही चित्त है । एकके अभावसे दोनोंका अभाव हो जाता है । यह इन दोनोंका अभाव सत्यस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्म-विषयक विचार करनेसे ही सम्भव है। जैसे मलिन मणिको युक्तिसे साफ करनेपर उससे शुद्ध प्रकाश प्रकट होता है, उसी तरह शुद्ध चित्तका अनुभव सत्य होता है । चिरकालतक एक परमात्माके चिन्तनरूप दृढ़ अभ्याससे चित्तकी शुद्धि होती है। जो संकल्पोंसे आक्रान्त नहीं है, ऐसे चित्तसे ज्ञानका उदय होता है । जैसे मलिन वस्त्रमें सुन्दर रंग नहीं टिकता, उसी तरह वासनासे मलिन चित्तमें ब्रह्माकाररूप एक दृष्टि स्थिर नहीं होती । वासनासे रहित होना ही चित्तकी शुद्धि है, जगत्के ज्ञानसे शून्य और एक ब्रह्माकार होना ही उसका वासनासे रहित होना है। चित्तकी शुद्धि होनेसे पुरुष शीघ्र ही प्रबुद्ध ( ज्ञान-सम्पन्न ) हो जाता है । चित्तका चिन्मय परमात्मारूपमें लय हो जाना ही उसकी वास्तविक शुद्धि है । इस शुद्धिका लाभ होते ही प्रबुद्ध पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है । ( सर्ग १–१७ )
स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्ष-लाभका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस प्राणीका जिस तरहके कर्मोंका भोगानुकूल फल जहाँ जैसे रहता है, वहाँ उतना ही वह अनुभव करता है, उससे अतिरिक्त नहीं । एक व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान जो मनोराज्य है, उसे देखने या भोगने आदिमें दूसरे व्यक्तिका मन सफल नहीं होता । यह जो असफलताको प्राप्त हुई मनकी स्थिति है, वही उसके विच्छेद यानी नानात्वमें हेतु है—यों जानना चाहिये । उस मनके भेदसे ही जीवोंके भी भेद होते हैं अर्थात् जैसे भिन्न-भिन्न मन हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न जीव भी हैं । जैसे सुवर्ण अपने ज्ञानके अभावसे कड़े-कंगन आदिके रूपको प्राप्त होता है, उसी प्रकार जिसे अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है, उस चेतनने स्थूल देहको स्वीकार करके संसाररूपिणी अविद्याका मिथ्या ही अनुभव किया है ।
सम्पूर्ण जीव-समूहोंका आत्मा स्वयं ही अपने संकल्पसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन अवस्थाओंको प्राप्त हुआ है । इन अवस्थाओंमें शरीर कारण नहीं है । इस प्रकार जाग्रत् आदि तीन अवस्थारूप आत्मामें ही जीवत्व है अर्थात् वह आत्मा ही जीवरूपसे स्फुरित हो रहा है; इसमें शरीरत्वका विकास नहीं है । तात्पर्य यह कि जैसे जल ही लहर एवं भँवर आदिके रूपमें विख्यात होता है—यह तात्त्विक दृष्टि प्राप्त होनेपर जलमें उससे पृथक् लहर आदिकी सत्ता नहीं रहती, उसी प्रकार जीवात्मा ही जाग्रत् आदि अवस्थारूप है—यह विचार दृढ़ होते ही जीवसे पृथक् देहकी वास्तविक सत्ता शेष नहीं रह जाती ।
इसी प्रकार तत्त्वज्ञ पुरुष सुषुप्ति-अवस्थाके अवसानभूत तुरीय पदरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मपदको ज्ञानद्वारा प्राप्त करके संसारसे निवृत्त हो जाता है; परंतु जो मूढ़ जीव है, वही सृष्टिमें प्रवृत्त होता है । ज्ञानी और अज्ञानी दोनोंकी सुषुप्ति एकरूप ही है; क्योंकि अज्ञको भी सुषुप्तावस्थामें सुखकी प्राप्ति होती है । किंतु अज्ञानी जीव तो सुषुप्तावस्थामें पहुँचकर भी असम्बुद्ध ( वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित और देहात्मभावकी भ्रान्ति-वासनासे वासित ) होनेके कारण सृष्टिको प्राप्त होता है, परंतु
स्थिति-प्रकरण ] * स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति तथा विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन * २२१
ज्ञानी नहीं। परब्रह्म परमात्मा निर्विशेष होनेके कारण अभाव नहीं कहा जा सकता। निर्विकार, अद्वितीय और असङ्ग होनेके कारण जो वास्तवमें किसीका कारण नहीं है, तथापि सम्पूर्ण प्रपञ्चके आरोपका अधिष्ठानरूपसे आदिकारण है, उस निर्विशेष परब्रह्म परमात्मामें वस्तुतः कारण एवं निमित्त आदि वस्तुकी भी सम्भावना नहीं है। (अतः ब्रह्ममें बिना किसी कारणके ही प्रतीत होनेवाला यह जगत् मिथ्या ही है।)
सार वस्तु (ब्रह्म)-का ही विचार करना उचित है। असार वस्तु (दृश्य संसार)-के विचारसे क्या लाभ। बीज अपने स्वरूपका त्याग करके अङ्कुर आदिके क्रमसे फलरूपमें परिणत होता देखा जाता है, परंतु ब्रह्म वैसा नहीं है। वह अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही जगत्रूप अध्यारोपका अधिष्ठानरूपसे कारण होता है, बीजका अवयव आदि सब कुछ साकार है। अतः उससे निराकार परम पदरूप ब्रह्मकी तुलना करना उचित नहीं। इसलिये कल्याणस्वरूप ब्रह्मके लिये कोई उपमा सम्मत ही नहीं हो सकती। अपनेको दृश्यरूपमें देखनेवाला द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप आत्माको नहीं देख सकता (इसलिये उसे अनर्थकी प्राप्ति होती है)। जिसकी बुद्धि प्रपञ्चसे आक्रान्त हो, ऐसे किसी पुरुषको अपनी यथार्थ स्थितिका ज्ञान नहीं होता।
