संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
अण्डाके रोग ।
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है। ऐसे रज-वीर्यके मिश्रणमें जिस अंगके बननेका अंग नहीं होता, वह अंग गर्भमें नहीं बनता। अतएव जिन माता पिताके मिले हुए रज-वीर्यमें अण्डे बननेका अंश नहीं होता, उससे उत्पन्न हुई कन्याके गर्भाशयमें अण्डे नहीं होते। (रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं— (रतिशान्त्र)
१. गर्भाशय नहीं होता।
२. शरीर सदैव दुबला रहता है।
३. स्त्रीकी आकृति छोकरके समान होती है।
४. मुख सदैव सूखा और चिपटा हुआ रहता है।
५. पैर पंजमें पड़ी तक चिपटा और सूखा होता है।
६. कद छोटा होता है। कोई स्त्रियाँ कुछ लम्बी होती हैं।
७. अतुल्यस्मर्ग नहीं होना।
८. पुरुषसे मिलनेकी इच्छा नहीं होती।
९. मुखसे सदैव दुर्गन्ध निकला करती है।
२. अण्डोंका पूर्ण रीतिसे न विलना।
१. यह रोग गर्भहीसे उत्पन्न होता है। इसमें अण्डे जवानी पर पूरे तौरसे नहीं खिलते, कारण यह कि जब माता-पिताके मिले हुये रज-वीर्यमें अण्डे बनानेवाला अंश कम होता है, तो ऐसे रज-वीर्यके मिले हुये पदार्थसे उत्पन्न हुई कन्याओंके अण्डे निर्बल और छोटे रह जाते हैं। अतएव वे जवानोंमें अच्छी तरह नहीं खिलते।
(रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं। (रतिशास्त्र)
१. गर्भाशयका छोटा और निर्बल होना।
२. शरीरका सदैव दुबला रहना।
६२
सन्ताति-शास्त्र ।
३. ऋतु-धर्ममें कर्म ।
४. रजोधर्मके समय नारीके दोनों ओर ओर नीचे टट्टा ।
२. बचपनमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. समयके पहले रजस्वला होना । यह उसी समय होना है जब कि कन्याई जल्द सयानी हो जावे और सब बालोंको समझने लगे । यह रोग भ्रनी और शौकीन घरोंकी कन्याओंको विशेष होता है, इसके अनेक कारण हैं ।
१. बुरी सङ्गनका होना ।
२. मिलने और साथ रहनेवाली स्त्रियोंकी हँसी, टिल्लगी और मजाक ।
३. हँसी मजाक और ऐश्यों तथा मनोरञ्जनभरी पुस्तकों का पढ़ना ।
४. ऐसे नये ढंगका अन्हूटा न्यूनाग कि जिससे शीघ्र कामोद्दीपन हो ।
५. ऐसा बुरा व्यवहार कि जिससे पुस्तकोंमें पढ़ी और स्त्रियां या बराबरकी अवस्थावाली कन्याओंसे सुनी बात सच्ची मालूम हो ।
३. जवानीमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. चोट--
यह दो प्रकारकी होती हैं (१) पेटके ऊपरसे लगनेवाली । (२) मँथुनकी असावधानीसे लगनेवाली ।
दोनों प्रकारकी हलकी चोटोंमें थोड़ा टट्टा होता है और आप ही अरुद्ध हो जाता है, परन्तु अधिक चोट लगनेसे अण्डेमें सूजन आ जाती है, और भवाद भी पैदा हो जाता है ।
अण्डोंके रोग ।
१३
अण्डोंकी सूजन ।
यह दो प्रकारकी होती हैं 'नई' और 'पुरानी' ।
१. 'नई सूजन' । यह कभी एक और कभी दोनों अण्डोंमें होती है । ऐसा भी होना है कि एकमें कम और दूसरेमें अधिक हो । इसके अनेक कारण हैं ।
१. पेटके ऊपरकी गहरी चोटसे ।
२. रति समयकी असावधानीसे ।
३. गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
४. किसी प्रकार अण्डोंपर सर्दीके पहुँच जानेसे ।
५. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
६. रक्त-विकारके अनेक उपद्रवोंसे ।
