शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
अष्टम पटल ] [ १७१ वाग्भव वनिता विष्णोर्माया मकरकेतनः । चतुर्बीजात्मको मन्त्रश्चतुर्वर्गफलप्रदः ॥ अङ्गानि कुर्याद्दीर्घाढ्यचरमाबीजेन मन्त्रवित् ।३० माणिक्यप्रतिमप्रभां हिमनिभैस्तुङ्गै श्चतुर्भिर्गजै- र्हस्ताग्राहितरत्नकुम्भसलिलैरासिच्यमानां मुदा । हस्ताब्जैर्वरदानमम्बुजयुगाभीतीर्दधानां हरेः । कान्तां, कांक्षितपारिजातकलतिकां वन्दे सरोजासनाम् ।३१ भानुलक्षं हविष्याशी जपेदन्ते सरोरुहैः । जुहुयादरुणैः फुल्लै त्तत्सहस्रं जितेन्द्रियः । २ रमायाः कल्पिते पीठे तद्विधानेन पूजयेत् । कुर्यात्प्रयोगांस्तत्रस्थान्मनुना तेन साधकः ।३३ निधिभिः सेव्यते नित्यं मूर्तिमद्भिरुपासितैः । दीर्घा यादिविसर्गान्तो ब्रह्मा भानुर्वसुन्धरां ।३४ वान्ते सिन्यै प्रिया वह्नेर्मनः प्रोक्तौ दशाक्षरः । ऋषिर्दक्षो विराट्छन्दो देवता श्रीः समीरिंता ।३५ देव्यै हृदयामाख्यातं पद्मिन्यै शिर ईरितम् । विष्णुपत्न्यै शिखाप्रोक्ता वरदायै तनुच्छदम् ।३६ वाग्भव-विष्णु भगवान की वनिता-माया-मकरकेतन-यह चार बीजों के स्वरूप वाला मन्त्र चारों वर्गों के अर्थात् धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष के फलों का प्रदान करने वाला होता है। मन्त्र का ज्ञाता दीर्घ से संयुत रमा के बीज के द्वारा अङ्गों को करे ।३०। ध्यान एवं वन्दना बतलाते हैं-माणिक्य के समान प्रभावाली-जिनकी सूडों में रत्नों से निर्मित जल से परिपूर्ण कलश है ऐसे हिम (बर्फ) के सदृश चार गजों के द्वारा आनन्द पूर्वक आसिच्यमान है अर्थात् गजों की सूड़ों में स्थित कलशों से अभिषेक की जा रही है-जिसकी भुजाओं में जो कमल समान कर वाली हैं उनमें वरदान पद्मों का जोड़ा और अभयदान धारण किये हुईं हैं। ऐसी भगवान हरि की कान्ता की जो
१७२ ] [ श्री शारदा तिलक अभीष्ट मनोरथों के लिए कल्प लतिकाके सदृश हैं और कमल के आसन पर विराजमान हैं मैं वन्दना करता हूँ ।३१। हविष्य का भोजन करने वाला पुरुष बारह लाख जप के अन्त में अरुण तथा विकसित कमलों के द्वारा इन्द्रियों को अपने वश में रखते हुए बारह सहस्र आहुतियों का हवन करे ।३२। रमादेवी के कल्पना किये हुए पीठ पर उसके विधान से अभ्यर्चन करे । साधक वहाँ पर स्थित प्रयोगों को उस मन्त्र के द्वारा करे ।३३। वह उपासक उपासना की हुई मूर्तिमान निधियों के द्वारा नित्य ही सेवित हुआ करता है । नकार शक्ति-जिसके अन्त में विसर्ग हों ऐसा ककार और मकार-वकार के अन्त में स्वरूप और स्वाहा-यह दश अक्षरों वाला मन्त्र है । इसका ऋषि दक्ष है तथा विराट् छन्द है और देवता इसका श्रीदेवी कही गयी है ।३४।५। देवी के लिए हृदय कहा गया है और पद्मिनी के लिए शिर बताया गया है । विष्णुपत्नी के लिए शिखा कही गयी है तथा वरदान के लिए तनुच्छद बताया गया है ।३६। अस्त्रं कमलरूपायै नमोऽन्ताः प्रणवादिकाः । अंगमन्त्राः समुद्दिष्टा ध्यायेद्देवीमनुन्यधीः ।३७ जासीना सरसीरुहे स्मितमुखी हस्ताम्बुजैर्विभ्रती । दानं पद्मयुगाभये च वपुषां सौदामिनीसन्निभा । मुक्तादामविराजमानपृथुलोत्तं ङ्गस्तनोद्भासिनी । पायाद्वः कमला कटाक्षविभवैरानन्दयन्ती हरिम् ।३८ दशलक्षं जपेन्मंत्रं मंत्रविद्विजितेन्द्रियः । दशांशं जुहुयान्मंत्रान् मधुराक्तैः सरोरुहैः ।३६ श्रीपीठे पूजयेद्देवीमङ्गानि प्रथमं यजेत् । बलाकाद्यास्ततः पूज्या लोकेशांस्तिस्र।वृतीरपि ।४० इति सम्पूजयेद्देवी संपदामालयोभवेत् । समुद्रगायां सरिति कण्ठमात्र जले स्थितः ।४१
अष्टम पटल ] [ १७३ त्रिलक्षं प्रजपेन्मन्त्री साक्षाद्वैश्रवणोभवेत् । आराध्योत्तरनक्षत्रे देवीं स्रक्चन्दनादिभिः ४२ अस्त्र कमल रूपा के लिये है । ये नमः अन्त वाले तथा प्रणव आदि वाले हैं । ये अङ्ग मन्त्र कहे गये हैं । अनन्य बुद्धिवाला होकर देवी का ध्यान करना चाहिए । ३७। ध्यान और वन्दना बतलायी जाती है-देवी कमल पर विराजमान है-मुख पर मन्द मुस्कान की छटा दिखाई दे रही है-अपने कर कमलोसे वरदान-दो पद्म और अभयदान को धारण किये हुईं हैं-देवी का शरीर विद्युल्लता के सदृश है । जिनके ऊपर मोतियों की माला विराजमान है ऐसे स्थूल एवं समुन्नत स्तनों से सुशोभित हैं-अपने कटाक्षों के वैभव के द्वारा श्री हरि को आनन्दित करती हुए कमला देवी आपका परित्राण करें । ३८। अपनी इन्द्रियों को जीत लेने वाला मन्त्र का ज्ञाता इस मन्त्र का दस लाख जप करे । जप के दशम भाग को मधुर से अक्त कमलों के द्वारा आहुति देवे । ३६। श्रीपीठ पर देवी का यजन करे और अङ्गों का यजन पहिले करना चाहिए । वलाका आदि का इसके अनन्तर पूजन करे और फिर लोकेशों के यजन की तीन आवृत्ति भी करे । ४०। इस रीति से देवी का भला भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए । वह यजन करने वाला सम्पदाओं का निवास स्थान बन जाया करता है । महासागर में गमन करने वाली सरिता में कण्ठ मात्र तक जल में स्थित होकर मन्त्रधारी को तीनलाख जप करना चाहिए । इसके प्रभाव से वह साक्षात् वैश्रवण हो जाया करता है । तीनों उत्तरा नक्षत्रों में माला पुष्प चन्दन आदि के द्वारा देवी की आराधना करे । ४१।