जबतक भ्रान्तिसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति हो रही है, तबतक किसीकी समझदारी किस कामकी; और जब यह ज्ञान हो गया कि यहाँ जल नहीं है, तब वहाँ मृगतृष्णा ही क्या रह गयी। जैसे नेत्र बहिर्मुख होनेके कारण अपने-आपको नहीं देख पाता, उसी प्रकार आकाशकी भाँति निर्मल होता हुआ भी द्रष्टा बहिर्मुख होनेके कारण अपने स्वरूपका साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह भ्रमकी प्रबलता कैसी आश्चर्यजनक है ! यदि दृश्य-प्रपञ्चको दृश्यरूपसे ही सच्चा समझा जाय तो आकाशके समान निर्मल ब्रह्म यत्न करनेपर भी नहीं मिल सकता; फिर तो उसकी प्राप्ति बहुत दूर हो जाती है। श्रीराम ! इसीलिये उसको दृश्य ही दिखायी देता है, द्रष्टाका दर्शन नहीं होता। वास्तवमें एकमात्र द्रष्टा ही सर्वत्र स्थित है, दृश्य नामकी कोई वस्तु यहाँ है ही नहीं (जो कुछ दिखायी देता है, वह केवल भ्रम है)। जब द्रष्टा और दृश्यमें कोई अन्तर ही नहीं रहा, तब कौन द्रष्टा और कैसा दृश्य, क्योंकि वह द्रष्टा ही दृश्यरूपमें प्रकट होता है।
जब चित्त सिद्धिको प्राप्त होता है, तब जीव जड-संसर्गसे मुक्त हो केवल शुद्ध चिन्मय आत्मस्वरूपसे स्थित होता है। वह चेतन आत्मा शुद्ध एवं सर्वव्यापी है; चेतन आत्मा जहाँ जिस वस्तुकी भावना करता है, वहाँ वह तत्काल प्रकट हो जाती है। उसने स्वप्नमें भी जो कुछ देखा है, वह स्वप्नके समयमें सत्य ही है। जैसे बीजके अंदर सूक्ष्मरूपसे पत्ते, लता, फूल और फलरूप अणु रहते हैं, उसी प्रकार चेतनरूप अणुके भीतर समस्त सूक्ष्म अनुभव विद्यमान हैं। जिस पुरुषके भीतर यह विचार नहीं उठता कि मैं कौन हूँ और यह जगत् क्या है, वह संसारके बन्धनसे मुक्त नहीं हुआ। जिस विशुद्ध बुद्धिवाले पुरुषकी भोगलिप्सा प्रतिदिन क्षीण होती जाती है, उस वैराग्यवान्का ही विवेकयुक्त विचार सफल होता है। जैसे शरीरके द्वारा पथ्य-भोजन आदि नियमोंके साथ सेवन किया हुआ औषध ही आरोग्य प्रदान करता है, उसी प्रकार जितेन्द्रियताका अभ्यास हो जानेपर ही विवेक सफल होता है। चित्रमें अङ्कित प्रज्वलित अग्निकी भाँति जिसका विवेक केवल कथनमात्र ही है, कार्यमें परिणत नहीं हुआ है, उसने अविवेकका त्याग नहीं किया है; अतः वह अविवेक उसे दुःख ही देनेवाला होगा। जैसे स्पर्शसे ही वायुकी सत्ताका भान होता है, कथनमात्रसे नहीं, उसी प्रकार भोगेच्छाके क्षीण होनेसे ही पुरुषका विवेक जाग्रत् होता है। चित्रलिखित अमृत अमृत नहीं है, चित्रलिखित अग्नि अग्नि नहीं है, चित्रलिखित नारी
२२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निश्चय ही नारी नहीं है; उसी तरह कथनमात्रका विवेक विवेक नहीं है, वास्तवमें अविवेक ही है। विवेकसे पहले राग और द्वेषका समूल नाश हो जाता है। तत्पश्चात् विषयभोगोंके लिये प्रयत्न सर्वथा क्षीण हो जाता है। जिस पुरुषमें विवेक जाग्रत् है, वही परम पवित्र है।
(सर्ग १८-१९)
उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! वे जीव अपनी सिद्धिके लिये जैसे-जैसे प्रयत्न करते हैं, उन विविध उपासनाओंके रूपसे वे शीघ्र वैसे-ही-वैसे हो जाते हैं। देवताओंकी पूजा करनेवाले देवताओंको, यक्षोंकी आराधना करनेवाले यक्षोंको और ब्रह्मके उपासक ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। इनमें जो सर्वोत्तम है, उसी परमात्मारूप इष्टदेवका आश्रय लेना चाहिये।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप मुझे जाग्रत् तथा स्वप्न-अवस्थाओंका भेद बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी प्रतीति स्थिर हो, उसे जाग्रत् कहते हैं और जिसकी प्रतीति स्थिर नहीं होती, उसे स्वप्न कहा गया है। यदि स्वप्न भी कालान्तरमें स्थित हो तो प्रत्यक्ष अनुभवके आधारपर उसे जाग्रत्की श्रेणीमें ही देखा जायगा; और यदि जाग्रत् भी कालान्तरमें स्थित नहीं है तो वह स्वप्न ही है। इस प्रकार जाग्रत् स्वप्नभावको और स्वप्न जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है। स्वप्न भी स्वप्नकालमें स्थिर होनेके कारण जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है और जाग्रत्के मनोरथ भी जाग्रत्कालमें अस्थिर होनेसे स्वप्न ही हैं; क्योंकि वैसा ही बोध होता है।