७. पेटके अस्तरकी भिल्लीमें सूजन होनेसे ।
८. रति समयमें स्त्रीको संतोष न होनेसे ।
९. अति मैथुनसे ।
१०. मंदिरा अधिक पीनेसे ।
११. प्रदरके बढ़ने और उसके उपद्रवोंसे ।
१२. जलन उत्पन्न होनेवाली औषधिका गर्भाशयमें लगानेसे ।
१३. खराब खूनवाले पुरुषके साथ संयोगसे । जैसे— कोढ़, गरमी, और सूजाक इत्यादिका रोगी ।
१४. अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नलियोंकी सूजन और इनके दूसरे रोगोंसे ।
१५. योनिसे संबंध रखनेवाले संकामक रोगोंके होनेसे जैसे—गरमी और सूजाक ।
१६. अतु बन्द हो जाने या अधिक होने या चार छः मासमें एक दो चार होने या थोड़ा थोड़ा होनेसे ।
सन्तति-शास्त्र ।
१४
१७ हिस्टीरियाके दौरेके समय जब अतुल्यमं होनेवाला हो तो अण्डोंमें रक्तके डकड़ा हो जानेसे ।
२ 'पुरानी सूजन'—नई सूजन जब अच्छी नहीं होती तो कुछ दिनों पीछे वह पुरानी हो जाती है। इन दोनों प्रकारकी सूजनमें अनेक लक्षण होते हैं।
१. पेड़ और साथियोंमें दर्द होना ।
२. पेड़के एक और या दोनों ओर दर्द होना । जब एक ओरका अण्ड सूजा होता है तो एक ओर, और दोनों ओरके सूजने पर दोनों ओर दर्द होता है ।
३. रजस्वला होनेमें रक्तका कम या अधिक आना या एकादम बन्द हो जाना ।
४. रक्त रक्त कर पीड़ा होना, जब कि सूजन हलकी हो।
५. सूजन बढ़ने पर वरावर और अधिक पीड़ा होना ।
६. रजोदर्शनके समय दर्द का बढ़ जाना ।
७. जिस ओरका अण्ड सूजा हो उस ओरकी जाँगमें दर्द होना ।
८. ज्वर, कन्डियत, छाती और पेटमें जलन होना ।
९. मूत्रका थोड़ा थोड़ा आना और जलन होना ।
१०. मँथुनमें पीड़ा होना ।
११. रोग बढ़नेपर पेड़ से अण्डोंतक तथा अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नस्ती और नलियोंमें दर्द ।
१२. दूसरे रोगोंके मिलने और उपद्रवोंके बढ़ जानेसे उन्माद होना ।
१३. कुपच, उपकार्द और धुमनीका होना ।
१४, बड़े हुए रोगमें सन्निपातकीसी दशाका होना ।
१५, बड़े हुए रोगमें मूली और दस्तका होना ।
अण्डोके रोग ।
१५
१६. अन्तिम दशामें पेटके अस्तरकी फिल्ली सूजन आ जाता है ।
१७ ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है कष्ट भी उसीके साथ बढ़ता जाता है ।
३. अण्डोका एक जाना—
१. यह रोग अण्डोकी सूजनके पीछे होता है । ऐसी दशामें मवाद दो तरहसे निकलती है ( १ ) चीर कर ( २ ) आपही आप फूट कर ।
जो मवाद आप ही फूटकर निकलती है वह दो ओरको जाती है ( १ ) भगकी ओर ( २ ) पेटके अस्तरकी फिल्लीसे फूटकर भीतरकी ओर । चीरकर निकाल लेना अथवा भगकी ओरसे निकल जाना अच्छा है, परन्तु फिल्लीका टूट जाना मौतकी निशानी है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्डोकी सूजनके समय ज्वरका आना अथवा कुछ दिनोंतक उसका बराबर रहना ।
२. सूजनके समय अण्डोमें चाँट लगना ।
३. रक्त-विकारसे ।
इसके निम्नलिखित लक्षण हैं ।
१. ऊपर कहे हुए अण्डोकी सूजनके सारे लक्षण ।
२. खड़े होनेमें पीड़ा ।
३. पीड़ासे कमर झुक जाना और चलते समय पैरोंका थराना ।
४. अण्डोका भंश ।
१. यह कठिन रोग है । इसमें दोनों ओर या एक ओरका अण्डा अपने स्थानसे खसक कर पीछे या योनि-द्रोणमें आ जाता है । इसके अनेक कारण हैं ।
