संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
( १० )
सिद्ध बन जावे. चाहे कोई इश्वर बननेका दावा करें, परंतु मैं यह कहता हूँ कि तुमको हमारे ही यहाँसे अधिकार करनेकी गति और योग्यता प्राप्त हुई है। यह कहा जाता है कि सन्तान संबंधी विषयोंको जाननेके लिये हमारे पास कुछ भी सामान नहीं है। इस विषयपर ध्यान न देने वाले लोग केवल इतना ही कहकर अपनी जिम्मेदारीसे अलग होना चाहते हैं; परंतु ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि जो खी पुत्र सन्तान पैदा करने-वाले हैं, इश्वरकी शीरसे उनपर यह जिम्मेदारी लागू होती है कि वे सन्तान उत्पन्न करनेकी क्रियाओंको आरम्भ करनेके पहले ही इस विषयका ज्ञान प्राप्त कर लें। यदि ऐसा न होगा तो निःसन्देह यह कहा जायगा कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पर कुछ भी विचार नहीं किया। हमारे यहाँ क्या नहीं है? लाखों पुस्तकोंके जलाये जानेपर भी इतना सामान है कि जिसका कोई ग्राहक नहीं मिलता। चरक, नुश्रुत और वागभट्ट इत्यादि प्राचीन और नवीन वैद्याने क्या कुछ कम कहा है? परंतु सब कुछ होनेपर भी हम उनपर विश्वास नहीं करते। इसका कारण यह है कि हमको अपने शास्त्रोंपर विश्वास करनेका शिक्षा ही माताओंसे नहीं मिली। हमारे हृदयोंपर अपने शास्त्रोंपर विश्वास करनेका श्रंकुर ही नहीं जमाया गया, जिसके बदौलत आज सर्वस्व हानि हमारी ही है। अतएव दरिद्रोंकी भाँति हमको अपनी पैतृक संपत्ति और अपनी पूँजी-से समृद्धिशाली बननेका प्रयत्न करते रहना चाहिये। हम इस
( ११ )
बातको मानते हैं कि इस विषयका अधिकांश क्या, प्रायः सारा सामान संस्कृत विद्यामें है और हिन्दी साहित्यमें लानेके लिये बहुत बड़े यत्न किये गये हैं और होंगे ।
इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गर्भार्धानादि नियमोंको जान कर उत्तम सन्तान पैदा करनेका है । वे ही माता-पिता भाग्य-मान हैं कि जिनकी गोदसे उत्तम और सुयोग्य सन्तान पृथ्वीपर जन्म लेकर संसारका हित करती हैं । अतएव प्रत्येक मनुष्यको उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छा न छोड़नी चाहिये । वेद भगवानका वचन है कि
आत्मा वै जायते पुत्रः
‘पुत्र पिताकी आत्मासे पैदा होता है ।’ अतएव उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंको जाननेके पहले आपको अपनी आत्मा-को बलवान बनाना चाहिये । जब आपकी आत्मा बलवान होगी और आप उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंका पालन करेंगे, तभी उत्तम सन्तान हो सकती है । निदान यह है कि बिना बल-वान आत्मा के उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के नियमोंको जाननेपर भी सुयोग्य सन्तान नहीं हो सकती । प्रिय पाठक, अब भूमिका समाप्त होती है । विद्वानो द्वारा सन्तानोत्पत्ति-विषयक मालूम किये हुए प्राकृतिक नियमोंको अपनी तुच्छ बुद्धिके अनुसार पाठकोंके सामने रखनेकी चेष्टा मैंने की है । इत्यलम् ।
अयोध्याप्रसाद भार्गव
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( ३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ३६ माताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव .. | १७२ |