रघुनन्दन ! मैंने तुमसे यह जो कुछ कहा है—जाग्रत् आदि अवस्थाओंका वर्णन किया है, वह सब मनके स्वरूपका निरूपणमात्र है। और किसी हेतु या प्रयोजनसे यह सब नहीं कहा गया है। जैसे अग्निके सम्पर्कमें आनेसे लोहेका गोला आग बन जाता है, उसी प्रकार दृढ़ निश्चयसे युक्त चित्त जिस वस्तुकी बारंबार भावना करता है, उसीके आकारको प्राप्त हो जाता है। भाव, अभाव, ग्रहण और त्याग आदि सारी प्रतीतियाँ चेतनमें मनके द्वारा कल्पित हैं। ये प्रतीत होती हैं, इसलिये तो ये असत्य नहीं हैं और वास्तवमें ये हैं नहीं, इसलिये सत्य नहीं हैं। चित्तकी चपलतासे ही इनका निर्माण हुआ है। मन मोहका जनक और जगत्की स्थितिका कारण है। मलिन मन ही व्यष्टि और समष्टिरूपसे इस जगत्की कल्पना करता है। संसारकी सारी विभूतियाँ एकमात्र मनको जीतनेसे ही प्राप्त होती हैं। चित्त जिसकी भावनामें तन्मय होता है, उसे निस्सन्देह प्राप्त कर लेता है। सौभाग्यशाली श्रीराम ! मनके द्वारा अभिलषित देश या विषयको शरीर प्राप्त होता है। परंतु शरीरके द्वारा आचरित देश या विषयको मन नियमतः प्राप्त नहीं होता।
जैसे सुगन्धित पुष्पके भीतर स्थित हुई वायु उसकी घनीभूत सुगन्धको प्राप्त कर लेती है, उसी प्रकार मननसे चञ्चल हुआ मन जिस-जिस वस्तुकी भावना करता है अथवा जिस-जिस वासनासे युक्त भावको अपनाता है, उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जैसे गन्धके भीतर स्थित हुई वायु गन्धरूपताको प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार मन जिस भावसे युक्त होता है, उसके बाद उसका वशवर्ती शरीर भी उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। ज्ञानेन्द्रियोंके अपने-अपने विषयमें
स्थिति-प्रकरण ] * उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन *
प्रवृत्त होनेपर उनसे कर्मेन्द्रियरूप स्वतः ही इस तरह स्फुरित होता है, जैसे धूलमिश्रित वायुमें पृथ्वी अपने-आप धूलिकणोंके रूपमें स्फुरित होती है । कर्मेन्द्रियाँ क्षुब्ध होकर जब अपनी क्रियाशक्तिको प्रकट करती हैं, तब वायुमें धूल-समूहकी भाँति मनमें प्रचुर कर्म सम्पादित होता है । इस प्रकार मनसे कर्मकी उत्पत्ति हुई है और मनकी उत्पत्तिमें भी कर्मको ही बीज (कारण) बताया गया है । फल और सुगन्धकी भाँति इन दोनोंकी सत्ता एक दूसरेसे भिन्न नहीं है । दृढ़ अभ्यासके कारण मन जैसे भावको ग्रहण करता है, वैसे ही स्पन्द और कर्म नामकी शाखाओंको वह प्रकट करता है तथा उसी तरहकी क्रियारूप उसके फलको बड़े आदरसे उत्पन्न करता है । तदनन्तर उसीके स्वादका अनुभव करके शीघ्र बन्धनमें पड़ता है । मन जिस-जिस भावको अपनाता है, उसी-उसीको वस्तुरूपमें पाता है । वही श्रेय है, दूसरा नहीं—ऐसा उसका निश्चय हो जाता है । अपनी-अपनी प्रतीतिके द्वारा ही दृढ़तापूर्वक भिन्नताको प्राप्त हुए (मनुष्योंके) मन सदा ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये प्रयत्न करते हैं ।
जो अकृत्रिम अर्थात् नित्य-सिद्ध विज्ञान-आनन्दघन परमात्मा हैं, उनके लिये प्रयत्न करनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने मनको तन्मय बना दें, जिससे उसकी प्राप्ति हो सके । यह दृश्य माया है, अविद्या है और भय देनेवाली भावना है । मनकी जो दृश्यमयता है, विद्वान्लोग उसीको (बन्धनमें डालनेवाला) कर्म कहते हैं । स्वभावमें स्थित जो यह दृश्य-तन्मयता अनुभवमें आती है, वही विद्वानोंद्वारा मदिराके समान संसारको उन्मत्त बना देनेवाली अविद्या कही जाती है । जैसे पटलनामक रोगसे अंधा हुआ पुरुष सूर्यके दीप्तिमान् प्रकाशको नहीं देखता, उसी प्रकार इस अविद्यासे
वह अविद्या संकल्पसे स्वयं उत्पन्न होती है । भ भावनाके संकल्पको त्याग देनेमात्रसे जब वह जाती है, उस समय रसस्वरूप आनन्दमय पर ध्यानके अभ्यासकी दृढ़तासे सुशोभित श्रवण म विचारके द्वारा सब पदार्थोंमें अनासक्ति स्थिर हो है । फिर सम्यग्दृष्टिके प्राप्त होनेपर असत्य दृष्टिका हो जाता है और वह निर्मल-स्वभाव, निर्विकल्प सच्चिदानन्द परमात्मा प्राप्त हो जाता है, जो न न असत् है न सुखी है न दुखी है तथा कैक्यभाव अपने हृदयमें अनुभवसे ही प्राप्त हो जैसे यह रस्सी है या सर्प है—ऐसा सन्देह रस्सीमें सर्पभाव आरोपित होता है, उसी प्रकार रहित चिन्मय आकाशस्वरूप जीवात्माने अपनेमें बन्धनकी कल्पना कर रखी है । जैसे एक ही रात और दिनकी कल्पनासे रातमें और तरहका देता है और दिनमें अन्य प्रकारका, उसी तरह वस्तु ब्रह्म बारंबार उस प्रतिकूल कल्पनाद्वारा प्रकारका भासित होता है और अपने स्वरूपसे दूसरा ही रूप धारण कर लेता है । जो तुच्छ आभास-रहित है, उपाधिशून्य है, जिसमें ब नहीं है तथा जो नाना प्रकारकी कल्पनाओं वह परब्रह्म परमात्मा ही परम सुखस्वरूप होने सुख दे सकता है । जीवकी अपनी कल्पनासे अभाव, शुभ और अशुभ क्षणभरमें उत्पन्न हो और क्षणभरमें मिट जाते हैं । समस्त पद भावके अनुसार ही फल देनेवाले हैं, यह जान पुरुष इस परिवर्तनशील जगत्के पदार्थोंके विष एक निश्चित रूपका प्रतिपादन नहीं कर दृढ़ भावनाके द्वारा जिस पदार्थके विषयमें जब निश्चित धारणा बनाये रखता है, तबतक व ही परिणामको वह देखता या अनुभव क ... । वह प्रत्यक्ष बाह्य हो है अथवा