32. प्रेम द्वारा उत्तम संन्तानकी उत्पत्ति
१६
सन्तति-शास्त्र ।
१. अरण्डोंमें रक्तका जमाव होनेमें या और किसी कारण वजन बढ़ जानेसे ।
२. गर्भाशयके हटनेसे ।
३. फलवाहिनी नलीके विकार या उसके टेढ़े होनेसे ।
४. कड़ी चोट या दबाव पहुँचनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. पाखना जाते समय पेड़ और अरण्डोंके स्थानोंमें दर्द होता ।
२. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता ।
३. पेड़ और अरण्डोंकी जगह दवानेसे पीड़ा होता ।
४. घुमनी पेटका भारीपन और कुपच होता ।
५. जिस और अण्ड भुका हो उधर के पेड़में दर्द होता ।
अण्डोंकी गाँठें ।
१ ये दो प्रकारकी होती हैं ।
(१) शैलीदार ।
(२) गूच मरी हुई दोस ।
२ शैलीदार गाँठें तीन प्रकार की होती हैं ।
(१) मामूली ।
(२) जिसमें कुछ गाढ़ा पदार्थ रहता है ।
(३) जिसमें चरबीका भाग होता है ।
दोस और तीसरी तरहकी गाँठें बहुत कम पाई जाती हैं । ये अण्डोंपर होती हैं । प्रायः अण्डों और गर्भाशयके बीचमें भी पाई जाती हैं । प्रारम्भमें कुछ जान नहीं पड़ता, पर गाँठें ज्यों ज्यों बढ़ती जाती हैं, त्यों त्यों कष्ट भी बढ़ता जाता है । रोग उत्पन्न होने ही सारे लक्षण प्रकट नहीं होते । विषवा और कुमारी
अरडोके रोग ।
१७
स्त्रियों में यह रोग अधिक होता है । पहले पहल प्रायः तीन लक्षण होते हैं ।
१. मैथुनमें कष्ट ।
२. पाचनशक्तिका कम हो जाना ।
३. रजो-धर्मका न होना या थोड़े कष्टके साथ होना ।
रोगके साथ पेटकी सूजन बढ़ती जाती है । मुख, हाथ-पांव और पेटसे गर्भके लक्षण प्रगट होते हैं । पेशी दशामें जब रजोधर्म बन्द होजाता है, तो गर्भका सन्देह होता है । जिनके रजोधर्म बन्द नहीं होता उनके मोटे होनेका सन्देह रहता है । कुछ दिन बीतनेपर अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. हथेली, तलुचे और भगमें जलन उत्पन्न होना ।
२. आंतोंका भारी पड़ जाना ।
३. पेशाबका रक्त २ कर आना ।
४. सिवा पेटके और सब अङ्गोंसे क्षय (तपेदिक) के लक्षण प्रतीत होना ।
५. बड़े हुए रोगमें सारे शरीर में कठिन पीड़ा होना ।
६. फेफड़ेका विगड़ जाना और साँसका जल्दी चलना ।
७. सारे शरीरका पीला पड़ जाना ।
८. खड़े करके देखनेमें गाँठोंका दिखलाई देना ।
९. अत्यन्त बड़े रोगमें सारे शरीरपर सूजन का होना ।
यह रोग बहुत धीरे धीरे होता है । इसके तीन तीन चार चार वर्षके रोगी पाए जाते हैं । इतने दिनोंमें गाठों से सारा पेट भर जाता है । सबसे अच्छा इलाज चीरकर गाठें निकाल लेना है ।
२
33. वच्चोंपर मातापिताके मनोविलका प्रभाव
१८
नन्दादिशास्त्र ।
६. नन्दादिशान्तर-
१. यह योग अज्ञान स्थित्ये विभेद होता है। इसके अनेक कारण हैं—
१. कल अवस्थाने ही संयुक्तों अधिक्ता।
२. रक्षका कल होता।
३. सार कार गर्भका गिरता।
४. अर्द्धांनं गहरी बौद्धका पहुँचता।
५. पत्नी औपधियोंका काला कि जिससे संशोधन बन्द होता है।
६. विषम स्वरके होनेसे।
७. उपवास, नन्दादि और संग्रहणसे।
८. शरीरसे रक्तका कमी रक्त कल करने से।
९. नन्दिश अधिक पीनेसे।
इनमें अनेक तत्त्व होने हैं।
१. प्रारम्भसे रजका रक्त रक्त और आना और गंगवृद्धिसे पर बन्द हो जाता।
२. नुक्ते अन्तर्त दुर्गदका आना।