| ३७ सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव | १७४ |
| ३८ सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव | १७६ |
| ३९ माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव | १७८ |
| ४० सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव .. | १८१ |
| ४१ माताके भोजनका सन्तानपर प्रभाव | १८५ |
| ४२ गर्भवतीके लक्षण | १८६ |
| ४३ गर्भमें क्या है ? | १८८ |
| ४४ मूढ़ गर्भ .. | १९० |
| ४५ गर्भ रह जानेपर कवचक संयोग करना चाहिये ? | १९२ |
| ४६ गर्भवतीके कर्तव्य .. | १९४ |
| ४७ गर्भवतीके रोग .. | १९४ |
| ४८ गर्भलाव और गर्भपात.. | २०४ |
| ४९ मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ? .. | २०६ |
| ५० गर्भमें शरीर कैसे बनता है ? | २०६ |
| ५१ गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ? .. | २१७ |
| ५२ बच्चोंमें मातापिताके रोगोंका संचार | २१८ |
| ५३ शरीरका वर्ण (रंग) .. | २२१ |
| ५४ मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ? .. | २२५ |
| ५५ नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होता | २२८ |
( ४ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ५६ अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ? | २२६ |
| ५७ वच्चा कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है ? | २३२ |
| ५८ तत्काल वच्चा जननेवाली स्त्रीके लक्षण | २३३ |
| ५९ वचकेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य | २३४ |
| ६० जन्म लेनेपर वचको दूध कब पिलाना चाहिये ? | २४८ |
| ६१ वच्चोंकी तौल | २५० |
| ६२ धाय कैसी होनी चाहिये ? | २५२ |
| ६३ वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ? | २५४ |
| ६४ वच्चोंका मल-भूत्र और नींद | २५५ |
| ६५ वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? | २५६ |
| ६६ वच्चोंकी शानेन्डिय | २६५ |
| ६७ स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर | २६५ |
| ६८ दूध कैसे विगडता है ? | २६७ |
| ६९ स्तनोंके रोग | २७१ |
| ७० वच्चोंको कैसे छुलाना चाहिये ? | २७७ |
| ७१ वच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ? | २७९ |
1. रज और वीर्य क्या हैं और कैसे बनते हैं ?
सन्तति-शास्त्र
अर्थात्
मनुष्य जातिकी उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंका संग्रह ।
( १ ) रज और वीर्य क्या हैं और कैसे बनते हैं ?
वैद्यकका मत है कि जो कुछ भोजन किया जाता है वह पकाशयमें पहुँचता है, वहाँ पाचन-शक्तिसे पचकर उसका रस बनता है । इस रसके तीन भाग होते हैं । पहला उत्तम भाग हृदयमें जाता है, मध्यम मल ( पाखाना ) कहलाता है, और तीसरे जलके भागको मूत्र कहते हैं । हृदयमें गया हुआ रस हृदयकी अग्निसे पचता है और रुधिरके रूपमें बदलकर शरीर-रसक रुधिरमें मिल जाता है । रुधिरकी अग्निसे पाचन होकर मल सूक्ष्म और स्थूल दो भागोंमें बँट जाता है । रुधिरका मल पित्त है । यह पित्तसे मिलकर उसको पुष्ट करता है । दूसरा सूक्ष्म भाग रुधिरमें ही रहकर उसकी कमीको पूरा करता है । तीसरा स्थूल भाग शरीरारसक माँसमें मिलता है, और माँसकी अग्निसे पचकर ऊपर बतलाई हुई रीति से बँट जाता है ॥