२२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अभिन्न है, ऐसा अपने मनमें निश्चय करके तुम अपनी बुद्धिके द्वारा उस अनादि अनन्त परमात्माका अपने आपमें ही अनुभव करो—मैं ही वह परब्रह्म परमात्मा हूँ, ऐसा अनुभव करो। (सर्ग २०-२१)
दृढ़ बोध होनेपर सम्पूर्ण दोषोंके विनाश, अन्तःकरणकी शुद्धि और विशुद्ध आत्मतत्त्व-के साक्षात्कारकी महिमाका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो नित्यानित्य वस्तुके विवेकसे सम्पन्न है, जिसके चित्तकी वृत्तियाँ परमात्मामें विलीन होती जा रही हैं, जो ज्ञान प्राप्त करके संकल्पोंका त्याग कर रहा है, जिसका मन परमात्माके स्वरूपमें परिणत हो गया है, जो इस हेय नाशवान् जड दृश्यका परित्याग कर रहा है तथा उपादेय सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका ध्यान कर रहा है, अर्थात् जो द्रष्टा परमात्माका अनुभव करता है तथा अद्रष्टारूप दृश्य-का अनुभव नहीं करता, जागरणके योग्य परम तत्त्वमें ही जाग रहा है और घनीभूत अज्ञानके विकाररूप संसारसे सोया हुआ है, जो सम्पूर्ण तुच्छ सुखोंसे लेकर हिरण्यगर्भ ब्रह्मतकके सुखोंमें अत्यन्त वैराग्यके कारण सरस और नीरस आपातरमणीय भोगोंमें आसक्त न होकर उनकी ओरसे पूर्णतया विरक्त है, जिसके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं है-ऐसे अधिकारी पुरुषका अनादि जडता (अज्ञान)-रूपी आकाश आसक्तिशून्य हो जब परमात्मारूपी जलके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है और धूपमें बर्फकी भाँति पूर्णतया विगलित हो जाता है। वर्षाकाल बीत जानेपर जैसे तरङ्गयुक्त जलसे चञ्चल मध्यभागवाली लहराती हुई नदियाँ धीरे-धीरे सूखने लगती हैं, उसी प्रकार जब विषयरूपी तरङ्गोंसे युक्त तृष्णाएँ शान्त हो जाती हैं तथा जैसे चूहे चिड़ियोंके जाल काट देते हैं, उसी प्रकार जब तीव्र वैराग्यसे संसार-वासना-रूपी जाल टूट जाता है और हृदयकी गाँठें ढीली पड़ जाती हैं, तब जैसे निर्मलीको पीसकर जलमें डालनेसे जल स्वच्छ हो जाता है, उसी तरह विज्ञानके प्रभावसे अन्तःकरण विशुद्ध होकर प्रसन्न हो जाता है। जैसे वायुके शान्त होनेपर समुद्रमें (निश्चलता) रूप समता आ जाती है, उसी प्रकार मनके शान्त होनेपर सब जगह सर्वोत्तम शान्ति पैदा करनेवाली अज्ञानरूपी मलसे रहित उन्नत समदर्शिताका उदय होता है। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ—जिसने जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वको जान लिया है, वह परम बुद्धिमान् पुरुष वायु आदि चारों भूतोंसे रहित आकाशकोशके समान न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है।
मैं कौन हूँ, यह दृश्य जगत् कैसे हुआ ?—इन सब बातोंका जबतक विवेकपूर्वक विचार नहीं किया जाता, तभीतक यह अन्धकारके समान संसारका आडम्बर खड़ा है। मिथ्या भ्रमसमूहसे उत्पन्न यह शरीर आपत्तियों-का घर है। जो आत्मभावनाके द्वारा इस दृश्यको नहीं देखता अर्थात् जो यह दृश्य नहीं है, सब कुछ आत्मा ही है—ऐसा देखता है, वही यथार्थरूपसे देखनेवाला है। जो देश और कालवश शरीरमें उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंको भ्रमरहित दृष्टिसे 'ये मेरे नहीं हैं' इस तरह देखता है, वही यथार्थ द्रष्टा है। जो असीम आकाश, दिशा और काल आदि हैं तथा उनमें वर्तमान जो परिच्छिन्न क्रियाओंसे युक्त वस्तु है, वह सब 'मैं ही हूँ'—इस प्रकार जो सबमें अपने आत्माको देखता है, वही वास्तवमें देखनेवाला है। सर्वशक्तिमान्, अनन्तात्मा, सम्पूर्ण पदार्थोंमें स्थित, एकमात्र अद्वितीय चेतन परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं—ऐसा जो अपने हृदयके भीतर देखता है, वही वास्तवमें देखता है। जो विद्वान् आधि, व्याधि, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त इस देहको अपना स्वरूप नहीं मानता—'मैं देह हूँ', ऐसा नहीं देखता, वही
स्थिति-प्रकरण ] * शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन * २२५