३. पुरुष संयोगको चित्त न चाहता।
४. अर्द्धांनं काले।
१. यह मातृसौ योग नहीं है। अर्द्धांनं अन्तर प्रवर्त पदार्थ नर जाता है, जिससे अर्द्धांनं बढ़ जाता है और पद अन्तरांनं समाप्त हो जाता है। अर्द्धांनं और उसके अन्तरांनं गाँठ पड़ जाती है अथवा एकके नीचे दूसरे गाँठ पैदा हो जाती है। एक गाँठ होने पर उसके नीचे गहरी कोई चीज नहीं होती है,
अण्डोंके रोग ।
१६
और जब बहुतसी गर्ठि होतीहैं तो काले रंगका चिकना तथा बहनेवाला पदार्थ भरा रहता है ।
प्रायः २० से ४० वर्ष तककी अवस्थावाली स्त्रियोंको जो मैथुनकी विशेष इच्छा रखती हैं, चाहे वे कुमारी हों या विवाहिता, यह रोग होता है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. रजके विकारसे ।
२. कुपचर्क बढ़ जानेसे ।
३. फलवाहिनी नलीकी एकावृटके कारण रजके ठीक ठीक न निकलनेसे ।
४. गर्भाशयके विकारोंमें रजके ठीक तौर पर न निकलेसे ।
ऐसी दशामें प्रायः लोग गर्भका सन्देह करते हैं, परन्तु यह एक भ्रम है । इसके अनेक लक्षण होते हैं ।
१. धीरे धीरे पेटका बढ़ना ।
२. कमर, जाँघ और रीढ़में कठिन पीड़ा ।
३. अत्यन्त दुर्बलता और निर्बलता ।
४. कभी कभी कम, अधिक सूत्रका आना ।
५. पेटका जलंधरके समान बढ़ जाना ।
६. साँसका जल्दी चलना ।
७. कभी रजका कम आना, कभी अधिक और कभी विलकुल न आना ।
८. बड़े हुए रोगमें पैरोंपर शोथ ।
९ जब एक ही रसौली अण्डेके पास हो तो पेट गोल हो जाता है ।
१० जब कई रसौली हों तो पेट ऊँचा-नीचा हो जाता है ।
6. फलवाहिनी नली क्या है ?
२५
सन्तति-शास्त्र ।
११. योनिमें हाथ डालकर दंडने संप्रैसी रसाली नाभिसे लगी हुई जान पडती है ।
इस रोगमें बहुत बड़ा भ्रम हो जाता है ।
बढ़ने पर लोग उसे अलंधर समझकर औषधि करते हैं । इसलिये नृव जांच कर लेनी चाहिये ।
इस प्रकार अण्डोंमें अनेक रोग होने हैं । जब ऋतु-धर्ममें किसी प्रकारकी खराबी मालूम हो, तो तुरन्त अण्डोंकी जाँच करानी चाहिये क्योंकि जब अण्डोंमें कुछ फसाद होता है, तभी ऋतु-धर्म भी बिगड़ता है ।
(६) फलवाहिनी नली क्या है ?
यह बतलाया जा चुका है कि जिस प्रकार पुरपोंके दो अण्डकोप होते हैं उसी भाँति स्त्रियोंके भी होते हैं । भेड़ इतना ही होता है कि पुरपोंके दोनों ओर बाहर लट्के रहते हैं और स्त्रियोंके भीतर दहिने बाएँ छिपे रहते हैं । इन्हीं अण्डों और गर्भाशयसे फलवाहिनी नलीका संबंध होता है । यह दोनों ओर दहिने बाएँ अण्डोंसे लगी रहती है और गर्भाशयके वंथनोंके ऊपरी सिरेमें होती हुई समाप्त होती है । लम्बाई ४ इञ्च तक और अण्डाशयकी ओरका भिन्न पंजेकी भाँति होता है । रज और अण्डकोश इसी नलीमें होकर गर्भाशयमें पहुँचते हैं । इसका खास काम यही है कि अण्डाशयसे रज और रजकोप-ओं गर्भाशय में पहुँचावे । अतएव गर्भस्थिति होनेके लिये यह एक सहायक अवयव है । इससे गर्भाशयको बहुत बड़ी सहायता पहुँचती है ।
(७) फलवाहिनी नली के रोग ।
सन्तान उत्पन्न करनेके विषयमें गर्भ, अण्ड, फलवाहिनी
7. फलवाहिनी नली के रोग
फलवाहिनी नलीके रोग।