४२। नन्द्यावर्तभवैः पुष्पैः सहस्रं जुहुयात्ततः । पौर्णमास्यां फलैर्बिल्वैर्जुहुयान्मधुराप्लुतैः ।४३ पञ्चम्यांविशदाम्भोजैः शुक्रवारे सुगन्धिभिः । अन्यैर्वाविशदैः पुष्पैः प्रतिमासं विशालधीः । स भवेदब्दमात्रेण सर्वदा संपदां निधिः ।४४
१७४ ] [ श्री शारदा तिलक वाग्भवं शम्भुवनिता रमा मकरकेतनः । तार्तीयं हि जगत्पात्रोर्वन्हिबीजसमुज्ज्वलः ।४५ अर्धीशढ्योभृगुस्त्यैहृत् मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । महालक्ष्म्याः समुद्दिष्ट स्ताराद्यः सर्वसिद्धिदः ।४६ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम् । देवता जगतामादिर्महालक्ष्मीः समीरिना ।४७ हस्तौ संशोध्य मन्त्रेण तारादिहृदयांतिकम् । बीजानां पञ्चकं न्यस्येदंगुलीषु यथाक्रमम् ।४८ मंत्रशेषं न्यसेन्मन्त्री तलयोरुभयोरपि । मूर्धादि चरणं यावत् मन्त्रेण व्यापक न्यसेत् ।४६ नदी या आवर्त्त में समुत्पन्न पुष्पों के द्वारा फिर एक सहस्र आहु- तियां देवें । पूर्णिमा तिथि में विल्व के फलों से जो तीनों मधुरों से समाप्लुत होवें हवन करे । पंचमी तिथि में शुक्रवार के दिन विकसित कमलों से होम करे जो सुगन्धित होवें । विशाल बुद्धि वाले को प्रति मास हवन करना चाहिए चाहें कमलों के अभाव में अन्य विकसित पुष्प होवें । ऐसा करने वाला व्यक्ति केवल एक वर्ष पर्यन्त करने पर सम्प- दाओं की निधि हो जाया करता है ।४३।४४। वाग्भव—माया—वीज रमा—मकर केतन—तार्तीय वाला का या भैरवी का स्वरूप यकार—रेफ युक्त लेनप्र—ॐ से आढ्य सकार उससे सू—स्वरूप—हन्तम्—ताराद्य यह मन्त्र द्वादश अक्षरों वाला है जो महा लक्ष्मी का उद्दिष्ट किया गया है । ताराद्य सब सिद्धियों का देने वाला है ।४५।४६। इसके ऋषि ब्रह्मा कहे गये हैं और छन्द गायत्री होता है इसका देवता जगतों का आदि महालक्ष्मी बताई गई है ।४७। दोनों हाथों को भली भाँति-शुद्ध करके मन्त्र के द्वारा तार से आदि लेकर हृदय के समीप तक पाँचो वीजों का क्रमानुसार अंगुलियों में न्यास करना चाहिए ।४८। मन्त्रधारी को चाहिये कि मन्त्र के शेष दोनों तलों में न्यास करे । मूर्धा से आदि लेकर चरण पर्यन्त मन्त्र के द्वारा व्यापक न्यास करना चाहिए ।४६।
अष्टम पटल ] [ १७५ मूर्धादिवक्षोगुह्या ङ्घ्रो पञ्चबीजानि विन्यसेत् । शेषान्यसेत्सप्तवर्णान् हृदये सप्तधातुषु ।५० अङ्गानि पञ्चभिर्बीजैरस्त्रं शिष्टाक्षरैर्भवेत् । ज्ञानैश्वर्यादिभिर्युक्तैश्चतुर्थ्यन्तैः सजातिभिः ।५१ ज्ञानमैश्वर्यशक्ती च बलवीर्ये सतेजसा । ज्ञानैश्वर्यादयः प्रोक्ताः षट्क्रमादंगदेवताः ।५२ एवं न्यस्तशरीरोऽसौ स्मरेदुद्यानमुत्तमम् । चम्पकाशोकपुन्नागपाटलैरुपशोभितम् ।५३ लवंगमालतीबिल्वदेवदारुनमेरुभिः । मंदारपारिजाताद्यैः कल्पवृक्षैः सुपुष्पितैः ।। ५४ चन्दनैः कर्णिकारैश्च मातुलिंगैश्च वञ्जुलैः । दाडिमीलकुचांकोलैः पूगैः कुरवकैरपि ।५५ कदलीकुंदमंदारनालिकेरैरलङ्कृतैः । अन्यैः सुगंधिपुष्पाद्यैर्वृक्षसंघश्च मण्डितम् ।५६ मूर्धा के आदि में—वक्ष—गुह्य और दोनों चरणों में पाँच बीजों का न्यास करे । शेष सात वर्णों को हृदय में न्यास करे । पाँच बीजों से अङ्गों को सप्तधातुओं में न्यास करे और निरन्तर शिष्टाक्षरों द्वारा होवें। ज्ञान ऐश्वर्य आदि से युक्त—सजाति और जिसके अन्त में चतुर्थी विभक्ति हो । ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य तेजके सहित होवे ये क्रम से ज्ञानैश्वर्यादिक अङ्ग देवता कहे गये हैं ।५०।५१।५२। इस रीति से जिसने शरीर में न्यास कर लिया है वह एक उत्तम उद्यान का स्मरण करे जो उद्यान चम्पक—अशोक पुन्नाग और पाटल से उप शोभित होवे ।५३। जो लवंग, मालती, विल्व, देवदारु, नमेरु, मन्दार पारिजात आदि कल्प वृक्षों से शोभा सम्पन्न होवे, जिन वृक्षों में सुन्दर पुष्प भी होवें । चन्दन, कर्णिकार, मातुलिंग, वञ्जुल, दाड़िम, लकुच, कङ्कोल, पूग, कुरवक, कदली, कुन्द, मन्दार, नारियल से अलंकृत होवे—ऐसे ही अन्य सुगन्धित पुष्पादि से तथा वृक्षों के समुदायों से मण्डित होवे ।५४।५५।५६ ।