यथार्थदर्शी है । सूतमें गुँथी हुई मणियोंके समान यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही ओतप्रोत है, परंतु मैं मन नहीं हूँ--इस तरह जो देखता है, वही आत्माके यथार्थ स्वरूप-को देखता है । न मैं हूँ न दूसरी ही कोई 'वस्तु है; किंतु एकमात्र निरामय ब्रह्म ही सर्वत्र सब रूपोंमें विराजमान है--इस तरह जो देखता है, वही वास्तवमें देखता है । जिस महात्माके सांसारिक देह आदिके प्रति अपने पराये और तेरे-मेरेके भेद मिट गये हैं, वही सुन्दर दृष्टिसे सम्पन्न महापुरुष आत्माका यथार्थरूपसे अनुभव करता है । जो आकाशकी भाँति एकात्मा है और सम्पूर्ण पदार्थोंमें व्याप्त होता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, ऐसा वह महात्मा पुरुष साक्षात् महेश्वर ही है । जो तम ( सुषुप्ति ), प्रकाश ( जाग्रत् ) और कलना ( स्वप्न )--इन तीनों अवस्थाओंसे मुक्त हैं, कालका भी परम प्रेमास्पद आत्मा बन गया है तथा जो सौम्य, समदर्शी और अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हैं, ऐसे उस परमःम-पदको प्राप्त हुए पुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण जगत्में एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है--जिसकी बुद्धिमें ऐसा निश्चय हो गया है तथा जिसकी वृत्ति ( ब्रह्माकारदृष्टि ) जगत्की सृष्टि, प्रलय और स्थितिरूपिणी विचित्र एवं मनोहर वैभवायुक्त कलाओंमें सदा ही एकरस है, उस परम बोधवान् शिवस्वरूप महापुरुषको नमस्कार है । ( सर्ग २२ )
शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुकुलनन्दन श्रीराम ! जैसे देवराज इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीमें निश्चिन्त होकर राज्य करते हैं, उसी प्रकार विवेकी पुरुष इस देहरूपिणी नगरीमें राज्य करता हुआ सदा निश्चिन्त एवं अपने आत्मामें स्थित रहता है। वह अपने मनरूपी मतवाले घोडेको कामभोगके भयानक गड्ढेकी ओर नहीं जाने देता तथा अपनी प्रज्ञा-रूपिणी पुत्रीको लोभके वशमें होकर नहीं बेचता । अज्ञानरूपी शत्रु राष्ट्र इसके छिद्रको नहीं देख सकता और यह संसाररूपी शत्रुके भयकी जड़ोंको ही काट देता है। तृष्णारूपिणी नदीके प्रवाहके भीतर उठनेवाली बड़ी भारी भँवरमें, जहाँ काम-भोगरूपी दुष्ट ग्राह निवास करते हैं, वह विवेकी पुरुष बहिर्मुख होकर डूबता नहीं । वह मनकी ब्रह्माकारवृत्तिमें आरूढ हो बाहर-भीतर परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको न देखता हुआ सदा समता-शान्तिरूप गङ्गा-यमुनाके संगममें स्नान करता है । जिसपर सम्पूर्ण इन्द्रियरूपी जन-समुदायकी दृष्टि रहती है, उस विषय-सुखके अवलोकनसे पराङ्मुख हो वह ध्यानमें सदा सुखपूर्वक बैठा रहता है । सर्वव्यापक होकर भी इस शरीररूपी नगरीमें स्थित आत्मारूपी पुरुष विश्वकी कल्पनाद्वारा निर्मित विविध भोगोंका प्रारब्धानुसार उपभोग करके अपने स्वरूपभूत परमपुरुषार्थको प्राप्त होता है । समस्त पदार्थोंकी क्रियासे विमुख रहनेवाला वह विवेकी पुरुष व्यवहार-दृष्टिसे कर्म करता हुआ भी परमार्थ-दृष्टिसे कुछ नहीं करता; क्योंकि वह सम्पूर्ण व्यावहारिक कार्योंका कर्तापनके अभिमानसे रहित होकर सम्यक्रूपसे अनुष्ठान करता है । उस शरीर-नगरीमें रहकर हृदय-पुण्डरीकमें आरूढ हो वह सदा शान्तिरूप शीतल शरीरवाली लोकसुन्दरी मैत्रीरूपिणी अपनी प्रियाके साथ नित्य रमण करता है। जैसे चन्द्रमाके अगल-बगलमें चित्तको आह्लादित करनेवाली विशाखा नामक दो ताराएँ स्थित होती हैं, इसी तरह विवेकी पुरुषके दोनों पार्श्वभागोंमें सत्यता और समता नामकी दो कान्ताएँ सम्यक्रूपसे विराजमान होती हैं, जो चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाली हैं। जैसे सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त और समस्त शोभा-सम्पत्तिसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले पूर्णिमाके चन्द्रमा चिरकालतक सम्पूर्ण दिशाओंको अपनी सुधामयी किरणोंसे पूर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जिसके सारे मनोरथ चिरकालके लिये परिपूर्ण हो
२२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
गये हैं, जो सर्वात्मभावरूप सम्पत्तिसे सुन्दर दिखायी देता है, वह आत्मकाम तत्त्ववेत्ता पुरुष निरन्तर अपने प्रकाशसे प्रकाशित होता है । चन्द्रमा तो पुनः क्षीण होनेके लिये प्रकाशित होते हैं, परंतु तत्त्वज्ञ फिर क्षीण नहीं होता। वह अखण्ड एकरसभावसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहनेके लिये प्रकाशित होता है।
जैसे बिना किसी प्रयत्नके स्वतः प्राप्त हुए तथा व्यर्थ पदार्थोंमें मनुष्यकी दृष्टि आसक्तिशून्य होकर ही पड़ती है, उसी प्रकार विवेकी पुरुषकी बुद्धि सांसारिक कार्योंमें भी रागशून्य ही रहती है। इन्द्रियोंको प्रारब्धवश जो न्याययुक्त विषय प्राप्त होते हैं, उनका तो वह कभी निवारण नहीं करता और अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका प्रयत्न भी नहीं करता (प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाय, उसीमें संतुष्ट रहता है)। इस प्रकार ज्ञानी अपने आपमें परिपूर्ण रहता है। जैसे मोर-पंखोंके आघात पर्वतको कम्पित नहीं कर सकते, उसी प्रकार ज्ञानीको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये होनेवाली चिन्ताएँ और प्रतिकूल प्राप्त वस्तुके लिये पश्चात्ताप विचलित नहीं करते। जिसके सारे संदेह निवृत्त हो गये हैं, भोगसम्बन्धी सारी उत्सुकता विनष्ट हो गयी है तथा काल्पनिक शरीर क्षीण हो गया है, वह ज्ञानी पुरुष सम्राट्के समान विराजमान होता है। जैसे अपार अनन्त क्षीरसागर अपने आपमें ही परिपूर्ण है, उसी प्रकार अपरिच्छिन्न आत्मज्ञानी अपने आपमें ही नहीं समाता अर्थात् अपने आपमें ही परिपूर्ण है और आत्मासे आत्मामें ही रमण करता है।
