शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
२६६ ] [ श्रीशारदा तिलक वामोरुन्यस्ततद्धस्तस्तदधस्तो दक्षिणेन धृताऽभयाः । अम्बुजाड्यकरोभानुर्दंष्ट्राभीममुख शनिः ।११ राहुविकृतवक्त्रः स्यात्केतुः स्याद्विहिताञ्जलिः । लोकपालास्ततः पूज्या वज्राद्यस्रैः सह क्रमात् ।१२ एवं सिद्धमनुर्मंत्री सम्पदां वसतिर्भवेत् । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं तारविभूषितम् ।१३ तारापतिं स्मरन्मंत्री त्रिसहस्रं मनु जपेत् । राज्यैश्वर्यं दरिद्रोऽपि प्राप्नुयाद्वत्सरान्तरे ।१४ पूर्वोक्तसंख्यं प्रजपेत् शशिनं मूर्ध्नि चिन्तयन् । रोगापमृत्युदुःखानि जित्वा वर्षशतं वसेत् ।१५ ब्रह्मचर्यरतः शुद्धश्चतुलंक्षमिमं जपेत् । निधानंभुगतं सद्यः प्राप्नुयाद्यत्नवर्जित ।१६ अपने प्रियतम में समासक्त मन वाली ओर मदके विभ्रर्मों से मन्थर जरोजाक्षी ओर चन्द्र विम्व के समान मुखों वालियों का भली भाँति अभ्यर्चन करना चाहिए ।८। रवि, मङ्गल, बुध, शनि, गुरु, राहु, शुक्र, केतु ये ग्रह दलों के अग्र भागों में पूजने चाहिए ।६। ये स्वर्णवर्णों वाले वस्त्रों से संजित हैं और अपने नाम के आद्य वर्ण के बीजों वाले हैं। इनका वर्ण रक्त, पीत, अरुण, श्वेत, नील, धूम्र, सित और असित है ।१०। ये अपने वाम हस्त को वामोरु पर रखे हुए हैं और दाहिने हाथ में अभय दान धारण करने वाले हैं। भानु के करमें अम्बुज है-दाढ़ों से भयानक मुख वाला शनि है । विकृत मुख वाला राहु होता है । केतु अञ्जलिको विहित करने वाला है-इसके अनन्तर क्रम से वज्र आदि अस्त्रों के सहित पूजने चाहिए ।११२। इस रीति से मन्त्र सिद्ध करने वाला मन्त्रधारी सम्पदाओं का निवास स्थान हो जाता है। हृदय कमल के मध्य में स्थित, मुक्तहार से अलंकृत तारापति का स्मरण करता हुआ दो हजार मन्त्र का जप करे । तो दरिद्र पुरुष भी एक ही वर्ष के बीच में राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त कर लियाँ करता है ।१३।
द्वादश पटल ] [ २६७ । ४। मस्तक में चन्द्र का चिन्तन करते हुए पूर्व कथित संख्या में जप करे तो वह रोग—अपमृत्यु और दुःखों को जीतकर सौ वर्ष तक स्थित रहा करता है । १५। ब्रह्मचर्य से रत होकर शुद्ध होवे और इसका चार लाख जप करे तो यत्न रहित होते हुए भी भूमि में रहने वाले निधान को तुरन्त ही प्राप्त कर लेता है ।१६। जितेन्द्रियो जपेन्मंत्रं पौर्णमास्यां विशेषतः । भवेत्सौभाग्यनिलयः सम्पदामपरोनिधि ।१७ घोरान् ज्वरान् शिरोरोगानभिचारानुपद्रवान् । विष,णमपि संघातं नशियेन्मनुनाऽमुना ।१८ पूर्णमास्या निराहारो दद्यादर्घं विदूदये । प्राक्प्रत्यगायतं कुर्याद्भूतले मण्डलत्रयम् ।१६ निषण्णः पश्चिमे मन्त्री मण्डले विहितासने । मध्यस्थे स्थापयेत्पश्चात् पूजाद्रव्याण्यशेषतः ।२० अन्यस्मिन्मण्डले सोममर्चयित्वाम्बुलान्विते । राजतं चषकं तत्र स्थापयेत् पुरतः सुधीः ।२१ गोदुग्धेन समापूर्य स्पृष्ट्वा तं प्रजपेन्मनुम् । अष्टोत्तरशतं पश्चाद्विद्यामन्त्रेण देशिकः ।२२ दद्यादर्घं शशाङ्काय सर्वकार्यार्थसिद्धये । अनेन विधिना कुर्यात्प्रतिमासमहतन्द्रितः ।२३ मन्त्र का जप जितेन्द्रिय होकर करे और विशेष रुप से पौर्णमासी में करे तो वह सौभाग्यका स्थान हो जाता है और सम्पदाओं का दूसरा निधि ही बन जाया करता है ।१७। इस मन्त्र के द्वारा घोर ज्वर-शिरो रोग-अभिचार-उपद्रव विषों के संघानों का विनाश कर दिया करता है ।१८। पौर्णमासी में निराहार रहकर चन्द्रोदय के समय में चन्द्रमाको अर्घ्य देवे । पूर्व और पश्चिममें भूतलायत तीनमण्डल बनावे ।१९। मन्त्रधारी मण्डल में विहित आसन पर पश्चिम में स्थित होवे । पीछे मध्य में सम्पूर्ण पूजा ने द्रव्यों को स्थापित करे ।२०। अम्बुजान्वित
२६८ ] [ श्रीशारदा तिलक अन्य मण्डल में सोम का अर्चन करके सुधी को चाँदी से निर्मित चषक से वहाँपर आगे स्थापित करना चाहिये ।२१। गायके दूध से समापूरित करके उसका स्पर्श करे और इस मन्त्र का जप करे । पीछे एक सौ आठ विद्या तन्त्र के द्वारा आचार्य चन्द्रमा के लिए सब कार्यों की विधि के लिये अर्घ्य देवे । इसी विधिसे प्रत्येक मासमें अतन्द्रित रहकर करना चाहिये ।२२-२३। षण्मासाभ्यन्तरे सिद्धि साधकेन्द्रः समश्नुते । प्रियमत्पूर्जितान् पुत्रान् सौभाग्यं पुष्कलं यशः ।२४ कन्याभिष्टामवप्नोति कन्यापि वरमाप्नुयात् । वहुना किमिहोक्तेन सर्व दद्यान्निशापतिः ।