१७६ ] [ श्री शारदा तिलक मालती मल्लिका जाती केतकी शतपत्रकैः । पारन्ती तुलसी नन्द्यावर्तेर्द मनकैरपि ।५७ सर्वर्तुं कुं सुमोपेतैर्नमद्द्भिरुपशोभितम् । मन्दमारुतसंभिन्नकुसुमामोदिदिङ्मुखम् ।५८ तस्य मध्ये सदोत्फुल्लैः कुमुदोत्पङ्कजैः । सौगन्धिकैश्च कह्लारर्नवं: कुवलयैरपि ।५६ हंसासारसाकारण्ड भ्रमरैश्चक्रनामभिः । अन्यैः कलकलारावैर्विहंगैरुपशोभितम् ।६० तहासरसि तन्मध्ये पुलिनेऽतिमनोहरे । परितः पारिजाताढ्यंमण्डपं मणिकुट्टिमम् ।६१ उद्यदादित्यसंकाश भास्वर शशि शीतलम् । चतुर्द्वारसमायुक्तं हेमप्राकारशोभितम् ।६२ रत्नोपक्लृप्तिसंशोभि कपाटाष्टकसंयुतम् । नवरत्नसमावलृप्त तुङ्गोतुरतोरणम् ।६३ मालती—मल्लिका—जाती—केतकी—शतपत्रक—पारन्ती— तुलसी-नन्द्यावर्त्त—दमनकों से तथा सब ऋतुओं में होने वाले कुसुमों से युक्त नीचेकी ओर झुके हुये होवें । इनसे उपशोभित होवें । ऐसा ध्यान हो—यही स्मरण करना चाहिए । मन्द वायु से विकसित हुए पुष्पों की गन्ध से युक्त जिसमें दिशाओं का मुख होवें ।५७।५८। उसके मध्य में सदा उत्फुल्ल कुमुद उत्पल और पंकज होवें तथा सौगन्तिक—कल्हार नव कुवलय होवें—इनसे उपशोभायमान होवें ।५६। अन्य कल-कल रव (ध्वनि) वाले पक्षियों वह शोभायमान है ! उनमें एक महान् सरोवर है जिसका पुलिन अतीव मनोहर है । दोनों ओर पारिजाति के वृक्ष हैं, उनसे संयुत एक मण्डप है जिसमें मणियों का फर्श लग रहा है ।६०।६१। वह उदोयमान सूर्य के समान है जो परम भास्कर है और चन्द्रमा के सदृश शीतल है । उसमें चार द्वार हैं तथा सुवर्ण की चार दिवारी से परम शोभित है ! वह रत्नों की उपकृति से शोभा
अष्टम पटल ] [ १७७ वाला है अर्थात् उसमें रत्न लगे हुए हैं। उस मण्डप के आठ कपाट (किवाड़) हैं। वह नव रत्नों से अन्वित हैं और उसमें ऊँचे गोपुर और तोरण हैं ।६२।६३। हेमदण्डसमालंबि ध्वजावलिपरिष्कृतम् । नवरत्नसमाबद्धस्तम्भराजिविराजितम् ।६४ सहस्रदीपसंयुक्तदीपदण्डविराजितम् । तप्तहाटकसङ्क्लृप्तवातायनमनोहरम् ।६५ जानावर्णांशुकोबद्धसुवर्णशतकोटिभिः । किंकिणीमालिकायुक्तं पताकाभिरलङ्कृतम् । ६६ जातरूपमयैरत्नविचित्रैरतिविस्तृतैः । माणिक्यरत्नैर्वैदूर्यस्वर्णमालावलीयुतैः । ६७ अन्तरान्तरसम्बद्धरत्नैहृष्टिमनोहरैः । विचित्रैश्चित्रवर्णैश्च वितानैरुपशोभितम् । ६८ सर्वरत्नसमायुक्तं हेमकुट्टिसमुज्ज्वलम् । केतकीमालतीजातीचम्पकोत्पलकेसरैः । ६६ मल्लिकातुलसीजातीनन्द्यावर्तकदम्बकैः । एतैरन्यैश्च कुसुमैरलङ्कृतमहीत लम् । ७० उस मण्डप पर ध्वजाएं लगी हुई हैं, जिससे सुपरिष्कृत हो रहा है और वे ध्वजाएं सुवर्ण रचित दण्डों में बँधी हुयीं हैं। नौ प्रकार के रत्नों द्वारा समाबद्ध खम्भों से शोभायमान है ।६४। सहस्रों द्वीप दण्डों में सहस्रों ही दीपों से समायुक्त है । उस मण्डप में वातायनों की परम सुन्दरता है जो तपाये हुए सुवर्ण से सकॢप्त हैं ।६५। अनेक वर्ण के वस्त्रों से उपबद्ध हैं जिसमें सैकड़ों करोड़ सुन्दर वर्ण हैं । वह किंकिणियों की मालाओं से समन्वित है । और बहुत—सी पताकाओं से युक्त है ।६६। वह वितानों से उपशोभित हैं जो सुवर्ण से परिपूर्ण रत्नों से विचित्र हैं और अत्यधिक विस्तार वाले हैं । जो माणिक्य ( लाल वर्ण का रत्न ) रत्नों से और वैदूर्य एवं स्वर्ण की मालाओं से संयुत है ।६७। बीच-
१७८ ] [ श्री शारदा तिलक बीच में सम्बद्ध रत्नों के द्वारा दृष्टि को मनोहर लगने वाले हैं ऐसे अद्भूत और चित्रों से परिपूर्ण है उन वितानों के द्वारा अतीव मनोहर है !६८। सभी प्रकार के रत्नों से समाबद्ध-सुवर्ण के कुट्टिम वाला तथा अति उज्ज्वल है । केतकी, मालती, जाती, चम्पा, उत्पल केसरों मे, मल्लिका, तुलसी, जाती, नन्द्यावर्त्त, कदम्बो से, इन कथितों के द्वारा तथा अन्य पुष्पों से महीतल अलंकृत है ।६६।७०। अम्बुकाश्मीरकस्तूरीमृगनाभितमालकैः । चन्दनागुरुकर्पूरैरामोदितदितदिगन्तरम् ।७१ एव सञ्चन्त्य मनसा मण्डपं सुमनोहरम् । तन्मध्ये भावयेन्मन्त्रो पारिजातं मनोहरम् ।७२ तस्याधस्तात्स्मरेन्मन्ती रत्नसिंहासनं शुभम् । तस्मिन्सञ्चिन्तयेद्देवी महालक्ष्मीं मनोरमाम् ।७३ बालाक्रद्युतिमिन्दुखण्डविलहत्कोटीरहारोज्ज्वलाम् । रत्नाकल्पविभूषितां कुचनतां शालैः करैर्मञ्जरीम् । पद्मे कौस्तुभभरतनमध्यविरतं सम्बिभ्रतीं सुस्मिताम् । फुल्लाम्भोजविलोचनत्रययुतां ध्यायेत्परां देवताम् ।७४ सिञ्जन्मञ्जीरसंशोभिपादाम्भोजविराजिताम् । नवरत्नगणाकीर्णकाञ्चीदामविभूषिताम् ।७५ मुक्तामाणिक्यवैदूर्यसम्बद्धोदरबन्धनाम् । विभ्राजमानां मध्येन वलित्रितयशोभिताम् ।७६ जाह्नवीसरिदावर्तशोभिनाभिविभूषिताम् । पाटीरपङ्ककर्पूरकुङ्कुमालङ्कृतस्तनीम् ।७७ उस मण्डप के सभी दिशाओं में अम्बु काश्मीर (केशर) कस्तूरी, मृगनाभि, तमाल, चन्दन, गूगल, कपूर से आमोद फैला हुआ था अर्थात् सभी ओर परम सुगन्ध छायी हुई थी ।७१। उसके मध्य में मण्डप में मन्त्रधारी व्यक्ति को परम मनोहर पारिजात की भावना करनी चाहिए । इसके पूर्व मन में अतीव सुन्दर का चिन्तन कर लेवे ।७२। उसके नीचे