इतने बड़े भूमण्डलमें वे ही पुरुष सौभाग्यशाली, शुद्धचित्त और पुरुषोचित कलाओंके ज्ञानमें गणनीय हैं, जो अपने चित्तसे पराजित नहीं हुए हैं। जिसके हृदय-रूपी बिलमें कुण्डलाकार मनरूपी महान् सर्प सर्वथा शान्त हो गया है, अपने स्वरूपमें पूर्णरूपसे उदित हुए ऐसे उस अत्यन्त निर्मल तत्त्ववेत्ताको मैं प्रणाम करता हूँ।
(सर्ग २३)
मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ, अत्यन्त अज्ञानी और ज्ञानीके लिये उपदेशकी व्यर्थता तथा जगत् और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! (मनसहित) इन्द्रियरूपी छः शत्रु बड़े ही दुर्जय हैं। वे तपन, अवीचि, महारौरव, रौरव, संघात और कालसूत्र—नरकके इन छः बड़े-बड़े साम्राज्योंपर प्रतिष्ठित हैं। पापरूपी मतवाले हाथी इनके वाहन हैं तथा तृष्णारूपी बाण-शलाकाओंसे वे सदा सम्पन्न रहते हैं। वे इतने कृतघ्न हैं कि सबसे पहले अपने आश्रयभूत शरीरका ही नाश करते हैं। उनका महान् कोशागार कुकर्मरूपी धनसे ही भरा हुआ है। अपने इन इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। जिसने विवेकरूपी सूतके जालसे उन इन्द्रिय-रूपी दुष्ट शत्रुओंको बाँध लिया है, उसके अङ्गों (शम, दम, समता, शान्ति आदि) का वे विनाश नहीं करते। जिसने इन्द्रियरूपी भृत्योंको काबूमें कर लिया है तथा मनरूपी शत्रुको पूर्णतया बंदी बना लिया है, उस पुरुषकी विशुद्ध बुद्धि उसी तरह बढ़ती है, जैसे वसन्त ऋतुमें आमकी मञ्जरी। जिसका चित्तरूपी गर्व नष्ट हो गया है और इन्द्रियरूपी शत्रु जिसकी कैदमें आ गये हैं, उस पुरुषकी भोग-वासनाएँ उसी तरह क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमल विनष्ट हो जाते हैं। जबतक एकमात्र परमात्मतत्त्वके दृढ़ अभ्यासद्वारा मनपर विजय नहीं पा ली जाती, तभीतक मध्यरात्रिमें नाचनेवाले वेतालोंकी तरह हृदयमें वासनाएँ उछल-कूद मचाये रहती हैं। मैं समझता हूँ कि विवेकी पुरुषका यही मन विवेकके द्वारा अभीष्ट कार्य करनेसे भृत्य, मन्त्रणाद्वारा उत्तम कार्य करवानेसे मन्त्री और सब ओरसे इन्द्रियोंपर आक्रमण करनेके कारण सामन्त बन जाता है। मनरूपी मन्त्री
स्थिति-प्रकरण ] * मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ * २२७
शास्त्रविहित शुभ कर्ममें प्रवृत्त हुए पुरुषको उन निष्काम कर्मोंके करनेके लिये सलाह देता है, जो जन्म-मृत्युरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठारके समान हैं तथा भविष्यमें होनेवाले अभ्युदय (निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति) के कारण हैं।
किंतु जिसे जगत्की सत्यताका पूर्ण निश्चय है, 'वह अत्यन्त मूढ़ है। उस अत्यन्त मूढ़ पुरुषके प्रति यदि जगत्की असत्यताका प्रतिपादन किया जाय तो यह उपदेश वहाँ शोभा नहीं पाता—उसके मनको अच्छा नहीं लगता। परमात्मतत्त्वके विचारका अभ्यास किये बिना जगत्की सत्यताके अनुभवका अपलाप (निराकरण) नहीं हो सकता। इस संसारमें किसीका भी जो निश्चय अन्तःकरणमें जड जमाकर सुदृढ़ हो गया है, वह शास्त्रोक्त परमार्थतत्त्वका अभ्यास किये बिना कदापि नष्ट नहीं होता। जो अनधिकारी-के प्रति ऐसा उपदेश देता है कि यह जगत् मिथ्या है, केवल ब्रह्म सत्य है, उस पुरुषको उन्मत्तके समान समझकर इस जगत्के उन्मत्त और मूढ़ मनुष्य उसकी पूरी हँसी उड़ाते हैं किंतु जो मदिरा पीकर मतवाला हो गया है, जो मदिरासे दूर रहनेके कारण मदमत्त नहीं हुआ है, उन दोनोंकी कहाँ एकता होती है। जैसे अन्धकार और प्रकाशको समझनेमें, छाया और धूपको पहचाननेमें कोई बाधा नहीं आती, उसी प्रकार ज्ञानी और अज्ञानीके विषयमे भी समझना चाहिये। बोधके विषयमें ज्ञानी और अज्ञानीकी कभी एकता नहीं हो सकती। अज्ञानीको कितने ही यत्नसे क्यों न समझाया जाय, उसे बाहर-भीतर जो संसारकी सत्यताका अनुभव हो रहा है, उसका वह सत्य अधिष्ठान-रूप ब्रह्ममें उसी प्रकार बाध नहीं कर सकता, जैसे शव अपने पैरों चल नहीं सकता। (अध्यस्त वस्तुका बाध किये बिना अधिष्ठान-तत्त्वका बोध नहीं हो सकता; इसलिये उसे बोधका उपदेश देना व्यर्थ है।)