२
उन्नावि-शास्त्र ।
स्थूल मागमें मनुष्य माग आका मेल है सूक्ष्म माग मांसमें मिलकर उसको पुरु करता है। स्थूल माग मेंमें पहुँचता है और मंदाग्निसे पचकर उसी प्रकार वंद जाता है। इसके मनुष्य माग पसीना है। सूक्ष्म माग मेंमें ही रहकर उनका पोषण करता है। स्थूल माग हाँडियामें जाता है। और हाँडियोंकी अग्निसे पचकर पूर्वमेव वंद जाना है। इसके मनुष्य मागमें मल और कल बनते हैं। सूक्ष्म माग हाँडियामें ही रहकर उनका पोषण करता है। स्थूल माग मन्त्रामें जाता है और मन्त्राग्निसे पचकर पूर्वमेव वंद जाता है। इसके मनुष्य माग आँखोंका मेल और शरीरको चकितम है। सूक्ष्म माग मन्त्रामें ही रहकर उसको पुरु करता है। स्थूल माग शरीरारम्भक वायुमें मिल जाता है और वायुआग्निमें पचकर मन्त्रहिन हो उता है। उसीसे यह दो मागमें वंदता है। स्थूल माग वायुमें ही रहता है और सूक्ष्म मागमें आत्र बनता है। यह हृदयमें रह कर सारे शरीरमें व्यापक रहता है। उससे चोक्रम, तुष्टिपुष्टि और वन उन्मत्त होता है। यही प्राणियाँका जीवन है। इससे अनेक उन्मत्त होनेवानेभाव, उन्माद, बुद्धि, श्रेय, सुन्दरता, लावण्य, और सुष्ठुभारता, इत्यादिकी उत्पात्ति है। मोजन किये हुए पशुयके रससे प्रायः एक मासमें वायु बनता है। बनावल और निवेन पाचन-शक्तिवानोंमें उसीके अनुसार न्यूनाधिक समय बनना चाहिये।
( मन्त्ररुद्र )
इसों प्रकार इसके विषयमें विद्वानोंकी शय है कि रसके मन्त्रविरोधसे बना हुआ रस वायुसे पुरु होकर रहनता है। वायुका कोई विरोध स्थान नहीं है। जिस प्रकार मन्त्र
गतिशब्द,
2. रज और वीर्यमें क्या है ?
रज और वीर्यमें क्या है ?
३
मंस्कन, ईषमे रस और तिलमें तेल सर्वत्र रहता है, इसी प्रकार वीर्य सारे शरीरमें व्याप्त है । ( च० वि० अ० २ श्लो०७३ )
“ प्रायः लोग अण्ड-कोपोको ही वीर्यका स्थान मानते हैं, इस कारण कि रति समयमें वीर्य इन्द्रियोंसे विचकर यहाँ इकट्ठा होता है, और उपस्थ इन्द्रिय द्वारा यहाँसे बाहर निकल जाता है । कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जिस प्रकार श्रोत्र हृदयमें रहकर सारे शरीरमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार वीर्य नाभि-कमलके पास वीर्याश्वमें रहकर सारे शरीरमें फैला रहता है । पुरुषोंकी भाँति स्त्रियोंके शरीरमें भी वीर्य और श्रोत्र वनता है । पुरुषोंमें जो काम वीर्य और श्रोत्रका है, वही स्त्रियोंमें भी है, परंतु स्त्रियोंका वीर्य सन्तानोत्पत्तिमें उपयोगी नहीं होता । जिस प्रकार सन्तानोत्पत्तिके लिये पुरुषोंमें वीर्य प्रधान है, उसी प्रकार स्त्रियोंमें रज प्रधान है ।
इस भाँति रज और वीर्य उत्पन्न होकर प्रकृतिके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं ।
( २ ) रज और वीर्यमें क्या है ?