२५ विद्ये विद्यामालिनति स्याच्चन्द्रिण्यन्ते ततो भवेत् । पुनश्चन्द्रमुखिस्वाहा विद्यामन्त्र उदाहृतः । २६ ततोघृणिर्भृ गः पश्चाद्वामकर्णविभूषितः । वह्न्यासनेामरुच्छेषेः ससुत्रोत्रिस्त्यपश्चिमः ।२७ अष्टाक्षरोमनुःप्रोक्तोभानोरभिमतप्रदः । देवनागोमुनिः प्राक्तोगायत्री छन्द ईरितम् ।२८ आदित्यो देवता प्रोक्तोदृष्टादृष्टफलप्रदः । सत्याय हृदयं प्रोक्तं ब्रह्मणे शिर ईरितम् ।२६ इससे छै मास के अन्दर ही साधक सिद्धियों प्राप्तकर लिया करता है । श्री-अत्यन्त ऊर्जित पुत्र-सौ भाग्य-पुष्कल यश-अभीष्ट कन्या और कन्या भी अभीष्ट वर की प्राप्ति करती है। बहुत अधिक कथन से क्या लाभ है यही पर्याप्त है कि चन्द्रदेव सभी कुछ दे दिया करते हैं। ।२४-२५। मन्त्रका उद्धार बताया जाता है-विद्ये विद्यामालिनि- चन्द्रिणि चन्द्रमुखि स्वाहा-यह विद्या मन्त्र बताया गया है ।२६। अब- सूर्य का मन्त्र बताया जाता है-घृणि-वह स्वरूप है, भृगु-सः नाम वर्ण-ऊ-इससे भूषित अर्थात् 'सू'-मरुन - यकार, वह्नि-रेफ के आसन वाला अर्थात् जिस पर रकार हो, शेष-ना, सेमेघ इकार युक्त
द्वादश पटल ] | २६६ अ.त्रद, स्य अन्तिम होता है। यह भानुदेय का अभिमत का प्रदाता आठ अक्षरों वाला मन्त्र बताया गया है। कल्याण हृदय कहा है और ब्रह्मणे शिर कहा गया है। २७-२६। विष्णवे स्याच्छिखा वर्म रुद्राय परिकीर्तितम् । अग्नयेनेत्रमाख्यातं शर्वाययास्त्रमुदीरितम् । ३० तेजोज्वालामणिहुंफट्द्विठान्ताः पृथगीरिताः । अंगमन्त्रान्विन्यस्येत्पञ्च मूर्तीर्यथाक्रमम् । ३१ आदित्यं विन्यसेन्मूर्ध्नि रविं मुखगतं न्यसत् । हृदये भानुनामनं भास्करं गुह्यदेशतः । ३२ सूर्य चरणयोर्न्यस्येद्व्रस्वैः सद्यादिपञ्चभिः । प्रधानमूर्तिप्रतिमाःसर्वाभरणभूषिताः । ३३ मूर्द्धास्यकण्ठहृदयकुक्षिनाभिध्वजाङ्घ्रिषु । मन्त्रवर्णान् न्यसेक्यो प्रत्येकं प्रणवादिकान् । ३४ विष्णवे - यह शिखा है, रुद्राय - वह वर्म कीर्तित किया गया है। अन्नेये नेत्र कहा है और शर्वाय अस्त्र होता है। दो ठकार और स्वाहा है, तेजो ज्वाला मणिहूँ फट् - यह होता है। फिर अङ्ग मन्त्रोंका न्यास करना चाहिये और यथा क्रम पाँच मूर्तियों का करे । ३०-३१। आदित्य का मूर्धा में विन्यास करे और रवि का मुख में न्यास करे। हृदम में भानु का और भास्कर का गुह्य देश में न्यास करना चाहिये । ३२। सूर्य, का चरणों में सद्यादि पाच व्याहृतियोंहैके साथ न्यास करे। प्रधान मूर्ति की प्रतिमायें सग आभरणों से भूषित हों । ३३। मूर्धा, मुख, कण्ठ हृदय, कुक्षि, नाभि, ध्वज और चरणोंमें प्रणव जिसके आदिमें होवे ऐसे प्रत्येक मन्त्र के वर्णों का न्यास करना चाहिए। ३३-३४। एवं न्यस्यशरीरोऽसौ चिन्तयेत्तेजसांनिधिम् । ३५ रक्ताब्जयुग्माऽभयदानहस्तं केयूरहारांगदभूषणाढ्यम् । मणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्ति विलसत्त्रिनेत्रम् । ३६
२७० ] [ श्रीशारदा तिलक वसुलक्षं जपेन्मंत्र समिद्भिः क्षीरशाखिनाम् । तत्सहस्रं प्रजुहुयात् क्षीराक्ताभिर्जितेन्द्रियः । ३७ पीठस्य क्लृप्तेः प्रथमं दिक्षु मध्ये च संयजेत् । प्रभूतं विमलं सारं समाराध्यमनन्तरम् । ३८ परमादिसुखं पीठं स्वम्बिान्तं प्रकल्पयेत् । दीप्तः सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला पुनः ।.६। अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । दीप्तदीपशिखाकारा बीजान्यासां विदुः क्रमात् ।४० इस तरह से शरीर में न्यास किया हुआ साधक तेजों के निधि का चिंतन करे । ३५। ध्यान-हाथों में रक्त कमलो का जोड़ा और अभय- दान धारण करने वाले केयूर-अङ्गद हार आदि भूषणों से अन्वित- मस्तक में माणिक्य धारी-बन्धूक पुष्प के समान कांति वाले-तीन नेत्रों से भूषित दिन नाथ का मैं स्तवन करता हूँ । ३६। दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओं से आठ लाख मन्त्र का जप करके एक सहस्र का होम करे । क्षीर से अवन समिधाओं से तन्द्रा रहित होकर हवन करना चाहिये । ३७। क्लृप्त पीठ के प्रथम दिशाओं में और पीछे मध्य में यजन करे । अनन्तर में प्रभूत, विमल और सार का समाराधन करके अपने विम्बके अन्त में परमादि सुख पीठ की कल्पना करनी चाहिए । पीठ शक्तियोंके नामों का परिगणन किया जाता है-दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, मुद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता, और सर्वतोमुखी-ये पीठ शक्तियाँ होती हैं । क्रम से बीजन्यास दीप्त दीप की शिखा के आकार वाली का जानना चाहिए । ३८-४०। अक्लीवह्रस्वत्रितस्वरान् बिन्दुग्निसंयुतान् । वदेत्पदं चतुर्थ्यन्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ४१ सौराय योगपीठाय तमः पदमनंतरम् । पीठमंत्रोऽयमाख्यातो दिनेशस्य जगतपतेः ।४२