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है—ऐसा उपदेश उस मनुष्यके प्रति देना उचित नहीं, जो अत्यन्त अज्ञानी है; क्योंकि उस अज्ञानीने तप और विद्या आदिके अनुभवसे होनेवाले संस्कारका अभाव होनेके कारण सदा उस लोकप्रसिद्ध देहात्मभावका ही अनुभव किया है। कभी भी असंसारी आत्मभावका उसे अनुभव नहीं हुआ। श्रीराम ! जिसको थोड़ा-थोड़ा ज्ञान है, उस पुरुषके प्रति ही यह उपदेश-वाणी सुशोभित (सफल) होती है। जो पुरुष पूर्ण ज्ञानी है, उसको तो 'मैं हूँ' इस प्रकार अहंकारास्पदरूपसे विचार करनेके लिये कुछ भी नहीं है। (इसलिये वह भी उपदेश देनेके योग्य नहीं है। तात्पर्य यह कि जो न तो अत्यन्त अज्ञानी है और न पूर्ण ज्ञानी ही, वही जिज्ञासु इस उपदेशका अधिकारी है।) जो शुद्ध बुद्धिसे युक्त ज्ञानी पुरुष निरन्तर यह अनुभव करता है कि यह सब कुछ शान्त परब्रह्म ही है, उसके इस अनुभवका बाध कैसे हो सकता है। आत्मामें परब्रह्मके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, सोनेमें अँगूठी आदिकी तरह आत्मामें अन्य किसीकी प्रातीतिक सत्ता भी नहीं है। मूढ़ पुरुष मिथ्या अहंकारमय है और सुन्दर बुद्धिसे युक्त ज्ञानी एकमात्र सत्य आत्मस्वरूप है। इन दोनोंके स्वभावके अन्तरका निराकरण कहीं नहीं हो सकता है। जो सर्वत्र व्याप्त, शान्त, शुद्ध, चेतन, आकाशवत् निर्विकार, निर्मल तथा उत्पत्ति-विनाशसे रहित है, वह ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। जिसके नेत्र तिमिर-रोगसे पीडित हैं, उसकी स्वाभाविक दृष्टियाँ ही आकाशमें केशोंके वर्तुलाकार गोलोंकी तरह प्रतीत होती हैं। उसी तरह चिन्मय परमात्मामे ये सृष्टियाँ प्रतिभासित होती हैं। वह चिदाकाशस्वरूप सत्यात्मा अपने आपको जैसा समझता है क्षणभरमें वैसा ही अनुभव करने लगता है। उसके दृष्टिबलसे असत्य वस्तु भी क्षणभरमें सत्य-सी प्रतीत होने लगती है।
२२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंके तापको ही मृगजल या मृगतृष्णा नाम दिया गया है, उसी प्रकार जो आकाशकी-ज्यों निराकार है, उस आकाशरूप चिन्मय परमात्माके अपने खमतुल्य प्रतिभासका ही, जो वास्तवमें शून्य है, जगत् नाम रक्खा गया है। जैसे स्फटिक-शिलाका मध्यभाग वास्तवमें घनीभूत है, उसी प्रकार महाचेतन परमात्माका यह जो शान्त और निर्मल अपना स्वरूप है, वह वास्तवमें सच्चिदानन्दघन है। स्फटिक-शिलामें प्रतिबिम्बित होनेवाले वन, पर्वत और नदी आदिके स्वरूपकी भाँति 'है और नहीं है' ये दो दृष्टियाँ चिदाकाश परमात्मामें कहीं नहीं हैं। और प्रतिभासमात्रसे जो कुछ है, उस चेतन-आत्माका स्वरूप ही उस रूपमें भासित होता है—ऐसा समझना चाहिये। (सर्ग २४-३१')
शास्त्रचिन्तन, शास्त्रीय सदाचारके सेवन तथा शास्त्रविपरीत आचारके त्यागसे लाभ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! चिन्मय आकाश-स्वरूप जो 'जीवात्मा' है, वही रजोगुणसे रहित होकर अपने स्वाभाविक स्वरूप—स्वप्रकाशरूपताका त्याग न करता हुआ ही अहंकार, प्राण, देह और इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस विरूप देहको भी अपना आत्मा समझता है। असत्य होकर भी सत्य-सी प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णा-में जल-बुद्धिके समान अपनी ही अविद्यामूलक वासनाकी भ्रान्तिसे जीव मानो अपने चिन्मयरूपसे भिन्नता (जड-देहरूपता) को प्राप्त होता है। जो लोग महावाक्य-रूप शस्त्रसे दृश्य-प्रपञ्चको आगन्तुक समझकर निर्वाण-भावमें स्थित हैं, वे अन्तरात्माकी ओर उन्मुख हुई अपनी बुद्धिसे ही भवसागरसे पार हो जाते हैं। जो उदारचेता पुरुष त्रिलोकीके वैभवको भी सदा तृणके तुल्य समझता है, उसे सारी आपत्तियाँ इस तरह छोड़ देती हैं, जैसे साँप अपनी केंचुलीको। जिसके भीतर सदा सत्यस्वरूप ब्रह्मका चमत्कार स्फुरित होता है, उसकी सारे लोकपाल अखण्ड ब्रह्माण्डके समान रक्षा करते हैं। अपार विपत्तिमें पड़नेपर भी कभी कुमार्गमें पैर नहीं रखना चाहिये; क्योंकि राहु अनुचित मार्गसे अमृत पीनेका प्रयत्न करनेके कारण ही मृत्युको प्राप्त हो गया। जो पुरुष उपनिषद् आदि उत्तम शास्त्र और उनके अनुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंके सम्पर्क रूपी सूर्यका, जो कि परमात्माका साक्षात्कार-रूपी तीव्र प्रकाश देनेवाला है, आश्रय लेते हैं, वे फिर कभी मोहरूपी अन्धकारके वशीभूत नहीं होते। जिसने शम-दम आदि गुणोंके द्वारा यश प्राप्त किया है, वशमें न आनेवाले प्राणी भी उसके वशीभूत हो जाते हैं। उसकी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उसे अक्षय कल्याणकी प्राप्ति होती है। जिनका गुणोंके विषयमें संतोष नहीं है, जिनका शास्त्रोंके प्रति अनुराग है तथा जिन्हें सत्य-पालनका स्वाभाविक अभ्यास है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उनके अतिरिक्त जो दूसरे लोग हैं, वे पशुओंकी ही श्रेणीमें हैं। जिनके यशरूपी चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्राणियोंका हृदयरूपी सरोवर प्रकाशित है, वे क्षीरसागरके समान हैं। उनके शरीरमें निश्चय ही भगवान् श्रीहरिका निवास है।