डाकुरोने अनेक युक्तियोंसे सिद्ध कर दिया है कि वीर्यमें एक प्रकारके कीड़े पाये जाते हैं । डाकुर काल्लिकर (Kalliker) कहते हैं कि शुद्ध वीर्यका कीड़ा \frac{1}{100} इञ्च लम्बा होता है । डाकुर किर्कस (Kirkes) की राय है कि येसे कीड़ोंका सर चिपटा, लम्बा और गोल होता है । सरसे मिली पूँछ \frac{1}{100} से \frac{1}{200} इञ्च तक लम्बी, पतली और पहलुदार होती है । सरकी लम्बाई \frac{1}{1000} और चौड़ाई \frac{1}{3000} इञ्च होती है । ये कीड़े साँप और केतुओंकी भाँति रेंगकर नहीं चलते, किन्तु कुदते हैं । इनके सरकी जड़में एक वारीक तार कीड़ेके आकारसे
3. शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान
४
सन्तति-शास्त्र ।
चौगुना एक फिल्लीमें दँका हुआ होता है। चलनेकी शक्ती इसी तार और फिल्लीमें ही होती है। वीर्यमें थोड़ीसी पतली और बहनेवाली वस्तुके सिवा विशेष भाग कोईका ही होती।
इसी भाँति रजमें भी एक प्रकारके जन्तु पाप जाते हैं। जिनको शर्तव जन्तु, रज-जन्तु या रज-कोप (Sell-) कहने हैं। डाकूर कालिलकरके मतानुसार एक रज-कोपका आकार \frac{1}{300} इञ्च होता है। इसकी दन्तावट एक ग्रण्डकी भाँति होती है। ऐसे रज-कोपका व्यास \frac{1}{320} से \frac{1}{200} इञ्च तक होता है।
रज और वीर्यके मिश्रणमें बालकका शरीर बननेके लिये सारे अवयव रहते हैं। कुछ अंगोंकी उत्पत्ति मानाके रज और कुछेककी पिताके वीर्यमें होती है। इसलिये रज और वीर्यके मेलसे जो आकार घनता है वह सारे अवयवोंसे पूर्ण होता है।
(३) शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान ।
रज और वीर्यका वर्णन पहले कर चुके हैं, साथ ही साथ यह भी जानना आवश्यक है कि शुद्ध और दूषित रज-वीर्यके लक्षण क्या हैं।
शुद्ध रज ।
१—खरहा (खरपाश) के खधिरको समान लाल या लालके रंगके सदृश जिसमें सफेद वस्त्र रंग कर सुखानेसे फिली प्रकारका दाग न पड़े और धो डालनेसे सफेद हो जाय, वही शुद्ध रज है। (सु० न० ७० २ श्लोक १००)
२—लाखके रंगकासा लाल, जिसके निकलनेमें जलन और पीडा न हो कपड़ेमें दाग न पड़े और दुर्गन्ध न आती हो।
(१० क०)
शुद्ध और दूषित रज-वोध्यकी पहचान ।
५
२—दूषित रज ।
१. वातमें दूषित रज ।
१. ऐसे दूषित रजका रंग लालीमें काला लिये होता है और कुछ रुक कर निकलता है । (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग कुसुमके पतले और मुलायम फूलके समान होता है । खावके समय कमर और योनिमें पीड़ा तथा ज्वर भी होता है । (श० क०)
२. पित्तसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें पीला लिये कुछ नीला होता है और निकलनेके समय दाह उत्पन्न करता है। (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग जामुनके फलसे मिलता हुआ होता है खावके समय कुछ पीड़ा और जलन होती है । (श० क०)
३. कफसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें सफेदी या पीलापन लिये होता है, और खावके समय दर्द पैदा करता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा रज कुछ थोड़ा भागदार और खावके समय नाभीके नीचे दर्द पैदा करता है । (श० क०)
४. रक्तमें दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाल होता है । मुरदेकी सी दुर्गंध आती है । अधिक खाव होता है और दाह उत्पन्न करता है । (सुश्रुत)
५. कफ और वायुसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाली लिये होता है और कुटकी सी गांठे पड़ी रहती है । खावमें कष्ट होता है । (सुश्रुत)
4. अण्ड क्या हैं ?