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नली और गर्भाशय ये चार अवयव प्रधान हैं। इनमें फलवाहिनी नलीका काम यह है कि वह गर्भ-अण्डसे गर्भाशयमें ठीक रीतिसे रजको पहुँचावे। इन तीनोंका आपसमें बहुत बड़ा संबंध है। जब गर्भाशय और गर्भ-अण्डमें विकार उत्पन्न होता है तो फलवाहिनी नलीमें अवश्य होता है। जब इसमें विकार उत्पन्न होता है तब गर्भ-अण्ड और गर्भाशयमें हो जाता है। इस प्रकार एक दूसरेके संबंधसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं।
१. फलवाहिनीनलीका शोथ। इसके अनेक कारण हैं—
१. गर्भ-अण्ड और गर्भाशय के शोथ से।
२. रजविकार या चोट से।
३. गुरदे के अनेक रोगों और सरदी पहुँचने से।
४. मदरके अनेक उपद्रव और प्रतिमैथुन से।
इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं—
१. रजका ठीक समय पर न आना।
२. पेट में पीड़ा और नली में भारीपन।
३. पेट्को ऊपर से दवाने में दर्द।
४. कञ्जियत और भोजन में अरुचि।
इस रोगमें बड़ी सावधानी रखनी चाहिये क्योंकि सूजन के कारण नलीका सुराख बहुत छोटा रह जाता है।
२ फलवाहिनी नलीका टेढ़ा या संकुचित हो जाना।
इसके कई कारण हैं—
१. रक्त-विकार और पेट के परदों में शोथ उत्पन्न होनेसे।
२. गर्भाशय में किसी तरह की चोट पहुँचने से।
३. फलवाहिनी नलीमें किसी प्रकार रक्त जम जाने से।
४. नली में एक प्रकार के मस्से उत्पन्न हो जाने से।
8. गर्भाशय (Uterus)
२२
सन्तति-शास्त्र ।
५. गर्भ-अण्ड और गर्भाशय के अनेक विकार और रोगोंसे ६. गर्भाशय या गर्भ-अण्ड के दल जाने से ।
इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं—
१. प्रथम नली में शोथ होता है । २. गर्भाशय के आसपास में दर्द होता है ।
इस रोग के बढ़ने पर स्त्री वन्ध्या हो जाती है, ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, कष्ट बढ़ता जाता है ।
३ फलवाहिनी नली में रक्त जम जाना । इसके कई कारण हैं—
१. जब कि गर्भाशय से रक्त का स्वाव न हो या रज- विकार हो । २. जब कि फलवाहिनी नलीके मुख में कुछ रुकावट हो। ३. गर्भाशय के अनेक रोगों से ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. नलीमें भारीपन मालूम होता । २. नली में पीड़ा और दहिन बाँध मुकने में दर्द । ३. गर्भ-अण्ड में पीड़ा होना और थोड़ा रज निकलना ।
जब फलवाहिनी नली में रक्त जम जाता है और वह थोड़ा होता है तो रज थोड़ा थोड़ा आता है, जब अच्छी तरह जम जाता है तो रज प्रायः बन्द हो जाता है और अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
( ८ ) गर्भाशय [ Uterus ]
गर्भाशय स्त्री के शरीरका वह अवयव है कि जहाँ बच्चा रहता है । इस के आगे मूत्राशय (पेशाब इकट्ठा होने की जगह) पीछे मलाशय (मल इकट्ठा होने की जगह) और ऊपर नाभी होती है । यह एक फिल्ली का बना हुआ खोखला अवयव है ।
9. गर्भाशय के रोग
गर्भाशयके रोग ।
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इसमें रक्ख की भाँति फैलने और सुकड़ने की शक्ति होती है आकार ठीक एक नासपाती (Pyiform) के समान होता है ।
वैद्यक का मत है कि स्त्रियों की योनि शंख की नाभी के आकार की तीन फेरवाली होती है । उसके तीसरे फेर में गर्भाशय रोह मछली के मुख के सदृश और उसीके समान होता है ।
( सु० श० ३० ४९ व ५० )