अष्टम पटल ] [ १७६ की ओर मन्त्रधारी को परम शुभ रत्नों के सुन्दर सिंहासन का स्मरण करना चाहिए । उस पर मध्य में मनोरमा महालक्ष्मी देवी का स्मरण करना चाहिए ।७३। अब ध्यान बतलाया जाता है—लाल सूर्य के सदृश्य कान्ति से संयुत—चन्द्रमा के खण्ड से शोभित, कोटीर मुकुट हार से समुज्ज्वल, रत्नाकल्प से विभूषित, स्थूल स्तनों से विनम्र होने वाली करों द्वारा मञ्जरी, पद्मयुगल, कौस्तुभ रत्न को निरन्तर धारण करती हुई, स्मित से युक्त आनन वाली, विकसित कमलों के सदृश लोचनों से समन्वित परादेवता का ध्यान करना चाहिए ।७४। बजती हुई मंजीरों से विभूषित चरण कमलों से विराजमान, नौ प्रकार के रत्नों के समूह से समाकीर्ण काञ्चीदाम (कौंधनी) से शोभित भागीरथी गङ्गा नदी के आवर्त (भँवर) के समान शोभा वाली नाभि से विभूषित, पाटीर के पंक, कपूर और कुंकुम से समसंकुल स्तनों वाली महालक्ष्मी का चिन्तन करे ।७५।७७। वारिवाहविनिर्मुक्तमुक्तादामगरीयसीम् । वहन्तीमुत्तरासङ्गेऽन्दुकूलपरिकल्पितम् ।७८ तप्तकाञ्चनसन्नद्धवैदूर्याङ्गदभूषणाम् । पद्मरागस्फुरद्धर्णकङ्कणाढ्यकराम्बुजाम् ।७६ माणिक्यशकलाबद्धमुद्रिकाभिरलङ्कृताम् । तप्तहाटकसंक्लृप्तमालाग्रैवेयशोभिताम् ।८० विचित्रविविधाकल्पकम्बुसंकाशकन्धराम् । उद्यद्दिनकराकारमणिटाटङ्कमण्डिताम् ८१ रत्नाङ्कितलसत्स्वर्णकर्णपूरोपशोभिताम् । जपाविद्रुमलावण्यललिताधरपल्लवाम् ।८२ दाडिमोफलबीजाभदन्तपङ्क्तिविभूषिताम् । कलङ्काशर्यनिर्मुक्तशरच्चन्द्रनिभानाम् ।८३ पुण्डरीकदलाकारनयनत्रसुन्दरीम् । भ्रूलताजितकन्दर्पकरकार्मुकविभ्रमाम् ।८४
१८० ] [ श्री शारदा तिलक वारिवाहों (मेघों) से विनिर्मुक्त मोतियों की लड़ी से महान्, उत्तरा- सङ्ग वहन करती हुई, वस्त्रों से परिकल्पित, तपे हुए सुवर्ण से सन्नद्ध वैदूर्य (मणिविशेष) से निर्मित, अगदों (बाजूवन्द) के भूषण से समन्वित ।७७।७८। पद्मराग मणि के समान स्फुरण करने वाले वर्ण से युक्त कंकणों से संयुत कर कमलों वाली ।७६। माणिक्य (लाल रङ्ग का रत्न विशेष) के खण्ड से आवद्ध अंगूठी से विभूषित, तपे सुवर्ण से क्लृप्त माला तथा धैय्य से सुशोभायमान, माला और विचित्र कम्बु से सदृश कन्धरों वाली, उदीयमान सूर्य के आकार वाली मणि से युक्त, ताटङ्क (तरकी, कान का भूषण) से विभूषित, रत्नों से अंकित शोभित सुवर्ण के कर्णपुरों से उपशोभित, जपा के पुष्प तथा विद्रुम के सदृश लावण्य से ललित अधरपल्लवों वाली, अनार के बीजों की आभा से संयुत दांतों की पंक्ति से शोभायमान्, कलंक की कालिमा से रहित शरत्कालीन चन्द्र के सदृश आनन वाली कमल के दल के आकार वाले तीन नेत्रों से परम सुन्दरी-भृकुटियों के द्वारा जीत लिया है कामदेव के धनुष का विभ्रम जिन्होंने ऐसी भौंहों वाली महालक्ष्मी देवी का चिन्तन करे ।८०।८४। विलसत्तिलपुष्पश्रीविजयोद्यतनासिकाम् । ललाटकान्तिविथविजिताद्र्धंसुधाकराम् ।८५ सान्द्रसौरभसम्पन्नकस्तूरीतिलकाङ्किताम् । मत्तालिमालाविलसदलकाढ्यमुखाम्बुजाम् ।८६ पारिजातप्रसूनश्रीवाह्निधम्मिल्लबन्धनाम् । अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटाङ्कितमस्तकाम् ।८७ सर्वलावण्यसति भवनं विभ्रमश्रियः । तेजसां जन्मभूमिं तां महालक्ष्मी मनोहराम् ।८८ एवं सञ्चत्य यो देवीं हविष्याशी जितेन्द्रियः । भानुलक्षं जपेन्मन्त्र दशांशं जुहुयाद् घृतैः ।८६ जुहुयाच्छ्रीफलैः पद्मैः प्रत्येकमयुतं ततः । तर्पयेत्सलिलैः शुद्धैः सुगन्धैरयुत द्वयम् ।६०