६
सन्तति-शास्त्र ।
८ पित्त और कफसे दूषित रज ।
१ ऐसे रजका रंग लाली लिये पीप सरीखा गाढ़ा और वद्वृद्धार होता है । (सुश्रुत)
७ पित्त और वायुसे दूषित रज ।
१. ऐसा रज क्षीण होता है और कष्टसे निकलता है । (सुश्रुत)
८ निद्रोष ( बात पित्त-कफ ) से दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें म्याही और पीलापन लिये होता है । इसमें मल और सूत्रकी सी दुर्गंध आने लगती है । (सुश्रुत)
२. ऐसा रज गरम, भागदार कष्टसे निकलने और दाह उत्पन्न करनेवाला होता है । (सुश्रुत)
इन आठ प्रकारोंमेंसे नम्बर १-२-३ के रोगचाली स्त्रियाँ निरोग हो सकती हैं, बाकी लगभग असाध्य हैं ।
( सु० न० अ० २ श्लो० ४ )
१. शुद्ध वीर्य ।
१ बिल्लीरी पत्थरके समान, सफेद, पतला, चिकना और मीठा, जिसमें शहदकी सी सुगंध आती हो । कोई वैद्य तेल और गहदके समान वीर्यको भी शुद्ध मानते हैं ।
( सु० स० अ० २ श्लो० १६ )
२- पानी मे डालनेसे ह्वने और कष्टसे न निकलनेवाला वीर्य शुद्ध होता है ।
( श० क० )
शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान ।
७
२. दूषित वीर्य ।
वायुसे दूषित वीर्य ।
१. ऐसे वीर्यका रंग कुछ लालऔर कालापन लिये होता है और कुछ रक्त रक्तरक्त निकलता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा वीर्य भारादार, शुष्क पिच्छिल और कष्टसे निकलता है । (श० क०)
पित्तसे दूषित वीर्य ।
१. ऐसा वीर्य पीली और नीली रंगतका होता है, निकलने में दाह उत्पन्न करता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा वीर्य नीले और पीले रंगका, गरम दुर्गन्धयुक्त और निकलनेमें दाह उत्पन्न करता है । (श० क०)
कफसे दूषित वीर्य ।
१. ऐसे वीर्यका रंग सफेदीसे ज़रा पीलापन लिये होता है और निकलनेमें दर्द पैदा करता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा वीर्य गिलगिला हो जाता है । कफके कारण निकलनेका मार्ग रुक जाता है, और इसी कारण कष्ट होता है । (श० क०)
वृन्मसे दूषित वीर्य ।
१. ऐसे वीर्य का रंग लाल होता है, सुरदेकोसी दुर्गन्ध आती है; बहुत निकलता है और जलन होती है । (सुश्रुत)
२. अतिमैथुन, वस्तिस्थान, लिंग और आस पासके स्थानों में चोट लगने या वीर्य कम होनेसे जो वीर्य निकलता है, उसमें रक्त मिला होता है । (श० क०)
रक्त और वायुसे दूषित वीर्य ।
१. ऐसे वीर्यमें गाठें पड़ जाती हैं और निकलनेमें कष्ट होता है । (सुश्रुत)
5. अण्डोंके रोग
१०
सन्तति-शास्त्र ।
पर स्थित रहता है। यह भिल्ली जलोत्पादक भिल्लीके साथ मिली रहती है। इसके भीतर एक और भिल्ली होती है, वह अण्डाशयमें फैली रहती है। इसके भीतर अण्डोत्पादक कोष होते हैं। रजोधर्मके समयमें अण्डोंका आकार और वजन बढ़ जाता है। यहींसे रज डिम्ब-नालियों द्वारा गर्भगर्भमें पहुँचता है। औरवायुकी प्रेरणासे बाहर हो जाता है। रज बन्द हो जाने पर अण्डे पहलेकी भाँति धीरे धीरे सिकुड़ जाने हैं।
फलवाहिनी नली और अण्डोंका संबंध बहुत बड़ा है। अण्डोंसे रज उत्पन्न होकर फलवाहिनी नली द्वारा गर्भाशयमें पहुँचता है।
( ५ ) अण्डोंके रोग ।