यह तीन भागोंमें बँटा रहता है । ऊपरके भागको (Fundus) कहते हैं । दूसरा नीचे का पतला भाग, इसको गर्दन या शीवा ( Cervix ) कहते हैं । यह सुराही की भाँति लम्बा और गोल योनि तक होता है । मुख ऊपरी भागमें आगेकी दीवारके ओर होता है । लम्बाई स्त्रीके शरीरकी लम्बाईके अनुसार होती है । इसका भीतरी मुख गर्भाशयमें रहता है । तीसरा बीचका भाग कि जिसको गर्भाशय (Body) कहते हैं, पोला होता है । इसके दोनों ओर टहिन बायें अण्ड और अण्डवाहक नालियोंके छेद होते हैं इसी गस्ते से रज गर्भाशयमें पहुँचता है । गर्भाशय इतना छोटा होने पर भी गर्भके पूरे दिनों तक पच्चीस गुना बढ़ जाता है । यह हर समय गर्भ धारण नहीं करता । वैद्यक का मत है कि जिस प्रकार सन्ध्या होने पर कमल बन्द हो जाता है उसी तरह रजोदर्शनसे सोलह रात्रि बीत जाने पर गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है ( सु० श० अ० ३२ लो० ८ ) इसके बाद गर्भाशय गर्भ धारण नहीं करता, परन्तु अर्द्धरात्रि ऋतुमती होने पर गर्भ धारण होता है । इस बिषयपर आगे लिखा जायगा ।
(६) गर्भाशय के रोग ।
यह कह चुके हैं कि गर्भाशय वह जगह है कि जहाँ बच्चा
२४
सन्तति-शास्त्र ।
रहता है । इसमें नाना भाँति के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और उनके अनेक भेद हैं ।
१—गर्भाशय के बाहरी मुखका छोटा होजाना ।
इसके दो भेद हैं—
१ जन्म से छोटा होना ।
२ समय पाकर छोटा होना ।
१ पहला भेद—जन्म से छोटा होना ।
यह रोग गर्भ से ही होता है । इसका कारण यह है कि—
१. जब माता पिता के मिले हुये रज-वीर्य में जिस अवयव के बनाने का अशक्त कम होता है, वह अवयव गर्भ में अधूरा बन जाता है ऐसेही इसको भी समझना चाहिये ।
ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. ऋतु, धर्मकी रुकावट ।
२. गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाने से सूजन ।
३. गर्भाशय से संबंध रखने वाली दन्तियों की सूजन ।
४ रजकी गर्भा से भीतरी अवयव के किसी भाग का पक जाना ।
५ रजका अत्यन्त कष्ट से निकलना ।
६ पैड़, पीठ और साँथलों में पीड़ा ।
७ दर्द के कारण स्त्री का ठीक तौर से खड़ा न हो सकना ।
८ छातियों में दर्द, पेट में अपफार और असुविधा ।
९ सरदर्द, पेटमें जलन और कन्क ।
यह कठिन रोग है इसके बढ़ जाने पर रोगी की दशा बिगड़ जाती है ।
गर्भाशयके रोग ।
२५
२. इतरा भेद—ममय पान्जर मुखका छोटा हो जाना ।
गर्भाशय के मुख पर तेजाव सरीखा कोई जलानेवाला पदार्थ लगाया जाना ।
२. गर्भाशय में सूजन या दूसरे रोगों का होता ।
३. योनि के अनेक रोगों से ।
४. गर्भाशय के मुखपर किसी प्रकार की चोट-श्रौजार या किसी दूसरी तरह से ।
५. किसी प्रकार का दाब गर्भाशय के मुख पर हो जाने से । ऐसी दशा में भी उपरोक्त लक्षण होने हैं । रोग बढ़ने पर दशा बहुत बिगड़ जाती है इसमें शीघ्र उपचार करता चाहिये ।
२. गर्भाशयकी सूजन ।
(क) “हनीमोंका मत”-गर्भाशय में चार प्रकार की सूजन होती है ( १ ) गर्भाशय की गरम सूजन ( २ ) ठंडी सूजन ( ३ ) दाढ़ी की कड़ी सूजन ( ४ ) बड़ी और फैली हुई सूजन ।
१. गर्भाशय की गरम सूजन—इसके कई कारण हैं ।
१. गर्भाशय पर चोट लगने से ।
२. किसी प्रकार गर्भाशय पर दबाव पहुंचने से ।