अष्टम पटल ] [ १८१ श्रीबीजस्योदिते पीठे महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् । श्रीबीजेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।६१ शोभित तिल के फूल की श्री पर विजय प्राप्त करने के लिए समु- द्यत सुन्दर नासिका से समन्वित ललाट की कांति के द्वारा पराभूत किये हुए, आधे सुधाकर की किरणों वाली, सान्द्र (घने) सौरभ से युक्त कस्तूरी के तिलक से चिन्हित, मत्त भौंरों की माला से शोभित दलसे संयुत मुख कमल वाली, पारिजात के पुष्पों की शोभा का वहन करने वाले धम्मिल के पुष्पों से बन्धन वाली—बेश कीमती रत्नों से सुघटित मुकुट से युक्त मस्तक से समन्वित, सब प्रकार के लावण्य के निवास स्थान-विभ्रम की श्री का भवन स्वरूप, तेजों के प्रभव का स्थान ऐसी परमाधिक मनो- हर महालक्ष्मी का ध्यान करे । इस प्रकार से उसी देवी का हृदय में चिन्तन करके हविष्य का अशन करने वाला तथा इन्द्रियों को जीतकर वश में रखने वाला होवे । बारह लाख मन्त्र का जप करे और जप का दशम भाग का घृत से हवन करना चाहिए । इसके अनन्तर प्रत्येक का श्री फलों से तथा पद्मों से दश हजार आहुतियाँ देवे । बीस हजार शुद्ध जल द्वारा जिसमें सुन्दर गन्ध हो तर्पण करना चाहिए । श्री बीज के उदित पीठ में महालक्ष्मी का पूजन करे । श्री बीज से आसन देना चाहिए तथा मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे ।८५।६१। पूजयेद्दक्षिणे पार्श्वे देव्याः शङ्करनन्दनम् । अन्यतः पुष्पधन्वानं पुष्पाञ्जलिकरं यजेत् ।६२ अङ्गानि पूर्वमुक्तेषु स्थानेषु विधिवद्यजेत् । उमाद्याः पत्रमध्यस्थाः शक्तीरष्टौ यजेत् क्रमात् ।६३ अथोमा श्रीसरस्वत्यौ दुर्गा धारिणिसंयुता । गायत्री देव्युषा चैवपद्महस्ताः सुभूषणाः ।६४ जह्नुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते । शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्धृतचामरा ।६५
१८२ ] [ श्री शारदा तिलक धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः। संपूज्य राशीन्परितो यजेदथ नवग्रहान् ।६६ अर्चयेद्दिग्गजान् दिक्षु चतुर्दन्तविभूषितान्। ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ।६७ पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः। अभ्यर्च्यदथेन्द्रादीन् तदस्त्राणि वहिर्यजेत् ।६८ देवी के दाहिने भाग में शंकर नन्दन (श्रीगणेश) का अभ्यर्थन करे। अन्य और पुष्पधन्वा (कामदेव) यजन करे जिनके कर में पुष्पांजलि होवे। उनके अङ्गों का पूर्व की भाँति पहिले कथित स्थानों में विधि के साथ यजन करना चाहिए। उमा आदि का जो पत्रों के मध्य में संस्थित हैं इन आठ शक्तियों का क्रम से अभ्यर्थन करे। इसका अनन्तर उमा, श्रीसरस्वती, दुर्गा-धरणी गायत्री देवी, उषा इनका यजन करे जो पद्म करों में लिए हुई हों और सुन्दर भूषणों से विभूषित होवें। जह्नु की सुता (गंगा) और सूर्य की सुता (यमुना) का पूजन करे जो पादों का प्रक्षालन करने के लिए समुद्यत होवे। दोनों पार्श्वभागों में चमर लिए हुए हों ऐसे पद्म निधि और शंख निधियों का यजन करे। पश्चिम में आतपत्र (छत्र) धारी वरुण का पूजन करना चाहिए। सब ओर राशियों का पूजन करके नव ग्रहों का यजन करे। दिशाओं में दिक्पालों गजों का पूजन करे जो चार दांतों से विभूषित होवें। उनके नाम हैं— ऐरावत पुण्डरीक वामन, कुमुद, अञ्जन, पुष्पदन्त, सार्वभौम, सुप्रतीक, ये दिग्गज होते हैं। इसके अनन्तर इन्द्रादिक का यजन करे और उनके अस्त्रों का बाहिर की ओर पूजन करना चाहिए।६२।६८। आगमोक्ते विधिना सुगन्धैः सुमनोहरैः। पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैर्देवींमन्वहमादरात् ।६९ दूर्वाभिराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायषे नरः। दशरात्रं समिद्धेऽग्नौ अष्टोत्तरसहस्रकम् । १००
षष्ठम पटल ] [ १८३ गडूचीराज्यसंसिक्ता जुहुयात्सप्तवासरम् । अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ।१०१ हुत्वा तिलान् घृताभ्यक्तान्दीर्घमायुरवाप्नुयात् । आरभ्यार्कदिने मन्त्री दशरात्रे दिनेदिने ।१०२ आज्याक्तार्कसमिद्धोमादारोग्य लभते ध्रुवम् । कण्ठमात्रोदके स्थित्वा ध्यात्वा देवी दिवाकरे ।१०३ ऊर्ध्वबाहुर्दशशतमष्टोत्तरमिमं हुनेत् । आरोग्यं लभते सद्यो वाञ्छितान्यपि मन्त्रवित् ।१०४ शालीभिर्जुह्वतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रम् । अचिरादेव महती लक्ष्मीः संजायते ध्रुवम् ।१०५ आगम में वर्णित विधि से सुगन्धित और सुमनोहर गन्ध पुष्प आदि उपचारों के द्वारा बड़े आदर से प्रतिदिन देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए ।६६। घृत से अक्त दूर्वाओं से मनुष्य को आयु के लिए हवन करना चाहिए । दश रात्रि में समिद्ध अग्नि में एक हजार आठ आहु- तियां घृत से अक्त गुडची (गुलोय) से देवे जो सात दिन तक देनी चाहिए । जो पुरुष एक सहस्र आठ आहुतियाँ देता है । वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है ।