द्वादश पटल ] [ २७१ तारादि खं खखोल्काय मनुना मूत्तिकल्पना । साक्षिणः सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३ अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्क्रमूर्त्तयः । आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्य्याः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४ स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् । उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्त्तिताः ।४६ पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् । चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो वहिः ।४७ इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् । एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८ दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते । प्रभाते मण्डल ं कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६ पात्र ं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् । निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५० ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअं त वालाबोले । इसके अनन्तर-सौरया योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए। यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो- ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा- हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे ओर दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए । आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये । ।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।
२७० ] [ श्रीशारदा तिलक वसुलक्षं जपेन्मंत्र समिद्भिः क्षीरशाखिनाम् । तत्सहस्रं प्रजुहुयात् क्षीराक्ताभिर्जितेन्द्रियः । ३७ पीठस्य कॢप्तेः प्रथमं दिक्षु मध्ये च संयजेत् । प्रभूतं विमलं सारं समाराध्यमनन्तरम् । ३८ परमादिसुखं पीठं स्वम्व्रान्तं प्रकल्पयेत् । दीप्तः सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला पुनः । ३६। अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । दीप्तदीपशिखाकारा बीजान्यासां विदुः क्रमात् ।४० इस तरह से शरीर में न्यास किया हुआ साधक तेजों के निधि का चिंतन करे । ३५। ध्यान-हाथों में रक्त कमलों का जोड़ा और अभय- दान धारण करने वाले केयूर-अङ्गद हार आदि भूषणों से अन्वित- मस्तक में माणिक्य धारी-बन्धूक पुष्प के समान कांति वाले-तीन नेत्रों से भूषित दिन नाथ का मैं स्तवन करता हूँ । ३६। दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओं से आठ लाख मन्त्र का जप करके एक सहस्र का होम करे । क्षीर से अवत समिधाओं से तन्द्रा रहित होकर हवन करना चाहिये । ३७। कॢप्त पीठ के प्रथम दिशाओं में और पीछे मध्य में यजन करे । अनन्तर में प्रभूत, विमल और सार का समाराधन करके अपने विम्बके अन्त में परमादि सुख पीठ की कल्पना करनी चाहिए । पीठ शक्तियोंके नामों का परिगणन किया जाता है-दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, मुद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता, और सर्वतोमुखी-ये पीठ शक्तियाँ होती हैं । क्रम से बीजन्यास दीप्त दीप की शिखा के आकार वाली का जानना चाहिए । ३८-४०। अक्लीबह्रस्वत्रितस्वरान् बिन्द्वग्निसंयुतान् । वदेत्पदं चतुर्थ्यन्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।४१ सौराय योगपीठाय तमः पदमनंतरम् । पीठमंत्रोऽयमाख्यातो दिनेशस्य जगत्पतेः ।४२
द्वादश पटल ] [ २७१ तारादि खं खखोल्काय मनुना मूर्तिकल्पना । साक्षिणं सर्वलोकानां तस्यामावाह्य पूजयेत् ।४३ अङ्गानि पूजयेदादौ दिक्पत्रेष्वर्कमूर्त्तयः । आदित्याद्याश्चतस्रोऽर्च्यः शक्तयः कोणपत्रगाः ।४४ स्वस्वनामादिवर्णाः स्युस्तासां बीजान्यनुक्रमात् । उषा प्रज्ञा संध्या शक्तयः परिकीर्तिताः ।४६ पत्राग्रसंस्था ब्राह्मण्याः पुरयोऽरुणमर्चयेत् । चंद्रादानर्चयेत्पश्चाद्ग्रहानष्टौ ततो बहिः ।४७ इन्द्रादींश्च तदीस्त्राणि यथा पूर्वं समर्चयेत् । एव संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् ।४८ दद्यादर्घं प्रतिदिनं वारे वा तस्य चोदिते । प्रभाते मन्डल' कृत्वा पूर्वत्पीठमर्चयेत् ।