३. गरम औषधियों को गर्भाशय में लगाने से, जिनसे कि जलन पैदा हो ।
४. गरमी, सूजांकवाले पुरुषों के संयोग से ।
५. रजोयममें की रूकावट से ।
६. श्रुतिमैथुन से ।
७. गर्भ गिर जाने से ।
८. छोटी अवस्था में पहले ही पहल जवान पुरुष के साथ संयोग करने से कि जिसकी इन्द्रिय लम्बी हो । ( इस कारण गर्भाशयपर एक दम दबाव पड़ता है )
२६
सन्तति-शास्त्र ।
६. वच्चा पैदा होते समयकी कठिनता सं ।
१०. रक्त विकार और अनेक असावधानियां सं ।
पेसी सूजन पाँच जगह पर होती है, जिसके अलग अलग अनेक लक्षण होते हैं ।
१ गर्भाशय के अगले भाग में नीचे की ओर सूजन के लक्षण ।
१ तेज ज्वर का होना ।
२ कै और दस्तों का प्रकोप ।
३ सर में दर्द होना ।
४ तालू और पेट्टू में पीड़ा ।
२ गर्भाशय के अगले भाग में नीचे की ओर की सूजन के लक्षण ।
१ सूत्र का कठिनता सं आना ।
२ सूत्र का रुक रुक कर दर्द के साथ उतरना ।
३ गर्भाशय के अन्त में ऊपर की ओर सूजन के लक्षण ।
१ दोनों निचलों के बीच की ओर पीठ में दर्द ।
२ दोनों पैरों में भडकन और तालू में जलन ।
४ गर्भाशय के अन्त में नीचे की ओर सूजन के लक्षण ।
१ दस्त में रक्तावष्ट का होना ।
२ अधोवायु की रक्तावष्ट ।
५ गर्भाशय के दोनों वगल में सूजन के लक्षण ।
१ दोनों कोखों में दर्द का होना ।
२ दोनों तित्थों में पीड़ा ।
ऊपर लिखे हुए लक्षण अलग अलग तो होते ही हैं, परंतु नीचे लिखे हुए लक्षण हर अवस्था में होते हैं—
१. गलेका सूख जाना ।
२. रजोधर्म में रक्तावष्ट होना ।
३ निर्बलता और हाथ पैरों में जलन ।
गर्भाशयके रोग ।
२७
४. सरदर्द, चमड़े पर रूखापन, ज़िगर की खराबी और कृत्रियत ।
इस प्रकार गर्भाशय की गर्म सूजन के कारण और लक्षण होते हैं ।
१. गर्भाशय की ठंडी मूज्जन । इस को कई कारण हैं—
१. गर्भाशय में ठंडक का पहुंचना ।
२. ठंडी चीजों का अत्यन्त सेवन ।
३. नाभी के नीचे भारीपन ।
४. रजोधर्म में रुकावट ।
५. ज़िगर का खराब होना ।
६. हिचकी, कृत्रियत और पेटका अफ़रा ।
इस प्रकार गर्भाशय की ठंडी सूजन के कारण और लक्षण होते हैं ।
३. गर्भाशय में वाठी की कड़ी मूज्जन— इसको कई कारण हैं—
१. गर्भाशय की गर्म सूजन से कड़ी सूजन होजाना ।
२. रजविकार से एकाएक सूजन हो जाना ।
पेसी सूजन में अनेक लक्षण होते हैं ।
१. पेट्ट के सामने वोभ सा जान पड़ना ।
२. चलने फिरने में पीड़ा ।
३. निर्बलता और साँस का जल्दी जल्दी चलना ।
४. घबराहट और हाथ पैरों में दर्द ।
५. चलते समय में जिस ओर सूजन हो उस ओर के पैर का कँपना । यदि दोनों ओर सूजन हो तो दोनों पैरों का कँपना ।
६. मवाद पड़ जाने पर ज्वर का होना ।
७. यदि सूजन दहिने ओर है तो गर्भाशय दाएँ ओरको
२८
सन्तति-शास्त्र ।
और यदि चाँपे और है तो दहिने और को, यदि आगे है तो पीछे को यदि पीछे है तो आगे को झुक जाता है ।
इस प्रकार गर्भाशय में वाडी की कड़ी सूजन के कारण और लक्षण होते हैं ।
४ गर्भाशय में बड़ी और फैली हुई सूजन-इसके कई कारण हैं ।
१. गरम सूजन से मवाद न निकलने पर ऐसी सूजन पैदा होजाती है ।
ऐसी सूजन के अनेक लक्षण दिखाई देने हैं ।
१ पैरों का सूख जाना ।
२ गरमी बहुत मालूम होना ।
३ आँखों और कनपटी में दर्द ।
४ पेट का निकल आना ।