१००।१०१। घृत से अभ्यक्त तिलों का हवन करके मनुष्य दीर्घ आयु को प्राप्त किया करता है । रविवार से आरम्भ करके मन्त्रधारी व्यक्ति प्रतिदिन दश रात्रि पर्य्यन्त आक की समिधा के होम करने से निश्चय ही आरोग्य का लाभ किया करता है । कण्ठ पर्य्यन्त जल में स्थित होकर सूर्य देवी का ध्यान करे और अपनी बाहुओं को ऊपर की ओर कर लेवे और फिर एक सहस्र आठ बार इसका हवन करे तो मन्त्र का ज्ञाता व्यक्ति तुरन्त ही आरोग्य का लाभ करता है । और जो भी मनोवांछित होते हैं उनकी भी प्राप्त किया करता है। जो शालि चावलों के द्वारा अष्टोत्तर सहस्र का नित्य हवन करता है उसको अविलम्ब ही महती (बहुत बड़ी) लक्ष्मी का निश्चय ही लाभ होता है ।१०२।१०५।
१८४ ] [ श्री शारदा तिलक प्रसूनैर्जुहुयान्मन्त्री लक्ष्मीवल्लीसमुद्भवैः । नन्द्यावर्तसमुत्थैर्वा सिद्धार्थैश्च घृतप्लुतैः ।१०६ महतीं श्रियमाप्नोति मन्यते सर्वजन्तुभिः । मरीचैर्जीरकोन्मिश्रैर्नारिकेलरसाप्लुतैः ।१०७ सगुडैराज्यसंकपक्कैरपूपैराज्यलोलितैः । जुहुयात्पयसाहारो मन्त्रविद्विजितेन्द्रियः ।१०८ अष्टोत्तरशतं नित्यं मण्डलाद्धनदोभवेत् । हविषा गुडमिश्रेण जुहुयादर्थवान् भवेत् ।१०९ जपापुष्पाणि जुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् । गृहीत्वा प्रजपेद्भस्म नागवल्लीसमन्वितम् ।११० तिलकं तनुयात्तेन सर्ववश्यकरं भवेत् । ब्रह्मवृक्षसमित्पुष्पैर्ब्राह्मणान्वशयेद्वशी ।१११ जातीपुष्पैश्च राजानं वैश्यान् रक्तोत्पलैः शुभैः । शूद्रान्नीलोत्पलैर्हुत्वा वशयेन्मन्त्रविन्नरः ।११२ मन्त्रधारी व्यक्ति लक्ष्मीवल्ली समुत्पन्न पुष्पों से तथा नन्द्यावर्त से प्रसूत प्रसूनों से और घृत से प्लुत सिद्धार्थों से आहुतियां देता है,वह बहुत बड़ी श्री को प्राप्त किया करता है और सभी प्राणियों के द्वारा मान किया जाता है । जो जीरक से मिश्रित मिरचों से तथा अजाप्लुत नारिकेलोंसे गुड़ के सहित, घृत में पकाये हुए घृत में लोलित पूओं से हवन करे तथा पायस का आहर करे और इन्द्रियों को जीत लेने वाला रहकर नित्य एक सौ आठ आहुतियाँ देवे तो मण्डल में वह धनद हो जाया करता है । गुड़से मिश्रित हवि से हवन करे तो मनुष्य अर्थ वाला होता है ! मंडल का अर्थ उनचास दिन होता है । एक सौ सहस्र वार जपा के पुष्पों से आहुतियाँ देवे और फिर भस्म ग्रहण करके नाग वल्ली से समन्वित करके उससे तिलक करे तो सबको वश्य करने वाला होता है । पलाश के वृक्ष की समिधा और पुष्पों से वह ब्राह्मणों को वशीभूत कर लिया करता है । जाती के पुष्पों से राजा को, रक्त कमलों से वैश्यों को
अष्टम पटल ] [ १८५ और नील कमलों से शूद्रों को मन्त्र का ज्ञाता हवन करके वश में कर लिया करता है ।१०६।११२। पुष्पैर्मधूकजैर्हुत्वा वशमानयति स्त्रियः । कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं यन्त्रभूषितम ।११३ अभिषेकं प्रकुर्वीत विधिना सर्वसिद्धये । कलशान्स्थापयेत्तष पदेषु शुभलक्षणान् ।११४ चन्दनालिप्तसर्वाङ्गानन् दूर्वाक्षतसमन्वितान् । दुकूलवेष्टिताने तान्पूरयेत्तीर्थवारिणा ।११५ नवरत्नममाबद्धं कर्षकाञ्चनकल्पितम् । मध्यकुम्भे क्षिपेत्पद्म यन्त्राढ्यं देशिकोत्तमः ।११६ चन्दनोशीरकर्पूर जातीकङ्कोलकुङ्कुमम् । कुष्ठागरूत्तमालैलायुतं संपिष्य भागतः ।११७ त्रिलोड्य सर्वकुम्भेषु रत्नान्यपि विनिःक्षिपेत् । लक्ष्मी दूर्वा सदाभद्रा सहदेवी मधुव्रता ।११८ मुशली शक्रवल्लीच क्रान्ताऽपामार्गपत्रकान् । प्रियैंगु मुग्दगोधूमव्रीहींश्च सचिलान्यवान् ।११९ उक्त विधि से ही मधूक के पुष्पों से हवन करके स्त्रियों को वश कर लेता है । नवपद स्वरूप वाला यन्त्र विशेष को लिखकर मण्डल यन्त्र में भूषित करे फिर विधि से अभिषेक समस्त सिद्धि के लिए करना चाहिए । उन स्थानों में शुभ लक्षण वाले कलशों की स्थापना करे जो चन्दन से सर्वाङ्ग में आलिप्त होवे और दूर्वा तथा अक्षतों से समन्वित होवे । इनको वस्त्र से वेष्टित करके तीर्थ के जल से भर देवे । उत्तम आचार्य को चाहिए कि कुम्भ के मध्य में एक सौ साठ रत्तियों के प्रमाण वाले सुवर्ण से प्रकल्पित और नौ रत्नों से समाबद्ध यन्त्र से संयुत पद्म को क्षिप्त करे । चन्दन, उशीर (खस) कपूर, जाती, कंकोल, कुंकुम, कुष्ठ, अगरु, तमाल, एला (इलायची) से संयुत भाग बराबर पीस कर सब कलशों में विलोडन करके रत्नों का भी प्रक्षेपण कर देवे । लक्ष्मी,