अण्डे ही रज-जन्तुओंका उत्पत्तिके प्रधान स्थान हैं। जब इनसे नियमपूर्वक रज उत्पन्न नहीं होता, तब अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। अण्डोंके रोग तीन प्रकारके होते हैं। ( १ ) वह कि जो जन्मसे ही हैं। ( २ ) वह कि जो वययनमें हैं और ( ३ ) वह कि जो जवानोंमें हैं। जो रोग जन्मसे ही होते हैं उनको असाध्य समझना चाहिये। वययन और जवानोंमें उत्पन्न हुए रोग अच्छे हो सकते हैं। जन्मसे होनेवाले रोग गर्भमें ही हो जाते हैं, इसका कारण गर्भाधानका दोष है। वययन और जवानोंमें उत्पन्न होनेवाले रोगोंका कारण नियमोंका न पालन करना और अनेक प्रकारकी असावधानियाँ हैं।
१. जन्मसे होनेवाले रोग ।
१ अण्डोंका न होना ।
३ यह रोग गर्भसे ही उत्पन्न होता है। कारण यह कि माता-पिताके मिले हुए रज-वीर्यसे बच्चेका शरीर बनता
अण्डाके रोग ।
२१
है। ऐसे रज-वीर्यके मिश्रणमें जिस अंगके बननेका अंग नहीं होता, वह अंग गर्भमें नहीं बनता। अतएव जिन माता पिताके मिले हुए रज-वीर्यमें अण्डे बननेका अंश नहीं होता, उससे उत्पन्न हुई कन्याके गर्भाशयमें अण्डे नहीं होते। (रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं— (रतिशान्त्र)
१. गर्भाशय नहीं होता।
२. शरीर सदैव दुबला रहता है।
३. स्त्रीकी आकृति छोकरके समान होती है।
४. मुख सदैव सूखा और चिपटा हुआ रहता है।
५. पैर पंजमें पड़ी तक चिपटा और सूखा होता है।
६. कद छोटा होता है। कोई स्त्रियाँ कुछ लम्बी होती हैं।
७. अतुल्यस्मर्ग नहीं होना।
८. पुरुषसे मिलनेकी इच्छा नहीं होती।
९. मुखसे सदैव दुर्गन्ध निकला करती है।
२. अण्डोंका पूर्ण रीतिसे न विलना।
१. यह रोग गर्भहीसे उत्पन्न होता है। इसमें अण्डे जवानी पर पूरे तौरसे नहीं खिलते, कारण यह कि जब माता-पिताके मिले हुये रज-वीर्यमें अण्डे बनानेवाला अंश कम होता है, तो ऐसे रज-वीर्यके मिले हुये पदार्थसे उत्पन्न हुई कन्याओंके अण्डे निर्बल और छोटे रह जाते हैं। अतएव वे जवानोंमें अच्छी तरह नहीं खिलते।
(रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं। (रतिशास्त्र)
१. गर्भाशयका छोटा और निर्बल होना।
२. शरीरका सदैव दुबला रहना।
६२
सन्ताति-शास्त्र ।
३. ऋतु-धर्ममें कर्म ।
४. रजोधर्मके समय नारीके दोनों ओर ओर नीचे टट्टा ।
२. बचपनमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. समयके पहले रजस्वला होना । यह उसी समय होना है जब कि कन्याई जल्द सयानी हो जावे और सब बालोंको समझने लगे । यह रोग भ्रनी और शौकीन घरोंकी कन्याओंको विशेष होता है, इसके अनेक कारण हैं ।
१. बुरी सङ्गनका होना ।
२. मिलने और साथ रहनेवाली स्त्रियोंकी हँसी, टिल्लगी और मजाक ।
३. हँसी मजाक और ऐश्यों तथा मनोरञ्जनभरी पुस्तकों का पढ़ना ।
४. ऐसे नये ढंगका अन्हूटा न्यूनाग कि जिससे शीघ्र कामोद्दीपन हो ।
५. ऐसा बुरा व्यवहार कि जिससे पुस्तकोंमें पढ़ी और स्त्रियां या बराबरकी अवस्थावाली कन्याओंसे सुनी बात सच्ची मालूम हो ।
३. जवानीमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. चोट--
यह दो प्रकारकी होती हैं (१) पेटके ऊपरसे लगनेवाली । (२) मँथुनकी असावधानीसे लगनेवाली ।
दोनों प्रकारकी हलकी चोटोंमें थोड़ा टट्टा होता है और आप ही अरुद्ध हो जाता है, परन्तु अधिक चोट लगनेसे अण्डेमें सूजन आ जाती है, और भवाद भी पैदा हो जाता है ।