५ पैरों पर सूजन का होना ।
६ पेट से लेकर छातियों तक दर्द होना ।
७ गर्भाशय में जखम हो जाना । इसके कई लक्षण हैं ।
१. पेट पीठ और कमर में अत्यन्त पीड़ा ।
२ कई रंगों का बदबूदार स्वास होना ।
८ कञ्चित्त, बेचैनी, प्यास दर्द, आँखों की जलन,
पेट का अपफरा, बुरी डकारों का आना, मन्टानि,
पेशाब में जलन और हिचकी आना ।
इस प्रकार गर्भाशय में बड़ी और फैली हुई सूजन के कारण और लक्षण होते हैं ।
(ब) “डाक्टरों का मत ”
इस विषय में डाक्टरों ने चार प्रकार की सूजन मानी हैं ।
(१) घडकी सूजन (२) गर्दन की सूजन (३) डीवारों की सूजन और (४) भीनरी सूजन । इनके अनेक कारण हैं ।
गर्भाशयके रोग ।
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१. वच्चा पैदा होते समयकी असावधानियोंसे गर्भाशय में चोट, रगड़ और दबाव पहुंचना ।
२. गर्भाशय के ऊपर बाहर से किसी प्रकार की चोट पहुंचना ।
३. कम अवस्थावाली स्त्री का पूरे जवान पुरुषके साथ संयोग होने पर इन्द्रिय द्वारा भीतरी चोट पहुंचना ।
४. अति मैथुनसे ।
५. संयोगकी कठोरतासे ।
६. रजवन्द हो जानेसे ।
७. वच्चा पैदा होनेमें देर लगनेसे, जब कि गर्भाशय में दबाव हो जाय ।
८. गर्भाशय में सरदी पहुंचनेसे ।
९. प्रदरके बढ़ जानेसे ।
सृजन दो प्रकारकी होती है—हलकी और भारी । हलकी सृजनमें मामूली लक्षण होते हैं । यह प्रायः अच्छी भी हो जाती है, परन्तु भारी सृजन स्वयं अच्छी नहीं होती और उस में अनेक लक्षण होते हैं ।
१. जाड़े से ज्वर का आना ।
२. पेड़ में बोफ जलन और दर्द ।
३. जाँघ, कमर और रीढ़में पीड़ा ।
४. सारे शरीरमें रह रह कर दर्द होना ।
५. चलने फिरने उठने बैठने में कठिन पीड़ा ।
६. जी मचलना, घुमनी, कै और दस्त/का होना ।
७. गर्भाशय का कड़ा और बड़ा हो जाना ।
८. सरदर्द, सूत्रका सूकना और पाखाना कठिनतासे होना ।
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नन्दानि-शास्त्र ।
१. जब क्रम में दृढ़ हो तो गमांगय के पिछले भागमें सूजन समझनी चाहिये ।
२०. जब पंद्रह में दृढ़ हो और चवकी चने तो गमांगय के मुख पर सूजन समझना चाहिये ।
२१. जब कोखमें दृढ़ हो तो गमांगयकी दीवारोंमें सूजन जाननी चाहिये । जब दहिने कोख में दृढ़ हो तो दहिने और बाँए में दृढ़ हो तो बाँए और । जब दहिने बाँए दोनों और दृढ़ हो तो दोनों और सूजन जाननी चाहिये ।
ये तक्षण और क्रारा गमांगयके थंडकी सूजन, गरदन की सूजन और दीवारों की सूजन के कहे गये हैं । गमांगय की सीनगी सूजन का विदर नीचे लिखा जाता है ।
गमांगयकी सीनगी सूजन दो प्रकारकी होती हैं—एक हल्की दूसरी भारी । पहले हल्की सूजन होती है । जब इसका इतना जोर और तौरमें नहीं होता है तो वह भारी हो जानी है इसके अनेक कारण हैं ।
१. विषम स्वर के होनेसे ।
२. गमांगय के हृंग पहुँचनेसे ।
३. किसी नष्ट हिन जाननेसे ।
४. फेफड़े, गुदके और पालडुगेन के प्रकोपसे ।
५. बच्चा पैदा होने समय की कठिनाईसे ।
६. बच्चा पैदा होनेके बाद गमांगयमें रक्तके जम जानेसे ।
७. बेड़ीका टुकड़ा अन्दर रह जानेसे ।
८. बेड़ी टूटने निकलनेसे ।
९. किसी आँजुलके चोट लगनेसे ।
१०. स्त्रु समयमें सरनी लग जानेसे ।
११. अति मधुन और मधुनमें चोट लग जानेसे ।