४६ पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि मनोहरम् । निधाय तत्र मनुना पूरयेत्तच्छुभोदकैः ।५० ह्रस्व त्रियत-अ,इ,उ इन स्वरोंको जो बिन्दु और अग्नि अर्थात् रेफ से संयुत होवे । ब्रह्मा-विष्णु और शिवके स्वरूपवाले पदको चतुर्थीकेअंत वालाबोले । इसके अनन्तर-सौराय योगपीठाय नमः यहबोलना चाहिए। यह जगतपति दिनेश्वर का पीठ मन्त्र बताया गया है।४१-४२। खखो- ल्काययह स्वरूप है-जिसमें प्रणव आदिमें हो ऐसा खं यह मंत्र है । इससे मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें सब लोकोंके साक्षी का आवा- हन करके पूजन करना चाहिए ।४३। आदि में अङ्गों का पूजन करे और दिशाओं के पत्रों में अर्क देव की मूर्तियों का यजन करना चाहिए । आदित्य आदि कोणों के पत्रोंमें स्थित चारों का अर्चन करना चाहिये । ।४४। उन मूर्त्तियों के बीज अनुक्रम से अपने-अपने नामों के आदि वर्ण होते हैं । तथा प्रज्ञा,प्रभा-संध्या, ये शक्तियां बतलायी गयीहै ।४६। पत्रों के अग्र भागों में विराजमान ब्राह्मणी आदि हैं । आगे अरुण का अर्चन करे । पीछे चन्द्रादि आठ ग्रहों को बाहिर समन्वित करनी चाहिए ।४७।
२७२ ] [ श्रीशारदा तिलक इन्द्र आदि ओर उनके अस्त्रों का पूर्व की तरह से समर्चन करे । उस प्रकार से भक्तों पर दया करने वाले भास्कर देव का विधि के साथ पूजन करके प्रतिदिन अर्घ्यदेवे अथवा उनके प्रेरित वार (दिन) में देवे । प्रभात से मण्डल की रचना करके पूर्व की तरह ही पीठ का अर्चन करना चाहिये ।४८-४६। ताम्रगण प्रस्थ से जल का ग्रहण करने वाले- मनोहर पात्र को वहाँ पर रखकर उसे मन्त्र द्वारा शुभ जल से भर देवे ।५०। कुंकुमं रोचना राजी रक्तचन्दनवैणवान् । करवीरजपांशालिकुशश्यामाकतण्डुलान् ।५१। निक्षिपेत्सलिले तस्मिन्नेकग्रं सञ्चिन्त्य भानुना । सांगमभ्यर्चयेत्तस्मिन् भास्करं प्रोक्तलक्षणम् ।५२ गन्धपुष्पादिनैद्यैर्यथाविधि विधानवित् । तत्पिधाय जपेन्मन्त्रं सम्यगष्टोत्तर शतम् ।५३ पुनः संपूज्य गन्धाद्यैर्जानुभ्यामवनि गतः । आमस्तकं तदुद्धृत्य व्योम्नि सावरणं रवौ ।५४ दृष्टि निधाय स्वैक्येन मूलमन्त्रं धिया जपन् । दद्यादर्थं दिनेशाय प्रसन्नेनान्तरात्मना ।५५ कृत्वा पुष्पाञ्जलि भूयोजपेदष्टोत्तरं शतम् । यावदर्घ्यामृतं भानुः समादत्ते निजैः करैः ।५६ उनमें कुंकुम, रोचना, राजी, रक्त, चन्दन, वैष्णव, करवीर, जपा, शाली, कुश, श्यामा तण्डुलों का निक्षेप कर देवे । उस जल में भानु के साथ एकता का चिन्तन करना चाहिये । उसमें कहे हुये लक्षणों वाले भास्कर का अङ्गों के सहित अर्चन करना चाहिये ।५१-५२। विधान का ज्ञाता तथा गन्ध-पुष्प और नैवेद्य आदि से अर्चन करे । उसको ढककर भली भाँति एक सौ आठ बार मन्त्र जप करना चाहिए ।५३। फिर गन्धादिके द्वारा पूजनकरके घुटनोंसे पृथ्वीपर स्थित होवे । मस्तक तक उसका उद्धार करके व्योम में सावरण दृष्टि रखकर
द्वादश पटल ] [ २७३ मूल मन्त्र का आन्तरिक एकता से जप करे । फिर दिनेश्वर के लिये अर्घ्य देवे और अन्तरात्मा में परम प्रसन्न होकर ही देवे ।५४-५५ फिर पुष्पाञ्जलि देकर पुनः अष्टोत्तर शत मन्त्र का जप करना चाहिए जब तक सूर्य अपने करों से अर्घ्य के अमृत का समाधान करे तब तक करे । ५६। तेन तृप्तो दिनमणिर्दद्यादस्मै मनोरथान् । अर्घदानमिदं पुंसामायुरारोग्यवर्द्धनम् ।५७ धनधान्यपशुक्षेत्रपुत्रमित्रकलत्रम् । तेजोवीर्ययशः कान्तिविद्याविभवभाग्यदम् ।५८ आकाशमग्निदीर्घेन्दुसंयुक्तं भुवनेश्वरी । सर्गान्वितोभृगुर्भानोस्त्रयक्षरो मनुरोरितः ।५६ आधारादिपदाग्रान्तं कण्ठाधारकावधि ! मूर्द्धादिकण्ठपर्यन्तं क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् । षड् दीर्घवरयुक्तेन मध्ययेनाङ्गक्रिया मता ।६० रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि । हृद्मद्ध्याभयवरान् दधतं कराब्जेर्माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम् ।६१ उससे सन्तुष्ट होकर दिनमणि इस लिये मनोरथों को दिया करते हैं । यह अर्घ्यदान पुरुषों को आयु और आरोग्य के बढ़ाने वाला होता है । ५७। इससे धन-धान्य, पशु, क्षेत्र, पुत्र, मित्र, कलत्र की प्राप्ति हुआ करती है और यह तेज, वीर्य, यश, क्रान्ति, विद्या, विभव और भाग्य का देनेवाला होता है । ५८। अब प्रयोजन तिलक मन्त्र बताया जाताहै- आकाश, हकार, अग्नि, रेफ, दीर्घ बिन्दुके सहित था, भुवनेश्वरी-विसर्गों से समन्वित भृगु-सः, यह भानु का तीन अक्षरों वाला मन्त्र है ऐसा कहा गया है । ५६। आधार से आदि लेकर पादोंके अग्रभाग के अन्त तक तथा कण्ठ से आधार की अवधि पर्यन्त-मूर्द्धा से आदि लेकर कण्ठ पर्यन्त