अण्डोंके रोग ।
१३
अण्डोंकी सूजन ।
यह दो प्रकारकी होती हैं 'नई' और 'पुरानी' ।
१. 'नई सूजन' । यह कभी एक और कभी दोनों अण्डोंमें होती है । ऐसा भी होना है कि एकमें कम और दूसरेमें अधिक हो । इसके अनेक कारण हैं ।
१. पेटके ऊपरकी गहरी चोटसे ।
२. रति समयकी असावधानीसे ।
३. गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
४. किसी प्रकार अण्डोंपर सर्दीके पहुँच जानेसे ।
५. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
६. रक्त-विकारके अनेक उपद्रवोंसे ।
७. पेटके अस्तरकी भिल्लीमें सूजन होनेसे ।
८. रति समयमें स्त्रीको संतोष न होनेसे ।
९. अति मैथुनसे ।
१०. मंदिरा अधिक पीनेसे ।
११. प्रदरके बढ़ने और उसके उपद्रवोंसे ।
१२. जलन उत्पन्न होनेवाली औषधिका गर्भाशयमें लगानेसे ।
१३. खराब खूनवाले पुरुषके साथ संयोगसे । जैसे— कोढ़, गरमी, और सूजाक इत्यादिका रोगी ।
१४. अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नलियोंकी सूजन और इनके दूसरे रोगोंसे ।
१५. योनिसे संबंध रखनेवाले संकामक रोगोंके होनेसे जैसे—गरमी और सूजाक ।
१६. अतु बन्द हो जाने या अधिक होने या चार छः मासमें एक दो चार होने या थोड़ा थोड़ा होनेसे ।
सन्तति-शास्त्र ।
१४
१७ हिस्टीरियाके दौरेके समय जब अतुल्यमं होनेवाला हो तो अण्डोंमें रक्तके डकड़ा हो जानेसे ।
२ 'पुरानी सूजन'—नई सूजन जब अच्छी नहीं होती तो कुछ दिनों पीछे वह पुरानी हो जाती है। इन दोनों प्रकारकी सूजनमें अनेक लक्षण होते हैं।
१. पेड़ और साथियोंमें दर्द होना ।
२. पेड़के एक और या दोनों ओर दर्द होना । जब एक ओरका अण्ड सूजा होता है तो एक ओर, और दोनों ओरके सूजने पर दोनों ओर दर्द होता है ।
३. रजस्वला होनेमें रक्तका कम या अधिक आना या एकादम बन्द हो जाना ।
४. रक्त रक्त कर पीड़ा होना, जब कि सूजन हलकी हो।
५. सूजन बढ़ने पर वरावर और अधिक पीड़ा होना ।
६. रजोदर्शनके समय दर्द का बढ़ जाना ।
७. जिस ओरका अण्ड सूजा हो उस ओरकी जाँगमें दर्द होना ।
८. ज्वर, कन्डियत, छाती और पेटमें जलन होना ।
९. मूत्रका थोड़ा थोड़ा आना और जलन होना ।
१०. मँथुनमें पीड़ा होना ।
११. रोग बढ़नेपर पेड़ से अण्डोंतक तथा अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नस्ती और नलियोंमें दर्द ।
१२. दूसरे रोगोंके मिलने और उपद्रवोंके बढ़ जानेसे उन्माद होना ।
१३. कुपच, उपकार्द और धुमनीका होना ।
१४, बड़े हुए रोगमें सन्निपातकीसी दशाका होना ।
१५, बड़े हुए रोगमें मूली और दस्तका होना ।
अण्डोके रोग ।
१५
१६. अन्तिम दशामें पेटके अस्तरकी फिल्ली सूजन आ जाता है ।
१७ ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है कष्ट भी उसीके साथ बढ़ता जाता है ।
३. अण्डोका एक जाना—
१. यह रोग अण्डोकी सूजनके पीछे होता है । ऐसी दशामें मवाद दो तरहसे निकलती है ( १ ) चीर कर ( २ ) आपही आप फूट कर ।
जो मवाद आप ही फूटकर निकलती है वह दो ओरको जाती है ( १ ) भगकी ओर ( २ ) पेटके अस्तरकी फिल्लीसे फूटकर भीतरकी ओर । चीरकर निकाल लेना अथवा भगकी ओरसे निकल जाना अच्छा है, परन्तु फिल्लीका टूट जाना मौतकी निशानी है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्डोकी सूजनके समय ज्वरका आना अथवा कुछ दिनोंतक उसका बराबर रहना ।