१८६ ] [ श्री शारदा तिलक दूर्वा, सदाभद्रा, सहदेवी, मधुव्रता, मुशली, शक्रवल्ली, क्रान्ता, अपामार्ग इनके पत्तों को प्रियंगु, गोधूम (गेहूँ), मूंग, ब्रीहि, तिल, यव, शालि तण्डुल, उर्द इनका प्रक्षालन करके इनमें सबक प्रक्षेपण कर देवें । ११९३। ११६। शालितण्डलमाषांश्च प्रक्षाल्यैतेषु निःक्षिपेत् । धात्रीलकुचबिल्वानां कदलीनालिकेरयोः ।१२० फलान्यपि विनिःक्षिप्य पुष्पाण्येतानि निःक्षिपेत् । पद्मं सौगन्धिकं जाति मल्लिकां वकुलं तथा ।१२१ चम्पकाशोकपुन्नागतुलसीकेतकोद्भवम् । पल्लवानि वटाश्वत्थप्लक्षोदुम्बरशाखिनाम् ।१२२ ब्रह्मकूर्चं विनिःक्षिप्य चम्पकैः सफलान्वितैः । पिधाय कुम्भवक्त्राणि क्षौमैराच्छादयेत्ततः ।१२३ आवाह्य मध्यकलशे महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् । यजेदुमायाः शिष्टेषु कलशेष्वष्टसु क्रमात् ।१२४ गन्धैर्मनोहरैः पुष्पैर्धूपदीप समन्वितैः । निवेद्य भक्ष्यभोज्यानि तान्स्पृष्ट्वा प्रजपेन्मनुम् ।१२५ त्रिसहस्रं, जपस्यान्ते साध्यमानीय संयतम् । संस्थाप्य स्थण्डिले पीठं तस्मिस्तं विनिवेशयेत् ।१२६ धात्री (आँवला) लकुच, विल्व, केला, नारियल में फलों का निक्षे- पण करके इनके पुष्पों का भी क्षेपण कर देवे । पद्म, सौगन्धिक, जाती मल्लिका, वकुल, चम्पक, अशोक, पुन्नाग, तुलसी और केतकी से समु- त्पन्न पुष्प लेवे और प्रक्षिस करे । वट, अश्वत्थ (पीपल) प्लख (पाखर) उदुम्बर ( गूलर ) के वृक्षों के पत्ते तथा फलान्वित चम्पक के सहित ब्रह्म कूर्च को निःक्षिप्त करके कुम्भों के मुखों को ढककर क्षौम वस्त्र से आच्छादित कर देवे । जो मध्य में कलश है उसमें भली भाँति आवाहन करके महालक्ष्मी का पूजन करे । शेष बचे हुए कलशों में जो आठ हैं क्रम से उमा आदि का यजन करना चाहिए । सुगन्ध, सुन्दर पुष्प, धूप,
अष्टम पटल ] [ १८७ दीप, भक्ष्य, भोज्य उनको निवेदित करके स्पर्श करके फिर मन्त्र का जप करे । तीन सहस्र जप करके अन्त में साध्य का अनायन करे जो सङ्गत हो । स्थण्डिल में संस्थापन करके उसमें उसका विनिवेश करना चाहिए ।१२०।१२६। रम्यैराभरणैर्वस्त्रै रलङ्कृत्य समादरात् । सुमङ्गलीभिर्नारीभिः क्षिप्तपुष्पाक्षतान्वितम् । १२७ अर्चितानां द्विज तीनामाशीर्वादपुरःसरम् । नदत्सु पञ्चवाद्येषु मुहूर्ते शोभने सुधीः । १२८ मध्यस्थं कुम्भमुत्सृज्य महालक्ष्मीमनुस्मरन् । अभिषिञ्चेत्क्रमादन्यैः कलशैरपि देशिकः ।१२६ करेणास्य शिरःस्पृष्ट्वा प्रयुञ्जीताशिषं गुरुः । भद्रमस्तु शिवं चास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु ।१३० रक्षन्तु त्वां सदा देवाः संपदः सन्तु सर्वदा । अथोत्थायाभिषिक्तः सन् वाससी परिधाय च ।१३१ यथाविधि समाचाम्य दण्डवत्प्रणमुद्गुरुम् । वस्त्रै राभरणैर्धान्यैर्धनैर्गोमहिषादिभिः । १ ३२ दासीदासैश्च विधिवत्तोषयेद्देवताधिया । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्दीनान्धकृपणैः सह ।१३३ उसको सुन्दर भूषणों से — वस्त्रों से आदर के साथ समलंकृत करके फिर सुमङ्गली नारियों के द्वारा उसमें पुष्प और अक्षतों का प्रक्षेपण करावे । पूजित विप्रों के आशीर्वाद पूर्वक वाद्यों के बजाये जाने पर शोभन मुहूर्त में विद्वान् मध्य में स्थित कुम्भ का उत्सर्जन करके महा- लक्ष्मी का अनुस्मरण करते हुए आचार्य क्रम से अन्य कलशों के द्वारा भी अभिषिञ्चन करे । गुरु कर से इसके शिर का स्पर्श करके आशीर्व- चन का प्रयोग करे । आशीर्वचन इस निम्न प्रकार से करे—'कल्याण' होवे—मङ्गल होवे —महालक्ष्मी प्रसन्न होवे । आपको सदा ही देवगण रक्षित रक्खें और सर्वदा सम्पदाएं होवें । इसके अनन्तर अभिषिञ्च
१८८ ] [ श्री शारदा तिलक होकर वस्त्रों का परिधान करे और विधि के साथ आचमन करके गुरु को साष्टाङ्ग प्रणाम करे। और उन गुरुदेव को देव बुद्धि के साथ वस्त्र भूषण धन, धान्य, गौ, महिषी, दासी, दास आदि से विधि के सहित सन्तुष्ट करे। फिर ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा जो दीन, अन्धे और दया के पात्र होवे उनको भी भोजन करावे ।१२७।१३३। महान्तमुत्सवं कुर्यात्शुभभवने बन्धुभिः सह । तदा कृतार्थमात्मानं मन्यते मनुजोत्तमः ।१३४ अभिषिक्तो नरपतिः परान् विजयतेऽचिरात् । पदेच्छुः पदमाप्नोति राजपुत्रो न संशयः ।१३५ अभिषिक्ता सती बन्ध्या सूते पुत्रं महामतिम् । महारोगेषु जातेषु कृत्याद्रोहेषु देशिकः ।१३६ भूतेष दुर्निमित्तादौ विदध्यादभिषेचनम् । सर्वसम्पत्करं पुंसां सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् ।१३७ सर्वरोगप्रशमनं सर्वापद्विनिवारणम् । गर्भरक्षाकरं स्त्रीणां दीर्घायुर्जनकं परम् ।