२७४ ] [ श्रीशारदा तिलक क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिये । षट् दीर्घस्वर स युक्त मध्य से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।६०। अब ध्यान कहा जाता है- रक्त अम्बुज के आसन वाले, सम्पूर्ण गुणों का एक महासागर, समस्त जगतों का स्वामी, करकमलों में दो पद्म, वर और अभयदान को धारण करती हुई, मस्तक में माणिक्य रखने वाले, अरुण अङ्ग रुचि से सम- न्वित, तीन नेत्रों के धारण करने वाले भानुदेव का मैं भजन करता हूँ अर्थात् यजन करता हूँ ।६१। भानुलक्षं जपेन्मन्त्रमन्त्राज्येन दशांशतः । तिलैर्वा मधुरासिक्तै र्जुहुयाद्विजितेन्द्रियः ।६२ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे विधानंनामुना रविम् । प्रथमावृत्तिरङ्गैः स्यात् परा चन्द्रादिभिर्ग्रहैः ।६३ तृतीया लोकपालैः स्याच्चतुर्थी स्यात्तदायुधैः । इति संपूज्य निर्माल्यं तेजश्चन्द्राय दीयताम् ।६४ अर्घं प्रागीरितं दद्याद्भानवे संयतेन्द्रियः । सोऽपि रत्नं धनं धान्यं पुत्रपौत्रान्पशूंस्तथा ।६५ वस्त्राणि भूषणादीनि दद्यादस्मै न संशयः । आकाशमग्निपवनसद्यान्तोऽधीशबिन्दुमत् ।६६ मार्त्तण्डभैरवं नाम बीजमेतदुदोहृतम् । पुटितं विम्बबीजेन सर्वकामफलप्रदम् ।६७ ठान्तं दहननेत्रेन्दुसहित तदुदीरितम् । पञ्चह्रस्वाद्यबीजेन पञ्चमूर्त्ति प्रविन्यसेत् ।६८ बारह लाख मन्त्र का जप करे । इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला जप का दशांश घृत से अथवा मधुर से अक्त तिलों से होम करना चाहिए । इसी विधान से पूर्वमें कथित पीठ में रवि का अभ्यर्चन करे । प्रथम आवृत्ति अंगों से होती है और परा आवृत्ति चन्द्र प्रभृति ग्रहों से होती है ।६२-३३, तीसरी आवृत्ति लोक पालों से की जाती है तथा चौथी आवृत्ति उन लोक पालो के आयुधों से होती है । इस रीति से भली भांति पूजन करके निर्माल्य और तेज चन्द्र के लिये देवे ।६४।
द्वादश पटल ] [ २७५ सप्त इन्द्रियों वाला होकर भानु देव के लिये पूर्व में वर्णित अर्घ देना चाहिये । वह भी रत्न, धान्य, पुत्र, पौत्र तथा पशुओं को और वस्त्र और भूषण आदि इसके लिये दे दिया करते हैं-इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है । अब मार्त्तण्ड भैरवी बीज बतलाया जाता है-आकाश- हः, अग्नि-रेफ, पवन-यः, सद्यान्त-ओ, अधीश-ऊः जो बिन्दु से संयुत होता है-यह मार्त्तण्ड भैरव नामक बीज कहा गया है। यह विम्ब बीज के साथ सम्पुटित किये जाने पर सब मनोरथों के फल का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।६७। टान्त-ठः, दहन-रेफ, नेत्र-इ, बिन्दु से सहित होवे अर्थात् अनुस्वार से समन्वित होवे ऐसा यह कहा गया है । पाँच ह्रस्वाद्य बीज से पंच मूर्ति का विन्यास करना चाहिए ।६८। मध्यमादिकनिष्ठान्तमङ्गुलीषु क्रमादिकाः । सूर्याख्यो भास्करो भानुस्तथा रविदिवाकरौ ।६६ शिरोवदनहृद्गुह्यपाददेशे तु ताः पुनः । दीर्घ युक्तेन बीजेन नेत्रान्ताङ्गानि विन्यसेत् । व्यापकं मूलबीजेन कुर्वीत तदनन्तरम् ।७० हेमाम्भोजप्रवालप्रतिमनिजरुचि चारुखट्वाङ्गपद्मे । चक्रं शक्तिं च पाशं सृणिमतिरुचिरामक्षमालां कपालम् । हस्ताम्भोजैर्दधानं त्रिनयनविलसद्देववक्त्राभिरामम् । मार्त्तण्डं वल्लभाद्धं फणिमयमुकुट हारदीप्तं भजामः ।७१ लक्षत्रयं जपेन्मन्त्री बीजं बिम्बपुटीकृतम् । दशांशं कमलैः फुल्लैर्जुहुयान्मधुरीक्षितैः ।७२ पीठे दीप्तादिभिर्युक्तैः कर्णिकायामुषादिकाः । पूर्वादिदिक्षु संपूज्य मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।७३ मध्यमा से आदि लेकर कनिष्ठिका के अन्त तक अंगुलियों में क्रम से विन्यास करे । सूर्य्य भास्कर, भानु, रवि, दिवाकर फिरउनको शिर- मुख, हृदय, गुह्य और पादों के देश में दीर्घ युक्त बीज से नेत्रान्त अंगों का विन्यास करे । उसके अनन्तर मूल बीज से व्यापक न्यास करना चाहिए ।६६-७०। अब ध्यान बतलाते हैं-हेम, अम्भोज, प्रवाल के