परम पुरुषार्थरूपी प्रयत्नका आश्रय ले उत्तम उद्योगको अपनाकर शास्त्रके अनुकूल उद्वेगशून्य आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिका भागी नहीं होता। अर्थात् वह सिद्धिका भागी अवश्य होता है। शास्त्रके अनुसार कार्य करनेवाले पुरुषको सिद्धियोंके लिये उतावली नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चिरकालतक परिपक्व 'हुई सिद्धि ही पुष्ट एवं उत्तम फलको देनेवाली होती है। शोक, क्लेश और भयका परित्याग करके घमंड और शीघ्रताके आग्रहको छोड़कर शास्त्रके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके विपरीत चलकर अपना विनाश नहीं करना चाहिये। परिणाममें दुर्भाग्य प्रदान करनेवाली,
स्थिति-प्रकरण ] * शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारके त्यागसे मोक्षकी प्राप्ति * २२९
दीन, शुभ फलसे रहित जो धन, पुत्र आदि लौकिक वस्तुओंकी चिन्ता है, वह दीर्घकालतक बनी रहनेवाली प्रगाढ़ महानिद्रा ही है। उसे त्यागकर सचेत हो जाना चाहिये—विशुद्ध ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर लेना चाहिये। व्यवहारपरायण पुरुषोंके विचारसे लोकमर्यादाके अनुसार तथा शास्त्र और सदाचारके अनुकूल कर्म करके उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिसका चरित्र सदाचारसे सुन्दर तथा बुद्धि विवेकशील है और संसारके सुख-फलरूपी दुःखद दशाओंमें जिसकी आसक्ति नहीं है, उस पुरुषके यश, गुण और आयु—ये तीनों ही वसन्त ऋतुकी लताओंके समान उत्तम फल देनेके लिये शोभाके साथ विकासको प्राप्त होते हैं। (सर्ग ३२)
शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! समस्त साधनोंका अधिक अभ्यास ही सफल होता है। इसलिये सर्वत्र और सदा साधन करनेसे सब प्रकारके फलोंकी प्राप्ति सम्भव है; क्योंकि इष्ट, मित्र, स्वजन एवं बन्धु-बान्धवोंको आनन्द देनेवाले नन्दीने तालाबके किनारे आराधना करके भगवान् शिवको पाकर मृत्युपर भी विजय पा ली। दानव-सेना और धन-धान्यसे सम्पन्न बलि आदि दानवों-द्वारा देवता उसी तरह कुचल दिये गये, जैसे हाथियोंके द्वारा कमलोंसे भरे हुए सरोवर मथ डाले जाते हैं; किंतु फिर अतिशय प्रयत्न करनेके कारण देवताओंने सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। राजा मरुत्तके यज्ञमें महर्षि संवर्तने ब्रह्माजीकी तरह देवताओं और असुरों-सहित दूसरी सृष्टि ही रच डाली थी। (अतिशय साधन और प्रयत्नसे ही उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हुई थी।) शास्त्रीय विधिसे महान् साधनोंके अनुष्ठानमें अत्यन्त संलग्न रहनेवाले विश्वामित्रने बारं बार की गयी कठोर तपस्या-द्वारा दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। राजकुमारी सावित्री अपने पति-प्रेमरूप पातिव्रत्य धर्मके प्रभावसे यमराजको जीतकर उत्तम वाणीका प्रयोग करके संतुष्ट किये हुए यम देवताकी अनुमतिसे अपने पति सत्यवान्को लौटा लायी। संसारमें ऐसा कोई शास्त्रीय शुभ कर्मका अतिशय अनुष्ठान नहीं है, जिसका फल स्पष्टरूपसे प्राप्त न होता हो। अपने मनमें ऐसा विचार करके कल्याणकामी पुरुषोंको सर्वोत्कृष्ट प्रयत्नसे सुशोभित होना चाहिये। सम्पूर्ण सुख-दुःख आदि अवस्थाओंकी भ्रम-दृष्टियोंका मूलोच्छेद करनेवाला परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही है। अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये साधनका अतिशय अभ्यास करना चाहिये। संसार-सागरको पार करनेके लिये सत्पुरुषोंके सङ्ग और सेवाके बिना तप, तीर्थ तथा शास्त्राभ्यास आदि कोई भी साधन सफल नहीं होते। जिसके सेवनसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हों और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
जबतक अन्तःकरणके आकाशमें चैतन्यरूपी चाँदनी अहंकाररूपी मेघमालासे आच्छादित है, तब-तक वह परमार्थरूपिणी कुमुदिनीको विकसित नहीं कर सकती। जबतक हृदयाकाशमें अहम्भावका बादल उमड़-घुमड़कर बढ़ता जाता है, तभीतक तृणारूपी कुटज-कुसुमकी मञ्जरी विकासको प्राप्त होती है। वह मिथ्याकल्पित अहंकार दूषित अन्तःकरणमें अनन्त संसार-बन्धनमें डालनेवाले मोहको जन्म देता है। 'यह देह मैं हूँ' इस प्रबल मोहसे बढ़कर अनर्थकारी दूसरा अज्ञान इस संसारमें न कभी हुआ है और न होगा ही। इस संसारमें यह जो कुछ भी सुख-दुःखरूपी विकार आता है, उसके रूपमें अहंकार-चक्रका ही