२. सूजनके समय अण्डोमें चाँट लगना ।
३. रक्त-विकारसे ।
इसके निम्नलिखित लक्षण हैं ।
१. ऊपर कहे हुए अण्डोकी सूजनके सारे लक्षण ।
२. खड़े होनेमें पीड़ा ।
३. पीड़ासे कमर झुक जाना और चलते समय पैरोंका थराना ।
४. अण्डोका भंश ।
१. यह कठिन रोग है । इसमें दोनों ओर या एक ओरका अण्डा अपने स्थानसे खसक कर पीछे या योनि-द्रोणमें आ जाता है । इसके अनेक कारण हैं ।
32. प्रेम द्वारा उत्तम संन्तानकी उत्पत्ति
१६
सन्तति-शास्त्र ।
१. अरण्डोंमें रक्तका जमाव होनेमें या और किसी कारण वजन बढ़ जानेसे ।
२. गर्भाशयके हटनेसे ।
३. फलवाहिनी नलीके विकार या उसके टेढ़े होनेसे ।
४. कड़ी चोट या दबाव पहुँचनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. पाखना जाते समय पेड़ और अरण्डोंके स्थानोंमें दर्द होता ।
२. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता ।
३. पेड़ और अरण्डोंकी जगह दवानेसे पीड़ा होता ।
४. घुमनी पेटका भारीपन और कुपच होता ।
५. जिस और अण्ड भुका हो उधर के पेड़में दर्द होता ।
अण्डोंकी गाँठें ।
१ ये दो प्रकारकी होती हैं ।
(१) शैलीदार ।
(२) गूच मरी हुई दोस ।
२ शैलीदार गाँठें तीन प्रकार की होती हैं ।
(१) मामूली ।
(२) जिसमें कुछ गाढ़ा पदार्थ रहता है ।
(३) जिसमें चरबीका भाग होता है ।
दोस और तीसरी तरहकी गाँठें बहुत कम पाई जाती हैं । ये अण्डोंपर होती हैं । प्रायः अण्डों और गर्भाशयके बीचमें भी पाई जाती हैं । प्रारम्भमें कुछ जान नहीं पड़ता, पर गाँठें ज्यों ज्यों बढ़ती जाती हैं, त्यों त्यों कष्ट भी बढ़ता जाता है । रोग उत्पन्न होने ही सारे लक्षण प्रकट नहीं होते । विषवा और कुमारी
अरडोके रोग ।
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स्त्रियों में यह रोग अधिक होता है । पहले पहल प्रायः तीन लक्षण होते हैं ।
१. मैथुनमें कष्ट ।
२. पाचनशक्तिका कम हो जाना ।
३. रजो-धर्मका न होना या थोड़े कष्टके साथ होना ।
रोगके साथ पेटकी सूजन बढ़ती जाती है । मुख, हाथ-पांव और पेटसे गर्भके लक्षण प्रगट होते हैं । पेशी दशामें जब रजोधर्म बन्द होजाता है, तो गर्भका सन्देह होता है । जिनके रजोधर्म बन्द नहीं होता उनके मोटे होनेका सन्देह रहता है । कुछ दिन बीतनेपर अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. हथेली, तलुचे और भगमें जलन उत्पन्न होना ।
२. आंतोंका भारी पड़ जाना ।
३. पेशाबका रक्त २ कर आना ।
४. सिवा पेटके और सब अङ्गोंसे क्षय (तपेदिक) के लक्षण प्रतीत होना ।
५. बड़े हुए रोगमें सारे शरीर में कठिन पीड़ा होना ।
६. फेफड़ेका विगड़ जाना और साँसका जल्दी चलना ।
७. सारे शरीरका पीला पड़ जाना ।
८. खड़े करके देखनेमें गाँठोंका दिखलाई देना ।
९. अत्यन्त बड़े रोगमें सारे शरीरपर सूजन का होना ।
यह रोग बहुत धीरे धीरे होता है । इसके तीन तीन चार चार वर्षके रोगी पाए जाते हैं । इतने दिनोंमें गाठों से सारा पेट भर जाता है । सबसे अच्छा इलाज चीरकर गाठें निकाल लेना है ।
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