२७६ ] [ श्रीशारदा तिलक सदृश अपनी कान्ति वाले-कर कमलों के द्वारा चारु खटाङ्ग, दो पद्म, चक्र, शक्ति पाश, सृणि, अतीव रुचिर अक्षों की माला-कपाल को धारण करते हुए तीन नेत्रों से शोभित चार मुखों से अभिराम-वल्लभाधं फणि मयमुकुट से अन्वित तथा हार से देदीप्यमान भानु का हम भजन करते हैं ।७१। मंत्र को धारण करने वाला पुरुष इस बिम्बपुटीकृत बीज का तीन लाख जप करे । मधुर में उक्षित विकसित कमलों के द्वारा जप का दशांश होम करे । दीप्ता आदि से से युक्त पीठ में कर्णिका में उषादि का पूर्व आदि दिशाओं में भली भाँति अर्चन करके मूल मंत्र से मूत्ति की कल्पना करनी चाहिए ।७२-७३। आवाह्य पूजयेद्देवं वक्ष्यमाणविधानतः । सूर्यादींश्चतुरोदिक्षु विदिक्ष्वन्यं समर्चयेत् ।७४ अङ्गपूजा यथापूर्वं नेत्रमीशानदिग्गतम् । ग्रहानष्टौ ततो बाह्ये लोकपालांस्ततः परम् ।७५ अर्घप्रधानं प्रजपेन्मन्त्री मार्त्तण्डभैरवम् । इतिसिद्धमनुमन्त्री साधयेदिष्टमात्मनः ।७६ शाल्याज्यतिलबिल्वानां लक्षहोमाद्भवेन्निधिः । राजवृक्षसमुद्भूतैः पुष्पैर्होमोरमाकरः ।७७ जपाकुसुमहोमेन वशयत्यचिरात्नृपान् । मातुलिङ्गफलैर्हुत्वा धनमिष्टं लभेत सः ।७८ आवाहन करके आगे कहे गये विधानसे देव का यजन करे । चारों दिशाओंमें सूर्यादिक का तथा विदिशाओंमें अन्य का समर्चन करे ।७४। पूर्व की तरह अङ्गार्चन करे और ईशान दिशा में स्थित नेत्र का फिर बाह्य में आठ ग्रहों का और उनके आगे लोक पालों का पूजन करे । मंत्रधारी अर्धप्रधान मार्त्तण्ड भैरव का जप करे । इस प्रकार से मंत्र की सिद्धि करनेवाला मंत्रधारी अपने अभीप्सितका साधनकरे ।७५-७६। शाली-आज्य (घृत) तिलों की तथा विल्वों की एक लाख आहुतियों के देने से निधि हो जाया करती है । राज वृक्ष के समुद्भूत पुष्पों से किया
द्वादश पटल ] [ २७७ हुआ होम रमाके करने वाला है ।७७। जपा के पुष्पों से किया हुआ होम स्वरूप समय में ही मानवों को वश में कर दिया करता है। मातुलिङ्ग के फलों के द्वारा होम करके यह अभीष्ट धन का लाभ किया करता है।७८। इमं मन्त्रं जपन्मर्त्यः कान्ति पुत्रान्बलं द्युतिम् । वित्तर्द्धिममितां लक्ष्मीं सौभाग्यमपि साधयेत् ।७६ वियददर्धेन्दुसहितं तदादिः सर्गसंयुतः । अजपाख्यो मनुः प्रोक्तोद्व्यक्षरः सुरपादपः ।८० ऋषिर्ब्रह्मा स्मृतो देवी गायत्रीच्छन्दं ईरितम् । देवता जगतामादिः संप्रोक्तो गिरिजारतिः ।८१ हंसा षड्दीर्घयुक्तेन कुर्यादङ्गक्रियां मनोः ।८२ उद्यद्भानुस्फुरियतडिदाकणरमर्द्धाम्बिकेशम् । पाशाभीती वरदपरशु सन्दधानं कराग्रैः । दिव्याकल्पैरमृतमणिमयैः शोभितं विश्वमूलं । सौम्याग्नेयं वपुरवतु वश्चन्द्रचूडं त्रिनेत्रम् ।८३ इस मंत्र का जप करता हुआ मनुष्य कान्ति, पुत्रों, बल, द्युति, अमित वित्तकी ऋद्धि-लक्ष्मी और सौभाग्य का भी साधन किया करता है ।७६। अब आज्या मंत्र बतलाया जाता है-वियत्-हः, र्धेन्दु-विन्दु, तदादि-सः सर्ग अर्थात् विसर्गों से संयुत है-यह अजपा नाम वाला मंत्र कहा गया है जो दो अक्षरों का है और कल्प वृक्ष है अर्थात् मनोवा- ञ्छितों का प्रदाता होता है ।८०। इसका ऋषि ब्रह्मा, आदि स्मृति, गायत्री छन्द कहा गया है । उसका देवता जगतों का आदि गिरिजापति कहा गया है ।८१। षड् दीर्घ युक्त उससे मंत्र की अङ्ग क्रिया करनी चाहिए ।८२। अब ध्यान बतलाया जाता है-उदीयमान भानु और स्फुरण करती हुई विद्युल्लता के आकार से संयुत-अर्द्धाम्बिका के ईश- करों के अग्रभागों के द्वारा पाश, अभय वरदान और परशु को धारण
२७८ ] [ श्रीशारदा तिलक करते हुए मणिमय दिव्य कल्पों से शोभित, विश्व के मूल, सौम्याग्नेय, तीन नेत्रों से सयुत चन्द्रचूड का वपु आपकी रक्षा करे ॥८३॥ भानुलक्षं जपेन्मन्त्रं पायसेन ससर्पिषा । दशांश जुहुयात्सम्यक् ततः सिद्धो भवेन्मनुः ।८४ दीप्तादिपूजिते पीठे प्रागुक्ते पूजयेद्विभुम् । मूत्तिं मूलेन सङ्कल्प्य यजेदङ्गादिभिः सह ।८५ क्रतुं वसुं नरवरौ दिग्दलेषु विदिक्ष्वथ । अर्चयेहृतजां गोजामब्जाख्यामद्रिजां पुनः ।८६ लोकेश्वरांस्तदस्त्राणि पूजयेदेवमन्वहम् । अर्घं च विधिवद्दद्यात्प्राक् प्रोक्तेनैव वर्त्मना ।८७ मन्त्राद्यमातृकाङ्कपूर्णकुम्भं निधाय तम् । पिधाय वामहस्तेन न्यस्तमन्त्रेण संयतः ।८८ इस मन्त्र का बारह लाख जप करना चाहिए घृत से संयुत पायस से जप का दशांश होम करे फिर यह मन्त्र सिद्ध होजाया करता है ।८४ पूर्व में कथित दीप्त आदि से पूजित पीठ में विभु का अर्चन करे । मूल मन्त्र से मूत्ति की कल्पना करके फिर अंगादि के साथ यजन करना चाहिए।८५। क्रतु वसु और नरवरों का यजन करे । दिशाओं के दलों में और विदिशाओं में ऋतजा-गोजा-अन्जा और अद्रिजा का यजन करना चाहिये ।८६। प्रति दिन लोकेशों का तथा उसके आयुधोंका इसी भाँति पूजन करे। पूर्व में वर्णित विधान से ही विधि के साथ अर्थ देना चाहिए ।८७। मन्त्राद्य मातृका पद्म सम्पूर्ण उस कुम्भ को रखकर वाम कर से ढककर न्यास किये हुए मन्त्र द्वारा संयत होकर करे ।८८। अष्टोत्तरशतं मन्त्रं जपेत्तोयं सुधामयम् । स्मृत्वा तेनाभिषिञ्चेद्यं स भवेद्विगतामयः ।८६ आयुरारोग्यविकवानमिताल्लभते नरः । अनेनैव विधानेन विषार्त्तोनिर्विषो भवेत् ।६०