१३८ प्रसूतानामपि स्त्रीणां सूतिकागाररक्षकम् । प्रनष्टपुष्पगर्भाणां पुष्पगर्भाभिरक्षम् ।१३६ आसन्नशत्रुभीतीनां नाशनं च महीभृताम् । अभिषेकमिनं प्राहूरागमार्थविशारदाः ।१४० अपने भाई बन्धुओं के साथ गृह में महान् उत्सव करावे । उसी अवसर पर मनुष्य अपने आपको कृतार्थ मानता है । इस प्रकार से अभिषेक किया हुआ नरपति अपने शत्रुओं पर शीघ्र ही विजय प्राप्त किया करता है। राजपुत्र आदि पद पाने की इच्छा वाला हो तो निश्चय ही पद को प्राप्त कर लेता है—इसमें लेश मात्र की संशय नहीं है। यदि सती वन्ध्या हो तो अभिषिक्त होकर मतिमान् पुत्र का प्रसव किया करती है । आचार्य का कर्त्तव्य है कि महान् रोगों के हो जाने पर-कृत्या द्रोह में-भूतों में और दुर्निमित्तों में अवश्य ही अभिषेक
अष्टम पटल ] [ १८६ करावे। यह अभिषेक पुरुषों के लिए सभी सम्पदाओं का करने वाला होता है—सब प्रकार से सौभाग्यों का और सिद्धियों का प्रदान करने वाला है। स्त्रियों क गर्भ की रक्षा करने वाला है और परमदीर्घ आयु के समुत्पन्न करने वाला है। जो स्त्रियाँ प्रसव कर चुकी हैं उनके प्रसूत गृह की रक्षा करने वाला यह अभिषेक होता है—ऐसा आगमों के ज्ञाता मनीषी गण कहा करते है ।१३४।१४०। वेदादिस्थितसाध्यनाम युगशः श्रीशक्तिमारान्वितं किञ्जल्केषु दिनेशपत्रविलसन्मन्त्राक्षर तद्वहि। पद्म व्यञ्जनकेसरं स्वरलसत्पत्राष्टयुग्मं धरा- विम्बभ्यां वषदन्तया त्वरितया यन्त्रं लिखेद्वेष्टितम् ।१४१ भूपुरद्वयकोणेषु हक्षौ लेख्यौ पुनःपुनः । महालक्ष्मीयन्त्रमिदं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ।१४२ सर्वदुःखप्रशमनं सर्वापद्विनिवारणम् । बहुना किमिहोक्तेन परमस्मान्न विद्यते ।१४३ शम्भुपत्नी श्रिया रुद्धा कमौ भगवतां मही। प्रह्रादित्यौ धरादीर्घा लः क्षादिर्भगवान् मरुत् ।१४४ प्रसीदयुगलं भूयः श्रीरुद्धा भुवनेश्वरी । महालक्ष्म्यै नमोऽन्तः स्यात्प्रणवादिरय मनुः ।१४५ सप्तविंशत्यक्षराढ्यः प्रोक्तः सर्वसमृद्धिदः । कमले हृदयेप्रोक्तं शिरः स्यात्कमलालये ।१४६ शिखा प्रसीद तेनैव कवच चतुरक्षरः । अस्त्रमेतैः पदैः कुर्यात्त्रिबीजपुटितैः पृथक् ।१४७ अब मन्त्र के विषय में बतलाया जाता है—यन्त्रपद्म के रूप वाला है—ऐसा ही उसे लिखे—प्रणव में स्थित साध्य साधक के कर्म का नाम हो अर्थात् उसकी कर्णिका में होना चाहिए। दो वार श्री शक्ति और मार से संयुत होवे—आद्य में किंजल्क में श्रीशक्ति हो और परमें मार और श्री होवे—बारह दलों में शोभित मन्त्र के अक्षर होवे।
१६० ] [ श्री शारदा तिलक उसके बाहिर ककार आदि का व्यंजन होवे । सोलह दलों में स्वर होवे- अन्त में वषट् होवे और धरा बिम्बों से वेष्टित करे—ऐसा ही यन्त्र लिखना चाहिए । भूपुर से दोनों कोणों में ह और क्ष वार-वार लिखे- यही महालक्ष्मी का यन्त्र होता है जो सब ऐश्वर्यों के फल का प्रदान करने वाला है । यह सब दुःखों का शमन करने वाला और सभी आप- दाओं का निवारण करने वाला होता है । इसके विषय में बहुत अधिक क्या कहा जावे—इतना ही पर्याप्त है कि इसके समान अन्य कोई भी यन्त्र ही नहीं है । अब अन्य मन्त्र बतलाते हुए उसका उद्धार कहते हैं—माया बीज श्रीबीज से पुटित होवे—ककार, तकार और एकार से युक्त लकार, ककार और मकार और लकार दीर्घ युक्त होवे—इकार और मरुत एकार से युक्त हो । दो बार प्रसीद पद होवे । पुनः भुवने- श्वरी श्री होवे । महालक्ष्मी के अन्त में नमः यह पद दो और आदि में प्रणव हो—यही मन्त्र होता है—यह सत्ताईस अक्षरों से युक्त होता है जो सभी समृद्धियों का प्रदाता है—ऐसा कहा गया है । हृदय कमल में कहा गया है और शिर कमलालये में बताया गया है—प्रसीद शिखा हैं उसी के चार अक्षरों का कवच बताया गया है । पृथक् तीन बीजों से पुटित इन पदों से अस्त्र करना चाहिए ।१४१।१४७। सिन्दूरारुणकान्तिमब्जवसतिं सौन्दर्यवारि निधिम् । कोटीराङ्गदहारकुण्डल कटीसूत्रादिभिर्भूषिताम् । हस्ताब्जैर्वसुपत्रमब्जयुगलादर्शी वहन्तीं परा- भावीतां परिचारिकाभिरनिशं ध्यायेत्प्रियां शार्ङ्गिणः ।१४८ लक्षं जपेत्फलैर्बिल्वैर्जुहुयान्मनुरोक्षितैः । दशांशं संस्कृते वह्नौ प्राक् प्रोक्तं नैव वर्त्मना। १४६ श्रीबीजोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् । अङ्गावृत्तेर्बहिः पूज्या मूर्त्तयः श्रीधरादया ।१५० श्रीधराख्यं हृषीकेशं बैकुण्ठं विश्वरूपकम् । वासुदेवं सङ्कर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ।१५१