द्वादश पटल ] [ २७६ इन्दुभ्यां विगलत्सुधापरिचित मन्त्रान्त्यबीज ततः । प्राच्ये तत्परमामृतार्द्रशशिना ससिक्तमाद्यं स्मरन् । मन्त्री मन्त्रमिमं जपेद्विषगदोन्मादापमृत्यज्वरान् । जित्वा वर्षशतं विशिष्टविभवोजीवेत्सुखं बन्धुभिः ।६१ व्याहृतित्रयमग्निः स्ताज्जातवेद इहावह । सर्वकर्माणि संभाष्य साधयाग्निप्रियां ततः ।६२ ताराद्योय मन्ः प्रोक्तः पञ्चविंशतिवर्णवान् । ऋिषिर्भृगुर्भवेच्छन्दो गायत्रं देवताऽनलः ।६३ एक सौ आठ बार मन्त्र का जाप करे और उस जल को सुधा से परिपूर्ण स्मरण करके जिसका उससे अभिषिंचन करे वह विगत आमय (रोग) वाला हो जाया करता है ।८६। मनुष्य आयु-आरोग्य और अमित विभवों को लाभ किया करता है। इसी विधान के करने से विष से आत्तं मानव निर्विष हो जाया करता है ।६०। इन्दुओं से गल कर गिरने वाली सुधा से परिचित फिर मन्त्र का अन्तिम बीज-प्राच्य में उस पर अमृत में आर्द्र चन्द्र से संसिक्त आद्य का स्मरण करता हुआ मन्त्रधारी इस मन्त्र का जप करे तो विषगद-उन्माद-अपामृत्यु- ज्वरों को जीतकर विशिष्ट वैभव वाला होते हुए बन्धुओं के साथ सुख पूर्वक सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।६१। व्याहृतियों का जप और अग्नि फिर जात-वेद इहावह। इसके पीछे 'सर्व कर्माणि' यह कहे । फिर 'साधय, -यह पद कहकर स्वाहा' कहे । इसके आदि में प्रणव होता है-यह ऐसा मन्त्र कहा गया है जिसमें पच्चीस वर्ण होते हैं। इसका ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता अनल कहा गया है ।६२-६३। विभक्तैः पञ्चभिः षड्भिश्चतुर्भि पञ्चभिस्त्रिभिः । द्वाभ्यामङ्गक्रिया प्रोक्ता वर्णै मूलमनोः क्रमात् ।६४ अं सामक्तसुवर्णमाल्यमरुणस्रक्चन्दनालङकृतं । ज्वालापुञ्जजटाकलापविलसन्मौलि सुशुल्कांशुकम् ।
२८० ] [ श्रीशारदा तिलक शक्तिस्वस्तिकदर्भमुष्टिकजपस्रक्स्रुवाभीवरान् दोर्भिर्विभ्रतमञ्चितत्रिनयन रक्ताभमग्नि भजे ।६५ गुरोर्लब्धमनुर्मन्त्री चतुर्दश्यामुपोषितः । जपेद्भानुसहस्राणि शुद्धाचारोजितेन्द्रियः ।६६ अमावास्यादिने विप्रान् भोजयेन्मधुरोत्तरैः । भक्ष्यभोज्यैर्यथाशक्ति दद्यात्तेभ्योऽथदक्षिणाम् ।६७ भुक्त्वास्वयं समानीय होमद्रव्याणि शोधयेत् । अपरं दिनमारभ्यहोमं कुर्यादतन्द्रितः ।६८ मूल मंत्र के क्रम से विभक्त पाँच-छै-चार-पाँच-तीन- दो से अङ्ग क्रिया कही गयी है ।६४। अब ध्यान का क्रम कहा जाता है-असामक्त सुवर्णमाल्य से संयुत-अरुण सृक् और चन्दन से सम- लकृत ज्वाला के पुंज के सदृश जटाकलाप से शोभित मस्तक वाले शुक्ल वस्त्रधारी, करों, में शक्ति, स्वस्तिक, दर्भ मुष्टि, जप, माला- स्रुक्, स्रुव्, अभय और वरदानों को धारण किये हुए, तीन नेत्रों से आंचित-रक्त आभा वाले अग्नि देव का सेवन करता है ।६५। मंत्र के धारण करने वाला पुरुष गुरुदेव से मंत्र का लाभ करके चतुर्दशी में उपवास करे और शुद्ध आचार वाला तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बारह सहस्र मंत्र का जप करे ।६६। अमावस्या के दिन में मधुरोत्तर भक्ष्यों तथा भोज्यों से विप्रों को भोजन करावे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए ।६७। स्वयं भोजन करके होम द्रव्यों को लाकर शोधन करे । दूसरे दिन में अशन करके अतन्द्रित होकर होम करना चाहिये ।६८। क्रमाऽवटससिद्व्रीहितिलराजीहविर्घृतैः । प्रत्येकमष्टोत्तरशतं जुहुयाहिनशा सुधीः ।६६ दशाहमेवं निर्वर्त्य विधानेन विधानवित् । दत्त्वा पूर्णाहुतिं सम्यगेकादश्या द्विजोत्तमान् ।१००
द्वादश पटल ] [ २८१ सम्पूज्य तर्पयेद्द्विजैर्यथा विभवमादरात् । गुरवे दक्षिणां दद्यादरुणां गां पयस्विनीम् ॥१०१ वासांसि धरधान्यानि दत्त्वा सम्प्रीणयेत्पुनः । स्वमण्डलान्तं प्रजयेत्पीठं सनवशक्तिकम् ॥१०२ पीता श्वेताऽरुणा कृष्णा धू म्रा तीव्रा स्फुलिङ्गिनी । रुचिरज्वालिनी प्रोक्ता कृशानोर्नव शक्तयः ॥१०३ सुधी पुरुष क्रम से वट की समिध!, व्रीहि, तिल, राजी, हवि, घृत से दिन में ही प्रत्येक का अष्टोत्तर शत होम करे ।६६। विधान के ज्ञाता को चाहिये कि विधि - विधान से दश दिन पर्यन्त इसको करके एकादशी में भलीभांति पूर्णाहुति देकर द्विजोत्तमो का पूजन करके श्रेष्ठ विप्रों को आदर से विभव के अनुसार तृप्त करना चाहिए ।१००। फिर अपने श्री गुरुदेव के लिए दक्षिणा तथा अरुण वर्ण वाली पयस्विनी गौ, वस्त्र, धनधान्य देकर उनकी प्रीणित करे । अपने मण्डल के अन्दर नौशक्तियों से समन्वित पीठ का अर्चन करना चाहिए ।१०१-१०२। अब उन नौ शक्तियों के कर्मोंका परिगणन किया जाता है-पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णों, धूम्रा, तीवा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिर ज्वालिनी और कृशालु-ये नौ शक्तियाँ होती है ।१०३। स्वबीजेनासनं दद्यान्मूर्त्तिमूलेन कल्पयेत् । तत्र सम्पूजयेद्वह्निं विधिना प्रोक्तलक्षणम् ॥१०४ अङ्गपूजां पुरा कृत्वा मूर्तीरष्टौ दलष्विमाः । जातवेदा सप्तजिह्वाहव्यवाहनसंज्ञकः ॥१०५ अश्वोदरजसंज्ञोन्यः पुनवैश्वानराह्वयः । कौमारतेजाः स्याद्द्विश्वमुखोदेवमुखः परः ॥१०६ अर्च्यत्स्वस्तिकशक्तिभ्यां विराजितकराम्बुजाः । लोकेशानर्चयेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् ॥१०७ इतित्सम्पूज्येग्नित्यं जपेन्मात्रं सहस्त्रकम् । जायते वत्सरादर्वाग्वनधान्यसमृद्धिमान् ॥१०८
२८२ ] [ श्रीशारदा तिलक साज्यमन्नं प्रजुहुयाद्वत्सराल्लभते श्रियम् । कुसुमैर्ब्रह्मवृक्षस्य दधिक्षौध्रप्लुतैः ।१०६ करवीरप्रसूनैर्वा मण्डलात्स्यात्समृद्धिमान् । षण्मासं कपिलाज्येन जुहुयाद्वत्सरान्तरे ।११० तस्य संजायते लक्ष्मीः कीर्तिस्त्रैलोक्यवन्दिता। शालिभिर्जुहुयान्नित्यं विधिनाष्टोत्तरशतम् ।१११ अपने बीज के द्वारा आसन समर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । इसके अनन्तर कहे हुए लक्षण वाले वह्नि का विधि के साथ पूजन करना चाहिये ।१०४। पहिले अङ्ग पूजा करके दलों में इस अष्ट मूर्तियों का यजन करे । जात वेदा-सप्तजिह्वा-हव्य वाहन-यशवीदरज-वैश्वानर-कौमार तेजा-विश्य मुख-देव मुख स्वस्तिक और शक्ति के सहित करों में अम्बुज रखे हुए अर्चन करना चाहिए । बाहिर में लोकेशों का जो वज्रायुधों के संयुत होवें अर्चन करे । इस प्रकार से नित्य ही एक सहस्र आठ बार पूजन करना चाहिए इसका यह प्रभाव है कि एक वर्ष के पहिले ही धन-धान्य की समृद्धि वाला हो जाता है ।१०५-१०८। आज्य के सहित अन्न का हवन करना चाहिए । इसमें एक वर्ष में श्री को लाभ क्रिया करता है। ब्रह्म वृक्ष के पुष्पों से जो दही और शहद और घृतसे आप्लुत करके होम करे अथवा करवीर के पुष्पों से होम करे तो मण्डल में समृद्धिमान् हो जाता है । छै मास तक कपिला गौ के घृत से होम करे तो वर्षके अन्दर ही उसको लक्ष्मी और त्रैलोक्य से वन्दित कीर्त्ति हो जाया करती है। शाली से नित्य विधि से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए ।१०६-१११। व्रीहिगोमहिषान्गाद्यैर्भवनां तस्य पूर्यते । तिलहोमेन महतीं लक्ष्मीमाप्नोति मानवः।११२ पलाशविल्वखदिरशमीदुग्धमहीरुहाम् । विकं'कताकारवधयोः समिद्भिः करवीरजैः । ११३
द्वादश पटल ] [ २८३ प्रसूनैः कुमुदैः पद्मैः कह्लारैररुणोत्पलैः । जातीप्रसूनैर्दूर्वाभिर्नित्यमष्टोत्तरं शतम् । ११४। एकेन जुहुयान्मन्त्री प्रतिपत्स्वथ वा सुधीः । साधयेदखिलान्कामान् षण्मासान्नत्र संशयः । ११५ उत्तिष्ठ पुरुष ब्रूयाद्धरिपिङ्गलतत्परम् । लोहिताक्षरपदं देहि मेददापयठद्वयम् । ११६ चतुर्विंशत्यक्षरात्मा समृद्धिमन्नु रीरितः । ऋष्यादयः पुरा प्रोक्ताः षड्भूतकरणैस्त्रिभिः । ११७ चतुर्भियुगलेनार्णैर्मूलमन्त्रसमुद्भवैः । विदधीत षडङ्गानि जातियुक्तानि मन्त्रवित् । ११८ उसका भवन व्रीहि गो-महिषी अन्य आदि से भर जाया करता है। तिलों से होम करने से बहुत बड़ी लक्ष्मीको मानव प्राप्तकर लिया करता है । ११२। पलाश-खदिर-शमी और दूध वाले वृक्ष- विकंकतक, अपावध को तथा करवीर की समिधाओं से कुमुद पद्म-कल्हार-अरुणोत्पल-जाती पुष्प और दूर्वा से तथा नित्य ही एक सौ आठ हवन करे । ११३-११४। मन्त्रधारी से हवन करे अथवा सुधी प्रतिपदा से होम करे । इससे होता सम्पूर्ण मनोरथों का साधन कर लेता है और छै मासों के अन्दर ही सब साधन बन जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११५। अब तुरगगग्निमन्त्रको बताया जाता है-उत्तिष्ठ पुरुष-बोले और इसके पीछे हरि पिङ्गल-यह कहे लोहिताक्षर पद कहकर 'देहि में ददापय और दोठकार कहे। यह चौबीस अक्षरों वाला समृद्धि मन्त्र कहा गया है। इसके ऋषि पहिले ही कह दिये गये हैं। तीन षड्भूत करणों से-चारों से-युगल अर्णों से तथा मूल मन्त्र समुद्भूतों से छै अङ्गों को मन्त्र वेत्ता जाति युक्त करें । ।११६-११८। स्वर्णश्वत्थविनिर्गतं हुतवहं सिन्दूरपुञ्जप्रभं । ज्वालाभिर्निचितांवरोमनिनचय कन्त्या जगन्मोहनम् ।